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Thursday, 27 March 2008

क्या हमें सभ्य कहलाना अच्छा नहीं लगेगा...?

अनिल चमड़िया



आखिर क्या कारण है कि भूमंडलीकरण की नीति की शुरुआत के साथ कई विकसित देशों ने उन देशों से माफी मांगने की जरूरत महसूस की जहां की जातियों को उनके दुर्व्यवहार और भेदभाव की नीति का शिकार होना पड़ा है। 1990 में पूर्वी जर्मनी की ससंद ने इस्राइल से यहूदियों की प्रताड़ना के लिए माफी मांगी। सोवियत संघ ने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जेलों में बंद हजारों अधिकारियों को मारने के बाद जंगल में दफना दिए जाने के लिए माफी मांगी। 1998 में कनाडा ने अपने मूल निवासियों से माफी मांगी जिसकी संस्कृति को नष्ट-भ्रष्ट करने के लिए सरकार योजनाएं बनाती रही है। यहां तक कि 1992 में दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति एफडब्ल्यूडी क्लार्क ने तीन करोड़ काले लोगों पर पचास लाख गोरों के शासन के लिए, काले लोगों को दशकों तक प्रताड़ित करने की नीति जारी रखने के लिए माफी मांगी। भारत में जालियांवाला बाग कांड के लिए ब्रिटेन की प्रधानमंत्री मार्ग्रेट थेचर ने इसी दौर में अमृतसर आकर डायर के, ब्रिटिश सरकार के इस कुकृत्य के लिए माफी मांगी।
इसकी सबसे ताजा कड़ी 13 फरवरी को आस्ट्रेलिया में देखने को मिली जहां लेबर पार्टी के प्रधानमंत्री केविन रड ने कैनबरा की गणतांत्रिक संसद में खड़े होकर देश के मूलवासी आदिवासियों के साथ अब तक की दमनकारी संस्कृति और नीति के खिलाफ 'राष्ट्रीय माफी' मांगी। आस्ट्रेलिया मानव सभ्यता के इतिहास का सबसे पुराना दस्तावेज है। भारत की तरह वहां सत्रहवीं सदी की शुरूआत में ब्रिटिशों ने अपना कब्जा जमाना शुरू किया और तब से इन आदिवासियों के खिलाफ लगातार दमन, अत्याचार, रंगभेदी अमानवीय व्यवहार जारी है। शुरूआती दौर में तो ब्रिटेन से अपराधियों को बतौर सजा यहां भेजा जाता था, ताकि वे आदिवासियों के खिलाफ गुंडई कर सकें। गोरे मर्दों के संबंध से जो आदिवासी महिलाएं बच्चे को जन्म देती उन बच्चों को उठा कर ले जाया जाता था। उन बच्चों के साथ हर संभव अत्याचार होते थे। 1910-70 तक तो इस चुराई जाने वाली पीढियों के साथ खुलेआम कुकर्म होते रहे और किसी भी 'सभ्य सरकार' ने उसका विरोध नहीं किया।


पिछले चुनाव में लेबर पार्टी ने चुनावी घोषणा पत्र में उन आदिवासियों से राष्ट्र की तरफ माफी मांगने का वायदा किया और उसे इसका समर्थन मिला। 13 फरवरी को सार्वजनिक तौर पर माफी मांगे जाने की घटना के समय जॉन हार्वड को छोड़ कर देश के सभी जीवित प्रधानमंत्री मौजूद थे। कंजरवेटिव पार्टी के 1975-83 तक प्रधानमंत्री रहे मैलकालन फ्रेजर ने तो यह अफसोस जाहिर किया कि काश वे खुद ये काम कर पाते। मौजूदा प्रधानमंत्री तो रो पड़े। लेकिन उन्होंने जो कहा वह महत्वपूर्ण है। उनके अनुसार यह माफी आस्ट्रेलिया के इतिहास में एक नये युग का सूत्रपात करेगी। उनके अनुसार देश के उन सभी लोगों के एकजुट होने का अब समय आ गया है जो आस्ट्रेलिया के मूल निवासी हैं या मूल निवासी नहीं रहे हैं। इस दृश्य को देखने के लिए वंचित और दमित समाज हजारों किलोमीटर चल कर संसद तक पहुंचे थे। यह दुनिया भर में जातियों के खिलाफ शासक जातियों और वर्गों द्वारा माफी मांगने की एक नई मिसाल है। अगर इतिहास के जानकार जिन अन्य माफियों के लिए अपेक्षा करते हैं और उनमें अभी तक जो सामने नहीं आई है, तो वह है अमेरिका द्वारा रेड इंडियन से माफी मांगना। विश्व स्तर पर माफीनामे की कड़ियों को विश्लेषित किया जा सकता है। भूमंडलीकरण के दौर में शासक उन घावों को भरने की कोशिश कर रहे हैं जो संबंधों को सहज करने में बाधा होता है। लेकिन यह किसी देश द्वारा किसी बाहरी समाज से संबंध बनाने तक ही सीमित नहीं है बल्कि अपने आप को मजबूत करने के लिए अंदरूनी तौर पर भी संबंधों की खाई पाटना जरूरी लगता है। आस्ट्रेलिया अपने देश के मूल निवासियों से माफी मांगकर उन्हें बराबर की हिस्सेदारी देने के लिए खुद को तैयार कर रहा है। अपने देश में शासकों द्वारा अतीत के कुकृत्यों के लिए ही माफी मांगते नहीं देखा जाता है जबकि हाल के दिनों में लंदन और आस्ट्रेलिया में सरकारों ने अपने तंत्र द्वारा निर्दोषों की गिरफ्तारी या हत्या के लिए भी बाकायदा माफी मांगी। इस नजरिये से इन घटनाक्रमों को देखा जा सकता है। एक तो भूमंडलीकरण के दौर में ऐसे देशों की सरकारों ने रणनीति के तौर पर अतीत की गलतियों को सुधारने का प्रयास किया है, लेकिन ऐसी रणनीति को स्वीकार्य बनाने के लिए सांस्कृतिक बाधाओं को तोड़ना और जड़ता पर हमला जरूरी होता है। क्या ऐसे देशों और शासकों को उनके यहां के वैचारिक आंदोलनों की पृष्ठभूमि इसकी इजाजत देती है? वे अपने देश में जातियों के बीच के भेदभाव को दूर करने का साहस उसी पृष्ठभूमि से प्राप्त कर रहे हैं। भारत जैसे देशों के इतिहास के बारे में यह सर्वविदित है कि यहां के गहरे जातीय भेदभावों और शासक जातियों के अत्याचार की वजह से, आपसी बंटवारे ने विदेशी शासकों को अपनी जड़ें जमाने का यहां मौका दिया। सांस्कृतिक वर्चस्व रखने वाली जातियों की तरह आधुनिक राजनीतिक राष्ट्र-राज्य व्यवस्था के शासकों ने भी भेदभाव को बढ़ाने की नीतियां ही जारी रखीं। क्या अपने यहां की वैचारिक पृष्ठभूमि अपने कुकृत्यों को स्वीकार करने और फिर माफी मांगने के साहस की ही इजाजत नहीं देती है? यह कैसी जड़ता है? अपने भारतीय समाज में बार-बार कुकृत्यों को भूल जाने की सलाह दी जाती है और वह भी इस तरह से कि कुकृत्यों के दोबारा अंजाम देने की स्थितियां बनी रहें। कोई ऐसा कुकृत्य बताया जाए जो विदेशियों के देश से जाने के बाद भी पिछले पचास वर्षों से बार-बार देखने को नहीं मिलता हो? बजाय इस जड़ता को तोड़ने के हम कितने शर्मनाक तरीके से अपने समाज की जातियों पर ही यह आरोप लगाते हैं कि उन्होंने विदेशियों का साथ दिया। अपने अपने लिए विदेशियों की खोज में जातियां लगी रहती हैं।


हर स्तर पर समाज पर वर्चस्व रखने वाला समूह ऐसे किसी भी माफीनामे का विरोध करता है जो कि उसके वर्चस्व को खत्म करने में कोई भूमिका अदा करता हो। आस्ट्रेलिया में भी यह देखने को मिला। गौरतलब है कि नई पूंजी वाला मीडिया इसमें बड़ी भूमिका अदा कर रहा है। प्रधानमंत्री केविन रड ने जब संसद के पटल पर माफीनामा रखा था तो आस्ट्रेलिया के मीडिया में कोई उत्साह नहीं था। दूसरे दिन माफीनामे को सुनने के लिए उमड़ती भीड़ को देख कर चैनलों ने उसका सीधा प्रसारण तो किया लेकिन इस तरह के विचारों को ही ज्यादा जगह दी जिसमें इस तरह के माफीनामे की जरूरत नहीं बताई गई और न आदिवासी इलाकों में किसी परिवार के साथ उनके दुर्व्यवहार को दिखाया। यही रुख नई पूंजी वाला भारतीय भाषाओं का मीडिया का है। भारत के मीडिया के बड़े हिस्से में आमतौर पर वंचितों को न्याय देने की नीति के वक्त यही प्रवृत्ति दिखाई देती है। भाषाई मीडिया ने भी आस्ट्रेलिया की इस घटना को प्रचारित करने से परहेज किया। लेकिन भारत में सामाजिक, धार्मिक और क्षेत्रीय स्तर की जातियों के साथ कुकृत्यों से माफी मांगने और उन्हें न्याय के समान स्तर पर लाकर खड़ा करने से ऐसे कितने दिनों तक रोका जा सकता है? भारतीय समाज में माफीनामा आंतरिक ऊर्जा का स्रोत है जिसकी ताकत को सार्वभौमिक एवं आत्मनिर्भर राष्ट्र निर्माण में लगाया जा सकता है।

Wednesday, 28 November 2007

आई पकड़ में "आत्मा"

अमिताभ पांडेय


मौत का विज्ञान
बचपन में किसी दोस्त ने एक वैज्ञानिक प्रयोग की बात बताई थी। एक मरते हुए आदमी को कांच के बक्से में सीलबंद कर दिया गया, जैसे ही मरा, कांच चटक गया और उसकी आत्मा बाहर निकल गई। यह प्रयोग आज तक मेरे लिए पहेली है। कोई नहीं जानता कि इसे कब, कहां और किसने किया था और न ही यह समझ पाया हूं कि आत्मा जिसे न आग जला सकती और न ही कोई शस्त्र जिसे भेद सकता है, उसे शीशा चटका कर बाहर निकलने की क्या जरूरत थी? क्या वह रोशनी से भी ज्यादा मोटी होती है?

