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Saturday, 4 January 2014

सामंतवाद की दीवार में सिर फोड़ता सामाजिक न्याय...



नवंबर 2005 में जब बिहार में लालू प्रसाद की पार्टी का तथाकथित "जंगल राज" खत्म हुआ और तय हो गया कि भाजपा के सहारे से नीतीश कुमार बिहार के मुखिया बन जाएंगे, उस वक्त मैं बिहार के सीतामढ़ी जिले मे अपने गांव से पांच किलोमीटर दूर गाढ़ा चौक पर था। जदयू-भाजपा की जीत की मुनादी पीटती हुई भीड़ चौक की तरफ आ रही थी। पास आने पर "नीतीश कुमार जिंदाबाद" जैसे नारों के साथ जो मुझे सुनाई पड़ा, वह किसी भी होशमंद शख्स को दहलाने के लिए काफी था। लगभग दो सौ लोगों की भीड़ गुलाल-अबीर से होली खेलती उन्माद में चीख रही थी कि "हमारा राज वापस आ गया... हमारा राज वापस आ गया...।"

यहां मुझे यह साफ करने की जरूरत शायद नहीं है कि वे लोग कौन थे जो इस बात की होली मना रहे थे कि "हमारा राज वापस आ गया...।" मैं अंदाजा लगा सकता था, लेकिन फिर भी मैंने वहां पिछले कई साल से कंधे पर डोलची टांग कर पान बेचते सुखो भाई से पूछा कि ये कौन लोग हैं। उन्होंने मुझे जवाब के तौर पर सवाल दिया कि इस चौक पर और किसकी हिम्मत होगी दिवाली के साथ होली मनाने की। फिर उन्होंने धीरे और सहमी हुई आवाज में बताया कि सब बाबू साहब हैं।

लालू प्रसाद की तरह नीतीश कुमार भी पिछड़ी जाति, यानी ओबीसी की ही पृष्ठभूमि से आते हैं। लेकिन गाढ़ा चौक पर "बाबू साहबों" की भीड़ क्यों खुशी मना रही थी और नारे लगा रही थी कि "हमारा राज वापस आ गया...।"

मैं नहीं जानता कि कुछ उदार कहे जाने वाले लोगों को आज भी यह वहम क्यों है कि नीतीश भाजपा के साथ खड़े हैं, लेकिन भाजपाई नहीं हैं। इस देश की असली मुश्किल यही है कि यहां ब्योरा जमा करना और उसे पेश करना अपनी जिम्मेदारी का पूरा होना मान लिया जाता है। हमें यह ध्यान रखने की जरूरत है कि अगर हमें यहां से आगे बढ़ना है तो किसी भी क्या के क्यों पर बात करनी होगी, उसकी करनी होगी।

गाढ़ा चौक पर "हमारा राज वापस आ गया..." की मुनादी पीटते हुए लोग कोई चाणक्य नहीं थे, लेकिन वे क्यों निश्चिंत थे कि उनका "राज" वापस आ गया? क्या सिर्फ इसलिए कि भाजपा सत्ता की हिस्सेदार थी? मामला केवल हिस्सेदारी का नहीं था, बल्कि उस भरोसे का था जो नीतीश कुमार ने दिया था और उस मानसिकता का था, जिसमें नीतीश कुमार जीते हैं। यहां शायद बिहार में अति पिछड़ी जातियों और महादलितों के लिए की गई उनकी तथाकथित "क्रांति" की हकीकत का बयान करने का मौका नहीं है।

लेकिन 2005 के नवंबर से आज तक अलग-अलग मौकों पर गाढ़ा चौक पर गूंजते वे नारे अगर मुझे जिंदा दिखे हैं तो इसलिए कि नीतीश कुमार और उनकी सरकार ने हर मौके पर उसे पाला-पोसा और मजबूत किया है।

सत्ता में आने के महज तीसरे महीने उन्होंने अपना सबसे पहला बड़ा फैसला लिया और उस पर तुरंत अमल किया वह था अमीरदास आयोग को भंग करना। मुझे अक्सर यह शक होता है कि कहीं यह नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री बनने की पूर्व शर्त तो नहीं थी! वरना क्या वजह हो सकती है कि जो अमीरदास आयोग अपनी लगभग सारी रिपोर्ट पूरी कर चुका था, बस उसके सौंपे जाने की औपचारिकता बाकी थी, उसे आखिरी वक्त में भंग कर दिया गया?

दरअसल, अमीरदास आयोग शायद चाह कर भी उन हकीकतों को नजरअंदाज नहीं कर सकता था कि भूमिहारों की रणवीर सेना को खाद-पानी से सींचने और पालने-पोसने वाले लोग भाजपा और जदयू के वैध साए में जनतांत्रिक राजनीति कर रहे थे और उसके पांव राजद के भीतर भी फैले हुए थे। इसलिए इस आयोग का भंग किया जाना सबके लिए सुविधाजनक था और शायद इसीलिए किसी को भी इस पर हंगामा खड़ा करना जरूरी नहीं लगा। लालू प्रसाद की उस राजद के लिए भी नहीं, जिसके सत्ताकाल में रणवीर सेना द्वारा किए गए कत्लेआमों की पड़ताल और उसके तारों की जांच के लिए वह आयोग बिठाया गया था।

अमीरदास आयोग को भंग किए जाने को मैं नीतीश कुमार की सामाजिक राजनीति की दृष्टि मानता हूं। और उनकी सरकार की समूची कार्यशैली ने इसे बार-बार पुष्ट किया है। फर्क सिर्फ यह है कि उनके कामकाज का आलकन एक लगभग बिके हुए और समर्पित मीडिया के "ट्रांसफॉर्म्ड बिहार" टाइप रिपोर्टों के आधार पर होता रहा है। सवाल है कि नीतीश कुमार की मेहरबानी से बिहार को ट्रांसफॉर्म्ड बताने वालों का समाज कौन-सा है और उसे अपने निष्कर्षों का आधार बनाने वाले लोग कौन हैं? पैदा होने के बाद रणवीर सेना की बर्बरताओं को राजद सरकार की नाकामी करार देना सही था, लेकिन इसी मीडिया के लिए अमीरदास आयोग को भंग करना किसी परेशानी की वजह नहीं था। क्यों?

