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Thursday, 18 January 2018

'पद्मावत': अराजकता और वर्चस्व की राजनीति


जैसी कि उम्मीद थी, सुप्रीम कोर्ट ने 'पद्मावत' (पहले 'पद्मावती') फिल्म को देश भर में दिखाए जाने के पक्ष में फैसला सुना दिया। अब इस फिल्म का प्रदर्शन इस बात पर निर्भर है कि राज्य सरकारें सुरक्षा व्यवस्था के मोर्चे पर क्या करती हैं और सुप्रीम कोर्ट के फैसके के बावजूद मारकाट मचाने की धमकी देने वाली 'करणी सेना' या दूसरे उन्मादी तत्त्वों से कैसे निपटती है। खबरों के मुताबिक राजपूत करणी सेना के कार्यकर्ताओं ने मुजफ्फरपुर में एक सिनेमा हॉल के सामने हिंसक प्रदर्शन किया है। देश के अलग-अलग हिस्सों से इस मसले पर फिल्म बनाने वालों और उसके कलाकारों को मार डालने, दफ्न कर देने की धमकियां दी जा रही हैं। यहां तक कहा जा रहा है कि अगर 'पद्मावत' पर पाबंदी नहीं लगाई गई तो चित्तौड़गढ़ में सैकड़ों महिलाएं 'जौहर' करेंगी।

कुछ सालों के दौरान कई ऐसी फिल्में आईं, जिन पर अलग-अलग सामाजिक समूहों ने 'भावनाएं आहत होने' का आरोप लगाया और पाबंदी की मांग की। लेकिन अदालतों में इस तरह की आपत्तियां कानून और तर्क की कसौटी पर नहीं टिकीं और आखिर सिनेमा हॉलों में दिखाई गईं। हां, इस बहाने संबंधित फिल्म को ज्यादा प्रचार मिल गया यह बहस का एक अलग सवाल है। लेकिन इस तरह के विरोध से कला और अभिव्यक्ति की आजादी के अलावा सामाजिक सोच के विकास के सामने जो चुनौती खड़ी होती है, वह किसी भी देशकाल के लिए प्रतिगामी ही है।

भाजपा शासित कई राज्यों की सरकारों ने अपनी ओर से उन राज्यों में 'पद्मावत' के प्रदर्शन पर पाबंदी लगाए जाने की घोषणा की थी। लेकिन यह अपने आप में हैरानी की बात है कि जिस फिल्म को सेंसर बोर्ड ने प्रदर्शन के लिए प्रमाण पत्र दे दिया था, उसे दिखाए जाने पर इन सरकारों को क्या आपत्ति थी! क्या करणी सेना जैसा कोई संगठन इस कदर ताकतवर है कि उसके गैरकानूनी फरमान इस देश में संविधान और कानून के राज का शपथ लेकर राज करने वाली सरकारों पर हावी हैं? सवाल है कि संविधान और कानून का राज ये चुनी गई सरकारें कायम करेंगी या करणी सेना को अपने मध्ययुगीन विचारों को कानून की शक्ल में लागू करने की छूट दी जाएगी? अगर यह सिरा आगे बढ़ता है तो देश में अलग-अलग जातियों के समूहों के संगठनों को किस स्तर तक उनकी मर्जी और मनमानी व्याख्या के हिसाब से देश चलने दिया जाएगा?

मिथक बनाम इतिहास

किसी मिथक को इतिहास समझ लेने या उसे इतिहास के रूप में परोसने के खतरे इसी तरह के होते हैं। 'पद्मावती' को जायसी की रचना के मुताबिक एक काल्पनिक पात्र के रूप में देखा जाता रहा है। लेकिन करणी सेना का जोर उसे इतिहास मानने पर है। और चूंकि पद्मावती की जातिगत पृष्ठभूमि राजपूत मानी गई है, इसलिए उसके किसी मुसलिम शासक से प्रेम करने का संदर्भ भी बर्दाश्त करना संभव नहीं है। मगर जिस देश के मध्यकालीन इतिहास में ऐसे तमाम प्रसंग हैं, जिनमें किसी हिंदू शासक ने मुसलिम शासकों के साथ राजनीतिक और पारिवारिक संबंध भी कायम किए, उसमें कई मौकों पर शादियां भी हुईं, उसके समांतर जायसी की रचना में दर्ज काल्पनिक पात्र 'पद्मावती' के अल्लाउद्दीन खिलजी से प्रेम के संदर्भ को पचा पाना करणी सेना के लिए क्यों मुमकिन नहीं हो रहा है।

