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Tuesday, 16 January 2018

'मुक्काबाज' : ब्राह्मणवाद के चेहरे पर एक प्यार भरा मुक्का...!




चूंकि पहले से यह प्रचारित था कि 'मुक्काबाज' जाति के सवालों से भी जूझती है, इसलिए उम्मीद तो थी ही। दरअसल, जब कहीं कुछ नहीं होता है, तब कुछ दिखने पर उत्साहित हो जाना स्वाभाविक है। 'वास्तविक घटना पर आधारित' इस फिल्म में खेल के तंत्र पर काबिज ब्राह्मणों की सत्ता को फिल्मी तरीके से जरूर दिखाया गया है, लेकिन समाज में जात के मसले को दिखाते हुए इस तरह का अनाड़ीपना या फिर धूर्तता कि कहने का मन है कि भारतीय समाज में जाति का जो मनोविज्ञान रहा है, उसमें पर्दे पर जाति के सवाल से जूझने और खासतौर पर ब्राह्मणवाद को बेपर्द करने के लिए किसी वैसे व्यक्ति की मदद ली जानी चाहिए, जो ब्राह्मणवाद के खिलाफ 'काउंटर जातिवादी' माना जाता हो! लेकिन सरोकार भी दिखाना है और बाजार भी निभाना है! ऐसे में यह चुनौती थोड़ी मुश्किल हो ही जाती है। वैसे बिना किसी की मदद के सुभाष कपूर ने आखिर 'गुड्डू रंगीला' बनाई ही थी, जिसमें शायद किसी 'काउंटर जातिवादी' की मदद नहीं ली गई थी, लेकिन जो एक शानदार व्यावसायिक और कामयाब फिल्म है। भारत में सामाजिक मुद्दों को केंद्र बनाना और उसे निबाह ले जाना, इतना आसान नहीं है। वैसे सामाजिक मसले पर फिल्म बनाने वालों को पाकिस्तान में बनी फिल्म 'बोल' को बार-बार देखना चाहिए।

बहरहाल, हीरो श्रवण के बारे में भगवान प्रसाद मिश्रा कहता है कि वह राजपूत है... उनके खून के बारे में पहले से तय नहीं कि क्या है... फिर कई छोटी जात के लोग भी सिंह लगा कर खुद को राजपूत बताते हैं! फिल्म में जात की बात देखते हुए हीरो श्रवण के अपने आसपास के लोगों के साथ व्यवहार से आप इन पहचानों में से निकाल लेते हैं कि भगवान मिश्रा ने श्रवण की पहचान के बारे में जो कहा, वह कहां से आता है। जब श्रवण कुमार पहली बगावत करता है कि 'हम यहां मुक्केबाजी सीखने आते हैं, मालिश करने नहीं' और अपने मिश्रा गुरु के सामने खड़े हो जाने पर मुंह पर एक जरूरी मुक्का जमा देता है तो वहां राजपूती ठसक ही दिखती है..!

और कभी भूमिहारों की गुलामी करते अपनी पूर्वजों को याद करते हुए आज अफसर बन बैठे 'यादव जी' हीरो को तंग करते हैं तो हीरो उन पर अपनी 'मुक्काबाजी' का ऐसा धौंस जमाता है कि 'यादव जी' पैंट में ही पेशाब कर देते हैं और हीरो उसका सेल्फी वीडियो बनाता है! फिल्म के हिसाब से यादव जी भगवान मिश्रा के बराबर के सामंती व्यवहार वाले हैं। यहां समझ में आता है कि फिल्मकार की नजर में सामाजिक बदलाव क्या है और पिछले दो-ढाई दशक के दौरान सामाजिक उथल-पुथल को वह किस तरह देखना और पेश करना चाहता है। भूमिहारों की गुलामी करने वाले पूर्वजों की जिंदगी छोड़ते हुए अगर आगे बढ़ कर कुर्सी हासिल कर भी चुके हैं तो 'ऊंच' कही जाने वाली जातियों के सामने अपनी हैसियत याद रखें, वरना 'ऊंच' कही जाने वाली जात का हीरो आपको आज भी औकात दिखा कर पैंट में पेशाब करने पर मजबूर कर दे सकता है!