यही वही दौर था जब 2002 में रणवीर सेना का मुखिया ब्रह्मेश्वर सिंह पकड़े जाने के बाद से जेल में बंद था और बथानी टोला जैसे तमाम कत्लेआमों के सिलसिले में जहां भी अदालतों में उसकी खोज होती, नीतीश सरकार के सिपाही उसके "फरार" होने की खबर दे देते। और आखिरकार नीतीश कुमार की दोस्ताना मेहरबानी से जब ब्रह्मेश्वर सिंह जेल से बाहर आ गया तो इस पर क्यों किसी को हैरान होना चाहिए? यहां तक कि लालू प्रसाद या रामविलास पासवान को भी इस पर चुप रहना जरूरी लगा तो इसके कुछ तो कारण रहे होंगे।

और जब पटना हाईकोर्ट के जजों ने लक्ष्मणपुर बाथे या बथानी टोला कत्लेआम के निचली अदालत में साबित तमाम अपराधियों को रिहा किया तो कम से कम मुझे सचमुच कोई हैरानी नहीं हुई। लालू प्रसाद की राजद सरकार ने बहुतेरे धतकरम किए होंगे, लेकिन कम से कम लक्ष्मणपुर बाथे और बथानी टोला मामले में उसने पीड़ितों के पक्ष में इतना जरूर किया कि सेशन कोर्ट ने कइयों को छोड़ने के बावजूद कइयों को फांसी और उम्रकैद की सजा दी थी। लेकिन जब "अपना राज" वाली सरकार आ गई तो राज्य की बदली हुई तस्वीर का असर अदालतों पर भी तो पड़ना चाहिए! सो हाईकोर्ट के जजों को स्वाभाविक रूप से उस कत्लेआम के गवाह भरोसेमंद नहीं लगे। निचली जातियों के लोग सिर्फ जान देते वक्त भरोसेमंद होते हैं। वे अदालत के कठघरे में भरोसेमंद नहीं होते हैं।

अभी बहुत दिन नहीं बीते हैं जब दिल्ली में रोहिणी की एक अदालत की जज कामिनी लाउ ने भी हरियाणा के मिर्चपुर कांड के पीड़ितों को "गैरभरोसेमंद" गवाह घोषित किया था और तीन को छोड़ कर तमाम आरोपियों को मासूम होने का तमगा देकर रिहा कर दिया था। दलितों पर अत्याचार के मुकदमों में सजा की दर महज दो प्रतिशत के आसपास है। खुद केंद्र सरकार कहती है कि दलितों पर जुल्म से संबंधित लगभग अस्सी फीसद मामले लंबित हैं। यानी सौ में करीब अस्सी मामले अदालतों तक पहुंचे ही नहीं। और हममें से बहुत सारे लोग हैं जो न्यायिक सेवाओं में आरक्षण की मांग को एक पिछड़ा और द्वेषपूर्ण मांग करार देते हैं! हो सकता है, यह शक सही हो। लेकिन वे कौन-सी वजहें होंगी कि उसी पटना हाईकोर्ट को अमौसी हत्याकांड में दस लोगों को फांसी की सजा देने में कोई हिचक नहीं हुई। क्या इसलिए कि नीतीश सरकार की परिभाषा के हिसाब से वे आरोपी महादलित थे और अदालत को वे सभी गवाह "भरोसेमंद" लगे जो सवर्ण थे? यह देश के दूसरे इलाकों का भी सच हो सकता है। लेकिन बिहार में पुलिस थानों के दारोगा को शायद जज भी बना दिया गया है जो उत्पीड़न, अत्याचार या अपराध के मामले दर्ज नहीं करता है, तत्काल थाने में ही निपटा देता है। आंकड़ों में अपराध में कमी वैसे ही नहीं होती है। और दलितों-पिछड़ों पर जुल्म ढाने वाली सामंती ताकतों ने नीतीश कुमार को यों ही नहीं बिठाया है बिहार की कुर्सी पर!

