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Thursday, 19 July 2012

कुंठित पुरुषवाद अजन्मी बेटियों को भी नहीं बख्शता...




निष्ठा-बिष्ठा की तुकबंदी और गिदड़ा-गुड़कान...

कोई चाहे तो एक रिपोर्ट को "झूठ" मान कर "'टाइम्स ऑफ इंडिया" पर मुकदमा कर सकता है, या फिर उसका शुक्रिया अदा कर सकता है कि उसने एक ऐसे सच से परदा उठा दिया, जिसके तले न जाने कैसे बदबूदार कीड़े बजबजा रहे हैं।

छह मई 2012 को अभिनेता आमिर खान के शो "सत्यमेव जयते" के ठीक एक दिन पहले कई दूसरे बड़े नामों के साथ फिल्म अभिनेता संजय दत्त के भी खयाल शाया हुए थे। अपनी बेटी त्रिशला के फिल्मों में काम करने के सवाल पर उनका कहना था- "...मेरी बहन और भांजी भी फिल्मों में काम कर सकती थी। लेकिन यह वह रास्ता नहीं है, जो मेरे पिता ने तैयार किया। ...अपने परिवार में सबसे बड़ा होने के नाते मैं उस "वसीयत" को नहीं छोड़ सकता। ...त्रिशला एक फोरेंसिक वैज्ञानिक है, बस! इससे ज्यादा कुछ नहीं। ...मैं क्यों ऐसा चाहूंगा कि वह यहां आए और फिल्मों में अपने नितंब हिलाए?"

(कैसा लगता है उस वक्त जब संजय दत्त अपने से आधी या बेटी की उम्र की लड़कियों की कमर पर थाप देते हैं और अपना लोंदा-सा देह किसी भोंदे की तरह ठुलकाते हैं?)

बहरहाल, इसके जवाब में त्रिशला ने जो कहा, उसे उनके पिता संजय दत्त के खयाल के साथ मेरे इन कुछ बेवकूफाना खयालों को पढ़ते हुए ध्यान रखने की गुजारिश है। त्रिशला का कहना था- "...वे अपने काम और नए परिवार (नई पत्नी) के साथ व्यस्त हैं। लेकिन आखिरी तौर पर फैसला मेरा होगा। ...मैं अपने पापा को बहुत प्यार करती हूं, लेकिन अगर उन्होंने मेरे फैसले का साथ नहीं दिया तो मेरा रास्ता अलग होगा।"

अपने छह मई के "सत्यमेव जयते" में आमिर खान जब कन्या भ्रूणहत्या के सवाल पर भारत के लोगों को ज़ार-ज़ार रुलाते हुए यह कह रहे थे कि ये मसला देश के अमीर और इलीट तबकों के बीच सबसे ज्यादा गंभीर है तो क्या इस संदर्भ में संजय दत्त और त्रिशला की बातों का घालमेल करने की कोई तुक हो सकती है? यह अपने आप में एक बेतुका सवाल है। सिर्फ तुकबंदी के शौक में अगर हम "निष्ठा" का मिलन "विष्ठा" से करा देते हैं तो सिवाय बदबू के कुछ और हासिल नहीं, लेकिन थोड़ी मेहनत कर "निष्ठा" में "प्रतिष्ठा" की तुक घोलें तो निश्चित तौर पर उसमें से "मिष्ठा" की खुशबू आएगी। खैर, तुकबंदी दरअसल "गिदड़ा-गुड़कान" टाइप का एक खेल भर है, जो आपकी काबिलियत के साथ-साथ कलाकारी के सहारे आगे बढ़ता है।

मैजोकिज़्म की मासूमियत...

आमिर खान को "सत्यमेव जयते" के लिए बधाई इसलिए दिया जाना चाहिए, क्योंकि मार्कंडेय काटजू के खयालों को तोड़-मरोड़ कर कहूं तो ये कि नब्बे फीसदी भारतीयों के सोचने-समझने का दर्जा औसत से भी नीचे हैं। मैं उनके लफ़्जों में नहीं कहूंगा कि नब्बे फीसद भारतीय मूर्ख हैं, क्योंकि मैं मानता हूं कि कोई भी समाज अपनी सामाजिक-राजनीतिक प्रक्रियाओं की वजह से अपने चेहरा हासिल करता है। इसलिए मुझे लगता है कि उंगली उठा कर सबको मूर्ख कहने के बजाय मूर्ख होने की वजहों के बारे में भी इतनी ही हिम्मत के साथ बात की जानी चाहिए।

लेकिन जिस संस्कृति की बुनियाद ही "मैजोकिज़्म" पर टिकी हो, उसमें यह उम्मीद निहायत मासूम-सी लगती है कि कोई व्यक्ति सामने घट रही तमाम चीजों को विश्लेषण के नजरिए से देखेगा। आमिर खान को अक्सर इसी का फायदा मिलता है।

