Tuesday, 9 December 2014

विज्ञान बनाम आस्था के द्वंद्व का समाज...


(कर्नाटक में अपने रोग को दूर करने की मनोकामना के साथ ब्राह्मणों के जूठन पर लोटते दलित )

भारतीय जनता पार्टी के सत्ता में आने के बाद पिछले छह-सात महीने में जिस तरह की खबरें सबसे ज्यादा चर्चा में रहीं, बल्कि दीनानाथ बतरा जैसे लोगों के बेवकूफी भरे विचारों और उनकी किताबों को नीतिगत स्तर पर भी लागू करने की कोशिश चल रही है, उसमें यह समझना जरूरी हो जाता है कि आखिर अंधविश्वासों पर आधारित मान्यताओं की स्वीकृति के लिए भी विज्ञान का सहारा क्यों लिया जाता है। क्या यह अपने आप में यह नहीं बताता कि अंधविश्वासों की पैरोकारों को भी अपनी राजनीति और कूढ़मगजी को स्थापित करने के लिए एक साजिश करने की जरूरत पड़ रही है, ताकि हर तरह के शोषण पर आधारित एक खास वर्ग की व्यवस्था कायम रहे और बाकी लोग अंधविश्वासों के अंधेरे में डूबे रहें? कुछ समय पहले प्रभात खबर अखबार के दीपावली विशेषांक पत्रिका के लिए यह लेख लिखा था। आजकल तमाम अंधविश्वासों को विज्ञान का सहारा लेकर स्थापित करने की जो कोशिश की जा रही है, उसमें लगा कि इसे ब्लॉग पर भी डाल देना चाहिए।

कुछ वाकये हमें उस तरह की सैद्धांतिकी के व्यावहारिक पहलुओं को समझने में मदद करते हैं, जिसमें यह बताया जाता है कि व्यक्ति की शिक्षा-दीक्षा उसकी चेतना पर अनिवार्य रूप से असर डालते हैं। इस लिहाज से विज्ञान और तकनीक के साथ समाज का साबका और उसका व्यक्ति के सोचने-समझने या दृष्टि पर असर का विश्लेषण सामाजिक विकास के कई नए आयाम से रूबरू कराता है। कुछ साल पहले की एक घटना है। राजधानी दिल्ली से सटे और तब ‘हाईटेक सिटी’ के रूप में मशहूर शहर गाजियाबाद में एक काफी वृद्ध महिला को उनके तीन बेटे तब तक (शायद चप्पलों से) पीटते रहे, जब तक उनकी जान नहीं निकल गई। किसी ‘ऊपरी असर’ से छुटकारा दिलाने के मकसद से ऐसा करने का निर्देश एक तांत्रिक बाबा का था।

अंधविश्वासों के अंधेरे कुएं में डूबते-उतराते हमारे समाज में साधारण लोगों के हिसाब से देखें तो इस तरह की यह घटना न अकेली थी और न नई। लेकिन यह घटना मेरी निगाह में इसलिए खास थी कि उस बुजुर्ग महिला को तांत्रिक के आदेश पर पीटते-पीटते मार डालने वाले तीन में से कम से कम दो बेटों की शैक्षिक पृष्ठभूमि विज्ञान विषय थी। उनमें से एक ने डॉक्टरी और दूसरे ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की थी। यानी जिस विज्ञान और तकनीकी विकास ने समाज में अज्ञानता के अंधकार को दूर करने और समाज को अंधविश्वासों की दुनिया से काफी हद तक बाहर लाने में अपनी अहम भूमिका निभाई है, उस विषय की शिक्षा-दीक्षा भी उन बेटों की चेतना पर पड़े अंधविश्वासों के जाले को साफ नहीं कर सकी। क्या यह विज्ञान की शिक्षा के ‘लेन-देन’ में वैज्ञानिक दृष्टि के अभाव का नतीजा नहीं है?

हाल ही में एक दिलचस्प अनुभव से रूबरू हुआ। हालांकि फिल्मों, टीवी धारावाहिकों और समाज में इस तरह की बातें आम हैं। एक बेहद सक्षम, जानकार और अनुभवी सर्जन-डॉक्टर के क्लीनिक में इस आशय का बड़ा पोस्टर दीवार टंगा था कि ‘हम केवल माध्यम हैं। आपका ठीक होना, न होना भगवान की कृपा पर निर्भर है! -आपका चिकित्सक।’ दूसरी ओर, अंतरिक्ष यानों के प्रक्षेपण जैसी विज्ञान, तकनीक और प्रौद्योगिकी की चरम उपलब्धियों को मुंह चिढ़ाते हुए हमारे इसरो, यानी अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के मुखिया जैसे पद पर बैठे लोग भी किसी यान के प्रक्षेपण की कामयाबी के लिए ‘ईश्वरीय कृपा’ हासिल करने के मकसद से किसी मंदिर में पूजा-अर्चना करते हैं। 24 सितंबर, 2014 को भारत के मंगलयान की शानदार कामयाबी इसरो के हमारे तमाम वैज्ञानिकों की काबिलियत की मिसाल है। मगर यह वही मंगलयान है, जिसके प्रक्षेपण के पहले चार नवंबर, 2013 इसरो के अध्यक्ष के. राधाकृष्णन ने तिरुपति वेकंटेश्वर मंदिर में पूजा-अर्चना की और इसकी अभियान की कामयाबी के लिए प्रार्थना की थी। राधाकृष्णन के पूर्ववर्ती इसरो अध्यक्ष माधवन नायर भी यही करते रहे थे।

वैज्ञानिक चेतना के बगैर विज्ञान का समाज

यह साधारण-सा सच है कि कोई भी पोंगापंथी, दिमाग से बंद, कूपमंडूक अंधविश्वासी व्यक्ति जब यह देखता है कि भारत के अंतरिक्ष प्रक्षेपण अनुसंधान संगठन, यानी इसरो का मुखिया विज्ञान पर केंद्रित किसी कार्यक्रम में शिरकत करते हुए या किसी उच्च क्षमता के अंतरिक्ष यान के प्रक्षेपण से पहले घंटों किसी मंदिर में पूजा करता है तो यह उसके भीतर बैठी हीनताओं को तुष्ट करता है। इसे उदाहरण बना कर वह कह पाता है कि इसरो जैसे विज्ञान के संगठन के वैज्ञानिक ऐसा करते हैं तो उसका कोई आधार तो होगा ही। जाहिर है, हमारे समाज में विज्ञान की पढ़ाई-लिखाई और उस क्षेत्र में अच्छी-खासी उपलब्धियों में कोई कमी नहीं रही है। लेकिन वैज्ञानिक चेतना या दृष्टि का लगभग अभाव रहा है। चिकित्सा के क्षेत्र में महान खोजों से प्रशिक्षित, मस्तिष्क, तंत्रिका या हृदय की बेहद जटिल शल्य-क्रिया करके किसी मरीज को जीवन देने वाले सक्षम डॉक्टर जब अपनी काबिलियत और कामयाबी का श्रेय वैज्ञानिक खोजों के साथ-साथ अपनी मेहनत और कुशलता को देने के बजाय ‘अज्ञात शक्ति’ या भगवान को देते हैं तो इससे क्या साबित होता है! ऐसा करके या मान कर क्या हम उन तमाम लोगों की क्षमता, सालों की दिन-रात की मेहनत और वैज्ञानिक दृष्टि को खारिज नहीं करते हैं, जिनके जरिए कई बार हमारा जिंदा बच पाना मुमकिन होता है?

यह कोई नया आकलन नहीं है कि मानव समाज के विकास के क्रम में एक दौर ऐसा रहा होगा, जब मनुष्य ने अपनी सीमाओं के चलते मुश्किलों का हल किसी पारलौकिक शक्ति की कृपा में खोजने की कोशिश की होगी। लेकिन आज जब मंगल पर कदम रखने से लेकर ब्रह्मांड की तमाम जटिल गुत्थियों को खोलते हुए दुनिया का विज्ञान हर रोज अपने कदम आगे बढ़ा रहा है तो ऐसे में अलौकिक-पारलौकिक काल्पनिक धारणाओं में जीते समाज और उसके ढांचे को बनाए रखने का क्या मकसद हो सकता है?

विज्ञान और वैज्ञानिक चेतना का द्वंद्व

यहीं आकर एक बिंदु उभरता है जिसके तहत समाज में चंद लोगों या कुछ खास समूहों की सत्ता एक सामाजिक व्यवस्था के रूप में आकार पाती है। यह व्यवस्था अगर शोषण-दमन और भेदभाव पर आधारित हुई तो संभव है कि भविष्य में प्रतिरोध की स्थिति पैदा हो, क्योंकि वैज्ञानिक चेतना से लैस कोई भी व्यक्ति यह समझता है कि दुनिया में मौजूद तमाम अंधविश्वास का सिरा पारलौकिक आस्थाओं से अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है। इसी स्थिति को पैदा होने से रोकने के लिए लौकिक यथार्थों पर पारलौकिक धारणाओं का मुलम्मा चढ़ा दिया जाता है। ऐसी कवायदों का संगठित रूप धर्म के रूप में देखा जा सकता है। हालांकि मानव समाज के लिए धर्म की अलग-अलग व्याख्याएं पेश की जाती रही हैं, लेकिन इसके नतीजे के रूप में सामाजिक सत्ताओं का ‘केंद्रीकरण’ ही देखा गया है। और चूंकि विज्ञान लौकिक यथार्थों पर चढ़े अलौकिक भ्रमों की परतें उधेड़ता है, इसलिए वह स्वाभाविक रूप से धर्म का घोषित-अघोषित दुश्मन हो जाता है।

विडंबना यह है कि ब्रह्मांड और मानव सभ्यता के विकास का आधार होने के बावजूद विज्ञान अब तक दुनिया भर में धर्म के बरक्स एक सत्ता या व्यवस्था के रूप में खुद को खड़ा कर सकने में नाकाम रहा है। जबकि विज्ञान, तकनीकी या प्रौद्यागिकी के सहारे कई देश अपने आर्थिक-राजनीतिक ‘साम्राज्यवाद’ के एजेंडे को कामयाब करते हैं। हालांकि इसकी वजहों की पड़ताल कोई बहुत जटिल काम नहीं है। पहले से ही हमारे सामने अगर ‘राज्य की उत्पत्ति के दैवीय सिद्धांत’ जैसी व्याख्याएं हैं तो ‘विकासवादी सिद्धांत’ भी है। लेकिन आखिर क्या वजह है कि सामाजिक व्यवहार में ‘दैवीय सिद्धांत’ अक्सर हावी दिखता है!

दरअसल, राजनीतिक-सामाजिक सत्ताओं पर कब्जाकरण के बाद इसके विकेंद्रीकरण की प्रक्रिया को रोकने के लिए उन तमाम रास्तों, उपायों को हतोत्साहित-बाधित किया गया, जो पारलौकिकता या दैवीय कल्पनाओं पर आधारित किसी ‘प्रभुवाद’ की व्यवस्था को खंडित करते थे। चार्वाक, गैलीलियो, कोपरनिकस, ब्रूनो से लेकर हाल में नरेंद्र दाभोलकर की हत्या जैसे हजारों उदाहरण होंगे, जिनमें विज्ञान या वैज्ञानिक दृष्टि को बाधित करने के लिए सामाजिक सत्ताओं के रूप में सभी धर्मों में मौजूद ‘ब्राह्मणवाद’ ने बर्बरतम तरीके अपनाए।

दिलचस्प यह है कि विज्ञान का दमन करने वाली ताकतें यह अच्छे से जानती थीं कि विज्ञान की ताकत क्या है। इसलिए एक ओर उन्होंने समाज में वैज्ञानिक नजरिए या चेतना के विस्तार को रोकने के लिए हर संभव क्रूरताएं कीं तो दूसरी ओर धार्मिक और आस्थाओं के अंधविश्वास को मजबूत करने के लिए विज्ञान और तकनीकों का सहारा लिया और उनका भरपूर उपयोग किया। एक समय सोमनाथ के मंदिर में जो मूर्ति बिना किसी सहारे के हवा में लटकी हुई थी और जिसे देख कर लोग चमत्कृत होकर और गहरी आस्था में डूब जाते थे, उसमें चुंबकीय सिद्धांतों की बेहतरीन तकनीक का इस्तेमाल किया गया था। इसे ‘मैग्नेटिक लेविटेशन’ या चुंबकीय उत्तोलन कहते हैं, जिसका अर्थ है चुंबकीय बल के सहारे हवा में तैरना। इसी तरह, किसी सीधे खड़े संगमरमर के पत्थरों से दूध भरे चम्मच का किनारा सटते ही चम्मच में मौजूद दूध का खिंच जाना गुरुत्व के सिद्धांत से संबंधित है और इसकी वैज्ञानिक व्याख्या है। लेकिन इसी का सहारा लेकर तकरीबन दो दशक पहले समूचे देश में गणेश की मूर्तियों को अचानक दूध पिलाया जाने लगा था।

विज्ञान के बरक्स अंधविश्वास का समाज

धार्मिक स्थलों के निर्माण से लेकर जादू-टोना, तंत्र-मंत्र, झाड़फूंक, चमत्कार वगैरह विज्ञान और तकनीक के सहारे ही चलता रहा है। यह बेवजह नहीं है कि मर्सिडीज बेंज या बीएमडब्ल्यू जैसी आधुनिक तकनीकी से लैस कारें चलाने वाले और ऊपर से बहुत आधुनिक दिखने वाले लोग अपनी कार में ‘अपशकुन’ से बचने के लिए नींबू और हरी मिर्च के गुच्छे टांगे दिख जाते हैं। इसी तरह, उच्च तकनीकी के इस्तेमाल से बनने वाली इमारतें बिना भूमि-पूजन के आगे नहीं बढ़तीं। बहुत आधुनिक परिवारों के लोग अपने शानदार और हाइटेक घरों के आगे या कहीं पर एक ‘राक्षस’ के चेहरे जैसी आकृति टांगे दिख जाएंगे, जिसका मकसद मकान को ‘बुरी नजर’ से बचाना होता है! यानी जिन वैज्ञानिक पद्धतियों और तकनीकी का इस्तेमाल अंधविश्वासों को दूर कर समाज को गतिमान बनाने या आगे ले जाने के लिए होना था, वे समाज को जड़ और कई बार प्रतिगामी बनाने के काम में लाई जाती रही हैं।

इसकी वजह यह है कि विज्ञान अपने आप में दृष्टि है, लेकिन वैज्ञानिक सिद्धांत, संसाधन या तकनीक एक ‘उत्पाद’ की तरह है, जिसका इस्तेमाल कोई भी कर सकता है- विज्ञान का दुश्मन भी। बहुत ज्यादा पीछे जाने की जरूरत नहीं है। मौजूदा दौर में ही इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और अखबार के अलावा फेसबुक, ट्विटर, व्हाट्स ऐप जैसे सोशल मीडिया के मंचों और मोबाइल जैसे संचार के साधनों के दौर को हम विज्ञान और तकनीक के चरम विकास का दौर कह सकते हैं। लेकिन हम देख सकते हैं कि इन संसाधनों पर किस तरह वैसे लोगों या समूहों का कब्जा या ज्यादा प्रभाव है जो विज्ञान और तकनीकी का इस्तेमाल वैज्ञानिक चेतना या दृष्टि को कुंद या बाधित करने में कर रहे हैं।

आधुनिकी उन्नत तकनीकों के इस्तेमाल से बनाई गई अंधविश्वास फैलाने वाली फिल्में या धारावाहिक पहले से चारों तरफ से अंधे विश्वासों में मरते-जीते आम दर्शक की जड़ चेतना को ही और मजबूत करते हैं। टीवी चैनलों पर धड़ल्ले से अंधविश्वासों को बढ़ाने या मजबूत करने वाले कार्यक्रम ‘धारावाहिक’ के तौर पर चलते ही रहते हैं, कई बार ‘समाचार’ के रूप में भी दिखाए जाते हैं। यह ‘बाबाओं’ और ‘साध्वियों’ के प्रवचनों और विशेष कार्यक्रमों से लेकर फिल्मों के हीरो-हीरोइनों या मशहूर हस्तियों के जरिए ‘धनवर्षा यंत्र’ या ‘हनुमान यंत्र’ आदि के प्रचारों के अलावा होता है। अखबार इसमें पीछे नहीं हैं। इससे टीवी चैनलों मीडिया संस्थानों को कमाई होती है, मुनाफा होता है, लेकिन समाज को कितना नुकसान होता है, इससे उन्हें कोई मतलब नहीं होता! इसके अलावा, फेसबुक जैसे सोशल मीडिया का मोबाइल पर व्हाट्स ऐप जैसे संवाद-साधनों के जरिए किस तरह सांप्रदायिकता का जहर परोसा जा रहा है, यहां तक कि दंगा भड़काने में भी इनका इस्तेमाल किस पैमाने पर किया जा रहा है, यह जगजाहिर तथ्य है।

यानी विज्ञान के जरिए की वैज्ञानिक दृष्टि या चेतना को कैसे कुंद किया जा रहा है और विज्ञान का सहारा लेकर समाज को किस तरह अंधविश्वासों के अंधेरे में झोका जा रहा है, यह साफ दिखता है। दरअसल, किसी भी धर्म के सत्ताधारी तबकों की असली ताकत आम समाज का यही खोखलापन होता है कि वह विज्ञान के सहारे अपने जीवन की सुविधाएं तो सुनिश्चित करे, लेकिन उसे किसी ‘अज्ञात शक्ति’ की कृपा माने। पारलौकिक भ्रम की गिरफ्त में ईश्वर और दूसरे अंधविश्वासों की दुनिया में भटकते हुए लोग ही आखिरकार बाबाओं-गुरुओं, तांत्रिकों, चमत्कारी फकीरों जैसे ठगों के फेर में पड़ते हैं और अपना बचा-खुचा विवेक गवां बैठते है। यह केवल समाज के आम और भोले-भाले लोगों की बंददिमागी नहीं है, बौद्धिकों, बड़े-बड़े नेताओं, मुख्यमंत्रियों, प्रधानमंत्रियों और राष्ट्रपतियों तक को फर्जी और कथित चमत्कारी बाबाओं के चरणों में सिर नवाने में कोई हिचक नहीं होती।

दलील दी जाती है कि आस्था निजी प्रश्न है। लेकिन विज्ञान की कामयाबियों के साथ आस्था का घालमेल आखिरकार वैज्ञानिक चेतना को भ्रमित करता है। और यही वजह है कि गहन और जटिल ऑपरेशन हो या भूकम्प और बाढ़ जैसी आपदाएं, इनकी वजहें जानने, उसका विश्लेषण करने के बावजूद व्यक्ति या खुद इसके विशेषज्ञ इन सबको किसी भगवान का चमत्कार, कृपा या फिर कोप के रूप में देखते-पेश करते हैं। यह अपने ज्ञान-विज्ञान और खुद पर भरोसा नहीं होने-करने का, अपनी ही क्षमताओं को खारिज करने का उदाहरण है। क्षमताओं के नकार की यह स्थिति किसी विनम्रताबोध का नहीं, बल्कि भ्रम और हीनताबोध का नतीजा होती है। और जब हम विज्ञान के विद्याथियों या वैज्ञानिकों तक को इस तरह के द्वंद्व और भ्रम में जीते देखते हैं तो ऐसे में साधारण इंसान या समाज से क्या उम्मीद हो, जो जन्म से लेकर मौत तक वैज्ञानिक चेतना से बहुत दूर दुनिया के धर्मतंत्र और अलौकिक-पारलौकिक आस्थाओं के चाल में उलझा रह जाता है।

जाहिर है, असली चुनौती यह है कि विज्ञान केवल लोगों के जीवन को सहज नहीं बनाए, बल्कि दुनिया के यथार्थ को समझने के लिए समाज को वैज्ञानिक चेतना से भी लैस करे। यह समाज के ज्यादातर हिस्से को सोचने-समझने के तरीके या माइंडसेट पर कब्जा जमाए पारलौकिक आस्थाओं के बरक्स एक बहुत बड़ी चुनौती है। अगर यह कहा जाए कि जिस पैमाने पर समाज धार्मिकता के जंजाल में उलझा है, अगर उसी पैमाने पर वैज्ञानिक चेतना होती तो हमारा समाज शायद अभी से कई हजार साल आगे होता, तो शायद अतिश्योक्ति नहीं होगी।


Saturday, 21 June 2014

ध्रुवीकरण की राजनीति में गुम अस्मिताएं






नरेंद्र मोदी के देश के प्रधानमंत्री के रूप शपथ-ग्रहण के बाद अब शायद यह कहना अप्रासंगिक होगा कि खुद भाजपा को भी इतनी सशक्त जीत की उम्मीद नहीं थी। इसके बावजूद अगर भाजपा ने चुनावों से पहले से ही खुद को एक तरह से जीते हुए पक्ष के रूप में पेश करना शुरू कर दिया था तो इसकी क्या वजहें रही होंगी, सोचने का मसला यह है। सवाल है कि आखिर भाजपा किस भरोसे यह दावा कर रही थी। क्या वह इस बात को लेकर आश्वस्त थी कि सियासी शतरंज पर उसने जो बिसात बिछाई है, उसमें नतीजे उम्मीद के हिसाब से ही आएंगे? वह बिसात बिछाते हुए आरएसएस या भाजपा ने किन-किन चुनौतियों को ध्यान में रखा और उसके बरक्स कौन-से मोर्चे मजबूत किए? उसके सामने चुनौतियों की शक्ल में जितनी भी राजनीतिक ताकतें थीं, उनके लिए यह अंदाजा लगाना क्या इतना मुश्किल था कि वे आरएसएस की चालों को भांप तक नहीं पाए? आम अवाम के पैमाने पर क्या ऐसा किया गया कि अब तक भाजपा के लिए चुनौती रहा एक साधारण वोटर एक खास तरह के "हिप्नोटिज्म" की जद में आकर भाजपा के पाले में जा खड़ा हुआ? क्यों ऐसा हुआ कि यह सब विकास लगभग बिना किसी सवाल या रोकटोक के अपने अंजाम तक पहुंचा?