नीतीश एक अच्छे प्रतिनिधि साबित हुए हैं उन ताकतों के, जो उनके पहले के तकरीबन डेढ़ दशक के तथाकथित जंगल राज में निराश हो गए थे। लालू प्रसाद अपने शुरुआती सत्ताकाल में कहते थे- "गाय चराने वालों, सुअर चराने वालों, पढ़ना लिखना सीखो, पोथी-पतरा फेंको, पढ़ना-लिखना सीखो।" सुअर या बकरी चराने वालों के पढ़ने-लिखने और पंडितों का पोथी-पतरा फेंक देने के "खतरे" का अंदाजा किसे नहीं था। फिर लालू के ही नाम से प्रचारित "परवल का भुजिया खाओ" या "भूरा बाल साफ करो..." जैसे जुमलों ने सचमुच बहुत सारे लोगों के दिमाग में कुछ गड़बड़ पैदा की। लालू की खासियत यही थी और शायद उनकी सीमा भी कि इससे ज्यादा वे कुछ नहीं कर सके। शायद कर भी नहीं सकते थे। और उनके जुमले आखिरकार एक खास तरह का दिशाभ्रम परोसने से ज्यादा का दर्जा हासिल नहीं सके। बाद में उन्होने जो रास्ता पकड़ा, उसे उम्मीदों के साथ धोखा करना कहा जाए, तो वह भी कम होगा। पोथी-पतरा फेंको का नारा देने वाले वही लालू प्रसाद आज मंदिरों में दर-दर भटकते हुए जेल पहुंच चुके हैं और अपने भविष्य के लिए तंत्र-मंत्र, पूजा-पाठ और पंडितों के आगे दंडवत हैं।

लेकिन असली मुश्किल शायद भाकपा (माले) की थी। 2004 तक मैं पटना में ही था और मैंने देखा है कि भाकपा (माले) की रैलियों में किसी भी दूसरी पार्टी की रैलियों से बहुत ज्यादा भीड़ होती थी। लेकिन उस भीड़ को वे शायद कभी अपनी ताकत के रूप में तब्दील नहीं कर पाए। समूचे मध्य बिहार में जिस संघर्ष की लहर भाकपा (माले) ने पैदा की, उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। लेकिन वे कौन-सी वजहें रहीं कि उसकी जमीन पर कब्जा किसी और का हो गया। क्यों इसके भीतर वे तमाम लोग किनारे लगा दिए गए, जिन्होंने इसे खड़ा किया? यह पार्टी जिनके लिए लड़ाई लड़ने का दावा करती रही है, उनके बीच का कोई भी चेहरा पटल पर नहीं दिखता है तो क्यों?

वैसे यह अकेले माले की दिक्कत नहीं है। माकपा और भाकपा ने भी इसी पैमाने पर जो खाली, लेकिन बेहद उपजाऊ जमीन छोड़ी, उस पर किसी न किसी को तो फसल उगाना था! कम्युनिस्ट पार्टियों के लिए जो लोग अपने हो सकते थे, उन्हें ये पार्टियां अपनी नहीं लगीं, क्यो? क्यों उन नक्सली समूहों को मौका मिला जिन्होंने दलित-पिछड़ी जातियों के सबसे कमजोर तबकों को रणवीर सेना और सरकारी पुलिस के बीच में खड़ा कर दिया? जिस स्थिति में नक्सली समूह रहे हैं, उसमें उत्पीड़ित तबकों को वे इससे ज्यादा क्या दे सकते थे? लक्ष्मणपुर बाथे या बथानी टोला के बदले सेनारी कर दिया जाएगा, लेकिन पटना हाईकोर्ट में कौन खड़ा होगा लक्ष्मणपुर बाथे या बथानी टोला के भुक्तभोगियों के लिए? क्या इस देश के समाज को समझना इतना मुश्किल है?

नब्बे के दशक में बिहार में दलितों और पिछड़ी जातियों का जो उभार हुआ था, उसका नेतृत्व वामपंथी दलों को करना था। लेकिन क्यो यह ताकत लालू का दामन थाम कर आगे बढ़ी और नीतीश के जरिए फिर वहीं वापस लौट गई, जहां वह थी। सोशल जस्टिस के नारे को सोशल इंजीनियरिंग में तब्दील करने के जितने बड़े अपराधी नीतीश कुमार हैं, लालू की जिम्मेदारी उससे कम नहीं बनती। लेकिन वामपंथी पार्टियों ने क्या किया? क्यों नीतीश जैसे फर्जी लोगों को निचली जातियों का उद्धारक घोषित कर दिया जाता है, जबकि नीतीश की मूल दृष्टि सामंती ताकतों की जड़ें मजबूत करती हैं? कुछ सपने दिखाए गए और ढेर सारी उम्मीदों के साथ लोग इंतजार करते रहे और कोई सोशल जस्टिस से बेईमानी करता रहा, कोई सोशल इंजीनियरिंग को पुख्ता करता रहा तो कोई इसे पचड़ा कह कर दूर भागता रहा।

इस देश में जाति से निपटे कौन-सा वर्ग खड़ा किया जा सकता है? इस देश में वर्ग के परदे से जाति को ढकना क्या एक मजाक नहीं लगता?

खैर, कोई भी सत्ता बिना तंत्र पर कब्जे के मन-मुताबिक नहीं चल सकती। लालू प्रसाद के कथित "जंगल राज" में जो थोड़ी तोड़-फोड़ हुई थी, नीतीश के चेहरे के जरिए उसी को दुरुस्त किया जा रहा है। नौकरशाही को खुली छूट दे दो, वह आपको सत्ता का मुखौटा बने रहने में कोई अड़चन नहीं पैदा करेगा। और किसी को यह समझने के लिए बहुत मेहनत नहीं करनी होगी कि बिहार की नौकरशाही और बिहार का तंत्र आज भी किसका है, किसके लिए है। साइकिल वितरण टाइप योजनाएं दरअसल वे परदे हैं जिसके पीछे दो दशकों में सामाजिक यथास्थितिवाद के मनोविज्ञान के गड़बड़ाए हुए पुर्जे दुरुस्त किए जा रहे हैं। सभी मोर्चों पर...!

