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Wednesday, 13 April 2016

आरएसएस-भाजपा: आंबेडकर से अनुराग का पाखंड





सन 2015 के नवंबर महीने में अपने ब्रिटेन दौरे के दौरान जब लंदन स्थित आंबेडकर हाउस का उद्घाटन नरेंद्र मोदी के हाथों के होने की खबर आई तो वहां के सबसे बड़े दलित संगठन 'कास्ट वाच यूके' के अलावा दूसरे दलित संगठनों ने भी सख्त आपत्ति जताई। 'कास्ट वाच यूके' ने अपने एक बयान में कहा कि भारतीय प्रधानमंत्री जिस तरह आंबेडकर की स्मृतियों को अपने राजनीतिक औजार की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं, वह घिनौना है और उन दलितों को भ्रमित करने की कोशिश है जो आज भारत में अपने मानवाधिकारों के लिए जंग लड़ रहे हैं और ब्रिटेन में भी बराबरी के लिए अपनी मांग को सशक्त तरीके से दर्ज कर रहे हैं।

यह बयान अपने आप में यह बताने के लिए काफी है कि अभी भी बाबा साहेब आंबेडकर के दर्शन से खौफ खाने वाली और वास्तव में उसे अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानने वाली आरएसएस-भाजपा के लिए आज आंबेडकर क्यों प्रिय होते दिख रहे हैं। यहां 'दिख रहे हैं' का इस्तेमाल जानबूझ कर किया गया है, क्योंकि 'दिखने' और 'होने' में कई बार बड़ा फासला होता है। ब्रिटेन में आंबेडकर हाउस का उद्घाटन करने से पहले महाराष्ट्र में भाजपा की सरकार बनने के बाद वहां आंबेडकर स्मृति स्थल निर्माण की प्रक्रिया शुरू हुई। लेकिन भाजपा को कुछ समय पहले ही यह अंदाजा हो गया था कि आने वाले दौर की सामाजिक राजनीति की दिशा कैसे तय होगी। इसलिए लोकसभा चुनावों के पहले से ही खालिस ब्राह्मणवादी राजनीति करने की अभ्यस्त आरएसएस और उसके सहयोगी संगठनों की जमीनी गतिविधियों में आंबेडकर, ज्योतिबा फुले आदि दलित प्रतीक शख्सियतों की तस्वीरें आ गई थीं। खासतौर पर आंबेडकर का नाम भाजपा ने ऐसे ढोना शुरू किया गोया कि वह अपने गोलवलकर के दर्शन से हार गई हो।

लेकिन सच यह नहीं था। पिछले दो-तीन दशकों के दौरान हुई राजनीतिक उठा-पटक ने एक तरह से अगले कुछ दशकों की राजनीति की दिशा कर दी है। यों चेतना और जागरूकता की दिशा तो जाति से मुक्त व्यवस्था की ओर होनी चाहिए, लेकिन फिलहाल जितना भी हुआ है, उसमें ऐतिहासिक तौर पर नाइंसाफी के शिकार सामाजिक तबकों ने अपने लिए न्याय की मांग करनी शुरू कर दी और इसे अपने हक की तरह देखा। यही आवाज आज दलित-वंचित तबके की ओर से लगातार उठते हुए राजनीति और समाज-व्यवस्था के सामने एक जबर्दस्त दखल बन चुकी है। अब चाह कर भी कोई राजनीतिक दल या समूह ऐतिहासिक रूप से सामाजिक वर्चस्व बनाए रखने वाले समूहों-जातियों की खुली पैरोकारी नहीं कर सकता है।

यही वजह है कि दलित-वंचित जातियों के लगातार बढ़ते एसर्शन और इस वर्ग की राजनीतिक उपयोगिता को देखते हुए इसे 'कोऑप्ट' करने या खुद में समा लेने की जो होड़ चली, उसमें आरएसएस और भाजपा ने प्रतीकों का सबसे ज्यादा और निर्लज्जता से इस्तेमाल किया है। आंबेडकर को अपने एक आदर्श-पुरुष के रूप में प्रचारित करने के पीछे मकसद सिर्फ दलित-वंचित तबकों को अपने मत-समूह के रूप में आकर्षित करना है। दरअसल, पिछले तीन-चार दशकों के दौरान इन वर्गों के बीच कई वजहों से हुए सामाजिक सशक्तीकरण ने इनकी चेतना को भी सशक्त किया है और अब वे अपने लिए कोई मेहरबानी नहीं, अधिकार मांग रहे हैं।

