Wednesday, 13 May, 2009

नफरत की बुनियाद पर उन्माद की राजनीति...


वरुण गांधी के बयानों ने जो तूफान पैदा किया है, वह भारतीय राजनीति के लिए क्या सचमुच इतना विस्मयकारी है? क्या ऐसा पहली बार हुआ है, जब भाजपाई हिंदुत्व की रगों में दौड़ती नफरत की बुनियाद पर हिंदू राष्ट्र का हवामहल खड़ा करने का ख्वाब परोसा गया है? और शायद इसे भी एक शुद्ध भाजपाई अभ्यास के तौर पर मान लिया जाना चाहिए कि तीर जब अपना काम कर जाए, तो दिखावे का अफसोस जाहिर कर देने, उससे खुद के अलग रहने या फिर बिना किसी शर्म के पलटी मार देने में कोई हर्ज नहीं है। तो मीडिया में हूबहू बयान आने के बाद वरुण गांधी ने भी कह दिया कि उनके भाषणों के टेप के साथ छेड़छाड़ की गई है; वे राजनीतिक साजिश के शिकार हुए हैं; और कि उन्होंंने वैसा कुछ भी नहीं कहा है जिसके लिए उनकी गर्दन पकड़ने की कोशिश हो रही है।


भाजपा में, लेकिन लोकतंत्र में यकीन रखने वाले वैसे बहुत सारे लोगों को थोड़ी देर के लिए इस बात से राहत मिली होगी कि पार्टी ने वरुण गांधी के बयानों की जिम्मेदारी नहीं ली और कहा कि उनके बयानों से भाजपा का कोई लेना-देना नहीं है। लेकिन भोलेपन और मासूमियत की चाशनी में लिपटा भाजपा का यह ‘सच’ सिर्फ दो दिनों के भीतर सामने आ गया। चुनाव आयोग की नजर में दोषी होने और उसकी एक मरियल-सी फरियाद के बावजूद भाजपा ने ज्यादा हमलावर तरीके से वरुण गांधी का पक्ष लिया। दरअसल, न तो वरुण गांधी इतने मासूम हैं और न भाजपा इतनी भोली कि इस तरह की ‘बाजियों’ के नफा-नुकसान का अंदाजा इन्हें न हो। इसलिए बयानों के असर को और ज्यादा तीखा बनाने के लिए ‘शहीदाना’ अंदाज में वरुण गांधी के आत्मसमर्पण और गिरफ्तारी के नाटक का एक और दृश्य भी पूरा कर लिया गया।

नब्बे के दशक की शुरुआत में ही मंडल आयोग की सिफारिशों पर अमल के साथ पैदा हुए सामाजिक न्याय के नारे की भ्रूण हत्या के इरादे से निकली ‘रथयात्रा’ आखिरकार बाबरी मस्जिद विध्वंस की मंजिल तक पहुंची। और इस मंजिल तक पहुंचने के लिए लालकृष्ण आडवाणी ने जो राह तैयार की, वरुण गांधी जैसे लोग तो उस पर अपने तरीके से चलने वाले महज कुछ मुसाफिर हैं। दरअसल, तब से लेकर भाजपा ने लगातार भारतीय राजनीति में एक ऐसी जमीन तैयार की है, जिसमें ‘हीरो’ बनने के लिए सिर्फ एक तयशुदा फार्मूले पर अमल की जरूरत होती है। और नरेंद्र मोदी हों या प्रवीण तोगड़िया, या फिर योगी आदित्यनाथ, प्रमोद मुतालिक या वरुण गांधी, इन सबके लिए यह ज्यादा आसान रास्ता है कि संघर्ष का लंबा रास्ता अख्तियार करने के बजाय यही फार्मूला अपनाया जाए। आग लगाने वाले दो-चार बयान, उत्पात और मीडिया में कवरेज का इंतजाम- जिसके लिए किसी खास तैयारी की जरूरत नहीं पड़ती। हाल में उगे प्रमोद मुतालिक को मंगलोर में पब पर हुए हमले से पहले कितने लोग जानते थे? या फिर कितने लोगों को यह पता था कि वरुण गांधी मेनका गांधी का बेटा होने के अलावा भाजपा की सक्रिय राजनीति भी कर रहे हैं? लेकिन पीलीभीत के अपने चंद बयानों से उन्होंने अपनी ही पार्टी में जगह बनाने के लिए दशकों से संघर्ष कर रहे तमाम नेताओं को पीछे छोड़ दिया।

मगर भाजपा का दुख यह है कि भारतीय भूभाग के पिछले पांच-सात सौ सालों के इतिहास ने यहां ऐसा सामाजिक-राजनीतिक ढांचा खड़ा कर दिया है, जिसका बहुमत इस तरह के उन्माद को ‘इलाज’ के लायक ही मानता है। यह अकारण नहीं है कि पिछले लगभग दो दशक में हिंदुत्व में उफान पैदा करने वाली तमाम कोशिशों के बावजूद आज भी वह केवल अपने बूते देश की सत्ता पर काबिज होने में नाकाम है। अगर ‘गुजरात प्रयोग’ जैसे छिटपुट उदाहरण दिए जाते हैं तो यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि इसे आजादी के बाद देश के सत्ता संचालकों की नाकामी कहें या यथास्थितिवाद को बनाए रखने की महीन राजनीति कि सत्ता के ‘लोकतांत्रिक’ ढांचे के बावजूद हर मोर्चे पर लोकतंत्र को कुंठित करने की कोशिश हो रही है। यही वजह है कि न तो सत्ता अपने मूल स्वरूप में व्यवहार के स्तर पर लोकतांत्रिक हो सकी और न इसके सामाजिक नतीजे हासिल किए जा सके।

सवाल है कि इन स्थितियों का ज्यों का त्यों बने रहना आखिरकार किसके हित में था या है। समाज को जड़ताओं और विद्रूपों से मुक्त करने के लिए जमीनी स्तर पर कुछ करने की बात तो दूर, क्या कारण है कि पिछले साठ साल की ‘अपनी सत्ता’ के बावजूद हम यह संदेश तक प्रेषित करने में विफल रहे हैं कि हमारा मकसद एक प्रगतिशील मूल्यों के साथ जीने वाले समाज की रचना है? यह कैसे संभव हो सका कि भारत में विकास के पर्याय के रूप में स्थापित होने के बाद कर्नाटक आज कुछ गिरोहों का अभयारण्य बनता जा रहा है? वहां से वे सारे उदाहरण सामने आ रहे हैं जो अफगानिस्तान या पाकिस्तान में तालिबान के प्रभाव वाले इलाकों का चेहरा बन चुके हैं।


मंगलोर के एक पब में घुस कर युवतियों को मारना-पीटना इस दक्षिणी राज्य की अकेली घटना नहीं थी। इससे पहले गिरजाघरों पर लगातार हमले हो रहे थे, मगर किसी को उसका नोटिस लेना जरूरी नहीं लगा। जबकि याद किया जा सकता है कि 1998 में गुजरात के डांग जिले में कैसे सुनियोजित तरीके से लगातार गिरजाघरों पर हमले किए गए थे। उसके बाद चार साल में जो जमीन तैयार हुई, उस पर गुजरात जनसंहार एक इतिहास बन कर खड़ा है। तो कर्नाटक के दक्षिण कन्नड़ और उडुपी में जो कुछ चल रहा है, क्या वह गुजरात-2002 जैसे प्रयोग की पूर्वपीठिका है? गुजरात में बाबू बजरंगी जैसे लोगों ने जो किया, बजरंग दल और प्रमोद मुतालिक की श्रीराम सेना कर्नाटक में वही कर रही है। उनके लोग कॉलेजों में जाते हैं, दूसरे धर्म के छात्रों से जान-पहचान रखने वालों को मारते-पीटते हैं, अपहरण करते हैं और मुसलिम छात्राओं को बुर्का पहनने के कारण जलील करते हैं। उनका ‘हिंदू समाजोत्सव’ दूसरे धर्म वालों में आतंक पैदा करने का जरिया हो चुका है और इसे कर्नाटक सरकार का घोषित संरक्षण मिला हुआ है। यह ‘लोकतांत्रिक सिद्धांतों’ के तहत चुनी गई सरकार का संरक्षण है। यह ‘बहुमत’ के शासन के सिद्धांत का ‘व्यवहार’ है।

