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Sunday, 25 September 2016

PARCHED : स्त्रीवाद नहीं, लेकिन मर्दवाद के सिंह-आसन की चिंदी-चिंदी...!


मैं 'पिंक' की तुलना 'पार्च्ड' से इसलिए नहीं करना चाहता हूं कि 'पिंक' आखिरकार अपने उस एजेंडे के खिलाफ जाकर खड़ी हो जाती है, या ज्यादा उदार होकर कहें तो अपने ही एजेंडे को कमजोर कर देती है, जिसमें बुनियादी मकसद स्त्री को पुरुष-तंत्र और उसके मानस से स्वतंत्र और कहीं उसके बरक्स करना है। पितृसत्ता के खिलाफ लड़ाई की शुरुआत इसके बरक्स खड़ा होने से शुरू होगी, उसके आसरे में नहीं। फिर भी, 'पिंक' की अपनी अहमियत है।

बहरहाल, 'पार्च्ड' अपने उस एजेंडे में पूरी तरह कामयाब है, जिसमें स्त्री की जिंदगी, स्त्री के लिए, स्त्री के हाथों में और स्त्री के द्वारा तय होने की मंजिल तक पहुंचती है। हो सकता है कि 'पार्च्ड' की चारों स्त्रियों ने कथित मुख्यधारा के स्त्रीवाद का कोई आख्यान नहीं रचा हो, लेकिन कहीं उन्होंने मर्दवाद के भरोसे से बाहर खुद पर भरोसा किया, कहीं मर्दवाद को आईना दिखाया, कहीं मर्दवाद के बरक्स खड़े मर्द को स्वीकार किया तो कहीं मर्दवाद का मुंह तोड़ दिया। यानी यह कथित मुख्यधारा का स्त्रीवाद नहीं भी हो सकता है, लेकिन मर्दवाद के सिंहासन के पाए जरूर तोड़े।

दरअसल, 'पार्च्ड' में स्त्री की जमीनी हकीकतों का सामना जो स्त्रियां करती हैं, उन्होंने कोई क्रांति या स्त्रीवाद की पढ़ाई नहीं की है, लेकिन जहां उनके सामने 'आखिरी रास्ता' का चुनाव करने का विकल्प बचता है, वहां वे पुरुषवाद और पितृसत्ता की कुर्सी के पायों की चिंदी-चिंदी करके रख देती हैं। मुमकिन है, उसे स्त्रीवाद की क्लासिकी के दायरे में न गिना जाए। लेकिन स्त्री के अपनी जिंदगी को इसी सिरे से बरतने की पृष्ठभूमि में स्त्रीवाद की सैद्धांतिकी तैयार होती है।

लज्जो अपने 'बांझ' होने को तब तक मजाक बना कर जीती है और पति के हाथों यातना का शिकार होती है, जब तक बिजली उसे यह नहीं बताती कि 'बांझ' उसका पति भी हो सकता है। ('बोल'- जिसमें बेटी या बेटा होने के लिए मर्द जिम्मेदार है।) वह पति, जिसकी मर्दानगी हर अगले पल जागती है और उस वक्त तूफान की शक्ल अख्तियार कर लेती है, जब लज्जो उसे यह खबर देती है कि उसकी नौकरी पक्की हो गई है, नियमित पगार मिलेगी। इस पर उसके पति को अपनी 'जरूरत खत्म होने' के डर और मर्द अहं को ठेस लगने के दृश्य को जिस तरह फिल्माया गया है, वह केवल एक मर्द की नहीं, बल्कि समूचे पुरुषवाद की कुंठा का रूपक है। इसके अलावा, पति के मशीनी संवेदनहीन सेक्स और संतान पैदा करने की अक्षमता का दंश झेलते हुए बिजली के जरिए लज्जो जब एक बाबा के साथ सेक्स के जीवन-तत्व और सम्मान को जीती है और गर्भ लेकर पति को बताती है तो यह खबर पाते ही पति को जो सदमा लगता है, वह उसे खुद उसकी ही मर्दानगी के हमले की आग में जला डालता है।

