Saturday 24 April 2010

बदलते बिहार का वितंडा...

सत्ता सामाजिक बदलाव का एक औजार जरूर है, लेकिन क्या यह व्यक्तियों को सत्ता में बदल देने का भी औजार है? इसे हमारे देश के तमाम राजनेताओं ने साबित किया है कि सत्ता तंत्र की लगाम हाथ लगते ही उनकी दिशा अपने स्वार्थों और नफे-नुकसान के हिसाब से तय होने लगती है। सत्ता की लगाम हाथ में आने के बाद नीतीश सरकार के पिछले लगभग चार साल में सामाजिक विकास या शैक्षिक सुधार के सवाल पर बने तमाम आयोगों का जिस तरह इस्तेमाल हुआ या उनका जो हश्र हुआ, उसे देखते हुए भूमि सुधार आयोग की सिफारिशों के खारिज किए जाने पर किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। सत्ता में आते ही अमीरदास आयोग को भंग करने के बाद यह दूसरी बार है, जिसकी मार्फत नीतीश कुमार ने खुले तौर पर यह बताने की कोशिश की है कि उनकी सामाजिक-विकास दृष्टि और राजनीति असल में क्या है।

दरअसल, बिहार में मीडिया का जो सामाजिक और वर्गीय चरित्र रहा है, उसमें पिछले तीन-चार साल में सत्ता के मीडिया प्रबंधन का दौर उसके लिए शायद बिन मांगी मुराद जैसा रहा है। नीतीश कुमार ने ‘बदल गया बिहार’ के सुर वाले नारे को ‘सूचना’ के रूप में पेश किया और महज सूचक बन कर समूचे मीडिया जगत ने इसे देश-समाज के सामने परोस दिया। कुछ ही समय पहले राज्य में हुए विधानसभा के उपचुनाव भी इसी ‘बदल गया बिहार’ की शोर के बीच लड़े गए थे। लोकसभा चुनावों के नतीजों से अति उत्साह में आए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इन उपचुनावों को जिस तरह अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों का सेमीफाइनल घोषित कर दिया था, उसने स्वाभाविक रूप से इस बात के विश्लेषण का मौका दिया कि महज तीन महीने में मतदाता का मन-मिजाज क्यों बदला।


विकास वोट के लिए कोई मुद्दा नहीं है- यह वह शिगूफा है, जो शायद कभी लालू प्रसाद की जुबान से फिसला था। तो बिहार में मौजूदा विकास-राग के दौर में क्या लालू प्रसाद के उस जुमले को अपने असर से साथ लौटने में महज तीन महीने लगे? क्या कारण रहा कि ‘शाइनिंग इंडिया’ और ‘फील गुड’ की तर्ज पर ‘बदल गया बिहार’ का प्रचार विधानसभा के उपचुनावों में कारगर नहीं रहा? कुछ विश्लेषकों की निगाह में भूमि सुधार आयोग की रिपोर्ट और उसे लागू करने के अफवाह ने मतदाताओं को नीतीश सरकार से डरा दिया कि वह जमीन पर अब जोतदारों को हक देने जा रही है! इस निष्कर्ष को सामने रखने वाले लोग दरअसल भूमि सुधार पर बंदोपाध्याय समिति की रिपोर्ट पर अमल करने की सलाह देने के बजाय नीतीश सरकार को यह बताना चाहते थे कि अगर राज्य के भूपतियों यानी जमींदारों को छेड़ा गया तो उसके नतीजे ऐसे ही होंगे।

हालांकि भाजपा के सहारे सत्ता को ढोती नीतीश कुमार की सरकार से इससे इतर किसी सामाजिक विकास-नीति की उम्मीद भी बेमानी है। लेकिन जब प्रतीक-स्वरूप भी आपके सामने कुछ होता है तो उम्मीद पाल लेना मुगालता भले हो, स्वाभाविक है। संयोग से मिली सत्ता को कायम रखने के लिए लालू प्रसाद ने जिस सामाजिक फार्मूले का ईजाद किया था, नीतीश कुमार के सामने बिना भाजपा के सहारे के कोई नया फार्मूला तैयार करने का विकल्प नहीं था।