सिर्फ कुछ महीनों के भीतर यह आश्चर्य अब अभ्यास में तब्दील हो चुका है कि दक्षिण कन्नड़ या उडुपी में अगर आपका कोई दोस्त मुसलमान या ईसाई है तो आपको डरना चाहिए या फिर उसे त्याग देना चाहिए। लेकिन क्या-क्या त्यागेंगे आप? पहले मुसलमान या ईसाई, फिर दलित, उसके बाद पिछड़े वर्ग का कोई दोस्त! धार्मिक और सामाजिक वर्णक्रम के विभाजन पर आधारित हिंदुत्व के रास्ते की मंजिल क्या कोई और है? और आखिरी तौर पर इसी क पैरोकार होने का बार-बार सबूत देने वाला आरएसएस और उससे गर्भनाल से जुड़ी भाजपा को रास्ता भी वही चाहिए जो उसे इस मंजिल तक पहंचाए। उसे बहुत अच्छे से मालूम है कि ब्राह्मणवादी हिंदुत्व ने इस समाज के असंख्य, लेकिन हर खंड को उसकी जड़ताओं से इस कदर बांध रखा है, जहां यह सोचने की गुंजाइश नहीं है कि वरुण गांधी या प्रमोद मुतालिक ने क्या और क्यों कहा? जहां यह गुंजाइश बची होती है, वहां से यह सवाल उठता है कि चुनावों के ठीक पहले इस तरह की घिनौनी भाषा का इस्तेमाल करने वाला व्यक्ति या तो जाहिल है या शातिर। मगर जाहिल की जिद और शातिराना जिद में बड़ा फर्क होता है। और इस नाते वरुण गांधी जाहिल नहीं हैं।
दरअसल, इस्लामी चेहरा लिए तालिबान से ऊपरी तौर पर नफरत करने वाली भाजपा, विहिप, बजरंग दल या श्रीराम सेना जैसी संघी जमातें उसी आबोहवा के निर्माण में लगी हैं, जो तालिबान का मकसद है। फर्क सिर्फ काले और भगवे चोले का है। शरीअत पर अमल से लेकर महिलाओं के पर्दे के भीतर रहने, लड़कियों के स्कूल जाने पर पाबंदी, आॅनर किलिंग यानी ‘सम्मान’ बचाने के लिए हत्या या मजहबी पोंगापंथ जैसी तमाम बातों में से एक भी बात ऐसी नहीं है, जो हिंदुत्व के ठेकेदारों को तालिबान से अलग करती हो।

यह दुनिया के लिए एक बेहतरीन लतीफा हो सकता है कि जिस तरह टीवी, मोबाइल, मोटरगाड़ियों, एके-47 या टैंकों-मोर्टारों या दूसरे अत्याधुनिक हथियारों जैसे विज्ञान के रहम की बदौलत तालिबान सभ्यता की इच्छा रखने वाले एक समाज को जंगली कबीले में तब्दील करने की कोशिश में है, ठीक उसी तरह ‘वाइब्रेंट गुजरात’ दरअसल हिंदुत्व के खौफ से थर्रा रहा है और हमारे ‘सिलिकॉन वैली’ वाले राज्य में अब भगवा का भय पसरता जा रहा है। तो क्या हमारा आगे बढ़ना अब पूरा हो चुका है और क्या हम लौट रहे हैं?

भारतीय राजनीति की शतरंजी बिसात पर संघ के मुकाबले का माहिर खिलाड़ी-समूह कोई नहीं है। वह अपनी हर चाल के बरक्स सामने वाले को भी वही चाल चलने को मजबूर करता है जिसकी बाजी संघी झोले में जाए। यह महज संयोग नहीं है कि धर्मनिरपेक्ष और तमाम वैज्ञानिक प्रगतिशील मूल्यों के प्रवक्ता जवाहरलाल नेहरू के ही परिवार का एक सदस्य आज अचानक प्रतिगामी धारा का प्रतीक बन गया और हर बार की तरह उनकी कांग्रेस पार्टी लाचार मुंह बाए खड़ी है। क्या यह सचमुच की लाचारी है? क्या वास्तव में हमारे देश का कानून और संविधान इस हद तक मजबूर है कि प्रमोद मुतालिक या वरुण गांधी जैसे लोग वह करने का हक पा चुके हैं जो वे कर रहे हैं? फिर अकेले सिमी जैसे संगठनों को ही हम क्यों खत्म होते देखना चाहते हैं?

यह अनायास नहीं है कि मुंबई में देश पर अब तक के सबसे बड़े आतंकवादी हमले के बावजूद ‘इस्लामी आतंकवाद’ का सुर कुछ शांत-सा लगा। दरअसल, ईसाइयों और उनके गिरजाघरों पर हिंदुत्व के झंडाबरदारों के हमले से लेकर राज ठाकरे के आतंक तक पर जो बहस जोर पकड़ती जा रही थी, उसमें इस्लामी आतंकवाद के अमेरिकी राग पर टिके रहना संभव नहीं रह गया था। रही-सही कसर महाराष्ट्र एटीएस ने आतंकवाद के हिंदुत्ववादी चेहरे का पर्दाफाश करके पूरी कर दी। अब चूंकि असुरक्षा और भय के ध्रुवीकरण की गुंजाइश कम हुई, तो इसके बरक्स गुजरात में आजमाया हुआ नफरत का नुस्खा एक आसान औजार के रूप में सामने है। यह कौन जानता है कि वरुण गांधी ने मुसलमानों और सिखों के खिलाफ जवानी के जोश में आकर जहर उगला या फिर यह सब कुछ ठंडे दिमाग से सोच-समझ कर सामूहिक रूप से लिया गया फैसला था।

सत्ता पर कब्जा करने से पहले उसके तंत्र पर कब्जा करना जरूरी होता है। हिंदुत्व की सामाजिक सत्ता पर तो पहले ही संघी व्यवस्था काबिज है। तंत्र में भी इसका चेहरा बार-बार दिखता है। लेकिन राजनीतिक सत्ता पूरी तरह संघ के कब्जे में आना थोड़ा मुश्किल है क्योंकि उसके सूत्रों को कांग्रेस भी अच्छी तरह समझती है और कई-कई ‘उदार’ चेहरों के साथ अक्सर उस पर अमल भी करती दिखती है। और दूसरे, कि उन सूत्रों की बारीकियों की परतें उघाड़ने वाले लोग भी रह-रह कर उठ खड़े होते हैं। कन्नड़ के विख्यात लेखक यूआर अनंतमूर्ति ‘मोदी-सावरकर-गोड्से’ की त्रिमूर्ति को संघ परिवार का मॉडल मानते हैं। यानी मोदी जैसा प्रशासक, सावरकर का दर्शन और गोड्से को पीड़ित मानने का फार्मूला, यानी एक आम हिंदू मानस की ‘आकांक्षाओं’ का मॉडल। नरेंद्र मोदी के बाद पहली बार भाजपा या संघ परिवार को अपने मॉडल के लायक कोई ‘हीरो’ मिला है। यह अलग बात है कि नरेंद्र मोदी, प्रमोद मुतालिक, योगी आदित्यनाथ या वरुण गांधी जैसों के उगले जहर की जमीन पर जो देश या समाज खड़ा होगा, उसका बोझ संभाल पाना शायद खुद भाजपा के लिए भी मुश्किल होगा।

(जनसत्ता में प्रकाशित)

Monday, 26 January, 2009

स्री विमर्श बरास्ते सविता भाभी डॉट कॉम...!