लज्जो के चरित्र की व्याख्या मर्दवाद के केंद्र पर चोट करती है।

इधर पत्नी से ज्यादा रुचि दूसरी औरत में लेने वाले पति की मौत और अपने बेटे के बाल-विवाह के बाद रानी अपने लिए 'शाहरुख खान' के प्रेम की उम्मीद में खुश होती है। फिर बेटे के भी अपने पति की राह पर चले जाने के बाद बच्ची जैसी बहू के साथ खड़ी हो जाती है, उसे उसके प्रेमी के साथ किताब देकर विदा करती है।

जानकी ने बाल विवाह के बाद के जीवन से लेकर बलात्कार तक की त्रासदी को जिस तरह जीवंत किया है, अपने पति के भीतर के मर्द की मार से उपजी पीड़ा को जो भाव और अभिव्यक्ति दी है, वह हैरान करती है। भविष्य के लिए सिनेमा को एक बेहतरीन कलाकार मुबारक। 

और समाज की जुगुप्सा के हाशिये पर खड़ी, लेकिन मर्दानगी की अय्याशी के लिए जरूरी बिजली ने ऊपर की तीनों महिलाओं की आंखों को जिस तरह फाड़ कर खोला, लज्जो को बताया कि बच्चा होने या नहीं होने के लिए उसका पति भी जिम्मेदार हो सकता है... लज्जो के साथ-साथ रानी को भी बताया कि सेक्स का मतलब केवल शारीरिक नहीं, दिमागी-मानसिक स्तर पर भी चरम-सुख होना चाहिए... लज्जो, रानी और जानकी, तीनों को बताती है कि गालियां केवल औरतों के खिलाफ इसलिए होती हैं कि इन्हें मर्दों ने बनाया है तो वह एक गंभीर बागी लगती है। और जब परदे पर चारों महिलाओं के मुंह से एक साथ गालियां गूंज रही थीं, तो समूचे सिनेमा हॉल में मैं अकेला था जो ताली बजाने लगा! हालांकि मैं किसी भी तरह की गाली के खिलाफ अब भी हूं! देह-व्यापार की त्रासदी को जिस तरह बिजली में उतरता हुआ पाते हैं, वह शायद सबको हिला देगा। लेकिन अपनी बाकी तीनों दोस्तों यानी लज्जो, रानी और जानकी को जिंदगी का सपना भी वही यानी समाज के लिए घिनौनी एक वेश्या ही देती है।

'ये सारी गालियां मर्दों ने ही बनाई है...' 'मर्द बनने से पहले इंसान बन जा...' या 'देखता हूं, मर्द के बिना इस घर का काम कैसे चलता है..' जैसे कई डायलॉग तो सिर्फ बानगी हैं यह बताने के लिए कि फिल्मकार ने अपने एजेंडे को लेकर कितना काम किया है। खासतौर पर रानी का अपने किशोर बेटे को यह कहना कि 'मर्द बनने से पहले इंसान बन जा' उन तमाम आंदोलनों को आईना दिखाता है, जिसमें मर्दों से उनके सुधरने के लिए 'शास्त्रीय संगीत' के लहजे में स्त्री का सम्मान करने की फरियाद की जाती है...!

खैर, आजादी का एहसास करने फटफटिया पर बैठ कर निकल पड़ी तीनों या चारों महिलाएं जब नदी में निर्वस्त्र होकर नहाती हैं, तब वहां किसी कृष्ण के फटकने की जगह नहीं होती जो इन महिलाओं के कपड़े लेकर पेड़ पर भाग जाए! यानी हर अगले दृश्य में यह फिल्म मर्दवाद और पितृसत्ता के खिलाफ स्त्री के सपने को एक नया आयाम देती है। इस सपने को किसी भी पुरुष के भरोसे पूरा नहीं होना है। जानकी के चोर और अय्याश पति का भाग जाना है, जानकी को उसका प्रेम हासिल हो जाना है, जो जाते समय उसकी किताबें और थैला थामता है, लज्जो के पति का जिंदा जल जाना है और रानी के 'शाहरुख खान' का पीछे छूट जाना है। आखिर समाज और परंपरा की दी हुई शक्ल को नोच और फेंक कर नई शक्ल के साथ जब बिजली, रानी और लज्जो एक चौराहे पर खड़ी होकर इस सवाल का सामना करती हैं कि अब राइट जाएं या लेफ्ट, तो आखिर में जवाब आता है कि इस बार तो हम तीनों अपने दिल की सुनेंगे...!

