Showing posts with label पितृसत्ता. Show all posts
Showing posts with label पितृसत्ता. Show all posts

Wednesday, 16 February 2011

बाजार दरअसल व्यवस्था का ही पोषण करता है...

सत्ता की जुबान

मृणाल वल्लरी



कुछ समय पहले अपने एक गीत की वजह से सिनेमा हॉलों में आने से पहले मशहूर हो चुकी एक फिल्म ‘तीसमार खां’ बड़ी धूम से आई, लेकिन बॉक्स ऑफिस पर मुंह के बल गिरी। उस बाजारू धूम का धुआं पैदा करने में जिन दो खास पहलुओं की भूमिका रही, वे यह थीं कि फिल्म के रिलीज होने के पहले ही ‘शीला की जवानी...’ ने कथित तौर पर युवा दिलोदिमाग को अपने मायाजाल में कैद कर लिया था और दूसरे कि टीवी पर चलाए गए प्रचार में यह संवाद बड़े जोर-शोर से परोसा गया कि किसी तवायफ की लुटती इज्जत को बचाना और तीसमार खां को पकड़ने की कोशिश करना- दोनों बेकार है। हैरानी तभी हुई थी कि एक महिला निर्देशक की फिल्म में इतना संवेदनहीन संवाद कैसे हो सकता है। जब टीवी के प्रोमो से वह संवाद हटा लिया गया था तो थोड़ी राहत महसूस हुई थी। लेकिन फिल्म में वह संवाद ज्यों का त्यों था, सिर्फ तवायफ शब्द पर एक ‘बीप’ की पट्टी चढ़ा-पढ़ा दी गई। सवाल है कि क्या सेंसर बोर्ड इतना भोला है कि उसने मान लिया कि ‘बीप’ चढ़ा देने भर से दर्शकों को वहां प्रयोग किए गए शब्द का पता नहीं चलेगा! ‘तीसमार खां’ किसकी इज्जत से इतनी घृणा से देख रहा है, एक आम दर्शक शायद इसलिए भी बड़ी आसानी से अंदाजा लगा लेता है, क्योंकि इसके इस्तेमाल का मकसद ही सामाजिक आग्रहों-दुराग्रहों और कुंठाओं का शोषण था।

इसके पहले प्रकाश झा की फिल्म ‘राजनीति’ के इस संवाद पर भी सेंसर बोर्ड ने कैंची चलाई थी कि ‘विधवा सब लूट कर ले जाएगी।’ यह फिल्म की नायिका कैटरीना कैफ के लिए कहा गया था। ध्यान रखने की बात यह है कि कैटरीना की उस भूमिका को परोक्ष रूप से सोनिया गांधी से जोड़ा गया था। सेंसर बोर्ड को लगा कि इससे शायद सोनिया गांधी के सम्मान को चोट पहुंचेगा, और वह संवाद बदल दिया गया। लेकिन ‘तीसमार खां’ जिसकी इज्जत बचाने को ‘बेकार’ घोषित करता है, उसके इससे आहत होने या न होने से सचमुच कहां किसी को कोई फर्क पड़ता है? अभिमन्यु की तरह मां के पेट से ही ठगी, धोखे और जालसाजी के गुण सीख कर आया आज के समाज का ‘सुपर हीरो’ अपनी जिंदगी के कई सिद्धांतों में से इस एक को कंटीली मुस्कान के साथ परदे पर जब भी कहता है कि तवायफों की कोई इज्जत नहीं होती तो सिनेमा हॉल में बैठा दर्शक तालियों की गड़गड़ाहट से उसकी मर्दानगी की हौसला-अफजाई करता है।