लेकिन सामाजिक समीकरणों से सत्ता को साधने की कोशिश न केवल कोई स्थायी नतीजे नहीं दे सकती, बल्कि एक ऐसी राजनीतिक दिशा का निर्माण करती है जिसमें राज ज्यादा होता है और नीति कम। आजादी के बावजूद एक ढांचे के तौर पर सामाजिक सामंतवाद ने हमारे देश में लगातार अपना दबाव बनाए रखा है। बिहार में लालू-युग को हम उस ढांचे को तोड़ने, या फिर कुछ सामाजिक वर्गों की उसमें घुसपैठ करने के रूप में देख सकते हैं। इसी दौर में देश में नवउदारवादी पूंजीवाद के उभार की पृष्ठभूमि में बिहार में पूंजीवादी सामंतवाद की भी स्थितियां पैदा हुईं। नीतीश कुमार के लिए यह एक मौका था। लेकिन उन्होंने सामाजिक सामंतवाद के घोड़े का सवार बनना ज्यादा पसंद किया।

अमीरदास आयोग या बदोपाध्याय समिति की सिफारिशों का हश्र तो महज कुछ नमूने हैं। भौतिक विकास के पर्याय के रूप में सड़क, अपराध-भ्रष्टाचार से मुक्ति, सामाजिक विकास के लिए अति पिछड़ों और महादलितों के लिए विशेष घोषणाएं और परिवारवाद से कथित ‘लड़ाई’- ये ऐसे मुद्दे रहे हैं, जो पिछले तीन-चार साल से कुछ लोगों को रिझाते रहे है। मगर थोड़ा करीब जाते ही यह साफ हो जाता है कि इन कुछ प्रचार-सूत्रों को किस तरह हकीकतों को ढांकने या उन्हें दफन कर देने का औजार बनाया गया है! इसी दौर में एक और महत्त्वपूर्ण ‘मिशन’ जारी है, जिसमें सामाजिक यथास्थितिवाद पर हमला करने वाले किसी भी सोच को बड़े करीने से किनारे लगाया जा रहा है।

करीब दो महीने पहले पटना में ‘बिहार की ब्रांडिंग में मीडिया की भूमिका’ विषय पर गोष्ठी हुई थी। यह प्रसंग दिलचस्प इसलिए है कि क्या मीडिया का काम किसी राज्य की ‘ब्रांडिंग’ करना है, या फिर उसकी प्राथमिकताओं में ‘जनता’ की जगह ‘राज्य’ ऊपर आ गया है। यों बिहार में नीतीश सरकार के सत्ता संभालने और ‘तीन महीने में सब कुछ ठीक कर देने’ की मुनादी के कुछ ही समय बाद से मीडिया को सब कुछ ‘गुडी-गुडी’ दिखाई देने लगा था। तो क्या यह सचमुच सब कुछ ठीक हो जाने का संकेत था, या खुली आंखों पर एक ऐसा चश्मा चढ़ जाना था जिसके पार वही दिखाई देता है जो हम देखना चाहते हैं?

‘अपराधियों के आतंक से मुक्त बिहार’ के प्रचार में मशगूल मीडिया के लिए खुद बिहार सरकार की ओर से विधानसभा में पेश आंकड़े अगर कोई मायने नहीं रखते तो इसके कारण समझना बहुत मुश्किल नहीं है। विपक्ष की ओर से घेरे जाने के बाद बाकायदा विधानसभा में अपराध के आंकड़े सामने रखते हुए सरकार ने कहा कि अकेले 2008 में केवल महिलाओं के खिलाफ होने वाले अत्याचार के 4,415 मामले दर्ज किए गए, जिनमें 1,028 मामले बलात्कार और दुष्कर्म के और 902 मामले महिलाओं और लड़कियों के अपहरण के थे। इसके अलावा पिछले छह महीने में 1,571 हत्याएं, 37 फिरौती वसूलने, 346 डकैती, राहजनी की 80, लूट की 395 और बैंक लूट की एक घटना थाने में दर्ज की गयी।