पहेली
जिंदगी और मौत की पहेली हमेशा से इंसान को उलझाए हुए है। वह क्या है जो हमें जीवित रखता है और जिसके न रहने पर हम वापस मिट्टी हो जाते हैं। गुनी-ज्ञानीजन कहते आए हैं, क्या जीवन उसी के खेल है? क्या इस पर सिर्फ मानव का विशेष अधिकार है या सारे पशु, पेड़ों को भी हासिल है? फिर क्या बाकी अचेतन जगत मिट्टी, पत्थर, पहाड़, नदी, समंदर, धरती, आदि ग्रहों और तारों-गैलेक्सियों की भी आत्मा होती है? सारे प्राचीन प्रागैतिहासिक धर्म इसका जवाब हां में देते आए हैं और आज के लगभग सभी धर्म एक परमात्मा या विश्वआत्मा की परिकल्पना करते हैं, जिसने सारी सृष्टि की रचना की और उसे चलाती है। आज का विज्ञान क्या कहता है विश्वआत्मा और जीवन के बारे में, दर्शन और धर्मशास्त्रों के शब्दजाल में उलझे बिना, विज्ञान छोटे-छोटे सवालों को सुलझाने में यकीन रखता है, बड़े-बड़े सवालों की परतें बिना सर्वज्ञाता होने के दंभ के खुलती जा रही हैं। जो आंखों से, टेलिस्कोप से, खुर्दबीन से दिखता है और दूसरों को दिखाया जा सकता है, जिसे परखा जा सकता है और बिना शक साबित किया जा सकता है, उसे ही विज्ञान का सर्टीफिकेट मिलता है। ज्ञान के पर्वत पर आंखों पर आस्था की पट्टी बांध कर चढ़ना नामुमकिन है, उसकी ढलानों पर न जाने कितनी परिकल्पनाओं के कंकाल बिखरे बड़े हैं। विज्ञान में जो प्रत्यक्ष प्रयासों से सिद्ध हो जाए, उसे ही सिद्धांत का दर्जा मिलता है।
केमिकल लोचा
इलेक्ट्रॉन, परमाणु, अणु, पत्थर, पहाड़, नदी, समंदर, धरती आदि ग्रह और तारे-गैलेक्सियां जीवित नहीं हैं, यह आज सब जानते हैं, तो कैसे मानें कि उनकी आत्मा होगी। इनके गुण-धर्म उनमें निहित पदार्थों के आपसी और वातावरण से व्यवहार पर निर्भर हैं, जिनकी व्याख्या भौतिकी के नियम बिना किसी अपवाद के कर सकते हैं। रसायन विज्ञान बिना किसी खारी या मीठी आत्मा के सहारे, बिना गुड़ की मिठास और समंदर के खारेपन के समझा जा सकता है। क्या आपने मुर्दा नमक चखा या देखा है? जीवजगत का मामला थोड़ा ज्यादा ही पेचीदा है, पर विज्ञान धीरे-धीरे ये पेच भी खोल रहा है। मुन्नाभाई की जुबान में बोलें तो जीवन एक केमिकल लोचा है। यहां भी वैज्ञानिकों को आत्मा के कोई सबूत नहीं मिल रहे हैं।
हमारा शरीर खरबों कोशिकाओं का बना होता है जो आमतौर पर इतनी छोटी होती हैं कि उनको खुर्दबीन की मदद से ही देखा जा सकता है। इनमें से हर एक कोश उतना ही जीवित होता है जितने कि हम। एक कोशिका भी जबर्दस्त जटिल रचनाओं वाली होती है। कोशिका दीवार के अंदर तो पूरा एक औद्योगिक क्षेत्र ही पसरा होता है। जिसमें परतदार रचनाओं पर स्थित राइबोसोम आरएनए की मदद से लाखों किस्म के प्रोटीनों का उत्पादन करते हैं। आरअनए कोशिका के कंट्रोल केंद्र से डीएनए से हर कार्य व्यापार का आदर्श और खाका लेकर आते हैं। प्राणियों में आदि बैक्टीरिया के वंशज माइटोकांड्रिया जो उनके कोशों में शायद दो अरब साल पहले रच-बस गए हैं, भोज्य पदार्थों से ऊर्जा निकाल कर इस्तेमाल लायक अणुओं- एटीपी- में सहेज कर जरूरत की जगह पर भेजते हैं। हरे पौधों में क्लोरोप्लास भी आदि सहयोगी बैक्टीरिया हैं जो सूरज की रोशनी से भोजन बना कोशिकाओं के साथ बांट कर खाते हैं।
आज प्रयोगशाला में कोशिका के सारे प्रोटीनों- आरएनए और डीएनए का कृत्रिम तौर पर बनाया जा चुका है और शायद आने वाले दस साल में कृत्रिम कोशिका भी बिना "आत्मा" की छौंक लगाए बना ली जाएगी। इसकी उम्मीद बढ़ती जा रही है। कोशिका की जीवंतता का रहस्य रसायन विज्ञान की पहुंच में है- यह किसी से छिपा नहीं है।

उम्रदराज अमर बैक्टीरिया
जीवन के इतिहास में, धरती पर ३.८ खरब साल में आज से सौ करोड़ साल पहले तक सिर्फ एककोशीय जीवों जैसे बैक्टीरिया, अर्किया और अमीबा जैसे जीवों का साम्राज्य था। बैक्टीरिया आदि की सिर्फ अकाल मृत्यु होती है, अन्यथा अनुकूल आबोहवा में तो वे "अमर" ही होते हैं। बैक्टीरिया बंट कर एक से दो, दो से चार और चार से आठ, इस तरह मुद्रास्फीति की तरह बढ़ते ही जाते हैं, जब तक खुराक और ऊर्जा मिलती रहे। खराब हालात में ये सुप्तावस्था में चले जाते हैं और जरूरत पड़े तो लाखों साल तक अलसाए पड़े रहते हैं अपने खोल में। हाल ही में जमीन में मीलों नीचे से और ध्रुवीय बर्फ में से तीन करोड़ साल से ज्यादा उम्रदराज बैक्टीरिया को निकाल कर जगाने में वैज्ञानिकों को सफलता मिली है।

पहला पाप
बैक्टीरिया के ही जमाने में सेक्स का चलन शुरू हुआ था, पर तब वह जरा चालू किस्म का था। यों ही घूमते-फिरते मौका मिलने पर वे कुछ जींस का आदान-प्रदान कर लिया करते और इसमें वे जात-कुजात की भी परवाह नहीं करते थे। बिल्ली में मछली के जींस और मटर में मिले खून बनाने वाले "कबाड़ जीन" शायद इसी तरह की हेरा-फेरी का नतीजा हैं। पैंसठ करोड़ साल पहले जब बहुकोशीय जीव स्वतंत्र कोशिकाओं के सहकार से बने और आगे चलकर नर और मादा जीव मिल कर "सभ्य" तरीके संतान पैदा करने लगे तो दुनिया में मौत का भी आगाज हुआ। मशहूर खगोल विज्ञानी कार्ल सेगन का यह रोचक सुझाव ईसाई, यहूदी और इस्लामिक आदिग्रंथ ओल्ड टेस्टामेंट की धारणा की स्वीकृति नहीं है। क्या तब के हमारे जीव पुरखे ने शैतान के बहकाने पर -जीवन वृक्ष- का फल खाया था और आदम और हव्वा की तरह वे भी नासमझ थे। मौत की वजह -पहला पाप- नहीं, बल्कि जटिल जीवों में "सहकार से जुड़ी कोशिकाओं" में तालमेल बिगाड़ना होता है।
जीवों के जटिल होने के साथ उनकी उम्र बढ़ने लगी और साथ ही जीनों की जटिलता भी बढ़ने लगी। इससे उम्र चढ़ते जीनों में खराबी आने की संभावना ज्यादा होती है। शरीर की कोशिकाएं अब अनिश्चितकाल तक विभाजन नहीं कर सकती हैं। बार-बार विभाजन से गुणसूत्रों से सिरे छीजते हैं और कोशिकाओं की रिपेयर प्रणाली बार-बार चूक करने लगती है। उम्र बढ़ने पर सत्रहवें गुणसूत्र पर स्थित टीडी-५३ जीन में खराबी होने पर शरीर के अलग-अलग कोशिकाएं अनियंत्रित होकर विभाजन कर कैंसर के ट्यूमर बना सकती हैं। कोशिकाओं की जन्म-मृत्यु तो हमारे जन्म से ही शुरू हो जाती है। कोशिका का विभाजन से जन्म और टीडी-५३ जैसे जीनों से नियंत्रित मृत्यु दोनों ही जरूरी है। अगर एक कोशिका बिना मरे दिन में पचास बार भी विभाजित हो तो साल भर में ब्रह्मांड में मौजूद सारे परमाणुओं से ज्यादा संतानें बनाएगी, जो वैसे भी संभव नहीं है।