लेकिन खैर... मुक्केबाज को 'नेशनल' में नहीं खेलने देने की जिद में भगवान मिश्रा आखिर तक अपनी जिद में अड़ा रहता है और कूटे जाने के बावजूद अपना तंत्र बनाए रखने के लिए समझौते के तहत इस अपमान का भी त्याग कर देता है कि अपनी पिटाई छिपी रह जाए।

सबसे ज्यादा दया तब आती है जब ब्राह्मण, राजपूत के बरक्स बनारस में मुक्केबाजी के एक कोच से भगवान मिश्रा जात पूछता है और कोच हजार टन की हिचकी के साथ बताता है- 'हरिजन!' अव्वल तो हरिजन शब्द तक का प्रयोग अब बंद है। फिर हरिजन या दलित या अनुसूचित जाति, कोई जाति नहीं है, जाति-समूह है। इसमें हर जगह के मुताबिक कितनी-कितनी जातियां हैं। किसी एक जात के बारे में पता कर लिया जाता तो इतने अधकचरेपन का विज्ञापन नहीं होता। अब कह सकते हैं कि वे सारे 'हरिजनों' की 'पीड़ा' दिखाना चाहते थे! लेकिन जब हीरो श्रवण कुमार राजपूत हो सकता था, विलेन भगवान मिश्रा ब्राह्मण हो सकता था, दलित कोच संजय कुमार को पीटने वालों की जात भूमिहार हो सकती थी, तो संजय कुमार की भी कोई जाति हो सकती थी। समझने वाले समझ लेते कि वह दलित या बहुजन या अनुसूचित जाति का है। लेकिन यहां फिल्मकार शायद सही है। कोच संजय कुमार खेलों के तंत्र पर काबिज 'ऊंची' कही जाने वाली जाति के जाल में पेशेवर तरीके से दखल देता है, थोड़ा-सा सह लो, फिर खुद को काबिल बनाओ, और उनके बराबर खड़े हो जाओ...! जो मिलता है, उसे बतौर मेहरबानी लो, अधिकार की तरह नहीं। गुजारिश चलेगी, प्रतिरोध नहीं!

आज के दौर में जब दलित तबका ब्राह्मणवादी राजनीति के बरक्स प्रतिरोध की राजनीति के एक नए मानक रच रहा है, आरक्षण एक बड़ा सवाल है, वैसे में 'कोटा' के नाम से ही नफरत करने वाला और अलग बर्तन में पानी देने के अपमान पर प्रतिरोध जताने के बजाय शांत रह जाने वाला कोच संजय कुमार निश्चित रूप से गांधी का 'हरिजन' ही हो सकता था, भीमराव का 'दलित' नहीं!

'हरिजन' दया से मिला सामाजिक पद है, 'दलित' संघर्ष और प्रतिरोध के आंदोलन से उपजा मानक, जो अब इस पहचान को भी पीछे छोड़ कर 'बहुजन' की ओर बढ़ रहा है। अगर फिल्म की कहानी का एक देशकाल था, तो जिस तरह उस देशकाल को आधुनिक मोबाइल और कम्प्यूटर की तकनीक से लैस किया गया, उसमें इस 'हरिजन' से भी जूझ लिया जाता!

बहरहाल, अलग जग में पानी लाने से लेकर 'हम ब्राह्मण हैं... हम आदेश देते हैं' जैसे जुमलों के साथ ब्राह्मणों का चेहरा दिखाने की कोशिश की गई है, लेकिन उसके समांतर भगवान मिश्रा के भाई को 'गरीब ब्राह्मण' के रूप में पेश करके उसकी भरपाई कर दी गई है। हंसने का मन करता है कि गरीब ब्राह्मण या तो मिश्रित खून के शक वाले राजपूत या फिर किसी 'नीच' कही जाने वाली जात के बराबर हो सकता है...!

सबसे नकली और मजेदार तब लगता है कि जब राजपूत हीरो से ब्राह्मण हीरोइन की अंतरजातीय शादी होती है। यह प्रेम के बाद हुई अरेंज्ड मैरेज यानी पारंपरिक शादी होती है, जिसमें खलनायनक भगवान मिश्रा को छोड़ कर किसी को आपत्ति नहीं होती है, सब कुछ धूमधाम के साथ होता है। किसी कस्बे या जिले में एक बेरहम ब्राह्मण सामंत के साए में खुली जातीय बर्बरताओं के समांतर इस तरह सबकी सहमति और प्रेम भाव के बीच पारंपरिक तरीके से अंतरजातीय शादी... भले ही वह राजपूत लड़के और ब्राह्मण लड़की के बीच हो..!!! इससे ज्यादा बड़ी क्रांति और क्या होती..! मजाक बना कर रख दिया है हकीकतों को...!