भारत का समाज यों भी प्रतीकों में जीने वाला, प्रतीकों से ताकत हासिल करने वाला समाज रहा है। अब चूंकि ये प्रतीक राजनीतिक अर्थों में अपनी अहमियत स्थापित करने और सत्ता में भागीदारी के लिए अहम औजार या संघर्ष के हथियार के तौर पर उपयोग हो रहे हैं, इसलिए आरएसएस-भाजपा ने भी इन प्रतीकों को अपनी राजनीति में शामिल कर लिया है। वरना आंबेडकर के रूप में जिस प्रतीक को वह आज अपनी राजनीति के लिए इस्तेमाल करना चाह रही है या कर रही है, वही आंबेडकर आरएसएस की राजनीति के प्रस्थान-बिंदु के सबसे खिलाफ हैं। बल्कि कायदे से कहें तो आंबेडकर अपने विचार और अपने समग्र प्रतीक के रूप में जिस समाज और व्यवस्था की पैरोकारी करते हैं, उसके लिए आंदोलन करते हैं, वह आरएसएस के सपनों के समाज के बरक्स है, खिलाफ है, बराबरी और सम्मान पर आधारित एक नई दुनिया की योजना है।

हम सिर्फ कल्पना कर सकते हैं कि आंबेडकर ने जब ब्राह्मण-धर्म से पूरी तरह मुक्ति की बात की, तब आरएसएस के दिल पर क्या गुजरी होगी! लेकिन जिस आरएसएस के लिए ब्राह्मण-धर्म का पुनरोत्थान और उसकी स्थापना आज भी मूल मकसद है, उसके राजनीतिक मोर्चे पर आंबेडकर को खड़ा किया गया है। क्या यह समझना इतना मुश्किल है कि हिंदू कहे जाने वाले ब्राह्मण-धर्म के तहत जीने-मरने वाले समाज के जिस हिस्से यानी दलित-पिछड़ी जातियों पर उसे फिर से कब्जा चाहिए तो उसके लिए आंबेडकर से बेहतर 'राजनीतिक हथियार' और कुछ नहीं हो सकता? मगर दिलचस्प यह है कि आंबेडकर का झंडा आगे करने के बावजूद आरएसएस ने अब तक शायद यह कहीं और कभी नहीं कहा कि हम हिंदुत्व के ढांचे से ब्राह्मणों का वर्चस्व खत्म करेंगे, फिर जाति-व्यवस्था का जड़-मूल से नाश करेंगे। और अगर जाति-व्यवस्था को बनाए रखते हुए या इसे मजबूत करते हुए आरएसएस-भाजपा आंबेडकर को अपने हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर दलित-पिछड़ी जातियों को अपनी ओर लुभाने की कोशिश कर रही है तो वह एक बार फिर किस सामाजिक व्यवस्था की दीवारों और जंजीरों को मजबूत करने की फिराक में है?

यों राजनीतिक और स्वाभाविक रूप से आंबेडकर के प्रतीक और विचार से आरएसएस-भाजपा की सीधे-सीधे दुश्मनी बनी रहनी चाहिए। मुख्य वजह है आंबेडकर के स्थायी विचार। हिंदुत्व के बारे में अपने वक्तव्य 'जाति का उन्मूलन' में आंबेडकर कहते हैं- "हमें यह मानना होगा कि हिंदू समाज एक मिथक है। 'हिंदू' नाम ही विदेशी है। मुसलमानों ने यहां के निवासियों से अपनी अलग पहचान बनाने की गरज से इन्हें हिंदू नाम दिया। ...उन्होंने कभी एक सामान्य नाम की आवश्यकता नहीं समझी, क्योंकि अपने को एक समुदाय के रूप में बांधने की अवधारणा उनके पास थी ही नहीं। इस प्रकार से हिंदू समाज का कोई अस्तित्व नहीं है। यह तो जातियों का समूह मात्र है। हरेक जाति अपने अस्तित्व के प्रति सचेत है। इनका अस्तित्व जाति-व्यवस्था के जारी रहने का कुल परिणाम है। जातियां एक संघ भी नहीं बनातीं। कोई जाति दूसरी जातियों से जुड़ने की भी भावना नहीं रखती, सिर्फ हिंदू-मुसलिम दंगे के समय ये आपस में जुड़ती हैं। ...हरेक जाति केवल आपस में विवाह करती है। ...वास्तव में एक आदर्श हिंदू, बिल में रहने वाले उस चूहे की तरह है, जो अन्य लोगों (चूहों) के संपर्क में नहीं आना चाहता।

...हिंदुओं में सामूहिक चेतना की भारी कमी पाई जाती है। ...प्रत्येक हिंदू में जो चेतना होती है, वह अपनी जाति के लिए है। इसी कारण से यह नहीं कहा जा सकता कि ये एक समाज या राष्ट्र बनाते हैं। फिर भी ऐसे काफी भारतीय हैं जिनकी देशभक्ति उन्हें यह मानने की स्वीकृति नहीं देती कि भारत एक राष्ट्र नहीं है, बल्कि यह केवल असंगठित लोगों की भीड़ है।"