ऑयल की तरह आत्मा
खैर, बचपन में कोशिकाएं ज्यादा बनती हैं और मरती कम हैं, पर १८-२० की उम्र तक जन्म और मृत्यु का पलड़ा बराबरी पर आ जाता है। और फिर? चौंकिए मत। फिर जिंदगी की ढलान शुरू। चालीस की उम्र हमारी प्राकृतिक सीमा है, उसके बाद की जिंदगी तो तकनीक और विज्ञान की गिफ्ट है। दस हजार साल पहले पशुपालन और कृषि के आविष्कार के पहले बिरलों को ही पचास तक पहुंचना नसीब होता था। जो भी हो, आज का चिकित्सा विज्ञान भी अस्सी के पार शायद कुछ मदद कर पाएगा। दिमाग, दिल, जोड़ और पेट की क्या दशा होती, उससे तो सब वाकिफ ही हैं। एक १९७० के मॉडल की कार की तरह कारबोरेटर संभालो तो गियर खड़खड़ाने लगते हैं। पर ऐसा धीरे-धीरे क्यों होता है? क्या आत्मा ऑयल की तरह धीरे-धीरे लीक हो रही है? या फिर दिल की धड़कन बंद होते ही "प्राण पखेरू" उड़ जाते हैं। ऑक्सीजन की सप्लाई बंद होने पर दिमाग सबसे पहले जवाब दे देता है। अगर ताप कम हो तो दिल, फेफड़े, गुर्दे, जिगर, आंखें और खाल खुछ घंटों तक जीवित रह सकती हैं।
अगर इनको किसी जरूरतमंद को प्रत्यारोपित कर दिया जाए तो हम अपने शरीर को कुछ हिस्सों को न सिर्फ अपनी "आत्मा" से बिछड़ने के बाद भी जिंदा रख सकते हैं, बल्कि कुछ पुण्य भी कमा सकते हैं। कोमा की बेहोशी में हमारे दिमाग का सचेत हिस्सा खराब हो जाता है, फिर भी शरीर जिंदा रहता है और इसके उलट पक्षाघात में शरीर तो खराब हो जाता है, पर दिमाग पूरा चुस्त-दुरुस्त रहता है। तो क्या कोमा में आत्मा शरीर में अटकी रहती है और पक्षाघात में दिमाग में? वैज्ञानिक मत से दो ऐसा है कि मरने पर कोई आत्मा-वात्मा बाहर नहीं निकलती, क्योंकि वह अंदर कभी आई ही नहीं थी। माता के गर्भ में अंडाणु और पिता के शुक्राणु से जो दोनों ही जीवित हैं, गर्भ बनता है, वह भी जीवित गर्भ से पनपे हम भी जीवित, तो फिर हमारी खास आत्मा ने प्रवेश कब किया?

टलेगा बुढ़ापा

एक तरह से देखें तो हम, हमारे सारे पुरखे, उनकी हर कोशिका "गर्मी प्रेमी" आदि बैक्टीरिया की संतान हैं, जो आज से लगभग चार अरब साल पहले महासागर के गर्भ में ज्वालामुखियों की आंच में पैदा हुआ और पनपा था। इस मायने में तो हम अमर हैं। हम, पुरखों और संतानों की अटूट शृंखला है और हम अपने मन और विचारों को संस्कृति के द्वारा जिंदा रखने में कामयाब हैं। वैसे पुराने का मरना भी जरूरी है, नहीं तो नए को जगह कहां से मिलेगी। पर हां, बुढ़ापे को सौ या दौ सो साल तक टालना इस शताब्दी के अंत तक संभव हो सकता है।

Thursday, 25 October 2007

राम इतिहास हैं, तो शंबूक का वध...?

आस्थावादियों की दलील है कि धर्म निजी आस्था का सवाल है और इसमें दखल देने का हक किसी को नहीं है। मेरा मानना है कि कोई भी धर्म या मौजूदा सामाजिक व्यवस्था इंसानी समाज पर पूरी तरह एक थोपी गई चीज है। यहां तक कि आस्था भी। बहुत आसानी से हम अपनी आस्था को तार्किक आधार देने के लिए मिथकों को इतिहास घोषित करने लगते हैं। बिना इस बात पर गौर किए कि इसके बाद जो कड़वे सवाल उठेंगे, उसका जवाब हमारे पास क्या होगा। पिछले दिनों जनसत्ता में शंभुनाथ ने कुछ ऐसे ही सवाल उठाए। रामसेतु के मसले पर राम की ऐतिहासिकता का वितंडा पीटते हुए क्या हम उससे जुड़े कुछ सवालों पर गौर करना चाहेंगे?


धर्म की हिंसा

दुनिया के प्रायः सभी बड़े धर्मों के इतिहास से पता चलता है कि ये युद्ध, हिंसा और अत्याचारों के बीच से पैदा हुए। और लंबे समय तक खून-खराबे के बीच से ही इनका विकास हुआ। चिंताजनक यह है कि सभ्यता का दावा करने वाले समाजों में आज भी हिंसा का एक प्रधान औजार है धर्म। अभी सेतुसमुद्रम परियोजना के संदर्भ में राम का मुद्दा फिर गरम है। यह प्रस्तावित है कि पौराणिक कथा या पुराकथा को इतिहास के रूप में देखा जाए। इसके संदेह नहीं कि हर जाति के कुछ मिथकीय लोक विश्वास होते हैं, जिनका तार्किक आधार नहीं होता और इस पर आश्चर्य नहीं करना चाहिए, अगर वे किसी सार्वभौम जीवन सत्य की ओर संकेत करते दिखाई दें। राम, कृष्ण और शिव हिंदुओं के प्राचीन लोकविश्वास हैं, जिनकी रचना हजारों साल में हुई है। इन लोकविश्वासों के भीतर से करोड़ों लोग अपने जीवन के दुख-सुख, हंसी-खुशी, पर्व-उत्सव और रीति-नीति व्यक्त करते आए हैं। वे अपने भौतिक कष्टों के क्षणों में कहीं आश्रय न पाकर इन्हीं लोकविश्वासों की छाया में जाते हैं। यह समझ में आ सकता है कि तार्किक आधार न होने के बावजूद ये कितनी निष्कलंक जगहें हैं। फिर भी आज से नहीं, हजारों साल से इन लोकविश्वासों को पहले धर्म ने अपनी रणभूमि में बदल दिया। अब ये राजनीति और बाजार के खेल के मैदान हैं। यह कितनी आसानी से समझाने की कोशिश होती है कि सेतुसमुद्रम योजना के तहत जल के अंदर समाए जिस सेतु को तोड़ा जा रहा है, वह भगवान राम ने बनाया था। एक प्राकृतिक घटना को पुरातात्त्विक साक्ष्य बताया जा रहा है, जबकि हिंदुत्ववादियों के शासन में ही इसकी योजना नए सिरे से बनी थी।

यह लोकविश्वासों की डकैती है

यह एक लोकविश्वास है कि हनुमान और नल-नील के नेतृत्व में बंदरों ने सेतु बनाया। इसमें एक गिलहरी का भी योगदान था। यह भी एक लोकविश्वास है कि हनुमान ने पूंछ में लगी आग से सोने की लंका जला दी, पर खुद उनकी पूंछ तक नहीं जली। भारत के लोग जो भी सोचें, श्रीलंका के लोग कभी मानने के लिए तैयार नहीं होंगे कि मिथकीय रावण की लंका यही है। वहां के लोकविश्वास दूसरे हैं, वह दूसरा देश है। इसी तरह, इतिहास ने कभी नूह की नौका के पुरातात्त्विक साक्ष्य ढूंढ़ने का दावा किया था। प्राचीन धार्मिक ग्रंथों में पहले विज्ञान खोजा जाता था। पर अब इतिहास ढूंढ़ा जाता है। धार्मिक मिथकों, पुराकथाओं या पुराणों का इतिहासीकरण दरअसल, एक राजनीतिक परिघटना है। इसका लक्ष्य लोकविश्वासों की राजनीतिक घेरेबंदी है। धर्मध्वजधारियों ने लोकविश्वासों का अपने वर्ण और वर्ग हित में इस्तेमाल किया। बाजारपतियों ने इनको एक आंतरिक भावना से उत्पाद बना दिया, आस्था का बाजारीकरण किया। राजनीतिज्ञों ने इन्हें सत्ता के लिए रणभूमि में बदल दिया। अब अयोध्या की जगह रामसेतु का मुद्दा है- फोकस अब उत्तर से हट कर दक्षिण के प्रसंग की ओर मुड़ गया है। अब भेद, घृणा और रक्त की लहलहाती खेती पीछे छोड़ती हुई एक नई रथयात्रा शुरू होगी। दरअसल, इसी तरह धर्म, बाजार और सुविधावादी राजनीति साधारण लोक को ठगते आए हैं। यह लोकविश्वासों की डकैती है। लोक अपने विश्वासों की व्याख्या खुद नहीं करेगा तो जाहिर है धर्मध्वजधारी, बाजारपति और सुविधावादी राजनीति अपनी-अपनी व्याख्याएं देंगे। ये लोक से उसके विश्वास छीन लेंगे और उसे सांस्कृतिक खोखलेपन में धकेल देंगे।