इसी जगह पर जवाब की तरह यह सवाल सामने आता है कि भारत जैसे देश में सामाजिक विकास फिलहाल जिस पायदान पर है, उसमें उसे अपने पक्ष में खड़ा करने के लिए आखिर कौन-कौन से रास्ते अख्तियार किए जाने चाहिए? इस सवाल से अब तक सबसे बेहतर तरीके से कांग्रेस निपटती आई है। अब शायद यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि आज भाजपा जिस बुनियाद पर अपना महल खड़ा कर सकी है, वह बुनियादी तौर पर कांग्रेस की ही तैयार की हुई है। क्या वजह है कि आजादी के बाद लगभग पूरे समय सत्ता में रहते हुए भी उसने आम जनता की समझदारी को मूल्यांकन या विश्लेषण आधारित बनाने की अपनी जिम्मेदारी की आपराधिक स्तर की न केवल अनदेखी की, बल्कि संवैधानिक तकाजों को भी ताक पर रखते हुए उसने यथास्थितिवाद की जमीन को और मजबूत ही किया? यह यथास्थितिवाद आखिर किस खास व्यवस्था के लिए खाद-पानी का काम कर सकता है, करता रहा है? यह समझने के लिए कोई बहुत ज्यादा मंथन करने की जरूरत शायद नहीं है कि कांग्रेस ने जिस खेल की जमीन तैयार की थी, उसमें भाजपा एक ज्यादा ताकतवर खिलाड़ी के रूप में इस बार सामने आई है। और पता नहीं, यह रिवायत किन हालात में शुरू हुई होगी कि अकेले भारत में नहीं, शायद समूची दुनिया की आम जनता आखिर विजेता के पक्ष में खड़ी होती है, बिना इस बात पर विचार किए कि युद्ध में किसने किसी को पराजित करने के लिए कौन-सा तरीका आजमाया।

अपने पिछले दो शासनकाल में कांग्रेस ने जिस घनघोर स्तर पर सबसे जरूरतमंद वर्गों की उपेक्षा की, उन्हीं आस्थाओं का नरम कारोबार किया, जिस पर भाजपा एक स्पष्ट चेहरे के साथ लोगों के सामने थी, वैसी हालत में अभाव में मरते-जीते लोगों को उनके ‘मूल’ और उनकी ‘परंपरागत’ भावनाओं और सपनों का पोषण करके बड़ी आसानी से अपने पक्ष में किया जा सकता था। यों सपनों को जमीन पर उतारना और जीवन की भूख का हल करना इस देश की किसी भी राजनीतिक पार्टी की जवाबदेहियों-जिम्मेदारियों में शामिल नहीं रहा है। पिछली बार मजबूरी में वामपंथी दलों के सहयोग के चलते उसने जनता के सामने अपने सरोकार की सरकार का दावा किया भी था, लेकिन इस बार सच यही रहा कि कुल मिला कर अपने बीते एक दशक के रिकार्ड के हिसाब से कांग्रेस जनता के सामने यह पांसा भी फेंक सकने की हालत में नहीं थी। दूसरी ओर, उसकी मुख्य प्रतिद्वंद्वी के रूप में भाजपा के पास ‘जड़ों' की खुराक भी थी और अभाव में पलते समाज के सामने ‘विकास’ के मिथकों से लैस सपने भी थे। इससे भी ज्यादा महत्त्वपूर्ण यह कि इन दोनों हथियारों के बेहतर इस्तेमाल के लिए उसके पास एक सुचिंतित तंत्र भी था जो एक ओर आरएसएस के स्वयंसेवकों के रूप में तमाम परंपरागत अवधारणाओं के औजार से लोगों के ‘मूल’ को ‘जगा’ रहा था, तो दूसरी ओर अपने कार्यकर्ताओं से लेकर मीडिया के रूप में उसे हर स्तर पर बने-बनाए कार्यकर्ता मिल गए थे, जो दिन-रात उसकी खेत की सिंचाई कर रहे थे। नतीजा सामने है।

सवाल है कि भाजपा के बरक्स जितनी भी राजनीतिक ताकतें थीं, क्या उन्हें इस बात का अंदाजा नहीं था कि उनका समर्थक वर्ग जिस समाज का हिस्सा है, पिछले दो-ढाई दशकों के दौरान सचेत तौर पर उसकी चेतना में किन-किन तरीकों से किस तरह की व्यवस्था घोल दी गई है? वह व्यवस्था ज्यादातर लोगों के लिए एक नियति की तरह है, जिस पर वे सोचना नहीं चाहते। किसी भी राजनीतिक पार्टी ने शहरों से लेकर दूरदराज के इलाकों तक में छोटे-बड़े जागरण टाइप के उन धार्मिक आयोजनों या पूजा-पाठ की सार्वजनिक गतिविधियों पर गौर करना जरूरी नहीं समझा, जिसके जरिए समाज के हिंदू मानस को तुष्ट किया गया, उसके राजनीतिक दायरे को लगातार छोटा करके एक केंद्र में समेटने की कोशिश की गई, सांप्रदायीकरण किया गया और इस तरह आखिरकार ध्रुवीकरण की राजनीति की जमीन तैयार हुई। यह ध्रुवीकरण बहुत छोटी-छोटी बातों से सक्रिय की जा सकती थी। सामाजिक चेतना के बरक्स धार्मिक चेतना को खड़ा करके उस पर हावी करने के लिए आस्था को बतौर हथियार इस्तेमाल किया गया और उसका सबसे आसाना जरिया रहा नरेंद्र मोदी के रूप में एक प्रतीक को उसी "तैयार की गई" जनता के सामने खड़ा कर देना। ये नरेंद्र मोदी "गुजरात-2002" की छवि वाले मोदी थे, जो एक आम हिंदू मानस को सहलाता है। इसमें आरएसएस पूरी तरह कामयाब रहा।

धर्मनिरपेक्ष और सामाजिक न्याय की राजनीति करने वालों के सामने इस जटिल चुनौती से निपटने का क्या कोई रास्ता नहीं था? जब अपने ही राजनीतिक आदर्शों को ताक पर रख दिया जाता है तब ऐसे हालात का सामना एक स्वाभाविक परिणति होती थी।

मैदान में खड़ा होकर सामने करने का एकमात्र रास्ता था कि शासक अस्मिताओं के बरक्स शासित अस्मिताओं को सीधे संबोधित किया जाए। इसके कामयाब प्रयोग का उदाहरण बहुत पुराना नहीं है। करीब ढाई दशक पहले जब मंडल आयोग की रिपोर्ट पर अमल की घोषणा हुई तो उसके बाद यह हुआ भी। तभी पहली बार यह लगा कि एक सहज-सी दिखने वाली व्यवस्था के जरिए जिस यथास्थितिवाद का पालन-पोषण होता आ रहा था, उसकी परतों के नीचे कितने विद्रूप पल रहे हैं।

उसी दौर में मंडल आंदोलन ने शासित सामाजिक वर्गों की अस्मिता की लड़ाई के जरिए एक ऐसे नेतृत्व वर्ग की शृंखला खड़ी की, जो पहले से चली आ रही शासन और समाज व्यवस्था के ढांचे में सीधे-सीधे तोड़-फोड़ थी। इसका अहसास उसी समय सत्ताधारी तबकों को हो गया था और प्रतिक्रिया भी बहुत तीखी शक्ल में सामने आई थी, लेकिन वह बाद में बहुत सोच-समझ कर किसी दीर्घकालिक योजना का हिस्सा साबित हुई। तब मेरिट की शक्ल में आसानी से "पॉपुलर" होने वाले जुमलों से लैस सवाल उछाले गए, आरक्षण के खिलाफ आत्मदाही ‘आंदोलन’ या दूसरे प्रतिगामी प्रचारों से जब काम नहीं चलता लगा तब लालकृष्ण आडवाणी की ‘रथयात्रा’ चल पड़ी, जिसने शासित अस्मिताओं के उभार को रोकने और आखिरकार इस चुनाव में अपने हिंदू अस्मिता में समाहित कर लेने में कामयाबी हासिल कर ली। आरएसएस और भाजपा को इस "प्रोजेक्ट" को ताजा निष्कर्ष तक लाने में महज सवा दो या ढाई दशक का वक्त लगा।

जिन अस्मिताओं से हिंदुत्व के मूल ढांचे को नुकसान हो सकता था, उनके बीच से कुछ हिम्मती चेहरे सामने तो आए, लेकिन एक ओर सत्ता और तंत्र के बीच फर्क समझ सकने में नाकामी और अदूरदर्शिता के साथ-साथ दूसरी ओर इनके बीच से ही कुछ स्वार्थी, महत्त्वाकांक्षी और अवसरवादी तत्त्वों ने सत्ता में पहुंचने के लिए उस समूचे आंदोलन का बेड़ा गर्क करने में अपनी पूरी भूमिका निबाही। अस्मिता के संघर्ष का मकसद जहां इसके जरिए ऐतिहासिक रूप से छीने गए अधिकारों को हासिल करके भेदभाव पर आधारित एक व्यापक पहचान, यानी हिंदुत्व के ढांचे को तोड़ना था, वहां अस्मिता ही राजनीति का एक हथियार बन गया।  ऐसी स्थिति में जो होना था, वही हुआ। संघर्ष मुक्ति के लिए होना था, लेकिन उसने अपने लिए ऐसे दायरे पैदा किए, जिसके भीतर ही उसे गोल-गोल घूमना था। जबकि मकसद उसी दायरे को तोड़ कर आगे का रास्ता अख्तियार करना होना चाहिए था। क्या इस दायरे की दीवार इतनी मजबूत है कि उससे पार न पाया जा सके? यह शायद आखिरी सच नहीं है। लेकिन किसी दबाव से उपजे संघर्ष की दिशा कई बार भ्रम का शिकार हो जाती है। जबकि यही संघर्ष अगर किसी सुचिंतित योजना का हिस्सा हो तो नई व्यवस्था की जमीन तैयार कर सकता है।

जाति की अस्मिता धर्म की व्यापक अस्मिता के दायरे के भीतर की चीज थी। इसलिए जब अधिकारों के लिए खड़ी हुई अस्मिताएं संघर्ष का रास्ता छोड़ कर वैचारिक रूप से भी जातिगत दायरे में सिमटने लगीं तो ऐसे में उस पर उसकी व्यापक अस्मिता का हावी होना लाजिमी था। हिंदुत्व की व्यवस्था चलाने वाले एक सक्षम समूह के रूप में आरएसएस को यह बहुत अच्छे से मालूम है कि अगर उसकी व्यवस्था के मूल ढांचे को खतरा हो तो उसे समान हथियार से ही वापस मोड़ा जा सकता है। तो जिस तरह सामाजिक वंचना के नतीजे में छीने गए अधिकारों को हासिल करने के लिए जाति की अस्मिता आंदोलन की शक्ल में खड़ी हुई, उसी जाति को मंडल आयोग की सिफारिशें लागू होने के बाद आरक्षण विरोधी आंदोलन के साए में आरएसएस ने उसकी व्यापक अस्मिता, यानी हिंदुत्व में समाहित करने के लिए रथयात्रा से अपना अभियान शुरू किया और फिर गुजरात जनसंहार से लेकर हिंदू-मुसलिम तनाव को एक मुद्दे के रूप में जिंदा रखने की कामयाब कोशिश की।

लेकिन यह अगर आरएसएस की राजनीति का प्रत्यक्ष और हावी पहलू रहता तो देश से लेकर दुनिया भर में यह साबित करना मुश्किल होता कि उनकी यह राजनीति ‘प्रतिगामी’ नहीं है। इसलिए गुजरात जनसंहार के बाद कट्टर हिंदुत्व के नायक के चेहरे के रूप में उभरे नरेंद्र मोदी नेतृत्व में ही विकास के ‘गुजरात मॉडल’ का मिथक खड़ा किया गया, ठीक उसी तरह जिस तरह धर्म और पारलौकिक मिथकों के सहारे सामाजिक सत्ताएं अपना शासन बनाए रखती हैं, शासित तबकों के सोचने-समझने, विश्लेषण करने के दरवाजों को बंद रखती हैं।

इन सबको जमीनी स्तर पर पहुंचाने के लिए जहां आरएसएस के पास अपने स्वयंसेवक थे, वहीं इस सामाजिक सत्ता-तंत्र में पहले से ही एक ‘इम्यून सिस्टम’ की तरह काम करने वाले वाचाल तंत्र को सिर्फ शह की जरूरत थी। इसके अलावा, आज दूरदराज के इलाकों तक अपनी मजबूत पहुंच और दखल बना चुके मीडिया ने अपने सामाजिक ढांचे और कारोबारी क्षमता का अपूर्व प्रदर्शन करते हुए आरएसएस की तमाम परोक्ष कवायदों को स्थापना दी। मूल तत्त्व हिंदुत्व की व्यापक अस्मिता में जातीय अस्मिताओं को समाहित करना था, लेकिन उस पर विकास के ‘गुजरात मॉडल’ की चमकीली चादर टांग दी गई। यानी ‘प्रतिगामी’ होने के तमाम आरोप अब ‘अग्रगामी’ संदेशों में तब्दील हो गए। इसके बाद इस ढांचे से लड़ने की चुनौती इस रूप में खड़ी हुई कि अस्मिता के संघर्ष को राजनीति में झोंकने वालों की जमीन खिसक गई और उस पर हिंदुत्व की अस्मिता का महल खड़ा हो गया।

इसलिए कम से कम यह न कहा जाए कि लोकसभा चुनावों में भाजपा की जीत ने साबित किया है कि जाति की राजनीति खत्म हो गई। जाति या अस्मिता की राजनीति खत्म नहीं हुई। बल्कि वह ज्यादा बड़ी अस्मिता में विलीन हुई है और उसमें घुल-मिल जाने के बाद जो अस्मिता की राजनीति मुखर होगी, वह ज्यादा खतरनाक साबित होगी, जिसकी गाज आखिरकार वंचित और कमजोर जातियों पर ही गिरनी है। इस वंचना की सबसे बड़ी त्रासदी की तुलना पारलौकिक अंधविश्वासों में डूबी उस गुलाम चेतना से लैस समाज के अंत से की जा सकती है जिसमें कोई व्यक्ति कुछ मनचाहे की कामना पूरी होने के लालच में किसी पत्थर की मूर्ति के सामने हाथ जोड़ने के बाद अपने ही हाथों से अपनी गर्दन काट लेता है।

बहरहाल, भारतीय राजनीति में भारतीय जनता पार्टी के एक सक्षम सत्ताधारी ताकत के तौर पर उभरने के बाद अब इसके पीछे कॉरपोरेट, पूंजी-जगत, सत्ता-तंत्र, हजारों करोड़ रुपए खर्च कर तैयार की गई चुनावी ‘परियोजना’ के सूत्रधारों की खोज और व्याख्या की जाएगी और की जानी चाहिए। लेकिन भारत जैसे देश में आग्रहों-पूर्वाग्रहों-दुराग्रहों, भक्ति, व्यक्ति पूजा, प्रचार, अफवाहों पर मारने-मरने पर उतर जाने वाले समाज में एक अर्धविकसित मतदाता अगर दक्षिणपंथ के लिए अपना हाथ उठाता है तो यह किसी भी विकासमान समाज की नाकामी है। वह मतदाता विकास नहीं समझता। उसे विकास का ‘गुजरात मॉडल’ समझाया जाता है, जो दरअसल एक नफरत की एक अनदेखी बुनियाद पर खड़ा होता है। लेकिन उस अनदेखी बुनियाद पर परदा उतारने का जिम्मा आखिर किसका है?

अब चुनौती उन ताकतों के सामने है जो हिंदुत्व की मौजूदा धारा के खिलाफ एक तरह से व्यवस्था विरोधी प्रतीक के रूप में खड़े हुए थे, लेकिन बाद में उन्होंने भी नरम कार्ड खेलना शुरू किया था। बिना इस सच को समझे कि उनकी मूल ताकत और चुनौती क्या है और कौन है...! नब्बे के दशक में राजनीति की एक वैकल्पिक जमीन तैयार करने के साथ-साथ विचारधारा के स्तर पर व्यवस्था-विरोधी प्रतीक के रूप में देखे जाने वाले राजनीतिक समूहों के सामने अब खुद को बचाए रखने का सवाल सबसे अहम है। अगर वे पहचान सकें कि इस प्रतीक के रूप में उन पर कहीं व्यवस्था के एजेंट तो हावी नहीं है और उन्हें दूर करना उनका सबसे पहला मकसद होना चाहिए, तो शायद बचने-बढ़ने और एक विकल्प की उम्मीद को जमीन पर उतारा जा सकता है...!

Thursday, 27 February 2014

इंसानी सभ्यता पर कलंक वह "शासकीय कत्लेआम"...






मास्टर साहब की डायरी

अरविंद शेष

राजकीय आदर्श विद्यालय फतेहपुर में तबादले के बाद पिछले तीन महीने में अख़्तर साहब ने कई समझौते किए थे। मसलन, कुर्ता और चौड़े घेरे का पायजामा पहनना छोड़ कर पैंट-शर्ट पहन लगे थे। सिर पर की टोपी हटा ली थी, लंबी दाढ़ी को छोटा करवा लिया था और स्कूल के सभी मास्टर साहबों के साथ-साथ नई भर्ती से आए मास्टर संतलाल को भी दोनों हाथ प्रणाम की मुद्रा में जोड़ कर मिलते ही 'नमस्कार संतलाल जी' कह कर- 'कैसे हैं' कहना नहीं भूलते थे। उन्होंने अब दाहिने हाथ का अंगूठा तलहथियों से लगा कर 'आदाब' या 'अस्सलाम-वालेक़ुम' करना छोड़ दिया था। हालांकि संतलाल को उनकी किसी बात से कभी कोई परेशानी नहीं हुई थी, लेकिन मुश्किल यह थी कि स्कूल संतलाल की सुविधा-असुविधा के हिसाब से नहीं चलता था और अख़्तर  साहब को संतलाल जी की नहीं, बल्कि बाकी चारों शिक्षकों रामाधार शर्मा, महेश तिवारी, हेडमास्टर प्रेमशंकर झा और हरेंद्रगुप्ता की सुविधा-असुविधा का खयाल जरा ज्यादा करना पड़ता था। स्कूल में गणित शिक्षक के रूप में आने के आठ-दस दिन बाद से ही आपसी बैठकी में अख़्तर  साहब पर छोटी-छोटी टिप्पणियां शुरू हो गई थीं, जैसे- 'आप भी अख़्तर  साहब महान हैं। महाराज रहते हैं हिंदुस्तान में और दिखाई देते हैं पाकिस्तानी जैसा।' 'हाथ जोड़ के नमस्कार करने में अपमान बुझाता है क्या अख़्तर  साहब!' -ये टिप्पणियां हंसते हुए की जातीं, लेकिन अख़्तर  साहब लगभग पचास के हो चले थे, सो बातों के छिपे भावों को ताड़ लेते थे और धीरे-धीरे उन्होंने समझौते करने शुरू कर दिए थे।

पिछली फरवरी से स्कूल में 'हिंदुस्तान' की जगह 'दैनिक जागरण' अखबार आने लगा और इस बदलाव के परिणाम उनके चेहरे पर पढ़े जाने लगे तब भी अख़्तर  साहब को कोई खास परेशानी नहीं हुई। लेकिन अट्ठाईस फरवरी को स्कूल पहुंचते ही 'शो काउज़' की तरह जब अखबार उनके सामने पटका गया तो वे प्रेमशंकर झा का मुंह ताकने लगे।

'मुंह क्या ताकते हैं? देखिए, साठ गो कारसेवक को ... मियां सब जला के राख कर दिया।' अखबार की ओर उंगलियां दिखा कर गंदी गाली देते हुए प्रेमशंकर झा ने कहा।

'ये जिसने भी किया है, बहुत गलत किया है।' अख़्तर  साहब बोले।

'अरे जिसने क्या! गोधरा में और रहता कौन है? सब मुसलमाने सब मिल के सबको जिंदा जला दिया महाराज! औरत आ बच्चो को नहीं छोड़ा। एतना क्रूर होता है सब। बाप रे!' रामाधार शर्मा भी कुढ़ते हुए बोले।

'हम भी वही कह रहे हैं। जिसने भी ये हरकत की है, अल्लाह उसे माफ नहीं करेगा।' अख़्तर  साहब ने वहां से हटना चाहा।

'जाइए महाराज! अबहियो जिसने पर अटके हुए हैं।' प्रेमशंकर झा ने कहा और एक छात्र को बुला कर क्लास लगने की घंटी बजा देने को कहा।

और एक मार्च को अखबार वाला बिल दे गया। पता नहीं स्कूल में सरकार अखबार के लिए अलग से पैसे देती है या नहीं, स्कूल में सभी मास्टर साहब सत्रह-सत्रह रुपए मिला कर अखबार मंगाते थे। दो मार्च को अखबार का बिल चुका दिया गया। अख़्तर  साहब से बिना पैसे लिए। सिहरते हुए उन्होंने जब महेश तिवारी से इस बारे में पूछा तो जवाब मिला, 'बिल चुका दिया गया है। आपको देने की जरूरत नहीं है।'?