यहां इन्हें बचाने या इनका उद्धार करने के लिए के लिए कोई पुरुष नायक नहीं आता, शहरों की पढ़ी-लिखी और इंपावर महिलाओं को अपनी लड़ाई के लिए किसी पुरुष हीरो की छांव की जरूरत होती होगी, लेकिन गांव की अनपढ़ और साधनहीन 'पार्च्ड' की तीनों स्त्रियां जब घर की दहलीज से निकल जाती हैं तो वे अपने आप पर भरोसे से लबरेज होती हैं, उन्हें किसी हीरो की तलाश नहीं होती, अगर कोई 'शाहरुख खान' हीरो होना भी चाहता है तो वे उसे भी पीछे छोड़ कर निकल जाती हैं।
इससे ज्यादा और साफ-साफ क्या कहा जा सकता था कि जिंदगी को जिंदगी तरह जीने की राह क्या हो सकती है..! गांव में कपड़े और वेशभूषा के हिसाब से ही दलित-वंचित परिवारों की महिलाओं को पहचान लिया जा सकता है। तो इनके जीवट का अंदाजा लगाना क्या इतना मुश्किल है...! इससे ज्यादा पहचानना हो तो बिजली (स्त्री) के लिए दलाली करने को तैयार 'राणा' और पहले से दलाली करते 'शर्मा-वर्मा' (पुरुष) की साफ घोषणा का आशय समझा जा सकता है। 'राणा' और 'शर्मा-वर्मा' का मतलब आज के दौर में अलग से समझाने की जरूरत नहीं पड़नी चाहिए।

बाकी टीवी, मोबाइल, स्थानीय कला को बेचने वाले एनजीओ वगैरह सिर्फ सहायक तत्त्व हैं। कहानी का केंद्र इनके सहारे नहीं, जानकी, बिजली, रानी और लज्जो के भरोसे टिका है।

पुनश्च-

एकः इस फिल्म में कमी के बिंदु मेरी निगाह में बस एक है- लज्जो के पति का घर में लगी आग में जलना और दूसरी ओर जश्न के तौर पर रावण के पुतले को जलाना। जब तीनों-चारों महिलाओं के नदी में निर्वस्त्र होकर नहाने के समय किसी कृष्ण को उनका कपड़ा लेकर पेड़ पर भाग जाने की कथा को खारिज किया गया, तो उसी सिरे से रावण-दहन से बचा जा सकता था, राम को भी कृष्ण की तरह खारिज किया जा सकता था।

दोः 'पार्च्ड' सिनेमा आखिर किसके लिए बनाई गई है, उसका दर्शक वर्ग कौन होगा? 'पिंक' जैसी फिल्में भी किसी पीवीआर के साथ-साथ 'रीगल' जैसे साधारण सिनेमा हॉल में भी लगी थीं। इसलिए 'पिंक' तक आभिजात्य और साधारण, दोनों तबके पहुंचे। जबकि 'पार्च्ड' कम से कम दिल्ली के पीवीआर या ऐसे ही और बहुत कम और बेहद महंगे सिनेमा हॉल में लगी है। अंदाजा लगाइए कि यह फिल्म किस तबके की कहानी कहती है और उस तक पहुंचने और मनोरंजन करने वाले लोग किस तबके के ज्यादा होते हैं।