बिहार का मीडिया हमें दिखाता है कि नीतीश सरकार ने स्कूलों-अस्पतालों की हालत अच्छी कर दी है। वह हमें यह नहीं बताता कि स्कूल-अस्पताल की इमारतों पर रंग-रोगन के अलावा पढ़ाई-लिखाई या डॉक्टर-इलाज की हकीकत क्या है। हम अखबारों के पन्नों पर बिहार की चमकती सड़कों की खबरें पढ़ कर खुश होते हैं। कोई नहीं बताता कि हर वक्त पैसे का रोना रोने वाली बिहार सरकार अपने कुल बजट का अड़तीस फीसद हिस्सा केवल सड़कों के लिए देती है तो इसके पीछे मकसद क्या केवल सड़कें दुरुस्त करना है? कंस्ट्रक्शन और सेवा क्षेत्र की चमकती तस्वीर पर ग्रोथ-रेट के फर्जीवाड़े से किसका चेहरा खिल रहा है? यह पता लगाने की जरूरत है कि सड़क निर्माण से लेकर कंस्ट्रक्शन के तमाम ठेके समाज के किस वर्ग के हिस्से जा रहे हैं।

बहुत अच्छी सड़कों वाले हरियाणा से कोई खबर आ जाती है कि किसी दलित ने किसी सवर्ण के घड़े से पानी पी लिया और उसके हाथ काट दिए गए। और बहुत चमकती सड़कों की ओर तेजी बढ़ते और दावा करने वाले बिहार में भी एक दलित किसी सवर्ण के घर के आगे लगे सरकारी हैंडपंप से पानी पी लेता है तो उसे पीट-पीट कर मार डाला जाता है। फारबिसगंज में जो हुआ था, वह अररिया की तरह चुपचाप दफन हो जाता, अगर चोरी से बनाया गया वीडियो क्लिप बाहर नहीं आ जाता। हमारी बहुत अच्छी सड़कों की मंजिल कहां हैं?

हम लक्ष्मणपुर बाथे या बथानी टोला पर हाईकोर्ट के फैसले से परेशान होते हैं। लेकिन इस व्यवस्था में इससे अलग कोई फैसला होना भी कहां है? लक्ष्मणपुर बाथे या बथानी टोला कत्लेआम को अंजाम देने वाली रणवीर सेना के गुंडे जब ब्रह्मेश्वर सिंह की हत्या के बाद राजधानी पटना में नंगा नाच करते हैं और उसे पोसने वाली सरकार इस तांडव का मजा लेते हुए कहती है कि उन्हें रोकने से दंगा भड़क जाता तो हम किससे उम्मीद कर रहे हैं? रणवीर सेना के गुंडों का तांडव दंगा नहीं था और उसे रोकने से दंगा भड़क जाता! याद कीजिए कि बथानी टोला कत्लेआम पर पटना हाईकोर्ट के फैसले के बाद नीतीश कुमार ने कुछ भी कहा हो।

नीतीश सरकार ठीक कहती है। उन्हें रोका जाता तो समाज की दबी-कुचली पिछड़ी जातियों को यह संदेश कैसे पहुंचता कि रणवीर सेना के नेतृत्व में सवर्ण वर्चस्व आज भी कितनी ताकत रखता है। यानी एक मोर्चे पर तंत्र चुपचाप अपना काम कर रहा है और अब दूसरा मोर्चा भय का मनोविज्ञान रच रहा है।

नीतीश कुमार की यह वही सरकार है जिसके हाथ सरकारी स्कूल के टीचरों से लेकर आशा की महिला कार्यकर्ताओं के शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों पर बर्बर लाठी चार्ज करते हुए नहीं कांपते। लेकिन रणवीर सेना का नंगा नाच शायद वह मंत्रमुग्ध होकर देखती है। कॉमरेड एबी बर्धन जब कहते हैं कि नीतीश कुमार ने लालू प्रसाद से सत्ता पाने के लिए रणवीर सेना जैसे सामंती संगठनों का सहारा लिया तो उसे एक विवादित बयान कहा जाता है। लेकिन नीतीश सरकार का वह कौन-सा चरित्र है जो उसे एबी बर्धन की राय से उसे अलग करता है। वैसे कॉमरेड एबी बर्धन ने सिर्फ वही कहा जो बहुत सारे लोगों के साथ-साथ खुद नीतीश सरकार भी पहले से जानती है। क्या यह बेवजह होगा कि जातिगत आतंक और कत्लेआम का प्रतीक बन चुका रणवीर सेना का मुखिया कहता है कि नीतीश बिहार में अच्छा काम कर रहे हैं? (हालांकि यही कॉमरेड एबी बर्धन अब मानते हैं कि नीतीश कुमार बिल्कुल धर्मनिरपेक्ष हैं और लालू प्रसाद उनके सामने संकट पैदा कर रहे हैं। पता नहीं, यह दिशाभ्रम कॉमरेडों को कहां लेकर जाएगा।)

ब्रह्मेश्वर सिंह की रिहाई, बथानी टोला और लक्ष्मणपुर बाथे जनसंहार पर पटना हाईकोर्ट का फैसला, ब्रह्मेश्वर की हत्या के बाद पटना में तांडव- सभी एक ही जगह पहुंचने वाले अलग-अलग रास्ते हैं।

