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Saturday, 21 September 2019

'सेक्शन 375' : स्त्री के विरुद्ध पर्दे का चक्रव्यूह


अरविंद शेष

'दुरुपयोग' की दुहाई से इंसाफ की आवाज पर हमला

पिछले कुछ सालों के दौरान कभी दबे-छिपे तरीके से तो कभी खुल कर स्त्रियों और दलितों, दो सामाजिक वर्गों के अधिकारों के संरक्षण के लिए बने कानूनों के दुरुपयोग की दुहाई दी गई और इन कानूनों को खत्म करने तक की मांग की गई। कहा गया कि बलात्कार के खिलाफ  बने कानूनों का महिलाएं बड़े पैमाने पर दुरुपयोग करती हैं और इस वजह से बहुत सारे 'बेचारे' निर्दोष मर्द मारे जाते हैं। इसी तरह, दलित-वंचित जातियों-तबकों के हक में बने अनुसूचित जाति-जनजाति (अत्याचार निवारण) कानून का अनुसूचित जातियों के लोग काफी दुरुपयोग करते हैं और बहुत सारे भोले-भोले सवर्ण जातियों के लोगों को फंसाते हैं।

इन दोनों आरोपों की सच्चाई का अंदाजा न सिर्फ जमीनी वस्तुस्थिति पर नजर डालने से होगा, बल्कि आधिकारिक आंकड़े तक इस 'पॉपुलर' धारणा के खिलाफ जाते हैं। इसके बावजूद ये दोनों तरह की बातें जोर देकर कही और फैलाई जाती हैं। काफी जद्दोजहद और कई 'विशाल आंदोलनों' के बाद एससी-एसटी (अत्याचार निवारण) कानून के खिलाफ माहौल बनाया गया था। एससी-एसटी (अत्याचार निवारण) कानून को तो एक अदालती फैसले के जरिए कुंद भी किया जा चुका था, लेकिन इसके  खिलाफ उभरे व्यापक आंदोलन के बाद सरकार को फिर से इस पर विचार करना पड़ा। अभी भी कुछ सामाजिक वर्गों की इस कानून को खत्म करने की मांग होती रहती हैं और जिस तरह की राजनीतिक ताकतें सत्ता में हैं, उनके रहते इस कानून के संरक्षण का भरोसा कमजोर रहेगा।

'राष्ट्रीय पुरुष आयोग' की ओर बढ़ते कदम

इसी तरह, बलात्कार के खिलाफ बने कानूनों के दुरुपयोग को लेकर भी समाज का एक बड़ा हिस्सा बेहद संवेदनशील है। हालत यह है कि पचास-साठ लोगों ने एक संगठन बना कर 'बेचारे... मासूम... बेकसूर' पुरुषों को दहेज के अलावा बलात्कार के आरोप में कठघरे में खड़ा करने से बचाने और उन्हें संरक्षण देने के लिए अब बाकायदा एक 'राष्ट्रीय पुरुष आयोग' बनाने की मांग भी की है। यह संगठन समाज में पुरुषों के बीच फैली उस कुंठा को नुमाइंदगी देता है कि महिलाएं बलात्कार से संबंधित कानूनों का दुरुपयोग करके 'अच्छे-भले' पुरुषों को फंसाती हैं। इसके लिए सड़क पर अभियान तो चल ही रहा है, लेकिन इस मसले पर पहले समाज, फिर सरकार को प्रभावित करने के मकसद से लोकप्रिय फिल्मों के जरिए भी दबाव बनाने की कोशिश की जा रही है। फिल्म 'सेक्शन 375' इसी अभियान की एक कड़ी है।

यह फिल्म शुरुआती तौर पर स्त्री के पक्ष में बनी दिखती है, लेकिन अंतिम तौर पर स्त्री के खिलाफ जाती है, यह स्थापित करके कि एक जरूरतमंद हो या महत्त्वाकांक्षी लड़की, अपनी सुविधा और स्वार्थ की वजह से अपने शरीर का इस्तेमाल करती है और फिर उसे बलात्कार के रूप में दिखा कर किसी 'अच्छे-भले' पुरुष को बर्बाद कर डालती है। एक साधारण परिवार से आने वाली अंजलि दांगले एक फिल्म डायरेक्टर रोहन खुराना के साथ कास्ट्यूम डिजाइनर के तौर पर काम करती है, उसे एकतरफा पसंद करने लगती है, रोहन खुराना उसे खुद को सौंपने की शर्त पर काम पर बनाए रखता है, इस बीच अंजलि उस पर हक जताने लगती है, तब रोहन खुराना उसे निकाल बाहर करता है। फिर अंजलि बदला लेने के लिए साजिश रचती है, रोहन खुराना से यौन संबंध बनाती है और उसे अपने साथ बलात्कार का दृश्य रच कर रोहन खुराना को दस साल की सजा दिलवा देती है।

पूरी कहानी बस यही है। इसमें फिल्मकार की मूल स्थापना यह है कि स्त्रियों के हक में बहुत जरूरी कानून बनाए गए हैं, लेकिन स्त्रियां अपने लिए फायदा उठाने के लिए इसका दुरुपयोग भी करती हैं। पहले तो सहमति से यौन-संबंध बनाती हैं और फिर उसे बलात्कार की शक्ल में पेश करके भोले-भाले मर्दों की जिंदगी बर्बाद करती हैं। यह समझना मुश्किल है कि इक्का-दुक्का और यहां तक कि कई बार किसी काल्पनिक घटना को आधार बना कर एक ऐसे जघन्य अपराध का सरलीकरण कैसे किया जा सकता है, जो आज भारत जैसे देश में न जाने कितनी स्त्रियों की जिंदगी का एक त्रासद अध्याय बना हुआ है। फिल्म की कहानी, स्क्रिप्ट लिखने वालों और निर्देशक को पता नहीं इस बात का अंदाजा है या नहीं कि इस देश में न जाने बलात्कार के कितने मामले मजबूरी, लोकलाज, धौंस, कानूनी प्रक्रिया की जटिलता जैसी कई वजहों से दफ्न हो जाते हैं, कितनी लड़कियां बलात्कार के बाद किसी से कुछ नहीं कहतीं, बस खुदकुशी कर लेती हैं।

आम के बजाय अपवाद का चुनाव

अगर फिल्में दावा करती हैं कि उसमें वही दिखाया जाता है जो समाज में घटता है, तो किसी फिल्म को अपवादों का प्रतिनिधित्व करना चाहिए या फिर आम घटनाओं का? 'सेक्शन 375' बलात्कार के खिलाफ कानूनों के दुरुपयोग के किसी मामले को उठा कर उसे प्रतिनिधि मामले के रूप में पेश करती है और पहले से ही पितृसत्ता की सड़ांध में मरते ज्यादातर आम दर्शकों के मन में बसे स्त्रियों के खिलाफ मानस को और खाद-पानी देती है। इसके बरक्स रोजाना कितनी महिलाओं का बलात्कार होता है और कितने आरोपियों को सजा मिल पाती है, यह कोई छिपा तथ्य नहीं है।

इस फिल्म की इस कदर बारीक बुनाई की गई है कि अगर एक पारंपरिक मानस वाला व्यक्ति बलात्कार की शिकार लड़की की हालत देख कर अपने विचार के स्तर पर उदार होना भी चाहता है तो उसके सामने कानून के महारथी की शक्ल में एक मशहूर वकील के मुंह से 'तर्कों का पहाड़' खड़ा कर दिया जाता है और आखिरकार वह फिर से अपने मर्दाना दड़बे में घुस जाता है। फिल्म के आखिर में जिस तरह पीड़ित लड़की मुकदमा जीतने यानी अपने 'मर्द दुश्मन' को सजा दिलाने के बाद खुद कबूल कर लेती है कि 'रोहन खुराना ने बलात्कार नहीं किया था, लेकिन जो किया था, वह बलात्कार से कम नहीं था' तो एक आम दर्शक के दिमाग में सिर्फ यही बैठता है कि 'रोहन खुराना ने बलात्कार नहीं किया था', जिसे फिल्म में 'वास्तविक घटना' के रूप में परोसा गया है। फिल्म में 'बलात्कार के सिर्फ पच्चीस प्रतिशत आरोपों में सजा हो पाती है' की व्याख्या इस रूप में की जाती है कि 'अदालत की सख्त कानूनी प्रक्रिया का सामना करने के बावजूद पचहत्तर प्रतिशत आरोपी निर्दोष साबित होते हैं।'

इंसाफ की लड़ाई का उलटता चक्र

इस फिल्म की हालत यह है कि पीड़ित अंजलि दांगले की ओर से पेश होने वाली सरकारी वकील हीरल गांधी अपने सीनियर तरुण सलूजा की टीम को छोड़ने की वजह उसका मर्दवादी बर्ताव बताती है और अंत में उसके सामने ही दयनीय भाव से जाकर कहती है कि 'जस्टिस इस नॉट डन सर'! इस तरह यह फिल्म एक मर्दवादी या पितृसत्तात्मक समाज में उसी प्रचलित धारणा की पुष्टि करता है कि महिलाएं अपने स्वार्थ के लिए अपने शरीर का इस्तेमाल करती हैं और फिर बाद में बेचारे पुरुषों पर बलात्कार का आरोप लगा देती हैं। जब कुछ नेता ठीक इसी आशय के बयान देते हैं तो उस पर तूफान खड़ा हो जाता है, लेकिन एक पूरी फिल्म यही स्थापित करती है तो उसे महज फिल्म की तरह देखने की अपेक्षा की जाएगी।

जिस तरह राजनीति की दुनिया में पिछले करीब तीन दशकों में सामाजिक न्याय के पक्ष में हुए बदलावों को तंत्र और व्यापक संसाधनों से लैस आक्रामक राजनीति के सहारे उल्टी दिशा की ओर मोड़ दिया गया है, समाज में दलित-वंचित तबकों के हक में इंसाफ के सवालों को दफ्न करने के इंतजाम किए जा रहे हैं और ब्राह्मणवाद का मानो पुनरोत्थान हो रहा है, उसी तरह किसी तरह अपने बूते खड़ी हो रही, अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ती, अपने भरोसे जीती और पितृसत्तात्मक और मर्दवादी दुनिया में अपने लिए जगह बनाती स्त्री भी चारों तरफ से घेरी जा रही है। घर की दहलीज से बाहर निकलने वाली स्त्री इस सामाजिक व्यवस्था के लिए चुनौती है और उसे रसोई की शोभा बनाना परंपरा और संस्कृति बचाना है। इस मकसद से एक ओर सड़कों-गलियों में लड़कियों-महिलाओं के सिर पर कलश रखवा कर यात्रा निकाली जानी है, जागरण से लेकर कुंभ तक की शोभा बनाई जानी है, महिलाओं के खिलाफ अपराधों में बढ़ोतरी होनी है और दूसरी ओर सिनेमा जैसे पॉपुलर हथियार के जरिए आम जनमानस में स्त्रियों के खिलाफ व्यूह रचना करनी है।

दरअसल, एससी-एसटी (अत्याचार निवारण) कानून और दहेज या बलात्कार से संबंधित कानूनों के दुरुपयोग का शिगूफ़ा एक औसत दिमाग वाले व्यक्ति को प्रभावित करता है और उसके जरिए फिर जनमत-निर्माण की प्रक्रिया चलती है। वंचित वर्गों के रूप में बहुत लंबी लड़ाई के बाद दलितों और स्त्री के पक्ष में जो भी कानूनी अधिकार सुनिश्चित हो सके हैं। उसका उसे क्या फायदा मिलता है, यह सभी जानते हैं, लेकिन महज चंद घटनाओं के आधार पर स्त्री के हक में बने कानूनों को कठघरे में खड़ा करना बताता है कि प्रतिगामी राजनीति के दौर में संसाधनों के मालिकों ने भी शायद वही रास्ता चुन लिया है। इसलिए सत्ताधारी जातियों-तबकों की ओर से कहीं एससी-एसटी (अत्याचार निवारण) कानून से लेकर भागीदारी को सुनिश्चित करने वाली आरक्षण की व्यवस्था को खत्म या कमजोर करने के खेल चल रहे हैं तो कहीं स्त्रियों को पारंपरिक सांस्कृतिक परिभाषा में समेटने या बांधने की कोशिश चल रही है।  

Saturday, 4 January 2014

सामंतवाद की दीवार में सिर फोड़ता सामाजिक न्याय...



नवंबर 2005 में जब बिहार में लालू प्रसाद की पार्टी का तथाकथित "जंगल राज" खत्म हुआ और तय हो गया कि भाजपा के सहारे से नीतीश कुमार बिहार के मुखिया बन जाएंगे, उस वक्त मैं बिहार के सीतामढ़ी जिले मे अपने गांव से पांच किलोमीटर दूर गाढ़ा चौक पर था। जदयू-भाजपा की जीत की मुनादी पीटती हुई भीड़ चौक की तरफ आ रही थी। पास आने पर "नीतीश कुमार जिंदाबाद" जैसे नारों के साथ जो मुझे सुनाई पड़ा, वह किसी भी होशमंद शख्स को दहलाने के लिए काफी था। लगभग दो सौ लोगों की भीड़ गुलाल-अबीर से होली खेलती उन्माद में चीख रही थी कि "हमारा राज वापस आ गया... हमारा राज वापस आ गया...।"

यहां मुझे यह साफ करने की जरूरत शायद नहीं है कि वे लोग कौन थे जो इस बात की होली मना रहे थे कि "हमारा राज वापस आ गया...।" मैं अंदाजा लगा सकता था, लेकिन फिर भी मैंने वहां पिछले कई साल से कंधे पर डोलची टांग कर पान बेचते सुखो भाई से पूछा कि ये कौन लोग हैं। उन्होंने मुझे जवाब के तौर पर सवाल दिया कि इस चौक पर और किसकी हिम्मत होगी दिवाली के साथ होली मनाने की। फिर उन्होंने धीरे और सहमी हुई आवाज में बताया कि सब बाबू साहब हैं।

लालू प्रसाद की तरह नीतीश कुमार भी पिछड़ी जाति, यानी ओबीसी की ही पृष्ठभूमि से आते हैं। लेकिन गाढ़ा चौक पर "बाबू साहबों" की भीड़ क्यों खुशी मना रही थी और नारे लगा रही थी कि "हमारा राज वापस आ गया...।"

मैं नहीं जानता कि कुछ उदार कहे जाने वाले लोगों को आज भी यह वहम क्यों है कि नीतीश भाजपा के साथ खड़े हैं, लेकिन भाजपाई नहीं हैं। इस देश की असली मुश्किल यही है कि यहां ब्योरा जमा करना और उसे पेश करना अपनी जिम्मेदारी का पूरा होना मान लिया जाता है। हमें यह ध्यान रखने की जरूरत है कि अगर हमें यहां से आगे बढ़ना है तो किसी भी क्या के क्यों पर बात करनी होगी, उसकी करनी होगी।

गाढ़ा चौक पर "हमारा राज वापस आ गया..." की मुनादी पीटते हुए लोग कोई चाणक्य नहीं थे, लेकिन वे क्यों निश्चिंत थे कि उनका "राज" वापस आ गया? क्या सिर्फ इसलिए कि भाजपा सत्ता की हिस्सेदार थी? मामला केवल हिस्सेदारी का नहीं था, बल्कि उस भरोसे का था जो नीतीश कुमार ने दिया था और उस मानसिकता का था, जिसमें नीतीश कुमार जीते हैं। यहां शायद बिहार में अति पिछड़ी जातियों और महादलितों के लिए की गई उनकी तथाकथित "क्रांति" की हकीकत का बयान करने का मौका नहीं है।

लेकिन 2005 के नवंबर से आज तक अलग-अलग मौकों पर गाढ़ा चौक पर गूंजते वे नारे अगर मुझे जिंदा दिखे हैं तो इसलिए कि नीतीश कुमार और उनकी सरकार ने हर मौके पर उसे पाला-पोसा और मजबूत किया है।

सत्ता में आने के महज तीसरे महीने उन्होंने अपना सबसे पहला बड़ा फैसला लिया और उस पर तुरंत अमल किया वह था अमीरदास आयोग को भंग करना। मुझे अक्सर यह शक होता है कि कहीं यह नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री बनने की पूर्व शर्त तो नहीं थी! वरना क्या वजह हो सकती है कि जो अमीरदास आयोग अपनी लगभग सारी रिपोर्ट पूरी कर चुका था, बस उसके सौंपे जाने की औपचारिकता बाकी थी, उसे आखिरी वक्त में भंग कर दिया गया?