बहरहाल, स्त्री और स्त्रीत्व से जुड़े मुद्दे पर फिल्म बनाते हुए शुजित सरकार और लीना यादव की फिल्मों ने बताया है कि एक ही विषय को डील करते हुए एक पुरुष और स्त्री की दृष्टि में कैसा और कितना फासला हो सकता है। पुरुष को साहस करना पड़ता है, इसलिए चीजें छूटेंगी या फिर गड़बड़ा जाएंगी, लेकिन स्त्री के पास अगर उसकी अपनी, अपने स्व की दृष्टि है तो उस गड़बड़ी को आमतौर पर संभाल लेगी। यह अंतर साफ करके सामने रखने के लिए लीना यादव से लेकर लहर खान तक को बहुत शुक्रिया...!

Monday, 23 May 2016

"बुद्धा इन ए ट्राफिक जाम" : सियासी परदे में किसका एजेंडा...!




'शहरी नक्सलवाद' का शिगूफ़ा..! 

देश के 'सबसे बड़े दुश्मनों' और 'सबसे बड़ी समस्याओं' से लड़ने के तरीके और उनसे पार पाने के 'रास्ते' अब वॉलीवुड के फिल्मकारों ने बताना शुरू कर दिया है! हालांकि सिनेमा के परदे पर 'उपदेश' तो पहले भी होते थे, लेकिन उन्हें 'फिल्मी' कह और मान कर माफ कर दिया जाता था! लेकिन अब फिल्में बाकायदा राजनीतिक एजेंडे के तहत दर्शकों को संबोधित करती हैं।

इस लिहाज से देखें तो 'बुद्धा इन ए ट्राफिक जाम' के निर्माता-निर्देशकों ने नक्सलवाद और सरकारी तंत्र के फंसे आदिवासियों की सभी तकलीफों या समस्याओं का हल निकाल लिया है, आदिवासियों के उद्धारकों की खोज कर ली है! यह उद्धारक है 'बिजनेस' और जाहिर है 'बिजनेसमैन' यह उद्धार करने के लिए अपने और आदिवासियों के बीच के सारे 'मिडिलमैन' यानी बिचौलिये को खत्म करना चाहता है!

परदे पर शुरुआती दो दृश्यों में पिछले डेढ़ दशक से एक हालत में अभाव की जिंदगी जीते एक निरीह, लाचार आदिवासी को सत्ता और नक्सलियों के बीच पिसने के 'मार्मिक' दृश्यों के जरिए हॉल में बैठे दर्शकों को सहानुभूति के सागर में गोते लगाने पर मजबूर किया जाता है, फिर 'लोक-स्पर्श' के गीत के जरिए बिजनेस मैनेजमेंट की पढ़ाई कराने वाले आधुनिक लड़के-लड़कियों को अपना 'सरोकार' जताते दिखाया जाता है। इस 'सरोकार' प्रदर्शन में पश्चिमी अंगरेजी मादकता है, शराब है, नशा है, एक बिंदास उन्माद है, 'नैतिक पुलिस' का हमला है... और सब पर 'सरोकार' का संगीत है..! यानी 'शहरी नक्सलवाद'..!

खैर, फिल्म आगे बढ़ती है और बताती है कि कैसे एक प्रोफेसर (अनुपम खेर) इतने बड़े बिजनेस स्कूल में घुसपैठ करके वहां के विद्यार्थियों को नक्सली बनाने की फिराक में है, एक 'भोले' स्टूडेंट (अरुणोदय) सिंह को वह इसके लिए फंसाना चाहता है, नक्सलियों के कमांडर तक कैसे प्रोफेसर की सीधी पहुंच है, घर में उसका दोहरा चेहरा है और उसकी पत्नी तक को नहीं मालूम कि वह नक्सली है! एक एनजीओ चलाने वाली या कार्यकर्ता कैसे सरकार से फंड लेकर वह पैसा नक्सलियों तक पहुंचाती हैं, वह प्रोफेसर कैसे सीधे आदिवासियों की मदद के प्रस्ताव को खारिज कर देता है। नक्सली राष्ट्रद्रोही हैं, उन्होंने जितने जवानों को मारा, उतने तो कारगिल जैसी लड़ाइयों में भी नहीं मारे गए! ये नक्सली एनजीओ वाले और बिजनेस स्कूल के प्रोफेसर की तरह चेहरा बदल कर सिस्टम के हर कोने में पैठ चुके हैं और अमेरिका की चकाचौंध को ठुकरा कर भारत में बिजनेस के जरिए उद्धार करने की आकांक्षा पाले एक 'लाचार' नौजवान को कैसे इन सबसे डरना चाहिए। परदे पर परदा, विरोधाभासों के बीच..! ये 'शहरी नक्सलवादी' सबसे बड़ी चुनौती हैं!