यानी बाबा साहेब आंबेडकर ने हिंदुत्व के नाम पर ब्राह्मणवाद के जिस ढांचे पर इतना तीखा सवाल उठाया और उसे ध्वस्त करने का आह्वान किया, उसी को बनाए रखने की राजनीति करने वाले समूह आज बाबा साहेब आंबेडकर को अपना राजनीतिक हथियार बना रहे हैं। जाहिर है, इसके पीछे एक गहरी साजिश है।

न सिर्फ राजनीतिक तौर पर, बल्कि आंबेडकर-पथ पर चलने वालों के समूचे समुदाय में घुस कर पहले उसे अपने असर में लेना, फिर धीरे-धीरे ब्राह्मण धर्म का गुलाम बने रहने पर मजबूर कर देना। बौद्ध धर्म से लेकर तमाम ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं कि ब्राह्मणवाद के बरक्स जैसे ही कोई ऐसा ध्रुव खड़ा होता हो जो इसकी समूची व्यवस्था को खत्म करने की ताकत रखता हो, एक नई व्यवस्था और समाज रच देने की क्षमता रखता हो, और ब्राह्मणवाद उससे सीधे निपट सकने की क्षमता नहीं रखता तो वह उसमें चुपके से सुनियोजित तरीके से घुसना शुरू कर देता है। उसके बाद किसी भी मत या विचारधारा का क्या हुआ है, यह किसी से छिपा नहीं है। यह बेवजह नहीं है कि सबसे प्रगतिशील विचारधारा तक पर ब्राह्मणवाद बरतने के आरोप लगाने में मुश्किल नहीं होती।

लेकिन एक लंबे दौर में हुआ यह है कि ब्राह्मणवाद के बरक्स खड़े संघर्षों के बीच में उसकी इस चाल की एक राजनीतिक प्रवृत्ति के तौर पर पहचान कर ली गई और इसी असलियत का परदाफाश होना ब्राह्मणवाद के लिए परेशानी का सबसे बड़ा कारण है। आज उसे अपने असली एजेंडे को जमीन पर उतारना इसीलिए थोड़ा मुश्किल होगा कि 'हिंदुत्व' नाम के एक बड़े पहचान के बरक्स इसके ढांचे में छोटी पहचानें भी संघर्ष के लिए खड़ी हुईं और अपनी सामाजिक अवस्थिति के कारकों को सामने रख कर सवालों का जवाब मांगने लगीं। और चूंकि दलित-वंचित तबकों के लिए कभी समझौता नहीं करने और ब्राह्मणवाद की परतों को उघाड़ कर सम्मान, गरिमा और स्वाभिमान के समाज का सपना देने वाले आंबेडकर का मॉडल अब सामने है, इसलिए आरएसएस-भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती भी। आज अगर आरएसएस-भाजपा आंबेडकर को अपने माथे पर उठाए दिखने की कोशिश कर रही है तो उसकी मजबूरी यही है। अगर हिंदू कहे जाने वाले समाज में सबसे निचले तबके के तौर पर शुमार दलित-पिछड़े तबके किसी तरह ब्राह्मणवाद के ढांचे से छिटकने लगे तो आरएसएस के सपनों के समाज पर संकट आएगा।

लेकिन इस हकीकत के बावजूद आरएसएस कभी-कभी अपने भीतर के सच को पूरी तरह ढक नहीं पाता। बिहार विधानसभा चुनाव के पहले आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने जिस तरह सामाजिक यानी जाति के आधार पर मौजूदा आरक्षण-व्यवस्था पर पुनर्विचार करने का खयाल जाहिर किया, वह उसी मूल का सबूत है। हालांकि इस आरक्षण को खत्म करने का विचार आरएसएस का नया नहीं है, लेकिन भागवत के बयान के बहाने इस पर पर्याप्त बहस हुई और एक तरह से आरएसएस और भाजपा दोनों ही इस मसले पर फंसे हुए दिखे। जाहिर है, आंबेडकर के प्रतीक को अपनी राजनीति बनाना और आरक्षण का विरोध, दोनों एक साथ नहीं चल सकते। लेकिन फिर भी क्या वजह है कि आरएसएस-भाजपा आज आंबेडकर से प्रेम दर्शाने और उसे स्वीकार किए जाने का गुहार लगा रही है?