"सत्यमेव जयते" के पहले अंक के पहले यह खबर सचमुच आम नहीं थी कि गर्भ में लिंग जांच के लिए अल्ट्रासाउंड या सोनोग्राफी की शुरुआत खुद सरकार ने की थी। लेकिन उसके खिलाफ लड़ाई के नतीजे में बने पीएनडीटी एक्ट, 1994 और उसके बाद सरकारी और गैरसरकारी पैमाने पर कन्याभ्रूण हत्या पर पूरी तरह रोक के अभियान इतने भी अनजाने नहीं रहे। इसके बावजूद कि बाजार और चिकित्सा क्षेत्र की लॉबियों ने उन अभियानों को बेअसर करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। अक्सर किसी बड़े नेता की ओर से बेटियों को बचाने या कन्या भ्रूण की हत्या नहीं करने को लेकर गुहार लगाई जाती है, तो कोई सरकार "लाडली" या दूसरी योजनाओं के जरिए इस संकट को दूर करने की कोशिश करती है। लेकिन वे कौन-सी वजहें हैं कि हर अगले अध्ययन या सर्वेक्षण में नतीजे वही आते हैं कि स्त्री-पुरुष अनुपात का फासला बढ़ रहा है और खासतौर पर पॉश कहे जाने वाले इलाकों में बेटियों की तादाद तेजी से कम हो रही है।

कन्या भ्रूणहत्या पर दुख जाहिर करते हुए जब इसकी वजहों पर बात करने की बारी आती है, बात इससे आगे नहीं बढ़ पाती कि बेटियों को कोख में मार देने की असली वजह बेटे की इच्छा और दहेज की समस्या है। लेकिन मेरे लिए अब तक यह समझना मुश्किल रहा है कि बेटा ही वंश चलाएगा, इसलिए बेटी को गर्भ में मार डालने की जरूरत क्यों पड़ती है। मैंने अपने गांव के अलावा कितनी ही जगहों पर ऐसे बेहद गरीब परिवारों को भी देखा है कि बेटे की चाह में दो-चार या छह बेटियां पैदा हो गईं, लेकिन जन्म के पहले या बाद में उनकी हत्या की कोशिश तक नहीं। जाहिर है, दहेज भी अगर किसी के लिए समस्या है तो यही वह वर्ग है, जिसके लिए हजार-दो हजार रुपए भी जीवन-मरण का सवाल होते हैं। बच्चों का भरण-पोषण और ब्याह किसी तरह हो गया, सब अच्छा...! शिक्षा नहीं, जागरूकता नहीं, सोनोग्राफी तक पहुंच नहीं, पैसा नहीं और इस पर यह "विश्वास" भी कि बच्चे भगवान की देन हैं। वजह कोई भी, लेकिन बेटी की हत्या नहीं करेंगे- पैदा होने के पहले या बाद में। हां, कुपोषण, देखभाल, बीमारी या दूसरी वजहों से कोई बच्चियों के मरने की खबरें तल्ख हकीकत जरूर हैं।

"बुरी जगह" में बोझ बेटी

दूसरी ओर, इसी देश के शहरी इलीट- शिक्षित और जागरूक, पैसा कोई समस्या नहीं, स्त्री-पुरुष की बराबरी का झंडाबरदार और आधुनिक होने के तमाम दावे भी। फिर महज एक बेटी के लिए भी जगह क्यों नहीं? ये वे हैं कि अगर कोई बीस मांगे तो चालीस अपनी ओर से उसकी झोली में डाल दें। मगर इनकी "आधुनिकता" क्या इतनी वीभत्स है कि कुलदीपक की चाह में ये गर्भ में ही बेटियों की हत्या कर डालते हैं? ऐसे घरों में अगर बेटी पैदा हो भी जाए तो पढ़ाई-लिखाई से परिवेश के तमाम हालात उसे बालिग होते-होते स्वनिर्भर बना देते हैं। यानी किसी भी हाल में ये अपने मां-बाप के लिए "बोझ" भी नहीं रहतीं। फिर इनके अलावा और क्या वजह हो सकती है कि ये इलीट किसी भी हाल में अपने घर में बेटी नहीं पैदा होने देते या उसकी हत्या कर देते हैं?

यहां संजय दत्त और उनकी बेटी त्रिशला की ताजा बहस इसलिए याद आ रही है, क्योंकि मैं इसे एक "सॉफ्ट" प्रतिनिधि मामले की तरह देखना चाहता हूं। संजय दत्त जानते हैं कि अपनी फिल्मी दुनिया में अपने से आधी उम्र की लड़कियों की कमर पर थाप देते हुए वे उस लड़की को क्या समझते हैं, "उनके समाज" के तमाम पुरुष ऐसी लड़कियों को सिर्फ किस काम आने वाली चीज समझते और उनसे कैसे बरतते हैं; वे जानते हैं कि उनकी फिल्मी दुनिया महिलाओं के लिए बहुत बुरी जगह है; इसलिए वे नहीं चाहते हैं कि उनकी बेटी उन हालात का शिकार बने।

लेकिन बात अगर यहीं खत्म हो जाती तो बात और थी...! संजय दत्त की त्रासदी तब और गहरी हो जाती है जब त्रिशला साफ तौर पर कह देती है कि "अगर मेरे पापा मेरे फैसले से सहमत नहीं हुए तो मेरा रास्ता अलग होगा।" यानी कि अगर संजय दत्त के घर में त्रिशला पैदा हो गई है तो उसका परिवेश उसकी ताकत होगा। वह चाहेगी तो फोरेंसिक वैज्ञानिक बनेगी और चाहेगी तो फिल्मों के परदे पर झूमेगी। संजय दत्त की विडंबना यह है कि उनकी आंखों में स्त्री का "व्यक्ति" नहीं है, सिर्फ उसका नितंब है- वह कोई और हो या फिर अपनी बेटी...!