बहरहाल, इसमें बदलाव का सपना लिए 'पिंक चड्ढी कैंपेन' चलाने वाले इस बिजनेस के दीवाने नौजवान के अलावा एक और 'लाचार' पक्ष है- सत्ता! सत्ता पूरी तरह निर्दोष है, मासूम है, वह आदिवासियों का कल्याण करने के लिए एनजीओ वालों को पैसा देती है और वे लोग वह पैसा नक्सलियों तक पहुंचा देते हैं! इसका हल सिर्फ और सिर्फ बिजनेस है, जो हर तरह के बिचौलियों को खत्म करके सीधे आदिवासियों का 'कल्याण' करेगा! वह बिचौलिया चाहे एनजीओ वाले हों या सरकार हो!

नक्सली क्यों और कैसे उगे, एनजीओ कैसे और क्यों उगे, सरकार की क्या जवाबदेही है, व्यवस्था की नाकामी के लिए कौन जिम्मेदार है, इससे सबसे फिल्मकार को कोई मतलब नहीं। उसकी निगाह में आदिवासियों का भला सिर्फ और सिर्फ इंडियन बिजनेस स्कूल, बिजनेस और बिजनेसमैन ही कर सकते हैं! आदिवासियों के लिए संवेदना का समंदर हाथ में लिए बिजनेस-सॉल्यूशन-मॉडल में समूचे देश में जमीन कब्जाने के खेल पर सोचने की कोई जरूरत नहीं, इस मॉडल में मजदूरों के सवालों के लिए कोई जगह नहीं, इससे सरकार या तंत्र की जरूरत और उसकी जिम्मेदारियों का क्या होगा, इसकी फिक्र नहीं, सरकार की जिम्मेदारियों पर सवाल खड़े करने के बजाय उसे नाकारा बना कर पेश करना मकसद, लेकिन इस समूचे मसले पर एक खास राजनीतिक धारा के नजरिए का विस्तार...! इसी लोकेशन से मां शब्द से जुड़ी वीभत्स गाली का इतनी बार इस्तेमाल है कि जुगुप्सा हो जाती है...! लगता है कि फिल्मकार का मन इसी गाली में डूबा हुआ है..!

दिखने के लिए 'भारत माता की जय' के साथ मां की सबसे 'मशहूर' और वीभत्स गाली परोसने के सिरे से लगता है कि इसमें किसी के पक्ष से नहीं खेला गया है, लेकिन इस 'औपचारिकता' के अलावा जिन-जिन राजनीतिक धाराओं और संस्थानों को कठघरे में किया गया है, सरकार और तंत्र को बख्श दिया गया है, उससे इस फिल्म की मंशा पर सवाल खड़े होते हैं! नक्सली संगठनों के बारे में अलग से कुछ भी ऐसा नहीं दिखाया गया, जो प्रचारित है। लेकिन सरकार क्या करती है, आदिवासी किन वजहों से उस हालत में पहुंचे, उसमें सरकार की क्या भूमिका या जिम्मेदारियां हैं, दो पाटों के बीच से वे कैसे निकलेंगे, इस पर जानबूझ कर परदा..! जवाब होगा कि एक फिल्म क्या-क्या करेगी! ठीक है! तो फिर यही क्यों किया..!

