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Wednesday, 15 June 2016

कैराना के झूठ के सहारे



साक्षी महाराज या साध्वी प्राची जैसे नफरत की आग उगलने वाले लोगों की बेलगाम बातों को अब तक भाजपा उनकी व्यक्तिगत राय बता कर दिखने के लिए खुद को दूर करती रही है। हालांकि अब सब जानते हैं कि ये बेलगाम हिंसक बयान किस राजनीति का हिस्सा हैं, लेकिन अब वह परदा भी उठ रहा है।

भाजपा के सांसद हुकुम सिंह की ओर से उठाए गए मुद्दे के बाद बाकायदा भाजपा अध्यक्ष की हैसियत से अमित शाह ने कहा कि 'उत्तर प्रदेश को कैराना की घटनाओं को हलके में नहीं लेना चाहिए, यह एक सदमे में डालने वाली घटना है... कैराना से (हिंदुओं का) भगाया जाना कोई साधारण घटना नहीं है!'

वे उस दिन भी सार्वजनिक रूप से यह कह रहे थे जब हुकुम सिंह की ओर से जारी लिस्ट की कलई खुल चुकी थी और कैराना के झूठ की खबरें चारों तरफ चलने लगी थीं। हालांकि भाजपा के लिए यह कोई नया 'प्रयोग' नहीं है, लेकिन अब शायद भाजपा ने तय कर लिया है कि उत्तर प्रदेश में सत्ता के लिए मैदान में उसकी भावी राजनीति क्या होगी! यानी कैराना के झूठ को बेशर्म तरीके से मुद्दा बनाने के साथ ही अब यह साफ हो गया लगता है कि भाजपा उत्तर प्रदेश के भावी विधानसभा चुनावों के मद्देनजर किस तरह का खेल खेलने जा रही है। हालांकि दादरी में मोहम्मद अख़लाक के मारे जाने के बावजूद अब नए सिरे से कथित फोरेंसिक जांच के बहाने कथित गोवंश के मांस का मुद्दा उठा कर वह यही करने की कोशिश में है। तो एक तरह से भाजपा ने मान लिया है कि उत्तर प्रदेश में सत्ता हासिल करने के लिए उसके पास अब शायद 'विकास' का जुमला भी नहीं रह गया है।

दरअसल, पिछले दो-ढाई दशक के दौरान सत्ता की उसकी राजनीति के केंद्र में यही अफवाह फैलाने या किसी भी रास्ते सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का फार्मूला रहा है। लेकिन केंद्र की सत्ता के लिए तात्कालिक तौर पर 'विकास' के जुमले का परदा ओढ़ा गया था। अपने इस जुमले के बारे में भाजपा खुद कितनी आश्वस्त है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि चुनावी जीत के लिए उसे अपने इस नारे पर भरोसा नहीं रह गया है। अपने नारे के प्रति ईमानदार नहीं रहना किसी भी व्यक्ति या समूह को इसी हालत में पहुंचा दे सकता है। सो, दो साल के भीतर-भीतर देश में इस कथित विकास के जुमले की हकीकत साधारण लोगों तक पहुंचने लगी है और इसमें खुद भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह ने पंद्रह लाख रुपए जैसे शिगूफों को जुमला घोषित कर मदद की।

दिक्कत यह भी है कि इस ओढ़े गए परदे के अलावा भाजपा के पास अपनी राजनीति के लिए सनातनी या हिंदुत्व की राजनीति के सिवा और क्या है, जिसके सहारे वह मैदान उतरे!

सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की तमाम कोशिशों के नाकाम हो जाने के बाद बिहार में 'विकास' के नारे की परीक्षा हो चुकी थी और लोग समझ चुके थे कि भाजपाई विकास का मतलब क्या होता है! इसलिए वहां बेहद बुरी हार के बाद भाजपा ने असम में अपने एजेंडे का खुला खेल खेला और जीत हासिल की। तो वही आदर्श लेकर अब वह उत्तर प्रदेश का मैदान आजमाने की फिराक में है।

थोड़ी राहत की बात यह जरूर है कि दो-तीन दिन के भीतर ही कुछ हलकों की ओर से कैराना के झूठ पर से परदा उठाने की कोशिश की गई और कैराना का खुला भाजपाई फर्जीवाड़ा अब सामने है। सवाल है कि कैराना से कथित तौर पर भगाए लोगों की लिस्ट में से कई लोग जब खुद कह रहे हैं कि उनके साथ ऐसा कुछ नहीं हुआ, यह लिस्ट फर्जी है, मनगढ़ंत है, तब भी सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष की हैसियत से अमित शाह 'कैराना से हिंदुओं के निकाले जाने' पर क्यों 'चिंता' जता रहे हैं!

क्या अब भाजपा के पास चुनावी जीत के लिए यही रास्ता बच गया है? क्या भारत के इस लोकतंत्र और संविधान के उसूलों को वह ताक पर रख चुकी है? भारत में सत्ता पर काबिज जिस पार्टी के अध्यक्ष खुद झूठ के सहारे नफरत की राजनीति करने वालों को बढ़ावा दे रहे हों, प्रधानमंत्री को अपनी राजनीतिक पार्टी की इस तरह की गतिविधियों पर सख्ती से रोक लगाने की जरूरत नहीं पड़ रही हो, तो क्या यह भारत के संविधान और लोकतंत्र के तहत भारत में शासन करने की उसकी क्षमता पर सवालिया निशान है?

जिस तरह बहुत मामूली मुद्दों को भी सांप्रदायिक ध्रुवीकरण में तब्दील करने की कोशिश की जा रही है, उसका हासिल क्या होना है? देशभक्ति और देश की एकता के लिए मर-मिटने का आह्वान करने वाले ही शायद देश को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाते हैं!