संजय दत्त तो फिर भी इतने उदार हैं कि उनकी बेटी त्रिशला जिंदा हैं। लेकिन अगर संजय दत्त को यह "ब्रह्म ज्ञान" त्रिशला के जन्म के पहले मिल गया होता तो क्या हुआ होता? खैर, संजय दत्त दया के पात्र हैं और उन्हें माफ किया जा सकता है। लेकिन शायद अब बात खुल रही है।

किसी भी रास्ते जब पैसा जरूरत से ज्यादा आता है, तो उसके जाने के लिए आमतौर पर अय्याशी के ठिकाने ही होते हैं। इस अय्याशी को जीने वाला "पुरुष" अपने गले में "आधुनिक" होने और "जिंदादिली" का पट्टा लटकाए रखता है। वह सेक्स संबंधी तमाम वर्जनाओं से "ऊपर उठ कर" इस मामले में "नवीनतम प्रयोगों" को अपने "आधुनिक" होने का पर्याय मानता है। इस "आधुनिकता" की सबसे अनिवार्य शिकार स्त्री है। और जाहिर है, वह "शिकार" घर की दहलीज से बाहर की स्त्री ही होगी। लेकिन घर में भी जो "त्रिशलाएं" होंगी, उसका क्या हल है? यानी अपनी "इज्जत" को बचाना है तो कुछ करना होगा! बेटी पैदा ही क्यों हो, कि वह अपने भाई-बंधुओं के "नवीनतम प्रयोगों" का शिकार बने! या "त्रिशला" हो जाए! सारी आधुनिकता और प्रगतिशीलता इस एक छोटी-सी ग्रंथि से संचालित और नियंत्रित होती है।

बेटी या बोटी...

हमारी एक दोस्त हैं। उनकी उम्र लगभग पच्चीस साल है। इसी मसले पर बात करते हुए उन्होंने बताया कि दिल्ली में नौकरी के बीच जब भी वे हरियाणा के एक कस्बे में अपने घर जाती हैं तो उनके पचपन साल के पिता के हमउम्र, लेकिन किसी बांके जवान की तरह सजे-संवरे, इत्र लगाए, हर वक्त पूरी तरह "मेनटेन" दिखने वाले, बहुत धनी-मानी और कई फैक्ट्रियों के मालिक एक दोस्त उनसे मिलने जरूर आते हैं। जहां उनके पिताजी प्रणाम करने पर सिर पर हाथ रख कर आशीर्वाद देते हैं, और फिर बैठ कर या खाते-पीते, हंसते-खेलते बातें होती हैं, वहीं उनके पिता के उस दोस्त के आशीर्वाद देने का तरीका कुछ और ही होता है। वे पांच मिनट में पचास बार "बेटे-बेटे" कहते हैं, छोटी-छोटी बातों पर इतने उत्साहित होकर बेटे-बेटे कहते हुए कंधे या पीठ पर थपकी देते हैं, जैसे उसके आने या आगे बढ़ने से सबसे ज्यादा खुशी उन्हें ही होती हो। गले लगा कर, चूम कर "आशीर्वाद" देना उनका खास तरीका है। पिछली बार तीन दिन में जब दूसरी बार उनके "आशीर्वाद" देते हाथ ने साफ तौर पर वही हरकत की, जिसका इन्हें अंदेशा था, तब इनका धीरज जवाब दे गया और इन्होंने अपनी मां को बताया। मां ने पति के उस दोस्त को ढेर सारी गालियां दीं, और कहा कि इसीलिए अपनी बीवी का गर्भ जांच करा कर चार बार गर्भपात करवाया और एक बेटा पर इतराता फिरता है। पता नहीं अपनी बेटी होती तो क्या करता। शायद इसीलिए बेटी नहीं होने दिया।

(हमारी दोस्त ने जब यह बताया तो मैंने कहा कि आपकी मां ने भले गुस्से में वह बात कही हो, लेकिन शायद उन्होंने आपके बहाने कन्या भ्रूणहत्या के सबसे बड़े कारण पर उंगली रख दी है। बस, हमारे भीतर इतनी हिम्मत पैदा नहीं होती कि इसे किसी वजह के तौर पर स्वीकार करें।)

एक बेहद धनी परिवार में पैसा कोई सवाल नहीं, बेटी बोझ नहीं हो सकती, बल्कि परिवार या खानदान का नाम ही ऊंचा करेगी। तब फिर दूसरी कौन-सी वजह हो सकती है बेटियों को मार देने की?

बेहिसाब अमीरी का एक अनिवार्य रिश्ता अय्याशी से होता है और अय्याशी में स्त्रियों को सिर्फ एक ही निगाह से देखा जाता है। यह निचले वर्गों में भी उतरता है। एक तरफ जड़ सामंती दिमागी ढांचा, तो दूसरी तरफ तथाकथित आधुनिकता और "ब्रॉडमाइंडेडनेस"- दोनों ही स्थितियों में स्त्रियां सिर्फ देह हैं, सेक्स के लिए एक वस्तु! तो इस तरह के "आधुनिक और ब्रॉडमाइंडेड" पिताजी ये कैसे बर्दाश्त कर सकते हैं कि जो वे दूसरी स्त्रियों के साथ करते हैं, उसी स्थिति का शिकार उनकी बेटी की भी हो। अगर किसी "धोखे" से घर में बेटी आ गई है तो इनकी जीवन शैली में वह किसके रोके रुकेगी? तमाम सुविधाओं के बीच वह पढ़ेगी-लिखेगी, अपनी काबिलियत साबित करके अपने भरोसे जिएगी, और अपनी जिंदगी को अपनी मर्जी से जैसे चाहे, जिसके साथ चाहे जिएगी।

न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी...