फिर निकलेंगे असंख्य विषैले सर्प
किसी भी धार्मिक महाकाव्य में "अच्छाई" और "बुराई" के बीच जो लड़ाई है, वही सच है। बाकी चीजें काव्यात्मक कल्पनाएं हैं या धर्मध्वजधारियों की कूटनीतिक सेंधें। क्या कोई मानेगा कि वाल्मीकि रामायण में बुद्ध को चोर कहा गया है? कहां रामायण, कहां बुद्ध। जाबालि को नास्तिक कह कर लोकायत परंपरा की आलोचना की गई है। संभवतः बौद्ध धर्म के ही असर से रामायण में एक जगह राम से सीता राम से हिंसा के विरोध में कहती हैं, आप बिना वैर के ही दंडकारण्य के राक्षसों का वध करना चाहते हैं। यह विचार त्याग दें, क्योंकि बिना अपराध के किसी को मारने को लोग अच्छा नहीं कहेंगे। राम ने जवाब दिया, राक्षसों के अत्याचार से तपस्यारत मुनि बहुत दुखी हैं। मैं तुम्हारा और लक्ष्मण का परित्याग कर सकता हूं, पर ब्राह्मणों को " नरभक्षियों" से रक्षा के लिए दिया गया वचन तोड़ नहीं सकता (अरण्यकांड, नौंवां और दसवां सर्ग) । रामायण में राम ने तलवार से शंबूक का सिर काटा है, जबकि राम के लोक बिंब में धनुष-बाण है, तलवार नहीं। जाहिर है कि बुद्ध को चोर कहने से लेकर शंबूक के वध तक के प्रसंग को भी अगर इतिहास मान लिया जाए तो राम को भगवान कहना कठिन होगा। इतना ही नहीं, इतिहास की पिटारी के सैकड़ों नए विषैले सर्प निकलेंगे। हम किसे ऐतिहासिक तथ्य मानें- वाल्मीकि रामायण में शंबूक वध दिखाया गया उसे, या तुलसी के रामचरितमानस में नहीं दिखाया गया उसे? अगर रामायण को इतिहास मान कर पढ़ा जाएगा, इसमें मिथक ही मिथक मिलेगा, मिथक मान कर पढ़ा जाएगा तो इतिहास ही इतिहास मिलेगा। अतीत का सामाजिक इतिहास।


"उद्धारार्थ हत्या"

दरअसल, रामकथा को लेकर प्राचीन काल से ही पॉलीमिक्स होता आया है। राम को लेकर राजनीति नई घटना नहीं है। राम को सामाजिक भेदभाव वाली सामाजिक-राजनीतिक अवधारणा की कठपुतली बनाने के प्रयास आगे भी चलेंगे। रामचरितमानस से लगभग दो सौ वर्ष पहले रचे गए अध्यात्म रामायण में राम कहते हैं कि स्त्री-पुरुष का भेद या वर्ण भेद या आश्रय मेरे भजन में बाधक नहीं बन सकते। भक्ति हो ते कोई भी मेरा भजन कर सकता है। यहां तक भक्ति आंदोलन का असर स्पष्ट दिखाई देता है क्योंकि इस ग्रंथ में शंबूक वध अनुपस्थित नहीं है। रामायण से भिन्नता यह है कि रामायण में शंबूक राम के हाथों वध के बाद भी स्वर्ग नहीं जा पाता, बल्कि उसके स्वर्ग न जा पाने से प्रसन्न देवता राम पर फूलों की वर्षा करते हैं। अध्यात्म रामायण में शंबूक स्वर्ग चला जाता है। अध्यात्म रामायण का रचनाकार जो भी रहा हो, उसने वाल्मीकि रामायण जरूर पढ़ी होगी। अगर वह सब इतिहास था तो उसने तथ्य क्यों बदले?रामायण में शंबूक के प्रति की गई क्रूरता शूद्र विरोधी तदयुगीन ब्राह्मणों की क्रूरता है, जबकि अध्यात्म रामायण लिखने वाले ब्राह्मण ने सोचा होगा कि वध ठीक है, पर चलो इसको कम से कम स्वर्ग भेज दो- "उद्धारार्थ हत्या।"


आधुनिक रथयात्री

रामकथा में हजारों साल से इतने प्रसंग आते-जाते रहे हैं कि आम हिंदू जनता के मन में जो मुख्य कथा है, वह दरअसल इसके केवल कुछ जीवन-उदबोधक प्रसंगों में उसका विश्वास है- उसमें कुछ भी तथ्य नहीं है। भारत के लोगों ने राम कथा को इतिहास के रूप में न कभी देखा और न देखी की जरूरत महसूस की। अगल-अगल कवियों ने राम कथा को अलग-अलग सृजनात्मक दृष्टि से देखा- वाल्मीकि से निराला तक। अगर राम कथा को इतिहास माना जाता, उसकी कथा में कहीं उलटफेर नहीं होता। भवभूति के उत्तररामचरित में सीता से राम के प्रेम और स्त्री के सामाजिक अधिकार की स्वीकृति के अनेक दृश्य हैं। तुलसी ने कई फेरबदल किए। ये सब समय-समय पर अपनी परंपराओं को जांचने और जरूरत पड़ने पर उन्हें बदल देने के जातीय साहस के चिन्ह हैं। एक ये आधुनिक रथयात्री हैं, जो बदलना बिल्कुल नहीं चाहते।

Monday, 22 October 2007

राम भरोसे हिंदू होटल

डॉ आंबेडकर के बाद कांचा इलैया इस धारा के सबसे बड़े चिंतक रहे हैं। इन्होंने हिंदू सामाजिक व्यवस्था पर कुछ कड़वे सवाल उठाए हैं जो आमतौर पर सवर्ण चेतना को गहरे रूप से असहज करता रहा है। उनके तर्क आमतौर पर नहीं काटे जा सकने लायक माने जाते रहे हैं। राम सेतु को एक बार फिर अपनी डूबती राजनीति का सहारा बनाने की जुगत में भिड़ी भाजपा और द्रमुक के आमने-सामने आने के बहाने उन्होंने तहलका में अपनी राय जाहिर की। मूल लेख अंग्रेजी में है। अनुवाद पंकज चौधरी ने किया हैः



पेरियार हमेशा यह कहते थे कि ईश्वर नाम की कोई सत्ता नहीं है। अब करुणानिधि लगातार यह कह रहे हैं कि राम का कोई अस्तित्व नहीं था। और जयललिता राम की सत्ता में पूरी विश्वास करती हुई जय श्रीराम का नारा लगाती हैं। करुणानिधि का राम की सत्ता में विश्वास नहीं करना उन्हें ई वी रामास्वामी नायकर पेरियार की तमिल और द्रविड़ राजनीति की निरीश्वरवादी और वैज्ञानिक परंपरा के एक रखवाले के रूप में सामने लाता है। दूसरी ओर, जयललिता का राम की सत्ता में विश्वास करना और यह कहना कि उन्हें पेरियार की निरीश्वरवादी अवधारणा में जरा भी विश्वास नहीं है, उनके उस रूप की पोल खोलता है कि वह न सिर्फ जन्मना ब्राह्मण हैं, बल्कि तमाम हिंदू देवी-देवताओं, खासतौर पर राम की आराधक हैं। सेतुसमुद्रम परियोजना पर जब बहस चल रही थी, तब जनता पार्टी के अध्यक्ष सुब्रह्मण्यम स्वामी ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दाखिल कर उससे केंद्र को यह निर्देश देने की गुजारिश की कि वह रामसेतु (एडम्स सेतु) को ध्वस्त नहीं करे। क्योंकि उनका व्श्वास है कि रामसेतु का निर्माण वाल्मीकि रचित रामायण के नायक राम के द्वारा हुआ है। ध्यान रहे कि स्वामी खुद एक तमिल ब्राह्मण हैं, और ब्राह्मण विरोधी द्रविड़ राजनीति से नफरत करते हैं।