ब्रह्मेश्वर सिंह की हत्या के बाद अगले कम से कम पंद्रह दिन तक के बिहार के कम से कम हिंदी अखबारों के पन्ने पलटे जा सकते हैं। करीब दो हफ्ते में इन अखबारों ने बताया कि बिहार के सत्ताधारी सामाजिक वर्ग का चरित्र क्या है, वह कैसे काम करती है। लगातार दस-बारह दिनों से अगर पहले पन्ने पर आठ कालम हत्यारों के किसी सरगना को "मुखिया जी" या दूसरे संबोधनों के साथ समर्पित हो तो क्या इसके मायने समझने में किसी को दिक्कत होनी चाहिए? यहां तक कि ब्रह्मेश्वर के श्राद्ध के भोज के एक दिन पहले जब सत्ताईस गैस सिलेंडर फटे और उसमें बहुत कुछ खाक हुआ तो उसे भी किसी आरती की तरह पेश किया गया। उसी में एक सरकारी स्कूल के खाक हो जाने पर एक लाइन की चिंता नहीं दिखी। वह सरकारी स्कूल किसका था और किसने उसके इस्तेमाल की इजाजत दी? लेकिन जब राज ही अपना हो तो इजाजत कैसी?

एक दुर्दांत हत्यारे की हत्या के बाद उसका महिमामंडन करता यह वही मीडिया है जिसे बथानी टोला या लक्ष्मणपुर बाथे कत्लेआम पर हाईकोर्ट के फैसले की खबर भीतर के पन्नों के लायक लगी। फैसले पर सवाल तो दूर, पीड़ितों की राय तक के लिए जगह नहीं थी। यही आपराधिक निर्लज्जता फिलहाल बिहार के मीडिया की सबसे बड़ी खासियत है जिसके सहारे चेतना के स्तर पर सामंती शासन को स्वीकार करने की जमीन मजबूत की जा रही है।

लेकिन इन सबके बीच चुपचाप जो हुआ, क्या खुद नीतीश कुमार उस पर गौर कर रहे हैं।  ब्रह्मेश्वर सिंह की हत्या के बाद बिहार के अखबारों में उनकी तथाकथित सेवा यात्रा की जगह क्या थी?  उनकी जिन यात्राओं का ब्योरा अखबारों के पहले पन्ने का आभूषण होता था, वह भीतर के नवें-दसवें या बारहवें-तेरहवें पन्ने पर क्यों खिसक गया? क्या यह नीतीश कुमार के लिए कोई चेतावनी है? हां, उन्हें ध्यान रखना होगा कि वे जिनके मोहरे हैं, वे उनके खिलाफ नहीं जा सकते, बल्कि उनकी अनदेखी भी नहीं कर सकते। परना जिस व्यवस्था के वे नुमाइंदगी कर रहे हैं, वह उन्हें झटकने में एक पल की भी देरी नहीं करेगी।

इसीलिए वे अमीरदास आयोग को भंग करते हैं, बद्योपाध्याय कमिटी की सिफारिशों को खारिज करते हैं, सवर्ण आयोग बनाते हैं, बथानी टोला या लक्ष्मणपुर बाथे जनसंहार पर पटना हाईकोर्ट के शर्मनाक फैसले पर चुप रहते है और रणवीर सेना का सरगना ब्रह्मेश्वर सिंह के गुंडो को पटना में आग लगाने की पूरी आजादी देते हैं।

2002 में नरेंद्र मोदी ने भी गुजरात में यही किया था। हिंदुओं को अपना गुस्सा निकालने की पूरी आजादी दी गई और अब वहां सब कुछ सहज दिखता है। विकास के जिस परदे से नरेंद्र मोदी के अपराधों को ढका जा रहा है वही परदा नीतीश कुमार ने अपने आगे टांग रखा है।

(यह लेख कुछ समय पहले लिखा गया था। अपने आलसीपने का क्या जवाब हो सकता है?)

Monday, 21 February 2011

गरीब औरत की इज्जत, डेढ़ लाख रुपए: वाया सुप्रीम कोर्ट


उत्तर प्रदेश में बांदा की शीलू ने एक अखबार के संवाददाता को बताया कि विधायक (पुरुषोत्तम द्विवेदी) ने उसके साथ बलात्कार करने की हिम्मत इसलिए की क्योंकि वह एक गरीब बाप की बेटी है।

शीलू का बलात्कार करने वाला विधायक पुरुषोत्तम द्विवेदी अब इस बात के लिए जश्न मना सकता है कि जो लोग उसे शीलू के बलात्कार के मामले में सजा दिलाने पर तुले हैं, इस देश की सु्प्रीम कोर्ट ने उन्हें आईना दिखा दिया है कि न्याय के आखिरी मंदिर का इस बारे में क्या मानना है। अब उस फैसले को सामने रख कर पुरुषोत्तम द्विवेदी चाहे तो शीलू को उसकी ‘औकात’ के हिसाब से एक-डेढ़ लाख रुपए अदा कर दे और खम ठोंक कर बाकायदा सुप्रीम कोर्ट से ‘राहत सर्टिफिकेट’ हासिल कर अपने ‘दुश्मनों’ को मुंह चिढ़ाए कि बलात्कार-बलात्कार में फर्क होता है! चूंकि उसके पास डेढ़ लाख रुपए की अगली किस्तों की कमी नहीं होगी, इसलिए वह अगली किसी शीलू के शिकार पर निकल सकता है।