लेकिन पितृसत्ता क्या इतनी आसानी से इस तरह की स्त्री सत्ता को स्वीकार कर लेगी? जाहिर है, बेटियों को इन तमाम "दुखों" से मुक्ति दिलाने वाले अमीर पिता इतने "भले मानुष" होते हैं कि इस दुख से निपटने का उनका रास्ता एक ही शेष और सुरक्षित है- न रहेगी बेटी, न उसे ये दिन देखने होंगे...!

अब कोई लाख मुंह चुराए या इनकार करे, अगर कन्या भ्रूणहत्या की समस्या अमीर परिवारों में सबसे गंभीर है तो इसकी सबसे बड़ी वजह यही है कि पितृसत्ता यहां अपने सबसे बर्बर और सड़े-गले स्वरूप में अट्टहास करता है। लेकिन तमाम सरकारी और गैरसरकारी अभियानों से लेकर "सत्यमेव जयते" कन्या भ्रूणहत्या को अमीरों के घर की "शोभा" बताने के बावजूद उसकी वजह के तौर पर सिर्फ दहेज या वंश चलाने के लिए बेटे की चाह को ही क्यों पेश किया जाता है? जबकि इस वर्ग के लिए दहेज कोई समस्या है ही नहीं और बेटा इन्हें अपना वंश चलाने के लिए नहीं, "समाज" को यह दिखाने के लिए चाहिए कि ये "अनुर्वर" नहीं हैं और वह इनकी विरासत अपने पास बनाए रख सके। यह सिलसिला बिना किसी मुश्किल के चलेगा।

उन्हें यह डर दिखाना मनोरंजक है कि जब लड़कियां नहीं रहेंगी तो बीवी कहां से लाओगे या मां-बहन कहां से पाओगे। इनकी सामंती, पितृसत्तात्मक और पुरुष कुंठाओं का हल इनका अकूत पैसा है। पैसा इनकी सभी मुश्किलों को दूर करता है- "अपने समाज" में स्त्रियों की कमी को भी! समाज के "पिछड़े" दिमाग वाले दलित या दूसरी जातियों के लोग तो बेटियों को जन्म देने के लिए हैं ही। जब तक बेटा न हो जाए, चार-पांच हों या छह-सात, बेटियों को गर्भ में नहीं मारेंगे। वे भी "भगवान" की देन हैं। चाहे गरीबी या बदहाली की वजह से बेटियों को मरने के लिए "राम भरोसे" ही क्यों न छोड़ देना पड़े। हरियाणा या पंजाब के पिछड़े हुए दिमाग वाले कुछ धनिकों को पकड़ लिया जाता है कि वे अपने समाज में महिलाओं की कमी के कारण किसी गरीब महिला को खरीद कर लाते हैं और एक परिवार में दो या चार मर्द उससे अपने पुरुषत्व को शांत करते हैं।

यानी इस धनी और इलीट समाज में महिला जिस रूप में है, वहां का कोई भी पुरुष नहीं चाहेगा कि वह जिसे जन्म दे, उसे इन हालात का शिकार होना पड़े।

सामंती कुंठाओं का जाला

शहरी इलीटों के बीच हालात अलग नहीं हैं, बस तरीका जरा "सॉफिस्टिकेटेड" और आभिजात्य हो जाता है। अमेरिका और फ्रांस की किसी गारमेंट कंपनी की सबसे महंगी और आधुनिक वेशभूषा के भीतर वह सड़ता-बजबजाता दिमाग होता है, जिसमें स्त्री की उपयोगिता सिर्फ बिस्तर पर होती है। सामंती कुंठाओं का यही जाला उसकी आंखों पर पड़ा होता है जिसके पार अपनी बेटी को उसी हालत में देखने का डर किसी व्यक्ति को सताता रहता है। इस डर से निजात के उपाय, यानी लिंग जांच और भ्रूणहत्या। जिसे अपनी बेटी इंसान लगेगी, उसे उसके होने का क्या डर होगा? वह अपनी बेटी के दुनिया में आने का स्वागत क्यों नहीं करेगा?

सवाल है कि पैदा होकर बहू या बीवी के रूप में मौजूद औरत कहां खड़ी है इस मामले में? आमिर ब्रांड "सत्यमेव जयते" में जिन महिलाओं को पेश किया गया था, उन्होंने विरोध करने का खमियाजा अपने पति या परिवार की यातनाएं झेल कर उठाया था। इन दो-चार की तादाद में कन्या भ्रूणहत्या का विरोध करने वाली महिलाओं का पलड़ा बराबर भी हो जाए तो तस्वीर बदल जाए। लेकिन पितृसत्ता की साजिशों की बुनियाद पर खड़ी व्यवस्था की कंडिशनिंग के नतीजे में एक पुरुषवादी मनोविज्ञान को जीती स्त्री सामंती कुंठाओं से लैस पुरुष से कुछ अलग नहीं सोच पाती।