यही बात अख़्तर  साहब को अखर गई। उन्हें लगा कि जैसे गोधरा में ट्रेन उन्होंने ही जला दिया और उसी की सजा उन्हें मिल रही है।

संतलाल जी थोड़ा खुल कर अख़्तर  साहब से बात करते थे। इस पर उन्हें भी थोड़ा आश्चर्य हुआ, क्योंकि उन्हें भी सिर्फ सत्रह रुपए लगे थे। यानी बाकी के पैसे उन लोगों ने आपस में बांट कर अदा किए। कायदे से अख़्तर  साहब को पैसे नहीं लगने का मतलब संतलाल के पैसों में बढ़ोतरी होनी थी।

लेकिन चार-पांच मार्च से अखबार के रुख की तरह प्रेमशंकर झा, शर्मा जी और तिवारी जी का रुख भी बदलने लगा। हरेंद्र गुप्ता अब अपनी ओर से अख़्तर  साहब को प्रणाम करने लगे और झा जी क्लास लगने से पहले अखबार पढ़ने-पढ़ाने काम उत्साहपूर्वक करते। अख़्तर  साहब को भी प्रथम पृष्ठ की खबरें दिखाई जातीं। जाहिर है, अखबार गुजरात के दंगों से पटे पड़े होते थे। एक बार प्रेमशंकर झा और एक बार महेश तिवारी अख़्तर  साहब को कह चुके थे- 'आपने ठीक कहा था अख़्तर  साहब, अल्लाह माफ नहीं करेगा।'

अख़्तर  साहब सब कुछ समझते। लेकिन खुद को बच्चों में झोंके रहते। बावजूद इसके उनके दिमाग में सीतामढ़ी दंगे का दृश्य बार-बार घूम जाता और वे गुजरात की कल्पना कर दिन--ब-दिन और ज्यादा सिहरते जा रहे थे।

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तब वे सीतामढ़ी मध्य विद्यालय में पदस्थापित थे। उस साल मोहर्रम उन्होंने वहीं बिताया था। अंसारी टोले का ताजिए का जुलूस खैरका रैन पर तीन घंटे में चल कर पहुंचता था। दूसरे कई ताजिए उस रैन पर पहुंचते थे। अंसारी टोले के उस्मान और उसका पड़ोसी रामबदन राय जब लाठी से भिड़ते तो दो घंटे में भी फैसला नहीं हो पाता था। मुकाबला हमेशा बराबर रहा। इस मुकाबले को देखने वालों की भीड़ हिंदू ज्यादा होते थे कि मुसलमान- कहना मुश्किल था। उसी साल दशहरे में दुर्गा की प्रतिमा के विसर्जन जुलूस में भी कितने हिंदू थे और कितने मुसलमान, कोई नहीं कह सकता था।

...और कोई नहीं कह सकता था कि किसने पत्थर फेंका और किसने दुर्गा की प्रतिमा का सिर काट दिया। लेकिन इसके बाद कितने लोगों के सिर कटे- यह भी कोई नहीं कह सकता था।

अख़्तर  साहब दशमी को अपने घर मोतिहारी के मुरैना से सीतामढ़ी के गणेशपुरा में अपनी बहन के घर आ गए थे कि परसों से स्कूल खुलेगा। लेकिन स्कूल क्या खुलेगा, दंगा शहर और आसपास के इलाकों में बुरी तरह फैल चुका था। रात साढ़े ग्यारह बजे गणेशपुरा में भी चीख-पुकार मची। अख़्तर  साहब की बहन का घर उत्तर की तरफ था। दंगाई दक्षिण से आए थे। बहन और तीनों बच्चों को लेकर अख़्तर  साहब और उत्तर की ओर भागे। बहनोई लंबा चाकू लेकर चीख-पुकार की दिशा में भागा, फिर कभी नहीं लौटा। उत्तर की ओर भागते हुए रास्ते में गांव से बाहर लखना डोम का घर था। उसके थोड़ी दूर के बाद गणेशपुरा का एक और मुस्लिम टोला था। पहले लखना को देख कर अख़्तर  साहब डरे, लेकिन लखना ने अपने घर का दरवाजा खोल दिया। एक पल उन्होंने लखना को देखा, फिर बच्चों औऱ बहन को लेकर लखना के घर में घुस गए। घर में पहले से आठ और लोग छिपे थे। लखना ने घर का दरवाजा बाहर से लगा दिया और बरामदे पर बिछे बिछावन पर लेट गया।

गणेशपुरा को आग में झोंकने के बाद दंगाइयों की भीड़ जब इसी ओर बढ़ने लगी तो दरवाजे की झिर्रियों से झांकते अख़्तर  साहब का खून सूखने लगा। भीड़ लखना के घर के सामने थी। अंधेरे में किसको पहचानें। लखना जन्म से ही गांव में था। वह भी किसी को नहीं पहचान रहा था। लेकिन उसने जयराम शर्मा को जरूर पहचाना। जयराम शर्मा ने यही सोचा कि भागने वाला टोले की ओर भागा होगा। इस डोम के घर में कौन घुसेगा! भीड़ में से किसी ने पूछा कि किधर भागा है सब? लखना ने बेसाख्ता पूरब की ओर उंगली बता दिया। लेकिन भीड़ जयराम शर्मा के इशारे पर उत्तर की ओर मुस्लिम टोले की तरफ बढ़ गई। पांच मिनट में ही वहां से भी चीख-पुकार की आवाज और धधकती हुई आग नजर आने लगी।

आधे घंटे में भीड़ लौटी। भीड़ को चुपचाप अपना काम करना था, वह चुपचाप अपना काम करके जा रही थी। लखना के घरके सामने से जब भीड़ गुजर गई तो पीछे से जयराम शर्मा लखना के पास आया। सौ-सौ के पांच नोट लखना के हाथ में देते हुए चुप रहने की हिदायत दी। लखना ने हसरत भरी निगाहों से नोटों की ओर देखा और 'हां'? में सिर हिलाया। आश्वस्त होकर जयराम शर्मा आगे बढ़ा कि पीछे से कत्ते का भारी वार गर्दन पर पड़ा। मुंह से आवाज भी निकली।

भीड़ गुजर चुकी थी। किसी का ध्यान भी नहीं गया। या गया भी होगा, तो भीड़ को अब जयराम शर्मा की जरूरत नहीं थी।

उधर गांव से ट्रकों से खुलने और जाने की आवाज आई। जिन ट्रकों में भीड़ आई थी, उसी में चली गई। बाद में घायल और बचे हुए लोगों ने भी पुलिस को बताया कि हमारे पड़ोसियों ने हमें नहीं मारा। हथियारों से लैस लोग बाहर से ट्रकों में भर कर आए थे। उस भीड़ में जयराम शर्मा को छोड़ कोई भी गांव का आदमी नहीं था। उसी की लाश अब लखना के घर के सामने थी। जयराम शर्मा की लाश की तरह सब कुछ शांत पड़ चुका था। लेकिन गणेशपुरा गांव और टोले- दोनों तरफ से रोने-पीटने और कराहने की आवाजें लगातार आ रही थीं।

लखना ने घर का दरवाजा खोला और कहा, 'सब चला गया। आप सभे गोरा रात में नहीं जाइए। जयराम शर्मा के साफ कर दिए। ऊहे सार सब करवाया। हम ओकर लाश के गांव में फेंक के आते हैं। एहे में खप जाएगा। सार तहिने, भरल चौक पर बांस के फट्ठा से मार के बन-बन फोड़ दिया था, जानते हैं, काहेला? मरल बिलाई फेंके, आ खाली पांच गो रुपइया मांगे थे। ऊ दुइए गो दे रहा था। आज सार के सभे निकाल दिए।'

गजब की संतुष्टि भी लखना के चेहरे पर। वह फिर दरवाजा बाहर से बंद कर बलराम शर्मा की लाश कंधे पर उठा कर गांव में सबसे पूरब उसी के घर के सामने फेंक आया। अपने घर के सामने कुदाल से खून सनी मिट्टी भी हटा दिया। सुबह जब पुलिस आई, तब लखना ने सबको अपने घर से जाने दिया। अख़्तर  साहब को बहनोई की लाश मिल गई थी, वे बहन और बच्चों को संभालने में लग गए थे। दहशत में लगभग सारा गांव खाली हो गया था। मुसलमान अगले हमले की आशंका और हिंदू पुलिस से पकड़े जाने के डर से गांव छोड़ कर भाग चुके थे। हालांकि जाते हुए हताहत मुसलमानों ने पुलिस से एक भी शिकायत गांव के हिंदुओं के बारे में नहीं की थी। दूसरे दिन तक दंगे पर नियंत्रण हो चुका था। कर्फ्यू लग चुका था। अख़्तर  साहब भी अपनी बहन और बच्चों को लेकर किसी तरह अपने घर मुरैना लौट चुके थे। कर्फ्यू और तनाव के बाद स्कूल छठ तक छुट्टी के बाद ही खुल सका था।

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सीतामढ़ी शहर अब सामान्य दिखता है, लेकिन इतना कमजोर कि जरा-सा उंगली लगाओ तो भरभरा कर गिर जाने का खतरा। दंगे के इतने साल बाद भी हालत यह है कि अभी कुछ दिन पहले रेलवे स्टेशन पर किसी की बारात उतरी थी। स्टेशन से बस रिजर्व थी। लोग उसमें बैठ चुके थे। छह-सात लोग पान खाने नीचे किसी दुकान पर रुके थे कि किसी की नजर धीरे-धीरे बढ़ चुकी बस पर पड़ी। छहो-सातों लोग आगे जा रही बस को पकड़ने तेजी से दौड़ पड़े। दौड़ते हुए लोगों को देख कर आसपास के सारे लोग घबरा गए। किसी ने किसी से कुछ नहीं पूछा। अचानक सिर्फ दुकानों के शटर गिरने की आवाज आने लगी। जिसको जिधर बन पड़ा, भाग चले। उस बस को भी जहां जाना था, चली गई। दस मिनट के भीतर शहर में पूरी तरह सन्नाटा छा गया और आधे घंटे के भीतर चप्पे-चप्पे पर पुलिस के जवान तैनात हो गए। खुद एसपी और डीएम ने मेहसौल चौक पर डेरा डाल दिया, मामले के साफ होने तक। एक तेरह साल के पप्पा बिस्कुट बेचने वाले लड़के ने एसपी के सामने मामला साफ किया था। लेकिन तनाव को हरा होना था, हरा हो गया। दशहरे का हो या मोहर्रम का जुलूस, बसें शहर के दो किलोमीटर बाहर रोक दी जाती हैं। सरकार ने सीतामढ़ी शहर को सांप्रदायिक दृष्टि से अति-संवेदनशील क्षेत्र घोषित कर रखा है।

तो आज फिर अख़्तर  साहब स्कूल में टिफिन यानी मध्यावकाश में लगे बच्चों के साथ खेलने। संतलाल भी खेल में शामिल थे। खेल में पहली से चौथी कक्षा तक के बच्चे भाग ले रहे थे, लेकिन पूरे स्कूल के बच्चे दर्शक थे। खेल का शीर्षक था- 'बोल भाई कितने, आप चाहें जितने...।' लगभग बीस बच्चों को गोल घेरा बना कर खड़ा किया गया था। घेरे में अख़्तर  साहब भी थे। संतलाल बीच में बोलते हुए तेजी से घूम रहे थे- 'बोल भाई कितने', बच्चे जवाब देते- 'आप चाहें जितने।' घूमते-घूमते अचानक संतलाल ने कहा- 'पांच।' पूरा गोला घेरा टूट कर पांच-पांच के समूह में बंट गया। जो एक बच गया, अब उसकी बारी थी, गोल घेरे में 'बोल भाई कितने' बोलते हुए घूमते हुए। ऐसे ही बाकी बच्चों को भी अन्य खेलों में शामिल किया जाता।

बच्चों के साथ अख़्तर  साहब और संतलाल का खेलना, खेलने के साथ-साथ पढ़ाना भी होता था। खाली समय के अलावे अक्सर ये दोनो ही कक्षा में धमाचौकड़ी मचा देते थे। हेडमास्टर प्रेमशंकर झा की नाराजगी के बात ये खेल मध्यावकाश और शाम की छुट्टी के समय होने लगे थे।

ऐसे मामलों में नाराज होने के लिए किसी कारण नहीं, बल्कि सिर्फ द्वेष की जरूरत होती है। और कुछ लोगों में द्वेष के लिए सिर्फ दूसरे के सुख की जरूरत होती है। तो चूंकि सारे के सारे बच्चे अख़्तर  साहब और संतलाल में सर जी- सर जी कहते हुए जहां उलझे होते थे, वहीं बाकी सर जीयों से सिहरे रहते। उन सर जीयों को इस बात से बड़ा सुख मिलता कि बच्चे उनसे डरते हैं, लेकिन अख़्तर  साहब और संतलाल में उलझे रहते हैं- इससे उन्हें परेशानी होती थी। यही परेशानी बैठकी में फूटती थी।

'मरदे स्कूल को मजाक बनाके रख दिया है।' महेश तिवारी ने हेडमास्टर प्रेमशंकर झा का मूड भांपते हुए कहा।

'समझे में नहीं आता है कि क्या किया जाए। ऐसे में तो बच्चा सब माथा पर चढ़बे करेगा।' रामाधार शर्मा ने भी तुक्का जोड़ा।

गुप्ता जी कैसे पीछे रहते- 'देखते हैं, पहिले टिफिने में सब ससुरी भाग जाता था। अब छुट्टियो के बाद घरे जाने का नाम नहीं लेता है सब।'

'क्या कीजिएगा! सरकारो सार नया-नया ट्रेनिंग चला दिया है कि गतिविधि आधारित पढ़ाई कराइए। इससे बच्चा सब ज्यादा समझेगा। समझेगा ... ! मूस मोटाएगा त लोढ़ा होगा। अरे इ स्कीम-उस्कीम से कुछो होता है। जिसको जो काम करना है उ करबे करेगा। हं..., इ खेले-कुदे वाला बात से लइका सब आदर करना छोड़ दिया है। कुछो होय, हमरा त अबहियो लइका सब प्रणाम सर जी कहबे करेता है।' निराशा और संतुष्टि के भाव से प्रेमशंकर झा बोले।

'कुछो कहिए, स्कूल का माहौल पहिले ऐसा नहीं था। जब से इ मियां जी आया है, क्लास रूम को खेल का मैदान बना दिया है।' महेश तिवारी ने फिर कुढ़ते हुए कहा।

'आ ताड़कोला! ठीके कहते हैं, सोलकन के सोलह आना धन हुआ नहीं कि लगा फुदकने।' रामाधार शर्मा ने खैनी मलते हुए संतलाल की व्याख्या की।

संतलाल के चाचा अब भी ताड़ के पेड़ से ताड़ी उतारते थे।

'अब हेडमास्टरे साहब को कुछो करना पड़ेगा। हम सब त कहेंगे त कह देगा कि तुम कौन होता है। हेडमास्टरो साहब नहीं कुछ किए, त बूझिए कि लइका सब नाच पार्टी में जाएगा। लौंडा बनेगा, नाटक करेगा। हं..., त निर्लज्ज बनेगा त नाचे पाटी में न जाएगा।' गुप्ता जी इस वक्त सोलकन से फॉरवर्ड बनने पर तुले हुए थे, सो उन्होंने हेडमास्टर साहब को चुनौती दी। शांति से सिर हिलाते हुए हेडमास्टर साहब बोले- 'अच्छा धीरज धरिए। कहीं गुजरात वाला हवा एनहू बह गया न...!'

इसी के बाद हेडमास्टर साहब ने कक्षा में खेलों को लेकर अख़्तर  साहब से अपनी नाराजगी जताई थी और संतलाल को भी हिदायत दी। संतलाल ने अकेले में अख़्तर  साहब से कहा- 'जो अपने दुख से दुखी होता है, उसका तो इलाज है, लेकिन जो दूसरो के सुख से दुखी है, उसका क्या इलाज है?'

संतलाल अगर दर्शन की भाषा में अख़्तर  साहब को तसल्ली देते थे, तो इसलिए कि बीए करने के बाद पटना घूमने गए। उस वक्त पटना के गांधी मैदान में पुस्तक मेला चल रहा था, सो वह भी घूम लिए। आठ-दस किताबें खरीदीं और तभी से किताबें खरीदने हर साल पुस्तक मेले में पटना जाते रहे। इसलिए बीए की पढ़ाई बेकार नहीं गई और धीरे-धीरे आदमी बनने लगे। हो सकता है कि अनुसूचित जाति के आरक्षण पर शिक्षक की नौकरी हासिल कर ली हो, लेकिन साहित्य और सामयिक किताबों से खुद को लगातार समृद्ध करते रहे। डायरी लिखने की आदत भी इसी दौरान पड़ी।

तो संतलाल ने फिर आज रात में सोते वक्त सिरहाने की ओर चौकी पर लालटेन रखा। पेट के बल लेट कर डायरी लिखने लगे- '...! अमर्त्य सेन ने कहा भी है, 'धार्मिक कट्टरवाद या सांप्रदायिक फासीवाद या संकीर्ण राष्ट्रवाद के लिए निरक्षरता का होना जरूरी नहीं है। लेकिन लड़ाकू कठमुल्लापन को कायम रखने के लिए निरक्षरता की अहमियत को नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता।'

संतलाल ने डायरी बंद की। एक ग्लास पानी पिया। लालटेन धीमा किया, और सो गए।

छब्बीस मई को स्कूल में गर्मी की छुट्टियों के बाद अख़्तर  साहब अपने गांव मुरैना जाने को तैयार थे। उसी दिन फतेहपुर के धनी-मानी राजपूत जयकांत सिंह के बेटे की बारात मोतिहारी से आगे मुरैना होते हुए फूलपुर जाने वाली थी। जयकांत सिंह ने दो-तीन मजदूर अख़्तर  साहब को जानते थे। उन तीनों को ट्रैक्टर पर बारात में जाने वाली मिठाइयों और पकवानों के साथ जाना था। उन लोगों ने अख़्तर  साहब को उसी पर बैठा लिया कि रास्ते में मुरैना है, उतर जाइएगा।

लेकिन मोतिहारी में प्रवेश करने के पहले ही सड़क की एक पुलिया टूटी थी। नीचे पानी नहीं था। दक्षिण से खेत में होकर रास्ता लगा हुआ था जो आगे सड़क में मिल जाता था। एक दिन पहले की बारिश में रास्ता पूरा कीचड़ हो चुका था और उसी कीचड़ में एक जीप फंसी हुई थी। रास्ता पूरी तरह बाधित था। वहां ट्रैक्टर काम तो आ सकता था, लेकिन जीप के आगे होता तब। ढाई घंटे इंतजार के बाद विपरीत दिशा से एक ट्रैक्टर आया। उसी से जीप को खींच कर निकालने की जुगत हुई और रास्ता खुल सका। मोतिहारी पहुंचते-पहुंचते ट्रैक्टर को रात आठ बज गए। लड़की वालों की तरफ से दो लोग मुख्य चौक पर इसी ट्रैक्टर के इंतजार में खड़े थे। रास्ता बताया गया कि मुरैना होकर रास्ता बहुत खराब हो चुका है, इसलिए परशुरामपुर होकर चलिए।

मुश्किल केवल अख़्तर  साहब को थी। यहां से मुरैना नौ किलोमीटर था और फूलपुर से दो किलोमीटर। ट्रैक्टर पर बैठे जगरनाथ ने कहा कि इतनी रात को अब पैदल कहां जाइएगा। फूलपुर चलिए, वहां से सबेरे चले जाइएगा। अख़्तर  साहब को भी यही ठीक लगा। फूलपुर पहुंचने में दस बज गए। सूखी और चांदनी रात होती तो इस वक्त भी चले जाते, लेकिन बरसात और कीचड़ के कारण रुक गए और जनवासे के शामियाने में एक कोना पकड़ लिया। तीनों मजदूर ट्रैक्टर का सामान लेकर लड़की वालों के घर की ओर जा चुके थे। बारात भी चल चुकी थी।

एक घंटे में द्वार-पूजा और नाश्ते के बाद लोग लौट आए। तब तक सब ठीक था। लेकिन भोजन के लिए बुलाने आए कुछ लोग जब बारातियों से चलने का आग्रह करते-करते अख़्तर  साहब के पास पहुंचे तो बखेड़ा हो गया। अख़्तर  साहब की दाढ़ी छोटी थी, लेकिन उसकी कटिंग देख कर उनमें से एक व्यक्ति ने कहा- 'इ त लगता है मुसलमान है। इहां कइसे आया।'