हालांकि फिल्म में देश भर में खेलों के तंत्र पर काबिज लोगों और उसकी राजनीति की अच्छी झलक देखी जा सकती है। मुक्केबाजी के खेल में कई जगह आप सचमुच की प्रतियोगिता की तरह का रोमांच हासिल कर सकते हैं। गीतों के शब्द अच्छे हैं। 'बहुत हुआ सम्मान...' में प्रतिरोध-तत्त्व बढ़िया है। (इसकी धुन से किसी कथित कविता या गीत जैसा कुछ ध्यान में आ रहा है, लेकिन चूंकि याद नहीं है, इसलिए कोई टिप्पणी नहीं।) सबसे ज्यादा हिम्मत दादरी में मोहम्मद अख़लाक की हत्या के प्रसंग को लगभग ज्यों का त्यों दिखाने की गई है। इसके लिए अनुराग कश्यप को बधाई मिलना चाहिए। खासतौर पर 'भारत माता की जय' के नारे के साथ आज देश की क्या हालत हो चुकी है, इसका अंदाजा वही लगा सकता है, जिसे बिना किसी कसूर के कोई भीड़ 'भारत माता की जय' का नारा लगा कर मार डालती है!

लेकिन चूंकि अनुराग कश्यप खुद ही कहते हैं कि फिल्मकारों से फिल्मों के जरिए संदेश देने के उम्मीद नहीं करनी चाहिए, इसलिए उनकी फिल्म 'मुक्काबाज' से भी उनकी बात समझ में आई।

पुनश्चः अनुराग कश्यप को मेरी ओर स्पेशल वाला थैंक्यू और बधाई कि जिस बनारस को खासतौर पर गालियों के लिए भी जाना जाता है, उस बनारस और इलाहाबाद के सामंती परिवेश को फिल्माते हुए कहीं भी मां-बहन की गाली का इस्तेमाल नहीं हुआ और गालियों के बिना फिल्म में कोई कमी नहीं लगी। पिछली बार 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' की जब मैंने इस लोकेशन से गालियों के बेवजह और जबरन इस्तेमाल पर सवाल उठाया था तो बहुत सारे लोगों को बुरा लगा था। एक अभियान भी चला था कि गालियां समाज की हकीकत हैं और उसे फिल्माना समाज के यथार्थ को स्वीकार करना है। लेकिन  आखिर अनुराग कश्यप ने भी कर दिखाया कि गालियों के बिना भी समाज की हकीकत से जूझा जा सकता है..! हालांकि इस संदर्भ में कोई देखना चाहे तो 'पानसिंह तोमर' देख सकता है, जो इस सवाल पर एक कामयाब प्रयोग है और गालियों के समर्थकों को आईना दिखाता है।

Saturday, 21 June 2014

ध्रुवीकरण की राजनीति में गुम अस्मिताएं






नरेंद्र मोदी के देश के प्रधानमंत्री के रूप शपथ-ग्रहण के बाद अब शायद यह कहना अप्रासंगिक होगा कि खुद भाजपा को भी इतनी सशक्त जीत की उम्मीद नहीं थी। इसके बावजूद अगर भाजपा ने चुनावों से पहले से ही खुद को एक तरह से जीते हुए पक्ष के रूप में पेश करना शुरू कर दिया था तो इसकी क्या वजहें रही होंगी, सोचने का मसला यह है। सवाल है कि आखिर भाजपा किस भरोसे यह दावा कर रही थी। क्या वह इस बात को लेकर आश्वस्त थी कि सियासी शतरंज पर उसने जो बिसात बिछाई है, उसमें नतीजे उम्मीद के हिसाब से ही आएंगे? वह बिसात बिछाते हुए आरएसएस या भाजपा ने किन-किन चुनौतियों को ध्यान में रखा और उसके बरक्स कौन-से मोर्चे मजबूत किए? उसके सामने चुनौतियों की शक्ल में जितनी भी राजनीतिक ताकतें थीं, उनके लिए यह अंदाजा लगाना क्या इतना मुश्किल था कि वे आरएसएस की चालों को भांप तक नहीं पाए? आम अवाम के पैमाने पर क्या ऐसा किया गया कि अब तक भाजपा के लिए चुनौती रहा एक साधारण वोटर एक खास तरह के "हिप्नोटिज्म" की जद में आकर भाजपा के पाले में जा खड़ा हुआ? क्यों ऐसा हुआ कि यह सब विकास लगभग बिना किसी सवाल या रोकटोक के अपने अंजाम तक पहुंचा?

