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Tuesday, 16 October 2012

मानेसर-मारुति कांडः यकीनन साजिश, लेकिन किसकी...?



मौसम "खराब" हैः माओवादियों का हाथ है...

हाल ही में एक अंग्रेजी टेबलायड ने अपने पहले पूरे पन्ने (इसके अलावा एक और लगभग पूरे पन्ने पर) पर बड़े अक्षरों में लीड स्टोरी छापी, जिसके रिपोर्टर ने खुफिया विभाग के हवाले से बड़े उत्साह के साथ बताया कि हरियाणा में मानेसर के मारुति फैक्ट्री में हुई हिंसा के पीछे माओवादियों का हाथ है। कुछ सत्ता-तंत्र के सुरक्षा विशेषज्ञों के सहारे मामले पर रोशनी डालते हुए रिपोर्टर ने लिखा कि यह दहलाने वाला खुलासा सिर्फ उन आशंकाओं की पुष्टि करता है, जो लंबे समय से जताई जा रही थी। रिपोर्टर के मुताबिक खुफिया एजेंसियों का मानना है के कि शहरी इलाकों में वामपंथी अतिवादियों का आधार फैल रहा है और दिल्ली और समूचा एनसीआर, या राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (फरीदाबाद, गुड़गांव, गाजियाबाद, नोएडा आदि) इलाकों (मजदूरों की हकमारी और शोषण के अड्डे ) में तेजी से फैल रहे हैं। रिपोर्टर कहता है कि अब यह एक तथ्य है। जबकि शुरुआती दौर में हरियाणा पुलिस ने अपनी जांच में मानेसर की घटना में माओवादियों का हाथ होने की बात को खारिज कर दिया था। इस पर रिपोर्टर बड़े राहत-भाव के साथ लिखता है कि "आज यह साबित हो गया है कि वह (हरियाणा पुलिस) गलत थी।"

यह अंदाजा लगाने में मुश्किल नहीं होना चाहिए कि सरकार किसके लिए काम करती है और क्या स्थापित करना चाहती है। पिछले डेढ़-दो दशक के दौरान आतंकवाद और माओवाद से निपटने के नाम पर किस कदर हिंसक और बर्बर खेल खेला गया है, यह किसी से छिपा नहीं है। जहां भी सरकार विफल होती है, अपनी जिम्मेदारियों से भागना चाहती है, या हक और मांगों को खारिज करना या उसका दमन करना चाहती है, वह संबंधित पक्षों को आतंकवादी या माओवादी घोषित कर देती है, ताकि उनके मानवाधिकारों से जुड़े सारे सवाल अपने-आप खारिज हो जाएं और इनके खिलाफ किसी भी हद तक जाने को आम जनता तक सही मान ले।

मनमोहनी उदारवादः सोचना बंद करो...

तो क्या मानेसर-मारुति कांड, उसकी पृष्ठभूमि और उसके बाद के हालात को भारत में मनमोहनी नवउदारवाद की एक स्वाभाविक परिणति के संकेत के तौर पर देखा जा सकता है? और, क्या यह कांड यह समझने के लिए एक संदर्भ है कि पिछले दो दशकों में इस देश की सरकारों ने खालिस दुकानदार की तरह काम किया और एक दुकानदार आखिरकार दूसरे दुकानदार का पेट भरेगा और उसी की ओर से मोर्चा लेगा?

यों इस मानेसर कांड के पहले भी हीरो होंडा से लेकर कई ऐसे मौके आए हैं जो सीधे नब्बे के दशक से जारी मजदूरों की दुश्मन सरकारों की कारगुजारियों का नतीजा थीं। लेकिन भारत की तमाम राजनीतिक-सामाजिक सत्ताओं को अपनी शासित "प्रजा" की लाचारी का शोषण करने और बगावतों से निपटने का सदियों पुराना अनुभव रहा है। इसलिए मजदूरों के असंतोष से खेलने और फिर उन्हें "निपटा" देने में उन्हें कोई दिक्कत पेश नहीं आती। इस लिहाज से मानेसर-मारुति कांड को भविष्य में एक पैमाने के तौर पर इस्तेमाल किया जाएगा, जिसमें निजी क्षेत्र में मजदूरों की ओर से खड़ी होने वाली सबसे जटिल चुनौती से निपटने का एक फार्मूला ईजाद किया गया है।