सबके कान खड़े हो गए। मुसलमान है, मुसलमान है- भनभनाहट होने लगी। जितने लोग थे, सभी अख़्तर  साहब के चारों तरफ घेरा बना कर खड़े हो गए। दो-तीन लोगों ने अख़्तर  साहब से पूछताछ शुरू कर दी। अख़्तर  साहब ने सब कुछ बताया कि किन हालात में वे यहां आ गए हैं। लेकिन उन्हें जानने वाले तीनों मजदूर लड़की वालों के दरवाजे पर थे। सो इन्क्वायरी चल रही थी। किसी के मुंह से निकला- 'अरे एकरा सब पर भरोसा करना खतरा खरीदना है। बेग चेक कीजिए।'

और मौखिक इन्क्वायरी चेकिंग पर पहुंच गई। अख़्तर  साहब का बैग लेकर उसमें से एक-एक सामान बाहर निकाल दिया गया- तौलिया, भागलपुरिया चादर, पैंट-शर्ट, शेविंग सेट, कुछ किताबें, कलम और कपड़े में लपेटी हुई एक तस्वीर। कपड़ा हटा कर तस्वीर निकाली गई। तस्वीर किसी युवती की थी।

'देखिए! सार अपने बुढ़ा गया है, आ बेटी के उमर के बीबी रखे हुए है।' फोटो देखने वाले ने कहा।

'अरे एकरा सब में एहे सब होएबे करता है। चार-चार गो रखता है सब! क्या कीजिएगा!' दूसरे ने जोड़ा।

अख़्तर  साहब का धीरज छूटा- 'नहीं बाबू, यह मेरी बेटी की तस्वीर है।'

लेकिन तस्वीर चटखारेदार विश्लेषणों के साथ भीड़ में घूमने लगी। साथ-साथ अख़्तर  साहब की आवाज भी घूमती रही कि 'नहीं बाबू, ये मेरी बेटी की तस्वीर है।' एक आवाज यहां तक आ गई कि 'क्या मरदे अकेल्ले आ गया है। जौरे इसको भी लेते आता। बाई जी के नाच के कमी पूरा हो जाता।'

अख़्तर  साहब दोनों हाथ सिर पर रख कर बैठ गए। लाचार-से बोले- 'ऐसा मत कहिए बाबू! यहां भी किसी बेटी की ही शादी है। ऐसा मत कहिए।'

पटना से बारात में आए दूल्हे के एक दोस्त से देखा नहीं गया। उसने तस्वीर लगभग छीन कर अपने हाथ में ले लिया और जोर से बोला- 'क्या करने पर तुले हैं आप लोग? क्या जरा भी आदमीयत नहीं बची है?' और उसने अख़्तर  साहब के हाथ में वह तस्वीर दे दी।

'इ कोन है हो? मियां जी के दमाद है का? इसको हटाओ त...! आ मियां जी के जेबी चेक करो। कोनो ठीक नहीं है। नेपाल माहे आईएसआई वाला सार सब देस में घुस रहा है।' और दो लोगों ने ऊपर से लेकर नीचे तक अख़्तर  साहब की एक-एक पर्ची तक चेक कर डाला। जब कुछ हाथ नहीं लगा, तब दूल्हे के चाचा ने कहा, 'अच्छा छोड़ दीजिए, सबेरे चले जाएंगे।'

शांति की प्रक्रिया शुरू हुई और बात यहां तक पहुंची कि 'अच्छा मौलवी साहब, छोड़िए, चलिए खाना खा लीजिए। लइका सब है, नहीं समझता है।'

'अब क्या खाएं बाबू! इतना खा चुके कि अब कुछ नहीं बचा।' अख़्तर  साहब रोने लगे। बेआवाज! उन्हें खुद याद नहीं कि कितने दिनों के बाद उनकी आंखों से आंसू बह रहे थे कि रुक नहीं रहे थे।

बैग और सामान अब भी उनके सामने बिखरा पड़ा। लोग उन्हें जिद्दी और नाटकबाज कहके जा चुके थे। धकिया के अलग कर दिया गया पटना से आया वह दूल्हे का दोस्त अब भी खाने नहीं गया था। वह धीरे-धीरे अख़्तर  साहब के पास आकर सामान समेटने में उनकी मदद करने लगा। अख़्तर  साहब के कंधे पर हाथ रखके उसने उन्हें दिलासा दिया- 'जाहिलों की जमात से आप क्या उम्मीद करते हैं बाबा।'

अख़्तर  साहब ने आंख उठा कर उसकी ओर देखा और हल्के से फफक पड़े।

और सुबह अख़्तर  साहब कब चले गए। किसी को खबर भी नहीं हुई। एक हल्ला हुआ कि देखो कहीं किसी का कोई सामान तो लेकर नहीं भागा है। सबके-सब ईमानदार निकले और कहा कि उनका सब कुछ ठीक है।

एकदम सुबह पहुंचते ही अख़्तर  साहब की पत्नी ने सवाल किया तो चुपचाप कमरे में चले गए और पत्नी के पास आते ही उसकी छाती में मुंह छिपा कर रोने लगे। पत्नी ने भी बच्चों की तरह थपकाते हुए पूछा- 'क्या हुआ...?' मुंह हटा कर सिर्फ इतना कह सके- 'इतना गैरयकीनी! इतना शक! इतनी नफरत!' थोड़ा रुक कर बोले- 'थोड़ी चाय बनाओ।' और पत्नी को सब कुछ बता दिया।

'वह लड़का कौन था?' पत्नी ने दूल्हे के उस दोस्त के बारे में पूछा।

'नहीं मालूम। लेकिन ऐसे ही लोगों के भरोसे चलना पड़ता है।' अख़्तर  साहब ने कहा।

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गर्मी की छुट्टियों के खत्म होने के बाद स्कूल फिर से खुल गया था। बच्चे संतलाल और अख़्तर  साहब के और ज्यादा करीब होते जा रहे थे। अख़्तर  साहब के साथ लगे होने की वजह से संतलाल भी बाकी सबकी नजरों में चढ़ते जा रहे थे।

एक दिन प्रेमशंकर झा ने व्यंग्य मारा- 'हं..., लगे रहिए। लइका सब कलक्टर नहीं त आपके जइसा मास्टरो बन जाए।'

हरेंद्र गुप्ता से भी नहीं रहा गया- 'क्या संतलाल! चाय के पइसा अख्त..रे साहब देते हैं क्या?'

संतलाल तुरंत मतलब समझ गए। लेकिन आज उन्हें भी नहीं रहा गया- 'हां, आप पीजिएगा त आपका भी पैसा उन्हीं से दिलवा देंगे। खाली कहिए त सही!'

'देखिएगा, चाय पीते-पीते कहीं संतलाल से सलीम न बन जाइए!' हरेंद्र गुप्ता कुढ़ते हुए जाने लगे।

'अभिए आप कोन अपना माने बैठे हैं।' संतलाल ने भी जड़ा और दूसरी ओर चले गए।

उस रात संतलाल ने अपनी डायरी में लिखा- 'इस प्रकार के द्वेष की जड़ें आखिर कहां हैं? बाकी तीनों का आग्रह तो समझ में आता है। लेकिन हरेंद्र गुप्ता! वे शिक्षक भी हैं। क्या कभी विश्लेषण के दौर में नहीं जाते?' और आगे उन्होंने पढ़ी हुई किसी किताब का एक अंश लिखा- ' ...चीखते हुए दादू ने हिंदू राष्ट्र का घोष करने वाले उन दस-बारह लड़कों के झुंड से कहा- पता है कहां थे तुमलोग जब उज्जयिनी की सड़कों पर वसंत सेना की पालकी निकलती थी? तुम उसको कंधा देते थे। कहां थे जब जगन्नाथ का रथ निकलता था? तुम उसका रस्सा खींचते थे। और कहां थे, जब राजाओं की अश्वमेध होता था? तुम भट्टी के सामने बैठ कर तलवार बनाते थे। तुम हमेशा सिर्फ सीढ़ियां रहे हो। और सीढ़ियां खुद कहीं नहीं जातीं। केवल दूसरे लोग उस पर पांव रख कर ऊपर जाते हैं। आज भी तुम वही हो- सबसे नीचे की सीढ़ियां, जो सिर्फ इस्तेमाल होती हैं।'

उधर गुजरात गौरव-यात्रा का दंश झेल कर 'गौरवान्वित' हो रहा था, तो इधर अख़्तर  साहब को अखबारों में छपी दंगों की खबरों का पाठ बड़े उत्साह से सुनाया जाता। और गुजरात में फिर से दो-तिहाई की जीत पर राजकीय आदर्श विद्यालय फतेहपुर में भी मिठाइयां बंटीं। दूसरे लोगों के साथ संतलाल को भी एक लड्डू मिला, लेकिन अख़्तर  साहब को दो लड्डू मिले। अख़्तर  साहब और संतलाल ने एक-दूसरे का मुंह देखते हुए लड्डू खा लिया।

पिछले स्वतंत्रता दिवस पर झंडा फहराने के बाद 'जन-गण-मन अधिनायक जय है' हुआ और एक जलेबी देकर छुट्टी दे दी गई। सो, इस बार गणतंत्र दिवस पर अख़्तर  साहब ने अपना एक आइटम बच्चों के साथ मिल कर तैयार करना शुरू कर दिया। आइटम सिर्फ यही था कि कुछ बच्चे कोरस में 'सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा' की तैयारी कर रहे थे। संतलाल ने भी गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस के बारे में पूरी जानकारी देने वाला नाटक तैयार करा लिया। इसी को देख कर महेश तिवारी ने कुछ बच्चों से 'वंदे मातरम' तैयार करा लिया। तय हुआ कि झंडोत्तोलन के बाद पहले 'वंदे मातरम' होगा, उसके नाटक, फिर 'सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा।'

पच्चीस जनवरी को नाटक के पूर्वाभ्यास में राष्ट्रगीत औऱ राष्ट्रगान के लेखकों का नाम आने पर हेडमास्टर साहब ने अख़्तर  साहब ने पूछा- 'इ सारे जहां से अच्छा किसका लिखा हुआ है?'

अख़्तर  साहब ने बताया- 'इकबाल।'

उसी शाम छुट्टी के बाद जब अख़्तर  साहब और संतलाल बच्चों में उलझे थे, बैठकी में प्रेमशंकर झा ने कहा- 'अब बुझाया! मौलाना को वंदे मातरम काहे नहीं सूझा। इहो अगर कोनो इकबाल का लिखा हुआ रहता जरूर सूझता।'

और कल होकर झंडोत्तोलन हुआ, राष्ट्रगान हुआ और जलेबी बंट गई। सभी बच्चे ताकते रह गए कि अब उनके द्वारा तैयार आइटम पेश होगा। लेकिन जलेबी बंट चुकी थी। अख़्तर  साहब और संतलाल बच्चों को लेकर स्कूल के प्रांगण में चले गए और 'बोल भाई कितने, आप चाहें जितने' खेलने लगे।

गणतंत्र दिवस की रात संतलाल ने अपनी डायरी में यह भी जोड़ा- '...फासीवादी ताकतें दूसरी-दूसरी पहचानों की ओर में काम करते हैं। आमतौर पर वह अपनी ओट बनाते हैं राष्ट्रवाद के एक अतिवादी रूप को, जिसके चलते राष्ट्रवाद के साथ ही एक फासीवादी परिभाषा नत्थी हो जाती है।' संतलाल ने डायरी बंद की और आज अपने चुप रह जाने के कारणों पर विचार करने लगे। ...तो क्या आज भी मेरी चेतना पर वही मानसिकता हावी है, जो सिर्फ मूकदर्शक रहना सिखाती है?

राजकीय मध्य विद्यालय फतेहपुर का अगला एक महीना बेहद तनावों भरा गुजरा। अख़्तर  साहब ज्यादा समय चुप रहने लगे थे। बच्चों के खेल में भाग नहीं लेते, बस खेलते हुए देखते। उन्हें कभी-कभी चक्कर आने लगा था। डॉक्टर ने आखिरकार स्थायी रूप से उच्च रक्तचाप की दवा लेने की सलाह दे दी। संतलाल ने अपने तबादले के लिए हाथ-पांव मारना शुरू कर दिया। लेकिन उसके साथ ही हेडमास्टर प्रेमशंकर झा तक को खरी-खरी सुनाना भी शुरू कर दिया।

लक्षणा में एक दिन प्रेमशंकर झा ने जड़ा- 'क्या संतलाल! सुनते हैं कि आपके अंबेडकर मुसलमान को देखना तक नहीं चाहते थे! आप त इहां...।' कि पलट कर संतलाल ने सीधा जवाब दिया- 'सोझे बजरंग दल के टिकट पर एमपीये का चुनाव लड़ न जाइए महाराज! काहेला मास्टरगीरी में चले आए हैं?'

उस दिन से प्रेमशंकर झा ने संतलाल से सीधे कभी बात नहीं की। संतलाल ने भी जिला शिक्षा अधिकारी के यहां स्थानांतरण के लिए सीधी अर्जी देने को सोच लिया। अपनी पहली पसंद अपना गांव लगमा बताया, फिर लिख दिया कि आप जहां चाहें, वहीं मुझे सुविधा होगी। रात में ही अर्जी तैयार भी कर ली।

इधर अख़्तर  साहब तबीयत ज्यादा खराब होते जाने के बावजूद कक्षाओं में बच्चों में उलझे रहते। उन्होंने संतलाल से भी धीरे-धीरे कटना शुरू कर दिया था। यह देख कर कि उनके चलते संतलाल को भी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे ही समय में क्रिकेट विश्व कप का बुखार तेजी से बढ़ता जा रहा था। खास कर एक मार्च को भारत-पाकिस्तान के मैच को लेकर माहौल तनाव की हद तक पहुंच चुका था। बयान-दर-बयान और शुभकामनाएं-दर-शुभकामनाएं आ रही थीं कि भारत और किसी से जीते न जीते, पाकिस्तान से मैच जीत जाना विश्व कप जीतने के बराबर होगा। या यों कहिए कि पाकिस्तान पर फतह होगा।

बाईस फरवरी को अख़्तर  साहब ने आवेदन दे दिया कि मेरी तबीयत ज्यादा खराब होती जा रही है, थोड़े आराम की जरूरत है। सोचा कि बंबई से बेटा भी आया हुआ है, उसके सात पटना जाकर ठीक से इलाज भी करा लेंगे।

आवेदन देते समय चौकड़ी जमी हुई थी। महेश तिवारी ने खैनी मलते हुए पूछा- 'तब अख़्तर  साहब! फटक्का भारत में छूटेगा कि पाकिस्तान में!' संदर्भ क्रिकेट मैच को लक्षित था।

'इसके लिए पाकिस्तान जाने की क्या जरूरत है! हर गांव आ शहर में कहीं-न-कहीं पाकिस्तान हइये है की!' रामाधार शर्मा ने तुक मिलाया।

अख़्तर  साहब मुस्कराए। सिर्फ इतना कहा- 'मेरा भरोसा अभी टूटा नहीं है।' और बाहर निकल गए। कल होकर ही मुरैना के लिए निकल पड़े। घर में स्वास्थ्य लाभ कर रहे थे। वेतन उठाने के बाद बेटे के साथ पटना जाने का भी मन बना चुके थे। बीच में ही ब्लड प्रेशर की नियमित दवाई खत्म हो गई। टालने में दो दिन टल गए।

सुबह चाय पीकर कुछ पैसों के इंतजाम में अपने गांव से दो किलोमीटर दूर शाहपुर एक संबंधी के घर गए। संबंधी आज भारत-पाकिस्तान मैच देने के लिए बैटरी चार्ज कराने गए थे। लौटने तक रुक गए। उनके आने पर पैसे भी मिल गए। पैसे लेकर घर को लौट रहे थे कि बीच रास्ते में ही छाती में बांईं ओर कचोटने जैसा दर्द शुरु हो गया। बांईं बांह में लगा कि जैसे कोई जोर-जोर से चुटकी काट रहा हो। एक रिक्शे वाले से मदद मांग कर किसी तरह घर पहुंचे। पत्नी गोद में सिर रख कर तेल लगा कर जोर से मलने लगी। बेटा छाती और बांह मलने लगा। इसी बीच अख़्तर  साहब ने दाहिने हाथ से बांईं छाती को जोर से भींचा। मुंह खोल कर कुछ कहना चाहा, लेकिन अचानक ठहर गए। गर्दन पत्नी की गोद में दाहिनी ओर ढलक गई। दोनों हाथों से अपनी छाती पीट कर 'या अल्लाह' कहती हुई पत्नी पीछे की ओर बेहोश होकर गिर पड़ी। बेटा पहले 'अब्बा' कह कर चिल्लाया, फिर 'अम्मी' कहते हुए संभालने दौड़ा।

तीन मार्च को अख़्तर  साहब का बेटा स्कूल में पहुंचा। हेडमास्टर प्रेमशंकर झा से बोला- 'मैं शकील अख़्तर ...। ...शमीम अख़्तर  का बेटा। ...अब्बा का शनीचर के रोज इंतकाल हो गया। ...मैं बाद में फिर आऊंगा। ...अभी खबर देने आ गया था।'

इतना कह वह जाने लगा कि प्रेमशंकर झा ने पूछा कि कैसे हो गया। अख़्तर  साहब के लड़के ने रुक-रुक कर बता दिया। जाते वक्त संतलाल उसे वस तक दिलासा देते हुए छोड़ने आए और कहा- 'जैसी भी मदद की जरूरत हो, बेहिचक कहना।'

संतलाल स्कूल में वापस आए। चौकड़ी की बैठकी चुटकियों के साथ चल रही थी।

'मैचवा के पहिले मरा कि बाद में हो?' रामाधार शर्मा ने पूछा।

'न..., दुपहरे में में खत्तम हो गया था।' प्रेमशंकर झा ने कहा।

'हो सकता है कि बेचारा के पहिलहिं आभास हो गया हो।' महेश तिवारी ने सुर मिलाया।

'अब इ न सोचिए कि अपने त चलिए गया, लेकिन बेटा के नौकरी दे के गया।' हरेंद्र गुप्ता ने जोड़ा।

'हं, इहे त एगो दुख के बात है कि बेटा के नौकरी हो जाएगा। न त आपलोगों को असली मिठाई त आजे बांटना चाहिए था।' संतलाल ने कमरे में घुसते हुए कहा और अपना हाथ में टांगने वाला थैला लेकर निकलते हुए बोले- 'आज त कम-से-कम स्कूल बंद रखिएगा?' और सभी व्यंग्य की नजर फेंकते हुए बाहर निकल गए।

और आज संतलाल ने डायरी के पन्नों की सीमा तोड़ दी। लिखते गए, लिखते गए ' ...अब सवाल यह नहीं रह गया लगता है कि पूर्वाग्रहों को त्याग कर तथ्यों और तर्कों के सहारे आगे कैसे बढ़ा जाए। बल्कि सवाल अब यही रह गया लगता है कि भावुकता के सहारे पीछे कैसे लौटा जाए। आगे बढ़ने के लिए तथ्यों और तर्कों की जरूरत पड़ती है, जिस पर मेहनत करना पड़ता है- सभी स्तरों पर। और भावनाओं में बहाने या भावुकता में बहने के लिए मेहनत की जरूरत नहीं पड़ती, इसलिए आसान है...। अख़्तर  साहब की मौत पर हमारे स्कूल में की टिप्पणियां इसलिए साधारण नहीं हैं, क्योंकि ये टिप्पणियां समाज के एक ऐसे तबके की गई हैं जो समाज की बुनियाद तैयार करता है। और जब बुनियाद डालने वाले हाथ ही पूरी तरह संवेदनहीन औऱ खोखले हों तो? दरअसल, धार्मिक कट्टरता से त्रस्त व्यक्ति जिस गुलामी को भोग रहा होता है, उसे न वह देख पाता है, न समझ पाता है। इससे बड़ी त्रासदी यह है कि यह गुलामी उसे अच्छी लगती है। एक डरे हुए शंकाग्रस्त व्यक्ति से 'मनुष्य' होने की उम्मीद भी कैसे की जा सकती है। लेकिन उम्मीद कहां है...?'

कल मुरैना जाऊंगा...। पता नहीं, अख़्तर  साहब के परिवार वाले किस हाल में होंगे। यही सोचते-सोचते संतलाल सोने लगे कि ध्यान आया कि ट्रांसफर के लिए अर्जी देने भी जाना है...। अब थोड़े ही दिनों में मैं भी चला जाऊंगा। ...तब वे लोग आराम से रह सकेंगे। ...लेकिन बच्चे! मैं भी भाग जाऊं तो बच्चे!

...नहीं-नहीं कहते हुए वे उठ बैठे। एक ग्लास पानी पिया और ट्रांसफर के लिए जो अर्जी उन्होंने तैयार की थी, उसे लेकर एक बार पढ़ा और अगले ही पल उसे फाड़ डाला।

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                                                                  (समाप्त) 
                                                         (पाखी में प्रकाशित)

Saturday, 4 January 2014

सामंतवाद की दीवार में सिर फोड़ता सामाजिक न्याय...