फिल्में अगर राजनीति नहीं हैं, एक एजेंडे के तहत नहीं बनाई गई, मनोरंजन हैं तो सलमान खान या कपिल शर्मा टाइप क्यों नहीं! एक ऐसा विषय क्यों, उसके साथ खिलवाड़ क्यों, उसमें सरकार से लेकर राजनीतिक दलों तक भूमिका की अनदेखी क्यों, जिसमें एक बड़ी आबादी कीड़ों-मकोड़ों की तरह समझी जा रही है, जमीन कब्जाने का व्यापक खेल चल रहा है! मारी जा रही आबादी की तकलीफों के साथ खिलवाड़ का अधिकार-पत्र कहां से जारी हुआ है..!

...और! एक जिक्र कि 'बुद्ध के समय का एक गांव इसलिए आज भी मौलिक कलाकृतियों के जरिए अपनी संस्कृति और इतिहास बता रहा है कि आज तक वहां कोई 'बाहरी' नहीं पहुंचा', शायद इस फिल्म के नाम 'बुद्धा इन ए ट्राफिक जाम' का आधार है। लेकिन क्या यह नाम इतना भोला और मासूम है..!

Monday, 26 March 2012

गाली प्रेमी सामंतों के खिलाफ बगावत है पान सिंह तोमर...



स्पष्टीकरणः
"आप फिल्म को फिल्म की तरह देखतें हैं। आप समाज को भी फिल्म की तरह देखते हैं। ...मैं फिल्म को समाज की तरह देखता हूं। और समाज की राजनीति की तरह देखता हूं।"




"देल्ही बेली" बनाने के बाद अगर आमिर खान या "गैंग्स ऑफ... " बनाने के बाद अनुराग कश्यप के हाथ में "पान सिंह तोमर" गई होती तो यह फिल्म कैसी बनी होती? यह खयाल मुझे "पान सिंह तोमर" के आखिरी दृश्य में "पान सिंह तोमर" यानी इरफान की मौत के साथ ही आया।

तिग्मांशु धूलिया की दूसरी फिल्में कैसी हैं, इसके बारे में कुछ कहने की स्थिति में नहीं हूं। उनकी "पान सिंह तोमर" के कला या सरोकारी पहलू पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है। लेकिन मेरे दिमाग में इस फिल्म के खत्म होती ही "देल्ही बेली" या आमिर खान या अनुराग कश्यप जैसे फिल्मकारों का ही नाम क्यों आया? "देल्ही बेली" अगर किसी वजह से याद रह जाती है तो सिर्फ इसलिए कि "गरीबी" का पाखंड जीते तीनों एलीट हीरो एक दूसरे को मां-बहन की सबसे वीभत्स गालियां ऐसे सहज भाव बोलते हैं जैसे किसी को तोहफे में फूल दे रहे हों; "देल्ही बेली" का एक "हीरो" एक स्त्री की कीमत लगाता है और पूरी सहजता से उसकी छातियां दबा कर चला जाता है; एक हीरो अपनी "प्रेमिका" की जांघों के बीच मुंह लगाए हुए दूसरी "प्रेमिका" का फोन सुनता है और बीच में ही उठ कर उसकी "सेवा" में चला जाता है; एक हीरो बड़ी सहजता से यह डायलॉग चिल्लाता है कि "ये शादी इसलिए नहीं हो सकती, क्योंकि इसने मेरा चूसा है और मैने भी इसकी ली है..."। ("मैंने भी इसकी ली है... " की जगह वास्तव में क्या है, इसे समझना मुश्किल नहीं है; वही हीरो अपनी "प्रेमिका" को दर्जनों बार "चुड़ैल-चुड़ैल" कहता है; और एक (आधुनिक और "इम्पावर्ड") हीरोइन को महज यौन-ताजगी के लिए अपने "प्रेमी" के साथ फूहड़ हो जाने की हद तक "जहां-तहां" मुंह में मुंह लगा कर मग्न हो जाने में कोई परेशानी नहीं होती...।