ये सरकारी आंकड़े हैं। सबको मालूम है कि अत्याचार के कौन-कौन से रूप हमारे बीच मौजूद हैं और जितने होते हैं, उनमें कितने मामले पुलिस थानों में दर्ज कराये जाते हैं। बहरहाल, एक विधायक का कहना था कि सरकार कहती है कि बैंक लूट की केवल एक घटना हुई, जबकि सच्चाई यह है कि इस दौरान बैंक लूट की चौरासी वारदातें हुई। इसके सबूत हैं। यों हाल में खगड़िया जनसंहार का उदाहरण इस तरह के प्रचार की सच्चाई का अंदाजा लगाने के लिए काफी है कि ‘बिहार में आज अपराधी घबराता है कोई हरकत करने से।’ जहां तक ‘बड़े अपराधियों’ को काबू में करने का सवाल है, मामला सिर्फ ‘अपने’ और ‘दूसरों’ के पक्ष का है।

इसके उलट यह जरूर हुआ है कि पिछले तीन-चार सालों में बिहार में अपनी मांगों को लेकर आंदोलन करने वाले किसी भी वर्ग या समूह की शामत आ गयी है। विरोध प्रदर्शनों को लाठियों, पानी के फव्वारों या गोली के सहारे कुचल देना नीतीश सरकार की खासियत बन चुकी है। उसकी पुलिस शिक्षकों से लेकर ‘आशा’ की महिला कार्यकर्ताओं तक पर पूरी क्षमता से लाठियां बरसाती है। लेकिन यह सुशासनी लाठी ‘विकास’ की नयी ऊंचाइयों की ओर अग्रसर भ्रष्टाचार के खिलाफ नहीं चलती। तमाम दावों के उलट व्यवहार में भ्रष्टाचार की कितनी नयी परतें तैयार हुई हैं, इस सच का अंदाजा पंचायत से लेकर प्रखंड और जिलास्तरीय सरकारी कार्यालयों और पुलिस थानों की गतिविधियों को देख कर ही लगाया जा सकता है। स्कूलों से लेकर आंगनवाड़ी केंद्रों तक का जिलाधिकारी या वरिष्ठ अधिकारियों के औचक निरीक्षण का मतलब कितना ड्यूटी सुनिश्चित करना है और कितना कमाई करना, इसे नजदीक से देखे बिना समझना मुश्किल है।

जब इस साल के सालाना बजट में राज्य में सड़क निर्माण के मद में तीस फीसद रकम निर्धारित की गयी, तो बहुतों के लिए यह विकास के प्रति नीतीश सरकार के समर्पण से कम नहीं था। विकास के लिए बुनियादी ढांचे के रूप में अच्छी सड़कों का होना अनिवार्य है। लेकिन ‘विकास दिखाई दे’- इसके लिए भी सड़कों का होना जरूरी होता है। और यह भी कोई छिपी बात नहीं है कि सड़क निर्माण उन कामों में शायद अव्वल है, जिसमें सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार होता है। तो कुल बजट का तीस फीसद सड़कों को समर्पित किए जाने का मतलब समझना कोई मुश्किल काम नहीं है।

यों भी, अगर सरकार सड़कें बनवाने पर खासा जोर दे रही है तो यह राज्य के नागरिकों पर मेहरबानी किस तरह है? दूसरे, राज्य उच्च पथों जैसे राज्य के अधीन कुछ को छोड़ कर बाकी सड़कों के मामले में राज्य सरकार की भूमिका महज कार्य कराने तक सीमित है। जबकि राष्ट्रीय उच्च पथों और ग्रामीण इलाकों की सड़कों के निर्माण और विकास के लिए केंद्र सरकार सीधे तौर पर वित्तीय सहायता देती है। इसके अलावा घोषित और प्रचारित दावों के विपरीत राज्य में काफी कम सड़कें बनी हैं, और जो बनी भी हैं उनके बारे में खुद सरकार को यह स्वीकार करना पड़ा कि राज्य में बनाई गयी सड़कों की गुणवत्ता काफी घटिया स्तर की है। ज्यादातर सड़कों पर कोलतार की पतली परत चढ़ा कर देखने में सुहाने लायक बना दिया गया, जिसकी उम्र दो से चार महीने से ज्यादा की नहीं होती। इसी बार की बरसात गुजरने के बाद बहुत सारी सड़कों की दशा देखी जा सकती है।