बात कहां तक पहुंचेगी, मुझे नहीं मालूम। लेकिन फिलहाल निवेदन है कि मोहल्ले पर शुरू हुआ "सविता भाभी डॉट कॉम" मार्का स्त्री विमर्श देखिए-सुनिए, गुनिए और अपना ही सिर धुनिए...।

दिन में घुसते ही बड़े संघर्ष के बाद इस कथित विमर्श के पार उतरा और रात में दूरदर्शन (शनिवार को) पर एक देखी हुई फिल्म "अस्तित्व" देखा। उसी समय दिन का विमर्श याद आया और वासुदेव भट्टाचार्य की फिल्म "आस्था" में एक प्रोफेसर दंपति की कहानी भी याद आई। अफसोस कि दोनों फिल्मों की नायिकाओं को किसी "सीन" में सविता भाभी टाईप का कोई डॉट कॉम देखते हुए नहीं दिखाया गया। अव्वल तो शायद उस वक्त "सविता भाभी..." पैदा नहीं हुआ था (पता नहीं, तब इस तरह के दूसरे डॉट कॉम थे या नहीं) और दूसरे कि अगर कोई और "एक्साइटिंग साइट" का सहारा ले लिया जाता तो इन दोनों फिल्मों की नायिकाओं को अपने "अस्तित्व" के लिए उतना जद्दोजहद करने की जरूरत ही कहां पड़ती। फिर कहानी भी नहीं बढ़ती। सॉरी, फिर कहानी तो अइसा बढ़ती कि "सविता भाभी..." की तरह फिल्मों की धारावाहिक ही चलाना पड़ता।

अब आगे बढ़ते हैं। (बहुत ज्यादा बढ़ने की न तो इश्कोप है और न इर्रादा- इसलिए धीरज को पकड़े रहिएगा। नही त बरॉड माइंडेड लोगों में आपका गिनती नहीं होगा। (भाषा में लिंग की भयानक गड़बड़ियां है न!) कोई बात नहीं। बात कहने का कोशिश करता हूं)

"सविता भाभी..." पर एक "लड़की" के कमेंट के बहाने स्त्री विमर्श के व्याख्याकार फरमा रहे हैं कि "तमाम की तरह की मुक्ति और बदलावों की बात कर लेने के बाद कोई स्त्री सेक्स पर बात करती है।" लेखाक (गलती से ले के बाद एक ठो (बिहारियों को किसी संख्या के बाद "ठो" कहने की आदत होती है) आ का डंडा लग गया है। माफ किजिएगा, अब कोन पीछे जेके डी-लिट करे। (लगता है डिलीट में भी मात्रा गड़बड़ा गया। कोई बात नहीं। बात है तो आगे बढ़ेगी।) महोदय "स्त्री विमर्श" की बात को "तमाम तरह की मुक्ति" में शामिल नहीं करते। खैर! करते हैं बदलाव की बात।

बदलाव के किन-किन चरणों को पार कर एक स्त्री "सविता भाभी..." पर पहुंचती है? बदलाव और मुक्ति की आपकी अवधारणा क्या है? एक स्त्री और पुरुष के दिमागी ढांचे का हमारे इस सामाजिक ढांचे से क्या कोई ताल्लुक है? इस सामाजिक ढांचे का सत्ता-सूत्र किनकी उंगलियों से जुड़ा और संचालित होता है? और दूसरे बहुत सारे सवालों को छोड़ कर एक आखिरी सवाल कि इस पूरे ढांचे में वे कौन-कौन से बदलाव हैं, जिन्हें पार कर एक स्त्री खुल कर सेक्स के स्तर पर बात करना चाहती है?

माफ करिएगा दोस्तों! इस आखिरी सवाल के बाद मैं कई और सवालों से जूझने लगता हूं। मसलन, सबसे आधुनिक दिखते हुए (और जाहिर है, यह आधुनिकता कपड़ों और फैशन के स्तर पर ही होगी) जब हम सड़क पर अपना गुरूर बिखेर रहे होते हैं, क्या हम उस वक्त अपने भीतर की हिंदू-मुस्लिम या किसी और मजहब या फिर ब्राह्मण या चमार की चेतना से मुक्त हो चुके होते हैं? लो-वेस्ट जींस या फंकी टाईप आधुनिकता ओढ़े हम अपने अस्तित्व को बाजार के गटर में गिरवी रख चुके होते हैं और गुमान में फूले नहीं समाते कि हम आधुनिक हो गए! डॉक्टरी, इंजीनियरी, पीएचडी, कलक्टरी या ऐसी तमाम पढ़ाइयों के बाद बाप के बहाने ब्याह के रास्ते दहेज के रूप में कीमत तय करते वक्त अपनी ही दलाली कर रहे होते हैं और आधुनिकता का ठेका भी उठाते हैं! मॉडर्न आउटलुक का इनरलुक कितना जातिवादी होता है और जातिवाद के किन महीन औजारों के साथ हैसियत का खेल खेलता है, क्या उसी "सॉफिस्टिकेटेड" ऐयारी को आधुनिकता कहना चाहते हैं हम?

देह के दम पर सबकी नजर अपनी ओर खींचने की कोशिश को मुक्ति का मार्ग समझने वाली या "सविता भाभी..." में अपनी पसंद जाहिर करने वाली लड़की का यह हक है कि अपने वजूद के एक सबसे जरूरी हिस्से के तौर पर यौन आकांक्षाओं को अपनी कसौटी पर कसे। लेकिन जब हम इन्हीं में कइयों को सोलह-श्रृंगार कर सफेद घोड़े पर सवार राजकुमार पति का ख्वाब देखते या चांद को देख कर पति के इंतजार में भूख से ऐंठती अंतड़ियों के तनाव के साथ करवा चौथ निबाहते दिखते हैं, तब भी ये क्या उतनी ही आधुनिक होती हैं? ऐसी बहुत-सी आधुनिक लड़कियां तब पति-परमेश्वर की सारी मर्दानगी को अपने भीतर जज्ब करना अपनी खुशनसीबी समझने लगती हैं। फिर "सविता भाभी..." के जरिए पैदा हुई देह की उत्तेजनाओं की सारी ऊर्जा एक अच्छी बहू और फिर एक सख्त सास बनने की कल्पना में स्खलित होने लगती है। अपनी व्याख्या और जानकारी के दायरे में खुल कर सेक्स बतियाने वाली बहुत-सी औरतें अपने पति की तमाम दैहिक-मानसिक बर्बरताओं को उनका हक मानती हैं। वे औरतें "सविता भाभी..." के बारे में नहीं जानती होंगी, लेकिन जब वे इसे देखने-जानने भी लगेंगी, तब क्या "सविता भाभी..." छाप स्त्री विमर्श उनके दिमागों के ये जाले साफ कर सकेगा?