जबकि आरएसएस-भाजपा इस बात से अनभिज्ञ नहीं होगी कि हिंदू धर्म के बारे में आंबेडकर ने कितना कुछ कहा है। मसलन, अपनी पुस्तक 'दलित वर्ग को धर्मांतरण की आवश्यकता क्यों है' में उन्होंने हिंदू धर्म को लेकर काफी सख्त बातें की थीं- "यदि आपको इंसानियत से मुहब्बत है तो धर्मांतरण करो। हिंदू धर्म का त्याग करो। तमाम दलित अछूतों की सदियों से गुलाम रखे गए वर्ग की मुक्ति के लिए एकता, संगठन, करना हो तो धर्मांतरण करो। समता प्राप्त करनी है तो धर्मांतरण करो। आजादी प्राप्त करनी है तो धर्मांतरण करो। अपने जीवन की सफलता चाहते हो तो धर्मांतरण करो। मानवी सुख चाहते हो तो धर्मांतरण करो। ...हिन्दू धर्म को त्यागने में ही तमाम दलित, पददलित, अछूत, शोषित पीड़ित वर्ग का वास्तविक हित है, यह मेरा स्पष्ट मत बन चुका है।"

इसके अलावा, 'जाति के उन्मूलन' में वे आरएसएस के हिंदुत्व के बारे में साफ कहते हैं कि "...हिंदू जिसे धर्म कहते हैं, वह कुछ और नहीं, आदेशों और प्रतिबंधों की भीड़ है। ...अगर आपको हिंदू समाज में जाति-प्रथा के खिलाफ लड़ना है तो आपको तर्क न मानने वाले और नैतिकता को नकारने वाले वेदों और शास्त्रों को बारूद से उड़ा देना होगा। श्रुति और स्मृति के धर्म को खत्म करना होगा। इसके अलावा, कुछ और करना लाभदायक नहीं होगा। इस मामले में मेरा मत यही है।" (जाति का उन्मूलन से।)

तो जो आंबेडकर हिंदुत्व और स्पष्ट कहें तो ब्राह्मणवाद के खिलाफ एक ठोस योजना देते हैं, वेदों और शात्रों को बारूद से उड़ा देने की बात करते हैं, वे आंबेडकर हिंदुत्व और सच कहें तो ब्राह्मणवाद की राजनीति करने वालों के लिए अचानक कैसे प्रिय हो गए? बात फिर वहीं घूम कर आती है कि आरएसएस को बहुत अच्छे से मालूम है कि पिछले सौ सालों के दौरान जो सामाजिक आलोड़न हुए हैं, उसमें ब्राह्मणवाद की कुर्सी के पाए थोड़े हिले हैं, दलित-वंचित तबके ने सामाजिक साजिशों की पहचान की है।

बहरहाल, इन सब सच्चाइयों के बरक्स चौदह अप्रैल, 2015 यानी आंबेडकर के जन्मदिवस के मौके पर भाजपा-आरएसएस ने आंबेडकर को राष्ट्रवादी और हिंदुत्व के तौर पर पेश करना चाहा। लेकिन यह वही भाजपा-आरएसएस है, जिसके सदस्य रहते हुए अरुण शौरी ने कुछ साल पहले अपनी किताब 'वर्शिपिंग फॉल्स गॉड' में आंबेडकर के खिलाफ अधिकतम जहर फैला दिया था... बेलगाम भाषा में आंबेडकर की शख्सियत को ध्वस्त करने में लगे थे और भाजपा-आरएसएस बल्लियों उछल कर उस किताब को आंबेडकर के खिलाफ हथियार बना रही थी। सवाल है कि उसकी नजर में आंबेडकर आज राष्ट्रवाद के प्रणेता कैसे हो गए! 
आंबेडकर के 'राष्ट्रवाद' का अंदाजा इससे लगा सकते हैं कि आंबेडकर ने राष्ट्रवाद की हकीकत यह बयान की कि "मजदूरों के सबसे गंभीर विरोधी निश्चित ही राष्ट्रवादी हैं। ...मजदूरों को चाहिए कि वे राजनीति के रूपांतरण और पुनर्निर्माण के जरिए लोगों के जीवन में लगातार नई जान फूंकने पर जोर दें। अगर जीवन के इस पुनर्निर्माण और पुनर्गठन के रास्ते में राष्ट्रवाद बाधा बन कर खड़ा होता है तब मजदूरों को चाहिए कि वह राष्ट्रवाद को खारिज कर दे...!"