दरअसल, इस देश में रोजाना होने वाले सैंकड़ों बलात्कारों के मामले में फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक नजीर पेश की है, लेकिन इसका ‘फायदा’ बलात्कार की शिकार सिर्फ उन महिलाओं को मिल पाएगा, जो गरीब हैं! अगर पीड़ित महिला गरीब नहीं है तो उसे यह ‘फायदा’ नहीं मिल पाएगा!
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मामला कुछ यों है कि सांपला, रोहतक के इस्माइल गांव में संजय और रामफल ने संतरो (बदला हुआ नाम) के साथ आठ साल पहले सामूहिक बलात्कार किया था। सेशन कोर्ट ने इन दोनों अपराधियों को आईपीसी की धारा 376 (बी) के तहत बारह-बारह साल की कैद की सजा दी। बाद में हाईकोर्ट ने भी इस सजा को बरकरार रखा। दोनों अपराधियों ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की और सुप्रीम कोर्ट की एक खंडपीठ ने न्याय के एक नए सिद्धांत का प्रतिपादन किया। फैसला सुनाते हुए कोर्ट ने कहा कि किसी महिला की इज्जत कुछ लाख रुपए नहीं हो सकती, लेकिन महिला गरीब है, इसलिए दोनों अपराधी अगर महिला को डेढ़-डेढ़ लाख रुपए मुआवजा दे दें तो उन्हें जमानत पर रिहा कर दिया जाए। इस तरह का अब तक का यह पहला मामला है जिसमें सामूहिक बलात्कार जैसे संगीन अपराध के मामले में मुआवजे की शर्त पर दोषियों को जमानत दे दी गई। (हिंदुस्तान, 13 जनवरी, 2011)

बलात्कारियों को लेकर न्यायमूर्तियों की इसी पीठ का एक और नया फैसला भी इसी तर्ज पर आया। 22 फरवरी को इन्हीं दोनों न्यायमूर्तियों ने पंजाब के लुधियाना जिले में मार्च 1997 में एक महिला के साथ सामूहिक बलात्कार करने वाले तीन अपराधियों को पचास-पचास हजार रुपए अदा करने की शर्त पर महज साढ़े तीन साल कैद की सजा काटने के बाद रिहा करने का आदेश दे दिया। मुजरिमों को सेशन कोर्ट दस-दस साल कैद की सजा सुनाई थी, हाईकोर्ट ने मुजरिमों की अपील खारिज कर दी थी, लेकिन इन दोनों न्यायमूर्तियों ने एक बार फिर अपनी करीब हफ्ते भर पहले शुरू की गई परंपरा का निर्वहन करते हुए एक और इसी तरह का फैसला सुनाया। तर्क वही है, पीड़िता और उसके साथ बलात्कार की सजा पाए अपराधी के बीच समझौता हो गया! गौर करिएगा, इसमें बलात्कार की शिकार औरत की इज्जत की कीमत घट कर पचास हजार रुपए हो गई है। अब देखना है कि न्याय के इस सबसे बड़े मंदिर में बलात्कार की शिकार अगली किसी औरत की इज्जत की कितनी कीमत लगाई जाती है...!
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ध्यान रहे कि बलात्कार के अपराध में धारा 376 (जी ) के तहत न्यूनतम सजा दस वर्ष और अधिकतम उम्रकैद है। यह अपराध गैरजमानती तथा गैरमाफी योग्य है।

सुप्रीम कोर्ट की जिस खंडपीठ ने यह फैसला सुनाया है, उसके दो माननीय ‘न्यायमूर्ति’ हैं माननीय न्यायमूर्ति मार्कंडेय काट्जू और माननीय न्यायमूर्ति ज्ञानसुधा मिश्रा। यहां साफ करने की जरूरत है कि इनमें से ज्ञानसुधा मिश्रा एक महिला का नाम है।

सुप्रीम कोर्ट के इस खंडपीठ में शामिल एक, मार्कंडेय काट्जू वही ‘न्यायमूर्ति’ हैं, जिन्होंने कुछ समय पहले लिव-इन रिलेशनिशप पर एक फैसला देते हुए कहा था कि ‘रखैलों’ को मुआवजा पाने का कोई हक नहीं है, और कि इसके लिए लंबे समय तक पति-पत्नी की तरह रहते दिखना होगा। हालांकि इन्हीं मार्कंडेय काट्जू ने अपने एक अन्य फैसले में नौ साल तक एक स्त्री के साथ रहने और उससे दो बच्चों का पिता बनने के बावजूद पत्नी के रूप में स्वीकार न करने वाले एक पुरुष के लिए महज ‘कपटी’ शब्द का इस्तेमाल करने तक से इनकार कर दिया और कहा कि ऐसे शख्स को ज्यादा से ज्यादा असभ्य कहा जा सकता है और कानून के तहत उसे सजा देना नाइंसाफी होगी। (उस खंडपीठ में भी ज्ञानसुधा मिश्रा उनके साथ थीं, लेकिन उन्होंने मार्कंडेय काट्जू से साफ तौर पर असहमति जताई थी और कहा था कि ऐसे पुरुष को कपटी कहना उचित होगा और उसे जेल की सलाखों के पीछे जाना ही होगा।) बहरहाल, जब रखैल शब्द पर आपत्ति उठाई गई तो न्यायमूर्ति श्री मार्कंडेय काट्जू का कहना था कि इस शब्द का इस्तेमाल तो सदियों से किया जाता रहा है। क्या ताजा फैसले से न्यायमूर्ति श्री मार्कंडेय काट्जू का इससे कोई अलग चेहरा सामने आता है?