एक लड़की (?) इस डॉट कॉम पर कमेंट करती है और हम इसके स्त्री विमर्श का एक नया अध्याय होने की मुनादी कर देते हैं। करें भी क्यों नहीं। अब तक एक स्त्री का हंसना-रोना, मरते हुए जीना भी तो हम ही तय करते आए हैं। "मित्रो मरजानी" की उस स्त्री से "सविता भाभी..." की तुलना करते हुए हमारे सामने से यह मामूली-सी बात भी क्यों गुजर जाती है कि "मित्रो मरजानी" की उस स्त्री के फैसले का सामाजिक परिप्रेक्ष्य क्या है। कहीं यह हमारी सेक्स पर खुल कर बात करने की "मर्दाना ताकत" की सीमा तो नहीं है! हमारा पूरा नजरिया किस कदर खंडित है, इसका अंदाजा इससे लगाइए कि "सविता भाभी..." तक अपनी या किसी की पहुंच को हम सशक्तीकरण की कसौटी मानते हैं और मस्तराम मार्का लोग हमारी नजर में पिछड़े और असभ्य होते हैं। क्या फर्क है मस्तराम की किताबों और "सविता भाभी..." में?

समझना है तो ऐसे समझिए कि यह आभिजात्य और गैर-आभिजात्य का फर्क है। वर्गों की पहुंच और चुनाव का फर्क है। देखेंगे-सुनेंगे-गुनेंगे हम वही, लेकिन हमारा लैपटॉप या कंप्यूटर हमें आधुनिक बना देता है, खासतौर पर उनके सामने जो चाह कर भी "मस्तराम"" के दायरे से ऊपर नहीं आ सके हैं।

"आस्था" फिल्म में प्रोफेसर पति दो मिनट में "सब कुछ" निपटा कर घोलट जाता है, जैसे कोई घंटो पान मुंह में चबा कर सेंकेडों में थूक दे। हालात का सिरा थामे पत्नी आखिरकार कहीं और ही मुक्त होती है और "सब कुछ" का विस्तार जान पाती है। क्या हमने अपने गांव-देहातों में "ऊपरी असर" या "भूतों"" के चंगुल में फंसी जवान औरतों को ओझाओं के सामने बाल खोल कर झूमते देखा है? क्या हम अब भी यह अंदाजा लगा पाने में नाकाम हैं कि वे ओझा उन औरतों को किस तरह उनके "भूतों" से मुक्त करते होंगे? हम एक ऐसे अप्रशिक्षित मर्द समाज में जी रहे हैं दोस्तों कि उन्माद के दौरे तक पहुंची स्नावयिक उत्तेजनाओं के शमन के बिना हजारों औरतें हीस्टीरिया का शिकार हो जाती हैं और पंडितों-ओझाओं के अलावा उनका मुक्तिदाता कोई नहीं होता। स्त्री की देह को उसकी मुक्ति का एकमात्र रास्ता बताने वाले कई "मर्द" मित्रों की मस्तराम-छाप यौन जानकारियां और यौनांगों के बारे में मूढ़ धारणाएं मेरे सामने कुछ अजीब से सवाल खड़े करते रहे हैं।

"सविता भाभी..." तक जिनकी पहुंच है, वे देह के स्तर पर खुद को "रिलीज" करने के रास्ते निकाल लेंगी, लेकिन दिमागी जड़ताओं से निपटने का उनका रास्ता क्या होगा? बेशक "सेक्स इज फॉर प्लेजर", लेकिन क्या यह स्त्री को एक व्यक्ति के रूप में स्वीकार किए बिना और यौन-कर्म को दो मिनट में फारिग होने की चीज समझने वाले मर्दों का उत्तेजना-केंद्रों का आविष्कारक हुए बिना मुमकिन है? "ऑरगेज्म" अगर पुरुषों की नियति है तो स्त्री का भी हक है। लेकिन जहां अपनी ही शारिरिक संरचना और उसकी बारिकियों को जानना-समझना एक शर्म का मामला हो और अपराध-बोध जगाता हो, वहां "सविता भाभी..." क्या सचमुच स्त्री विमर्श का एक नया पाठ तैयार कर रहा है?

इससे इनकार नहीं कि आज की लड़कियां अपने शरीर के बारे में इतनी अनजान नहीं हैं। मगर क्या इस सवाल के भी खत्म होने के आसार नजर आ रहे हैं कि हमारी औरतों के बरक्स जो मर्द खड़ा है, उसकी निगाह में सेक्स की मांग करने वाली औरत की जगह कहां है? "अस्तित्व" फिल्म का हीरो अपनी बीवी को पच्चीस साल पहले के एक बार के संबंध की "खोज" करने के बाद खारिज कर देता है और अपने कई स्त्रियों के साथ संबंध होने के एक मित्र के सवाल का जवाब यह देता है कि "मैं तो एक मर्द हूं।" यह वही आम मर्द है जो अपने "प्लेजर" के लिए ज्यादा से ज्यादा भोग करने लिए अपनी पहुंच में आई सभी स्त्रियों के सामने जाल फेंकता है और "अपनी" स्त्री के दिमाग में किसी और मर्द की बात की कल्पना से भी दहल जाता है। स्त्री की रोजमर्रा की चर्चा में सेक्स के खुलेआम होने के डर के पीछे भी यही एकाधिकार के बर्बर संस्कार है और डरा हुआ मर्द अहं है।

जहां तक सामंती और गुलामी की संस्कृति का सवाल है, हमें याद करना चाहिए एम-फिल या पीएचडी करती उन "कनकलताओं" के किस्से, जो पानी का नल छू देती हैं और इस देश का पानी अपवित्र हो जाता है। फिर जाति का हवाला और जलील करने के दौर। क्या इस संस्कृति में भी "सविता भाभी..." -छाप स्त्री विमर्श कोई दखल देने का रास्ता तैयार कर रहा है?

यह वहम पालने की जरूरत नहीं है कि औरतें अपनी लड़ाई या खुल कर सेक्स पर बात करने या इस मामले में सामने आने को वैधता दिए जाने के लिए इस समाज की "मर्दाना ताकत" के भरोसे बैठी हैं। वे अपने बूते हमारी मर्दानगी को आईना दिखा रही है, जिसमें हम बार-बार नंगे नजर आते हैं।

कभी फुर्सत मिले तो बालिका भ्रूण-हत्या की असली वजहों का पता लगाने की कोशिश कीजिएगा कि कितनी भ्रूण-हत्याओं के लिए दहेज जिम्मेदार है और कितने के लिए यह कुंठा कि हमारे भीतर "दूसरी" औरतों के लिए जो "जगह" होती है, वहां पहुंचने से पहले "अपनी" औरतों को हम "बचा" लेते हैं। जिस समाज में औरत के शरीर को ही उसकी हैसियत तय कर दिया गया है, उसे बनाए रखने में "सविता भाभी डॉट कॉम" छाप प्रगतिशीलता कितनी मदद करती है- यह भी खोजने की कोशिश की जानी चाहिए।

क्रांति-क्रांति चिल्लाने और क्रांति जीने में फर्क है। मुझे नहीं लगता कि दिल-दिमाग या बुद्धि की बदौलत अपनी शख्सियत दर्ज करने वाली लड़की के लिए सेक्स कोई वर्जित चीज है और वह कहीं से सेक्स को कम जीती है। हां, वह सविता भाभी जैसे डॉट कॉमों पर जाकर अपनी पसंद दिखाने को अपनी बहादुरी नहीं मानती। इसमें मुझे कोई शक नहीं कि यह लड़की उससे ज्यादा "खतरनाक" जरूर है, जिसका "सविता भाभी डॉट कॉम" पर एक कमेंट करना हमारे लिए एक आकर्षण की चीज बना हुआ है। और हममें से ज्यादातर सविता भाभी... पर जाकर उसका कमेंट देखने के बाद उसके आकार-प्रकार की कल्पना कर रहे होंगे। हम उस कमेंट करने वाली लड़की का पीठ जरूर थपथपाएंगे, ताकि वह हर अगले पोस्टों में नजर आए...!