पृष्ठभूमि

दो-तीन दशकों के सांप्रदायिक राजनीति का सिरा यहीं पहुंचना था। भारत में सांप्रदायिक राजनीति दमित-वंचित जातियों के अधिकारों को दबाने का हथियार रही है। करणी सेना के रवैये से केवल यह नहीं हो रहा है कि कोई खास जाति किसी फिल्म की कहानी से खुद के अपमानित होने का भाव प्रदर्शित कर रही है, बल्कि उसके जरिए हिंदू ढांचे में मौजूद बाकी जातियों के बीच भी मुस्लिम विरोध की भावना का दोहन करने की यह सुनियोजित कोशिश है। जायसी की रचना में किसी काल्पनिक हिंदू और राजपूत स्त्री के पात्र का किसी मुसलिम शासक से प्रेम पर करणी सेना को आपत्ति है, लेकिन अतीत में समाज के कमजोर तबकों के प्रति राजपूत जाति के व्यवहार का यथार्थ क्या रहा है, उस पर सोचना उसे जरूरी नहीं लगेगा। तो क्या अतीत के उन्हीं ऐतिहासिक संदर्भों पर पर्दा डालने के लिए किसी फिल्म के विरोध के बहाने अपने सामाजिक वर्चस्व को आज भी कायम रखने की कोशिश की जा रही है?

पहले जब संजय लीला भंसाली की ही फिल्म 'बाजीराव मस्तानी' आई थी, तब कुछ दलित-वंचित जातियों के उन सवालों पर गौर करने की जरूरत किसी को नहीं लगी थी जो उन्होंने पेशवाई शासन के इतिहास के बारे में उठाए थे। कई हलकों से यह कहा गया कि बाजीराव पेशवा- दो के कार्यकाल में 'अछूत' समूह में मानी जानी जाने वाली जातियों के खिलाफ जो नियम बनाए गए, वे व्यवस्थागत जातिगत अत्याचार का मॉडल थे। लेकिन एक अंतरधार्मिक प्रेम कहानी के बहाने पेशवाई शासन के उन तमाम प्रसंगों पर पर्दा डालने की कोशिश की गई, जिनके उल्लेख से किसी सभ्य समाज को शर्मिंदगी उठानी पड़ सकती है।

समाजिक समूह बनाम कानून

समय-समय पर कई फिल्मों को लेकर ऐसे विवाद उठते रहे हैं। सामाजिक स्तर पर अलग-अलग समूहों ने अपनी आक्रामक आपत्तियों के साथ किसी फिल्म को प्रतिबंधित करने की मांग की। लेकिन अब तक कानूनी स्तर पर वे लड़ाइयां कमजोर साबित होती रही हैं। सुप्रीम कोर्ट ने 'पद्मावत' को दिखाए जाने की इजाजत देते हुए कहा कि जब 'बैंडिट क्वीन' दिखाई जा सकती है, तो 'पद्मावत' क्यों नहीं! हालांकि 'बैंडिट क्वीन' और 'पद्मावत' की तुलना का क्या संदर्भ हो सकता है, यह समझना मुश्किल है, लेकिन किसी सामाजिक समूह की आपत्तियों के आधार पर किसी फिल्म पर पाबंदी लगाए जाने के विचार के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी कई फैसले दिए हैं।

किसी लोकतांत्रिक समाज में किसी फिल्म के प्रति लोग क्या राय बनाते हैं, यह उनके विवेक पर छोड़ दिया जाना चाहिए। यह संविधान में दर्ज अभिव्यक्ति के मौलिक अधिकार के तहत भी आता है। करीब तीन दशक पहले 'ओरे ओरु ग्रामाथिले' फिल्म को लेकर आपत्तियां उठाई गईं और उस पर पाबंदी लगाने की मांग की गई थी, तब इस मसले पर 1989 में अपने एक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ तौर पर कहा था कि महज हिंसा और विरोध प्रदर्शनों की धमकी के आधार पर अभिव्यक्ति की आजादी को नहीं दबाया जा सकता। इस लिहाज से देखें तो अगर राज्य सरकारें किसी स्थिति में 'पद्मावत' के प्रदर्शन को रोकने में सहायक की भूमिका निबाहती हैं तो वह करणी सेना की धमकियों के सामने समर्पण होगा और निश्चित रूप से कानून के शासन को धता बताने जैसा होगा।