जाहिर है, आंबेडकर दरअसल, आरएसएस-भाजपा के समूचे सियासी एजेंडे के खिलाफ खड़े होते हैं। लेकिन अब यह समझना मुश्किल नहीं होना चाहिए कि जब एक विचार और व्यवस्था के रूप में आंबेडकर के दबाव को हिंदुत्व की राजनीति अपने तमाम धतकरमों के बावजूद रोक सकने में सक्षम नहीं हुई तो अब वह आंबेडकर को ही अपना मोहरा बनाने की फिराक में है। यह न सिर्फ आंबेडकर के खिलाफ एक साजिश है, बल्कि हाशिये के या वंचित वर्गों के जितने भी लोगों या समाजों ने आंबेडकर से चेतना और ताकत हासिल की और अब भाजपा-आरएसएस की ब्राह्मणवादी राजनीति की झांसे में नहीं आ रहे हैं, उनके सामने यह एक नया भ्रम परोसने का खेल है।

Saturday, 21 June 2014

ध्रुवीकरण की राजनीति में गुम अस्मिताएं






नरेंद्र मोदी के देश के प्रधानमंत्री के रूप शपथ-ग्रहण के बाद अब शायद यह कहना अप्रासंगिक होगा कि खुद भाजपा को भी इतनी सशक्त जीत की उम्मीद नहीं थी। इसके बावजूद अगर भाजपा ने चुनावों से पहले से ही खुद को एक तरह से जीते हुए पक्ष के रूप में पेश करना शुरू कर दिया था तो इसकी क्या वजहें रही होंगी, सोचने का मसला यह है। सवाल है कि आखिर भाजपा किस भरोसे यह दावा कर रही थी। क्या वह इस बात को लेकर आश्वस्त थी कि सियासी शतरंज पर उसने जो बिसात बिछाई है, उसमें नतीजे उम्मीद के हिसाब से ही आएंगे? वह बिसात बिछाते हुए आरएसएस या भाजपा ने किन-किन चुनौतियों को ध्यान में रखा और उसके बरक्स कौन-से मोर्चे मजबूत किए? उसके सामने चुनौतियों की शक्ल में जितनी भी राजनीतिक ताकतें थीं, उनके लिए यह अंदाजा लगाना क्या इतना मुश्किल था कि वे आरएसएस की चालों को भांप तक नहीं पाए? आम अवाम के पैमाने पर क्या ऐसा किया गया कि अब तक भाजपा के लिए चुनौती रहा एक साधारण वोटर एक खास तरह के "हिप्नोटिज्म" की जद में आकर भाजपा के पाले में जा खड़ा हुआ? क्यों ऐसा हुआ कि यह सब विकास लगभग बिना किसी सवाल या रोकटोक के अपने अंजाम तक पहुंचा?

इसी जगह पर जवाब की तरह यह सवाल सामने आता है कि भारत जैसे देश में सामाजिक विकास फिलहाल जिस पायदान पर है, उसमें उसे अपने पक्ष में खड़ा करने के लिए आखिर कौन-कौन से रास्ते अख्तियार किए जाने चाहिए? इस सवाल से अब तक सबसे बेहतर तरीके से कांग्रेस निपटती आई है। अब शायद यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि आज भाजपा जिस बुनियाद पर अपना महल खड़ा कर सकी है, वह बुनियादी तौर पर कांग्रेस की ही तैयार की हुई है। क्या वजह है कि आजादी के बाद लगभग पूरे समय सत्ता में रहते हुए भी उसने आम जनता की समझदारी को मूल्यांकन या विश्लेषण आधारित बनाने की अपनी जिम्मेदारी की आपराधिक स्तर की न केवल अनदेखी की, बल्कि संवैधानिक तकाजों को भी ताक पर रखते हुए उसने यथास्थितिवाद की जमीन को और मजबूत ही किया? यह यथास्थितिवाद आखिर किस खास व्यवस्था के लिए खाद-पानी का काम कर सकता है, करता रहा है? यह समझने के लिए कोई बहुत ज्यादा मंथन करने की जरूरत शायद नहीं है कि कांग्रेस ने जिस खेल की जमीन तैयार की थी, उसमें भाजपा एक ज्यादा ताकतवर खिलाड़ी के रूप में इस बार सामने आई है। और पता नहीं, यह रिवायत किन हालात में शुरू हुई होगी कि अकेले भारत में नहीं, शायद समूची दुनिया की आम जनता आखिर विजेता के पक्ष में खड़ी होती है, बिना इस बात पर विचार किए कि युद्ध में किसने किसी को पराजित करने के लिए कौन-सा तरीका आजमाया।