उन्होंने यह सुप्रीम कोर्ट से यह गुजारिश तब की जब भारतीय पुरातात्त्विक सर्वेक्षण का यह हलफनामा सामने आ चुका था कि इतिहास में न तो किसी पुल का साक्ष्य मिलता है और न ही राम का। भारतीय पुरातात्त्विक सर्वेक्षण के इस हलफनामे को मीडिया ने जरूरत से ज्यादा तूल दिया, जिससे भाजपा और उसकी सहयोगी पार्टियों को सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह पर हिंदू विरोधी होने का आरोप लगाने में मदद मिली। एक ओर उन्होंने सोनिया गांधी पर ईसाई होने का आरोप लगाया, वहीं मनमोहन सिंह पर सिक्ख होने का। उन दोनों को सिर्फ इसलिए निशाना नहीं बनाया गया कि वे अपने प्रशासनिक कर्तव्य का निर्वहन नहीं कर पाए, बल्कि उन्हें इसलिए भी कि वे अल्पसंख्यक समुदाय से आते हैं। इसमें सोनिया गांधी पर सबसे ज्यादा उंगलियां इसलिए उठीं कि वे ईसाई होने के साथ-साथ विदेशी मूल की भी हैं।

उन पर निशाना साध कर हिंदूवादी ताकतें भारत के पूरे ईसाई समुदाय को एक ओर जहां राष्ट्रविरोधी ठहरा रही हैं, वहीं गुजरात और मध्यप्रदेश जैसे राज्यों में ईसाइयों पर हमले को बढ़ावा दिया जा रहा है। उनकी रणनीति यह है कि इन राज्यों में होने वाले चुनाव को खूनी खेल में बदल दें, जैसा कि संघ परिवार पहले भी कर चुका है। उनके दुर्भाग्य से करुणानिधि ने उनकी उस रणनीति की कब्र खोद दी और हिंदू बहुसंख्यक बनाम ईसाई अल्पसंख्यक की बहस को द्रविड़ बहुसंख्यक बनाम आर्य अल्पसंख्यक में बदल दिया। एक ऐसे समय में करुणानिधि ने देश में एक और गुजरात होने से बचा लिया जो शायद ईसाइयों के खिलाफ होता।

करुणानिधि न सिर्फ राम की सर्वव्यापकता को नकारते हैं, बल्कि उनके प्रति आक्रामक रुख अपनाते हुए उन्हें एक किताब में एक चरित्र से ज्यादा कुछ नहीं मानते हैं। राम के बारे में वे कहते हैं कि क्या राम का वर्णन वाल्मीकि ने एक शराबी के रूप में नहीं किया है? क्या राम के पास इंजीनियरिंग की डिग्री थी? अगर नहीं, तो फिर कैसे उन्होंने एक ऐसे पुल का निर्माण करवाया, जिससे होकर श्रीलंका पहुंचा जा सकता था? करुणानिधि के तर्कपूर्ण सवालों ने राम से संबंधित बहस पर जबर्दस्त असर छोड़ा है। हिंदुत्ववादी ताकतें कभी भी तमिल-द्रविड़ राष्ट्रीयता को बर्दाश्त नहीं कर सकतीं। अगर जयललिता ऐसा करतीं, तो उसका समर्थन खो देतीं। सुब्रह्मण्यम स्वामी की तो कोई बात ही नहीं, क्योंकि राज्य में उनकी कोई खास हैसियत नहीं है। इस मुद्दे पर सोनिया गांधी की रणनीति ने उतना काम नहीं किया, जितना उनकी चुप्पी और उदासीनता ने।

भारतीय पुरातात्त्विक सर्वेक्षण के हलफनामे ने भाजपा और उसके दिवालिये नेतृत्व की पोल खोल दी है। बड़े आर्थिक मुद्दे या समस्याओं पर भाजपा को मुख्य विपक्षी पार्टी की तह कभी भी आलोचनात्मक रवैया अपनाते हुए नहीं देखा गया। हां, वामपंथी पार्टियां जरूर इस मोर्चे पर अपनी भूमिका पूरी गंभीरता से निभाती रही हैं। रामसेतु अभियान बाबरी मस्जिद के खिलाफ चलाए गए अभियान की तरह नहीं है, जिसमें मुसलमानों को लक्ष्य बनाया गया था। यह संघर्ष मुख्य रूप से द्रविड़ तमिलों के साथ हैं, जिसके गंभीर नतीजे हो सकते हैं। यह जेहोवा या अल्लाह की तरह भी नहीं है। हिंदू धर्म में राम एक भगवान के रूप में बड़े पैमाने पर स्वीकार्य नहीं है। संघ परिवार और मुख्य संगठन सभी भारतीयों को यह समझाने में विफल रहे हैं कि राम एक मर्यादा पुरुषोत्तम हैं। हो सकता है कि मुसलमान और ईसाई राम के खिलाफ बात नहीं करें, लेकिन तमिल द्रविड़ ऐसा क्यों करें?

संघ परिवार अगर सच्चाई जानना चाहता है तो उसे यह स्वीकार कर लेना चाहिए कि दक्षिण भारत में राम उस तरह से लोकप्रिय नहीं हैं, जिस तरह शिरडी के साईं बाबा। आंध्र प्रदेश के भद्राचलम में, जहां राम का सबसे बड़ा मंदिर है, जरा-सी भी व्यस्त जगह नहीं है। बहुत कम लोग वहां जाते हैं। अगर भाजपा सोचती है कि राम का नारा उछाल कर एक बार फिर वह हिंदू वोटों की गोलबंदी कर रही है तो यह उसकी भूल है। दूसरी ओर, करुणानिधि जिस तरह से राम के प्रति आक्रामक रुख अपनाए हुए हैं और सेतुसमुद्रम का राजनीतिकरण करने में कामयाब रहे हैं, वह निश्चित रूप से तमिल वोटों के ध्रुवीकरण में मदद करेगा।

Friday, 28 September 2007

मैं नास्तिक क्यों हूं

भगत सिंह

भगत सिंह का यह लेख सिर्फ उनकी शख्सीयत का आईना नहीं है, बल्कि एक ऐसा जीवन-दर्शन है, जहां आदमी को आदमी के तौर पर जगह मिलती है, न कि किसी खास धर्म या जाति के सम्मानित या अपमानित होने वाले हिस्से के रूप में.

प्रत्येक मनुष्य को, जो विकास के लिए खड़ा है, रूढ़िगत विश्वासों के हर पहलू की आलोचना तथा उन पर अविश्वास करना होगा और उनको चुनौती देनी होगी. प्रत्येक प्रचलित मत की हर बात को हर कोने से तर्क की कसौटी पर कसना होगा. यदि काफ़ी तर्क के बाद भी वह किसी सिद्धांत या दर्शन के प्रति प्रेरित होता है, तो उसके विश्वास का स्वागत है. उसका तर्क असत्य, भ्रमित या छलावा और कभी-कभी मिथ्या हो सकता है. लेकिन उसको सुधारा जा सकता है क्योंकि विवेक उसके जीवन का दिशा-सूचक है.
लेकिन निरा विश्वास और अंधविश्वास ख़तरनाक है. यह मस्तिष्क को मूढ़ और मनुष्य को प्रतिक्रियावादी बना देता है. जो मनुष्य यथार्थवादी होने का दावा करता है उसे समस्त प्राचीन विश्वासों को चुनौती देनी होगी.
यदि वे तर्क का प्रहार न सह सके तो टुकड़े-टुकड़े होकर गिर पड़ेंगे. तब उस व्यक्ति का पहला काम होगा, तमाम पुराने विश्वासों को धराशायी करके नए दर्शन की स्थापना के लिए जगह साफ करना.
यह तो नकारात्मक पक्ष हुआ. इसके बाद सही कार्य शुरू होगा, जिसमें पुनर्निर्माण के लिए पुराने विश्वासों की कुछ बातों का प्रयोग किया जा सकता है.
जहाँ तक मेरा संबंध है, मैं शुरू से ही मानता हूँ कि इस दिशा में मैं अभी कोई विशेष अध्ययन नहीं कर पाया हूँ. एशियाई दर्शन को पढ़ने की मेरी बड़ी लालसा थी पर ऐसा करने का मुझे कोई संयोग या अवसर नहीं मिला. लेकिन जहाँ तक इस विवाद के नकारात्मक पक्ष की बात है, मैं प्राचीन विश्वासों के ठोसपन पर प्रश्न उठाने के संबंध में आश्वस्त हूँ. मुझे पूरा विश्वास है कि एक चेतन, परम-आत्मा का, जो कि प्रकृति की गति का दिग्दर्शन एवं संचालन करती है, कोई अस्तित्व नहीं है.
हम प्रकृति में विश्वास करते हैं और समस्त प्रगति का ध्येय मनुष्य द्वारा, अपनी सेवा के लिए, प्रकृति पर विजय पाना है. इसको दिशा देने के लिए पीछे कोई चेतन शक्ति नहीं है. यही हमारा दर्शन है.
जहाँ तक नकारात्मक पहलू की बात है, हम आस्तिकों से कुछ प्रश्न करना चाहते हैं-(i) यदि, जैसा कि आपका विश्वास है, एक सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापक एवं सर्वज्ञानी ईश्वर है जिसने कि पृथ्वी या विश्व की रचना की, तो कृपा करके मुझे यह बताएं कि उसने यह रचना क्यों की?
कष्टों और आफतों से भरी इस दुनिया में असंख्य दुखों के शाश्वत और अनंत गठबंधनों से ग्रसित एक भी प्राणी पूरी तरह सुखी नहीं.
कृपया, यह न कहें कि यही उसका नियम है. यदि वह किसी नियम में बँधा है तो वह सर्वशक्तिमान नहीं. फिर तो वह भी हमारी ही तरह गुलाम है.
कृपा करके यह भी न कहें कि यह उसका शग़ल है.
नीरो ने सिर्फ एक रोम जलाकर राख किया था. उसने चंद लोगों की हत्या की थी. उसने तो बहुत थोड़ा दुख पैदा किया, अपने शौक और मनोरंजन के लिए.