यह फार्मूला एक तरह से इतना "फुल प्रूफ" था कि शायद ही किसी को ठीक उन बातों पर भरोसा नहीं हुआ जो मारुति के प्रबंधन और पुलिस ने लोगों के सामने परोसा। हालांकि उस वक्त भी कम से कम मानवीय लिहाज से एक बार यह सोचने की गुंजाइश बची थी कि जिन मजदूरों की निर्भरता वह फैक्ट्री है, वे उसे क्यों खाक करेंगे। लेकिन कुछ कर्मचारियों की पिटाई के अलावा एक एचआर मैनेजर को हाथ-पांव बांध कर जिंदा जला दिए जाने की घटना ने सोचने के सारे दरवाजे बंद कर दिए। खबरें सिर्फ उतनी सामने आ रही थीं जितनी प्रबंधन चाह रहा था। पुलिस से लेकर राज्य का समूचा तंत्र मारुति के सामने हाथ-पांव जोड़ने में लगा था।

सौ लोगों की कारगुजारी...!

खबर परोसने की तमाम साजिशें भुक्तभोगियों और मजदूरों के सीने में दफन हो जातीं, अगर विशेष जांच टीम के मुखिया और गुड़गांव पुलिस के एक डीसीपी महेश्वर दयाल का बयान (धोखे से सही) एक अंग्रेजी अखबार ने नहीं छाप दिया होता। नौ अगस्त 2012 के "टाइम्स ऑफ इंडिया" में डीसीपी (पूर्व), महेश्वर दयाल का बयान छपा कि "मारुति-मानेसर कांड में हुई सभी तरह की हिंसा को अंजाम देने वालों में ज्यादा से ज्यादा सौ लोग शामिल थे।" प्रबंधन और पुलिस ने यह तादाद पहले बारह सौ, फिर बाद में साढ़े छह सौ मजदूरों की बताई थी।

सवाल है कि अगर हिंसा को अंजाम देने वाली भीड़ की तादाद ज्यादा से ज्यादा सौ थी तो यह संख्या क्या संकेत देती है? खबरों की भीड़ में से ही किसी तरह कुछ लोगों की नजर घटना के बाद शुरुआती दौर में आई उस खबर पर जरूर गई होगी कि मारुति कंपनी ने 18 जुलाई की हिंसा के डेढ़-दो महीने पहले ही एक से डेढ़ सौ "बाउंसरों" की भर्ती की थी, ताकि वे फैक्ट्री के भीतर "सुरक्षा-व्यवस्था" बनाए रखें। 18 जुलाई को भी जब जियालाल को जातिसूचक गाली दी गई और बात के तूल पकड़ने पर पहली शिफ्ट के कामगार धरने पर बैठ गए तो उन "बाउंसरों" को इन मजदूरों को इर्द-गिर्द खड़ा कर दिया गया। इसके बाद की खबर बस यही है कि हिंसा शुरू हो गई और एक एचआर मैनेजर को जला कर मार डाला गया। यह भी ध्यान रखना चाहिए कि गुड़गांव पुलिस की उपर्युक्त रपट में यह बताया गया कि स्थिति के बेकाबू होने के पहले पचास से ज्यादा की तादाद में पुलिसकर्मी फैक्ट्री में मौजूद थे। यानी सिर्फ सौ लोगों द्वारा की जा रही हिंसा को रोक सकने में पचास से ज्यादा पुलिसकर्मी अक्षम थे। डीसीपी दयाल का कहना है कि पुलिसवाले गेट के बाहर थे और "कामगार" उन्हें धक्का देकर परिसर मे घुस गए।

पूरा मामला ही संदिग्ध लगता है।

आइए कल्पना करें...

चलिए, इसके बरक्स हम एक काल्पनिक दृश्य की रचना करते हैं। मारूति प्रबंधन, हरियाणा सरकार, पुलिस और अदालतें मेरे गढ़े गए इस दृश्य को महज खयाल और तुक्केबाजी मानें।