अंग्रेजी में एक शब्द है माइसोजीनिस्ट...। इसका मतलब यह होता है कि कोई अपनी बुनावट में ही स्त्रियों से नफरत करने वाला है।

लेकिन हमारे लिए केवल दुख नहीं, त्रासदी का मामला यह है कि इसी खंडपीठ में ज्ञानसुधा मिश्रा के रूप में एक महिला भी बैठी हुई थीं और उन्हें भी इसमें आपत्ति करने लायक कोई बात नहीं दिखी कि सेशन कोर्ट और हाईकोर्ट में बारह-बारह साल की सजा पाए बलात्कारियों को इस शर्त पर राहत देने का आदेश दे दिया जाए कि वह पीड़ित महिला को डेढ़ लाख रुपए अदा कर दें। यह इसलिए कि महिला गरीब है। न्यायमूर्तियों ने यह कहने की मेहरबानी की कि ‘किसी महिला की इज्जत कुछ लाख रुपए नहीं हो सकती...।’

देश की सबसे ऊंची अदालत में न्याय की कुर्सी पर बैठने के बावजूद ज्ञानसुधा मिश्रा को भी यह क्यों लगता है कि एक स्त्री की ‘इज्जत’ का पर्याय उसका शरीर है और अगर बंदूक की नोक पर उसके साथ बलात्कार किया जाता है तो इससे उसकी ‘इज्जत’ चली जाती है? क्या एक स्त्री का अस्तित्व इसी ‘इज्जत’ के भरोसे टिका होता है, जिसके लूट लिए जाने के बाद उसके पास कुछ नहीं बचता? फिर इस सामाजिक स्थापनाओं को हम क्यों गलत कहें जिसमें इस ‘इज्जत’ के लुट जाने के बाद मान लिया जाता है कि अब वह कौन-सा मुंह लेकर जिएगी? क्या हम अक्सर आने वाली इन खबरों से इतने अनजान हैं कि किसी स्त्री ने बलात्कार के बाद खुद आत्महत्या कर ली? क्या स्त्री की अस्मिता के सारे सवाल इसी ‘इज्जत’ के साथ खत्म हो जाते हैं? और क्या बलात्कार खासतौर पर हमारी सामाजिक परिस्थितियों में एक स्त्री के अस्तित्व पर एक ऐसा हमला नहीं है, जिस अपराध के लिए कितनी भी सख्त सजा कम ही होगी?

सवाल है कि ये ‘इज्जत’ है क्या और इस तथाकथित इज्जत की यह परिभाषा किसने गढ़ी है...? किसने एक औरत को घर या जमीन की तरह एक जायदाद में तब्दील कर दिया और किसने उसकी अस्मिता के सारे सवालों को खारिज करके उसकी इज्जत को उसके देह का दूसरा नाम बना दिया?

दरअसल, स्त्री को गुलाम बनाए रख कर ही समाज के सामंती चरित्र को बचाए रखा जा सकता है। इसका विस्तार करें तो स्त्रियों के साथ सामाजिक वर्णक्रम में निचले पायदान पर गिनी जाने वाली जातियों को भी इस चक्र में शामिल किया जा सकता है। यानी स्त्रियों और समाज के अधिकांश हिस्से को अपनी उंगलियों पर नचाने वाले ब्राह्मणवादी सूत्रों ने ऐसा सामाजिक मनोविज्ञान रच दिया है कि उसमें गुलामी और त्रासदी झेलते हुए शोषित और पीड़ित वर्गों को पता भी नहीं चल पाता कि इस व्यवस्था ने कब और कैसे उनके स्वत्व का हरण कर लिया।

लेकिन देश के सुप्रीम कोर्ट के फैसलों में अगर इन्हीं स्थापनाओं की छाया दिखती है तो अंदाजा लगाइए कि यह व्यवस्था किसकी है और अलग-अलग मोर्चे पर अलग-अलग रूप में किसके लिए चल रही है!

सवाल है कि क्या सुप्रीम कोर्ट के इन दोनों जजों ने सचमुच कोई ऐसा फैसला सुनाया है कि इससे किसी को दुखी होना चाहिए? हमारे समाज में कौन किसी बात पर दुखी होता है और किसके दुखी होने का कोई मतलब है? इस फैसले से किसको दुख होगा? सुप्रीम कोर्ट ने तो उन्हीं धारणाओं, मानसिकताओं और रिवायतों को कानूनी स्थापना दी है, जो हमारे समाज और सरकार के चरित्र में घुला-रचा-बसा है! मगर इसके बाद एक सवाल और खड़ा होता है कि देश के सुप्रीम कोर्ट में न्याय की कुर्सी पर क्या सामाजिक रिवायतों के झंडाबरदार बैठे हुए हैं?

कोई कह सकता है कि महिला खुद भी इसके लिए राजी थी। लेकिन जो लोग महिला के भी राजी होने का तर्क स्वीकार कर रहे हैं, क्या वे अंदाजा भी लगा सकते हैं कि वह महिला व्यवस्था की इन बेरहम परतों के बारे में कितना सोच-समझ सकती है? जब सबसे ऊंची अदालत में न्याय की कुर्सी पर बैठे लोग उसकी ‘इज्जत’ और बलात्कार जैसे अपराध के लिए सजा की यह परिभाषा गढ़ रहे हैं, तो क्या हम उस महिला से अपने साथ हुए बलात्कार, इसके प्रति सामाजिक अवधारणाओं, स्थापनाओं, परंपराओं और मानसिकता की साजिशें समझ-बूझ कर कुछ तय करने की उम्मीद करेंगे?