नवंबर 2005 में जब बिहार में लालू प्रसाद की पार्टी का तथाकथित "जंगल राज" खत्म हुआ और तय हो गया कि भाजपा के सहारे से नीतीश कुमार बिहार के मुखिया बन जाएंगे, उस वक्त मैं बिहार के सीतामढ़ी जिले मे अपने गांव से पांच किलोमीटर दूर गाढ़ा चौक पर था। जदयू-भाजपा की जीत की मुनादी पीटती हुई भीड़ चौक की तरफ आ रही थी। पास आने पर "नीतीश कुमार जिंदाबाद" जैसे नारों के साथ जो मुझे सुनाई पड़ा, वह किसी भी होशमंद शख्स को दहलाने के लिए काफी था। लगभग दो सौ लोगों की भीड़ गुलाल-अबीर से होली खेलती उन्माद में चीख रही थी कि "हमारा राज वापस आ गया... हमारा राज वापस आ गया...।"

यहां मुझे यह साफ करने की जरूरत शायद नहीं है कि वे लोग कौन थे जो इस बात की होली मना रहे थे कि "हमारा राज वापस आ गया...।" मैं अंदाजा लगा सकता था, लेकिन फिर भी मैंने वहां पिछले कई साल से कंधे पर डोलची टांग कर पान बेचते सुखो भाई से पूछा कि ये कौन लोग हैं। उन्होंने मुझे जवाब के तौर पर सवाल दिया कि इस चौक पर और किसकी हिम्मत होगी दिवाली के साथ होली मनाने की। फिर उन्होंने धीरे और सहमी हुई आवाज में बताया कि सब बाबू साहब हैं।

लालू प्रसाद की तरह नीतीश कुमार भी पिछड़ी जाति, यानी ओबीसी की ही पृष्ठभूमि से आते हैं। लेकिन गाढ़ा चौक पर "बाबू साहबों" की भीड़ क्यों खुशी मना रही थी और नारे लगा रही थी कि "हमारा राज वापस आ गया...।"

मैं नहीं जानता कि कुछ उदार कहे जाने वाले लोगों को आज भी यह वहम क्यों है कि नीतीश भाजपा के साथ खड़े हैं, लेकिन भाजपाई नहीं हैं। इस देश की असली मुश्किल यही है कि यहां ब्योरा जमा करना और उसे पेश करना अपनी जिम्मेदारी का पूरा होना मान लिया जाता है। हमें यह ध्यान रखने की जरूरत है कि अगर हमें यहां से आगे बढ़ना है तो किसी भी क्या के क्यों पर बात करनी होगी, उसकी करनी होगी।

गाढ़ा चौक पर "हमारा राज वापस आ गया..." की मुनादी पीटते हुए लोग कोई चाणक्य नहीं थे, लेकिन वे क्यों निश्चिंत थे कि उनका "राज" वापस आ गया? क्या सिर्फ इसलिए कि भाजपा सत्ता की हिस्सेदार थी? मामला केवल हिस्सेदारी का नहीं था, बल्कि उस भरोसे का था जो नीतीश कुमार ने दिया था और उस मानसिकता का था, जिसमें नीतीश कुमार जीते हैं। यहां शायद बिहार में अति पिछड़ी जातियों और महादलितों के लिए की गई उनकी तथाकथित "क्रांति" की हकीकत का बयान करने का मौका नहीं है।

लेकिन 2005 के नवंबर से आज तक अलग-अलग मौकों पर गाढ़ा चौक पर गूंजते वे नारे अगर मुझे जिंदा दिखे हैं तो इसलिए कि नीतीश कुमार और उनकी सरकार ने हर मौके पर उसे पाला-पोसा और मजबूत किया है।

सत्ता में आने के महज तीसरे महीने उन्होंने अपना सबसे पहला बड़ा फैसला लिया और उस पर तुरंत अमल किया वह था अमीरदास आयोग को भंग करना। मुझे अक्सर यह शक होता है कि कहीं यह नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री बनने की पूर्व शर्त तो नहीं थी! वरना क्या वजह हो सकती है कि जो अमीरदास आयोग अपनी लगभग सारी रिपोर्ट पूरी कर चुका था, बस उसके सौंपे जाने की औपचारिकता बाकी थी, उसे आखिरी वक्त में भंग कर दिया गया?

दरअसल, अमीरदास आयोग शायद चाह कर भी उन हकीकतों को नजरअंदाज नहीं कर सकता था कि भूमिहारों की रणवीर सेना को खाद-पानी से सींचने और पालने-पोसने वाले लोग भाजपा और जदयू के वैध साए में जनतांत्रिक राजनीति कर रहे थे और उसके पांव राजद के भीतर भी फैले हुए थे। इसलिए इस आयोग का भंग किया जाना सबके लिए सुविधाजनक था और शायद इसीलिए किसी को भी इस पर हंगामा खड़ा करना जरूरी नहीं लगा। लालू प्रसाद की उस राजद के लिए भी नहीं, जिसके सत्ताकाल में रणवीर सेना द्वारा किए गए कत्लेआमों की पड़ताल और उसके तारों की जांच के लिए वह आयोग बिठाया गया था।

अमीरदास आयोग को भंग किए जाने को मैं नीतीश कुमार की सामाजिक राजनीति की दृष्टि मानता हूं। और उनकी सरकार की समूची कार्यशैली ने इसे बार-बार पुष्ट किया है। फर्क सिर्फ यह है कि उनके कामकाज का आलकन एक लगभग बिके हुए और समर्पित मीडिया के "ट्रांसफॉर्म्ड बिहार" टाइप रिपोर्टों के आधार पर होता रहा है। सवाल है कि नीतीश कुमार की मेहरबानी से बिहार को ट्रांसफॉर्म्ड बताने वालों का समाज कौन-सा है और उसे अपने निष्कर्षों का आधार बनाने वाले लोग कौन हैं? पैदा होने के बाद रणवीर सेना की बर्बरताओं को राजद सरकार की नाकामी करार देना सही था, लेकिन इसी मीडिया के लिए अमीरदास आयोग को भंग करना किसी परेशानी की वजह नहीं था। क्यों?

यही वही दौर था जब 2002 में रणवीर सेना का मुखिया ब्रह्मेश्वर सिंह पकड़े जाने के बाद से जेल में बंद था और बथानी टोला जैसे तमाम कत्लेआमों के सिलसिले में जहां भी अदालतों में उसकी खोज होती, नीतीश सरकार के सिपाही उसके "फरार" होने की खबर दे देते। और आखिरकार नीतीश कुमार की दोस्ताना मेहरबानी से जब ब्रह्मेश्वर सिंह जेल से बाहर आ गया तो इस पर क्यों किसी को हैरान होना चाहिए? यहां तक कि लालू प्रसाद या रामविलास पासवान को भी इस पर चुप रहना जरूरी लगा तो इसके कुछ तो कारण रहे होंगे।

और जब पटना हाईकोर्ट के जजों ने लक्ष्मणपुर बाथे या बथानी टोला कत्लेआम के निचली अदालत में साबित तमाम अपराधियों को रिहा किया तो कम से कम मुझे सचमुच कोई हैरानी नहीं हुई। लालू प्रसाद की राजद सरकार ने बहुतेरे धतकरम किए होंगे, लेकिन कम से कम लक्ष्मणपुर बाथे और बथानी टोला मामले में उसने पीड़ितों के पक्ष में इतना जरूर किया कि सेशन कोर्ट ने कइयों को छोड़ने के बावजूद कइयों को फांसी और उम्रकैद की सजा दी थी। लेकिन जब "अपना राज" वाली सरकार आ गई तो राज्य की बदली हुई तस्वीर का असर अदालतों पर भी तो पड़ना चाहिए! सो हाईकोर्ट के जजों को स्वाभाविक रूप से उस कत्लेआम के गवाह भरोसेमंद नहीं लगे। निचली जातियों के लोग सिर्फ जान देते वक्त भरोसेमंद होते हैं। वे अदालत के कठघरे में भरोसेमंद नहीं होते हैं।

अभी बहुत दिन नहीं बीते हैं जब दिल्ली में रोहिणी की एक अदालत की जज कामिनी लाउ ने भी हरियाणा के मिर्चपुर कांड के पीड़ितों को "गैरभरोसेमंद" गवाह घोषित किया था और तीन को छोड़ कर तमाम आरोपियों को मासूम होने का तमगा देकर रिहा कर दिया था। दलितों पर अत्याचार के मुकदमों में सजा की दर महज दो प्रतिशत के आसपास है। खुद केंद्र सरकार कहती है कि दलितों पर जुल्म से संबंधित लगभग अस्सी फीसद मामले लंबित हैं। यानी सौ में करीब अस्सी मामले अदालतों तक पहुंचे ही नहीं। और हममें से बहुत सारे लोग हैं जो न्यायिक सेवाओं में आरक्षण की मांग को एक पिछड़ा और द्वेषपूर्ण मांग करार देते हैं! हो सकता है, यह शक सही हो। लेकिन वे कौन-सी वजहें होंगी कि उसी पटना हाईकोर्ट को अमौसी हत्याकांड में दस लोगों को फांसी की सजा देने में कोई हिचक नहीं हुई। क्या इसलिए कि नीतीश सरकार की परिभाषा के हिसाब से वे आरोपी महादलित थे और अदालत को वे सभी गवाह "भरोसेमंद" लगे जो सवर्ण थे? यह देश के दूसरे इलाकों का भी सच हो सकता है। लेकिन बिहार में पुलिस थानों के दारोगा को शायद जज भी बना दिया गया है जो उत्पीड़न, अत्याचार या अपराध के मामले दर्ज नहीं करता है, तत्काल थाने में ही निपटा देता है। आंकड़ों में अपराध में कमी वैसे ही नहीं होती है। और दलितों-पिछड़ों पर जुल्म ढाने वाली सामंती ताकतों ने नीतीश कुमार को यों ही नहीं बिठाया है बिहार की कुर्सी पर!

नीतीश एक अच्छे प्रतिनिधि साबित हुए हैं उन ताकतों के, जो उनके पहले के तकरीबन डेढ़ दशक के तथाकथित जंगल राज में निराश हो गए थे। लालू प्रसाद अपने शुरुआती सत्ताकाल में कहते थे- "गाय चराने वालों, सुअर चराने वालों, पढ़ना लिखना सीखो, पोथी-पतरा फेंको, पढ़ना-लिखना सीखो।" सुअर या बकरी चराने वालों के पढ़ने-लिखने और पंडितों का पोथी-पतरा फेंक देने के "खतरे" का अंदाजा किसे नहीं था। फिर लालू के ही नाम से प्रचारित "परवल का भुजिया खाओ" या "भूरा बाल साफ करो..." जैसे जुमलों ने सचमुच बहुत सारे लोगों के दिमाग में कुछ गड़बड़ पैदा की। लालू की खासियत यही थी और शायद उनकी सीमा भी कि इससे ज्यादा वे कुछ नहीं कर सके। शायद कर भी नहीं सकते थे। और उनके जुमले आखिरकार एक खास तरह का दिशाभ्रम परोसने से ज्यादा का दर्जा हासिल नहीं सके। बाद में उन्होने जो रास्ता पकड़ा, उसे उम्मीदों के साथ धोखा करना कहा जाए, तो वह भी कम होगा। पोथी-पतरा फेंको का नारा देने वाले वही लालू प्रसाद आज मंदिरों में दर-दर भटकते हुए जेल पहुंच चुके हैं और अपने भविष्य के लिए तंत्र-मंत्र, पूजा-पाठ और पंडितों के आगे दंडवत हैं।

लेकिन असली मुश्किल शायद भाकपा (माले) की थी। 2004 तक मैं पटना में ही था और मैंने देखा है कि भाकपा (माले) की रैलियों में किसी भी दूसरी पार्टी की रैलियों से बहुत ज्यादा भीड़ होती थी। लेकिन उस भीड़ को वे शायद कभी अपनी ताकत के रूप में तब्दील नहीं कर पाए। समूचे मध्य बिहार में जिस संघर्ष की लहर भाकपा (माले) ने पैदा की, उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। लेकिन वे कौन-सी वजहें रहीं कि उसकी जमीन पर कब्जा किसी और का हो गया। क्यों इसके भीतर वे तमाम लोग किनारे लगा दिए गए, जिन्होंने इसे खड़ा किया? यह पार्टी जिनके लिए लड़ाई लड़ने का दावा करती रही है, उनके बीच का कोई भी चेहरा पटल पर नहीं दिखता है तो क्यों?

वैसे यह अकेले माले की दिक्कत नहीं है। माकपा और भाकपा ने भी इसी पैमाने पर जो खाली, लेकिन बेहद उपजाऊ जमीन छोड़ी, उस पर किसी न किसी को तो फसल उगाना था! कम्युनिस्ट पार्टियों के लिए जो लोग अपने हो सकते थे, उन्हें ये पार्टियां अपनी नहीं लगीं, क्यो? क्यों उन नक्सली समूहों को मौका मिला जिन्होंने दलित-पिछड़ी जातियों के सबसे कमजोर तबकों को रणवीर सेना और सरकारी पुलिस के बीच में खड़ा कर दिया? जिस स्थिति में नक्सली समूह रहे हैं, उसमें उत्पीड़ित तबकों को वे इससे ज्यादा क्या दे सकते थे? लक्ष्मणपुर बाथे या बथानी टोला के बदले सेनारी कर दिया जाएगा, लेकिन पटना हाईकोर्ट में कौन खड़ा होगा लक्ष्मणपुर बाथे या बथानी टोला के भुक्तभोगियों के लिए? क्या इस देश के समाज को समझना इतना मुश्किल है?

नब्बे के दशक में बिहार में दलितों और पिछड़ी जातियों का जो उभार हुआ था, उसका नेतृत्व वामपंथी दलों को करना था। लेकिन क्यो यह ताकत लालू का दामन थाम कर आगे बढ़ी और नीतीश के जरिए फिर वहीं वापस लौट गई, जहां वह थी। सोशल जस्टिस के नारे को सोशल इंजीनियरिंग में तब्दील करने के जितने बड़े अपराधी नीतीश कुमार हैं, लालू की जिम्मेदारी उससे कम नहीं बनती। लेकिन वामपंथी पार्टियों ने क्या किया? क्यों नीतीश जैसे फर्जी लोगों को निचली जातियों का उद्धारक घोषित कर दिया जाता है, जबकि नीतीश की मूल दृष्टि सामंती ताकतों की जड़ें मजबूत करती हैं? कुछ सपने दिखाए गए और ढेर सारी उम्मीदों के साथ लोग इंतजार करते रहे और कोई सोशल जस्टिस से बेईमानी करता रहा, कोई सोशल इंजीनियरिंग को पुख्ता करता रहा तो कोई इसे पचड़ा कह कर दूर भागता रहा।

इस देश में जाति से निपटे कौन-सा वर्ग खड़ा किया जा सकता है? इस देश में वर्ग के परदे से जाति को ढकना क्या एक मजाक नहीं लगता?

खैर, कोई भी सत्ता बिना तंत्र पर कब्जे के मन-मुताबिक नहीं चल सकती। लालू प्रसाद के कथित "जंगल राज" में जो थोड़ी तोड़-फोड़ हुई थी, नीतीश के चेहरे के जरिए उसी को दुरुस्त किया जा रहा है। नौकरशाही को खुली छूट दे दो, वह आपको सत्ता का मुखौटा बने रहने में कोई अड़चन नहीं पैदा करेगा। और किसी को यह समझने के लिए बहुत मेहनत नहीं करनी होगी कि बिहार की नौकरशाही और बिहार का तंत्र आज भी किसका है, किसके लिए है। साइकिल वितरण टाइप योजनाएं दरअसल वे परदे हैं जिसके पीछे दो दशकों में सामाजिक यथास्थितिवाद के मनोविज्ञान के गड़बड़ाए हुए पुर्जे दुरुस्त किए जा रहे हैं। सभी मोर्चों पर...!

बिहार का मीडिया हमें दिखाता है कि नीतीश सरकार ने स्कूलों-अस्पतालों की हालत अच्छी कर दी है। वह हमें यह नहीं बताता कि स्कूल-अस्पताल की इमारतों पर रंग-रोगन के अलावा पढ़ाई-लिखाई या डॉक्टर-इलाज की हकीकत क्या है। हम अखबारों के पन्नों पर बिहार की चमकती सड़कों की खबरें पढ़ कर खुश होते हैं। कोई नहीं बताता कि हर वक्त पैसे का रोना रोने वाली बिहार सरकार अपने कुल बजट का अड़तीस फीसद हिस्सा केवल सड़कों के लिए देती है तो इसके पीछे मकसद क्या केवल सड़कें दुरुस्त करना है? कंस्ट्रक्शन और सेवा क्षेत्र की चमकती तस्वीर पर ग्रोथ-रेट के फर्जीवाड़े से किसका चेहरा खिल रहा है? यह पता लगाने की जरूरत है कि सड़क निर्माण से लेकर कंस्ट्रक्शन के तमाम ठेके समाज के किस वर्ग के हिस्से जा रहे हैं।

बहुत अच्छी सड़कों वाले हरियाणा से कोई खबर आ जाती है कि किसी दलित ने किसी सवर्ण के घड़े से पानी पी लिया और उसके हाथ काट दिए गए। और बहुत चमकती सड़कों की ओर तेजी बढ़ते और दावा करने वाले बिहार में भी एक दलित किसी सवर्ण के घर के आगे लगे सरकारी हैंडपंप से पानी पी लेता है तो उसे पीट-पीट कर मार डाला जाता है। फारबिसगंज में जो हुआ था, वह अररिया की तरह चुपचाप दफन हो जाता, अगर चोरी से बनाया गया वीडियो क्लिप बाहर नहीं आ जाता। हमारी बहुत अच्छी सड़कों की मंजिल कहां हैं?

हम लक्ष्मणपुर बाथे या बथानी टोला पर हाईकोर्ट के फैसले से परेशान होते हैं। लेकिन इस व्यवस्था में इससे अलग कोई फैसला होना भी कहां है? लक्ष्मणपुर बाथे या बथानी टोला कत्लेआम को अंजाम देने वाली रणवीर सेना के गुंडे जब ब्रह्मेश्वर सिंह की हत्या के बाद राजधानी पटना में नंगा नाच करते हैं और उसे पोसने वाली सरकार इस तांडव का मजा लेते हुए कहती है कि उन्हें रोकने से दंगा भड़क जाता तो हम किससे उम्मीद कर रहे हैं? रणवीर सेना के गुंडों का तांडव दंगा नहीं था और उसे रोकने से दंगा भड़क जाता! याद कीजिए कि बथानी टोला कत्लेआम पर पटना हाईकोर्ट के फैसले के बाद नीतीश कुमार ने कुछ भी कहा हो।

नीतीश सरकार ठीक कहती है। उन्हें रोका जाता तो समाज की दबी-कुचली पिछड़ी जातियों को यह संदेश कैसे पहुंचता कि रणवीर सेना के नेतृत्व में सवर्ण वर्चस्व आज भी कितनी ताकत रखता है। यानी एक मोर्चे पर तंत्र चुपचाप अपना काम कर रहा है और अब दूसरा मोर्चा भय का मनोविज्ञान रच रहा है।

नीतीश कुमार की यह वही सरकार है जिसके हाथ सरकारी स्कूल के टीचरों से लेकर आशा की महिला कार्यकर्ताओं के शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों पर बर्बर लाठी चार्ज करते हुए नहीं कांपते। लेकिन रणवीर सेना का नंगा नाच शायद वह मंत्रमुग्ध होकर देखती है। कॉमरेड एबी बर्धन जब कहते हैं कि नीतीश कुमार ने लालू प्रसाद से सत्ता पाने के लिए रणवीर सेना जैसे सामंती संगठनों का सहारा लिया तो उसे एक विवादित बयान कहा जाता है। लेकिन नीतीश सरकार का वह कौन-सा चरित्र है जो उसे एबी बर्धन की राय से उसे अलग करता है। वैसे कॉमरेड एबी बर्धन ने सिर्फ वही कहा जो बहुत सारे लोगों के साथ-साथ खुद नीतीश सरकार भी पहले से जानती है। क्या यह बेवजह होगा कि जातिगत आतंक और कत्लेआम का प्रतीक बन चुका रणवीर सेना का मुखिया कहता है कि नीतीश बिहार में अच्छा काम कर रहे हैं? (हालांकि यही कॉमरेड एबी बर्धन अब मानते हैं कि नीतीश कुमार बिल्कुल धर्मनिरपेक्ष हैं और लालू प्रसाद उनके सामने संकट पैदा कर रहे हैं। पता नहीं, यह दिशाभ्रम कॉमरेडों को कहां लेकर जाएगा।)

ब्रह्मेश्वर सिंह की रिहाई, बथानी टोला और लक्ष्मणपुर बाथे जनसंहार पर पटना हाईकोर्ट का फैसला, ब्रह्मेश्वर की हत्या के बाद पटना में तांडव- सभी एक ही जगह पहुंचने वाले अलग-अलग रास्ते हैं।

ब्रह्मेश्वर सिंह की हत्या के बाद अगले कम से कम पंद्रह दिन तक के बिहार के कम से कम हिंदी अखबारों के पन्ने पलटे जा सकते हैं। करीब दो हफ्ते में इन अखबारों ने बताया कि बिहार के सत्ताधारी सामाजिक वर्ग का चरित्र क्या है, वह कैसे काम करती है। लगातार दस-बारह दिनों से अगर पहले पन्ने पर आठ कालम हत्यारों के किसी सरगना को "मुखिया जी" या दूसरे संबोधनों के साथ समर्पित हो तो क्या इसके मायने समझने में किसी को दिक्कत होनी चाहिए? यहां तक कि ब्रह्मेश्वर के श्राद्ध के भोज के एक दिन पहले जब सत्ताईस गैस सिलेंडर फटे और उसमें बहुत कुछ खाक हुआ तो उसे भी किसी आरती की तरह पेश किया गया। उसी में एक सरकारी स्कूल के खाक हो जाने पर एक लाइन की चिंता नहीं दिखी। वह सरकारी स्कूल किसका था और किसने उसके इस्तेमाल की इजाजत दी? लेकिन जब राज ही अपना हो तो इजाजत कैसी?