इसी जगह पर जवाब की तरह यह सवाल सामने आता है कि भारत जैसे देश में सामाजिक विकास फिलहाल जिस पायदान पर है, उसमें उसे अपने पक्ष में खड़ा करने के लिए आखिर कौन-कौन से रास्ते अख्तियार किए जाने चाहिए? इस सवाल से अब तक सबसे बेहतर तरीके से कांग्रेस निपटती आई है। अब शायद यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि आज भाजपा जिस बुनियाद पर अपना महल खड़ा कर सकी है, वह बुनियादी तौर पर कांग्रेस की ही तैयार की हुई है। क्या वजह है कि आजादी के बाद लगभग पूरे समय सत्ता में रहते हुए भी उसने आम जनता की समझदारी को मूल्यांकन या विश्लेषण आधारित बनाने की अपनी जिम्मेदारी की आपराधिक स्तर की न केवल अनदेखी की, बल्कि संवैधानिक तकाजों को भी ताक पर रखते हुए उसने यथास्थितिवाद की जमीन को और मजबूत ही किया? यह यथास्थितिवाद आखिर किस खास व्यवस्था के लिए खाद-पानी का काम कर सकता है, करता रहा है? यह समझने के लिए कोई बहुत ज्यादा मंथन करने की जरूरत शायद नहीं है कि कांग्रेस ने जिस खेल की जमीन तैयार की थी, उसमें भाजपा एक ज्यादा ताकतवर खिलाड़ी के रूप में इस बार सामने आई है। और पता नहीं, यह रिवायत किन हालात में शुरू हुई होगी कि अकेले भारत में नहीं, शायद समूची दुनिया की आम जनता आखिर विजेता के पक्ष में खड़ी होती है, बिना इस बात पर विचार किए कि युद्ध में किसने किसी को पराजित करने के लिए कौन-सा तरीका आजमाया।

अपने पिछले दो शासनकाल में कांग्रेस ने जिस घनघोर स्तर पर सबसे जरूरतमंद वर्गों की उपेक्षा की, उन्हीं आस्थाओं का नरम कारोबार किया, जिस पर भाजपा एक स्पष्ट चेहरे के साथ लोगों के सामने थी, वैसी हालत में अभाव में मरते-जीते लोगों को उनके ‘मूल’ और उनकी ‘परंपरागत’ भावनाओं और सपनों का पोषण करके बड़ी आसानी से अपने पक्ष में किया जा सकता था। यों सपनों को जमीन पर उतारना और जीवन की भूख का हल करना इस देश की किसी भी राजनीतिक पार्टी की जवाबदेहियों-जिम्मेदारियों में शामिल नहीं रहा है। पिछली बार मजबूरी में वामपंथी दलों के सहयोग के चलते उसने जनता के सामने अपने सरोकार की सरकार का दावा किया भी था, लेकिन इस बार सच यही रहा कि कुल मिला कर अपने बीते एक दशक के रिकार्ड के हिसाब से कांग्रेस जनता के सामने यह पांसा भी फेंक सकने की हालत में नहीं थी। दूसरी ओर, उसकी मुख्य प्रतिद्वंद्वी के रूप में भाजपा के पास ‘जड़ों' की खुराक भी थी और अभाव में पलते समाज के सामने ‘विकास’ के मिथकों से लैस सपने भी थे। इससे भी ज्यादा महत्त्वपूर्ण यह कि इन दोनों हथियारों के बेहतर इस्तेमाल के लिए उसके पास एक सुचिंतित तंत्र भी था जो एक ओर आरएसएस के स्वयंसेवकों के रूप में तमाम परंपरागत अवधारणाओं के औजार से लोगों के ‘मूल’ को ‘जगा’ रहा था, तो दूसरी ओर अपने कार्यकर्ताओं से लेकर मीडिया के रूप में उसे हर स्तर पर बने-बनाए कार्यकर्ता मिल गए थे, जो दिन-रात उसकी खेत की सिंचाई कर रहे थे। नतीजा सामने है।