दरअसल, अमीरदास आयोग शायद चाह कर भी उन हकीकतों को नजरअंदाज नहीं कर सकता था कि भूमिहारों की रणवीर सेना को खाद-पानी से सींचने और पालने-पोसने वाले लोग भाजपा और जदयू के वैध साए में जनतांत्रिक राजनीति कर रहे थे और उसके पांव राजद के भीतर भी फैले हुए थे। इसलिए इस आयोग का भंग किया जाना सबके लिए सुविधाजनक था और शायद इसीलिए किसी को भी इस पर हंगामा खड़ा करना जरूरी नहीं लगा। लालू प्रसाद की उस राजद के लिए भी नहीं, जिसके सत्ताकाल में रणवीर सेना द्वारा किए गए कत्लेआमों की पड़ताल और उसके तारों की जांच के लिए वह आयोग बिठाया गया था।

अमीरदास आयोग को भंग किए जाने को मैं नीतीश कुमार की सामाजिक राजनीति की दृष्टि मानता हूं। और उनकी सरकार की समूची कार्यशैली ने इसे बार-बार पुष्ट किया है। फर्क सिर्फ यह है कि उनके कामकाज का आलकन एक लगभग बिके हुए और समर्पित मीडिया के "ट्रांसफॉर्म्ड बिहार" टाइप रिपोर्टों के आधार पर होता रहा है। सवाल है कि नीतीश कुमार की मेहरबानी से बिहार को ट्रांसफॉर्म्ड बताने वालों का समाज कौन-सा है और उसे अपने निष्कर्षों का आधार बनाने वाले लोग कौन हैं? पैदा होने के बाद रणवीर सेना की बर्बरताओं को राजद सरकार की नाकामी करार देना सही था, लेकिन इसी मीडिया के लिए अमीरदास आयोग को भंग करना किसी परेशानी की वजह नहीं था। क्यों?

यही वही दौर था जब 2002 में रणवीर सेना का मुखिया ब्रह्मेश्वर सिंह पकड़े जाने के बाद से जेल में बंद था और बथानी टोला जैसे तमाम कत्लेआमों के सिलसिले में जहां भी अदालतों में उसकी खोज होती, नीतीश सरकार के सिपाही उसके "फरार" होने की खबर दे देते। और आखिरकार नीतीश कुमार की दोस्ताना मेहरबानी से जब ब्रह्मेश्वर सिंह जेल से बाहर आ गया तो इस पर क्यों किसी को हैरान होना चाहिए? यहां तक कि लालू प्रसाद या रामविलास पासवान को भी इस पर चुप रहना जरूरी लगा तो इसके कुछ तो कारण रहे होंगे।

और जब पटना हाईकोर्ट के जजों ने लक्ष्मणपुर बाथे या बथानी टोला कत्लेआम के निचली अदालत में साबित तमाम अपराधियों को रिहा किया तो कम से कम मुझे सचमुच कोई हैरानी नहीं हुई। लालू प्रसाद की राजद सरकार ने बहुतेरे धतकरम किए होंगे, लेकिन कम से कम लक्ष्मणपुर बाथे और बथानी टोला मामले में उसने पीड़ितों के पक्ष में इतना जरूर किया कि सेशन कोर्ट ने कइयों को छोड़ने के बावजूद कइयों को फांसी और उम्रकैद की सजा दी थी। लेकिन जब "अपना राज" वाली सरकार आ गई तो राज्य की बदली हुई तस्वीर का असर अदालतों पर भी तो पड़ना चाहिए! सो हाईकोर्ट के जजों को स्वाभाविक रूप से उस कत्लेआम के गवाह भरोसेमंद नहीं लगे। निचली जातियों के लोग सिर्फ जान देते वक्त भरोसेमंद होते हैं। वे अदालत के कठघरे में भरोसेमंद नहीं होते हैं।

अभी बहुत दिन नहीं बीते हैं जब दिल्ली में रोहिणी की एक अदालत की जज कामिनी लाउ ने भी हरियाणा के मिर्चपुर कांड के पीड़ितों को "गैरभरोसेमंद" गवाह घोषित किया था और तीन को छोड़ कर तमाम आरोपियों को मासूम होने का तमगा देकर रिहा कर दिया था। दलितों पर अत्याचार के मुकदमों में सजा की दर महज दो प्रतिशत के आसपास है। खुद केंद्र सरकार कहती है कि दलितों पर जुल्म से संबंधित लगभग अस्सी फीसद मामले लंबित हैं। यानी सौ में करीब अस्सी मामले अदालतों तक पहुंचे ही नहीं। और हममें से बहुत सारे लोग हैं जो न्यायिक सेवाओं में आरक्षण की मांग को एक पिछड़ा और द्वेषपूर्ण मांग करार देते हैं! हो सकता है, यह शक सही हो। लेकिन वे कौन-सी वजहें होंगी कि उसी पटना हाईकोर्ट को अमौसी हत्याकांड में दस लोगों को फांसी की सजा देने में कोई हिचक नहीं हुई। क्या इसलिए कि नीतीश सरकार की परिभाषा के हिसाब से वे आरोपी महादलित थे और अदालत को वे सभी गवाह "भरोसेमंद" लगे जो सवर्ण थे? यह देश के दूसरे इलाकों का भी सच हो सकता है। लेकिन बिहार में पुलिस थानों के दारोगा को शायद जज भी बना दिया गया है जो उत्पीड़न, अत्याचार या अपराध के मामले दर्ज नहीं करता है, तत्काल थाने में ही निपटा देता है। आंकड़ों में अपराध में कमी वैसे ही नहीं होती है। और दलितों-पिछड़ों पर जुल्म ढाने वाली सामंती ताकतों ने नीतीश कुमार को यों ही नहीं बिठाया है बिहार की कुर्सी पर!

नीतीश एक अच्छे प्रतिनिधि साबित हुए हैं उन ताकतों के, जो उनके पहले के तकरीबन डेढ़ दशक के तथाकथित जंगल राज में निराश हो गए थे। लालू प्रसाद अपने शुरुआती सत्ताकाल में कहते थे- "गाय चराने वालों, सुअर चराने वालों, पढ़ना लिखना सीखो, पोथी-पतरा फेंको, पढ़ना-लिखना सीखो।" सुअर या बकरी चराने वालों के पढ़ने-लिखने और पंडितों का पोथी-पतरा फेंक देने के "खतरे" का अंदाजा किसे नहीं था। फिर लालू के ही नाम से प्रचारित "परवल का भुजिया खाओ" या "भूरा बाल साफ करो..." जैसे जुमलों ने सचमुच बहुत सारे लोगों के दिमाग में कुछ गड़बड़ पैदा की। लालू की खासियत यही थी और शायद उनकी सीमा भी कि इससे ज्यादा वे कुछ नहीं कर सके। शायद कर भी नहीं सकते थे। और उनके जुमले आखिरकार एक खास तरह का दिशाभ्रम परोसने से ज्यादा का दर्जा हासिल नहीं सके। बाद में उन्होने जो रास्ता पकड़ा, उसे उम्मीदों के साथ धोखा करना कहा जाए, तो वह भी कम होगा। पोथी-पतरा फेंको का नारा देने वाले वही लालू प्रसाद आज मंदिरों में दर-दर भटकते हुए जेल पहुंच चुके हैं और अपने भविष्य के लिए तंत्र-मंत्र, पूजा-पाठ और पंडितों के आगे दंडवत हैं।

लेकिन असली मुश्किल शायद भाकपा (माले) की थी। 2004 तक मैं पटना में ही था और मैंने देखा है कि भाकपा (माले) की रैलियों में किसी भी दूसरी पार्टी की रैलियों से बहुत ज्यादा भीड़ होती थी। लेकिन उस भीड़ को वे शायद कभी अपनी ताकत के रूप में तब्दील नहीं कर पाए। समूचे मध्य बिहार में जिस संघर्ष की लहर भाकपा (माले) ने पैदा की, उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। लेकिन वे कौन-सी वजहें रहीं कि उसकी जमीन पर कब्जा किसी और का हो गया। क्यों इसके भीतर वे तमाम लोग किनारे लगा दिए गए, जिन्होंने इसे खड़ा किया? यह पार्टी जिनके लिए लड़ाई लड़ने का दावा करती रही है, उनके बीच का कोई भी चेहरा पटल पर नहीं दिखता है तो क्यों?

वैसे यह अकेले माले की दिक्कत नहीं है। माकपा और भाकपा ने भी इसी पैमाने पर जो खाली, लेकिन बेहद उपजाऊ जमीन छोड़ी, उस पर किसी न किसी को तो फसल उगाना था! कम्युनिस्ट पार्टियों के लिए जो लोग अपने हो सकते थे, उन्हें ये पार्टियां अपनी नहीं लगीं, क्यो? क्यों उन नक्सली समूहों को मौका मिला जिन्होंने दलित-पिछड़ी जातियों के सबसे कमजोर तबकों को रणवीर सेना और सरकारी पुलिस के बीच में खड़ा कर दिया? जिस स्थिति में नक्सली समूह रहे हैं, उसमें उत्पीड़ित तबकों को वे इससे ज्यादा क्या दे सकते थे? लक्ष्मणपुर बाथे या बथानी टोला के बदले सेनारी कर दिया जाएगा, लेकिन पटना हाईकोर्ट में कौन खड़ा होगा लक्ष्मणपुर बाथे या बथानी टोला के भुक्तभोगियों के लिए? क्या इस देश के समाज को समझना इतना मुश्किल है?

नब्बे के दशक में बिहार में दलितों और पिछड़ी जातियों का जो उभार हुआ था, उसका नेतृत्व वामपंथी दलों को करना था। लेकिन क्यो यह ताकत लालू का दामन थाम कर आगे बढ़ी और नीतीश के जरिए फिर वहीं वापस लौट गई, जहां वह थी। सोशल जस्टिस के नारे को सोशल इंजीनियरिंग में तब्दील करने के जितने बड़े अपराधी नीतीश कुमार हैं, लालू की जिम्मेदारी उससे कम नहीं बनती। लेकिन वामपंथी पार्टियों ने क्या किया? क्यों नीतीश जैसे फर्जी लोगों को निचली जातियों का उद्धारक घोषित कर दिया जाता है, जबकि नीतीश की मूल दृष्टि सामंती ताकतों की जड़ें मजबूत करती हैं? कुछ सपने दिखाए गए और ढेर सारी उम्मीदों के साथ लोग इंतजार करते रहे और कोई सोशल जस्टिस से बेईमानी करता रहा, कोई सोशल इंजीनियरिंग को पुख्ता करता रहा तो कोई इसे पचड़ा कह कर दूर भागता रहा।

इस देश में जाति से निपटे कौन-सा वर्ग खड़ा किया जा सकता है? इस देश में वर्ग के परदे से जाति को ढकना क्या एक मजाक नहीं लगता?

खैर, कोई भी सत्ता बिना तंत्र पर कब्जे के मन-मुताबिक नहीं चल सकती। लालू प्रसाद के कथित "जंगल राज" में जो थोड़ी तोड़-फोड़ हुई थी, नीतीश के चेहरे के जरिए उसी को दुरुस्त किया जा रहा है। नौकरशाही को खुली छूट दे दो, वह आपको सत्ता का मुखौटा बने रहने में कोई अड़चन नहीं पैदा करेगा। और किसी को यह समझने के लिए बहुत मेहनत नहीं करनी होगी कि बिहार की नौकरशाही और बिहार का तंत्र आज भी किसका है, किसके लिए है। साइकिल वितरण टाइप योजनाएं दरअसल वे परदे हैं जिसके पीछे दो दशकों में सामाजिक यथास्थितिवाद के मनोविज्ञान के गड़बड़ाए हुए पुर्जे दुरुस्त किए जा रहे हैं। सभी मोर्चों पर...!