एक दुर्दांत हत्यारे की हत्या के बाद उसका महिमामंडन करता यह वही मीडिया है जिसे बथानी टोला या लक्ष्मणपुर बाथे कत्लेआम पर हाईकोर्ट के फैसले की खबर भीतर के पन्नों के लायक लगी। फैसले पर सवाल तो दूर, पीड़ितों की राय तक के लिए जगह नहीं थी। यही आपराधिक निर्लज्जता फिलहाल बिहार के मीडिया की सबसे बड़ी खासियत है जिसके सहारे चेतना के स्तर पर सामंती शासन को स्वीकार करने की जमीन मजबूत की जा रही है।

लेकिन इन सबके बीच चुपचाप जो हुआ, क्या खुद नीतीश कुमार उस पर गौर कर रहे हैं।  ब्रह्मेश्वर सिंह की हत्या के बाद बिहार के अखबारों में उनकी तथाकथित सेवा यात्रा की जगह क्या थी?  उनकी जिन यात्राओं का ब्योरा अखबारों के पहले पन्ने का आभूषण होता था, वह भीतर के नवें-दसवें या बारहवें-तेरहवें पन्ने पर क्यों खिसक गया? क्या यह नीतीश कुमार के लिए कोई चेतावनी है? हां, उन्हें ध्यान रखना होगा कि वे जिनके मोहरे हैं, वे उनके खिलाफ नहीं जा सकते, बल्कि उनकी अनदेखी भी नहीं कर सकते। परना जिस व्यवस्था के वे नुमाइंदगी कर रहे हैं, वह उन्हें झटकने में एक पल की भी देरी नहीं करेगी।

इसीलिए वे अमीरदास आयोग को भंग करते हैं, बद्योपाध्याय कमिटी की सिफारिशों को खारिज करते हैं, सवर्ण आयोग बनाते हैं, बथानी टोला या लक्ष्मणपुर बाथे जनसंहार पर पटना हाईकोर्ट के शर्मनाक फैसले पर चुप रहते है और रणवीर सेना का सरगना ब्रह्मेश्वर सिंह के गुंडो को पटना में आग लगाने की पूरी आजादी देते हैं।

2002 में नरेंद्र मोदी ने भी गुजरात में यही किया था। हिंदुओं को अपना गुस्सा निकालने की पूरी आजादी दी गई और अब वहां सब कुछ सहज दिखता है। विकास के जिस परदे से नरेंद्र मोदी के अपराधों को ढका जा रहा है वही परदा नीतीश कुमार ने अपने आगे टांग रखा है।

(यह लेख कुछ समय पहले लिखा गया था। अपने आलसीपने का क्या जवाब हो सकता है?)

Saturday, 5 October 2013

सामाजिक सत्तावाद के बरक्स समांतर सत्ता-संदर्भ...



आमतौर पर किसी अदालत के फैसले के खिलाफ कोई विपरीत राय नहीं जाहिर की जाती है और उसे एक सही फैसला माना जाता है। इसलिए झारखंड में सीबीआइ की अदालत से बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और राष्ट्रीय जनता दल के नेता लालू प्रसाद को चारा घोटाले के मामले में आए फैसले के खिलाफ भी कुछ नहीं कहा जाना चाहिए। बल्कि कानूनी कसौटी पर उसे एक सही फैसला मान लिया जाना चाहिए। लेकिन अगर किसी को लगता है कि चारा घोटाले में लालू प्रसाद को हुई सजा किसी कानूनी लड़ाई का नतीजा है तो इसका मतलब है कि वह जाने-अनजाने इस समूचे परिप्रेक्ष्य में सामाजिक राजनीति के आयामों की अनदेखी कर रहा है या फिर उस पर परदा डाले रखना चाहता है। यह एक राजनीतिक लड़ाई भी थी, जिसमें तंत्र के अपने खिलाफ होने की वजह से लालू प्रसाद को दूसरी बार जेल जाना पड़ा। मैं यहां घोटालों की परतों या उसकी कानूनी बारीकियों के बारे में बात नहीं करूंगा। इसके बावजूद 1990 के दशक में पटना टाइम्स ऑफ इंडिया के स्थानीय संपादक रहे उत्तम सेनगुप्त की यह बात ध्यान में रखना चाहिए कि जिस चारा घोटाले में लालू प्रसाद को सजा हुई, उसमें मुकदमा दर्ज करने या फिर जांच के आदेश बतौर मुख्यमंत्री खुद लालू प्रसाद ने ही दिया था। झारखंड अदालत में सजा सुनाए जाने के बाद लालू प्रसाद ने लगभग रिरियाते हुए यही तथ्य जज साहब को सुनाते रहे। लेकिन तत्कालीन मुख्यमंत्री और वित्तमंत्री के रूप में वे बिहार की राजधानी पटना से कई सौ किलोमीटर दूर चाइबासा के ट्रेजरी से अवैध तरीके से धन निकासी करने वालों की अनदेखी करने के दोषी ठहराए गए।

बहरहाल अदालती फैसले की तकनीकी व्याख्या के हिसाब से लालू प्रसाद पशुपालन घोटाले के मामले में दोषी हैं। लेकिन इस देश की सामाजिक राजनीति के इतिहास में उनके "गुनाह" कुछ दूसरी ही शक्ल में दर्ज किए जाएंगे। बिहार की राजनीतिक जमीन पहले भी बहुत उर्वर रही है, मगर 1990 में लालू प्रसाद के अचानक मुख्यमंत्री बनने के साथ ही जिस तरह की राजनीति ने उस जमीन पर अपने पांव रखे, उसके बाद उसे नजरअंदाज करना राज-समाज के किसी भी अध्येता के लिए मुमकिन नहीं था। यह एक चौंकाने वाला दौर था, जिसमें कोई व्यक्ति सरकार बनाने के बाद और उसका मुखिया होने के बावजूद सामाजिक सवालों पर मुखर होकर दखल दे रहा था। वरना कोई भी राजनीतिक दल विपक्ष या किसी भी खेमे की राजनीति करता हुआ सामाजिक जटिलताओं के मुद्दे से बचता है या भागता है। यह अब तक की राजनीतिक परंपराओं और उन सरकारी औपचारिकताओं के खिलाफ था, जिसमें सरकार घोषित तौर पर अपने सभी नागरिकों के लिए समानता का व्यवहार रखने का दावा करती है। हालांकि भारत की सामाजिक व्यवस्था में समानता की खोज अपने-आप में एक प्रहसन से कम नहीं है।

तो 1990 में केंद्र की वीपी सिंह सरकार की मंडल आयोग की सिफारिशें लागू करने की घोषणा से लेकर लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा के दौरान देश के दूसरे इलाकों की तरह बिहार में भी जो आरक्षण विरोधी "आंदोलन" जैसी प्रतिक्रियाएं उभरीं, उसमें अपनी सरकार के बतौर मुखिया लालू प्रसाद सीधे-सीधे एक सामाजिक पक्ष में खड़े हो गए। इसके बाद आरक्षण विरोध के उस कथित आंदोलन के मसले पर सरकारी सख्ती और लालू प्रसाद के नाम से उड़ाए गए "भूरा बाल" जैसे जुमलों ने उन्हें एक साथ नायक और खलनायक, दोनों बना दिया। फिर समूचे देश की धर्मनिरपेक्षता, सामाजिक न्याय और संविधान को रौंदती हुई आडवाणी की रथयात्रा को जब लालू प्रसाद ने समस्तीपुर में तोड़ दिया और आडवाणी को मसानजोर के गेस्टहाउस में कैद कर दिया तो उसके बाद शायद यह साफ करने की जरूरत नहीं थी कि वे किसके लिए नायक बने और किसके लिए खलनायक बन गए।

इसी के बाद लालू की लड़ाई सामाजिक सत्ता-प्रतिष्ठानों से शुरू हो चुकी थी, जिसमें उनकी हार कई-कई वजहों से तय थी। एक राज्य के मुख्यमंत्री को किसी सरकारी रेडियो के बारे में अगर यह टिप्पणी करनी पड़ती है कि "ये सा... एआईआर वाले केवल झा-मिश्रा और पांडेय का समाचार देते हैं,' तो इसे कुछ लोग हताशा, पूर्वाग्रह या कुंठा का नतीजा मानेंगे। लेकिन पिछले दो-ढाई दशकों में तंत्र की राजनीति पर से जैसे-जैसे परदे उठ रहे हैं, उसमें यह समझना मुश्किल नहीं है कि लालू को वह टिप्पणी किन हालात में करनी पड़ी होगी।

बहरहाल, यही वह दौर था, जब लालू प्रसाद राज्य में सबसे गंदगीतरीन और अभावग्रस्त बस्तियों में खुद जाकर दलित परिवारों को साफ-सफाई से रहने के लिए "डांटते-फटकारते" और दलित बच्चों को अपने हाथ से साबुन लगा कर नहलाते हुए दिखने लगे थे। आसमान में हेलिकॉप्टर से गुजरते हुए किसी खेत में काम करती सिर्फ चार-पांच महिलाओं को देख कर हेलिकॉप्टर कहीं भी उतार देना या गांव के पिछड़े हुए समाज के गरीब बच्चों को हेलिकॉप्टर देखने के लिए नजदीक ले जाना शायद एक मुख्यमंत्री के सहज व्यवहार में नहीं गिना जा सकता। उनकी इस तरह की "हरकतों" के लिए उन्हें "जोकर" से लेकर "विदूषक" तक की उपाधि दी गई, लेकिन आज भी रुकुनपुरा जैसे कई इलाकों के उन दलित-वंचित परिवारों से जाकर लालू के उस "नाटक" के बारे में पूछना चाहिए, जिनके "गंदे-मैले-कुचैले" बच्चों को एक राज्य के मुख्यमंत्री ने साबुन लगाकर नहलाया था या किसी गरीब की झोंपड़ी के सामने रुक कर उससे पानी मांग कर पिया था। (कुछ ऐसा ही करते हुए आज देश के एक भावी प्रधानमंत्री तारीफ पाते हैं)।

खैर, यह सब करते हुए उस दौर के "नाटकबाज" लालू एक और काम करते थे। शायद उन्होंने खुद ही कवितानुमा कुछ लाइनें तैयार की थीं, जिसे वे कहीं भी भीड़ के सामने गाना शुरू कर देते थे। उनमें से कुछ जो मुझे याद हैं, वे ये हैं- "सुअर चराने वालों, भेड़ चराने वालों, गाय चराने वालों, भैंस चराने वालों, बकरी चलाने वालों, चारा लाने वालों, कूड़ा बीनने वालों, पढ़ना-लिखना सीखो, पढ़ना-लिखना सीखो... पोथी-पतरा फेंको, पढ़ना-लिखना सीखो...!" तभी लालू प्रसाद के दिमाग से "चरवाहा विद्यालय" भी निकला था, जो अपनी अवधारणा में महान था, कहीं-कहीं शुरू भी हुआ, लेकिन लालू प्रसाद अपने काल में भी उसकी कामयाबी सुनिश्चित नहीं कर सके। (पोथी-पतरा फेंको कितना "समाज विरोधी" और "व्यवस्था-विरोधी" शब्दावली है, यह किसके खिलाफ है, यह किस जड़ पर जानलेवा हमला करती है, इसकी प्रतिक्रिया क्या हो सकती है, यह समझने के लिए थोड़ा अपनी जड़ों से ऊपर उठना पड़ेगा।)

लेकिन सरकार की किसी भी योजना को जमीन पर पर कौन उतारता है? पटवारी-बीडीओ-डीएम... तमाम आईएएस या प्रशासनिक अधिकारी... टीचर-डॉक्टर... दारोगा-इंस्पेक्टर-एसपी... तंत्र के इन पुर्जों की मर्जी के बिना कौन सरकार अपनी किसी योजना को वास्तव में जमीन पर उतार सकती है, अगर करना भी चाहे तो ! फिर भी, अंग्रेजों के राज से लेकर आजादी के बाद अब तक आम गरीब जनता के बीच कुछ समय तक अगर नौकरशाही का खौफ कम या खत्म हुआ था तो यह लालू प्रसाद के उसी बेलगाम बड़बोलेपन का नतीजा था। तंत्र में समाज के दलित-पिछड़े वर्गों के जो लोग अफसर के रूप में 'शंटिंग' में सेवा दे रहे थे, उन्हें फील्ड में भेजने की व्याख्या और विकास के दुश्मन के रूप में उनका मूल्यांकन अभी बाकी है। लेकिन वंचित जनता के हक में बेलगाम बड़बोलेपन से कोई उस जनता का दोस्त हो सकता है, लेकिन उसे कुछ दे नहीं सकता, क्योंकि उसी बड़बोलेपन से उसने उन समूहों को भी अपना दुश्मन बना लिया होता है, जिनका राज-समाज और तंत्र पर कब्जा होता है। और जब तंत्र दुश्मन हो तो किसी जनता को अपना बना कर भी कोई क्या कर लेगा? तंत्र पर कब्जे के बिना सत्ता पर कब्जा करना न सिर्फ बेमानी है, बल्कि कई बार आत्मघाती भी!


आगाज़ के बरक्स अंजाम के धुंधलके

लालू प्रसाद के पास चूंकि अपने बेलगाम बड़बोलेपन के अलावा सामाजिक चेतना को मथने की कोई ठोस सुचिंतित योजना या दृष्टि नहीं थी, इसलिए उनके लिए ज्यादा आसान यह था कि वे यथास्थितिवादी व्यवस्थावाद के एक पुर्जे बन कर पहले की सत्ताओं की तरह सब कुछ "सहज" रूप से चलने देते। सांप्रदायिकता और सांप्रदायिक दंगों के मामले में सरकार में रहते हुए लालू प्रसाद ने जो उदाहरण पेश किया वह उन तमाम नरेंद्र मोदियों के लिए एक जवाब की तरह है कि अगर सरकार और शासन नहीं चाहे तो दंगे दो-तीन घंटे से ज्यादा नहीं चल सकते। इस मामले में उन्होंने सांप्रदायिकता की जमीन को खोखला करने के लिए जो सामाजिक मोर्चाबंदी की, उसने साबित किया कि सांप्रदायिक नफरत का इलाज इसी समाज के उपकरणों से किया जा सकता है। इच्छाशक्ति और काबिलियत रखने वाले और भी रास्ते खोज सकते हैं। खैर, सांप्रदायिक दंगों पर काबू पा लेने की काबिलियत को छोड़ दें तो पशुपालन घोटाला एक उदाहरण था, शायद शासन की बाकी प्रवृत्ति भी अपने "सामाजिक स्वभाव" में अपनी गति से चल ही रही थी। "अविकास" और उनके "विकास विरोधी" होने के तमाम आरोप इसके सबूत हैं। तो क्या लालू प्रसाद अपनी नाकामी पर परदा डालने के लिए सामाजिक स्तर पर "दखल" दे रहे थे? मुमकिन है कि ऐसा रहा हो। लेकिन जो समाज ऐतिहासिक रूप से एक ऐसे यथास्थितिवाद में जी रहा हो, जहां उसके अधिकार के कुछ टुकड़े उसे भीख या रहम की शक्ल में मिलते रहे, वहां चाहे अपनी नाकामी की भरपाई के लिए ही सही, लालू प्रसाद ने अगर चेतना के स्तर पर थोड़ा हिलाने-डुलाने की कवायद की, तो यह मेरी नजर में एक ज्यादा जरूरी पहल थी। नहीं तो यह वैसे लोगों का देश है ही, जहां कस्बे के किसी स्कूल-कॉलेज से लेकर दिल्ली विश्वविद्यालय ये जेएनयू में शिक्षित जनता जिस बर्बर सामंती जातीय-धार्मिक संस्कारों में जन्म लेती है, उसी में मर भी जाती है। अमेरिका और जापान बनती राजधानी दिल्ली में, आर्थिक राजधानी मायानगरी मुंबई में या सिलिकॉन वैली बंगलोर में भी। इससे कहीं किसी को शिकायत नहीं होती।

और इसीलिए बहुत अच्छी सड़कें, बहुत ऊंची इमारतें, बहुत सारे सेज (विशेष आर्थिक क्षेत्र), मॉलों और सोसाइटियों से चमकते शहरों की दुनिया तैयार करने वाले हरियाणा या गुजरात जैसे इलाके इस व्यवस्था को ज्यादा प्रिय हैं, भले ही वह दुनिया छीनी गई जमीन पर उगी हो और उसकी सिंचाई खून से की गई हो। दलितों या समाज के कमजोर तबकों पर जुल्म की व्यवस्था वाहक के बावजूद हरियाणा एक "विकसित' और "आदरणीय" राज्य है, हजारों मुसलमानों के कत्लेआम और एक बर्बर हिंदू व्यवस्था का सपना जमीन पर उतारने वाला नरेंद्र मोदी इस "देश" और दुनिया को सुहा रहा है। धर्म और समाज की व्यवस्था बनाए रखना किसी नेता को "प्रिय" और "प्यारा" बनाता है, इस व्यवस्था को नुकसान पहुंचाने की कोशिश उसे खलनायक बना देती है।

लेकिन इस व्यवस्था की बारीकियों को समझना इतना आसान नहीं है। लालू प्रसाद को जो "खलनायकी" का प्रमाण-पत्र मिला, उसमें उनकी "सामाजिक जुबानी बेलगामी" का कोई जिक्र नहीं है। वे "चारा घोटालेबाजों" के संरक्षक के तौर पर जेल गए। 2013 तक आते-आते इस जनतंत्र ने इतना मुमकिन कर ही दिया है कि कम से कम लालू प्रसाद की हैसियत वालों को कानूनी-प्रक्रिया के तहत जेल भेजा जाता है। वरना आज भी हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे कई इलाकों में जाति के बाहर शादी करने वालों को "सजा" के तौर पर सार्वजनिक रूप से मौत दी ही जाती है, या अंधे विश्वासों पर चोट करने वाले नरेंद्र दाभोलकर को मार ही डाला जाता है।

लालू प्रसाद के सत्ता के शुरुआती चार-पांच साल इसी 'सामाजिक उत्पात' के थे, जिसने चुपके-चुपके ही सही, चेतना के स्तर पर असर डाला था। और आज उसी को बहुत सारे लोग 'बेजुबानों' को जुबान मिलने के तौर पर दर्ज करते हैं। मगर उसके बाद के लालू वही नहीं थे। नब्बे के दशक से काफी पहले से चलता आ रहा पशुपालन घोटाले का 'पिशाच' 1993 में खड़ा हो चु्का था और उससे बचने की छटपटाहट ने लालू प्रसाद को वहां खड़ा कर दिया, जहां उन्हें अपने ही सामाजिक न्याय के नारे के साथ बेईमानी करने वाला कहा जा सकता है। 1995 से अगले दस साल और उनकी सत्ता रही, लेकिन हर रोज इस बात का इंतजाम करते हुए कि किसी तरह बच जाएं। मगर जिस व्यवस्था में धोखे से ही सही, उन्होंने अपने शुरुआती तीन-चार सालों में जो छेद कर डाला था, उसके लिए माफी नहीं होती। ऐसे उदाहरण खोजने पड़ेंगे जिसमें अनियमितता के आरोपी किसी मुख्यमंत्री को गिरफ्तार करने के लिए बाकायदा सेना भेजने की कोशिश की गई हो या फिर खुलेआम अखबारों में पहले पन्ने पर मोटे अक्षरों में लीड छपा हो कि 'लालू नेपाल भागेंगे!'

लालू कहीं नहीं भागे। लेकिन उन्होंने उस व्यवस्था के सामने समर्पण कर दिया, जिसके बरक्स कभी वे खड़े हुए थे। पिछले एक-डेढ़ दशक का उनका इतिहास यथास्थितिवादी सामंती व्यवस्था के सामने उनके गिड़गिड़ाने का ब्योरा भर है कि मुझे बख्श दो! और इसी दौर में उनसे "हरियाणवी" या "गुजराती" विकास की मांग को वाजिब कहा जा सकता है। बिहार की दुर्दशा के लिए लालू-राबड़ी के पंद्रह सालों को जिम्मेदार बताने वालों की समस्या और तकलीफ समझी जा सकती है। लेकिन उनकी पार्टी के दूसरे और तीसरे कार्यकाल का हिसाब मांगना उतना गलत भी नहीं है। इसके बावजूद कि इस दौरान भी वे कई तरह के अदृश्य जंजीरों में जकड़े हुए थे और उससे छूट पाने की छटपटाहट में थे। इस पूरे दौर में वे सामाजिक रूप से सत्ताधारी जातियों को यह भरोसा दिलाने में लगे रहे कि अब मैं आपका ही खयाल रखूंगा, मंदिर-मंदिर भटकते हुए पूजा-पाठ कराते, मंदिरों के लिए चंदा देते लालू अपनी सामाजिक न्याय की मांग के बरक्स सिर के बल खड़ा होकर यही गुहार लगा रहे थे कि अब मैं आपका हूं, मुझे बख्श दो। लेकिन इस व्यवस्था में उन प्रतीकों को माफ नहीं किया जाता, जो मौजूदा सामाजिक सत्ता के ढांचे को चुनौती दे या समांतर सत्ता का वाहक बने। वे कोई रेडिकल कम्युनिस्ट या नास्तिक नहीं थे कि हम उनसे मंदिर, पूजा-पाठ जैसी चीजों से पूरी तरह मुक्त हो जाने की उम्मीद कर लें। लेकिन लालू इतने खोखले कैसे हो गए थे? उनका खुद पर से भरोसा इतना कैसे डिग गया था कि अपनी उस राजनीति को ही उन्होंने धोखा दे दिया, जिसकी वे उपज थे और जो उनकी असली ताकत थी?