सवाल है कि भाजपा के बरक्स जितनी भी राजनीतिक ताकतें थीं, क्या उन्हें इस बात का अंदाजा नहीं था कि उनका समर्थक वर्ग जिस समाज का हिस्सा है, पिछले दो-ढाई दशकों के दौरान सचेत तौर पर उसकी चेतना में किन-किन तरीकों से किस तरह की व्यवस्था घोल दी गई है? वह व्यवस्था ज्यादातर लोगों के लिए एक नियति की तरह है, जिस पर वे सोचना नहीं चाहते। किसी भी राजनीतिक पार्टी ने शहरों से लेकर दूरदराज के इलाकों तक में छोटे-बड़े जागरण टाइप के उन धार्मिक आयोजनों या पूजा-पाठ की सार्वजनिक गतिविधियों पर गौर करना जरूरी नहीं समझा, जिसके जरिए समाज के हिंदू मानस को तुष्ट किया गया, उसके राजनीतिक दायरे को लगातार छोटा करके एक केंद्र में समेटने की कोशिश की गई, सांप्रदायीकरण किया गया और इस तरह आखिरकार ध्रुवीकरण की राजनीति की जमीन तैयार हुई। यह ध्रुवीकरण बहुत छोटी-छोटी बातों से सक्रिय की जा सकती थी। सामाजिक चेतना के बरक्स धार्मिक चेतना को खड़ा करके उस पर हावी करने के लिए आस्था को बतौर हथियार इस्तेमाल किया गया और उसका सबसे आसाना जरिया रहा नरेंद्र मोदी के रूप में एक प्रतीक को उसी "तैयार की गई" जनता के सामने खड़ा कर देना। ये नरेंद्र मोदी "गुजरात-2002" की छवि वाले मोदी थे, जो एक आम हिंदू मानस को सहलाता है। इसमें आरएसएस पूरी तरह कामयाब रहा।

धर्मनिरपेक्ष और सामाजिक न्याय की राजनीति करने वालों के सामने इस जटिल चुनौती से निपटने का क्या कोई रास्ता नहीं था? जब अपने ही राजनीतिक आदर्शों को ताक पर रख दिया जाता है तब ऐसे हालात का सामना एक स्वाभाविक परिणति होती थी।

मैदान में खड़ा होकर सामने करने का एकमात्र रास्ता था कि शासक अस्मिताओं के बरक्स शासित अस्मिताओं को सीधे संबोधित किया जाए। इसके कामयाब प्रयोग का उदाहरण बहुत पुराना नहीं है। करीब ढाई दशक पहले जब मंडल आयोग की रिपोर्ट पर अमल की घोषणा हुई तो उसके बाद यह हुआ भी। तभी पहली बार यह लगा कि एक सहज-सी दिखने वाली व्यवस्था के जरिए जिस यथास्थितिवाद का पालन-पोषण होता आ रहा था, उसकी परतों के नीचे कितने विद्रूप पल रहे हैं।

उसी दौर में मंडल आंदोलन ने शासित सामाजिक वर्गों की अस्मिता की लड़ाई के जरिए एक ऐसे नेतृत्व वर्ग की शृंखला खड़ी की, जो पहले से चली आ रही शासन और समाज व्यवस्था के ढांचे में सीधे-सीधे तोड़-फोड़ थी। इसका अहसास उसी समय सत्ताधारी तबकों को हो गया था और प्रतिक्रिया भी बहुत तीखी शक्ल में सामने आई थी, लेकिन वह बाद में बहुत सोच-समझ कर किसी दीर्घकालिक योजना का हिस्सा साबित हुई। तब मेरिट की शक्ल में आसानी से "पॉपुलर" होने वाले जुमलों से लैस सवाल उछाले गए, आरक्षण के खिलाफ आत्मदाही ‘आंदोलन’ या दूसरे प्रतिगामी प्रचारों से जब काम नहीं चलता लगा तब लालकृष्ण आडवाणी की ‘रथयात्रा’ चल पड़ी, जिसने शासित अस्मिताओं के उभार को रोकने और आखिरकार इस चुनाव में अपने हिंदू अस्मिता में समाहित कर लेने में कामयाबी हासिल कर ली। आरएसएस और भाजपा को इस "प्रोजेक्ट" को ताजा निष्कर्ष तक लाने में महज सवा दो या ढाई दशक का वक्त लगा।