बिहार का मीडिया हमें दिखाता है कि नीतीश सरकार ने स्कूलों-अस्पतालों की हालत अच्छी कर दी है। वह हमें यह नहीं बताता कि स्कूल-अस्पताल की इमारतों पर रंग-रोगन के अलावा पढ़ाई-लिखाई या डॉक्टर-इलाज की हकीकत क्या है। हम अखबारों के पन्नों पर बिहार की चमकती सड़कों की खबरें पढ़ कर खुश होते हैं। कोई नहीं बताता कि हर वक्त पैसे का रोना रोने वाली बिहार सरकार अपने कुल बजट का अड़तीस फीसद हिस्सा केवल सड़कों के लिए देती है तो इसके पीछे मकसद क्या केवल सड़कें दुरुस्त करना है? कंस्ट्रक्शन और सेवा क्षेत्र की चमकती तस्वीर पर ग्रोथ-रेट के फर्जीवाड़े से किसका चेहरा खिल रहा है? यह पता लगाने की जरूरत है कि सड़क निर्माण से लेकर कंस्ट्रक्शन के तमाम ठेके समाज के किस वर्ग के हिस्से जा रहे हैं।

बहुत अच्छी सड़कों वाले हरियाणा से कोई खबर आ जाती है कि किसी दलित ने किसी सवर्ण के घड़े से पानी पी लिया और उसके हाथ काट दिए गए। और बहुत चमकती सड़कों की ओर तेजी बढ़ते और दावा करने वाले बिहार में भी एक दलित किसी सवर्ण के घर के आगे लगे सरकारी हैंडपंप से पानी पी लेता है तो उसे पीट-पीट कर मार डाला जाता है। फारबिसगंज में जो हुआ था, वह अररिया की तरह चुपचाप दफन हो जाता, अगर चोरी से बनाया गया वीडियो क्लिप बाहर नहीं आ जाता। हमारी बहुत अच्छी सड़कों की मंजिल कहां हैं?

हम लक्ष्मणपुर बाथे या बथानी टोला पर हाईकोर्ट के फैसले से परेशान होते हैं। लेकिन इस व्यवस्था में इससे अलग कोई फैसला होना भी कहां है? लक्ष्मणपुर बाथे या बथानी टोला कत्लेआम को अंजाम देने वाली रणवीर सेना के गुंडे जब ब्रह्मेश्वर सिंह की हत्या के बाद राजधानी पटना में नंगा नाच करते हैं और उसे पोसने वाली सरकार इस तांडव का मजा लेते हुए कहती है कि उन्हें रोकने से दंगा भड़क जाता तो हम किससे उम्मीद कर रहे हैं? रणवीर सेना के गुंडों का तांडव दंगा नहीं था और उसे रोकने से दंगा भड़क जाता! याद कीजिए कि बथानी टोला कत्लेआम पर पटना हाईकोर्ट के फैसले के बाद नीतीश कुमार ने कुछ भी कहा हो।

नीतीश सरकार ठीक कहती है। उन्हें रोका जाता तो समाज की दबी-कुचली पिछड़ी जातियों को यह संदेश कैसे पहुंचता कि रणवीर सेना के नेतृत्व में सवर्ण वर्चस्व आज भी कितनी ताकत रखता है। यानी एक मोर्चे पर तंत्र चुपचाप अपना काम कर रहा है और अब दूसरा मोर्चा भय का मनोविज्ञान रच रहा है।

नीतीश कुमार की यह वही सरकार है जिसके हाथ सरकारी स्कूल के टीचरों से लेकर आशा की महिला कार्यकर्ताओं के शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों पर बर्बर लाठी चार्ज करते हुए नहीं कांपते। लेकिन रणवीर सेना का नंगा नाच शायद वह मंत्रमुग्ध होकर देखती है। कॉमरेड एबी बर्धन जब कहते हैं कि नीतीश कुमार ने लालू प्रसाद से सत्ता पाने के लिए रणवीर सेना जैसे सामंती संगठनों का सहारा लिया तो उसे एक विवादित बयान कहा जाता है। लेकिन नीतीश सरकार का वह कौन-सा चरित्र है जो उसे एबी बर्धन की राय से उसे अलग करता है। वैसे कॉमरेड एबी बर्धन ने सिर्फ वही कहा जो बहुत सारे लोगों के साथ-साथ खुद नीतीश सरकार भी पहले से जानती है। क्या यह बेवजह होगा कि जातिगत आतंक और कत्लेआम का प्रतीक बन चुका रणवीर सेना का मुखिया कहता है कि नीतीश बिहार में अच्छा काम कर रहे हैं? (हालांकि यही कॉमरेड एबी बर्धन अब मानते हैं कि नीतीश कुमार बिल्कुल धर्मनिरपेक्ष हैं और लालू प्रसाद उनके सामने संकट पैदा कर रहे हैं। पता नहीं, यह दिशाभ्रम कॉमरेडों को कहां लेकर जाएगा।)

ब्रह्मेश्वर सिंह की रिहाई, बथानी टोला और लक्ष्मणपुर बाथे जनसंहार पर पटना हाईकोर्ट का फैसला, ब्रह्मेश्वर की हत्या के बाद पटना में तांडव- सभी एक ही जगह पहुंचने वाले अलग-अलग रास्ते हैं।

ब्रह्मेश्वर सिंह की हत्या के बाद अगले कम से कम पंद्रह दिन तक के बिहार के कम से कम हिंदी अखबारों के पन्ने पलटे जा सकते हैं। करीब दो हफ्ते में इन अखबारों ने बताया कि बिहार के सत्ताधारी सामाजिक वर्ग का चरित्र क्या है, वह कैसे काम करती है। लगातार दस-बारह दिनों से अगर पहले पन्ने पर आठ कालम हत्यारों के किसी सरगना को "मुखिया जी" या दूसरे संबोधनों के साथ समर्पित हो तो क्या इसके मायने समझने में किसी को दिक्कत होनी चाहिए? यहां तक कि ब्रह्मेश्वर के श्राद्ध के भोज के एक दिन पहले जब सत्ताईस गैस सिलेंडर फटे और उसमें बहुत कुछ खाक हुआ तो उसे भी किसी आरती की तरह पेश किया गया। उसी में एक सरकारी स्कूल के खाक हो जाने पर एक लाइन की चिंता नहीं दिखी। वह सरकारी स्कूल किसका था और किसने उसके इस्तेमाल की इजाजत दी? लेकिन जब राज ही अपना हो तो इजाजत कैसी?

एक दुर्दांत हत्यारे की हत्या के बाद उसका महिमामंडन करता यह वही मीडिया है जिसे बथानी टोला या लक्ष्मणपुर बाथे कत्लेआम पर हाईकोर्ट के फैसले की खबर भीतर के पन्नों के लायक लगी। फैसले पर सवाल तो दूर, पीड़ितों की राय तक के लिए जगह नहीं थी। यही आपराधिक निर्लज्जता फिलहाल बिहार के मीडिया की सबसे बड़ी खासियत है जिसके सहारे चेतना के स्तर पर सामंती शासन को स्वीकार करने की जमीन मजबूत की जा रही है।

लेकिन इन सबके बीच चुपचाप जो हुआ, क्या खुद नीतीश कुमार उस पर गौर कर रहे हैं।  ब्रह्मेश्वर सिंह की हत्या के बाद बिहार के अखबारों में उनकी तथाकथित सेवा यात्रा की जगह क्या थी?  उनकी जिन यात्राओं का ब्योरा अखबारों के पहले पन्ने का आभूषण होता था, वह भीतर के नवें-दसवें या बारहवें-तेरहवें पन्ने पर क्यों खिसक गया? क्या यह नीतीश कुमार के लिए कोई चेतावनी है? हां, उन्हें ध्यान रखना होगा कि वे जिनके मोहरे हैं, वे उनके खिलाफ नहीं जा सकते, बल्कि उनकी अनदेखी भी नहीं कर सकते। परना जिस व्यवस्था के वे नुमाइंदगी कर रहे हैं, वह उन्हें झटकने में एक पल की भी देरी नहीं करेगी।

इसीलिए वे अमीरदास आयोग को भंग करते हैं, बद्योपाध्याय कमिटी की सिफारिशों को खारिज करते हैं, सवर्ण आयोग बनाते हैं, बथानी टोला या लक्ष्मणपुर बाथे जनसंहार पर पटना हाईकोर्ट के शर्मनाक फैसले पर चुप रहते है और रणवीर सेना का सरगना ब्रह्मेश्वर सिंह के गुंडो को पटना में आग लगाने की पूरी आजादी देते हैं।

2002 में नरेंद्र मोदी ने भी गुजरात में यही किया था। हिंदुओं को अपना गुस्सा निकालने की पूरी आजादी दी गई और अब वहां सब कुछ सहज दिखता है। विकास के जिस परदे से नरेंद्र मोदी के अपराधों को ढका जा रहा है वही परदा नीतीश कुमार ने अपने आगे टांग रखा है।

(यह लेख कुछ समय पहले लिखा गया था। अपने आलसीपने का क्या जवाब हो सकता है?)

Wednesday, 15 May 2013

एक थी डायनः बर्बरता की संस्कृति की आपराधिक दुकानदारी...


स्पष्टीकरणः "आप फिल्म को फिल्म की तरह देखते हैं। आप समाज को भी फिल्म की तरह देखते हैं। ...मैं फिल्म को समाज की तरह देखता हूं... और समाज को राजनीति की तरह देखता हूं।"





अंधविश्वास के अंधकार में...



त्रासद अंधेरे की आग...

दो साल पहले गांव गया था तो एक दिन पड़ोस में रहने वाली एक तकरीबन सत्तर-बहत्तर साल की वृद्ध महिला घबराई हुई मेरे घर में घुसी और कमरे में रखी चौकी के नीचे बिल्कुल कोने में दुबक गई। इससे पहले उसने मेरे सामने हाथ जोड़ कर गिड़गिड़ाते हुए कहा था कि "बउआ रे बउआ, हम कुछो न कलियइ ह...!" (मैंने कुछ नहीं किया है। मुझे बचा लो।)

मैं कुछ समझ पाता, इससे पहले उस वृद्ध महिला के घर के सामने गली से जोर-जोर से गाली-गलौच की आवाज आने लगी। निकला तो देखा कि लाठियों से लैस दर्जनों लोग मां-बहन की वीभत्स गालियां बकते हुए वृद्धा को घर से निकालने की मांग कर रहे थे। उन सबका कहना था कि वे उस महिला का सिर मूंडेंगे, उसे पाखाना पिलाएंगे, तभी आगे की बात होगी।

वहीं जमी भीड़ में से एक व्यक्ति से मैंने पूछा कि क्या हुआ है तो उसने बताया कि चौक पर वीरेंद्र शर्मा की मिठाई की दुकान है। वहीं चूल्हे पर बड़ी-सी कढाई चढ़ी थी जिसमें तेल था। "भगवानपुर वाली" (वृद्ध महिला) ने हलवाई से कहा कि आज क्या बना रहे हो, कढ़ाई में तेल ज्यादा है। यह कह कर वह वहां से चली गई। इसके बाद कढ़ाई में फटाक-फटाक की आवाज के साथ तेल चारों तरफ उड़ने लगा। दो लोगों के हाथ और गाल पर पड़ गया, जिससे फफोले निकल आए। उसने यह भी बताया कि भगवानपुर वाली "डायन" है और वही कुछ जादू-टोना करके चली आई थी।

लोग बहुत ज्यादा तैश में थे। मैंने उन्हें शांत करने की कोशिश की, लेकिन उनमें से कुछ ने मुझे धमकाना शुरू किया। हार कर मैंने कहा कि ठीक है, मैं पुलिस को फोन करता हूं। इसके बाद अचानक लोग छंटने लगे। तब मैंने जोर से चिल्ला कर धमकी दी कि अगर इस बुजुर्ग महिला को कोई भी नुकसान हुआ तो सबको जेल भिजवा दूंगा। थोड़ी देर में सभी वहां से चले गए। उनमें से कुछ लोग मुझे गालियां भी दे रहे थे।

कितने त्रासद अंधेरे में मरने-सड़ने के लिए छोड़ दिया दिया गया है उन लोगों को जो इतना भी समझ सकने लायक नहीं हैं कि पानी से भीगे ठंडे बर्तन में तेल डाल कर चूल्हे पर चढ़ा देने और बर्तन के गर्म होने पर फटाक-फटाक की आवाज के साथ पानी उड़ेगा ही। उनकी बेअक्ली की सजा एक कमजोर बुजुर्ग महिला को भुगतनी पड़ेगी, जिसे "डायन" मान लिया गया है।

महज संयोग से उस दिन मेरी वजह से भगवानपुर वाली बच गई। लेकिन ऐसी खबरें आम हैं, जिसमें किसी महिला को डायन कह कर सार्वजनिक रूप से निर्वस्त्र कर समूचे गांव में घुमाया गया, जबर्दस्ती पाखाना खिलाया गया, या फिर उसकी हत्या कर दी गई।

मैं अपने में घर लौटा। वह वृद्ध महिला मेरे गले लग कर जोर से रो पड़ी और बार-बार यह कहने लगी कि "बउआ रे बहुआ..., हम कुछो न कलियइ ह...!" वह थर-थर कांप रही थी और मेरी आंखों से आंसू निकल पड़े। गुस्सा इतना ज्यादा था कि लग रहा था कि "डायन" का खयाल पैदा करने या उसे बनाए रखने के जिम्मेदार लोग मिल जाएं तो उन्हें जिंदा जला दूं।

हां, उन धर्माधीशों, पंडों, गुरुओं, महंथों, ओझाओं और तांत्रिकों को, जिन्होंने दिमागी अंधापन फैला कर मर्दवाद और ब्राह्मणवाद की अपनी दुकानदारी बनाए रखने के लिए एक मोहरा "डायन" को भी बनाया था। सदियों पहले अपने जो एजेंट उन्होंने समाज में छोड़े थे, वे आज भी बड़ी शिद्दत से उनके उस अपराध और कुकर्म की परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। कोई यह दलील न दे कि "डायन" की धारणा एशिया-अफ्रीका से लेकर यूरोप तक के समाजों में भी पाई जाती है, फिर इसके लिए ब्राह्मणवाद पर सवाल क्यों? सभी समाजों के अपने-अपने ब्राह्मणवाद हैं और अपने मूल व्यवहार में वे वही हैं। बस सबकी शक्ल थोड़ी अलग-अलग होती है। जहां भी पारलौकिक हवाई घोड़े, भगवान या धर्म की व्यवस्था के जरिए समाज के मुट्ठी भर लोगों के शासन, मजे और ऐय्याशी के इंतजाम होंगे, वहां शासितों को काबू में रखने के लिए "डायन" जैसे तमाम अंधविश्वासों के इंतजाम भी होंगे।

अंधविश्वासों के जहरीले दलाल...