इसके अलावा, "देल्ही बेली" की कहानी क्या है, और इसके उपर्युक्त दृश्यों की जरूरत क्या थी, उसका जवाब नहीं मिलता है। अब इसे अगर कुछ "महान" समीक्षक स्त्री के पक्ष में खड़ी फिल्म तक घोषित करते हैं तो उनकी कुंठाओं या नफे-नुकसान का सिरा भी समझा जा सकता है। (गैंग्स ऑफ... पर बहस चल रही है।)

बहरहाल, आमिर खान और अक्षत वर्मा या अनुराग कश्यप को "पान सिंह तोमर" बनाना होता तो यह फिल्म कैसी बनती?

गांव का पान सिंह तोमर, फौजी पान सिंह तोमर, फौजी अधिकारियों से सजा पाता और उनसे पूरे भोलेपन के साथ जवाब-तलब करता पान सिंह तोमर, अपने दबंग और सामंती ठसक वाले रिश्तेदारों के अत्याचार झेलता पान सिंह तोमर, बागी पान सिंह तोमर, अपने गिरोह के साथ बीहड़ में जीता-मरता या धनपतियों का अपहरण करता और उनसे फिरौती वसूलता पान सिंह तोमर... । यानी अक्षत वर्मा और आमिर खान या अनुराग कश्यप जैसों के हिसाब से देखें तो पूरी फिल्म में संवाद या डायलॉग के नाम पर अगर कुछ होता तो बस मां-बहन की गालियां होतीं। शुरू से लेकर आखिर तक इस फिल्म में जो सामंती सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश मौजूद है, अक्षत वर्मा, आमिर खान, सुधीर मिश्रा या अनुराग कश्यप जैसे तमाम "महान" फिल्मकार इस फिल्म को गालियों की "गंगा" में डुबा देते और यह फिल्म भी समाज और संस्कृति के यथार्थ निरूपण का तमगा हासिल कर लेती!

लेकिन वे कौन-सी वजहें होंगी कि तिग्मांशु धूलिया को पूरी फिल्म में न केवल गाली जरूरी नहीं लगी, बल्किल एक जगह तिग्मांशु गालियों के खिलाफ खड़े होते हैं, जब पूरी फिल्म में एकमात्र जगह गाली का जवाब पान सिंह तोमर से दिलवाते हैं कि "हमारे यहां गाली पर गोली चल जाती है...।"

यह मेरे लिए हैरान कर देने वाली हकीकत है कि "पान सिंह तोमर" के पूरे परिवेश में अगर गालियां भर दी जातीं, तब भी उसे एक पैमाने पर जरूरी (सही नहीं) ठहराया जा सकता था, लेकिन तिग्मांशु धूलिया को पूरी फिल्म में यह गैर जरूरी लगा और इसके बावजूद फिल्म का एक मिनट का भी कोई दृश्य अपने असर में कमजोर नहीं रहा और दर्शकों में गहरे पैठा रहा।

मैं नहीं जानता कि तिग्मांशु की बाकी फिल्मों की सामाजिकता कैसी है, या आगे की फिल्मों में कैसी होगी। लेकिन मुझे लगता है कि "पान सिंह तोमर" के जरिए उस फिल्मकार के बारे में बात होनी चाहिए कि अगर वह ईमानदार है, जवाबदेह है, उसे अपनी क्षमता पर भरोसा है, उसमें कहीं सरोकार बचा हुआ है, वह खालिस दुकानदार नहीं हो गया है या वह व्यवस्था का एक एजेंट नहीं है तो वह विषय भी ढूंढ़ लेगा, कलाकार भी खोज लेगा और "पान सिंह तोमर" जैसी फिल्म भी बना लेगा, जो न केवल कहानी और प्रस्तुति के स्तर पर एक स्थायी असर से लबरेज होगी, बल्कि कारोबार के स्तर पर भी निराश नहीं होने देगी। (इस फिल्म ने साबित किया है कि वे फिल्मकार झूठ बोलते हैं जो यह कहते हैं कि दर्शक जो पसंद करता है, हम वही दिखाते हैं।)