अपने पिछले दो शासनकाल में कांग्रेस ने जिस घनघोर स्तर पर सबसे जरूरतमंद वर्गों की उपेक्षा की, उन्हीं आस्थाओं का नरम कारोबार किया, जिस पर भाजपा एक स्पष्ट चेहरे के साथ लोगों के सामने थी, वैसी हालत में अभाव में मरते-जीते लोगों को उनके ‘मूल’ और उनकी ‘परंपरागत’ भावनाओं और सपनों का पोषण करके बड़ी आसानी से अपने पक्ष में किया जा सकता था। यों सपनों को जमीन पर उतारना और जीवन की भूख का हल करना इस देश की किसी भी राजनीतिक पार्टी की जवाबदेहियों-जिम्मेदारियों में शामिल नहीं रहा है। पिछली बार मजबूरी में वामपंथी दलों के सहयोग के चलते उसने जनता के सामने अपने सरोकार की सरकार का दावा किया भी था, लेकिन इस बार सच यही रहा कि कुल मिला कर अपने बीते एक दशक के रिकार्ड के हिसाब से कांग्रेस जनता के सामने यह पांसा भी फेंक सकने की हालत में नहीं थी। दूसरी ओर, उसकी मुख्य प्रतिद्वंद्वी के रूप में भाजपा के पास ‘जड़ों' की खुराक भी थी और अभाव में पलते समाज के सामने ‘विकास’ के मिथकों से लैस सपने भी थे। इससे भी ज्यादा महत्त्वपूर्ण यह कि इन दोनों हथियारों के बेहतर इस्तेमाल के लिए उसके पास एक सुचिंतित तंत्र भी था जो एक ओर आरएसएस के स्वयंसेवकों के रूप में तमाम परंपरागत अवधारणाओं के औजार से लोगों के ‘मूल’ को ‘जगा’ रहा था, तो दूसरी ओर अपने कार्यकर्ताओं से लेकर मीडिया के रूप में उसे हर स्तर पर बने-बनाए कार्यकर्ता मिल गए थे, जो दिन-रात उसकी खेत की सिंचाई कर रहे थे। नतीजा सामने है।

सवाल है कि भाजपा के बरक्स जितनी भी राजनीतिक ताकतें थीं, क्या उन्हें इस बात का अंदाजा नहीं था कि उनका समर्थक वर्ग जिस समाज का हिस्सा है, पिछले दो-ढाई दशकों के दौरान सचेत तौर पर उसकी चेतना में किन-किन तरीकों से किस तरह की व्यवस्था घोल दी गई है? वह व्यवस्था ज्यादातर लोगों के लिए एक नियति की तरह है, जिस पर वे सोचना नहीं चाहते। किसी भी राजनीतिक पार्टी ने शहरों से लेकर दूरदराज के इलाकों तक में छोटे-बड़े जागरण टाइप के उन धार्मिक आयोजनों या पूजा-पाठ की सार्वजनिक गतिविधियों पर गौर करना जरूरी नहीं समझा, जिसके जरिए समाज के हिंदू मानस को तुष्ट किया गया, उसके राजनीतिक दायरे को लगातार छोटा करके एक केंद्र में समेटने की कोशिश की गई, सांप्रदायीकरण किया गया और इस तरह आखिरकार ध्रुवीकरण की राजनीति की जमीन तैयार हुई। यह ध्रुवीकरण बहुत छोटी-छोटी बातों से सक्रिय की जा सकती थी। सामाजिक चेतना के बरक्स धार्मिक चेतना को खड़ा करके उस पर हावी करने के लिए आस्था को बतौर हथियार इस्तेमाल किया गया और उसका सबसे आसाना जरिया रहा नरेंद्र मोदी के रूप में एक प्रतीक को उसी "तैयार की गई" जनता के सामने खड़ा कर देना। ये नरेंद्र मोदी "गुजरात-2002" की छवि वाले मोदी थे, जो एक आम हिंदू मानस को सहलाता है। इसमें आरएसएस पूरी तरह कामयाब रहा।

धर्मनिरपेक्ष और सामाजिक न्याय की राजनीति करने वालों के सामने इस जटिल चुनौती से निपटने का क्या कोई रास्ता नहीं था? जब अपने ही राजनीतिक आदर्शों को ताक पर रख दिया जाता है तब ऐसे हालात का सामना एक स्वाभाविक परिणति होती थी।

मैदान में खड़ा होकर सामने करने का एकमात्र रास्ता था कि शासक अस्मिताओं के बरक्स शासित अस्मिताओं को सीधे संबोधित किया जाए। इसके कामयाब प्रयोग का उदाहरण बहुत पुराना नहीं है। करीब ढाई दशक पहले जब मंडल आयोग की रिपोर्ट पर अमल की घोषणा हुई तो उसके बाद यह हुआ भी। तभी पहली बार यह लगा कि एक सहज-सी दिखने वाली व्यवस्था के जरिए जिस यथास्थितिवाद का पालन-पोषण होता आ रहा था, उसकी परतों के नीचे कितने विद्रूप पल रहे हैं।