बहरहाल, उसी छल आधारित व्यवस्था के बहुत सारे नए और आधुनिक दल्लों में विशाल भारद्वाज और एकता कपूर भी हैं, जिन बेईमान पाखंडियों (संदर्भः विशाल भारद्वाज की "मकड़ी") को "एक थी डायन" फिल्म की दुकानदारी से पहले शायद एक बार भी यह खयाल नहीं आया होगा कि यह एक शब्द "डायन" किसके लिए और कितनी बड़ी त्रासदी रहा है।

हालांकि जब आप किसी को दुकानदार कहते हैं तो यह मान लेना पड़ता है कि मुनाफा कमाना उसका "धर्म" है। लेकिन क्या किसी दुकान से कोई सामान खरीदते हुए कोई व्यक्ति मुफ्त में अपने खाने के लिए जहर भी लेता है? अगर उसे पता हो तो वह कतई ऐसा नहीं करेगा।

तो "एक थी डायन" के जरिए विशाल भारद्वाज और एकता कपूर ने इसके अलावा और क्या किया है कि मनोरंजन के बहाने अंधविश्वासों के जहर के असर को थोड़ा और गहरा किया है। पहले से ही गैरजानकारी या अज्ञानता के अंधेरे में डूबते-उतराते दर्शक वर्ग की चेतना को थोड़ा और कुंद किया, जो आखिरकार यथास्थितिवाद को बनाए रखने का सबसे बड़ा हथियार है।

कोई यह दलील दे सकता है कि एकता कपूर या विशाल भारद्वाज ने कोई पहली बार इस तरह की फिल्म नहीं बनाई है। हो सकता है, यह सही हो। इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक में जब दुनिया के वैज्ञानिक ब्रह्मांड की गुत्थियों को खोलने के करीब पहुंच चुके हैं, बॉलीवुड ही नहीं, हॉलीवुड में भी धड़ल्ले से भूत-प्रेत या शैतान की कहानियों पर फिल्में बनाई जा रही हैं। मगर रामसे बंधुओं से लेकर आज तक की तमाम हॉरर फिल्मों का हवाला होने के बावजूद विशाल भारद्वाज और एकता कपूर की "एक थी डायन" भारतीय संदर्भों में ज्यादा आपराधिक है, बनिस्बत इसके कि वह कुछ "मनोरंजन" करती है। किसी शातिर चोट्टे ने "काला जादू और डायन" नाम की किताब लिखी और उसके सहारे चलते हुए किस्से में इन दोनों फिल्मकारों ने उन तमाम खामखयालियों की दुकानदारी की, जो "डायन" को लेकर एक अक्ल से हीन समाज में पाई जाती है। "डायन बारह बजे रात से अपनी तंत्र-साधना शुरू करती है; डायन के पांव उल्टे होते हैं; डायन अपने सबसे प्रिय बच्चे की बलि लेकर या उसे "खाकर" ही जिंदा रहती है...!!!" ये सारी बातें गांव से लेकर शहर-महानगर तक अनपढ़ या फिर पढ़े-लिखे चेतनाविहीन अक्ल के दुश्मनों की कल्पना में हर वक्त रहती हैं।




हाईटेक काहिली-जाहिली...

गांव में भगवानपुर वाली को "डायन" कह कर मारपीट पर उतारू वे लोग अनपढ़ और जाहिल थे। मगर इस मामले में शहरों-महानगरों के पढ़े-लिखों की क्या औकात है? कुछ साल पहले दुनिया के एक हाईटेक घोषित शहर गाजियाबाद की एक घटना चर्चा में आई थी। "ऊपरी असर" से परेशान तीन बेटों ने एक तांत्रिक का सहारा लिया, तांत्रिक ने "गहनतम" तंत्र-मंत्र साधना के बाद बेटों की अत्यंत वृद्धा मां को "डायन" घोषित किया और उसकी सलाह से बेटों ने मिल कर अपनी बेहद वृद्ध हो चुकी मां को चप्पलों से तब तक पीटा, जब तक उसकी मौत नहीं हो गई। बर्बरता और मूर्खता का सिर्फ अंदाजा लगाया जा सकता है। इन तीन बेटों में से एक डॉक्टर और एक इंजीनियर था। यानी विज्ञान की पढ़ाई-लिखाई भी उनकी अक्ल पर पड़े परदों को हटा नहीं सकी।

लेकिन इससे एकता कपूर या विशाल भारद्वाज को क्या फर्क पड़ता है। बल्कि यों कहें कि जिस त्रासदी के कायम रहने से ही एकता कपूरों और विशाल भारद्वाजों की दुकानदारी चमकती है, बल्कि इससे उनके सामाजिक सत्ताधारी वर्ग की सत्ता की कुर्सी के पाए और मजबूत होते हैं, उससे उन्हें क्या फर्क पड़ेगा। अब तो लगता है कि "एक थी डायन" जैसी तमाम फिल्में बनाने वाली एकता कपूरों और विशाल भारद्वाजों का मुख्य मकसद जितना इन फिल्मों से पैसा कमाना होता है, उससे ज्यादा ये उन साजिशों को अमल में लाने का जरिया होते हैं, जिनसे इस समूचे समाज को काहिली-जाहिली के अंधेरे में डुबोए रखा जा सके। "मकड़ी" के जरिए "चुड़ैल" की कल्पना के झूठ को सामने रखने वाले "विशाल" पर पता नहीं क्यों उनका "भारद्वाज" चढ़ बैठा और वे "एक थी डायन" के झूठ को बतौर सच पेश करने में लग गए जो एक मर्दवादी और ब्राह्मणवादी सत्ता और उसके प्रभाव को स्थापित करने और विस्तार देने के लिए रचा गया था।

लाचार मायावी-रूहानी ताकतें...

इस फिल्म में पहली "डायन" का नाम "डायना" रखने से लेकर बच्चे की बलि, चोटी में जान जैसे वे सभी तुक्के आजमाए गए और "डायन" के कुछ "करिश्मे" भी दिखाए गए जो एक पिछड़ी हुई चेतना के आम अंधविश्वासी के भीतर पाई जाती है। दिक्कत यह है कि जब इस तरह के खिलवाड़ को "आधुनिक" ट्रीटमेंट दिया जाता है, तो वह चुपके-से अपनी वास्तविक क्षमता के मुकाबले हजार गुणा ज्यादा घातक असर करता है। "एक थी डायन" में महानगर में रहने वाले एक उच्चवर्गीय परिवार में अपनी "मादकता" के सहारे घुसने वाली वह "डायन" पता नहीं उससे पहले मुंबई के ताज होटल में रहती थी या अमेरिका के ह्वाइट हाउस में...! इससे पहले उसे फिल्म के बच्चा बोबो जैसा "हीरो" मिला था या नहीं, जो चुटिया काट कर उसे खाक कर देता है। वही चुटिया, जिससे वह आखिर में चमत्कारी फंदे का काम लेती है! लेकिन वह चमत्कारी फंदा और तमाम चमत्कारी रूहानी शक्तियां उसकी जान बचाने के काम कहां आती हैं? उसकी तो चुटिया बस एक बच्चा बोबो के हाथों साधारण से चाकू से काट दी जानी है, उस खौफनाक और सबको हवा में नचा-नचा कर मारने वाली "डायन" की सभी रूहानी ताकतों को लाचार मुंह ताकते रह जाना है। ठीक उसी तरह, जैसे शहर से गांव तक में किसी लाचार और निचली कही जाने वाली जाति की महिला को "डायन" कह कर बाल मुंड़ दिए जाते हैं, दांत तोड़ दिए जाते हैं, पाखाना घोल कर पिला दिया जाता है, निर्वस्त्र करके पीटते हुए समूचे गांव या बस्ती में घुमाया जाता है या कभी जिंदा जला दिया जाता है, लेकिन "डायन" की "शैतानी" और "मायावी" शक्तियां उसकी कोई मदद नहीं करतीं!

विज्ञान के दुश्मन...

सवाल है कि इस महान सांस्कृतिक अनुष्ठान को अंजाम देने या इसके प्रति श्रद्धाभाव से भरे अक्ल के हीन लोगों के माइंडसेट में परदे पर आधुनिक स्वरूपा "डायन" और उसकी वही पुरानी "करस्माएं" और कैसा जहर घोलेंगी? यह साधारण-सा सच है कि पोंगापंथी, दिमाग से बंद, कूपमंडूक अंधविश्वासी पुजेड़ी जब यह देखता है कि भारत के अंतरिक्ष प्रक्षेपण अनुसंधान संगठन यानी इसरो का मुखिया विज्ञान पर केंद्रित किसी कार्यक्रम में शिरकत करते हुए या किसी उच्च क्षमता के अंतरिक्ष यान के प्रक्षेपण से पहले घंटों किसी मंदिर में घंटा डोलाता है तो उसे कैसा लगेगा? एक औसत दिमाग का आदमी भी यह समझ सकता है कि इस तरह के उदाहरण एक अंधविश्वासी मन की कुंठाओं, हीनताओं और विकृतियों को "जस्टीफिकेशन" देते हैं। बल्कि मेरा दावा है कि इससे किसी भी पोंगापंथी व्यक्ति के भीतर मौजूद अंधविश्वासी पगलापन एक सबसे मजबूत खुराक पाएगा और वह किसी को भी अंगुली दिखा कर कह सकता है कि जब माधवन नायर या राधाकृष्णन जैसे इसरो अध्यक्ष और विज्ञान के पहरुए मंदिर में घंटा हिला कर अंतरिक्ष यानों का कामयाब प्रक्षेपण सुनिश्चित करते हैं तो हम तो सिर्फ "भगवान" की एक "सामान्य व्यवस्था" को ही निबाहते हैं, "डायन" को निर्वस्त्र करके घुमाते हैं, मैला पिलाते हैं या उसे उसकी "हैसियत" दिखाते हैं!


"एक थी डायन" जैसी फिल्में उसी इसरो अध्यक्षों जैसी भूमिका बनाते हैं, जिनमें विज्ञान और आधुनिक तकनीकी के जरिए उन तमाम खयाली घोड़ों और हवा-हवाई बातों को मूर्त देकर परदे पर पेश किया जाता है और पहले से ही चारों तरफ से अंधे विश्वासों में मरता-जीता उसका एक आम दर्शक "डायन" के झूठ को थोड़ा और साकार रूप देने लगता है। इसकी वजह भी वही "जस्टीफिकेशन" है जो विज्ञान और तकनीकी के जरिए उसके सामने साकार की गई, लेकिन जिसका कोई भी आधार नहीं है। और "डायन" अब तक सिर्फ उसकी धारणा थी। (आखिर एक अंधविश्वासी व्यक्ति भी विज्ञान की ताकत को तो समझता ही है।) उन धारणाओं में जो भी बातें शामिल थीं, एकता कपूर और विशाल भारद्वाज ने उन सबका शोषण किया और परदे पर बेचा। ऐसे व्यापारियों को इस बात से कोई मतलब नहीं होता कि "डायन" की समूची कल्पना किस कदर आज भी महिलाओं और खासतौर पर दलित-जनजातीय या निचली जाति की कितनी महिलाओं के लिए त्रासदी की वजह बन चुकी है, या बन रही है। सामाजिक सत्ताधारी वर्गों के मूल से उपजे इन व्यापारियों को इस बात की फिक्र आखिर हो भी क्यों? जो समस्या अपने या अपने वर्गों के सामने होती है, फिक्र उसी की की जाती है!

इस फिल्म की साजिश सबसे ज्यादा खुल कर तब सामने आती है जब इसमें एक पात्र के रूप में मौजूद मनोवैज्ञानिक या मनोचिकित्सक को पहले "डायन" को खारिज करते और फिर उसी "डायन" की मायावी ताकत के जरिए बुरी तरह मारे जाते दिखाया जाता है। यानी अंधविश्वासों के खिलाफ लड़ाई के लिए जो सबसे मजबूत तर्क मनोविज्ञान मुहैया कराता है, उसे हारता हुआ, अंधविश्वासों के सामने, उसके हाथों मुंह की खाता हुआ दिखाया जाए। कल्पना करिए कि एक औसत दिमाग और अपने घोर अंधविश्वासों-पूर्वाग्रहों के साथ सिनेमा हॉल में बैठा दर्शक किसी भी इस तरह की कहानी के इस पहलू से किस तरह प्रभावित होगा। यानी, लोग अंधविश्वासों के अंधेरे में डूबते-उतराते रहें, समाज की यथास्थिति बनी रहे, इसके लिए एकता कपूर या विशाल भारद्वाज जैसे धनपशुओं ने एक जड़ व्यवस्था के संचालकों-कर्णधारों की दलाली में निर्लज्जता की सारी सीमाएं तोड़ दीं।

"डायन" वही क्यों...

दरअसल, "एक थी डायन" में एकता कपूर और विशाल भारद्वाज का पूरा "लोकेशन" बिल्कुल साफ है। उनकी फिल्म का पुरुष जादूगर है, जो सिर्फ सबका मनोरंजन करता है, किसी को नुकसान नहीं पहुंचाता। दूसरी ओर, फिल्म में मुख्य रूप से तीन स्त्री पात्र हैं जिनमें दो साफ तौर पर "डायन" हैं, तीसरी "लगभग" "डायन" के रूप में दर्शकों के लिए खुला अंत छोड़ जाती है। फिल्म में "डायन" का स्वरूप वही है, जो गांव-शहर के अंधविश्वासी लोगों के दिमाग में पाया जाता है। यानी वह सिर्फ नुकसान पहुंचा सकती है। यानी जादूगर के रूप में पुरुष मनोरंजन करता है, तांत्रिक के रूप में वह ("डायन" के) "ऊपरी" हमलों से बचाता है। दिलचस्प है, जादू-टोना करने वाली स्त्री बच्चों को "खा" जाने वाली "डायन" हो जाती है और जादू-टोना अगर पुरुष करेगा तो वह तांत्रिक होगा। और तांत्रिक होना बचाने वाले की भूमिका है।



पितृसत्ता, पुरुषवाद और ब्राह्मणवाद के खेल बड़े निराले हैं। इस खेल में यह कोई नहीं पूछता िक इस साजिश का शिकार हमेशा और सौ फीसद स्त्री ही क्यों होती है? और किसी अजूबे अपवाद को दलील के तौर पर पेश न किया जाए तो "डायन" स्त्री हर बार दलित या निचली कही जाने वाली जाति की ही क्यों होती है?

तो...! एक व्यापक की त्रासदी को खत्म या कम करने की औकात विशाल भारद्वाज या एकता कपूर के पास नहीं है, तो उस दुख को मनोरंजन बना कर बेचना और इस तरह "डायन" की झूठी अवधारणा को आधुनिक तकनीकी के जरिए मूर्त बना कर पेश करने का उन्हें क्या हक है? क्या उन्हें यह मामूली बात समझ में नहीं आती कि समाज का माइंडसेट या मानस तैयार करने या उसे बनाए रखने में आज का सिनेमा कितनी अहम भूमिका में आ चुका है? अगर वे सब कुछ जानते-समझते हैं तो क्या वे ऐसा जान-बूझ कर रहे हैं?