और उसका इतिहास में क्या स्थान है? उसे इतिहासकार किस नाम से बुलाते हैं?
सभी विषैले विशेषण उस पर बरसाए जाते हैं. जालिम, निर्दयी, शैतान-जैसे शब्दों से नीरो की भर्त्सना में पृष्ठ-के पृष्ठ रंगे पड़े हैं. एक चंगेज़ खाँ ने अपने आनंद के लिए कुछ हजार ज़ानें ले लीं और आज हम उसके नाम से घृणा करते हैं. तब फिर तुम उस सर्वशक्तिमान अनंत नीरो को जो हर दिन, हर घंटे और हर मिनट असंख्य दुख देता रहा है और अभी भी दे रहा है, किस तरह न्यायोचित ठहराते हो? फिर तुम उसके उन दुष्कर्मों की हिमायत कैसे करोगे, जो हर पल चंगेज़ के दुष्कर्मों को भी मात दिए जा रहे हैं?
इसलिए मैं पूछता हूँ, ‘‘उस परम चेतन और सर्वोच्च सत्ता ने इस विश्व और उसमें मनुष्यों का सृजन क्यों किया? आनंद लुटने के लिए? तब उसमें और नीरो में क्या फर्क है"
मैं पूछता हूँ कि उसने यह दुनिया बनाई ही क्यों थी-ऐसी दुनिया जो सचमुच का नर्क है, अनंत और गहन वेदना का घर है? सर्वशक्तिमान ने मनुष्य का सृजन क्यों किया जबकि उसके पास मनुष्य का सृजन न करने की ताक़त थी? इन सब बातों का तुम्हारे पास क्या जवाब है? तुम यह कहोगे कि यह सब अगले जन्म में, इन निर्दोष कष्ट सहने वालों को पुरस्कार और ग़लती करने वालों को दंड देने के लिए हो रहा है. ठीक है, ठीक है. तुम कब तक उस व्यक्ति को उचित ठहराते रहोगे जो हमारे शरीर को जख्मी करने का साहस इसलिए करता है कि बाद में इस पर बहुत कोमल तथा आरामदायक मलहम लगाएगा?
ग्लैडिएटर संस्था के व्यवस्थापकों तथा सहायकों का यह काम कहाँ तक उचित था कि एक भूखे-खूँख्वार शेर के सामने मनुष्य को फेंक दो कि यदि वह उस जंगली जानवर से बचकर अपनी जान बचा लेता है तो उसकी खूब देख-भाल की जाएगी?
इसलिए मैं पूछता हूँ, ‘‘उस परम चेतन और सर्वोच्च सत्ता ने इस विश्व और उसमें मनुष्यों का सृजन क्यों किया? आनंद लुटने के लिए? तब उसमें और नीरो में क्या फर्क है?’’ मुसलमानों और ईसाइयों. हिंदू-दर्शन के पास अभी और भी तर्क हो सकते हैं. मैं पूछता हूँ कि तुम्हारे पास ऊपर पूछे गए प्रश्नों का क्या उत्तर है?
तुम तो पूर्व जन्म में विश्वास नहीं करते. तुम तो हिन्दुओं की तरह यह तर्क पेश नहीं कर सकते कि प्रत्यक्षतः निर्दोष व्यक्तियों के कष्ट उनके पूर्व जन्मों के कुकर्मों का फल है. मैं तुमसे पूछता हूँ कि उस सर्वशक्तिशाली ने विश्व की उत्पत्ति के लिए छः दिन मेहनत क्यों की और यह क्यों कहा था कि सब ठीक है. उसे आज ही बुलाओ, उसे पिछला इतिहास दिखाओ. उसे मौजूदा परिस्थितियों का अध्ययन करने दो. फिर हम देखेंगे कि क्या वह आज भी यह कहने का साहस करता है- सब ठीक है.
कारावास की काल-कोठरियों से लेकर, झोपड़ियों और बस्तियों में भूख से तड़पते लाखों-लाख इंसानों के समुदाय से लेकर, उन शोषित मजदूरों से लेकर जो पूँजीवादी पिशाच द्वारा खून चूसने की क्रिया को धैर्यपूर्वक या कहना चाहिए, निरुत्साहित होकर देख रहे हैं.
और उस मानव-शक्ति की बर्बादी देख रहे हैं जिसे देखकर कोई भी व्यक्ति, जिसे तनिक भी सहज ज्ञान है, भय से सिहर उठेगा; और अधिक उत्पादन को जरूरतमंद लोगों में बाँटने के बजाय समुद्र में फेंक देने को बेहतर समझने से लेकर राजाओं के उन महलों तक-जिनकी नींव मानव की हड्डियों पर पड़ी है...उसको यह सब देखने दो और फिर कहे-‘‘सबकुछ ठीक है.’’ क्यों और किसलिए?
यही मेरा प्रश्न है. तुम चुप हो? ठीक है, तो मैं अपनी बात आगे बढ़ाता हूँ.
और तुम हिंदुओ, तुम कहते हो कि आज जो लोग कष्ट भोग रहे हैं, ये पूर्वजन्म के पापी हैं. ठीक है.
तुम कहते हो आज के उत्पीड़क पिछले जन्मों में साधु पुरुष थे, अतः वे सत्ता का आनंद लूट रहे हैं.
मुझे यह मानना पड़ता है कि आपके पूर्वज बहुत चालाक व्यक्ति थे. उन्होंने ऐसे सिद्धांत गढ़े जिनमें तर्क और अविश्वास के सभी प्रयासों को विफल करने की काफी ताकत है. लेकिन हमें यह विश्लेषण करना है कि ये बातें कहाँ तक टिकती हैं.
न्यायशास्त्र के सर्वाधिक प्रसिद्ध विद्वानों के अनुसार, दंड को अपराधी पर पड़नेवाले असर के आधार पर, केवल तीन-चार कारणों से उचित ठहराया जा सकता है. वे हैं प्रतिकार, भय तथा सुधार.
आज सभी प्रगतिशील विचारकों द्वारा प्रतिकार के सिद्धांत की निंदा की जाती है. भयभीत करने के सिद्धांत का भी अंत वही है.
केवल सुधार करने का सिद्धांत ही आवश्यक है और मानवता की प्रगति का अटूट अंग है. इसका उद्देश्य अपराधी को एक अत्यंत योग्य तथा शांतिप्रिय नागरिक के रूप में समाज को लौटाना है.
लेकिन यदि हम यह बात मान भी लें कि कुछ मनुष्यों ने (पूर्व जन्म में) पाप किए हैं तो ईश्वर द्वारा उन्हें दिए गए दंड की प्रकृति क्या है? तुम कहते हो कि वह उन्हें गाय, बिल्ली, पेड़, जड़ी-बूटी या जानवर बनाकर पैदा करता है. तुम ऐसे 84 लाख दंडों को गिनाते हो.
मैं पूछता हूँ कि मनुष्य पर सुधारक के रूप में इनका क्या असर है? तुम ऐसे कितने व्यक्तियों से मिले हो जो यह कहते हैं कि वे किसी पाप के कारण पूर्वजन्म में गदहा के रूप में पैदा हुए थे? एक भी नहीं? अपने पुराणों से उदाहरण मत दो. मेरे पास तुम्हारी पौराणिक कथाओं के लिए कोई स्थान नहीं है. और फिर, क्या तुम्हें पता है कि दुनिया में सबसे बड़ा पाप गरीब होना है? गरीबी एक अभिशाप है, वह एक दंड है.
मैं पूछता हूँ कि अपराध-विज्ञान, न्यायशास्त्र या विधिशास्त्र के एक ऐसे विद्वान की आप कहाँ तक प्रशंसा करेंगे जो किसी ऐसी दंड-प्रक्रिया की व्यवस्था करे जो कि अनिवार्यतः मनुष्य को और अधिक अपराध करने को बाध्य करे?
क्या तुम्हारे ईश्वर ने यह नहीं सोचा था? या उसको भी ये सारी बातें-मानवता द्वारा अकथनीय कष्टों के झेलने की कीमत पर-अनुभव से सीखनी थीं? तुम क्या सोचते हो.
किसी गरीब तथा अनपढ़ परिवार, जैसे एक चमार या मेहतर के यहाँ पैदा होने पर इन्सान का भाग्य क्या होगा? चूँकि वह गरीब हैं, इसलिए पढ़ाई नहीं कर सकता.
वह अपने उन साथियों से तिरस्कृत और त्यक्त रहता है जो ऊँची जाति में पैदा होने की वजह से अपने को उससे ऊँचा समझते हैं.
उसका अज्ञान, उसकी गरीबी तथा उससे किया गया व्यवहार उसके हृदय को समाज के प्रति निष्ठुर बना देते हैं. मान लो यदि वह कोई पाप करता है तो उसका फल कौन भोगेगा? ईश्वर, वह स्वयं या समाज के मनीषी? और उन लोगों के दंड के बारे में तुम क्या कहोगे जिन्हें दंभी और घमंडी ब्राह्मणों ने जान-बूझकर अज्ञानी बनाए रखा तथा जिन्हें तुम्हारी ज्ञान की पवित्र पुस्तकों-वेदों के कुछ वाक्य सुन लेने के कारण कान में पिघले सीसे की धारा को सहने की सज़ा भुगतनी पड़ती थी? यदि वे कोई अपराध करते हैं तो उसके लिए कौन ज़िम्मेदार होगा और उसका प्रहार कौन सहेगा?
मेरे प्रिय दोस्तो. ये सारे सिद्धांत विशेषाधिकार युक्त लोगों के आविष्कार हैं. ये अपनी हथियाई हुई शक्ति, पूँजी तथा उच्चता को इन सिद्धान्तों के आधार पर सही ठहराते हैं.
जी हाँ, शायद वह अपटन सिंक्लेयर ही था, जिसने किसी जगह लिखा था कि मनुष्य को बस (आत्मा की) अमरता में विश्वास दिला दो और उसके बाद उसका सारा धन-संपत्ति लूट लो.