राजपूत करणी सेना के लड़ाकों को यह समझने की जरूरत है कि वे जाति के कथित गौरव के बखान और महिमामंडन की बुनियाद पर इस फिल्म का विरोध तो कर रहे हैं, लेकिन खुद को देशभक्त कहते हुए सुप्रीम कोर्ट के फैसले का खयाल रखने के साथ-साथ संविधान और कानून का पालन करने जैसी उनकी कुछ राष्ट्रीय जिम्मेदारियां भी हैं। जातिगत परंपरा से जुड़ी आस्थाओं या भावनाओं के सामने उनकी नजर में अगर देश का संविधान और कानून कोई मायने नहीं रखते, तो वे खुद तय करें कि उन्हें देशभक्ति और देशद्रोह के किस पैमाने पर देखा जाए!

इस समूचे प्रसंग में एक अहम पहलू यह है कि किसी कहानी या फिर इतिहास के पात्र के रूप में रानी पद्मिनी के जीवन के उस पर हिस्से पर गर्व करने पर जोर दिया जा रहा है, जिसमें पद्मिनी ने सोलह हजार रानियों के साथ 'जौहर' यानी जिंदा आग में जल जाने का 'व्रत' पूरा किया था। आज दुनिया में, जब स्त्री की अस्मिता और अधिकारों का सवाल खुद को सभ्य और लोकतांत्रिक कहने वाली व्यवस्था के सामने चुनौती है, उसमें स्त्री के दमन और शोषण को व्यवस्थागत शक्ल देने वाली परंपराओं पर गर्व करने का आग्रह समाज और देश को किस ओर ले जाएगा? क्या आज की कोई भी वह स्त्री 'जौहर' जैसी परंपरा पर गर्व करने के पक्ष में खड़ी हो सकती है, जो अब पुरुष वर्चस्व वाले समाज और व्यवस्था से अपनी बराबरी के हक के लिए लड़ रही है?

Wednesday, 2 June 2010

हिंसा का दुश्चक्र और सत्ता का “नवउदारवादी” खेल



जनतांत्रिक सिद्धांतों की बुनियाद पर खड़ी कोई सत्ता अगर अपने तंत्र में जन की वाजिब भागीदारी तय नहीं कर पाती तो उससे उपजी विडंबनाओं का चुनौती के रूप में तब्दील हो जाना स्वाभाविक है। विचित्र यह है कि संघर्ष के ‘लोकप्रिय’ तरीकों का हश्र जानने के बावजूद सत्ता और उसके सामने चुनौती पेश करने वाले पक्ष, दोनों ही समस्या को समाधान की दिशा देने के बजाय फिल्मी अंदाज में जनता का दिल जीतने की कोशिश करते दिखाई देते हैं। कुछ समय पहले तक ‘आतंकवाद’ से लड़ती भारतीय राजसत्ता के सामने अब एकमात्र चुनौती ‘माओवाद’ बन चुका है और हिंसा का मसला अब सुविधा के अनुकूल समर्थन और विरोध का सवाल बन रहा है।

मौजूदा संदर्भों में प्रत्यक्ष या परोक्ष कम से कम तीन बिंदु ऐसे हैं जो भारत में इस नवउदारवादी पूंजीवाद के दौर में सत्ता के खेल और चरित्र को समझने में मदद करते हैं। पहला, भारतीय राजसत्ता लगभग ‘सभ्य’ दिखने की कोशिश करती हुई यह कह रही है कि माओवादी हिंसा का रास्ता छोड़ें, तभी उनसे बातचीत होगी। दूसरा, मणिपुर में आर्म्स एक्ट को खत्म करने की मांग के साथ इरोम शर्मिला की भूख हड़ताल दसवें साल में प्रवेश कर चुकी है। और तीसरा, न्याय की मांग का समर्थन करने वाले, माओवादियों को एक पक्ष मानने और उनके साथ राजनीतिक और विचारधारात्मक स्तर पर निपटने की बात करने वाले तमाम लोग या पक्ष सरकार की निगाह में संदिग्ध हैं।