दरअसल, फराह खान जैसे निर्देशक जितना बाजार की नब्ज पहचानते हैं, उससे ज्यादा उन्हें यह पता है कि बाजार में समाज की किन कुंठाओं को सबसे ज्यादा बेचा जा सकता है। अपने हर अंक का आधा वक्त ‘बीप’ में काट लेने वाले कथित रियलिटी शो ‘बिग बॉस’ जैसे धारावाहिकों में हर ‘बीप’ के साथ उसके दर्शकों की किस तरह की प्यास बुझती है? यह बेवजह नहीं है कि आज हिंदी फिल्मों में ऐसे संवाद आम हैं, जिससे कहीं न कहीं लोगों की यौन लिप्साओं को तुष्टि मिलती है। इससे किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता कि सिनेमा हॉल की किसी सीट पर बैठी एक स्त्री के लिए वे संवाद किस हद तक असहज करने वाले हो सकते हैं। ऐसी स्त्रियों को पाठ पढ़ाया जाता है कि एक ओर स्त्रियां भी तमाम वर्जनाओं को त्याग कर धड़ल्ले से गालियों का इस्तेमाल करके अपनी ‘शक्ति’ का प्रदर्शन करने लगी हैं और यहां फिर से वर्जनाओं के जाल में उलझाने की कोशिश की जा रही है। ‘नो वन किल्ड जेसिका’ में पत्रकार बनी रानी मुखर्जी करगिल रिपोर्टिंग से लौटते वक्त हवाईजहाज में एक सहयात्री को जब गालीयुक्त मर्दाना भाषा में चुनौती देती है या कुछ दूसरी महिला पात्र जब बार-बार एक गाली का प्रयोग करती हैं तो सिनेमा हॉल में ठहाका लगता है या लोग फुसफुसाने लगते हैं और दूसरी ओर बाजार इसे स्त्री सशक्तीकरण के रूप में पेश करता है। धड़ल्ले से गालियों का इस्तेमाल कर रही कोई महिला क्या सोच भी पाती है कि दुनिया की अमूमन सभी गालियां कैसे स्त्री-देह को लक्षित हैं और इससे स्त्री की अस्मिता कहां-कहां और कैसे खंडित होती है? अपने लिए चुनौती बन सकने वाली किसी ताकत को सत्ताएं इसी तरह नष्ट कर डालती हैं।

हाल ही में रामगोपाल वर्मा की वाहियात कही जा सकने वाली फिल्म ‘रक्तचरित्र-1’ में एक पात्र एक संवाद में जब ‘नीची जाति’ बोलता है तो इसमें ‘नीची’ शब्द पर बीप की पट्टी चढ़ा दी गई और ‘जाति’ रहने दिया गया। लेकिन इसी फिल्म का खलनायक एक जगह मां की प्रसिद्ध गाली चिल्ला-चिल्ला कर दोहराता है और इससे सेंसर बोर्ड को कोई परेशानी नहीं होती। शायद इसलिए कि मां की गाली अब आपत्ति करने लायक नहीं रही। इसी गाली की आड़ ने देश के प्रिय क्रिकेटर हरभजन सिंह को बचा लिया था। जब आस्ट्रेलियाई खिलाड़ी एंड्रयू साइमंड्स ने आरोप लगाया कि हरभजन ने उन्हें ‘मंकी’ कहा तो इसे नस्लभेदी गाली मानते हुए कड़ी कार्रवाई की तैयारी हुई। लेकिन हरभजन ने बड़ी मासूमियत से सफाई दे दी कि उन्होंने ‘मंकी’ नहीं ‘मां की’ कहा था। उनकी सफाई को स्वीकार करते हुए उन्हें बख्श दिया गया। भारत में उनकी मां ने खुशियां मनार्इं कि उनका बेटा नस्लभेदी गाली देने के आरोपों से मुक्त हो गया। शायद उनकी मां को इस गाली से आपत्ति नहीं हुई होगी, क्योंकि यह तो यहां के लोगों की जुबान पर आम है।

सिनेमा और टीवी वाले कहते हैं कि हम वही दिखाते और सुनाते हैं जो जनता चाहती है। क्या हम सचमुच वही देखना और सुनना चाहते हैं? हम सभ्यता के किस दौर में जी रहे हैं जहां खांसने और छींकने पर तोसॉरीबोलते हैं, लेकिन वीभत्सतम गालियां सुनने-सुनाने के बाद भी हमें कोई पछतावा नहीं होता?

(14 फरवरी को जनसत्ता में दुनिया मेरे आगे स्तंभ में प्रकाशित)