दिमागी जड़ताओं से जब तक मुक्ति नहीं मिलती, केवल देह के रास्ते मुक्ति मुमकिन नहीं है।

Saturday, 1 November, 2008

अंधविश्वास के अंधकार में

"किसी को आत्मा के अमरत्व में विश्वास करने के लिए लगा दो और उसका सब कुछ लूट लो। वह हंसते हुए इस लूट में तुम्हारी मदद भी करेगा"- अप्टन सिनक्लेयर।



तंत्र-मंत्र और रूहानी इल्म के माहिर/ खुला चैलेंज/ लाभ 100 प्रतिशत/ 20 मिनट में गारंटी कार्ड के साथ/ जैसा चाहोगे, वैसा होगा/ माई प्रॉमिस/
नोट- अगर आपका विश्वास किसी ज्योतिष, पंडित-बाबा, मियां-मुल्ला, तांत्रिक से उठ गया हो तो एक बार अवश्य मिलें

मनचाहा वशीकरण स्पेशलिस्ट
कारोबार में रुकावट, बंदिश, गृह-क्लेश, मियां-बीवी के झगड़े, तलाक, दुश्मन और सौतन से छुटकारा, कर्ज मुक्ति, संतानहीनता, कोख बंधन, मुठकरनी, विदेश यात्रा, लव-मैरिज, फिल्मी और मॉडलिंग कैरियर में रुकावट जैसी जीवन की जटिल समस्याओं का समाधान।
चेतावनीः मेरे किए को काटने वाले को 1,51,000 रुपए ईनाम।

सभी इल्मों की काट हमारे पास है।

-प्यार में चोट खाए स्त्री एवं पुरुष एक बार अवश्य मिलें।

-एक अगरबत्ती का पैकेट दो नींबू साथ लाएं।

रुहानी और सातों इल्मों के बेताज बादशाह। वर्ल्ड फेमस

- सिद्ध गुरू अकबर भारती या समीरजी (बंगाली)


नगर सेवा की बसों, सड़क के किनारे या पेशाबखानों की दीवारों जैसी जगहों पर चिपकाए गए 'गुप्त रोगों का शर्तिया इलाज' की तरह के ऐसे विज्ञापनों पर एक 'पढ़े-लिखे' और 'सभ्य' व्यक्ति होने के नाते हमारी क्या प्रतिक्रिया होती है? हम मुंह बिचकाते हैं, ऐसा विज्ञापन करने वालों को ठग और मक्कार कहते हैं और उनके पास जाने वाले लोगों को मूर्ख मानते हैं। अगर हम ऐसा विज्ञापन करने वाले ठगों और मक्कारों को अपराधी की तरह देखते हैं या उनके खिलाफ हमारे भीतर नफरत के भाव पैदा होते हैं तो शायद यह गलत नहीं है।

ऐसी राय रखने वाले हम सब आमतौर पर बहुत अच्छी शिक्षा प्राप्त, बहुत अच्छी और साफ-सुथरी जीवनशैली वाले, सूटेड-बूटेड टाईयुक्त कपड़े पहनने वाले और अपनी पहुंच के लगभग सभी आधुनिक उपकरणों-संसाधनों का इस्तेमाल करने वाले होते हैं। वैसे विज्ञापनों पर ऐसे 'सभ्य, शिक्षित और विकसित' समाज का हिस्सा होने के नाते हमारी इस तरह की प्रतिक्रिया के बाद हम अपनी 'सभ्यता' और 'सामाजिक ऊंचाई' में थोड़ा और इजाफा होता हुआ महसूस करते हैं।

और जब समूचे समाज और उसकी सभ्यता को 'दिशा' देने वाले मीडिया को भी हम कुछ इसी तरह का या इससे भी ज्यादा असरदार तरीके से ऐसा ही काम करते हुए देखते हैं, तब हमारी क्या प्रतिक्रिया होती है? जब हम टीवी पर सूटेड-बूटेड टाईयुक्त और 'सभ्यता की पराकाष्ठा' पर पहुंचे हुए लोगों को लगभग चिल्ला कर यह कहते हुए देखते-सुनते हैं कि 'प्रलय... अब धरती बस खत्म होने वाली है' तो हमारे भीतर कौन-से भाव पैदा होते हैं? उस वक्त क्या हमें सड़क के किनारे या पेशाबखानों की दीवारों पर चिपकाए हुए वे विज्ञापन याद आते हैं? क्या ऐसे विज्ञापन करने वालों की मक्कारी और 'समस्याओं से मुक्ति' के लिए उन जगहों पर जाने वाले लोगों की मूर्खता याद आती है?

शायद नहीं। गहरे सम्मोहन के उस दौर की गुलामी की बात ही निराली है। उदयपुर के राकेश और राजग़ढ़ की छाया ने जो किया, उसी सम्मोहन के उन्माद का चरम है, जिसमें झूमते हुए तो बहुत सारे लोगों को देखा जा सकता है, लेकिन 'अंत' से पहले खुद को खत्म कर लेना सबके लिए मुमकिन नहीं होता। हां, 'जिंदा' रहते हुए मौत की चाहे जितनी पीड़ा वे झेल लें।

एक टीवी चैनल पर ज्योतिष संबंधी कार्यक्रम देखने के बाद राकेश ने एक कागज पर लिखा- 'कार्यक्रम को देख कर मुझे लगा कि मैं गलत ग्रह-नक्षत्र में पैदा हुआ हूं और इस वजह से मैं काफी परेशान हूं।' इसके बाद उदयपुर के बीएन कॉलेज में स्नातक प्रथम वर्ष के उस छात्र ने गले में फंदा लगा कर जान दे दी। इसी तरह एक ओर 'बिग बैंग' की सच्चाई की खोज में विज्ञान अब तक के सबसे बड़े प्रयोग की तैयार कर रहा था और टीवी चैनल इस प्रयोग के साथ ही 'धरती के अंत' की मुनादी कर रहे थे। पर्दे पर चीखते-चिल्लाते कुछ सूटे़ड-बूटेड टाईयुक्त पत्रकारनुमा लोग डरावने जंगल के वीराने या मौत के खौफ से आच्छादित श्मशान कब्रिस्तान के अघोड़ियों या तांत्रिकों से कम नहीं लग रहे थे। उससे पैदा होने वाली उत्तेजना में छाया ने तो कीटनाशक की दवा खाकर जान दे दी (मरने से पहले उसने पुलिस को बयान भी दिया), लेकिन हजारो-लाखों जानते हैं कि उस पूरे दौर में वे किस तरह तिल-तिल कर मरने के अहसास से गुजरते रहे।

कुछ समय पहले विज्ञान और वैज्ञानिक चेतना के प्रचार-प्रसार के लिए काम करने वाली संस्था 'स्पेस' ने इस बात पर गहरा क्षोभ जताया था कि विज्ञान के जिन आविष्कारों का इस्तेमाल अंधविश्वासों के जाले साफ करने में किया जाना चाहिए, उसी का सहारा लेकर आदमी को और अंधा बनाया जा रहा है। सवाल है कि विज्ञान के कंधों पर सवार ये आधुनिक और विकसित-से दिखने वाले 'प्राणी' ऐसा क्यों कर रहे हैं?