जिन अस्मिताओं से हिंदुत्व के मूल ढांचे को नुकसान हो सकता था, उनके बीच से कुछ हिम्मती चेहरे सामने तो आए, लेकिन एक ओर सत्ता और तंत्र के बीच फर्क समझ सकने में नाकामी और अदूरदर्शिता के साथ-साथ दूसरी ओर इनके बीच से ही कुछ स्वार्थी, महत्त्वाकांक्षी और अवसरवादी तत्त्वों ने सत्ता में पहुंचने के लिए उस समूचे आंदोलन का बेड़ा गर्क करने में अपनी पूरी भूमिका निबाही। अस्मिता के संघर्ष का मकसद जहां इसके जरिए ऐतिहासिक रूप से छीने गए अधिकारों को हासिल करके भेदभाव पर आधारित एक व्यापक पहचान, यानी हिंदुत्व के ढांचे को तोड़ना था, वहां अस्मिता ही राजनीति का एक हथियार बन गया।  ऐसी स्थिति में जो होना था, वही हुआ। संघर्ष मुक्ति के लिए होना था, लेकिन उसने अपने लिए ऐसे दायरे पैदा किए, जिसके भीतर ही उसे गोल-गोल घूमना था। जबकि मकसद उसी दायरे को तोड़ कर आगे का रास्ता अख्तियार करना होना चाहिए था। क्या इस दायरे की दीवार इतनी मजबूत है कि उससे पार न पाया जा सके? यह शायद आखिरी सच नहीं है। लेकिन किसी दबाव से उपजे संघर्ष की दिशा कई बार भ्रम का शिकार हो जाती है। जबकि यही संघर्ष अगर किसी सुचिंतित योजना का हिस्सा हो तो नई व्यवस्था की जमीन तैयार कर सकता है।

जाति की अस्मिता धर्म की व्यापक अस्मिता के दायरे के भीतर की चीज थी। इसलिए जब अधिकारों के लिए खड़ी हुई अस्मिताएं संघर्ष का रास्ता छोड़ कर वैचारिक रूप से भी जातिगत दायरे में सिमटने लगीं तो ऐसे में उस पर उसकी व्यापक अस्मिता का हावी होना लाजिमी था। हिंदुत्व की व्यवस्था चलाने वाले एक सक्षम समूह के रूप में आरएसएस को यह बहुत अच्छे से मालूम है कि अगर उसकी व्यवस्था के मूल ढांचे को खतरा हो तो उसे समान हथियार से ही वापस मोड़ा जा सकता है। तो जिस तरह सामाजिक वंचना के नतीजे में छीने गए अधिकारों को हासिल करने के लिए जाति की अस्मिता आंदोलन की शक्ल में खड़ी हुई, उसी जाति को मंडल आयोग की सिफारिशें लागू होने के बाद आरक्षण विरोधी आंदोलन के साए में आरएसएस ने उसकी व्यापक अस्मिता, यानी हिंदुत्व में समाहित करने के लिए रथयात्रा से अपना अभियान शुरू किया और फिर गुजरात जनसंहार से लेकर हिंदू-मुसलिम तनाव को एक मुद्दे के रूप में जिंदा रखने की कामयाब कोशिश की।

लेकिन यह अगर आरएसएस की राजनीति का प्रत्यक्ष और हावी पहलू रहता तो देश से लेकर दुनिया भर में यह साबित करना मुश्किल होता कि उनकी यह राजनीति ‘प्रतिगामी’ नहीं है। इसलिए गुजरात जनसंहार के बाद कट्टर हिंदुत्व के नायक के चेहरे के रूप में उभरे नरेंद्र मोदी नेतृत्व में ही विकास के ‘गुजरात मॉडल’ का मिथक खड़ा किया गया, ठीक उसी तरह जिस तरह धर्म और पारलौकिक मिथकों के सहारे सामाजिक सत्ताएं अपना शासन बनाए रखती हैं, शासित तबकों के सोचने-समझने, विश्लेषण करने के दरवाजों को बंद रखती हैं।