व्यवस्था के शातिर और छिपे हुए अपराधियों ने कभी आम जन की मजबूरी और उनके अज्ञान का फायदा उठा कर "डायन" की कल्पना को सामाजिक धारणा के रूप में स्थापित किया होगा। तब किसी अकेली या संपत्ति की वारिस स्त्री पर अत्याचार ढाने या उसे लूट लेने के लिए उस काल्पनिक सामाजिक धारणा में कहानियां गूंथी गई होंगी और फिर जनमानस में उसका प्रचार किया गया होगा। आज के दौर में "एक थी डायन" जैसी तमाम व्यवस्थावादी फिल्में समाज में यही भूमिका निभा रही हैं।

राजनीति का परदा...

अब यह किसी से छिपा नहीं है कि पिछले कुछ सालों में समाज में सोचने या विश्लेषण करने की प्रक्रिया को बाधित करने,  अंधविश्वास फैलाने, स्त्री की स्थिति को हीनतर बनाने, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण या आम लोगों के सांप्रदायीकरण के एजेंडे पर फिल्में बन रही हैं। और अगर इसमें कोई दक्षिणपंथी कट्टर धार्मिक समूह बड़े पैमाने पर पैसा लगा रहा हो तो हैरान होने की बात नहीं होगी। अंधविश्वासों को विस्तार देना या धार्मिक-सामाजिक और लैंगिक पूर्वाग्रहों-विद्रूपों को मजबूत करना यथास्थितिवाद की नियामक ताकतों की असली राजनीति है। और चूंकि एक सबसे ज्यादा असर डालने वाले "मनोरंजन" कला माध्यम के रूप में सिनेमा की आम जनता के बीच व्यापक पहुंच है, इसलिए अथाह पैसा लगा कर इसे नियंत्रित और अपने मुताबिक संचालित करने की कोशिशों की रफ्तार बहुत तेज है। शीतयुद्ध के दौरान और आज भी खासतौर पर अमेरिका ने दुनिया के मानस तैयार करने के लिए फिल्मों का कैसा इस्तेमाल किया है, यह किसी से छिपा नहीं है।

मुश्किल यह है कि अगर कोई व्यक्ति सिनेमा के सामाजिक पहलू या सिनेमा के सामाजिक असर की बात करता है तो व्यवस्थावादियों की ओर से एक झटके में उसे शुद्धतावादी घोषित कर दिया जाता है। दलील दी जाती है कि सिनेमा बदलते सामाजिक ढांचे और भावनाओं को दर्शाता है, और समाज में बदलाव से ही सिनेमा में बदलाव आते हैं। फिलहाल सिर्फ "एक थी डायन" का ही संदर्भ लें तो क्या सच केवल यह है कि समूचा समाज आज भी "डायन" की गिरफ्त में है और उसी की गिरफ्त में रहना चाहता है? क्या "डायन" प्रथा के खिलाफ कहीं भी कोई स्वर नहीं है? क्या अंधविश्वासों के बरक्स विज्ञान और तर्क इस समाज में बिल्कुल अनुपस्थित है? सिनेमा में समाज का यथार्थ परोसने के नाम परोसा गया विभ्रम ऐसे ही विद्रूप रचता है।

दरअसल, सिनेमा के समाज के हिसाब से चलने की बात इतनी चालाक दलील है कि इसके सहारे वे एक जड़ व्यवस्था को बनाए रखने में एक कला-माध्यम के इस्तेमाल करने के अपने तमाम कुकर्मों को ढकना चाहते हैं। क्या किसी समाज का अध्ययन और उसके निष्कर्ष उसे टुकड़ों में बांट कर देखने से सही-सही सामने आएगा? सेलेक्टिव तरीके से एक व्यापक जनसमुदाय के बीच जड़ता को बनाए रखने के इन अपराधियों की इस बेहद उथली साजिश को समझना इतना मुश्किल नहीं है, बस इनकी बोलियों के हर्स्व और दीर्घ मात्राओं पर ध्यान रखिए...!

मधुमाला देवी की अदालत में...

थोड़े समय पहले बिहार से एक खबर आई कि मधेपुरा जिले के एक गांव मिठाही की मुखिया ने यह घोषणा की कि समूचे पंचायत क्षेत्र में अगर किसी ने किसी महिला को "डायन" कहा तो उसे इक्कीस सौ रुपए जुर्माना देना होगा। गांव में रहने वाली, कम पढ़ी-लिखी, कम आधुनिक और कम पैसे वाली मधुमाला देवी संघर्ष के बाद पंचायत की मुखिया के एक छोटे-से पद पर किसी तरह पहुंचते ही इतना बड़ा क्रांतिकारी फैसला लेती है। लेकिन बहुत पढ़ी-लिखी, बेहद धनाढ्य, "अति आधुनिक" एकता कपूर और बौद्धिक परदाधारी विशाल भारद्वाज अक्ल से पैदल या शातिर पंडों-तांत्रिकों की साजिश के नतीजे में उपजी "डायन" के सिर पर एक हथौड़ा और मारते हैं। पद और हैसियत का इस्तेमाल मधुमाला देवी ने भी किया है और एकता कपूर और विशाल भारद्वाज ने भी। मगर मधुमाला देवी के बरक्स एकता कपूर और विशाल भारद्वाज को कैसे देखा जाए? क्या एकता कपूर और विशाल भारद्वाज को मधुमाला देवी की पंचायत-अदालत में खड़ा करके इक्कीस सौ रुपए जुर्माने के अलावा और सख्त सजा देने की जरूरत नहीं है? अगर "एक थी डायन" जैसी फिल्मों के जरिए समाज की मूर्खता और हजारों स्त्रियों की त्रासदी की दुकानदारी करने वाली एकता कपूरों और विशाल भारद्वाजों को जेल में बंद करने के लिए कोई कानून नहीं है तो भारत सरकार से मैं मांग करता हूं कि वह इस मसले पर सख्त से सख्त कानून बनाए और ऐसे तमाम एकता कपूरों और विशाल भारद्वाजों को गिरफ्तार करके जेल में सड़ने के लिए छोड़ दे, क्योंकि "एक थी डायन" के जरिए इन लोगों ने वैसे ठगों, बाबाओं और तांत्रिकों से अलग कोई काम नहीं किया है जो समाज को दिमागी तौर पर अंधा और चेतना से हीन बनाए रखने के अपराधी हैं...!

Saturday, 12 May 2012

भंवरी... स्त्री है, दलित है, इसलिए ब्लैकमेलर है, खलनायिका है...



जनतंत्र का जामा ओढ़े इस आजाद कहे जाने वाले देश के कुछ "पंच परमेश्वरों" ने करीब सत्रह साल पहले एक भंवरी का जो हश्र किया था, वह शायद तमाम भंवरियों की उस "नियति" का बयान था, जो मनुओं ने बड़े जतन से तय किया और आज भी उसे सहेज कर रखा है। सामूहिक बलात्कार की पीड़ा के साथ मर-जी रही एक स्त्री को "झूठी" घोषित करते हुए मनु-भक्तों ने जब कहा होगा कि "ऊंची जाति के लोग किसी नीच जाति वाले को छू नहीं सकते तो भंवरी का बलात्कार कैसे कर सकते हैं" तो क्या ठीक वही वक्त नहीं रहा होगा, जब उन "पंच-परमेश्वरों" के मुंह पर थूक दिया जाना चाहिए था? क्या भंवरी का कसूर यह था कि एक साथिन के तौर पर वह समाज को जागरूक करने के मकसद से घर की दहलीज के बाहर निकल पड़ी थी, और इससे भी ज्यादा वह देश के कानूनों के साथ बाल-विवाह की मुखालफत कर रही थी? इंसानियत, किसी सभ्य समाज के तकाजे और देश के कानून की किताब चाहे जो कहें, यह न केवल समाज के ठेकेदारों के नंगा नाचने के लिए काफी था, बल्कि न्याय की मूर्ति कहे जाने वालों ने भी भारत के संविधान और कानून की जगह अपने सड़े हुए दिमाग में अपने पता नहीं किसकी "स्मृति" घुसेड़ रखी थी।

और आज जब फिर एक मार डाली गई भंवरी को दूसरे पैमानों से उसी स्मृति की कसौटी पर पेश किया जा रहा है, तो लगता है कि भंवरी की सामाजिक हैसियत में मरने-जीने वाले तमाम तबकों के पास इस समूची व्यवस्था को खारिज करने के सिवाय कोई दूसरा विकल्प नहीं है। लगभग दो दशक पहले सामंतों की शिकार भंवरी बाई पर झूठी होने का आरोप लगाने वाले मनुपुत्रों को न तब शर्म आई थी, न आज के समाज के "आधुनिक" कहे जाने वाले व्यवस्था के झंडाबरदारों को यह कहते हुए शर्म आती है कि भंवरी देवी ब्लैकमेलर थी, भंवरी देवी अपनी महत्त्वाकांक्षाओं की शिकार हुई।

हां, वह महत्त्वाकांक्षी थी...

हां, भंवरी देवी महत्त्वाकांक्षी थी, क्योंकि जिस खानाबदोश नट जाति में वह पैदा हुई थी, उसकी पुश्तैनी संस्कृति को निबाहने के बजाय उसने स्कूल जाना पसंद किया था; क्योंकि जिस राजस्थान में अनुसूचित जातियों के बीच साक्षरता कुल आठ फीसद है और खासतौर पर नट जाति में सिर्फ नाम के लिए, और उनमें भी अठासी फीसद बच्चे बीच में ही स्कूल छोड़ देते हैं, भंवरी देवी ने पहले हाई स्कूल की परीक्षा पास की, फिर एएनएम के लिए मानक जांच परीक्षा में अपनी योग्यता साबित की; क्योंकि जोधपुर की कुल 617 में से अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की महज 47 एएनएम में दर-दर भटकने के लिए जानी जाने वाली नट जाति की भंवरी शायद अकेली थी; और क्योंकि उसने अपनी तनख्वाह का इस्तेमाल अपने बच्चों को स्कूल भेजने में करना ज्यादा जरूरी समझा था। इसके अलावा, इस तथाकथित समाज के हाशिये के बाहर जीने वाली नट समुदाय में पैदा होने के बावजूद उसने गीत-संगीत के क्षेत्र में दखल दिया; उसमें सृजन का जज्बा था और उसने अपनी रचनात्मकता साबित की थी; उसने संगीत के कई अल्बम में काम किया था।

और अपनी इन्हीं "महत्त्वाकांक्षाओं" को जिंदा रखने के लिए वह अपने इलाके के विधायक मलखान सिंह से मिली थी। वजह सिर्फ यह थी कि बतौर एएनएम उसका तबादला उसके घर से बहुत दूर कर दिया गया था और वह उसे रुकवाना चाहती थी। इस तरह या दूसरी जरूरतों के लिए लोगों का अपने क्षेत्र के जन-प्रतिनिधियों से अनुरोध करना एक आम रिवायत है। लेकिन वह कौन-सी सामाजिक-राजनीतिक नैतिकता या कानूनी नियम-कायदे किसी जन-प्रतिनिधि को यह छूट देती है कि वह फरियादी महिला के लिए सिफारिश करने के बदले उसे "यौन-सहयोग" के लिए मजबूर करे?

कुछ समय पहले बिहार में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद लगभग पैंतीस हजार प्रशिक्षित शिक्षकों को बहाली दी गई। इस बहाली में बड़ी तादाद में वैसी महिलाएं हैं जिन्हें अपने आवास तो दूर, बल्कि अपने गृह-जिले से भी दो या ढाई सौ किलोमीटर दूर के स्कूल में पदस्थापित किया गया। अव्वल तो महिलाओं को इतनी दूर नियुक्ति देने का फैसला कितना सही है, दूसरे ऐसी कितनी महिलाएं होंगी, जिन्हें इस तरह के पदस्थापन से शिकायत नहीं होगी। क्या हमने अपने समाज और परिवेश को ऐसा सहज और सुरक्षित स्वरूप दे दिया है कि ऐसी स्थिति में किसी महिला के दिमाग में "इतनी दूर" जाने को लेकर कोई परेशानी नहीं पैदा हो? और तीसरे कि ऐसे फैसलों के पीछे शोषण और घूसखोरी की कौन-सी पटकथा तैयार की जाती है, क्या यह किसी से छिपा है?

तो भंवरी देवी भी अपने घर से दूर कर दिए गए तबादले को रुकवाने के लिए महज प्रार्थना करने गई थी और मलखान सिंह एक सत्ता केंद्र था जो भंवरी का यह काम करा दे सकता था। क्या यह संभव नहीं है कि अपने काम के लिए बार-बार दौड़ती भंवरी थक कर मलखान के जाल फंस गई हो? अगर नहीं तो मलखान सिंह ने भंवरी को मदेरणा से किस मकसद से मिलवाया? मंत्रियों और विधायकों के लिए ऐसा कौन-सा विशेष नियम है जो उन्हें "एक वयस्क की सहमति" के नाम पर महिलाओं का यौन-शोषण करने की आजादी देता है? क्या अब इस बात की भी जांच किए जाने की जरूरत है कि तथाकथित जन-प्रतिनिधियों की काल-कोठरी में कितनी भंवरी देवियां दफन हो गई होंगी?

सहमति का जाल...

इतना तय है कि "तकनीकी तौर पर" दो वयस्कों के बीच "आपसी सहमति" पर आधारित संबंधों का मामला होने की वजह से भंवरी के साथ जो हुआ, व्यवस्था उसे बलात्कार नहीं कहेगी। लेकिन यहां अजीब कानून है जहां शादी का झांसा देकर हासिल की गई यौन-संबंधों की सहमति को बलात्कार माना जा सकता है, लेकिन अगर कोई अपने पद या हैसियत का इस्तेमाल कर किसी महिला को अपने जाल में फंसाता है और उसे "सहमतिजन्य संबंध" का नाम देता है तो वह कहीं से भी बलात्कारी नहीं है!

अस्सी के दशक में बलात्कार कानूनों में सुधार के मसले पर हुई बहस में यह सवाल उठा था कि अगर कोई पुरुष अपने ऊंचे पद या हैसियत का दुरुपयोग कर अपनी किसी महिला कर्मचारी पर यौन-संबंध बनाता है तो उसे भी बलात्कार माना जाए। लेकिन आज जब राजनीतिक हलकों से लेकर नौकरी या कार्यस्थलों पर महिलाओं के यौन-शोषण के लिए "सहमतिजन्य संबंध" के दलील की आड़ में ऐसे मामले आम होते जा रहे हैं तो समझा जा सकता है कि तब वह प्रस्ताव खारिज करने के पीछे व्यवस्थावादियों की क्या मंशा रही होगी।

समरथ को नहि दोष गुसाईं...