परिवारवाद के ‘सिंड्रोम’ से नीतीश के बचे होने के वितंडे के बीच इस प्रहसन की खबर पर गौर करना रोचक होगा कि केंद्र सरकार की राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के तहत बिहार में लोगों को जो जॉब कार्ड बांटे जा रहे हैं, उन पर नीतीश कुमार की फोटो छापी गयी है। यों जिस ‘मित्र’ भाजपा की लाठी के सहारे नीतीश सत्ता में हैं, उसी के उनके ‘मित्र’ नेता नरेंद्र मोदी भी परिवारवाद से बचे हुए हैं। भाजपा और आरएसएस भी परिवारवाद के विरोधी सिद्धांतों पर चलता है।

परिवारवाद का समर्थन करना एक लोकतंत्र के रास्ते में बाधा खड़ी करना है। लेकिन यहीं यह देखना भी जरूरी है कि किसी व्यक्ति की राजनीति देश और समाज को किस दिशा में ले जा रही है। लोहिया और जेपी के सपनों की जमीन पर खड़े होकर भाजपा के सहारे गद्दी पर बैठे ये वही नीतीश कुमार हैं जिन्हें दिल्ली में मंत्री या बिहार में मुख्यमंत्री बनने के लिए बाबरी मस्जिद ढहाने का ‘शौर्य’ ढोती भाजपा का हाथ थामने में कोई दिक्कत नहीं महसूस हुई। तब भी, जब ‘गुजरात-2002’ के दंगों का अध्याय उसके साथ जुड़ गया। यह अनायास नहीं है कि परिवारवाद से बचे हुए एक और ‘विकास पुरुष’ नरेंद्र मोदी इस देश के ‘दूसरे विकास पुरुष’ नीतीश कुमार की पीठ थपथपाते हैं।

इतिहास के कुछ पन्नों को शायद इसलिए नहीं भूला जा सकता क्योंकि न्याय सुनिश्चित होने तक उसे भूलना भी नहीं चाहिए। राजनीति की अपनी मजबूरियां हो सकती हैं। लेकिन सवाल है कि इसकी कीमत क्या हो। प्रचार की सड़क पर सरपट दौड़ते नीतीश कुमार ने सुशासन बाबू का तमगा तो लटका लिया है, लेकिन आरएसएस और भाजपा के सहारे राजनीति की जमीन तलाशती उनकी सरकार ने समाज को बदल सकने वाले सोच को हर स्तर पर कुंठित किया है। यह ध्यान रखना चाहिए कि समाज को बदलने के लिए सड़कों के मुकाबले सोच की जरूरत ज्यादा होती है।
(जनसत्ता, 29 अक्‍टूबर 2009 से साभार)

2 comments:

मुसाफिर बैठा said...

जनसत्ता में छ्पा यह आलेख नहीं पढ़ पाया था, कुछ नई बातें भी ध्यान में आयीं. बिहार में केन्द्र पोषित योजना 'मनरेगा'के कार्ड पर नीतीश की फोटो चढ़ा होने की बात मानीखेज है कि माल किसका और कमाल को अपने नाम करना!

मुसाफिर बैठा said...

जनसत्ता में छ्पा यह आलेख नहीं पढ़ पाया था, कुछ नई बातें भी ध्यान में आयीं. बिहार में केन्द्र पोषित योजना 'मनरेगा'के कार्ड पर नीतीश की फोटो चढ़ा होने की बात मानीखेज है कि माल किसका और कमाल को अपने नाम करना!