आज देश और दुनिया यही जानती है कि लालू प्रसाद को पशुपालन घोटाले में सजा हुई है। लेकिन खुद लालू भी शायद समझते होंगे कि आज वे जिस अंजाम तक पहुंचे हैं, उसका आगाज़ और उसके बाद का रास्ता कहां-कहां से गुजरा है!
(विस्तार बाकी.)

Saturday, 24 August 2013

सवालों से डरा हुआ धर्म-तंत्र...

कुछ साल पहले कुछ कट्टरपंथी हिंदू समूहों ने इस बात पर संतोष जताया था कि महाराष्ट्र सरकार द्वारा लाए गए अंधविश्वास विरोधी कानून का भारी विरोध हुआ। वे समूह शायद इस कानून को हिंदुत्व को खत्म करने की साजिश मानते हैं। ऐसा करते हुए हिंदुत्व के वे उन्नायक खुद ही बता रहे थे कि चूंकि हिंदुत्व की बुनियाद अंधविश्वासों पर ही टिकी है, इसलिए अंधविश्वासों का खत्म होना, हिंदुत्व के खत्म होने जैसा होगा। हालांकि यह केवल हिंदुओं के धर्म-ध्वजियों का खयाल नहीं है। सभी धर्म और मत के 'उन्नायक' यही कहते हैं कि सवाल नहीं उठाओ, जो धर्म कहता है, उसका आंख मूंद कर पालन करो। और धर्म की सांस से जिंदा तमाम लोगों के भीतर का भय बाहर आने के लिए छटपटाते सारे सवालों की हत्या कर देता है। हमारी विडंबना यह है कि अपने जिन "उद्धारकों" से हम सवाल उठाने की उम्मीद कर रहे होते हैं, वे खुद एक ऐसा मायावी लोक तैयार करने में लगे होते हैं, जहां कोई सवाल नहीं होता। दरअसल, वे हमारे स्वघोषित "उद्धारक" होते ही इसीलिए हैं कि न केवल उनकी "भूदेव" की पदवी कायम रहे, बल्कि एक ऐसी व्यवस्था भी अनंत काल तक बनी रहे, जिसमें अंधकार का साम्राज्य हो और समूचे समाज को अंधा बनाए रखा जा सके।

खासतौर पर जिस हिंदुत्व पर हम गर्व से अपनी छाती ठोंकते रहते हैं, उसमें यह साजिश ज्यादा विकृत इसलिए हो जाती है, क्योंकि यहां यह केवल आस्थाओं का कारोबार नहीं होता, बल्कि जन्म के आधार पर ऊंची और नीची कही जाने वाली जातियों की मानसिक और चेतनागत अवस्थिति बनाए रखने में भी अंधविश्वासों और आस्थाओं को हथियार के बतौर इस्तेमाल में लाया जाता है।




नरेंद्र दाभोलकर जैसे लोग इन्हीं "उद्धारकों" की राह में मुश्किल खड़ी करते हैं, क्योंकि वे इंसान को दिमागी तौर पर शून्य बनाने वाले उन आस्थाओं-विश्वासों को सवालों के कठघरे में खड़ा करते हैं। और जाहिर है, ये सवाल चूंकि आखिरकार सामाजिक सत्ताओं के ढांचे को तोड़ते-फोड़ते हैं, इसलिए इस तरह के सवाल उठाने वाले लोगों से "मुक्ति" के लिए सीधे उन्हें खत्म करने का ही रास्ता अख्तियार किया जाता है।

जाहिर है, बेमानी पारलौकिक विश्वासों को हथियार बना कर जड़ता की व्यवस्था को बनाए रखने में लगे लोगों-समूहों के पास अपने पक्ष में कोई तर्क नहीं होता, इसलिए वे सवालों से डरते हैं। अव्वल तो उनकी कोशिश यह होती है कि एक पाखंड और धोखे पर आधारित व्यवस्था को लेकर किसी तरह का सवाल नहीं उठे और इसके लिए वे सवालों और संदेहों को आस्था का दुश्मन घोषित करते हैं। वहीं एक भय की उपज पारलौकिकता की धारणाओं-कल्पनाओं में जीता व्यक्ति सवाल या संदेह करने को अपनी "आस्था" की पवित्रता भंग होना मानता है। अगर किन्हीं स्थितियों में किसी व्यक्ति के भीतर आस्था के तंत्र के प्रति शंका पैदा होती है और वह इसे जाहिर करता है तो धर्माधिकारियों से लेकर उनके अनुचरों तक की ओर से उसकी आस्था में खोट बताया जाता है या उसे अपवित्र घोषित कर दिया जाता है।

इसके अलावा, सवालों से निपटने के लिए एक और तरीका अपनाया जाता है। सवाल उठाने वाले को संदिग्ध बता कर उसके सवालों पर पूरी तरह चुप्पी साध ली जाती है। इससे भी हारने के बाद अक्सर धर्माधिकारी यह कहते पाए जाते हैं कि प्रश्न उठाने वाला व्यक्ति "ईश्वर का ही दूत है... और ऐसा करके वह वास्तविक भक्तों की परीक्षा ले रहा है।" कई बार उसे मनुष्य-मात्र की दया का पात्र भी घोषित कर दिया जा सकता है। इसके बावजूद जब "धर्म" की व्यवस्था पर खतरा बढ़ता जाता है, तब खतरे का जरिया बने व्यक्ति की आवाज को शांत करने के लिए उस रास्ते का सहारा लिया जाता है, जिसमें नरेंद्र दाभोलकर को अपनी जान गंवानी पड़ी।

सामाजिक विकास के एक ऐसे दौर में, जब प्रकृति का कोई भी उतार-चढ़ाव या रहस्य समझना संभव नहीं था, तो कल्पनाओं में अगर पारलौकिक धारणाओं का जन्म हुआ होगा, तो उसे एक हद तक मजबूरी मान कर टाल दिया जा सकता है। लेकिन आज न सिर्फ ज्यादातर प्राकृतिक रहस्यों को समझ लिया गया है, बल्कि किसी भी रहस्य या पारलौकिकता की खोज की जमीन भी बन चुकी है। यानी विज्ञान ने यह तय कर दिया है कि अगर कुछ रहस्य जैसा है, तो उसकी कोई वजह होगी, उस वजह की खोज संभव है। तो ऐसे दौर में किसी बीमारी के इलाज के लिए तंत्र-मंत्र, टोना-टोटका का सहारा लेना, बलि चढ़ाना, मनोकामना के पूरा होने के लिए किसी बाबा या धर्माधिकारी जैसे व्यक्ति की शरण में जाना एक अश्लील उपाय लगता है। बुखार चढ़ जाए और मरीज या उसके परिजनों के दिमाग में यह बैठ जाए कि यह किसी भूत या प्रेत का साया है, यह चेतना के स्तर पर बेहद पिछड़े होने का सबूत है, भक्ति या आस्था निबाहने में अव्वल होने का नहीं। इस तरह की धारणाओं के साथ जीता व्यक्ति अपनी इस मनःस्थिति के लिए जितना जिम्मेदार है, उससे ज्यादा समाज का वह ढांचा उसके भीतर यह मनोविज्ञान तैयार करता है। पैदा होने के बाद जन्म-पत्री बनवाने से लेकर किसी भी काम के लिए मुहूर्त निकलवाने के लिए धर्म के एजेंटों का मुंह ताकना किसी के भी भीतर पारलौकिकता के भय को मजबूत करता जाता है और उसके व्यक्तित्व को ज्यादा से ज्यादा खोखला करता है।

सवाल है कि समाज का यह मनोविज्ञान तैयार करना या इसका बने रहना किसके हित में है? किसी भी धर्म के सत्ताधारी तबकों की असली ताकत आम समाज का यही खोखलापन होता है। पारलौकिक भ्रम की गिरफ्त में ईश्वर और दूसरे अंधविश्वासों की दुनिया में भटकते हुए लोग आखिरकार बाबाओं-गुरुओं, तांत्रिकों, चमत्कारी फकीरों जैसे ठगों के फेर में पड़ते हैं और अपना बचा-खुचा विवेक गवां बैठते हैं। यह केवल समाज के आम और भोले-भाले लोगों की बंददिमागी नहीं है, बड़े-बड़े नेताओं, मुख्यमंत्रियों, प्रधानमंत्रियों और राष्ट्रपतियों तक को फर्जी और कथित चमत्कारी बाबाओं के चरणों में सिर नवाने में शर्म नहीं आती। यही नहीं, भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के वैज्ञानिक तक अंतरिक्ष यानों के सफल प्रक्षेपण की प्रार्थना करते हुए पहले मंदिरों में पूजा करते दिख जाते हैं। यह बेवजह नहीं हैं कि कला या वाणिज्य विषय तो दूर, स्कूल-कॉलेजों से लेकर उच्च स्तर पर इंजीनिरिंग या चिकित्सा जैसे विज्ञान विषयों में शिक्षा हासिल करने के बावजूद कोई व्यक्ति पूजा-पाठ या अंधविश्वासों में लिथड़ा होता है।

ऐसे में अगर कोई अंतिम रूप से यह कहता है कि मैं ईश्वर और धर्म का विरोध नहीं करता हूं, मैं सिर्फ अंधविश्वासों के खिलाफ हूं तो वह एक अधूरी लड़ाई की बात करता है। धर्म और ईश्वर को अंधविश्वासों से बिल्कुल अलग करके देखना या तो मासूमियत है या फिर एक शातिर चाल। हां, अंध-आस्थाओं में डूबे समाज में ये अंधविश्वासों की समूची बुनियाद के खिलाफ व्यापक लड़ाई के शुरुआती कदम हो सकते हैं। इसे पहले रास्ते पर अपने साथ लाने की प्रक्रिया कह सकते हैं। लेकिन बलि, झाड़-फूंक, तंत्र-मंत्र, गंडा-ताबीज, बाबा-गुरु, तांत्रिक अनुष्ठान आदि के खिलाफ एक जमीन तैयार करने के बाद अगर रास्ता समूचे धर्म और ईश्वर की अवधारणा से मुक्ति की ओर नहीं जाता है तो वह अधूरे नतीजे ही देगा।

वैज्ञानिक चेतना से लैस कोई भी व्यक्ति यह समझता है कि दुनिया में मौजूद तमाम अंधविश्वास का सिरा पारलौकिक आस्थाओं से अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है। यह तो नहीं हो सकता कि कोई व्यक्ति बलि देने या बीमारी का इलाज कराने के लिए चमत्कारी बाबाओं का सहारा तो न ले, लेकिन ईश्वर या धर्म को अपनी जीवनचर्या का अनिवार्य हिस्सा माने। अगर वह सगुण-निर्गुण, साकार-निराकार किसी भी तरह के मत-संप्रदाय का अनुगामी है तो उसका रास्ता आखिरकार एक पारलौकिक अमूर्त व्यवस्था की ओर जाता है, जहां वह खुद पर भरोसा करने के बजाय अपने अतीत, वर्तमान या भविष्य के लिए ईश्वर से की गई या की जाने वाली कामना को जिम्मेदार मानता है। इससे बड़ा प्रहसन क्या हो सकता है कि उत्तराखंड में बादल फटने या प्रलयंकारी बाढ़ के बावजूद अगर कुछ लोग बच गए तो उसके लिए ईश्वर को धन्यवाद दिया जाए और उसी वजह से कई-कई हजार लोग बेमौत मर गए, तो उसके लिए ईश्वर को जिम्मेदार नहीं माना जाए। बिहार के खगड़िया में कांवड़ लेकर भगवान को जल अर्पित करने जाते करीब चालीस लोग रेलगाड़ी से कट कर मर जाते हैं तो इसके लिए ईश्वर जिम्मेदार नहीं है और जो लोग बच गए, उन्हें ईश्वर से बचा लिया...!!!

यह ईश्वरवाद किस सामाजिक व्यवस्था के तहत चलता है। अपनी अज्ञानता की सीमा में छटपटाते लोगों ने पारलौकिकता की रचना की, कुछ लोगों ने उसकी व्याख्या का ठेका उठा लिया, उनकी महंथगीरी ने एक तंत्र बुन दिया, वह धर्म हो गया। यह केवल हिंदू या सनातन धर्म का नहीं, बल्कि सभी धर्मों का सच है। इसके बाद बाकी लोग सिर्फ पालक हैं, जिनके भोलेपन और प्रश्नविहीन होने के कारण ही यह धार्मिक-तंत्र चलता रहता है। ईश्वर-व्यवस्था के प्रति लोगों के भीतर कोई संदेह नहीं पैदा हो, इसके लिए तमाम इंतजाम किए जाते हैं। यह इंतजाम करने वाले वे लोग होते हैं, जो किसी भी धर्म-तंत्र के शीर्ष पर बैठे होते हैं। हालांकि यह "इंतजाम" का मनोविज्ञान अपने आप नीचे की ओर भी उतर जाता है और एक "ईश्वरीय" व्यवस्था या धर्म पर शक करने या उस पर सवाल उठाने वालों से निचले स्तर पर वे लोग भी "निपट" लेते हैं, जो खुद ही किसी धार्मिक-व्यवस्था के पीड़ित और भुक्तभोगी होते हैं।
 
 
ये "मैजोकिज्म" और "सैडिज्म" के मनोवैज्ञानिक चरणों के नतीजे हैं। "मैजोकिज्म" की अवस्था में कोई व्यक्ति अपने धर्मगुरु (इसे किसी धार्मिक व्यवस्था में जीवनचर्या को प्रभावित-संचालित करने वाले उपदेश भी कह सकते हैं) की किसी भी तरह की बात या व्यवहार पर कोई सवाल नहीं उठाता, भले कहीं कोई बात उसे गलत लगे। लेकिन वास्तव में यह गलत लगना उसके भीतर एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया को जन्म देता है, जिसे वह खुद भी नहीं समझ पाता, लेकिन अपने भीतर जज्ब कर लेता है। लेकिन यह प्रकृति का नियम है कि आप कुछ ग्रहण करेंगे तो उसका त्याग अनिवार्य है। इसलिए गुरु की किसी बात से मन में उपजी प्रतिक्रिया हर हाल में "रिलीज" होती है, यानी अपने निकलने का कोई न कोई रास्ता खोज लेती है। लेकिन तब इसका स्वरूप खाना सहज तरीके नहीं पचने के बाद उल्टियां होने की तरह बेहद विकृत हो सकता है। यानी यह "सैडिज्म" की अवस्था है। तो अपने धर्मगुरु की हर बात पचाने वाला व्यक्ति अपने घर में अपनी पत्नी या बच्चों के साथ बेहद बर्बर तरीके से पेश आ सकता है, किसी कमजोर व्यक्ति या कमजोर सामाजिक समूह के खिलाफ नफरत से भरा दिख सकता है, जोर-जोर की आवाज में बेहद वीभत्स गालियां बक सकता है या किसी वस्तु की बेमतलब तोड़फोड़ भी कर सकता है। इस तरह की कई मानसिक अवस्थाएं हो सकती हैं।

बहरहाल, नरेंद्र दाभोलकर आम जीवन में पसरे जिन अंधविश्वासों के खिलाफ मोर्चा ले रहे थे, उसका सिरा आखिरकार धर्म-तंत्र और फिर ईश्वर पर संदेहों की ओर जाता था। और जाहिर है, यह संदेह अंधविश्वासों और अंध-आस्थाओं पर टिके समूचे कारोबार और समाज के सत्ताधारी तबकों का साम्राज्य ध्वस्त कर सकता है। इसलिए इस तरह के संदेहों के भय से उपजी प्रतिक्रिया भी उतनी विकृत हो सकती है, जिसके शिकार नरेंद्र दाभोलकर हुए। यह हत्या दरअसल अंधविश्वासों की बुनियाद पर पलने वाले तमाम धर्मों और उनके धर्माधिकारियों के डर और कायरता का सबूत है। यह अंधे विश्वासों के सरमायेदारों के डर का प्रतीक है। अपनी दुकान के बंद हो जाने के डर से एक ऐसे शख्स की जान तक ले ली जा सकती है, जिसने अंधविश्वासों की बुनियाद पर पलने वाले धर्मों के खिलाफ इंसान की आंखें खोलने के आंदोलन में खुद को समर्पित कर दिया हो। यह केवल एक शख्स की हत्या नहीं है, यह तथाकथित धर्म के क्रूर मनोविज्ञान के खिलाफ एक विचार की हत्या की कोशिश है। इंसान के खुद पर भरोसे की और इंसानियत की एक नई और रौशन दुनिया के ख्वाब की हत्या की कोशिश है।

लेकिन क्या नरेंद्र दाभोलकर की हत्या से अंधविश्वासों के खिलाफ उनके विचारों को खत्म क्या जा सकेगा? जिन्हें भी लगता है कि अंधविश्वासों की बुनियाद पर पलने वाले धर्मों ने इस इंसानी समाज को बांटने, उसे कुंठित करने, नफरत फैलाने, सभ्यता को कुंद करने या एक तरह से मनुष्य विरोधी दुनिया बनाने में भूमिका निभाई है, उन सबको नरेंद्र दाभोलकर के नाम को अपनी ताकत बना कर आगे बढ़ना चाहिए। नरेंद्र दाभोलकर के हत्यारों और उसके अपराधी योजनाकारों को बताना चाहिए कि एक नरेंद्र दाभोलकर की हत्या के बाद हजारों और ऐसे लोग पैदा हो चुके हैं।

Tuesday, 20 August 2013

अंधे विश्वासों के सरमायेदारों का डर...


महाराष्ट्र के पुणे में  रहने वाले नरेंद्र दाभोलकर की हत्या अंधविश्वासों की बुनियाद पर पलने वाले तमाम धर्मों और उनके धर्माधिकारियों के डर और कायरता का सबूत है। यह अंधे विश्वासों के सरमायेदारों के डर का सबूत है। अपनी दुकान के बंद हो जाने के डर से एक ऐसे शख्स की जान तक ले ली जा सकती है जिसने अंधविश्वासों की बुनियाद पर पलने वाले धर्मों के खिलाफ इंसान की आंखें खोलने के आंदोलन में खुद को समर्पित कर दिया हो। यह केवल एक शख्स की हत्या नहीं है, यह तथाकथित धर्म के क्रूर मनोविज्ञान के खिलाफ एक विचार की हत्या की कोशिश है। इंसान के खुद पर भरोसे की और इंसानियत की एक नई और रौशन दुनिया के ख्वाब की हत्या की कोशिश है। लेकिन क्या नरेंद्र दाभोलकर की हत्या से अंधविश्वासों के खिलाफ उनके विचारों को खत्म क्या जा सकेगा? जिन्हें भी लगता है कि अंधविश्वासों की बुनियाद पर पलने वाले धर्मों ने इस इंसानी समाज को बांटने, उसे कुंठित करने, नफरत फैलाने, सभ्यता को कुंद करने या एक तरह से मनुष्य विरोधी दुनिया बनाने में भूमिका निभाई है, उन सबको नरेंद्र दाभोलकर के नाम को अपनी ताकत बना कर आगे बढ़ना चाहिए। नरेंद्र दाभोलकर के हत्यारों और उसके अपराधी योजनाकारों को बताना चाहिए कि एक नरेंद्र दाभोलकर की हत्या के बाद हजारों और ऐसे लोग पैदा हो चुके हैं। "अंधविश्वास के अंधकार में" लेख नवंबर 2008 में लिखा था। सत्य साईं बाबा की मौत के बाद एक बार इसे नया किया था। नरेंद्र दाभोलकर की हत्या के बाद इसे एक बार फिर सबके साथ साझा करना जरूरी लगा हैः

तो पनचानबे साल में मरने की घोषणा करने वाले भगवान सत्य साईं बाबा लगभग दस साल पहले मर गए। सत्य साईं बाबा को एक भगवान के रूप में पहचान दिलाने का श्रेय उनके उन "चमत्कारों" को जाता है जो अक्सर वे अपने भक्तों के सामने प्रदर्शित करते थे। हवा में हाथ हिला कर कभी सोने की अंगूठी तो कभी कोई मिठाई अपने भक्तों के हाथ में रख देने जैसे करतब ने लोगों को कहां-कहां से उनकी आंखें छीन लीं, यह साई बाबा बेहतर जानते हैं और इसके साथ हमारी यह सामाजिक-धार्मिक व्यवस्था भी जानती है जो खुद को सत्ता के बनाए रखने के लिए इस तरह के चमत्कारों और अंधविश्वासों को ही अपना हथियार बनाती है। एक ऐसा संजाल रचती है, उसमें लोगों को उलझाती है, ताकि लोग खुद पर से भरोसा खो दें और ऐसे चमत्कारों में अपना उद्धार देखने लगें।

"मैजोकिज्म" मनोविज्ञान का एक टर्म है, जिसमें कोई व्यक्ति अपने सामने किसी गुरु जैसी शख्सियत की हर बात के सामने सिर्फ सिर नवाता है, वह बात चाहे भली हो या कितनी भी वीभत्स हो। लेकिन इसका नतीजा यह होता है कि इस क्रम में स्वाभाविक प्रतिक्रिया की जो लहरें उसके भीतर ही उमड़ती-घुमड़ती जमा हुई रहती हैं, वे किसी कमजोर निशाने पर अपनी समूची विकृति के साथ फूटती है। इस नतीजे को "सैडिज्म" का नाम दिया गया है। यानी इस पूरी प्रक्रिया में हम अपने समाज और धर्म की पूरी व्यवस्था को देख सकते हैं, जिसमें इसकी बुनियाद में अंधविश्वास है। और इसी के शोषण की बुनियाद पर यह व्यवस्था हमारे सामने अट्टहास करती रहती है और हम उसके सामने सिर नवाए चुपचाप देखते और उसे सही मानते रहते हैं।





अंधविश्वास के अंधकार में...