दरअसल, यह अलग सोच पाना भी तब संभव हो पाता, जब अपनी बनाई हुई जमीन होती। लेकिन ऐसा नहीं है और इस लिहाज से देखें तो कन्या भ्रूणहत्या की समस्या पुरुष वर्चस्व की मानसिकता में मरती-जीती स्त्री की वजह से भी बनी हुई है। यह अलग बात है कि इसके लिए वे स्त्रियां नहीं, बल्कि व्यवस्था और उसके झंडाबरदार जिम्मेदार है। बिना उसकी परतें उधेड़े और उसे निशाने पर लिए बेटियों की हत्या गर्भ में ही कर देने के कुकर्म से निपटना मुमकिन नहीं होगा।

Saturday, 1 November 2008

अंधविश्वास के अंधकार में

"किसी को आत्मा के अमरत्व में विश्वास करने के लिए लगा दो और उसका सब कुछ लूट लो। वह हंसते हुए इस लूट में तुम्हारी मदद भी करेगा"- अप्टन सिनक्लेयर।



तंत्र-मंत्र और रूहानी इल्म के माहिर/ खुला चैलेंज/ लाभ 100 प्रतिशत/ 20 मिनट में गारंटी कार्ड के साथ/ जैसा चाहोगे, वैसा होगा/ माई प्रॉमिस/
नोट- अगर आपका विश्वास किसी ज्योतिष, पंडित-बाबा, मियां-मुल्ला, तांत्रिक से उठ गया हो तो एक बार अवश्य मिलें

मनचाहा वशीकरण स्पेशलिस्ट
कारोबार में रुकावट, बंदिश, गृह-क्लेश, मियां-बीवी के झगड़े, तलाक, दुश्मन और सौतन से छुटकारा, कर्ज मुक्ति, संतानहीनता, कोख बंधन, मुठकरनी, विदेश यात्रा, लव-मैरिज, फिल्मी और मॉडलिंग कैरियर में रुकावट जैसी जीवन की जटिल समस्याओं का समाधान।
चेतावनीः मेरे किए को काटने वाले को 1,51,000 रुपए ईनाम।

सभी इल्मों की काट हमारे पास है।

-प्यार में चोट खाए स्त्री एवं पुरुष एक बार अवश्य मिलें।

-एक अगरबत्ती का पैकेट दो नींबू साथ लाएं।

रुहानी और सातों इल्मों के बेताज बादशाह। वर्ल्ड फेमस

- सिद्ध गुरू अकबर भारती या समीरजी (बंगाली)


नगर सेवा की बसों, सड़क के किनारे या पेशाबखानों की दीवारों जैसी जगहों पर चिपकाए गए 'गुप्त रोगों का शर्तिया इलाज' की तरह के ऐसे विज्ञापनों पर एक 'पढ़े-लिखे' और 'सभ्य' व्यक्ति होने के नाते हमारी क्या प्रतिक्रिया होती है? हम मुंह बिचकाते हैं, ऐसा विज्ञापन करने वालों को ठग और मक्कार कहते हैं और उनके पास जाने वाले लोगों को मूर्ख मानते हैं। अगर हम ऐसा विज्ञापन करने वाले ठगों और मक्कारों को अपराधी की तरह देखते हैं या उनके खिलाफ हमारे भीतर नफरत के भाव पैदा होते हैं तो शायद यह गलत नहीं है।

ऐसी राय रखने वाले हम सब आमतौर पर बहुत अच्छी शिक्षा प्राप्त, बहुत अच्छी और साफ-सुथरी जीवनशैली वाले, सूटेड-बूटेड टाईयुक्त कपड़े पहनने वाले और अपनी पहुंच के लगभग सभी आधुनिक उपकरणों-संसाधनों का इस्तेमाल करने वाले होते हैं। वैसे विज्ञापनों पर ऐसे 'सभ्य, शिक्षित और विकसित' समाज का हिस्सा होने के नाते हमारी इस तरह की प्रतिक्रिया के बाद हम अपनी 'सभ्यता' और 'सामाजिक ऊंचाई' में थोड़ा और इजाफा होता हुआ महसूस करते हैं।

और जब समूचे समाज और उसकी सभ्यता को 'दिशा' देने वाले मीडिया को भी हम कुछ इसी तरह का या इससे भी ज्यादा असरदार तरीके से ऐसा ही काम करते हुए देखते हैं, तब हमारी क्या प्रतिक्रिया होती है? जब हम टीवी पर सूटेड-बूटेड टाईयुक्त और 'सभ्यता की पराकाष्ठा' पर पहुंचे हुए लोगों को लगभग चिल्ला कर यह कहते हुए देखते-सुनते हैं कि 'प्रलय... अब धरती बस खत्म होने वाली है' तो हमारे भीतर कौन-से भाव पैदा होते हैं? उस वक्त क्या हमें सड़क के किनारे या पेशाबखानों की दीवारों पर चिपकाए हुए वे विज्ञापन याद आते हैं? क्या ऐसे विज्ञापन करने वालों की मक्कारी और 'समस्याओं से मुक्ति' के लिए उन जगहों पर जाने वाले लोगों की मूर्खता याद आती है?