महिला चूंकि गरीब है, इसलिए डेढ़ लाख रुपए अदा कर रिहा करने का आदेश देते हुए भी दोनों न्यायमूर्ति यह तो मान ही रहे हैं कि कठघरे में खड़े दोनों व्यक्ति बलात्कार के अपराधी हैं। सेशन कोर्ट और हाईकोर्ट ने इन दोनों को बारह साल की कैद की सजा सुनाई थी। अगर सुप्रीम कोर्ट को लगता है कि ये दोनों व्यक्ति अपराधी नहीं हैं, तो वह उन्हें बाइज्जत बरी कर सकता है। अपराधी होने की स्थिति में भी उसकी कृपा बरसे तो वह उनकी सजा कम सकता है। लेकिन राहत पाने के लिए डेढ़ लाख रुपए देने की शर्त लगाते हुए न्यायमूर्तियों ने किस तर्क का सहारा लिया? क्या इस देश के संविधान में ही कहीं यह बात छिपी हुई है कि किसी गरीब महिला के साथ बलात्कार की स्थिति में अपराधियों को यह छूट है कि वह उसे लाख-डेढ़ लाख रुपए देकर राहत हासिल कर ले? अगर नहीं, तो न्यायमूर्तियों ने कानून की किसी भी धारा की व्याख्या इस रूप में किस आधार पर की? दोनों के अपराधी होने को स्वीकार करने के बावजूद उन्हें राहत हासिल करने की शर्त डेढ़ लाख रुपए कैसे तय कर दी?

हम मान ले सकते हैं कि इन न्यायमूर्तियों को महिला के गरीब होने पर दया आ रही थी। (जज की कुर्सी पर क्या दया करने के लिए बैठा जाता है?) लेकिन उसके साथ बलात्कार होने के लिए वह किस-किस को जिम्मेदार मानते हैं? अपने नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की आखिरी जिम्मेदारी राज्य पर है। इस लिहाज से उस महिला के साथ जो भी हुआ, वह राज्य की विफलता है। राज्य उसकी सुरक्षा नहीं कर सका, इसलिए अगर मुआवजा देना है तो राज्य को देना है। सुप्रीम कोर्ट की यह खंडपीठ अगर महिला को आर्थिक मदद मुहैया कराना ही चाहती थी तो वह राज्य को इतनी या इससे ज्यादा रकम मुआवजे के रूप में देने का आदेश दे सकती थी। लेकिन अगर बलात्कारियों को डेढ़ लाख रुपए दे कर राहत पाने की छूट दी जाती है, तो बलात्कार के अपराध में सजा पाए कितने ऐसे लोग होंगे जो इस विकल्प का चुनाव नहीं करना चाहेंगे?

और इसके साथ यह भी जोड़ लीजिए कि इस देश में जितनी भी महिलाओं के साथ बलात्कार होता है, उसमें ज्यादातर महिलाएं गरीब ही होती हैं। बांदा की शीलू ने जो कहा है, वह इस देश की एक बड़ी और तल्ख हकीकत है कि विधायक ने उसके साथ बलात्कार करने की हिम्मत इसलिए की, क्योंकि वह एक गरीब बाप की बेटी है।

अदालतें क्या इसी हल की राह पर चलते हुए किसी पीड़ित महिला के अमीर होने की स्थिति में डेढ़ लाख रुपए के मुआवजे को आनुपातिक तौर पर ज्यादा और बहुत ज्यादा बढ़ा कर महिला को चुप रहने की सलाह देंगी? (समाज में वर्गीय नफरत के भाव कैसे पैदा होते होंगे...?)

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला दरअसल मध्ययुगीन सामंती खाप मिजाजी पंचायतों के फैसलों या स्थानीय दबंगों की उन मनमानियों से कैसे अलग है, जिसमें बलात्कार की शिकार स्त्री को एक-दो-तीन या पांच हजार रुपए लेकर मुंह बंद रखने पर मजबूर कर दिया जाता है।

निचली अदालतों में फैली घूसखोरी, भ्रष्टाचार, अनियमतताओं और पद-प्रभाव के इस्तेमाल पर सोचने-समझने वाले लोगों से लेकर देश की सुप्रीम कोर्ट तक ने उंगली उठाई है। यानी आप सुप्रीम कोर्ट को पाक-साफ, पवित्र, अप्रश्नेय- सब कुछ मान सकते हैं। निचली अदालतों की उसी छवि के शिकार लोग जब किसी तरह सुप्रीम कोर्ट में पहुंचते हैं, तो न्याय की उम्मीद का वह एक आखिरी दरवाजा होता है। वहां से मिला ‘न्याय’ न केवल आखिरी तौर पर स्वीकार्य होता है, बल्कि एक नजीर भी कि आगे अगर देश की किसी अदालत में वैसा मामला आएगा तो सुप्रीम कोर्ट का फैसला राह दिखाएगा।

क्या इस फैसले के बाद भी न्याय का यह मंदिर यह सकने की हालत में है कि वह सबसे संगीन अपराधों में गिने जाने वाले अपराध- बलात्कार के मामले में संवेदनशील रवैया अपनाती है? क्या उसने यह नया सिद्धांत नहीं प्रतिपादित किया है कि अगर किसी गरीब महिला के साथ बलात्कार हुआ है तो उसे न्याय के रूप में लाख-डेढ़ लाख रुपए दे दो और बात खत्म करो? क्या किसी संभ्रांत या धनी वर्ग की महिला के साथ बलात्कार या किसी हाई-प्रोफाइल मामले में इन्हीं तथाकथित न्यायमूर्तियों को यही शब्द दोहराने की हिम्मत पड़ती?