"किसी को आत्मा के अमरत्व में विश्वास करने के लिए लगा दो और उसका सब कुछ लूट लो। वह हंसते हुए इस लूट में तुम्हारी मदद भी करेगा"- अप्टन सिनक्लेयर।


  • तंत्र-मंत्र और रूहानी इल्म के माहिर/ खुला चैलेंज/ लाभ 100 प्रतिशत/ 20 मिनट में गारंटी कार्ड के साथ/ जैसा चाहोगे, वैसा होगा/ माई प्रॉमिस/
     
  • नोट- अगर आपका विश्वास किसी ज्योतिष, पंडित-बाबा, मियां-मुल्ला, तांत्रिक से उठ गया हो तो एक बार अवश्य मिलें

    मनचाहा वशीकरण स्पेशलिस्ट
     
  • कारोबार में रुकावट, बंदिश, गृह-क्लेश, मियां-बीवी के झगड़े, तलाक, दुश्मन और सौतन से छुटकारा, कर्ज मुक्ति, संतानहीनता, कोख बंधन, मुठकरनी, विदेश यात्रा, लव-मैरिज, फिल्मी और मॉडलिंग कैरियर में रुकावट जैसी जीवन की जटिल समस्याओं का समाधान।
     
  • चेतावनीः मेरे किए को काटने वाले को 1,51,000 रुपए ईनाम।

    सभी इल्मों की काट हमारे पास है।
     
  • प्यार में चोट खाए स्त्री एवं पुरुष एक बार अवश्य मिलें।
  • एक अगरबत्ती का पैकेट दो नींबू साथ लाएं।
  • रुहानी और सातों इल्मों के बेताज बादशाह। वर्ल्ड फेमस
-सिद्ध गुरू अकबर भारती या समीरजी (बंगाली)

नगर सेवा की बसों, सड़क के किनारे या पेशाबखानों की दीवारों जैसी जगहों पर चिपकाए गए 'गुप्त रोगों का शर्तिया इलाज' की तरह के ऐसे विज्ञापनों पर एक 'पढ़े-लिखे' और 'सभ्य' व्यक्ति होने के नाते हमारी क्या प्रतिक्रिया होती है? हम मुंह बिचकाते हैं, ऐसा विज्ञापन करने वालों को ठग और मक्कार कहते हैं और उनके पास जाने वाले लोगों को मूर्ख मानते हैं। अगर हम ऐसा विज्ञापन करने वाले ठगों और मक्कारों को अपराधी की तरह देखते हैं या उनके खिलाफ हमारे भीतर नफरत के भाव पैदा होते हैं तो शायद यह गलत नहीं है।

ऐसी राय रखने वाले हम सब आमतौर पर बहुत अच्छी शिक्षा प्राप्त, बहुत अच्छी और साफ-सुथरी जीवनशैली वाले, सूटेड-बूटेड टाईयुक्त कपड़े पहनने वाले और अपनी पहुंच के लगभग सभी आधुनिक उपकरणों-संसाधनों का इस्तेमाल करने वाले होते हैं। वैसे विज्ञापनों पर ऐसे 'सभ्य, शिक्षित और विकसित' समाज का हिस्सा होने के नाते हमारी इस तरह की प्रतिक्रिया के बाद हम अपनी 'सभ्यता' और 'सामाजिक ऊंचाई' में थोड़ा और इजाफा होता हुआ महसूस करते हैं।

और जब समूचे समाज और उसकी सभ्यता को 'दिशा' देने वाले मीडिया को भी हम कुछ इसी तरह का या इससे भी ज्यादा असरदार तरीके से ऐसा ही काम करते हुए देखते हैं, तब हमारी क्या प्रतिक्रिया होती है? जब हम टीवी पर सूटेड-बूटेड टाईयुक्त और 'सभ्यता की पराकाष्ठा' पर पहुंचे हुए लोगों को लगभग चिल्ला कर यह कहते हुए देखते-सुनते हैं कि 'प्रलय... अब धरती बस खत्म होने वाली है' तो हमारे भीतर कौन-से भाव पैदा होते हैं? उस वक्त क्या हमें सड़क के किनारे या पेशाबखानों की दीवारों पर चिपकाए हुए वे विज्ञापन याद आते हैं? क्या ऐसे विज्ञापन करने वालों की मक्कारी और 'समस्याओं से मुक्ति' के लिए उन जगहों पर जाने वाले लोगों की मूर्खता याद आती है?

शायद नहीं। गहरे सम्मोहन के उस दौर की गुलामी की बात ही निराली है। उदयपुर के राकेश और राजग़ढ़ की छाया ने जो किया, उसी सम्मोहन के उन्माद का चरम है, जिसमें झूमते हुए तो बहुत सारे लोगों को देखा जा सकता है, लेकिन 'अंत' से पहले खुद को खत्म कर लेना सबके लिए मुमकिन नहीं होता। हां, 'जिंदा' रहते हुए मौत की चाहे जितनी पीड़ा वे झेल लें।

एक टीवी चैनल पर ज्योतिष संबंधी कार्यक्रम देखने के बाद राकेश ने एक कागज पर लिखा- 'कार्यक्रम को देख कर मुझे लगा कि मैं गलत ग्रह-नक्षत्र में पैदा हुआ हूं और इस वजह से मैं काफी परेशान हूं।' इसके बाद उदयपुर के बीएन कॉलेज में स्नातक प्रथम वर्ष के उस छात्र ने गले में फंदा लगा कर जान दे दी। इसी तरह एक ओर 'बिग बैंग' की सच्चाई की खोज में विज्ञान अब तक के सबसे बड़े प्रयोग की तैयार कर रहा था और टीवी चैनल इस प्रयोग के साथ ही 'धरती के अंत' की मुनादी कर रहे थे। पर्दे पर चीखते-चिल्लाते कुछ सूटे़ड-बूटेड टाईयुक्त पत्रकारनुमा लोग डरावने जंगल के वीराने या मौत के खौफ से आच्छादित श्मशान कब्रिस्तान के अघोड़ियों या तांत्रिकों से कम नहीं लग रहे थे। उससे पैदा होने वाली उत्तेजना में छाया ने तो कीटनाशक की दवा खाकर जान दे दी (मरने से पहले उसने पुलिस को बयान भी दिया), लेकिन हजारो-लाखों जानते हैं कि उस पूरे दौर में वे किस तरह तिल-तिल कर मरने के अहसास से गुजरते रहे।

कुछ समय पहले विज्ञान और वैज्ञानिक चेतना के प्रचार-प्रसार के लिए काम करने वाली संस्था 'स्पेस' ने इस बात पर गहरा क्षोभ जताया था कि विज्ञान के जिन आविष्कारों का इस्तेमाल अंधविश्वासों के जाले साफ करने में किया जाना चाहिए, उसी का सहारा लेकर आदमी को और अंधा बनाया जा रहा है। सवाल है कि विज्ञान के कंधों पर सवार ये आधुनिक और विकसित-से दिखने वाले 'प्राणी' ऐसा क्यों कर रहे हैं?


दरअसल, जब अक्ल को केवल तिजारत का हथियार बना लिया जाता है तो सारी नैतिकताएं पीछे छूट जाती हैं। अगर बात केवल टीवी चैनलों की करें तो जैसा कि कभी-कभी अंदाजा लगाया जाता है, खेल क्या केवल टीआरपी बढ़ाने का है? एक मकसद यह जरूर है। मगर यह सिर्फ दिखाई देने वाला व्यापार है। इसके पीछे जो महीन और शातिर मिजाज काम कर रहा होता है, एकबारगी उस पर यकीन होना मुश्किल है। लेकिन किसी भी गतिविधि को उसके असर की गहराई की बुनियाद पर आंका जाना चाहिए।

कई बार लगता है कि जादू-टोना और झाड़-फूंक के चमत्कार से मन की साध पूरी कराने का दावा करने वाले ओझाओं और टीवी चैनलों या अखबार में इस तरह की खुराक परोसने वाले संचालक एक ही पायदान पर खड़े हैं और उन्हें समाज के मनोविज्ञान की गहरी समझ होती है। यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि किसी भी व्यक्ति या समाज का मनोविज्ञान उसका सांस्कृतिक परिवेश तैयार करता है। अनंत ब्रह्मांड में सैर करती हमारी कल्पनाएं और जीवन की सीमाओं के बीच झूलती उम्मीदें और मायूसियां। जिन चीजों तक हमारी पहुंच होती हैं और जो किसी भी तरह से हमारे सामने मुहैया हो जाती हैं या जो कम-से-कम साक्षात हैं, उससे इतर कुछ भी पाने के लिए तो चमत्कार का ही आसरा है न! पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही चमत्कार या अदृश्य शक्तियों की धारणाएं हमारी चेतना में इस कदर गहरे पैठी होती हैं कि तुरत-फुरत कुछ हासिल कर लेने की हसरत या एक छोटी नाकामी भी हमें बेबस या लाचार बना देती है। फिर शुरू होता है दिमागी काहिली का दौर, जो जिंदगी को आखिरकार चमत्कार के रहमोकरम पर ले जाकर छोड़ देता है।

और चमत्कारों या अदृश्य दुनिया के खयाल का तिजारत करने वाले लोग हमारी उसी बेबसी का शोषण करते हैं। हम बिल्कुल भरे-पूरे, हर तरह से खुद को सेहतमंद महसूस करेंगे, लेकिन ज्यों ही हमें बताया जाएगा कि 'स्वर्ग जाने वाली सीढ़ियां खोज ली गई हैं', हम तुरंत ही अपनी उस ख्वाबों की दुनिया में पहुंच जाते हैं जो हमारे दिमाग में सोच का एक हिस्सा बना बैठा होता है। 'मर्दखोर परियां' एकबारगी हमें जन्नत की हूरों के साथ फूलों की सेज पर ला पटकती हैं। सीता से जुड़ी जगहों को श्रीलंका में खोज लेने की खबर आती है और तत्काल हम खुद को 'तथास्तु' कहते हुए 'श्रीराम' के सामने पाते हैं। भूतों की लड़ाई की 'लाइव कवरेज', रावण की वायुसेना और हवाईअड्डों पर 'ब्रेकिंग न्यूज' हमारी कल्पनाओं की पुष्टि करते लगते हैं। कुछ समय पहले एलियंस 'धरती पर हमला' करने आ रहे थे। ये सारी बातें 'शोधकर्ताओं' के हवाले से कही जाती हैं, ताकि इन्हें ज्यादा से ज्यादा विश्वसनीय बनाया जा सके। शकुन-अपशकुन पर आधारित कर्मफल का ब्योरा देता ज्योतिषि केवल कमाई नहीं कर रहा होता है। वह खूब जान रहा होता है कि इन सबसे कैसे उसका वर्गहित कायम रहता है और सामाजिक शासन और शोषण-परंपरा की बुनियाद और मजबूत होती है।

हमारी त्रासदी केवल पंडे-तांत्रिक या मीडिया तक ही सीमित नहीं है। तल्ख हकीकतों से लबरेज 'सत्या' जैसी फिल्म बनाने वाले रामगोपाल वर्मा 'फूंक' बना कर यह खुली चुनौती पेश करते हैं कि अगर कोई थियेटर में अकेले इस फिल्म को देख लेगा तो उसे पांच लाख रुपए ईनाम के तौर पर दिए जाएंगे। 'फूंक' में भूत-प्रेत या भगवान में यकीन नहीं रखने वाले नायक के साथ-साथ विज्ञान, चिकित्सा-विज्ञान और एक प्रगतिशील सोच को हारते और 'काला जादू' को जीतते दिखाया गया है। यह हजारों सालों से 'काला जादू' की गिरफ्त में जीते समाज के भावनात्मक शोषण के अलावा और क्या है?

लेकिन बात अगर यहीं खत्म हो जाती तो बात और थी। विज्ञान की बुनियाद पर अपनी पहचान कायम करने वाले एक पूर्व राष्ट्रपति से लेकर इस देश के कई शीर्ष नेताओं तक को 'चमत्कारी बाबाओं' के पांव पखारने में शर्म के बजाय गर्व ही महसूस होता रहा है। मानव संसाधन विभाग (यह मंत्रालय देश में वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देने के लिए जिम्मेदार है) के एक पूर्व राज्यमंत्री ने तो बाकायदा ओझाओं-तांत्रिकों का सम्मेलन ही करा डाला था। हाल ही में एक विधायक ने एक बड़े आयोजन में 265 भेड़ों की बलि दी, क्योंकि परमाणु करार के मुद्दे में खतरे में पड़ी यूपीए सरकार 'किसी तरह' विश्वासमत में जीत सकी। कुछ विधायकों की उनके कार्यकाल में अलग-अलग कारणों से हुई मौत के चलते विधानसभा भवन को भूत-प्रेत से ग्रस्त मान लिया जाता है। यह महज संयोग नहीं है कि ज्योतिष शास्त्र को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाए जाने की वकालत सिर्फ इसलिए की जाती है क्योंकि यह भारतीय संस्कृति का अभिन्न हिस्सा रहा है। देश को नेतृत्व देने का दावा करने वाले ऐसे राजनेताओं को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि इससे देश-समाज कितना पीछे जाता है या आधुनिक दुनिया में देश की कैसी छवि बनती है।

सवाल है कि अगर कोई तांत्रिक या व्यक्ति किसी बच्चे की बलि देता है तो उसके लिए कौन-सी स्थितियां जिम्मेदार हैं? सुना है कि कानून अपराध के लिए प्रेरित करने वाले को भी अपराधी ही मानता है। तांत्रिकों-ज्योतिषियों सहित ताजा फिल्में- 'फूंक' या '1920' जैसी फिल्में बनाने वाले ऐसे लोगों को क्या अंधविश्वासों और सामाजिक जड़ता को बनाए रखने का अपराधी नहीं माना जा सकता? इनके लिए कौन-सा कानून लागू होता है?

यह सब जवाहरलाल नेहरू के उस देश में हो रहा है, जो समाज को एक वैज्ञानिक सोच की जमीन पर खड़े होकर देखना चाहते थे।

हाल ही में एक अति पिछड़े माने जाने वाले समाज की एक सांस्कृतिक गतिविधि के साक्षात के दौरान इन पंक्तियों के लेखक ने देखा कि किस तरह करीब हजार लोगों की भीड़ के बीच भयानक उन्माद पैदा करते ओझाओं ने भेड़ों की बलि दी और उसके खून से खुद को नहाया। यह सुदूर देहात के एक पिछड़े इलाके की घटना है। लोग भूले नहीं होंगे कि सारी आधुनिकताओं से लैस देश की राजधानी के एक उपनगर गाजियाबाद में, जो संयोग से 'हाईटेक' भी घोषित हो चुका है, तीन बेटों ने अपनी मां की पीट-पीट कर इसलिए बलि दी क्योंकि एक तांत्रिक ने उन्हें ऐसा करने की सलाह दी थी। लेकिन विज्ञान की डिग्रियों की मार्फत इंजीनियर या डॉक्टर बने उन बेटों की मूढ़ता और त्रासदी पर हमक्या अफसोस जताएं। हमारे देश के अंतरिक्ष शोध संस्थान, यानी 'इसरो' का मुखिया जब पीएसएलवी जैसे अंतरिक्ष यानों के सफल प्रक्षेपण के लिए मंदिरों में पूजा आयोजित करता है और भगवान से खुद को कामयाब करने की याजना करता है तो एक पिछड़े समाज के सामने ओझाओं के उस उन्माद प्रदर्शन पर कौन-सा सवाल उठाया जाए?

दूरदराज के इलाकों में बहुत सारे मां-बाप अपने बच्चों की ओर आज भी यह जुमला उछालते हुए मिल जाएंगे कि 'देह बढ़ गया और दिमाग वहीं रह गया।' तो क्या हमारा समाज आधुनिकता की तमाम ऊंचाइयों को छूने की कोशिश के बावजूद अब भी किसी एक जगह पर ठहरा हुआ है? या उसे जड़ बनाए रखने की साजिश चल रही है? क्यों हम अब तक ऐसा कोई कारगर कानून बना सकने में नाकाम रहे हैं जो ओझाओं-तांत्रिकों, ग्रह-नक्षत्रों का पाठ पढ़ाने वाले ज्योतिषियों, चमत्कारों और अमूर्त दुनिया के किस्से परोसने वाले मीडिया आदि के ठगी के धंधे से समाज को बचा सकें?

इन सवालों के जवाब शायद विश्व हिंदू परिषद के 'अंतरराष्ट्रीय मुख्यमंत्री' रहे प्रवीण तोगड़िया के उस बयान में मिल जाते हैं, जो उन्होंने कुछ साल पहले गोलवलकर गुरु के सौंवे जन्म दिवस के मौके पर आयोजित 'विराट हिंदू सम्मेलन' में दिया था। महाराष्ट्र सरकार द्वारा लाए गए अंधविश्वास विरोधी कानून के मसले पर उनका कहना था कि हिंदुओं को इस कानून का विरोध करना चाहिए क्योंकि यह हिंदुत्व को खत्म करने की साजिश है। साफ है कि एक तरह से वे यह भी कर रहे थे कि हिंदुत्व की बुनियाद इन अंधविश्वासों पर ही टिकी है और अंधविश्वासों का खत्म होना, हिंदुत्व के खत्म होने जैसा ही होगा। और विहिप का 'हिंदुत्व' कया है, क्या यह किसी को बताना होगा?

यह केवल हिंदुओं के धर्म-ध्वजियों का खयाल नहीं है। सभी धर्म और मत के 'उन्नायक' यही कहते हैं कि सवाल नहीं उठाओ, जो धर्म कहता है, उसका अनुसरण करो। और हमारे भीतर का भय बाहर आने के लिए छटपटाते सारे सवालों की हत्या कर देता है। हमारी विडंबना यह है कि जिनसे हम सवाल उठाने की उम्मीद कर रहे होते हैं, वे खुद एक ऐसा मायावी लोक तैयार करने में लगे होते हैं, जहां कोई सवाल नहीं होता।


इसमें कोई शक नहीं कि देश-दुनिया से रूबरू कराने में टीवी चैनलों ने हर मुमकिन कोशिश की है। लेकिन असली मुश्किल यह है कि लगभग सारी प्रस्तुतियों में ऐसा कुछ भी नहीं होता जो हमें घटनाओं के विश्लेषण की ताकत देता हो। हम देश-दुनिया को देखें, मगर उसी निगाह से, जिससे हमें दिखाया जाता है। तो क्या यह मीडिया की सीमा है कि वह कुछ 'नया' देने के नाम पर हमें और 'पुराना' बना रहा है? क्या मीडिया इस बात से अनजान है कि भूत-प्रेत, जादू-टोना, ग्रह-नक्षत्र, ज्योतिष, प्रलय-चमत्कार से जुड़े किसी भी कार्यक्रम का एकमात्र असर सामाजिक यथास्थिति और जड़ता को कायम रखना है?

मकसद सिर्फ यह है कि समाज सोचने और सवाल उठाने के दौर में न पहुंचे। ऐसे कार्यक्रम परोसने वाले और ऐसी गतिविधियां चलाने वाले धर्मध्वजी यह खूब जानते हैं कि जिस समाज ने सवाल उठाना शुरू कर दिया, उनमें चमत्कारों और तकदीर बताने की दुकान बंद हो जाएगी। इसलिए दिमाग पर पड़े जाले बनाए रखने और नए-नए डिजाइन में नए जाले पेश करने का खेल जारी है। साधना या संस्कार जैसे चैनलों की तो बात छोड़ दें, प्रगतिशील कहे जाने वाले समाचार चैनलों के साथ-साथ इस खेल में हर वह तबका शामिल है, जो दुनिया को दिशा देने का दावा करता है।

कुछ ही समय पहले एक टीवी चैनल के मुखिया ने इस तरह के पाखंडों वाले कार्यक्रम दिखाने के मसले पर साफ जवाब दिया कि मुझे इस बात के लिए कतई शर्मिंदगी नहीं है। शायद वे सही कह रहे थे। इससे इतना तो जाहिर होता ही है कि जो कुछ हो रहा है, वह अनायास बिल्कुल नहीं है। एक सजग और सचेत समाज केवल यह नहीं देखेगा कि 'क्या' है, बल्कि वह उस 'क्या' के 'क्यों' की भी मांग या खोज करेगा। लेकिन सिर्फ 'क्या' परोस कर 'क्यों' का सवाल सिरे से गायब कर देने की कोशिश लगातार और सायास तरीके से चल रही है।