वह बगैर बड़बड़ाए इस कार्य में तुम्हारी सहायता करेगा. धर्म के उपदेशकों तथा सत्ता के स्वामियों के गठबंधन से ही जेल, फाँसीघर, कोड़े और ये सिद्धांत उपजते हैं.
मैं पूछता हूँ कि तुम्हारा सर्वशक्तिशाली ईश्वर हर व्यक्ति को उस समय क्यों नहीं रोकता है जब वह कोई पाप या अपराध कर रहा होता है? ये तो वह बहुत आसानी से कर सकता है. उसने क्यों नहीं लड़ाकू राजाओं को या उनके अंदर लड़ने के उन्माद को समाप्त किया और इस प्रकार विश्वयुद्ध द्वारा मानवता पर पड़ने वाली विपत्तियों से उसे क्यों नहीं बचाया?
मैं पूछता हूँ कि तुम्हारा सर्वशक्तिशाली ईश्वर हर व्यक्ति को उस समय क्यों नहीं रोकता है जब वह कोई पाप या अपराध कर रहा होता है?
ये तो वह बहुत आसानी से कर सकता है. उसने क्यों नहीं लड़ाकू राजाओं को या उनके अंदर लड़ने के उन्माद को समाप्त किया और इस प्रकार विश्वयुद्ध द्वारा मानवता पर पड़ने वाली विपत्तियों से उसे क्यों नहीं बचाया?
उसने अंग्रेज़ों के मस्तिष्क में भारत को मुक्त कर देने हेतु भावना क्यों नहीं पैदा की?
वह क्यों नहीं पूँजीपतियों के हृदय में यह परोपकारी उत्साह भर देता कि वे उत्पादन के साधनों पर व्यक्तिगत संपत्ति का अपना अधिकार त्याग दें और इस प्रकार न केवल सम्पूर्ण श्रमिक समुदाय, वरन समस्त मानव-समाज को पूँजीवाद की बेड़ियों से मुक्त करें.
आप समाजवाद की व्यावहारिकता पर तर्क करना चाहते हैं. मैं इसे आपके सर्वशक्तिमान पर छोड़ देता हूँ कि वह इसे लागू करे.
चलो, आपका परमात्मा आए और वह हर चीज़ को सही तरीके से कर दें.
अब घुमा-फिराकर तर्क करने का प्रयास न करें, वह बेकार की बातें हैं. मैं आपको यह बता दूँ कि अंग्रेज़ों की हुकूमत यहाँ इसलिए नहीं है कि ईश्वर चाहता है, बल्कि इसलिए कि उनके पास ताक़त है और हम में उनका विरोध करने की हिम्मत नहीं. वे हमें अपने प्रभुत्व में ईश्वर की सहायता से नहीं रखे हुए हैं बल्कि बंदूकों, राइफलों, बम और गोलियों, पुलिस और सेना के सहारे रखे हुए हैं. यह हमारी ही उदासीनता है कि वे समाज के विरुद्ध सबसे निंदनीय अपराध-एक राष्ट्र का दूसरे राष्ट्र द्वारा अत्याचारपूर्ण शोषण-सफलतापूर्वक कर रहे हैं.
कहाँ है ईश्वर? वह क्या कर रहा है? क्या वह मनुष्य जाति के इन कष्टों का मज़ा ले रहा है? वह नीरो है, चंगेज़ है, तो उसका नाश हो.
क्या तुम मुझसे पूछते हो कि मैं इस विश्व की उत्पत्ति और मानव की उत्पत्ति की व्याख्या कैसे करता हूँ? ठीक है, मैं तुम्हें बतलाता हूँ. चार्ल्स डारविन ने इस विषय पर कुछ प्रकाश डालने की कोशिश की है. उसको पढ़ो. सोहन स्वामी की ‘सहज ज्ञान’ पढ़ो. तुम्हें इस सवाल का कुछ सीमा तक उत्तर मिल जाएगा. यह (विश्व-सृष्टि) एक प्राकृतिक घटना है. विभिन्न पदार्थों के, निहारिका के आकार में, आकस्मिक मिश्रण से पृथ्वी बनी. कब? इतिहास देखो. इसी प्रकार की घटना का जंतु पैदा हुए और एक लंबे दौर के बाद मानव. डारविन की ‘जीव की उत्पत्ति’ पढ़ो. और तदुपरांत सारा विकास मनुष्य द्वारा प्रकृति से लगातार संघर्ष और उस पर विजय पाने की चेष्टा से हुआ. यह इस घटना की संभवतः सबसे संक्षिप्त व्याख्या है.
तुम्हारा दूसरा तर्क यह हो सकता है कि क्यों एक बच्चा अंधा या लँगड़ा पैदा होता है, यदि यह उसके पूर्वजन्म में किए कार्यों का फल नहीं है तो?
जीवविज्ञान-वेत्ताओं ने इस समस्या का वैज्ञानिक समाधान निकाला है. उनके अनुसार इसका सारा दायित्व माता-पिता के कंधों पर है जो अपने उन कार्यों के प्रति लापरवाह अथवा अनभिज्ञ रहते हैं जो बच्चे के जन्म के पूर्व ही उसे विकलांग बना देते हैं. स्वभावतः तुम एक और प्रश्न पूछ सकते हो-यद्यपि यह निरा बचकाना है. वह सवाल यह कि यदि ईश्वर कहीं नहीं है तो लोग उसमें विश्वास क्यों करने लगे? मेरा उत्तर संक्षिप्त तथा स्पष्ट होगा-जिस प्रकार लोग भूत-प्रेतों तथा दुष्ट-आत्माओं में विश्वास करने लगे, उसी प्रकार ईश्वर को मानने लगे. अंतर केवल इतना है कि ईश्वर में विश्वास विश्वव्यापी है और उसका दर्शन अत्यंत विकसित.
ईश्वर की उत्पत्ति के बारे में मेरा अपना विचार यह है कि मनुष्य ने अपनी सीमाओं, दुर्बलताओं व कमियों को समझने के बाद, परीक्षा की घड़ियों का बहादुरी से सामना करने स्वयं को उत्साहित करने, सभी खतरों को मर्दानगी के साथ झेलने तथा संपन्नता एवं ऐश्वर्य में उसके विस्फोट को बाँधने के लिए-ईश्वर के काल्पनिक अस्तित्व की रचना की
कुछ उग्र परिवर्तनकारियों (रेडिकल्स) के विपरीत मैं इसकी उत्पत्ति का श्रेय उन शोषकों की प्रतिभा को नहीं देता जो परमात्मा के अस्तित्व का उपदेश देकर लोगों को अपने प्रभुत्व में रखना चाहते थे और उनसे अपनी विशिष्ट स्थिति का अधिकार एवं अनुमोदन चाहते थे.
यद्यपि मूल बिंदु पर मेरा उनसे विरोध नहीं है कि सभी धर्म, सम्प्रदाय, पंथ और ऐसी अन्य संस्थाएँ अन्त में निर्दयी और शोषक संस्थाओं, व्यक्तियों तथा वर्गों की समर्थक हो जाती हैं. राजा के विरुद्ध विद्रोह हर धर्म में सदैव ही पाप रहा है. अपने व्यक्तिगत नियमों और अविभावकीय उदारता से पूर्ण ईश्वर की बढ़ा-चढ़ाकर कल्पना एवं चित्रण किया गया. जब उसकी उग्रता तथा व्यक्तिगत नियमों की चर्चा होती है तो उसका उपयोग एक डरानेवाले के रूप में किया जाता है, ताकि मनुष्य समाज के लिए एक खतरा न बन जाए. जब उसके अविभावकीय गुणों की व्याख्या होती है तो उसका उपयोग एक पिता, माता, भाई, बहन, दोस्त तथा सहायक की तरह किया जाता है.
इस प्रकार जब मनुष्य अपने सभी दोस्तों के विश्वासघात और उनके द्वारा त्याग देने से अत्यंत दुखी हो तो उसे इस विचार से सांत्वना मिल सकती है कि एक सच्चा दोस्त उसकी सहायता करने को है, उसे सहारा देगा, जो कि सर्वशक्तिमान है और कुछ भी कर सकता है. वास्तव में आदिम काल में यह समाज के लिए उपयोगी था. विपदा में पड़े मनुष्य के लिए ईश्वर की कल्पना सहायक होती है.
समाज को इस ईश्वरीय विश्वास के विरूद्ध उसी तरह लड़ना होगा जैसे कि मूर्ति-पूजा तथा धर्म-संबंधी क्षुद्र विचारों के विरूद्ध लड़ना पड़ा था.
मेरी स्थिति आज यही है. यह मेरा अहंकार नहीं है. मेरे दोस्तों, यह मेरे सोचने का ही तरीका है जिसने मुझे नास्तिक बनाया है. मैं नहीं जानता कि ईश्वर में विश्वास और रोज़-बरोज़ की प्रार्थना-जिसे मैं मनुष्य का सबसे अधिक स्वार्थी और गिरा हुआ काम मानता हूँ-मेरे लिए सहायक सिद्घ होगी या मेरी स्थिति को और चौपट कर देगी.
मैंने उन नास्तिकों के बारे में पढ़ा है, जिन्होंने सभी विपदाओं का बहादुरी से सामना किया, अतः मैं भी एक मर्द की तरह फाँसी के फंदे की अंतिम घड़ी तक सिर ऊँचा किए खड़ा रहना चाहता हूँ.
देखना है कि मैं इस पर कितना खरा उतर पाता हूँ. मेरे एक दोस्त ने मुझे प्रार्थना करने को कहा.
जब मैंने उसे अपने नास्तिक होने की बात बतलाई तो उसने कहा, ‘देख लेना, अपने अंतिम दिनों में तुम ईश्वर को मानने लगोगे.’ मैंने कहा, ‘नहीं प्रिय महोदय, ऐसा नहीं होगा. ऐसा करना मेरे लिए अपमानजनक तथा पराजय की बात होगी.
स्वार्थ के लिए मैं प्रार्थना नहीं करूँगा.’ पाठकों और दोस्तो, क्या यह अहंकार है? अगर है, तो मैं इसे स्वीकार करता हूँ.