शायद नहीं। गहरे सम्मोहन के उस दौर की गुलामी की बात ही निराली है। उदयपुर के राकेश और राजग़ढ़ की छाया ने जो किया, उसी सम्मोहन के उन्माद का चरम है, जिसमें झूमते हुए तो बहुत सारे लोगों को देखा जा सकता है, लेकिन 'अंत' से पहले खुद को खत्म कर लेना सबके लिए मुमकिन नहीं होता। हां, 'जिंदा' रहते हुए मौत की चाहे जितनी पीड़ा वे झेल लें।

एक टीवी चैनल पर ज्योतिष संबंधी कार्यक्रम देखने के बाद राकेश ने एक कागज पर लिखा- 'कार्यक्रम को देख कर मुझे लगा कि मैं गलत ग्रह-नक्षत्र में पैदा हुआ हूं और इस वजह से मैं काफी परेशान हूं।' इसके बाद उदयपुर के बीएन कॉलेज में स्नातक प्रथम वर्ष के उस छात्र ने गले में फंदा लगा कर जान दे दी। इसी तरह एक ओर 'बिग बैंग' की सच्चाई की खोज में विज्ञान अब तक के सबसे बड़े प्रयोग की तैयार कर रहा था और टीवी चैनल इस प्रयोग के साथ ही 'धरती के अंत' की मुनादी कर रहे थे। पर्दे पर चीखते-चिल्लाते कुछ सूटे़ड-बूटेड टाईयुक्त पत्रकारनुमा लोग डरावने जंगल के वीराने या मौत के खौफ से आच्छादित श्मशान कब्रिस्तान के अघोड़ियों या तांत्रिकों से कम नहीं लग रहे थे। उससे पैदा होने वाली उत्तेजना में छाया ने तो कीटनाशक की दवा खाकर जान दे दी (मरने से पहले उसने पुलिस को बयान भी दिया), लेकिन हजारो-लाखों जानते हैं कि उस पूरे दौर में वे किस तरह तिल-तिल कर मरने के अहसास से गुजरते रहे।

कुछ समय पहले विज्ञान और वैज्ञानिक चेतना के प्रचार-प्रसार के लिए काम करने वाली संस्था 'स्पेस' ने इस बात पर गहरा क्षोभ जताया था कि विज्ञान के जिन आविष्कारों का इस्तेमाल अंधविश्वासों के जाले साफ करने में किया जाना चाहिए, उसी का सहारा लेकर आदमी को और अंधा बनाया जा रहा है। सवाल है कि विज्ञान के कंधों पर सवार ये आधुनिक और विकसित-से दिखने वाले 'प्राणी' ऐसा क्यों कर रहे हैं?

दरअसल, जब अक्ल को केवल तिजारत का हथियार बना लिया जाता है तो सारी नैतिकताएं पीछे छूट जाती हैं। अगर बात केवल टीवी चैनलों की करें तो जैसा कि कभी-कभी अंदाजा लगाया जाता है, खेल क्या केवल टीआरपी बढ़ाने का है? एक मकसद यह जरूर है। मगर यह सिर्फ दिखाई देने वाला व्यापार है। इसके पीछे जो महीन और शातिर मिजाज काम कर रहा होता है, एकबारगी उस पर यकीन होना मुश्किल है। लेकिन किसी भी गतिविधि को उसके असर की गहराई की बुनियाद पर आंका जाना चाहिए।


कई बार लगता है कि जादू-टोना और झाड़-फूंक के चमत्कार से मन की साध पूरी कराने का दावा करने वाले ओझाओं और टीवी चैनलों या अखबार में इस तरह की खुराक परोसने वाले संचालक एक ही पायदान पर खड़े हैं और उन्हें समाज के मनोविज्ञान की गहरी समझ होती है। यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि किसी भी व्यक्ति या समाज का मनोविज्ञान उसका सांस्कृतिक परिवेश तैयार करता है। अनंत ब्रह्मांड में सैर करती हमारी कल्पनाएं और जीवन की सीमाओं के बीच झूलती उम्मीदें और मायूसियां। जिन चीजों तक हमारी पहुंच होती हैं और जो किसी भी तरह से हमारे सामने मुहैया हो जाती हैं या जो कम-से-कम साक्षात हैं, उससे इतर कुछ भी पाने के लिए तो चमत्कार का ही आसरा है न! पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही चमत्कार या अदृश्य शक्तियों की धारणाएं हमारी चेतना में इस कदर गहरे पैठी होती हैं कि तुरत-फुरत कुछ हासिल कर लेने की हसरत या एक छोटी नाकामी भी हमें बेबस या लाचार बना देती है। फिर शुरू होता है दिमागी काहिली का दौर, जो जिंदगी को आखिरकार चमत्कार के रहमोकरम पर ले जाकर छोड़ देता है।

और चमत्कारों या अदृश्य दुनिया के खयाल का तिजारत करने वाले लोग हमारी उसी बेबसी का शोषण करते हैं। हम बिल्कुल भरे-पूरे, हर तरह से खुद को सेहतमंद महसूस करेंगे, लेकिन ज्यों ही हमें बताया जाएगा कि 'स्वर्ग जाने वाली सीढ़ियां खोज ली गई हैं', हम तुरंत ही अपनी उस ख्वाबों की दुनिया में पहुंच जाते हैं जो हमारे दिमाग में सोच का एक हिस्सा बना बैठा होता है। 'मर्दखोर परियां' एकबारगी हमें जन्नत की हूरों के साथ फूलों की सेज पर ला पटकती हैं। सीता से जुड़ी जगहों को श्रीलंका में खोज लेने की खबर आती है और तत्काल हम खुद को 'तथास्तु' कहते हुए 'श्रीराम' के सामने पाते हैं। भूतों की लड़ाई की 'लाइव कवरेज', रावण की वायुसेना और हवाईअड्डों पर 'ब्रेकिंग न्यूज' हमारी कल्पनाओं की पुष्टि करते लगते हैं। कुछ समय पहले एलियंस 'धरती पर हमला' करने आ रहे थे। ये सारी बातें 'शोधकर्ताओं' के हवाले से कही जाती हैं, ताकि इन्हें ज्यादा से ज्यादा विश्वसनीय बनाया जा सके। शकुन-अपशकुन पर आधारित कर्मफल का ब्योरा देता ज्योतिषि केवल कमाई नहीं कर रहा होता है। वह खूब जान रहा होता है कि इन सबसे कैसे उसका वर्गहित कायम रहता है और सामाजिक शासन और शोषण-परंपरा की बुनियाद और मजबूत होती है।