गौर से इन तीन स्थितियों का ही विश्लेषण करने पर कई परतें खुल कर सामने आ जाती हैं कि भारतीय राजसत्ता और उसके संचालक वर्ग का मकसद क्या है और उसे पूरा करने के लिए वे किस हद तक जा सकते हैं। बातचीत के लिए एक शर्त के तौर पर माओवादियों से हिंसा का रास्ता छोड़ने की मांग करने वाली हमारी ‘सभ्य’ सरकार को इरोम शर्मिला की मांग माने जाने लायक नहीं लगतीं तो इसके क्या निहितार्थ हो सकते हैं? यहां मनोरमा बलात्कार कांड और उसके बाद किसी भी सभ्यता को शर्मिंदा कर देने वाले उस सबसे त्रासद आर्तनाद को याद किया जा सकता है, जिसमें महिलाओं ने निर्वस्त्र होकर सत्ता-व्यवस्था को ललकारा था। लेकिन जब उसका कोई असर सत्ता पर नहीं हुआ, तो इरोम की भूख हड़ताल क्या असर डालेगा!

इरोम शर्मिला ने अपनी मांगों के पक्ष में आंदोलन का जो रास्ता अख्तियार किया है, क्या उससे भी चरम अहिंसक रास्ता कोई और हो सकता है? लेकिन हिंसा को सारी समस्याओं का हल और एकमात्र वैकल्पिक रास्ता मानने वाले माओवादियों के साथ-साथ अगर इरोम शर्मिला का रास्ता भी अपने दसवें साल के सफर के बावजूद सरकार के कानों पर कोई असर नहीं डाल पाता, तो अब इस पर न केवल सोचने, बल्कि पूछने की जरूरत है कि आखिर आपकी मंशा क्या है।

ऐसा लगता है कि न्याय की परिभाषा तय करने का अधिकार शायद इन तीनों प्रत्यक्ष पक्षों- यानी सरकार, इरोम शर्मिला और माओवादियों के हाथ से निकल चुका है। घोषित तौर पर लोकतंत्र को अपने शासन का आधार मानने वाली सरकार के एजेंडे में ‘लोक’ की जगह अब क्या है, या उसके लिए ‘लोक’ अब कौन हो गया है, यह धीरे-धीरे साफ होने लगा है। दरअसल, शासन की निगाह में कॉरपोरेटों ने अब ‘लोक’ का रूप ग्रहण कर लिया है और विकास के तर्क पर उनका हित ‘न्याय’ की एकमात्र कसौटी है। ‘विकास आया-विकास आया’ का शोर किस तरह वीभत्सतम हकीकतों को दफन करने का हथियार बन चुका है, इसका सबसे बड़ा उदाहरण उस समय देखने में आया जब पूरी बेहयाई के साथ ‘इंडिया-इंक’ यानी भारतीय उद्योगपतियों का एक समूह नरेंद्र मोदी को देश का भावी प्रधानमंत्री घोषित कर रहा था! हमारे इंडिया-इंक के लिए गुजरात दंगों में मारे गए लोगों की यही कीमत है।

इसलिए नवउदारवादी पूंजीवाद के वाहकों से यह उम्मीद लगाना ही शायद बेमानी है कि वे न्याय की किसी उस अवधारणा के जमीन पर उतरने में मददगार होंगे जिससे सत्ता में उनका हिस्सा थोड़ा कम होता हो या उस वर्ग की भागीदारी सुनिश्चित होती हो जिस पर शासन ही उनकी सत्ता का आधार है। लेकिन विडंबना यह है कि जनतांत्रिक सिद्धांतों के साथ संसदीय राजनीति करने का दावा करने वाले दल भी सत्ता पाने की हड़बड़ी में अक्सर अराजक तत्त्वों का सहारा लेने की हद तक जाते दिखते हैं। पश्चिम बंगाल का उदाहरण इस संदर्भ को समझने के लिए काफी है कि किस तरह माओवादी उग्रवादियों के साथ अनैतिक गठबंधन करके एक खास राजनीतिक दल ने अपनी मौकापरस्ती और सत्ता के लिए तो किसी भी हद तक जाने का सबूत दिया ही, माओवादी उग्रवादियों को भी एक आसानी से इस्तेमाल हो जाने वाले औजार के रूप में पहचान दे दी।