दरअसल, जब अक्ल को केवल तिजारत का हथियार बना लिया जाता है तो सारी नैतिकताएं पीछे छूट जाती हैं। अगर बात केवल टीवी चैनलों की करें तो जैसा कि कभी-कभी अंदाजा लगाया जाता है, खेल क्या केवल टीआरपी बढ़ाने का है? एक मकसद यह जरूर है। मगर यह सिर्फ दिखाई देने वाला व्यापार है। इसके पीछे जो महीन और शातिर मिजाज काम कर रहा होता है, एकबारगी उस पर यकीन होना मुश्किल है। लेकिन किसी भी गतिविधि को उसके असर की गहराई की बुनियाद पर आंका जाना चाहिए।


कई बार लगता है कि जादू-टोना और झाड़-फूंक के चमत्कार से मन की साध पूरी कराने का दावा करने वाले ओझाओं और टीवी चैनलों या अखबार में इस तरह की खुराक परोसने वाले संचालक एक ही पायदान पर खड़े हैं और उन्हें समाज के मनोविज्ञान की गहरी समझ होती है। यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि किसी भी व्यक्ति या समाज का मनोविज्ञान उसका सांस्कृतिक परिवेश तैयार करता है। अनंत ब्रह्मांड में सैर करती हमारी कल्पनाएं और जीवन की सीमाओं के बीच झूलती उम्मीदें और मायूसियां। जिन चीजों तक हमारी पहुंच होती हैं और जो किसी भी तरह से हमारे सामने मुहैया हो जाती हैं या जो कम-से-कम साक्षात हैं, उससे इतर कुछ भी पाने के लिए तो चमत्कार का ही आसरा है न! पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही चमत्कार या अदृश्य शक्तियों की धारणाएं हमारी चेतना में इस कदर गहरे पैठी होती हैं कि तुरत-फुरत कुछ हासिल कर लेने की हसरत या एक छोटी नाकामी भी हमें बेबस या लाचार बना देती है। फिर शुरू होता है दिमागी काहिली का दौर, जो जिंदगी को आखिरकार चमत्कार के रहमोकरम पर ले जाकर छोड़ देता है।

और चमत्कारों या अदृश्य दुनिया के खयाल का तिजारत करने वाले लोग हमारी उसी बेबसी का शोषण करते हैं। हम बिल्कुल भरे-पूरे, हर तरह से खुद को सेहतमंद महसूस करेंगे, लेकिन ज्यों ही हमें बताया जाएगा कि 'स्वर्ग जाने वाली सीढ़ियां खोज ली गई हैं', हम तुरंत ही अपनी उस ख्वाबों की दुनिया में पहुंच जाते हैं जो हमारे दिमाग में सोच का एक हिस्सा बना बैठा होता है। 'मर्दखोर परियां' एकबारगी हमें जन्नत की हूरों के साथ फूलों की सेज पर ला पटकती हैं। सीता से जुड़ी जगहों को श्रीलंका में खोज लेने की खबर आती है और तत्काल हम खुद को 'तथास्तु' कहते हुए 'श्रीराम' के सामने पाते हैं। भूतों की लड़ाई की 'लाइव कवरेज', रावण की वायुसेना और हवाईअड्डों पर 'ब्रेकिंग न्यूज' हमारी कल्पनाओं की पुष्टि करते लगते हैं। कुछ समय पहले एलियंस 'धरती पर हमला' करने आ रहे थे। ये सारी बातें 'शोधकर्ताओं' के हवाले से कही जाती हैं, ताकि इन्हें ज्यादा से ज्यादा विश्वसनीय बनाया जा सके। शकुन-अपशकुन पर आधारित कर्मफल का ब्योरा देता ज्योतिषि केवल कमाई नहीं कर रहा होता है। वह खूब जान रहा होता है कि इन सबसे कैसे उसका वर्गहित कायम रहता है और सामाजिक शासन और शोषण-परंपरा की बुनियाद और मजबूत होती है।

हमारी त्रासदी केवल पंडे-तांत्रिक या मीडिया तक ही सीमित नहीं है। तल्ख हकीकतों से लबरेज 'सत्या' जैसी फिल्म बनाने वाले रामगोपाल वर्मा 'फूंक' बना कर यह खुली चुनौती पेश करते हैं कि अगर कोई थियेटर में अकेले इस फिल्म को देख लेगा तो उसे पांच लाख रुपए ईनाम के तौर पर दिए जाएंगे। 'फूंक' में भूत-प्रेत या भगवान में यकीन नहीं रखने वाले नायक के साथ-साथ विज्ञान, चिकित्सा-विज्ञान और एक प्रगतिशील सोच को हारते और 'काला जादू' को जीतते दिखाया गया है। यह हजारों सालों से 'काला जादू' की गिरफ्त में जीते समाज के भावनात्मक शोषण के अलावा और क्या है?

लेकिन बात अगर यहीं खत्म हो जाती तो बात और थी। विज्ञान की बुनियाद पर अपनी पहचान कायम करने वाले एक पूर्व राष्ट्रपति से लेकर इस देश के कई शीर्ष नेताओं तक को 'चमत्कारी बाबाओं' के पांव पखारने में शर्म के बजाय गर्व ही महसूस होता रहा है। मानव संसाधन विभाग (यह मंत्रालय देश में वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देने के लिए जिम्मेदार है) के एक पूर्व राज्यमंत्री ने तो बाकायदा ओझाओं-तांत्रिकों का सम्मेलन ही करा डाला था। हाल ही में एक विधायक ने एक बड़े आयोजन में 265 भेड़ों की बलि दी, क्योंकि परमाणु करार के मुद्दे में खतरे में पड़ी यूपीए सरकार 'किसी तरह' विश्वासमत में जीत सकी। कुछ विधायकों की उनके कार्यकाल में अलग-अलग कारणों से हुई मौत के चलते विधानसभा भवन को भूत-प्रेत से ग्रस्त मान लिया जाता है। यह महज संयोग नहीं है कि ज्योतिष शास्त्र को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाए जाने की वकालत सिर्फ इसलिए की जाती है क्योंकि यह भारतीय संस्कृति का अभिन्न हिस्सा रहा है। देश को नेतृत्व देने का दावा करने वाले ऐसे राजनेताओं को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि इससे देश-समाज कितना पीछे जाता है या आधुनिक दुनिया में देश की कैसी छवि बनती है।

सवाल है कि अगर कोई तांत्रिक या व्यक्ति किसी बच्चे की बलि देता है तो उसके लिए कौन-सी स्थितियां जिम्मेदार हैं? सुना है कि कानून अपराध के लिए प्रेरित करने वाले को भी अपराधी ही मानता है। तांत्रिकों-ज्योतिषियों सहित ताजा फिल्में- 'फूंक' या '1920' जैसी फिल्में बनाने वाले ऐसे लोगों को क्या अंधविश्वासों और सामाजिक जड़ता को बनाए रखने का अपराधी नहीं माना जा सकता? इनके लिए कौन-सा कानून लागू होता है?

यह सब जवाहरलाल नेहरू के उस देश में हो रहा है, जो समाज को एक वैज्ञानिक सोच की जमीन पर खड़े होकर देखना चाहते थे।

हाल ही में एक अति पिछड़े माने जाने वाले समाज की एक सांस्कृतिक गतिविधि के साक्षात के दौरान इन पंक्तियों के लेखक ने देखा कि किस तरह करीब हजार लोगों की भीड़ के बीच भयानक उन्माद पैदा करते ओझाओं ने भेड़ों की बलि दी और उसके खून से खुद को नहाया। यह सुदूर देहात के एक पिछड़े इलाके की घटना है। लोग भूले नहीं होंगे कि सारी आधुनिकताओं से लैस देश की राजधानी के एक उपनगर गाजियाबाद में, जो संयोग से 'हाईटेक' भी घोषित हो चुका है, तीन बेटों ने अपनी मां की पीट-पीट कर इसलिए बलि दी क्योंकि एक तांत्रिक ने उन्हें ऐसा करने की सलाह दी थी। लेकिन विज्ञान की डिग्रियों की मार्फत इंजीनियर या डॉक्टर बने उन बेटों की मूढ़ता और त्रासदी पर हमक्या अफसोस जताएं। हमारे देश के अंतरिक्ष शोध संस्थान, यानी 'इसरो' का मुखिया जब पीएसएलवी जैसे अंतरिक्ष यानों के सफल प्रक्षेपण के लिए मंदिरों में पूजा आयोजित करता है और भगवान से खुद को कामयाब करने की याजना करता है तो एक पिछड़े समाज के सामने ओझाओं के उस उन्माद प्रदर्शन पर कौन-सा सवाल उठाया जाए?