इन सबको जमीनी स्तर पर पहुंचाने के लिए जहां आरएसएस के पास अपने स्वयंसेवक थे, वहीं इस सामाजिक सत्ता-तंत्र में पहले से ही एक ‘इम्यून सिस्टम’ की तरह काम करने वाले वाचाल तंत्र को सिर्फ शह की जरूरत थी। इसके अलावा, आज दूरदराज के इलाकों तक अपनी मजबूत पहुंच और दखल बना चुके मीडिया ने अपने सामाजिक ढांचे और कारोबारी क्षमता का अपूर्व प्रदर्शन करते हुए आरएसएस की तमाम परोक्ष कवायदों को स्थापना दी। मूल तत्त्व हिंदुत्व की व्यापक अस्मिता में जातीय अस्मिताओं को समाहित करना था, लेकिन उस पर विकास के ‘गुजरात मॉडल’ की चमकीली चादर टांग दी गई। यानी ‘प्रतिगामी’ होने के तमाम आरोप अब ‘अग्रगामी’ संदेशों में तब्दील हो गए। इसके बाद इस ढांचे से लड़ने की चुनौती इस रूप में खड़ी हुई कि अस्मिता के संघर्ष को राजनीति में झोंकने वालों की जमीन खिसक गई और उस पर हिंदुत्व की अस्मिता का महल खड़ा हो गया।

इसलिए कम से कम यह न कहा जाए कि लोकसभा चुनावों में भाजपा की जीत ने साबित किया है कि जाति की राजनीति खत्म हो गई। जाति या अस्मिता की राजनीति खत्म नहीं हुई। बल्कि वह ज्यादा बड़ी अस्मिता में विलीन हुई है और उसमें घुल-मिल जाने के बाद जो अस्मिता की राजनीति मुखर होगी, वह ज्यादा खतरनाक साबित होगी, जिसकी गाज आखिरकार वंचित और कमजोर जातियों पर ही गिरनी है। इस वंचना की सबसे बड़ी त्रासदी की तुलना पारलौकिक अंधविश्वासों में डूबी उस गुलाम चेतना से लैस समाज के अंत से की जा सकती है जिसमें कोई व्यक्ति कुछ मनचाहे की कामना पूरी होने के लालच में किसी पत्थर की मूर्ति के सामने हाथ जोड़ने के बाद अपने ही हाथों से अपनी गर्दन काट लेता है।

बहरहाल, भारतीय राजनीति में भारतीय जनता पार्टी के एक सक्षम सत्ताधारी ताकत के तौर पर उभरने के बाद अब इसके पीछे कॉरपोरेट, पूंजी-जगत, सत्ता-तंत्र, हजारों करोड़ रुपए खर्च कर तैयार की गई चुनावी ‘परियोजना’ के सूत्रधारों की खोज और व्याख्या की जाएगी और की जानी चाहिए। लेकिन भारत जैसे देश में आग्रहों-पूर्वाग्रहों-दुराग्रहों, भक्ति, व्यक्ति पूजा, प्रचार, अफवाहों पर मारने-मरने पर उतर जाने वाले समाज में एक अर्धविकसित मतदाता अगर दक्षिणपंथ के लिए अपना हाथ उठाता है तो यह किसी भी विकासमान समाज की नाकामी है। वह मतदाता विकास नहीं समझता। उसे विकास का ‘गुजरात मॉडल’ समझाया जाता है, जो दरअसल एक नफरत की एक अनदेखी बुनियाद पर खड़ा होता है। लेकिन उस अनदेखी बुनियाद पर परदा उतारने का जिम्मा आखिर किसका है?

अब चुनौती उन ताकतों के सामने है जो हिंदुत्व की मौजूदा धारा के खिलाफ एक तरह से व्यवस्था विरोधी प्रतीक के रूप में खड़े हुए थे, लेकिन बाद में उन्होंने भी नरम कार्ड खेलना शुरू किया था। बिना इस सच को समझे कि उनकी मूल ताकत और चुनौती क्या है और कौन है...! नब्बे के दशक में राजनीति की एक वैकल्पिक जमीन तैयार करने के साथ-साथ विचारधारा के स्तर पर व्यवस्था-विरोधी प्रतीक के रूप में देखे जाने वाले राजनीतिक समूहों के सामने अब खुद को बचाए रखने का सवाल सबसे अहम है। अगर वे पहचान सकें कि इस प्रतीक के रूप में उन पर कहीं व्यवस्था के एजेंट तो हावी नहीं है और उन्हें दूर करना उनका सबसे पहला मकसद होना चाहिए, तो शायद बचने-बढ़ने और एक विकल्प की उम्मीद को जमीन पर उतारा जा सकता है...!