तो दृश्य यह है कि जियालाल पर जातिगत टिप्पणी के बाद नाराज होकर धरने पर बैठे मजदूरों को धीरे-धीरे सुरक्षा के नाम पर "बाउंसरों" ने घेर लिया। मजदूर सुपरवाइजर के खिलाफ कार्रवाई की मांग पर अड़े थे। शाम को अचानक मजदूरों को पता चला कि फैक्ट्री के भीतर आगजनी शुरू हो गई है। स्वाभाविक रूप से फैक्ट्री के भीतर और बाहर खड़े मजदूर पुलिस के हाथों पकड़े जाने के डर से भाग गए। वहां पुलिस भी मौजूद थी और अंदर कुछ कर्मचारियों के साथ मारपीट की घटना हो रही थी। हिंसा करने वाले लोगों ने जो वर्दी पहनी हुई थी, वह बिल्कुल मारुति के कामगारों की तरह ही थीं। वे कर्मचारियों को पकड़ते, थोड़ी-बहुत उनकी पिटाई करते और छोड़ देते। वह हिंसक जत्था एचआर डिपार्टमेंट पहुंचा। पहले एचआर मैनेजर को मारते-पीटते उसके पांव तोड़ दिए और विभाग में आग लगा कर उसे भी उसमें झोंक दिया। इसके अलावा, दो-तीन और जगहों पर आगजनी हुई, जिसमें कुछ भी महत्त्वपूर्ण नहीं जला। (माना जाता है कि वह एचआर मैनेजर कामगारों की निगाह में काफी मानवीयता से पेश आता था, मजदूरों से उसके अच्छे संबंध थे, वह सहृदय और विनम्र था!)

ईश्वरीय कृपा-सी हिंसा...!!!

जैसी कि सूचनाएं सामने आईं, "इतनी बड़ी" हिंसा में इस तरह की ईश्वरीय कृपा का जोड़ा नहीं मिलता कि कारों के प्रोडक्शन यूनिटों और संयंत्रों को जरा भी नुकसान नहीं पहुंचा और यों कहें कि हिंसा खत्म होने के ठीक बाद भी वहां कारों का उत्पादन सहज तरीके से हो सकता था। एक सबसे जरूरी बात- इस पूरी हिंसा के दौरान कंपनी में जगह-जगह लगे सीसीटीवी कैमरे कहां चले गए थे। शुरुआती दौर में किसी अखबार ने खबर दी थी कि "मजदूरों" ने हिंसा के वक्त सीसीटीवी कैमरों को या तो तोड़ दिया था या फिर उसका रुख छत की ओर कर दिया था।

वे गजब के सुनियोजित और सुशिक्षित "मजदूर" थे! जाहिर है, कंपनी प्रबंधन, मीडिया और पुलिस ही शायद सही कह रही होगी, वे मजदूर नहीं, जिनका कहना है कि उन्हें तो इस बात का पता भी नहीं था कि कंपनी में सीसीटीवी कैमरे लगे थे।

यानी इस पूरी हिंसा की पटकथा पहले से तैयार थी और सिर्फ इसके प्रदर्शन का इंतजार था। सिर्फ एक बहाने की तलाश थी जो जियालाल को जातिसूचक गालियां देने के बाद कामगारों के धरने ने मुहैया करा दिया था।

यह छब्बीस सितंबर, 2012 को पीपुल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स यानी पीयूडीआर की जांच रपट की जारी प्रेस विज्ञप्ति से भी साफ होता है कि जेल में बंद करीब डेढ़ सौ मजदूरों में से बहुत सारे का उस तथाकथित अपराध से किसी तरह का लेना-देना नहीं था। बल्कि 18-19 जुलाई 2012 को जो तिरानबे मजदूर गिरफ्तार हुए, उनमें से कई घटना के समय फैक्ट्री में मौजूद तक नहीं थे। आमतौर पर चिह्नित और सूचीबद्ध उन मजदूरों को गिरफ्तार किया गया जो 2011 के मध्य में हुए विरोध में सक्रिय थे और खुल कर बोलने वाले थे। इस बात का जवाब तो सिर्फ मारुति प्रबंधन, बल्कि श्रम कानूनों के पहरुओं और भारत सरकार को देना होगा कि इस देश के किस कानून के तहत मारूति ने तहकीकात पूरी होने के पहले ही लगभग साढ़े पांच सौ मजदूरों को बर्खास्त कर दिया। श्रम कानून के रखवाले किसके इशारों पर काम करते हैं, इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि किसी का किसी से चेहरा भर मिलने से गिरफ्तार कर लिया गया, किसी नामजद के परिवार वालों को प्रताड़ित किया गया, तो गिरफ्तार मजदूरों को हिरासत में भयानक थर्ड डिग्री की यातनाएं दी गईं और सादे कागज पर दस्तखत करने के लिए उन्हें मजबूर किया गया। यानी पुलिस की मंशा साफ है कि वह किसके इशारे पर और किसके हित में काम कर रही है।

बहरहाल, दिलचस्प है कि बिना किसी मजबूत आधार के मारुति साढ़े पांच सौ कामगारों को निकाल देती है, लेकिन उस सुपरवाइजर के खिलाफ कोई भी कार्रवाई करने की सूचना नहीं मिल सकी है, जिसकी जातिबोधक गाली के चलते सारा फसाद खड़ा किया गया।

यकीनन साजिश...