दूरदराज के इलाकों में बहुत सारे मां-बाप अपने बच्चों की ओर आज भी यह जुमला उछालते हुए मिल जाएंगे कि 'देह बढ़ गया और दिमाग वहीं रह गया।' तो क्या हमारा समाज आधुनिकता की तमाम ऊंचाइयों को छूने की कोशिश के बावजूद अब भी किसी एक जगह पर ठहरा हुआ है? या उसे जड़ बनाए रखने की साजिश चल रही है? क्यों हम अब तक ऐसा कोई कारगर कानून बना सकने में नाकाम रहे हैं जो ओझाओं-तांत्रिकों, ग्रह-नक्षत्रों का पाठ पढ़ाने वाले ज्योतिषियों, चमत्कारों और अमूर्त दुनिया के किस्से परोसने वाले मीडिया आदि के ठगी के धंधे से समाज को बचा सकें?

इन सवालों के जवाब शायद विश्व हिंदू परिषद के 'अंतरराष्ट्रीय मुख्यमंत्री' रहे प्रवीण तोगड़िया के उस बयान में मिल जाते हैं, जो उन्होंने कुछ साल पहले गोलवलकर गुरु के सौंवे जन्म दिवस के मौके पर आयोजित 'विराट हिंदू सम्मेलन' में दिया था। महाराष्ट्र सरकार द्वारा लाए गए अंधविश्वास विरोधी कानून के मसले पर उनका कहना था कि हिंदुओं को इस कानून का विरोध करना चाहिए क्योंकि यह हिंदुत्व को खत्म करने की साजिश है। साफ है कि एक तरह से वे यह भी कर रहे थे कि हिंदुत्व की बुनियाद इन अंधविश्वासों पर ही टिकी है और अंधविश्वासों का खत्म होना, हिंदुत्व के खत्म होने जैसा ही होगा। और विहिप का 'हिंदुत्व' कया है, क्या यह किसी को बताना होगा?

यह केवल हिंदुओं के धर्म-ध्वजियों का खयाल नहीं है। सभी धर्म और मत के 'उन्नायक' यही कहते हैं कि सवाल नहीं उठाओ, जो धर्म कहता है, उसका अनुसरण करो। और हमारे भीतर का भय बाहर आने के लिए छटपटाते सारे सवालों की हत्या कर देता है। हमारी विडंबना यह है कि जिनसे हम सवाल उठाने की उम्मीद कर रहे होते हैं, वे खुद एक ऐसा मायावी लोक तैयार करने में लगे होते हैं, जहां कोई सवाल नहीं होता।

इसमें कोई शक नहीं कि देश-दुनिया से रूबरू कराने में टीवी चैनलों ने हर मुमकिन कोशिश की है। लेकिन असली मुश्किल यह है कि लगभग सारी प्रस्तुतियों में ऐसा कुछ भी नहीं होता जो हमें घटनाओं के विश्लेषण की ताकत देता हो। हम देश-दुनिया को देखें, मगर उसी निगाह से, जिससे हमें दिखाया जाता है। तो क्या यह मीडिया की सीमा है कि वह कुछ 'नया' देने के नाम पर हमें और 'पुराना' बना रहा है? क्या मीडिया इस बात से अनजान है कि भूत-प्रेत, जादू-टोना, ग्रह-नक्षत्र, ज्योतिष, प्रलय-चमत्कार से जुड़े किसी भी कार्यक्रम का एकमात्र असर सामाजिक यथास्थिति और जड़ता को कायम रखना है?

मकसद सिर्फ यह है कि समाज सोचने और सवाल उठाने के दौर में न पहुंचे। ऐसे कार्यक्रम परोसने वाले और ऐसी गतिविधियां चलाने वाले धर्मध्वजी यह खूब जानते हैं कि जिस समाज ने सवाल उठाना शुरू कर दिया, उनमें चमत्कारों और तकदीर बताने की दुकान बंद हो जाएगी। इसलिए दिमाग पर पड़े जाले बनाए रखने और नए-नए डिजाइन में नए जाले पेश करने का खेल जारी है। साधना या संस्कार जैसे चैनलों की तो बात छोड़ दें, प्रगतिशील कहे जाने वाले समाचार चैनलों के साथ-साथ इस खेल में हर वह तबका शामिल है, जो दुनिया को दिशा देने का दावा करता है।

कुछ ही समय पहले एक टीवी चैनल के मुखिया ने इस तरह के पाखंडों वाले कार्यक्रम दिखाने के मसले पर साफ जवाब दिया कि मुझे इस बात के लिए कतई शर्मिंदगी नहीं है। शायद वे सही कह रहे थे। इससे इतना तो जाहिर होता ही है कि जो कुछ हो रहा है, वह अनायास बिल्कुल नहीं है। एक सजग और सचेत समाज केवल यह नहीं देखेगा कि 'क्या' है, बल्कि वह उस 'क्या' के 'क्यों' की भी मांग या खोज करेगा। लेकिन सिर्फ 'क्या' परोस कर 'क्यों' का सवाल सिरे से गायब कर देने की कोशिश लगातार और सायास तरीके से चल रही है।

Wednesday, 15 October, 2008

हिंदुत्व के निशाने पर देश

असली खेल तो कुछ और है...


भारत के नक्सली समूहों की छवि अब भी ऐसी है कि अगर वे किसी घटना की जिम्मेदारी लेते हैं तो उस पर भरोसा किया जा सकता है। लेकिन विश्व हिंदू परिषद के नेता अशोक सिंघल भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) की इस घोषणा को स्वीकार करने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं हैं कि ओडीशा के कंधमाल में स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की हत्या उसने की। भाकपा (माओवादी) की स्वीकारोक्ति के बावजूद विहिप आखिर उसे बरी करने को क्यों तैयार है? क्या वह दिल्ली या अमदाबाद जैसे शहरों में सिलिसलेवार बम धमाकों की कथित जिम्मेवारी लेने वाले इंडियन मुजाहिदीन नाम के अब तक अमूर्त संगठन के बारे में भी ऐसा ही रवैया अपनाने को तैयार हैं? आखिर क्या कारण है कि भाकपा (माओवादी) के प्रति विहिप अचानक ही इतनी उदार हो गयी है और इंडियन मुजाहिदीन केवल विहिप या संघ परिवार ही नहीं, देश के समूचे सत्ता तंत्र के लिए आतंक का एक सहज स्वीकार्य पर्याय बन चुका है?

मान लिया जाए कि बजरंग दल या विहिप भाकपा (माओवादी) की घोषित तौर पर लक्ष्मणानंद सरस्वती की हत्या की ली गई जिम्मेवारी स्वीकार कर लेती है। इसके बाद वह किसको निशाना बनाएगी या किससे 'बदला' लेगी? दरअसल, वह नक्सलियों की अपनी ओर से घोषित जिम्मेवारी के बावजूद उनसे टकराने का जोखिम नहीं मोल ले सकती। अव्वल तो इसलिए कि जिस सामाजिक समूह के 'धर्मांतरित' होने का भय विहिप को सताता रहता है, नक्सलियों की पैठ भी सबसे ज्यादा उन्हीं के बीच है। दूसरे, नक्सलियों की बात मानते ही अपने हाथ आया 'मुद्दा' निकल जाने का डर है, जिसको आधार बना कर ईसाइयों पर हमले को जायज ठहराने की कोशिश की जा रही है। सवाल है कि लक्ष्मणानंद सरस्वती की हत्या की 'प्रतिक्रिया' में बजरंग दल ने जो 'खेल' शुरू किया है, वह कितने ईसाइयों का खून पीने, उन्हें जिंदा जलाने या गिरजाघरों को फूंकने के बाद खत्म होगा?