उसी दौर में मंडल आंदोलन ने शासित सामाजिक वर्गों की अस्मिता की लड़ाई के जरिए एक ऐसे नेतृत्व वर्ग की शृंखला खड़ी की, जो पहले से चली आ रही शासन और समाज व्यवस्था के ढांचे में सीधे-सीधे तोड़-फोड़ थी। इसका अहसास उसी समय सत्ताधारी तबकों को हो गया था और प्रतिक्रिया भी बहुत तीखी शक्ल में सामने आई थी, लेकिन वह बाद में बहुत सोच-समझ कर किसी दीर्घकालिक योजना का हिस्सा साबित हुई। तब मेरिट की शक्ल में आसानी से "पॉपुलर" होने वाले जुमलों से लैस सवाल उछाले गए, आरक्षण के खिलाफ आत्मदाही ‘आंदोलन’ या दूसरे प्रतिगामी प्रचारों से जब काम नहीं चलता लगा तब लालकृष्ण आडवाणी की ‘रथयात्रा’ चल पड़ी, जिसने शासित अस्मिताओं के उभार को रोकने और आखिरकार इस चुनाव में अपने हिंदू अस्मिता में समाहित कर लेने में कामयाबी हासिल कर ली। आरएसएस और भाजपा को इस "प्रोजेक्ट" को ताजा निष्कर्ष तक लाने में महज सवा दो या ढाई दशक का वक्त लगा।

जिन अस्मिताओं से हिंदुत्व के मूल ढांचे को नुकसान हो सकता था, उनके बीच से कुछ हिम्मती चेहरे सामने तो आए, लेकिन एक ओर सत्ता और तंत्र के बीच फर्क समझ सकने में नाकामी और अदूरदर्शिता के साथ-साथ दूसरी ओर इनके बीच से ही कुछ स्वार्थी, महत्त्वाकांक्षी और अवसरवादी तत्त्वों ने सत्ता में पहुंचने के लिए उस समूचे आंदोलन का बेड़ा गर्क करने में अपनी पूरी भूमिका निबाही। अस्मिता के संघर्ष का मकसद जहां इसके जरिए ऐतिहासिक रूप से छीने गए अधिकारों को हासिल करके भेदभाव पर आधारित एक व्यापक पहचान, यानी हिंदुत्व के ढांचे को तोड़ना था, वहां अस्मिता ही राजनीति का एक हथियार बन गया।  ऐसी स्थिति में जो होना था, वही हुआ। संघर्ष मुक्ति के लिए होना था, लेकिन उसने अपने लिए ऐसे दायरे पैदा किए, जिसके भीतर ही उसे गोल-गोल घूमना था। जबकि मकसद उसी दायरे को तोड़ कर आगे का रास्ता अख्तियार करना होना चाहिए था। क्या इस दायरे की दीवार इतनी मजबूत है कि उससे पार न पाया जा सके? यह शायद आखिरी सच नहीं है। लेकिन किसी दबाव से उपजे संघर्ष की दिशा कई बार भ्रम का शिकार हो जाती है। जबकि यही संघर्ष अगर किसी सुचिंतित योजना का हिस्सा हो तो नई व्यवस्था की जमीन तैयार कर सकता है।

जाति की अस्मिता धर्म की व्यापक अस्मिता के दायरे के भीतर की चीज थी। इसलिए जब अधिकारों के लिए खड़ी हुई अस्मिताएं संघर्ष का रास्ता छोड़ कर वैचारिक रूप से भी जातिगत दायरे में सिमटने लगीं तो ऐसे में उस पर उसकी व्यापक अस्मिता का हावी होना लाजिमी था। हिंदुत्व की व्यवस्था चलाने वाले एक सक्षम समूह के रूप में आरएसएस को यह बहुत अच्छे से मालूम है कि अगर उसकी व्यवस्था के मूल ढांचे को खतरा हो तो उसे समान हथियार से ही वापस मोड़ा जा सकता है। तो जिस तरह सामाजिक वंचना के नतीजे में छीने गए अधिकारों को हासिल करने के लिए जाति की अस्मिता आंदोलन की शक्ल में खड़ी हुई, उसी जाति को मंडल आयोग की सिफारिशें लागू होने के बाद आरक्षण विरोधी आंदोलन के साए में आरएसएस ने उसकी व्यापक अस्मिता, यानी हिंदुत्व में समाहित करने के लिए रथयात्रा से अपना अभियान शुरू किया और फिर गुजरात जनसंहार से लेकर हिंदू-मुसलिम तनाव को एक मुद्दे के रूप में जिंदा रखने की कामयाब कोशिश की।

लेकिन यह अगर आरएसएस की राजनीति का प्रत्यक्ष और हावी पहलू रहता तो देश से लेकर दुनिया भर में यह साबित करना मुश्किल होता कि उनकी यह राजनीति ‘प्रतिगामी’ नहीं है। इसलिए गुजरात जनसंहार के बाद कट्टर हिंदुत्व के नायक के चेहरे के रूप में उभरे नरेंद्र मोदी नेतृत्व में ही विकास के ‘गुजरात मॉडल’ का मिथक खड़ा किया गया, ठीक उसी तरह जिस तरह धर्म और पारलौकिक मिथकों के सहारे सामाजिक सत्ताएं अपना शासन बनाए रखती हैं, शासित तबकों के सोचने-समझने, विश्लेषण करने के दरवाजों को बंद रखती हैं।