हमारी त्रासदी केवल पंडे-तांत्रिक या मीडिया तक ही सीमित नहीं है। तल्ख हकीकतों से लबरेज 'सत्या' जैसी फिल्म बनाने वाले रामगोपाल वर्मा 'फूंक' बना कर यह खुली चुनौती पेश करते हैं कि अगर कोई थियेटर में अकेले इस फिल्म को देख लेगा तो उसे पांच लाख रुपए ईनाम के तौर पर दिए जाएंगे। 'फूंक' में भूत-प्रेत या भगवान में यकीन नहीं रखने वाले नायक के साथ-साथ विज्ञान, चिकित्सा-विज्ञान और एक प्रगतिशील सोच को हारते और 'काला जादू' को जीतते दिखाया गया है। यह हजारों सालों से 'काला जादू' की गिरफ्त में जीते समाज के भावनात्मक शोषण के अलावा और क्या है?

लेकिन बात अगर यहीं खत्म हो जाती तो बात और थी। विज्ञान की बुनियाद पर अपनी पहचान कायम करने वाले एक पूर्व राष्ट्रपति से लेकर इस देश के कई शीर्ष नेताओं तक को 'चमत्कारी बाबाओं' के पांव पखारने में शर्म के बजाय गर्व ही महसूस होता रहा है। मानव संसाधन विभाग (यह मंत्रालय देश में वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देने के लिए जिम्मेदार है) के एक पूर्व राज्यमंत्री ने तो बाकायदा ओझाओं-तांत्रिकों का सम्मेलन ही करा डाला था। हाल ही में एक विधायक ने एक बड़े आयोजन में 265 भेड़ों की बलि दी, क्योंकि परमाणु करार के मुद्दे में खतरे में पड़ी यूपीए सरकार 'किसी तरह' विश्वासमत में जीत सकी। कुछ विधायकों की उनके कार्यकाल में अलग-अलग कारणों से हुई मौत के चलते विधानसभा भवन को भूत-प्रेत से ग्रस्त मान लिया जाता है। यह महज संयोग नहीं है कि ज्योतिष शास्त्र को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाए जाने की वकालत सिर्फ इसलिए की जाती है क्योंकि यह भारतीय संस्कृति का अभिन्न हिस्सा रहा है। देश को नेतृत्व देने का दावा करने वाले ऐसे राजनेताओं को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि इससे देश-समाज कितना पीछे जाता है या आधुनिक दुनिया में देश की कैसी छवि बनती है।

सवाल है कि अगर कोई तांत्रिक या व्यक्ति किसी बच्चे की बलि देता है तो उसके लिए कौन-सी स्थितियां जिम्मेदार हैं? सुना है कि कानून अपराध के लिए प्रेरित करने वाले को भी अपराधी ही मानता है। तांत्रिकों-ज्योतिषियों सहित ताजा फिल्में- 'फूंक' या '1920' जैसी फिल्में बनाने वाले ऐसे लोगों को क्या अंधविश्वासों और सामाजिक जड़ता को बनाए रखने का अपराधी नहीं माना जा सकता? इनके लिए कौन-सा कानून लागू होता है?

यह सब जवाहरलाल नेहरू के उस देश में हो रहा है, जो समाज को एक वैज्ञानिक सोच की जमीन पर खड़े होकर देखना चाहते थे।

हाल ही में एक अति पिछड़े माने जाने वाले समाज की एक सांस्कृतिक गतिविधि के साक्षात के दौरान इन पंक्तियों के लेखक ने देखा कि किस तरह करीब हजार लोगों की भीड़ के बीच भयानक उन्माद पैदा करते ओझाओं ने भेड़ों की बलि दी और उसके खून से खुद को नहाया। यह सुदूर देहात के एक पिछड़े इलाके की घटना है। लोग भूले नहीं होंगे कि सारी आधुनिकताओं से लैस देश की राजधानी के एक उपनगर गाजियाबाद में, जो संयोग से 'हाईटेक' भी घोषित हो चुका है, तीन बेटों ने अपनी मां की पीट-पीट कर इसलिए बलि दी क्योंकि एक तांत्रिक ने उन्हें ऐसा करने की सलाह दी थी। लेकिन विज्ञान की डिग्रियों की मार्फत इंजीनियर या डॉक्टर बने उन बेटों की मूढ़ता और त्रासदी पर हमक्या अफसोस जताएं। हमारे देश के अंतरिक्ष शोध संस्थान, यानी 'इसरो' का मुखिया जब पीएसएलवी जैसे अंतरिक्ष यानों के सफल प्रक्षेपण के लिए मंदिरों में पूजा आयोजित करता है और भगवान से खुद को कामयाब करने की याजना करता है तो एक पिछड़े समाज के सामने ओझाओं के उस उन्माद प्रदर्शन पर कौन-सा सवाल उठाया जाए?