तो क्या 18 जुलाई के फसाद की योजना पहले से तैयार थी और सिर्फ बहाने और मौके का इंतजार किया जा रहा था? लेकिन यह योजना किसकी थी और कौन इंतजार कर रहा था? यह मानना अपने आप में अपनी ही बुद्धि को कटघरे में खड़ा करना होगा कि यह मजदूरों की सुनियोजित साजिश थी। जो मजदूर पिछले साल तीन चरणों में अट्ठावन दिनों की हड़ताल के बावजूद धीरज, संयम और पूरी परिपक्वता के साथ सिर्फ अपने हक का सवाल उठाते रहे, वे इस बार भी सिर्फ इतनी-सी मांग कर रहे थे कि जियालाल को जाति की गाली देने वाले कर्मचारी के खिलाफ कार्रवाई हो। पिछले साल जब उतनी बड़ी तादाद में मजदूरों का धरना शांतिपूर्ण रहा तो इस बार उन्हें नियंत्रित करने के लिए मारुति को सौ या डेढ़ सौ "बाउंसरों" (गुंडों) की जरूरत क्यों पड़ गई? उन सभी बाउंसरों को मजदूरों का ही ड्रेस क्यों पहनाया गया था? क्या यह संयोग है कि विशेष जांच टीम का नेतृत्व करने वाले गुड़गांव के एक डीसीपी महेश्वर दयाल ने आखिरकार बताया कि फसाद में ज्यादा से ज्यादा सौ लौग शामिल थे और मारूति के "बाउंसरों" की संख्या भी उतनी ही बताई जाती है? डीसीपी की रिपोर्ट के मुताबिक अगर यह मान भी लिया जाए कि वे सौ लोग मजदूर ही थे, तो मारुति के वे एक-डेढ़ सौ "बाउंसर" और पचास से ज्यादा पुलिसकर्मी क्या उन सौ मजदूरों को रोक सकने में सक्षम नहीं थे? (कुछ ही देर में वह पूरा इलाका पुलिस छावनी में तब्दील हो गया था!)

ये सारी स्थितियां किसकी साजिश की ओर इशारा करती हैं? जिसकी साजिश कामयाब हुई है, उसे तो हक है मजदूरों को अपराधी करार देने का, लेकिन पुलिस, प्रशासन और पूरी सरकार से लेकर समूचा मीडिया किन वजहों से मजदूरों के खिलाफ हाय-हाय करता रहा और अपने "मालिकों" के सामने अंधा होकर सिर नवाता रहा? क्या नया संविधान बनाया जा चुका है, जिसमें मजदूरों को अब खुद को गुलाम मान कर काम करना होगा? जब मारुति जैसी देश की "नाक" कंपनी मजदूरों के दमन के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार है, तो दूसरी जगहों की क्या हालत होगी, क्या इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है? इस देश के तमाम "सेजों" (विशेष आर्थिक क्षेत्रों) को तो किसी भी तरह की कानूनी बाध्यताओं से पहले ही आजाद किया जा चुका है। बाकी जगहों पर भी बचे-खुचे श्रम कानूनों पर अमल की व्यावहारिक हकीकत जिस बर्बर शक्ल में है, वह अध्ययन का विषय है। सवाल है कि जनकल्याण के सिद्धांतों पर काम करने का दायित्व उठाने वाली हमारे देश की तथाकथित लोकतांत्रिक सरकारें किसकी सेवा में हाजिरी बजा रही हैं?

पूंजीवाद के घोड़े पर सवार सामंतवाद...