दरअसल, हाल की कुछ फिल्मों में "यथार्थ का स्पर्श" देने के नाम पर जिस तरह गालियों से लैस संवादों को सहज स्वीकार्य बनाने की कोशिश की जा रही है, वह "यथार्थ" के निरूपण के नाम पर एक साजिश से ज्यादा कुछ भी नहीं। समाज में जहां-तहां पसरी यौन-कुंठाओं का शोषण करके मकसद भले ज्यादा-से-ज्यादा कमाई करना हो, लेकिन इस रास्ते होता यह है कि एक सामंती, मर्दवादी, पितृसत्तात्मक और भारतीय सामाजिक संदर्भों में ब्राह्मणवादी सत्ता की कुर्सी के पाए और मजबूत होते हैं। स्त्रियों और शूद्र जातियों के खिलाफ जलील करने वाली भाषा या गालियों का सहज इस्तेमाल दरअसल इस सत्ता को बनाए रखने के अहम औजार हैं। गालियों को सहज सामाजिक अभिव्यक्ति मानने वाले या तो खुद एक साजिश के सूत्रधार होते हैं या फिर शायद अंदाजा भी नहीं लगा पाते कि ऐसी भाषा का सुनने या बोलने के स्तर पर इस्तेमाल करते हुए वे किस बारीक साजिश का एक हिस्सा हैं या फिर शिकार हैं।

सच तो यह है कि गालियों के जरिए एक ऐसा समाज मनोविज्ञान और ऐसी राजनीति का जाल बनाया गया है, जो आखिरकार जाति, नस्ल या लिंग के आधार पर सत्ताधारी, शासक और शोषक वर्गों का हित इस रूप में साधता है कि इससे सामाजिक हैसियत का मनोविज्ञान ज्यों-का-त्यों बना रहता है। यानी इस रास्ते शासित वर्गों को अपमानित करके उसका मनोबल गिराए रखना और उस पर मानसिक नियंत्रण बनाए रखना शासन का सबसे ताकतवर औजार बना। इसमें एक तरफ स्त्री की देह को ही उसकी अस्मिता का पर्याय बना दिया गया तो दूसरी ओर समाज के कमजोर तबकों की सामाजिक हैसियत, यानी वर्णक्रम पर आधारित जाति-व्यवस्था में नीची कही जाने वाली जाति की पहचान। यहां स्त्री के यौन की उनकी इज्जत का दूसरा नाम और उसे अपने नियंत्रण में रखने के लिए उसके यौन के खिलाफ शारीरिक या शाब्दिक हमला-हिंसा सामाजिक सत्ताओं का मूल चरित्र इसलिए बना, क्योंकि इससे एक साथ शूद्र जातियों और स्त्रियों- दोनों पर मनोवैज्ञानिक, सामाजिक और राजनीतिक नियंत्रण रखने में सबसे ज्यादा मदद मिली।

जाहिर है, ऐसे मनोवैज्ञानिक ढांचे-सांचे में जीते-मरते समाज की कुंठाओं का शोषण वैसी ही नई कुंठाओं के सार्वजनिक प्रदर्शन के जरिए करना सबसे आसान है। और आमिर खान या सुधीर मिश्रा जैसे तमाम फिल्मकारों का मकसद केवल इन कुंठाओं का शोषण करके कुबेर बनना भर नहीं है, बल्कि उस साजिश को कामयाब बनाना भी है, जिसमें यह सामंती, मर्दवादी और ब्राह्मणवादी व्यवस्था कायम रहे।

भदेसपन और संस्कृति का अभिन्न हिस्सा होने की दलील देकर जो लोग गालियों का बचाव करते हैं या उन्हें महिमामंडित करते हैं, वे भी दरअसल अनजाने में या फिर जान-बूझ कर इस साजिश का हिस्सा बनते हैं। दलील भले ही जनतांत्रिक होने और लोकभाषाओं के प्रति सहनशील होने की हो...।