दूरदराज के इलाकों में बहुत सारे मां-बाप अपने बच्चों की ओर आज भी यह जुमला उछालते हुए मिल जाएंगे कि 'देह बढ़ गया और दिमाग वहीं रह गया।' तो क्या हमारा समाज आधुनिकता की तमाम ऊंचाइयों को छूने की कोशिश के बावजूद अब भी किसी एक जगह पर ठहरा हुआ है? या उसे जड़ बनाए रखने की साजिश चल रही है? क्यों हम अब तक ऐसा कोई कारगर कानून बना सकने में नाकाम रहे हैं जो ओझाओं-तांत्रिकों, ग्रह-नक्षत्रों का पाठ पढ़ाने वाले ज्योतिषियों, चमत्कारों और अमूर्त दुनिया के किस्से परोसने वाले मीडिया आदि के ठगी के धंधे से समाज को बचा सकें?

इन सवालों के जवाब शायद विश्व हिंदू परिषद के 'अंतरराष्ट्रीय मुख्यमंत्री' रहे प्रवीण तोगड़िया के उस बयान में मिल जाते हैं, जो उन्होंने कुछ साल पहले गोलवलकर गुरु के सौंवे जन्म दिवस के मौके पर आयोजित 'विराट हिंदू सम्मेलन' में दिया था। महाराष्ट्र सरकार द्वारा लाए गए अंधविश्वास विरोधी कानून के मसले पर उनका कहना था कि हिंदुओं को इस कानून का विरोध करना चाहिए क्योंकि यह हिंदुत्व को खत्म करने की साजिश है। साफ है कि एक तरह से वे यह भी कर रहे थे कि हिंदुत्व की बुनियाद इन अंधविश्वासों पर ही टिकी है और अंधविश्वासों का खत्म होना, हिंदुत्व के खत्म होने जैसा ही होगा। और विहिप का 'हिंदुत्व' कया है, क्या यह किसी को बताना होगा?

यह केवल हिंदुओं के धर्म-ध्वजियों का खयाल नहीं है। सभी धर्म और मत के 'उन्नायक' यही कहते हैं कि सवाल नहीं उठाओ, जो धर्म कहता है, उसका अनुसरण करो। और हमारे भीतर का भय बाहर आने के लिए छटपटाते सारे सवालों की हत्या कर देता है। हमारी विडंबना यह है कि जिनसे हम सवाल उठाने की उम्मीद कर रहे होते हैं, वे खुद एक ऐसा मायावी लोक तैयार करने में लगे होते हैं, जहां कोई सवाल नहीं होता।

इसमें कोई शक नहीं कि देश-दुनिया से रूबरू कराने में टीवी चैनलों ने हर मुमकिन कोशिश की है। लेकिन असली मुश्किल यह है कि लगभग सारी प्रस्तुतियों में ऐसा कुछ भी नहीं होता जो हमें घटनाओं के विश्लेषण की ताकत देता हो। हम देश-दुनिया को देखें, मगर उसी निगाह से, जिससे हमें दिखाया जाता है। तो क्या यह मीडिया की सीमा है कि वह कुछ 'नया' देने के नाम पर हमें और 'पुराना' बना रहा है? क्या मीडिया इस बात से अनजान है कि भूत-प्रेत, जादू-टोना, ग्रह-नक्षत्र, ज्योतिष, प्रलय-चमत्कार से जुड़े किसी भी कार्यक्रम का एकमात्र असर सामाजिक यथास्थिति और जड़ता को कायम रखना है?

मकसद सिर्फ यह है कि समाज सोचने और सवाल उठाने के दौर में न पहुंचे। ऐसे कार्यक्रम परोसने वाले और ऐसी गतिविधियां चलाने वाले धर्मध्वजी यह खूब जानते हैं कि जिस समाज ने सवाल उठाना शुरू कर दिया, उनमें चमत्कारों और तकदीर बताने की दुकान बंद हो जाएगी। इसलिए दिमाग पर पड़े जाले बनाए रखने और नए-नए डिजाइन में नए जाले पेश करने का खेल जारी है। साधना या संस्कार जैसे चैनलों की तो बात छोड़ दें, प्रगतिशील कहे जाने वाले समाचार चैनलों के साथ-साथ इस खेल में हर वह तबका शामिल है, जो दुनिया को दिशा देने का दावा करता है।

कुछ ही समय पहले एक टीवी चैनल के मुखिया ने इस तरह के पाखंडों वाले कार्यक्रम दिखाने के मसले पर साफ जवाब दिया कि मुझे इस बात के लिए कतई शर्मिंदगी नहीं है। शायद वे सही कह रहे थे। इससे इतना तो जाहिर होता ही है कि जो कुछ हो रहा है, वह अनायास बिल्कुल नहीं है। एक सजग और सचेत समाज केवल यह नहीं देखेगा कि 'क्या' है, बल्कि वह उस 'क्या' के 'क्यों' की भी मांग या खोज करेगा। लेकिन सिर्फ 'क्या' परोस कर 'क्यों' का सवाल सिरे से गायब कर देने की कोशिश लगातार और सायास तरीके से चल रही है।