Friday, 31 August 2007

ये दरअसल हमारे मुल्‍क़ की वीरानी है

अविनाश


जिस वीरानी में कुर्तुल आपा ने पूरी ज़‍िंदगी गुज़ारी, वही वीरानी अस्‍पताल में उनके साथ अब भी मौजूद थी, जब उनकी सांस थम गयी थी। शव उनके वार्ड से निकाल कर उस कमरे में रख दिया गया था, जहां दरअसल शव ही रखे जाते हैं। रिसेप्‍शनिस्‍ट के पास कोई ज़्यादा जानकारी नहीं थी। टीवी वाला कहने पर अस्‍पताल के प्रशासनिक रूम का रास्‍ता ज़रूर बता दिया। वहां से पता चला, सुबह तीन बजे ही इंतक़ाल हुआ। साथ के लोग शव छोड़ कर घर चले गये हैं।

दफ्तर में काम के बोझ से थोड़ा हल्‍का होने के लिए हम स्‍मोकिंग ज़ोन में खड़े थे कि रवीश कुमार ने फोन किया- कुर्तुल एन हैदर नहीं रहीं। हम दौड़ते हुए न्‍यूज़ रूम पहुंचे। ब्रेकिंग न्‍यूज़ की पट्टी टीवी स्‍क्रीन पर चल रही थी। खेल बुलेटिन के बीच में रवीश के हल्‍ला करने पर हमने चार लाइन की इनफॉर्मेशन एंकर के लिए लिखी- उर्दू की मशहूर लेखिका कुर्तुल एन हैदर का आज सुबह नोएडा के कैलाश अस्‍पताल में निधन हो गया है। उनकी मशहूर किताब आग का दरिया की अब तक लाखों प्रतियां बिक चुकी हैं। उन्‍हें ज्ञानपीठ पुरस्‍कार भी मिल चुका है। आज शाम साढ़े चार बजे उन्‍हें जामिया के क़ब्रिस्‍तान में सुपुर्दे ख़ाक किया जाएगा।

... और वीटी लाइब्रेरी से टेप लेकर सीढ़‍ियों पर लगभग दौड़ते हुए स्‍टोर की तरफ भागे। ओबी वैन पहले ही रवाना हो चुकी थी। जिस अफरातफरी के आलम में ये क़यास लगाते हुए पहुंचे कि अस्‍पताल में भारी भीड़ होगी, वहां वे तमाम लोग मौजूद थे, जिन्‍हें शायद नहीं पता होगा कि यहीं एक इतिहास शव कक्ष में खामोश लेटा हुआ है। जानने वालों को शायद आपा के इंतक़ाल की ख़बर नहीं थी या हम इस समझ से भागना चाहते थे कि हमारे मुल्‍क में कुर्तुल जैसी शख्‍सीयत के नहीं रहने के कोई मायने नहीं हैं।

हम भी कहां जानते हैं कुर्तुल एन हैदर को! दफ्तर से अस्‍पताल तक, जितनी देर गाड़ी ने वक्‍त तय किया, इधर उधर फोन मारते रहे। लगभग आधा दर्जन दोस्‍तों से कुर्तुल के नहीं होने का मतलब टटोलते रहे।
(मुंबई में प्रमोद सिंह ने कहा था- आग का दरिया कहीं से लहा लो। लहा नहीं पाये। नये नये एनडीटीवी में आये तो एक दिन विनोद दुआ के हाथ में दिख गया। हमने कहा- दे दीजिए, पढ़कर लौटा देंगे। उन्‍होंने कहा- किस पब्लिकेशन का चाहिए? ये एक टीवी पत्रकार का सवाल था। हम लाजवाब थे। उन्‍होंने समझाया कि दो पब्लिकेशन से ये किताब शाया हुई है। किताबघर वाला अनुवाद ज़्यादा अच्‍छा है, लेकिन वे उन दिनों उसे पढ़ रहे थे। पढ़कर देने का वादा अब भी वादा ही है, जिसे शायद वे भूल चुके होंगे।)
अस्‍पताल से ही घर का पता मिला। सेक्‍टर 21 ई 55, हम वहां गये। वहां भी अस्‍पताल जैसी वीरानी ही तैर रही थी। बाहर कुछ किताबें रखी थीं, जिसके पन्ने टीवी के कुछ कैमरामैन पलट रहे थे। अंदर आम-फहम से दिखने वाले तीन-चार पड़ोसी जैसे लोग हाथों में उर्दू की पतली सी कोई पाक किताब लेकर प्रार्थना जैसा कुछ बुदबुदा रहे थे। अगरबत्ती की गंध घर से बाहर बरामदे में आकर पसर चुकी थी।

आपा की किताबों से कुछ बेहद ही ख़ूबसूरत तस्‍वीरें हमारे कैमरामैन ने उतारी। उन दिनों की तस्‍वीरें, जब कुर्तुल जवान थीं और जब अपनी जवानी को उन्‍होंने वीरानी का हमक़दम बनाने का फ़ैसला लिया होगा। प्रमोद सही कहते हैं कि जबकि एक हिंदुस्‍तानी औरत के लिए इस तरह का जीवन मुश्किल है- अपने वक़्त में अविवाहित, अकेली रहीं। उनकी तीस बरस पुरानी दोस्‍त शुग़रा मेहदी, जो हमें वहीं मिल गयी, कैमरे के सामने की गुफ्तगू में हमें बताया कि वे इस मस'ले पर कुछ भी पूछो ख़फ़ा हो जाती थीं। कहती थीं, पूरी दुनिया संग-साथ शादी-ब्‍याह में रची-बसी है, एक मैं ही अकेली हूं तो क़हर क्‍यों बरपा होता है।

अकेले रहना दरअसल अपने साथ होना होता है। अपने साथ होकर आप तबीयत से दुनिया के रहस्‍य सुलझा सकते हैं। उन्‍होंने सुलझाया। आग का दरिया का नीलांबर रामायण-महाभारत के वक्‍त से लेकर आधुनिक वक्‍त तक से संवाद करता है। महफिलों वाला आदमी तो कायदे से अपने वक्‍त से भी संवाद नहीं कर पाता।

ख़ैर दोपहर बाद से लोगबाग आने शुरू हुए। डेड बॉडी भी आयी। टेलीविज़न की ढेरों गाड़‍ियों से निकल कर पत्रकार ई 55 के आगे चहलक़दमी करने लगे। लेकिन तब तक कुर्तुल के नहीं होने की ख़बर का कोई मतलब नहीं रह गया था। देश में दूसरे बड़े डेवलपमेंट टेलीविज़न से पूरा-पूरा वक्‍त की मांग कर रहे थे।

नाइट शिफ्ट के बाद की जगी दुपहरी में आंख का गर्दा परेशान करने लगा। सुपुर्दे-खाक से पहले हमने घर का रुख कर लिया।