मगर क्या यह हड़बड़ी केवल मुख्यधारा के कुछ राजनीतिक दलों की सीमा है? वे कौन-सी वजहें रही होंगी जिसने भाकपा (माओवादी) के सामने भरोसे का संकट खड़ा किया होगा? हाल ही में पुलिस के हाथों पकड़े गए माओवादी विचारक कोबाद गांधी ने कहा कि लगातार अत्यधिक हिंसा ने हमारे सबसे मजबूत गढ़ आंध्र प्रदेश में हमारी जमीन कमजोर कर दी। कोबाद गांधी की इस स्वीकारोक्ति में संघर्ष के लिए सिर्फ हिंसा का रास्ता और उसकी परिणति को लेकर क्या कोई संदेश निहित है? सवाल है कि सेना तक को ललकारने वाले माओवादी कम से कम अपने प्रभाव वाले इलाकों में अपनी ताकत का इस्तेमाल उन सरकारी बाबुओं और अफसरों को मजबूर कर विकास सुनिश्चित कराने में क्यों नहीं करते, जो बिना घूस लिए मृत्यु प्रमाण पत्र तक नहीं बनाते हैं?

यहां एक ओर वह पक्ष है जो शायद जानबूझ कर इस हकीकत से मुंह चुरा रहा है कि राजसत्ता के पास ‘लोकतंत्र’ की दुहाई है, कानून-व्यवस्था का तर्क है और कोबरा से लेकर सेना तक एक ऐसी सुरक्षा पंक्ति है, जिसका सिरा शायद दुनिया की ‘सबसे बड़ी ताकत’ से जुड़ता है। और दूसरी ओर विकास का ठेका उठाने वाली वे सरकारें हैं, जिन्हें कारणों पर गौर करने या अवधारणाओं में फर्क करने की जरूरत महसूस नहीं होती। उसकी निगाह में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर, मुंबई या पेशावर के चिथड़े उड़ा देने वाले लोगों के बरक्स सत्ता के अत्याचारों के नतीजे में माओवादियों की शरण में गए दलित-आदिवासी बराबर के आतंकवादी हैं!

कमजोर तो यों भी महज मोहरे होते हैं। उन्हें यह समझाना आसान होता है कि इंदिरा आवास और सौ दिन का रोजगार काफी है भारत देश का नागरिक होने पर गर्व करने के लिए। उन्हें राजसत्ता की ‘विकास नीति’ के खिलाफ लोकतांत्रिक संघर्ष के लिए लामबंद करने के बजाए जंगल से लकड़ी काट कर बाजार में बेच कर गुजारा करने, स्कूल का मुंह नहीं देखने, घास-फूस के घर में रहने, बीमार पड़ने पर ओझाओं की शरण लेने और ‘डायनों’ को खोज कर मैला पिलाने, उन पर जुल्म ढाने या मार डालने जैसी परंपराओं को संस्कृति रक्षा के नाम पर बचाए रखने के लिए ‘आंदोलित’ करना भी आसान है। उन्हें यह समझाना भी आसान है कि तीर-धनुष काफी हैं एके-47 से लेकर तोपों-टैंकों तक से मुकाबले के लिए!

भाकपा (माओवादी) या उसके सहयोगी संगठनों का सबसे आखिरी चक्र एक ऐसे सुगठित तंत्र के भीतर रहता है कि वह ‘अपने लिए’ बिना कोई नुकसान उठाए राज्य से ‘टक्कर’ लेगा और नायक भी बना रहेगा। दूसरी ओर, राज्य है, जो ‘वैध’ तरीके से खुल्लमखुल्ला या फिर ‘रणनीतिक’ तौर पर हर जरूरी कदम उठाते हुए गुरिल्ला लड़ाकुओं का सामना करेगा। बीच में है ‘नागरिक’, जिसके पास न तो छापामार युद्ध की ट्रेनिंग है कि वह राज्य पर हमले के तुरंत बाद जंगलों में गुम हो जाए, और न राज्य का सामना करने की ताकत। मगर माओवादियों से लेकर उसकी सुरक्षा पंक्ति के रूप में काम करने वाले तमाम पक्षों के लिए भी वह एक सुविधाजनक मोहरा है और राज्य की बंदूकों के निशाने भी उसी पर टिके हैं।