पिछले साल तीन चरणों में लगभग दो महीने की हड़ताल की कामयाबी इस बात का साफ संकेत थी कि मजदूरों की बिखरी हुई लड़ाई अगर ठोस शक्ल लेती है तो पिछले दो दशकों में कॉरपोरेटों और पूंजीपतियों की दलाल सरकार की मदद से तैयार वह ढांचा ढह जा सकता है, जो मजदूरों के ज्यादा से ज्यादा शोषण से मालिकानों के लिए ज्यादा से ज्यादा मुनाफा सुनिश्चित करता है। जाहिर है, 2011 के अट्ठावन दिनों के हड़ताल के बाद छह महीने में वे तमाम इंतजाम किए गए जो पिछले दो दशकों की "उपलब्धियों" को बचा सके और उसे पुख्ता आधार दे सके।

इसलिए चार-पांच या छह-सात हजार रुपए महीने की तनख्वाह उठाने वाले ज्यादातर ठेका मजदूरों से स्थायी कर्मचारियों को अलगाने की सभी कोशिशें की गईं। लेकिन सच यह है कि एक अंतरराष्ट्रीय मानदंडों के तहत अपना धंधा चलाने का दावा करने वाली इस कंपनी के भीतर श्रम की स्थितियां दरअसल शोषण चक्र की बर्बर दास्तान थी। इसके बारे में कई ब्योरे अनेक रिपोर्टों में आ चुके हैं। इसका सिर्फ अंदाजा लगाया जा सकता है कि अगर कोई कामगार अचानक तबियत खराब होने की वजह से काम पर नहीं जा पाता तो न सिर्फ उसकी तनख्वाह से एक दिन के तीन सौ बीस रुपए काट लिए जाएंगे, बल्कि महीने भर की तनख्वाह के मद में ही जुड़ी अठारह सौ की राशि भी हड़प ली जाएगी, तो हालत क्या होगी। यह वहां का नियम था। लोकतंत्र की चादर ओढ़ कर किस बर्बर लुटेरी सरकार ने किसी दुकानदार को इंसान का लहू चूसने का हक दिया? क्या यहां के दुकानदारों की तमाम दुकानें आजाद देश हैं और वहां उनका अपना संविधान चलता है? क्या अब उनके हक में संविधान को बदल दिया जाएगा या बदल दिया गया है?

पूंजीवाद के परदे के पीछे से सत्रहवीं-अठारहवीं सदी के यूरोप के सामंतवाद की रगों में बहते वर्णवाद ने पिछले दो-ढाई दशक में मजदूरों के व्यापक हितों और खासतौर पर ट्रेड यूनियनों के खिलाफ जो जहर फैलाया है वह अब अपने पूरे असर के साथ सामने आ रहा है। काम और जरूरत के बीच के प्रबंधन में अपनी बेईमानी, काहिली और अक्षमताओं को छिपाने के लिए ट्रेड यूनियनों पर यह आरोप मढ़ देना आसान है कि उनके चलते काम की संस्कृति बिगड़ी। लेकिन इसके पीछे असली मंशा क्या होती है, यह बताने में इसलिए शर्म आती है क्योंकि फिर इससे यह परदा उतर जाएगा कि मकसद यह है कि कम से कम मजदूरों का ज्यादा से ज्यादा शोषण करके अपने मुनाफे को कितना ज्यादा बढ़ाया जा सकता है।

पूंजीवाद के घोड़े पर सवार सामंतवादियों को यह अच्छे से पता है कि भारत जैसे देश की सरकारों को अब वे इतनी छूट देने की हालत में ला चुके हैं कि वे चाहें तो किसी मजदूर के जिंदा रहने भर के लिए पेट भर कर उसके लहू का एक-एक कतरा तक चूस ले सकते हैं, यहां कोई रोक-टोक नहीं है। देश के कई इलाकों के औद्योगिक क्षेत्रों से यह मांग उठ चुकी है कि ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना की वजह से उद्योगों को "सही मजदूरी" पर काम करने वाले लोग मिलने बंद हो गए हैं, इसलिए नरेगा जैसी योजना को बंद कर देना चाहिए। अंदाजा लगाया जा सकता है कि सौ दिन के बजाय अगर साल भर के रोजगार की गारंटी सुनिश्चित कर दी जाए तो शोषण के इन कारखानों की क्या दशा होगी। यह भी ध्यान रखने की जरूरत है कि मनरेगा जैसी योजनाओं का वास्तविक लाभार्थी कौन है और किसे इस योजना से आपत्ति है और कौन इसे खत्म करने की मांग कर रहा है। तमाम सरकारी कल्याण कार्यक्रमों के तहत मिलने वाले लाभों की जरूरत समाज के किस तबके को है और सब कुछ का हल निजीकरण और विदेशी पूंजी निवेश में देखने वाले लोग आखिरकार किसके हित की वकालत कर रहे हैं? सिर्फ एक उदाहरण काफी है। नब्बे के दशक में पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षण लागू हुआ, उसके बाद सरकारी नौकरियां लगातार कम होती गईं और निजी क्षेत्र के लिए मैदान खुला छोड़ दिया गया। दरअसल, आरक्षण की "समस्या" का सीधा जवाब निजीकरण था और नब्बे के बाद अब तक की पूंजीपरस्त सरकारों का मकसद जितना आर्थिक सुधार है, उससे ज्यादा बड़ी लड़ाई वह सामाजिक मोर्चे पर लड़ने में लगी है।