इन सबको जमीनी स्तर पर पहुंचाने के लिए जहां आरएसएस के पास अपने स्वयंसेवक थे, वहीं इस सामाजिक सत्ता-तंत्र में पहले से ही एक ‘इम्यून सिस्टम’ की तरह काम करने वाले वाचाल तंत्र को सिर्फ शह की जरूरत थी। इसके अलावा, आज दूरदराज के इलाकों तक अपनी मजबूत पहुंच और दखल बना चुके मीडिया ने अपने सामाजिक ढांचे और कारोबारी क्षमता का अपूर्व प्रदर्शन करते हुए आरएसएस की तमाम परोक्ष कवायदों को स्थापना दी। मूल तत्त्व हिंदुत्व की व्यापक अस्मिता में जातीय अस्मिताओं को समाहित करना था, लेकिन उस पर विकास के ‘गुजरात मॉडल’ की चमकीली चादर टांग दी गई। यानी ‘प्रतिगामी’ होने के तमाम आरोप अब ‘अग्रगामी’ संदेशों में तब्दील हो गए। इसके बाद इस ढांचे से लड़ने की चुनौती इस रूप में खड़ी हुई कि अस्मिता के संघर्ष को राजनीति में झोंकने वालों की जमीन खिसक गई और उस पर हिंदुत्व की अस्मिता का महल खड़ा हो गया।

इसलिए कम से कम यह न कहा जाए कि लोकसभा चुनावों में भाजपा की जीत ने साबित किया है कि जाति की राजनीति खत्म हो गई। जाति या अस्मिता की राजनीति खत्म नहीं हुई। बल्कि वह ज्यादा बड़ी अस्मिता में विलीन हुई है और उसमें घुल-मिल जाने के बाद जो अस्मिता की राजनीति मुखर होगी, वह ज्यादा खतरनाक साबित होगी, जिसकी गाज आखिरकार वंचित और कमजोर जातियों पर ही गिरनी है। इस वंचना की सबसे बड़ी त्रासदी की तुलना पारलौकिक अंधविश्वासों में डूबी उस गुलाम चेतना से लैस समाज के अंत से की जा सकती है जिसमें कोई व्यक्ति कुछ मनचाहे की कामना पूरी होने के लालच में किसी पत्थर की मूर्ति के सामने हाथ जोड़ने के बाद अपने ही हाथों से अपनी गर्दन काट लेता है।

बहरहाल, भारतीय राजनीति में भारतीय जनता पार्टी के एक सक्षम सत्ताधारी ताकत के तौर पर उभरने के बाद अब इसके पीछे कॉरपोरेट, पूंजी-जगत, सत्ता-तंत्र, हजारों करोड़ रुपए खर्च कर तैयार की गई चुनावी ‘परियोजना’ के सूत्रधारों की खोज और व्याख्या की जाएगी और की जानी चाहिए। लेकिन भारत जैसे देश में आग्रहों-पूर्वाग्रहों-दुराग्रहों, भक्ति, व्यक्ति पूजा, प्रचार, अफवाहों पर मारने-मरने पर उतर जाने वाले समाज में एक अर्धविकसित मतदाता अगर दक्षिणपंथ के लिए अपना हाथ उठाता है तो यह किसी भी विकासमान समाज की नाकामी है। वह मतदाता विकास नहीं समझता। उसे विकास का ‘गुजरात मॉडल’ समझाया जाता है, जो दरअसल एक नफरत की एक अनदेखी बुनियाद पर खड़ा होता है। लेकिन उस अनदेखी बुनियाद पर परदा उतारने का जिम्मा आखिर किसका है?

अब चुनौती उन ताकतों के सामने है जो हिंदुत्व की मौजूदा धारा के खिलाफ एक तरह से व्यवस्था विरोधी प्रतीक के रूप में खड़े हुए थे, लेकिन बाद में उन्होंने भी नरम कार्ड खेलना शुरू किया था। बिना इस सच को समझे कि उनकी मूल ताकत और चुनौती क्या है और कौन है...! नब्बे के दशक में राजनीति की एक वैकल्पिक जमीन तैयार करने के साथ-साथ विचारधारा के स्तर पर व्यवस्था-विरोधी प्रतीक के रूप में देखे जाने वाले राजनीतिक समूहों के सामने अब खुद को बचाए रखने का सवाल सबसे अहम है। अगर वे पहचान सकें कि इस प्रतीक के रूप में उन पर कहीं व्यवस्था के एजेंट तो हावी नहीं है और उन्हें दूर करना उनका सबसे पहला मकसद होना चाहिए, तो शायद बचने-बढ़ने और एक विकल्प की उम्मीद को जमीन पर उतारा जा सकता है...!