इस ‘नागरिक’ की त्रासदी को सतह पर दिखते सवालों से समझना इसलिए मुश्किल है, क्योंकि यह सही है कि भूख, अपमान, अन्याय, उपेक्षाओं से त्रस्त और न्यूनतम मानव अधिकारों से वंचित किसी व्यक्ति के पास आखिर रास्ता क्या बचता है। लेकिन ‘मुक्ति’ के नाम पर चलाए जाने वाले अभियान के नाम पर जन अदालतों में किसी न किसी रूप में अपने ही वर्ग के ‘दुश्मनों’ का सफाया करना एक निर्मम सत्ता-व्यवस्था के बरक्स कौन-सा और कैसा विकल्प पेश करता है? राज्य तो एक तरह से ऐसी ‘उकसाने’ वाली घटनाओं के इंतजार में ही खड़ा होता है, ताकि कानून-व्यवस्था से लेकर सलवा-जुडूम तक के तर्क पेश कर दमन को सही ठहरा सके।

माओवादी और राज्य, दोनों ही क्या इस बात का हिसाब कभी लगाएंगे कि इस ‘संघर्ष’ में जिन लोगों की बलि चढ़ाई गई, वे कौन थे? समाज के सबसे कमजोर तबके के रूप में आदिवासी या दलित क्या सिर्फ इस्तेमाल होने या बलि का बकरा बनने के लिए पैदा होते हैं? कभी-कभार कुछ निचले दर्जे के पुलिस वालों की हत्या कर या किसी को अपनी पार्टी छोड़ने की सार्वजनिक घोषणा नहीं करने पर गला रेत कर मार डालने को ‘क्रांति’ घोषित करने वाले माओवादी क्या इस बात से अनजान होते हैं कि उनकी इस तरह की हर ‘बहादुरी’ के बाद राज्य और कितना बर्बर हो जाता है? और कि राज्य के अत्याचारों का शिकार उनके छापामार दस्ते के प्रशिक्षित गुरिल्ला नहीं होते, बल्कि वे निरीह आदिवासी या दलित होते हैं जिन्होंने खुद को बचाने का कोई ‘कारगर तरीका’ अब तक नहीं सीखा है। यानी व्यवस्था या सपना चाहे कोई भी हो, उसकी कीमत समाज के सबसे कमजोर तबकों को ही चुकाना है।

एक तरफ अन्याय और दमन की राजनीति और दूसरी तरफ इसके विरोध में मकसद को बेमानी बना देने वाली हिंसा की जटिल स्थितियों के बावजूद जनतंत्र के तकाजों का सवाल उठाने वालों को भी अगर भारतीय राजसत्ता संदेह के कठघरे में खड़ा करना चाहती है तो इसका मतलब समझने में बहुत मुश्किल नहीं होनी चाहिए। दरअसल, राजनीतिक और विचारधारात्मक लड़ाई की वकालत करने वाले पक्ष माओवादियों को किसी न किसी स्तर पर एक पक्ष के रूप में स्वीकार कर रहे हैं और इस तरह की स्वीकृति आखिरकार नवउदारवादी पूंजीवाद के पैरोकारों, कॉरपोरेटों और उनकी उंगलियों पर नाच रहे लोगों को एक असहज स्थिति में ला खड़ा करेगा।

और भारतीय राजसत्ता फिलहाल जिनके हाथों का खिलौना बनी हुई है, वे देश भर में एक ‘सुविधाजनक’ और ‘सुरक्षित’ हालात चाहते हैं। एक ऐसा सत्ता-तंत्र, जो मौजूदा सामाजिक सत्ता-व्यवस्था का आधुनिक और उदार दिखने वाला चोला हो। आज कॉरपोरेटों की सरकार ‘विकास’ की जिस अवधारणा पर काम कर रही है उसके लिए मुफ्त की आबो-हवा, सस्ती जमीन और सस्ते संसाधन चाहिए। और वे सस्ते मजदूर चाहिए, जिनके लिए श्रम की न्यूनतम मानवीय परिस्थितियां मुहैया कराना जरूरी नहीं होता, किसी भी तरह के श्रम कानूनों के पालन की जरूरत नहीं होती और न वाजिब मजदूरी जैसे कोई सवाल मायने रखते हैं। इसलिए माओवाद के बहाने हिंसा के तर्क को हावी करने और उन तमाम लोगों और पक्षों को संदेह के घेरे में लपेटने की कोशिश हो रही है जो कॉरपोरटों या बहुराष्ट्रीय कंपनियों के पूंजीवादी विकास के बरक्स हक या अधिकार जैसी कोई बाधा सामने रख दे। (यह आलेख जनसत्ता की प्रॉपर्टी है)
(8 दिसंबर 2009 को जनसत्ता में)