इस लिहाज से देखें तो भंवरी देवी के साथ जो हुआ, वह भारतीय राजनीति में घुसी पुरुष नीचताओं और आपराधिक जालसाजियों का एक प्रतिनिधि मामला है। इसमें सत्ता और शक्ति के इस्तेमाल से दबाव बना कर सेक्स हासिल करना है, हत्यारों के गिरोह के साथ चुने गए जनप्रतिधियों और सरकार के ऊंचे ओहदे पर बैठे मंत्रियों का गठजोड़ है, ताकतवर जातियों द्वारा एक कमजोर जाति की महिला का शोषण है, और यह सब करते हुए भी तथाकथित जनप्रतिनिधियों का जनता के बीच इतना लोकप्रिय बने रहना है। ध्यान रखने की बात है कि महिपाल सिंह मदेरणा और मलखान सिंह को सही ठहराते हुए न सिर्फ इनके परिवार वाले, बल्कि बड़ी तादाद में इनके समाज के लोगों ने भी जुलूस निकाल कर मदेरणा और मलखान का पक्ष लिया।

1995 जब इस देश के न्याय के मंदिर कहे जाने वाली एक अदालत ने जब भंवरी बाई के बलात्कारियों को रिहा किया था तो एक तत्कालीन भाजपा विधायक ने जयपुर में विजय जुलूस निकाला था और भाजपा की ही महिला संगठन ने भी उस रैली में हिस्सा लिया और भंवरी बाई को "झूठी" बताया। इस बार जब कानून ने भंवरी के हत्यारों को यों ही बख्श देने की इजाजत नहीं दी तो मदेरणा और मलखान को गिरफ्तार किया गया। इसके बाद मदेरणा और मलखान के समाज के लोगों ने जिस तरह हजारों की तादाद में अपने "पवित्र" नेताओं के समर्थन में जुलूस निकाल कर उन्हें निर्दोष घोषित करने की मांग की, उससे इस देश की त्रासदी का अंदाजा लगाया जा सकता है।

ब्लैकमेलर भंवरी की अकूत जायदाद...

जब भंवरी और मदेरणा की सीडी का किस्सा सामने आया तो न सिर्फ भंवरी की हत्या के आरोपियों और उसके परिवार-समाज के लोगों, बल्कि सीबीआई तक ने भंवरी को "ब्लैकमेलर" कहा। सीबीआई के निदेशक ने इस मामले में हॉलीवुड की एक फिल्म "सेक्स लाइज एंड वीडियोटेप" का उदाहरण पेश किया और इसी आधार पर मीडिया और उसे "देव-वचन" मानने वालों ने इसे "ब्लैकमेल, राजनीतिक, सेक्स और सीडी" का सबूत मान लिया। कहा गया कि सेक्स सीडी खुद भंवरी ने बनवाई और उसे सार्वजनिक करने की धमकी देकर उसने इसमें शामिल लोगों से अकूत धन वसूला।

यानी राजनेताओं के पद, हैसियत, शक्ति और इसके बूते अपने ऐय्याशी के लिए जाल में फांस कर और उसके भरपूर शोषण करने के बाद मार डालने वाले तो "बेचारे", "मासूम" और "नायक" ही रहे, लेकिन जब भंवरी ने अपनी हैसियत बनाने की कोशिश की तो वह ब्लैकमेलर और खलनायिका हो गई।

अपनी सामाजिक और राजनीतिक सत्ताओं के दम पर रोज न जाने कितनी भंवरियों का शिकार करने वाले मदेरणाओं और मलखानों की महत्त्वाकांक्षा से तो देश और समाज प्रेरणा ग्रहण करता है, क्योंकि वह पुरुष है और भंवरी ने अपनी मजबूरी की जिंदगी की भरपाई एक खोखले सपने से करना चाहा, तो उसकी महत्त्वाकांक्षा मजाक और नफरत के काबिल है, क्योंकि वह स्त्री है।

खतरनाक महत्त्वाकांक्षाः प्रेरक कुकर्म

यों भी, हम जिस सामंती समाज और संस्कृति पर अपना सीना फुलाए फिरते हैं, उसमें सत्ताओं के तमाम कुकर्म भी "प्रेरक" होते हैं, और शासितों की चीखें भी दफन कर देने लायक मानी जाती हैं। इसी कसौटी पर भंवरी अव्वल तो स्त्री थी, दूसरे शासित थी और इससे भी ज्यादा एक ऐसी जाति में शुमार थी, जिसे "नीच" कहा जाता है। जाहिर है, भंवरी की महत्त्वाकांक्षा खतरनाक थी, क्योंकि वह सामाजिक सत्ताओं के पूरे भविष्य को उलट-पुलट कर दे सकती थी।

लेकिन छल के बल पर राज करने वालों के बरक्स भंवरी देवी सिर्फ उनका शिकार ही हो सकती थी, अपनी महत्त्वाकांक्षाओं की लड़ाई लड़ पाना उसके बूते की बात नहीं थी। इसलिए अपनी "महत्त्वाकांक्षी" होने की लड़ाई वह हारी और अपने शिकारियों के हाथों मारी गई।

जब उसकी हत्या का मामला खुला और उसके बाद उसके बच्चों ने कानूनी लड़ाई के लिए जिस वकील को मुकदमा सौंपा, तो वह वकील इसलिए भाग गया क्योंकि भंवरी के बच्चों के पास उसे देने के लिए फीस नहीं थी। यहां यह समझना मुश्किल है कि भंवरी ने "ब्लैकमेलिंग" के जरिए जो "अकूत" धन इकट्ठा किया था, वे सारे पैसे कहां चले गए! उसकी बेटी को क्यों स्कूल से निकाल दिया गया और उसके बेटे ने किसके डर से कॉलेज जाना बंद कर दिया। साथिन भंवरी का बेटा भी जब कॉलेज जाने लायक हुआ था तो दबंगों के बाल-बच्चों ने उसकी बार-बार पिटाई कर कॉलेज जाने से रोका।

यानी भंवरी की कहानी तब भी वहीं थी और अब भी वहीं है। क्या इसकी वजह इसके सिवा कुछ और भी हो सकती है कि दोनों भंवरी स्त्री है सो है, दलित भी है?

साथिन भंवरी को कहां इस बात का अंदाजा था कि पितृसत्ता, मर्दवाद और ब्राह्मणवाद के जिन अंधे पहरुओं के बीच खड़ी होकर वह एक अंधेरे समाज में अलख जगाने की कोशिश कर रही है, उनकी सत्ता ही अंधकार की वजह से कायम है। इसलिए उन्होंने अपनी सत्ता के खिलाफ खड़ी केवल साथिन भंवरी की नहीं, बल्कि शासित स्त्री और दलित की अस्मिता और सम्मान को कुचल डाला, ताकि हजारों सालों से कायम एक बर्बर और जुल्मी व्यवस्था कायम रखा जा सके। इस फर्जी और मक्कार व्यवस्था से बेखबर साथिन भंवरी ने जब इंसाफ की गुहार लगाई तो न सिर्फ बलात्कारियों के परिवार और समाज ने उसे "झूठी औरत" कहा, बल्कि इस आजाद देश के पंच-परमेश्वरों ने जो कहा, वह अब दुनिया के इतिहास में दर्ज है। क्या कोई सामाजिक व्यवस्था इस हद तक जंगली हो सकती है, जिसमें न्याय की कुर्सी पर बैठे लोग न्याय नहीं करते, बल्कि न्याय का गला घोंटने और अपनी व्यवस्था को बचाने के लिए बेशर्मी की तमाम हदें लांघ जाते हैं?

आज भी तस्वीर में कितना फर्क आया है? खानाबदोश नट जाति की त्रासदी का सामना करती हुई भंवरी ने खुद पढ़ाई-लिखाई की, एएनएम बन गई और अपनी अगली पीढ़ी को उससे भी आगे ले जाने का सपना जमीन पर उतारने लग गई। लेकिन एक तबादला रुकवाने की कोशिश में वह कहां समझ पाई कि वह किस मर्द और सवर्ण सत्ता के जाल में फंसने जा रही है, जो उसके सामने महत्त्वाकांक्षाओं का टुकड़ा फेंक कर उसका शिकार करने के लिए घात लगाए बैठा था। भंवरी उस जाल में फंसी और आखिरकार मार डाली गई।

मर्द के बरक्स औरत...

एक अस्सी पार बूढ़े नारायण दत्त तिवारी की सेक्स सीडी बाजार में प्रसारित होती है, वह "सम्मानित" नेता बना आज भी सबसे अपनी पांव-पूजा कराता फिर रहा है, दूसरी ओर, एक सेक्स सीडी में जाल में फंसी भंवरी मार डाली जाती है और फिर भी ब्लैकमेलर और खलनायिका का दर्जा पाती है। भंवरी देवी के चरित्र की "जांच" करने के लिए बिना किसी की इजाजत के उसके बच्चों का डीएनए परीक्षण कराया जाएगा और साबित हो जाएगा कि भंवरी के एक बच्चे की वजह मलखान सिंह था। यानी कि यह पहले ही साबित हो चुका है कि भंवरी देवी ऐसे संबंधों की "अभ्यस्त" थी। दूसरी ओर, एक युवक गुहार लगाता फिरेगा कि नारायण दत्त तिवारी की डीएनए जांच कराओ, अदालत आदेश देगी कि नारायण दत्त तिवारी के डीएनए की जांच कराओ, पता लगाओ कि वह युवक तिवारी का बेटा है या नहीं! लेकिन सारे गुहार जाए भाड़ में... अदालत का आदेश ठेंगे पर...!!! कौन हिसाब मांगेगा इस "मर्द" से और "बाबा" से?

और भंवरी... महज इसलिए नफरत के काबिल है क्योंकि वह स्त्री है और इससे भी ज्यादा कि खानाबदोशी की नियति को कबूल करने के बजाय उसने "इंसानों" की तरह कुछ सपने देख लिए थे...!!!

बिहार के पूर्णिया जिले में भाजपा के एक विधायक राजकिशोर केसरी की हत्या करने वाली रूपम पाठक और राजस्थान की इस भंवरी देवी के मामले में क्या फर्क है, सिवाय इसके कि रूपम पाठक ने मार डाला और भंवरी देवी मारी गई...!!!

अब मर चुकी भंवरी के लिए अदालत के पंच-परमेश्वर एक बार फिर क्या फैसला सुनाएंगे, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि मामले की जांच के कर्णधारों ने पहले ही भंवरी को ब्लैकमेलर और खलनायिका घोषित कर दिया है। यानी कहानी फिर वहीं की वहीं... एक भंवरी झूठी, एक भंवरी ब्लैकमेलर...! कहानी के शेष पात्र पवित्र देव.... भूदेव...!!!

खामोश...!!! अदालत जारी है...!!!

Monday, 21 February 2011

गरीब औरत की इज्जत, डेढ़ लाख रुपए: वाया सुप्रीम कोर्ट


उत्तर प्रदेश में बांदा की शीलू ने एक अखबार के संवाददाता को बताया कि विधायक (पुरुषोत्तम द्विवेदी) ने उसके साथ बलात्कार करने की हिम्मत इसलिए की क्योंकि वह एक गरीब बाप की बेटी है।

शीलू का बलात्कार करने वाला विधायक पुरुषोत्तम द्विवेदी अब इस बात के लिए जश्न मना सकता है कि जो लोग उसे शीलू के बलात्कार के मामले में सजा दिलाने पर तुले हैं, इस देश की सु्प्रीम कोर्ट ने उन्हें आईना दिखा दिया है कि न्याय के आखिरी मंदिर का इस बारे में क्या मानना है। अब उस फैसले को सामने रख कर पुरुषोत्तम द्विवेदी चाहे तो शीलू को उसकी ‘औकात’ के हिसाब से एक-डेढ़ लाख रुपए अदा कर दे और खम ठोंक कर बाकायदा सुप्रीम कोर्ट से ‘राहत सर्टिफिकेट’ हासिल कर अपने ‘दुश्मनों’ को मुंह चिढ़ाए कि बलात्कार-बलात्कार में फर्क होता है! चूंकि उसके पास डेढ़ लाख रुपए की अगली किस्तों की कमी नहीं होगी, इसलिए वह अगली किसी शीलू के शिकार पर निकल सकता है।

दरअसल, इस देश में रोजाना होने वाले सैंकड़ों बलात्कारों के मामले में फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक नजीर पेश की है, लेकिन इसका ‘फायदा’ बलात्कार की शिकार सिर्फ उन महिलाओं को मिल पाएगा, जो गरीब हैं! अगर पीड़ित महिला गरीब नहीं है तो उसे यह ‘फायदा’ नहीं मिल पाएगा!
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मामला कुछ यों है कि सांपला, रोहतक के इस्माइल गांव में संजय और रामफल ने संतरो (बदला हुआ नाम) के साथ आठ साल पहले सामूहिक बलात्कार किया था। सेशन कोर्ट ने इन दोनों अपराधियों को आईपीसी की धारा 376 (बी) के तहत बारह-बारह साल की कैद की सजा दी। बाद में हाईकोर्ट ने भी इस सजा को बरकरार रखा। दोनों अपराधियों ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की और सुप्रीम कोर्ट की एक खंडपीठ ने न्याय के एक नए सिद्धांत का प्रतिपादन किया। फैसला सुनाते हुए कोर्ट ने कहा कि किसी महिला की इज्जत कुछ लाख रुपए नहीं हो सकती, लेकिन महिला गरीब है, इसलिए दोनों अपराधी अगर महिला को डेढ़-डेढ़ लाख रुपए मुआवजा दे दें तो उन्हें जमानत पर रिहा कर दिया जाए। इस तरह का अब तक का यह पहला मामला है जिसमें सामूहिक बलात्कार जैसे संगीन अपराध के मामले में मुआवजे की शर्त पर दोषियों को जमानत दे दी गई। (हिंदुस्तान, 13 जनवरी, 2011)