जनतंत्र की नाक और सामंती सत्ता-तंत्र...

पिछले दो दशक में मजदूरों के हक में बनाए गए तमाम कानूनों की क्या गत कर दी गई है, यह जानने के लिए देश के तथाकथित लोकतंत्र की नाक दिल्ली और इससे सटे गुड़गांव, फरीदाबाद, नोएडा या गाजियाबाद जैसे इलाकों में तमाम फैक्ट्रियों या काम देने वाले संस्थानों का अध्ययन किया जा सकता है। देश का श्रम मंत्रालय और श्रम निरीक्षक अब श्रम कानून पर अमल सुनिश्चित करने के बजाय मालिकों की सुविधा सुनिश्चित करने में लगे हैं।

कितनी न्यूनतम तनख्वाह होनी चाहिए; काम के अधिकतम घंटे कितने होने चाहिए; काम और श्रमिकों का क्या अनुपात होना चाहिए; लागत और मुनाफे का क्या अनुपात होगा; मुनाफे में मजदूरों को कितना न्यायपूर्ण हिस्सा मिलना चाहिए; मजदूरों के लिए सामाजिक सुरक्षा नीतियों के क्या इंतजाम हैं या इन पर अमल की क्या हकीकत है... जैसे न जाने कितने सवाल हैं। लेकिन इन पर बात करना अब पिछड़ेपन की निशानी मान लिया गया है। यानी मानवीयता के तमाम तकाजों को ताक पर रख कर ही "अगड़ेपन" का झंडा उठाया जा सकता है। फिर भी, दुनिया से सबसे बड़ा लोकतंत्र होने का दावा...! ठीक है...! तो क्या यहीं यह सवाल भी उठा दिया जाए कि अगर यही सच है तो यह "सिस्टम" बताए कि क्या वह अनंतभूतकाल से "अगड़ेपन" का आसन जमाए तबकों की प्रतिनिधि है?

आठ घंटे काम और उसके हिसाब से मेहनताना अब केवल बचे हुए सरकारी नौकरों के खाते में है। वहां भी निजी ठेकेदारी का बोलबाला है और सरकार खुद ठेकेदार बन कर और मजदूरों को बंधुआ गुलाम बना कर भर्ती करने की रिवायत शुरू कर चुकी है। बाकी ज्यादातर जगहों पर रजिस्टर पर आठ घंटे की ड्यूटी और छह हजार रुपए की तनख्वाह दर्ज कर मजदूरों से हस्ताक्षर कराने वाले ठेकेदार कंपनियां किस तरह मजदूरों को चार हजार रुपए पर बारह घंटे खटवाती हैं, इसका हिसाब लेने वाला कोई नहीं है। पहले इस्तीफा लिखवा कर किन शर्तों पर नौकरी दी जाती है या किन हालात में मजदूरों को काम करना पड़ता है; महंगाई के नाम पर लगातार बढ़ती लूट के बीच कितने लोग न्यूनतम खर्चे लायक भी आमदनी भी नहीं हो पाने की वजह से अपने गांव लौट गए; विकास के नाम पर दिल्ली जैसे शहरों को चुपके-चुपके किनके लिए टिक सकने लायक बनाया जा रहा है; अपना और अपने परिवार का पेट नहीं पाल पाने की हताशा में खुदकुशी कर लेने के फैसलों के पीछे कौन-सी वजहें हैं; इन सबकी सच्चाई अगर आम हो जाए तो यह तय करना मुश्किल होगा कि यह देश कैसे आधुनिक पैमानों पर आगे बढ़ता एक लोकतांत्रिक देश है और क्यों नहीं इसे आदिम या मध्ययुगीन बर्बर नियम-कायदों में मरने-जीने वाले किसी सामंती समाज के सत्ता-तंत्र और उसी व्यवस्था के तौर पर देखा जाए...!