बलात्कारियों को लेकर न्यायमूर्तियों की इसी पीठ का एक और नया फैसला भी इसी तर्ज पर आया। 22 फरवरी को इन्हीं दोनों न्यायमूर्तियों ने पंजाब के लुधियाना जिले में मार्च 1997 में एक महिला के साथ सामूहिक बलात्कार करने वाले तीन अपराधियों को पचास-पचास हजार रुपए अदा करने की शर्त पर महज साढ़े तीन साल कैद की सजा काटने के बाद रिहा करने का आदेश दे दिया। मुजरिमों को सेशन कोर्ट दस-दस साल कैद की सजा सुनाई थी, हाईकोर्ट ने मुजरिमों की अपील खारिज कर दी थी, लेकिन इन दोनों न्यायमूर्तियों ने एक बार फिर अपनी करीब हफ्ते भर पहले शुरू की गई परंपरा का निर्वहन करते हुए एक और इसी तरह का फैसला सुनाया। तर्क वही है, पीड़िता और उसके साथ बलात्कार की सजा पाए अपराधी के बीच समझौता हो गया! गौर करिएगा, इसमें बलात्कार की शिकार औरत की इज्जत की कीमत घट कर पचास हजार रुपए हो गई है। अब देखना है कि न्याय के इस सबसे बड़े मंदिर में बलात्कार की शिकार अगली किसी औरत की इज्जत की कितनी कीमत लगाई जाती है...!
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ध्यान रहे कि बलात्कार के अपराध में धारा 376 (जी ) के तहत न्यूनतम सजा दस वर्ष और अधिकतम उम्रकैद है। यह अपराध गैरजमानती तथा गैरमाफी योग्य है।

सुप्रीम कोर्ट की जिस खंडपीठ ने यह फैसला सुनाया है, उसके दो माननीय ‘न्यायमूर्ति’ हैं माननीय न्यायमूर्ति मार्कंडेय काट्जू और माननीय न्यायमूर्ति ज्ञानसुधा मिश्रा। यहां साफ करने की जरूरत है कि इनमें से ज्ञानसुधा मिश्रा एक महिला का नाम है।

सुप्रीम कोर्ट के इस खंडपीठ में शामिल एक, मार्कंडेय काट्जू वही ‘न्यायमूर्ति’ हैं, जिन्होंने कुछ समय पहले लिव-इन रिलेशनिशप पर एक फैसला देते हुए कहा था कि ‘रखैलों’ को मुआवजा पाने का कोई हक नहीं है, और कि इसके लिए लंबे समय तक पति-पत्नी की तरह रहते दिखना होगा। हालांकि इन्हीं मार्कंडेय काट्जू ने अपने एक अन्य फैसले में नौ साल तक एक स्त्री के साथ रहने और उससे दो बच्चों का पिता बनने के बावजूद पत्नी के रूप में स्वीकार न करने वाले एक पुरुष के लिए महज ‘कपटी’ शब्द का इस्तेमाल करने तक से इनकार कर दिया और कहा कि ऐसे शख्स को ज्यादा से ज्यादा असभ्य कहा जा सकता है और कानून के तहत उसे सजा देना नाइंसाफी होगी। (उस खंडपीठ में भी ज्ञानसुधा मिश्रा उनके साथ थीं, लेकिन उन्होंने मार्कंडेय काट्जू से साफ तौर पर असहमति जताई थी और कहा था कि ऐसे पुरुष को कपटी कहना उचित होगा और उसे जेल की सलाखों के पीछे जाना ही होगा।) बहरहाल, जब रखैल शब्द पर आपत्ति उठाई गई तो न्यायमूर्ति श्री मार्कंडेय काट्जू का कहना था कि इस शब्द का इस्तेमाल तो सदियों से किया जाता रहा है। क्या ताजा फैसले से न्यायमूर्ति श्री मार्कंडेय काट्जू का इससे कोई अलग चेहरा सामने आता है?

अंग्रेजी में एक शब्द है माइसोजीनिस्ट...। इसका मतलब यह होता है कि कोई अपनी बुनावट में ही स्त्रियों से नफरत करने वाला है।

लेकिन हमारे लिए केवल दुख नहीं, त्रासदी का मामला यह है कि इसी खंडपीठ में ज्ञानसुधा मिश्रा के रूप में एक महिला भी बैठी हुई थीं और उन्हें भी इसमें आपत्ति करने लायक कोई बात नहीं दिखी कि सेशन कोर्ट और हाईकोर्ट में बारह-बारह साल की सजा पाए बलात्कारियों को इस शर्त पर राहत देने का आदेश दे दिया जाए कि वह पीड़ित महिला को डेढ़ लाख रुपए अदा कर दें। यह इसलिए कि महिला गरीब है। न्यायमूर्तियों ने यह कहने की मेहरबानी की कि ‘किसी महिला की इज्जत कुछ लाख रुपए नहीं हो सकती...।’

देश की सबसे ऊंची अदालत में न्याय की कुर्सी पर बैठने के बावजूद ज्ञानसुधा मिश्रा को भी यह क्यों लगता है कि एक स्त्री की ‘इज्जत’ का पर्याय उसका शरीर है और अगर बंदूक की नोक पर उसके साथ बलात्कार किया जाता है तो इससे उसकी ‘इज्जत’ चली जाती है? क्या एक स्त्री का अस्तित्व इसी ‘इज्जत’ के भरोसे टिका होता है, जिसके लूट लिए जाने के बाद उसके पास कुछ नहीं बचता? फिर इस सामाजिक स्थापनाओं को हम क्यों गलत कहें जिसमें इस ‘इज्जत’ के लुट जाने के बाद मान लिया जाता है कि अब वह कौन-सा मुंह लेकर जिएगी? क्या हम अक्सर आने वाली इन खबरों से इतने अनजान हैं कि किसी स्त्री ने बलात्कार के बाद खुद आत्महत्या कर ली? क्या स्त्री की अस्मिता के सारे सवाल इसी ‘इज्जत’ के साथ खत्म हो जाते हैं? और क्या बलात्कार खासतौर पर हमारी सामाजिक परिस्थितियों में एक स्त्री के अस्तित्व पर एक ऐसा हमला नहीं है, जिस अपराध के लिए कितनी भी सख्त सजा कम ही होगी?

सवाल है कि ये ‘इज्जत’ है क्या और इस तथाकथित इज्जत की यह परिभाषा किसने गढ़ी है...? किसने एक औरत को घर या जमीन की तरह एक जायदाद में तब्दील कर दिया और किसने उसकी अस्मिता के सारे सवालों को खारिज करके उसकी इज्जत को उसके देह का दूसरा नाम बना दिया?

दरअसल, स्त्री को गुलाम बनाए रख कर ही समाज के सामंती चरित्र को बचाए रखा जा सकता है। इसका विस्तार करें तो स्त्रियों के साथ सामाजिक वर्णक्रम में निचले पायदान पर गिनी जाने वाली जातियों को भी इस चक्र में शामिल किया जा सकता है। यानी स्त्रियों और समाज के अधिकांश हिस्से को अपनी उंगलियों पर नचाने वाले ब्राह्मणवादी सूत्रों ने ऐसा सामाजिक मनोविज्ञान रच दिया है कि उसमें गुलामी और त्रासदी झेलते हुए शोषित और पीड़ित वर्गों को पता भी नहीं चल पाता कि इस व्यवस्था ने कब और कैसे उनके स्वत्व का हरण कर लिया।

लेकिन देश के सुप्रीम कोर्ट के फैसलों में अगर इन्हीं स्थापनाओं की छाया दिखती है तो अंदाजा लगाइए कि यह व्यवस्था किसकी है और अलग-अलग मोर्चे पर अलग-अलग रूप में किसके लिए चल रही है!

सवाल है कि क्या सुप्रीम कोर्ट के इन दोनों जजों ने सचमुच कोई ऐसा फैसला सुनाया है कि इससे किसी को दुखी होना चाहिए? हमारे समाज में कौन किसी बात पर दुखी होता है और किसके दुखी होने का कोई मतलब है? इस फैसले से किसको दुख होगा? सुप्रीम कोर्ट ने तो उन्हीं धारणाओं, मानसिकताओं और रिवायतों को कानूनी स्थापना दी है, जो हमारे समाज और सरकार के चरित्र में घुला-रचा-बसा है! मगर इसके बाद एक सवाल और खड़ा होता है कि देश के सुप्रीम कोर्ट में न्याय की कुर्सी पर क्या सामाजिक रिवायतों के झंडाबरदार बैठे हुए हैं?

कोई कह सकता है कि महिला खुद भी इसके लिए राजी थी। लेकिन जो लोग महिला के भी राजी होने का तर्क स्वीकार कर रहे हैं, क्या वे अंदाजा भी लगा सकते हैं कि वह महिला व्यवस्था की इन बेरहम परतों के बारे में कितना सोच-समझ सकती है? जब सबसे ऊंची अदालत में न्याय की कुर्सी पर बैठे लोग उसकी ‘इज्जत’ और बलात्कार जैसे अपराध के लिए सजा की यह परिभाषा गढ़ रहे हैं, तो क्या हम उस महिला से अपने साथ हुए बलात्कार, इसके प्रति सामाजिक अवधारणाओं, स्थापनाओं, परंपराओं और मानसिकता की साजिशें समझ-बूझ कर कुछ तय करने की उम्मीद करेंगे?

महिला चूंकि गरीब है, इसलिए डेढ़ लाख रुपए अदा कर रिहा करने का आदेश देते हुए भी दोनों न्यायमूर्ति यह तो मान ही रहे हैं कि कठघरे में खड़े दोनों व्यक्ति बलात्कार के अपराधी हैं। सेशन कोर्ट और हाईकोर्ट ने इन दोनों को बारह साल की कैद की सजा सुनाई थी। अगर सुप्रीम कोर्ट को लगता है कि ये दोनों व्यक्ति अपराधी नहीं हैं, तो वह उन्हें बाइज्जत बरी कर सकता है। अपराधी होने की स्थिति में भी उसकी कृपा बरसे तो वह उनकी सजा कम सकता है। लेकिन राहत पाने के लिए डेढ़ लाख रुपए देने की शर्त लगाते हुए न्यायमूर्तियों ने किस तर्क का सहारा लिया? क्या इस देश के संविधान में ही कहीं यह बात छिपी हुई है कि किसी गरीब महिला के साथ बलात्कार की स्थिति में अपराधियों को यह छूट है कि वह उसे लाख-डेढ़ लाख रुपए देकर राहत हासिल कर ले? अगर नहीं, तो न्यायमूर्तियों ने कानून की किसी भी धारा की व्याख्या इस रूप में किस आधार पर की? दोनों के अपराधी होने को स्वीकार करने के बावजूद उन्हें राहत हासिल करने की शर्त डेढ़ लाख रुपए कैसे तय कर दी?

हम मान ले सकते हैं कि इन न्यायमूर्तियों को महिला के गरीब होने पर दया आ रही थी। (जज की कुर्सी पर क्या दया करने के लिए बैठा जाता है?) लेकिन उसके साथ बलात्कार होने के लिए वह किस-किस को जिम्मेदार मानते हैं? अपने नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की आखिरी जिम्मेदारी राज्य पर है। इस लिहाज से उस महिला के साथ जो भी हुआ, वह राज्य की विफलता है। राज्य उसकी सुरक्षा नहीं कर सका, इसलिए अगर मुआवजा देना है तो राज्य को देना है। सुप्रीम कोर्ट की यह खंडपीठ अगर महिला को आर्थिक मदद मुहैया कराना ही चाहती थी तो वह राज्य को इतनी या इससे ज्यादा रकम मुआवजे के रूप में देने का आदेश दे सकती थी। लेकिन अगर बलात्कारियों को डेढ़ लाख रुपए दे कर राहत पाने की छूट दी जाती है, तो बलात्कार के अपराध में सजा पाए कितने ऐसे लोग होंगे जो इस विकल्प का चुनाव नहीं करना चाहेंगे?

और इसके साथ यह भी जोड़ लीजिए कि इस देश में जितनी भी महिलाओं के साथ बलात्कार होता है, उसमें ज्यादातर महिलाएं गरीब ही होती हैं। बांदा की शीलू ने जो कहा है, वह इस देश की एक बड़ी और तल्ख हकीकत है कि विधायक ने उसके साथ बलात्कार करने की हिम्मत इसलिए की, क्योंकि वह एक गरीब बाप की बेटी है।

अदालतें क्या इसी हल की राह पर चलते हुए किसी पीड़ित महिला के अमीर होने की स्थिति में डेढ़ लाख रुपए के मुआवजे को आनुपातिक तौर पर ज्यादा और बहुत ज्यादा बढ़ा कर महिला को चुप रहने की सलाह देंगी? (समाज में वर्गीय नफरत के भाव कैसे पैदा होते होंगे...?)

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला दरअसल मध्ययुगीन सामंती खाप मिजाजी पंचायतों के फैसलों या स्थानीय दबंगों की उन मनमानियों से कैसे अलग है, जिसमें बलात्कार की शिकार स्त्री को एक-दो-तीन या पांच हजार रुपए लेकर मुंह बंद रखने पर मजबूर कर दिया जाता है।

निचली अदालतों में फैली घूसखोरी, भ्रष्टाचार, अनियमतताओं और पद-प्रभाव के इस्तेमाल पर सोचने-समझने वाले लोगों से लेकर देश की सुप्रीम कोर्ट तक ने उंगली उठाई है। यानी आप सुप्रीम कोर्ट को पाक-साफ, पवित्र, अप्रश्नेय- सब कुछ मान सकते हैं। निचली अदालतों की उसी छवि के शिकार लोग जब किसी तरह सुप्रीम कोर्ट में पहुंचते हैं, तो न्याय की उम्मीद का वह एक आखिरी दरवाजा होता है। वहां से मिला ‘न्याय’ न केवल आखिरी तौर पर स्वीकार्य होता है, बल्कि एक नजीर भी कि आगे अगर देश की किसी अदालत में वैसा मामला आएगा तो सुप्रीम कोर्ट का फैसला राह दिखाएगा।

क्या इस फैसले के बाद भी न्याय का यह मंदिर यह सकने की हालत में है कि वह सबसे संगीन अपराधों में गिने जाने वाले अपराध- बलात्कार के मामले में संवेदनशील रवैया अपनाती है? क्या उसने यह नया सिद्धांत नहीं प्रतिपादित किया है कि अगर किसी गरीब महिला के साथ बलात्कार हुआ है तो उसे न्याय के रूप में लाख-डेढ़ लाख रुपए दे दो और बात खत्म करो? क्या किसी संभ्रांत या धनी वर्ग की महिला के साथ बलात्कार या किसी हाई-प्रोफाइल मामले में इन्हीं तथाकथित न्यायमूर्तियों को यही शब्द दोहराने की हिम्मत पड़ती?

Friday, 28 January 2011

गोहाना, दुलीना, मिर्चपुर… जुल्‍म की कहानी जारी है…

मिर्चपुर की कड़ियां...


पिछले साल अप्रैल में हरियाणा के हिसार जिले में मिर्चपुर गांव में बाल्मीकी बस्ती के एक कुत्ते के भौंक देने के बाद बाल्मीकि बस्ती पर वहां के जाटों ने हमला कर दिया था और कई घर फूंक डाले थे। उसमें एक विकलांग लड़की सुमन को जिंदा जला दिया गया और उसके पिता को भी। उस घटना के बाद कुछ आरोपियों को पकड़ा गया और मुकदमा चल रहा है। लेकिन उन्हें रिहा करने के लिए वहां जो "आंदोलन" चल रहा है और उसके प्रति जो सरकारी रुख है, वह अपने आप में इस बात का सबूत है कि हमारी व्यवस्था किसके लिए और किस तरह काम करती है। आज ही यह खबर छपी है कि मिर्चपुर गांव के भुक्तभोगी बाल्मीकी परिवारों ने डर से गांव छोड़ दिया है। क्या हम एक आजाद देश में रह रहे हैं और क्या हम आज भी यह कहने की हालत में हैं कि हम एक गौरवशाली परंपरा वाले समाज और देश में रहते हैं?



जब
अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारतीय समाज की जाति-व्यवस्था को नस्लीय भेदभाव की तरह वंचित वर्गों के खिलाफ दमन-शोषण के एक मानक के रूप में स्वीकार करने की बात आती है, तो देश की सरकार इस मुद्दे को खारिज करने के लिए अतिरिक्त उत्साह का प्रदर्शन करती दिखती है। इससे दुनिया में यही संदेश जाता है कि यह मांग कुछ असंतुष्ट वर्गों की गैरजरूरी ‘खुराफात’ होगी और जाति-व्यवस्था एक प्रचार से ज्यादा कुछ नहीं है। लेकिन दुनिया के सबसे ताकतवर देशों के साथ सामरिक-आर्थिक समझौते करते और भावी महाशक्ति के रूप में प्रचारित हमारे देश के सामाजिक हालात क्या इतने ही सुखद हैं?

दरअसल, सामाजिक वर्णक्रम का मनोविज्ञान इतना आसान नहीं है कि उसकी गुत्थियां अर्थव्यवस्था के विकास दर के जुमलों से सुलझायी जा सकें। दूसरे कई राज्यों के मुकाबले हरियाणा एक समृद्ध या और ज्यादा समृद्ध होता राज्य है। ‘जिंदल प्रभाव’ से आच्छादित राज्य के एक जिले हिसार का सफर करते हुए कोई यह अंदाजा लगा सकता है कि रास्ते में पड़ने वाले घरों की बनावट और वहां की बहुत अच्छी सड़कें शायद ‘ईमानदार और समग्र’ विकास नीतियों का नतीजा होंगी। मिर्चपुर गांव भी बाहर से ऐसा ही दिखता है। लेकिन पिछले महीने इस गांव की एक घटना ने फिर से इस वहम को तोड़ा है कि आर्थिक विकास सामाजिक शोषण और दमन की स्थितियों से निपटने का एक आखिरी जरिया है।

एक कुत्ते के भौंकने के बाद हुई नोक-झोंक क्या इतना बड़ी वजह हो सकती है कि गांव की समूची बाल्मीकि बस्ती पर हमला करके घरों को फूंक डाला जाए? लेकिन इस बहाने ने ऐसा रूप लिया कि दबंग माने जाने वाले जाट समुदाय के लोगों ने ‘अपनी’ सत्ता और पुलिस प्रशासन में अपने लोगों के साये में बाल्मीकि बस्ती को घेर कर करीब बीस घरों को इत्मीनान से जलाया। खासतौर पर उन घरों को निशाना बनाया गया जो किसी तरह थोड़ी अच्छी हालत में आ चुके थे।

घृणा के उस पैमाने का अंदाजा लगाना भी मुश्किल है जो एक विकलांग लड़की के ऊपर पेट्रोल डालने के बाद घर में बंद कर देने और बाहर से आग लगा देने को मजबूर करता है। शारीरिक रूप से लाचार अठारह साल की सुमन बारहवीं कक्षा में पढ़ रही थी। नफरत की इस आग में सुमन के साथ उसके पिता ताराचंद भी जला दिये गये।

सुव्यवस्थित विकास की दिख सकने वाली तस्वीरों के बीच इस स्थिति की कल्पना भी शायद मुमकिन नहीं कि अपने जलते घरों और खुद को बचाने की कोशिश करते पुरुषों और महिलाओं के सामने हमलावर निर्वस्त्र होकर नाचने लगें! यह किसी भी तरह के विकास के तमाम दावों को खारिज करने के लिए काफी है। यह हजारों साल की ‘महान’ सांस्कृतिक परंपराओं पर शर्म करने के लिए काफी है। यह एक ऐसे कबीले की कल्पना लगती है जिसे अपनी सड़ांधों पर गर्व करना सुहाता है और वह इसी में जीना चाहता है। नहीं तो क्या कारण है कि अपनी प्रकृति में समान गोहाना, दुलीना या मिर्चपुर कांड शृंखला की कड़ियों की तरह आगे बढ़ते जा रहे हैं।

इस तरह की घटनाओं के बावजूद अक्सर खाप पंचायतों में अपनी तीन हजार साल की परंपरा पर गर्व की घोषणा की जाती है। इन पंचायतों में वे लोग भी बैठे होते हैं, जिनके घरों में आधुनिकतम सुख-सुविधाओं के सभी साधन मौजूद होंगे और संभव है कि उनमें से बहुत सारे डॉक्टर-इंजीनियर या स्कूल-कॉलेज में पढ़ाने वाले शिक्षक हों। जिस मिर्चपुर गांव में बाल्मीकि बस्ती को जलाया गया, वहां दूसरी सरकारी नौकरियों के अलावा शिक्षण के पेशे में चार सौ लोग हैं। इन चार सौ में से तीन सौ अस्सी शिक्षक अकेले जाट बिरादरी से हैं। लेकिन मिर्चपुर की घटना के बाद भी इनके बीच का कोई शिक्षक अगर बाल्मीकियों को बदमिजाज और सिरचढ़ा कहता हुआ मिल जाए तो समझा जा सकता है कि अपने समाज पर इन शिक्षकों का क्या असर होगा और अगर होगा तो वह किस तरह का होगा। कहते हैं कि शिक्षा सभी तरह की जड़ताओं और अंधेरों को दूर करती है। लेकिन हकीकत यह भी है कि सत्ता और सत्ता में बने रहने की चाहत शिक्षा को एक साजिश में तब्दील कर देती है। राजनीतिक सत्ताएं आमतौर पर सामाजिक सत्ताओं का ही प्रतिरूप होती हैं। और यह जगजाहिर है कि राजनीतिक सत्ताओं के लिए सामाजिक सत्ताओं के हित क्यों सर्वोपरि होते हैं।

यह अनायास नहीं है कि खाप पंचायतों को न केवल पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला और उनकी पार्टी का, बल्कि हरियाणा के औद्योगिक विकास में अपनी खास जगह रखने वाले कांग्रेसी सांसद नवीन जिंदल का भी खुला समर्थन मिलता है। राज्य सरकार की ओर से मुआवजे की रस्म अदायगी को खारिज करके मिर्चपुर के पीड़ित जब अपनी मांगों के साथ हिसार जिलाधिकारी कार्यालय के बाहर धरने पर बैठे थे, तो उन्हें एक तरह से जबर्दस्ती वहां से हटा दिया गया। वे कौन-सी ताकतें हैं, जो राजनीतिक सत्ताओं को इस तरह के ‘खेल’ को जारी रखने के लिए मजबूर करती हैं? दरअसल, बदलती आर्थिक संरचनाओं का असर वंचित तबकों की सामाजिक और मनोवैज्ञानिक स्थितियों पर जरूर हुआ, जिसमें उन्हें सशक्तीकरण की एक प्रक्रिया में जाने का मौका मिला। नये दौर के संपर्कों के कारण बड़े पैमाने पर दलित अपने पारंपरिक पेशों से बाहर आये और मजदूरी से लेकर दूसरे कई तरह के काम-धंधों में उन्होंने दखल देना शुरू किया। पारंपरिक पेशे जहां उनकी सामाजिक हैसियत और आर्थिक बदहाली को बनाये रखने में ही अपनी भूमिका निभाते थे, वहां अब उन्होंने अपने घर की दीवारें अच्छी बनायीं, टीवी, फ्रिज या मोटरसाइकिल भी खरीदे। निजी स्कूलों का खर्च वे नहीं उठा सकते थे, इसलिए उन्होंने अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में ही सही, भेजना शुरू किया।

यह एक ऐसी स्थिति है जिससे समूची सामाजिक सत्ता-संरचना में टूट-फूट मच सकती है। और संस्कृति का ‘राग- उदार’ गाता हुआ हमारे देश या समाज का प्रभु वर्ग अभी इतना उदार नहीं हुआ है कि अपनी हैसियत की कुर्सी की ओर बढ़ते किसी कदम का वह स्वागत करे। जाहिर है, कमजोर वर्गों के लोगों का अपने अस्तित्व को लेकर जागरूक होना समाज पर पहले से काबिज प्रभु वर्गों को नागवार गुजरा है।

मुश्किल यह है कि सशक्तीकरण की इस प्रक्रिया ने दबंग समुदायों के बीच उदार या मानवीय होने की प्रेरणा भरने के बजाय अपनी परंपरागत हैसियत के छिन जाने का भय पैदा किया। जब तक समाज अपनी परंपराओं के हिसाब से चलता रहा और दलित-दमित तबके ‘अपनी सीमा’ में रहे, यह ‘गर्व’ करने का विषय रहा। और जब सामाजिक सत्ता के सूत्र बिखरने लगे तो इस श्रेष्ठता-बोध के मनोविज्ञान के सामने नयी चुनौतियां खड़ी हुईं। इसी यथास्थितिवाद को कायम रखने या इसे बचाने की कोशिशों के तहत प्रभु वर्ग ज्यादा आक्रामक हुए। गोहाना या मिर्चपुर जैसे कांड दरअसल उसी प्रतिक्रिया का नतीजा कहे जा सकते हैं, जिसकी मार्फत यह संदेश देने की कोशिश की जाती है कि समाज की लगाम किसके हाथों में है और किसे अपनी तय सामाजिक हैसियत से ऊपर आने का हक नहीं है।

मगर सामाजिक सत्ताओं और उसके प्रतिनिधि के रूप में काम कर रहे राजनीतिक-प्रशासनिक तंत्र के सामने स्थितियां क्या पहले की तरह ही आसान रह गयी हैं?

पुलिस प्रशासन के साये में सुनियोजित तरीके से हुए मिर्चपुर कांड के बाद सिर्फ सार्वजनिक शर्म से बचने के लिए हरियाणा सरकार ने जो औपचारिक कार्रवाई की, उसकी असलियत का अंदाजा भी स्थानीय दलितों के इस आरोप से लगाया जा सकता है कि घटना को अंजाम देने वाले अब भी खुलेआम घूम रहे हैं और लोगों को धमका रहे हैं।

गौरतलब है कि मिर्चपुर में दलित उत्पीड़न का लंबा इतिहास रहा है और खासतौर पर दलित महिलाओं का यौन उत्पीड़न और उन्हें नंगा करके घुमाने जैसी घटनाएं पहले भी होती रही हैं। अपनी मर्जी से वोट नहीं डाल पाने या गांव के मंदिर में दलितों का प्रवेश वर्जित होने जैसी स्थितियां अगर आज भी बनी हुई है तो यह किसकी विफलता है? शायद यही वजह है कि हालिया घटना के बाद प्रशासन की ओर से दिये गये सुरक्षा के आश्वासन के बावजूद कुछ भुक्तभोगी गांव में लौटे, लेकिन उन्होंने अपने परिवार की युवतियों और लड़कियों को गांव से दूर अपने रिश्तेदारों के पास रखने का विकल्प चुना।

यह उस इलाके में दलित वर्गों के लिए सम्मान और सुरक्षा के माहौल और प्रशासन के आश्वासन की सच्चाई है। वे कौन-से हालात होंगे, जिनमें स्थानीय दलित परिवारों ने दावा किया कि अगर पुलिस ने चाल नहीं चली होती तो हमारे लड़के इतना बड़ा कांड नहीं होने देते, और कि अब लड़ने के अलावा कोई चारा नहीं बचा? साफ है कि अब दलित भी शायद खुद सामना करने के विकल्प की ओर बढ़ रहे हैं। क्या यह सरकारों के चेतने का समय है? यह बेवजह नहीं है कि घटना के लगभग तीन हफ्ते बाद मिर्चपुर में एक ओर सर्वखाप पंचायत में आठ-दस हजार लोगों की भीड़ के सामने दावा किया जा रहा था कि ‘बाल्मीकि भाइयों ने अब समझौता कर लिया है और वे भाईचारे के साथ गांव में रहने को तैयार हो गये हैं’ और दूसरी ओर, जलायी गयी बस्ती के भुक्तभोगी परिवारों का साफ कहना था कि किसी तरह का समझौता नहीं हो सकता और दोषियों को हर हाल में सजा मिलनी चाहिए।

मगर राज्य की राजनीतिक ताकतों को दलित वर्गों की पीड़ा और उनके गुस्से की कोई परवाह नहीं है। दलितों पर अत्याचारों से लेकर इज्जत बचाने के नाम पर हत्या जैसे बर्बर फरमानों के बावजूद अगर राजनीतिक दल खाप पंचायतों के सामने सिर झुकाये नजर आते हैं तो इसके कारण क्या हो सकते हैं? या तो उनका मकसद सिर्फ वोट लेना है, या फिर वे खुद भी उसी मध्ययुगीन मानसिकता में कैद हैं! परंपरा को बचाने के नाम पर जातीय और राजनीतिक स्वार्थों का यह घालमेल संविधान तक को खारिज करने में नहीं हिचकता।

सामाजिक विकास नीतियों की इससे बड़ी विफलता और क्या हो सकती है कि शिक्षा और सभ्यता के तमाम दावे जाति की जड़ों के सामने हार जाते हैं! देश के सभी हिस्सों में लागू पाठ्यक्रमों में अपनी संस्कृति की उदारता पर गर्व करने का मनोविज्ञान तैयार किया जाता है। लेकिन अलग-अलग रूपों में देश के सभी हिस्सों में कमजोर तबकों के खिलाफ अक्सर होने वाली अत्याचार की घटनाएं व्यवहार में उस उदारता की हकीकत बयान करती हैं। इस सच्चाई को दुनिया के सामने नस्लीय भेदभाव के आईने में देखने से हमारी सरकारें क्या इसलिए कतराती रही हैं कि इससे गोहाना, दुलीना या मिर्चपुर जैसे कांडों पर पड़ा पर्दा उघड़ जाएगा?

(31 मई 2010 को जनसत्ता में प्रक‍ाशित)