संघ परिवार दरअसल अपने एजेंडे को लेकर जिस धीरज के साथ दूरगामी नीतियां तैयार करता है, वह किसी शोधकर्ता के लिए अध्ययन का विषय होना चाहिए। 1990 के दशक के शुरू में 'जय श्रीराम' के नारे के साथ शुरू हुई लड़ाई बाबरी मसजिद के विध्वंस के साथ ही फुस्स हो गयी थी। हालांकि उसके असर से तैयार हुए मानस के कारण भी भाजपा को आखिरकार देश की गद्दी पर बैठने का मौका मिला। लेकिन यही मौका शायद संघ परिवार के लिए सुयोग और इस देश के लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष स्वरूप में विश्वास रखने वालों के लिए दुर्योग साबित हुआ।

छह दिसंबर 1992 को हिंदुत्व के ये उद्धारक देश को यह बता चुके थे कि ये किसकी मर्जी का लोकतंत्र चाहते हैं। उसके लगभग दस साल बाद, यानी मार्च 2002 में एक बार फिर उन्होंने गुजरात जनसंहार की मार्फत दिखाया कि अपने 'दुश्मनों' को काबू में रखने का उनका तरीका क्या है। तब तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी समेत हिंदुत्व के समूचे कुनबे के बार-बार रटने के बावजूद 'इस्लामी आतंकवाद' की हवा ने इतना जोर नहीं पकड़ा था। वरना अंदाजा लगाया जा सकता है कि उस सुनियोजित-प्रायोजित दंगे पर देश-समाज और दुनिया की क्या प्रतिक्रिया होती। बहरहाल, इराक पर अमेरिकी कब्जे का मतलब अगर केवल तेल पर कब्जा मान भी लिया जाए, तो 9/11 के हमले के बाद अमेरिका ने जिस 'इस्लामी आतंकवाद' शब्द का ईजाद किया, उसने 'जय श्रीराम' के मरते हुए नारे के सहारे हिंदुत्व को घसीट रही भाजपा और संघ परिवार के लिए जैसे संजीवनी का काम किया। पूरा जोर लगा लेने के बावजूद 'राम' का नाम आरएसएस-भाजपा को वह दे सकने में नाकाम साबित हुआ, जो 'इस्लामी आतंकवाद' ने उसे महज पांच-छह सालों में ही दे दिया। आज कश्मीर से कन्याकुमारी तक किसी भी बम धमाके को आसानी से आतंकवादी हमला करार दिया जा सकता है। इस मामले में संघी एजेंडे की इससे भी बड़ी कामयाबी यह है कि किसी भी विस्फोट के साथ ही एक आम हिंदू मानस पूरी सहजता के साथ इसमें किसी मुसलमान का हाथ होना मान लेता है। और हर विस्फोट के बाद देश का सत्ता तंत्र कुछ मुसलिम नाम वाले लोगों को गिरफ्तार कर या 'मुठभेड़' में मार कर उसकी इस धारणा को स्थापित कर देता है - वह चाहे भाजपा का गुजरात हो, या कांग्रेस की दिल्ली।

इस देश के माहौल में ऐसी हवा घुल चुकी है कि आतंकवाद के मसले पर इस आम धारणा से इतर देश के सत्ता तंत्र के 'कारनामों' को शक की निगाह से देखने वाले ही शक की जद में आ सकते हैं। यह अलग बात है कि आतंकवाद का पर्याय मान लिए जाने के बावजूद सिमी या उससे जुड़े होने के आरोपों में जितने भी मुसलमानों को पकड़ा गया है, उन्हें आतंकवादी साबित किया जाना अभी बाकी है। इन कथित आतंकवादियों की प्राथमिक 'स्वीकारोक्तियों' की बुनियाद पर पुलिस जो कहानी मीडिया को सामने पेश करती है, पता नहीं क्यों इस देश की अदालतें (कभी-कभी 'जन भावनाओं को तुष्ट करने' वाले फैसले सुनाने के बावजूद) उसे मानने से इंकार कर देती हैं। अपने देश की न्यायपालिका पर हमें अब भी भरोसा करना चाहिए।
यह समझने के लिए भी ज्यादा जोर लगाने की ज़रूरत नहीं है कि नांदेड़ या कानपुर में बम बनाने के दौरान बजरंग दल के लोगों के मारे जाने और कई विस्फोटों में उनका नाम आने के बावजूद उनके लिए 'आतंकवादी' शब्द का इस्तेमाल क्यों नहीं होता है। जबकि कानपुर में बम विस्फोट में दो बजरंग दलियों की मौत के बाद पहुंची पुलिस ने दावा किया कि 'इतना बारूद आधे कानपुर को तबाह करने के लिए काफी था।' नांदेड़ में ऐसी ही घटना के बाद पुलिस ने बजरंग दल के उस 'ठिकाने' से मुसलमानों के पहनने वाले कपड़े, टोपी, बुर्के, नकली दाढ़ी वगैरह भी बरामद किये थे। इतने खुले सबूतों ('स्वीकारोक्तियों' पर आधारित कहानियां नहीं) के बावजूद कोई भी बम विस्फोट या आतंकी घटना के बाद सिमी या इंडियन मुजाहिदीन की तरह बजरंग दल का नाम एक आम मानस के भीतर उतनी ही सहजता से क्यों नहीं उतर पाता है? इंडियन मुजाहिदीन सिमी का नया नाम हो सकता है। लेकिन जिस बजरंग दल के लिए मुसलमानों की वेशभूषा इस्तेमाल करके भ्रम फैलाना आसान काम है, उसके लिए किसी दूसरे संगठन का नाम ओढ़ना क्यों मुश्किल होगा?

ऐसे सवाल न तो हमारे देश की पुलिस पर कोई खास असर डालते हैं, न हमारे मीडिया को इस पर सोचना जरूरी लगता है। दरअसल, पुलिस वही करती है, जो सत्ता उससे कराती है। और मीडिया का काम महज इतना रह गया है कि वह पुलिस के पक्ष को ज्यों का त्यों रख दे। खासतौर पर आपराधिक मामलों में तो मीडिया पुलिस के प्रवक्ता से ज्यादा की भूमिका में नहीं है। ऐसा कुछ तो उस खोखली बुनियाद के कारण होता है, जिस पर खड़ा होकर 'पत्रकारिता' करने का दावा किया जाता है और ज्यादा किसी खास घटना का कवरेज करने वाले पत्रकार या उसके समूचे संस्थान के आग्रहों के कारण। वरना क्या वजह है कि ओडीशा या कर्नाटक में गिरजाघरों पर हमले करने वाले बजरंग दल के गिरोह को सिर्फ एक 'भीड़' की संज्ञा दी जाती है, लेकिन अगर कोई 'आतंकवादी' पकड़ा जाता है तो सबसे पहले उसका नाम जोर देकर बताया जाता है। इसिलए कम कि 'आतंकवादी' एक व्यक्ति है, इसलिए ज्यादा कि वह मुसलमान है।

कुछ दूसरे शहरों की तरह दिल्ली के बम धमाकों में अठारह लोग मारे गये। निश्चित तौर पर इसे आतंकवादी घटना मानने से किसी को परहेज नहीं होना चाहिए। लेकिन हमारे देश के सत्ता तंत्र, पुलिस और मीडिया पर वह कौन-सी मजबूरी हावी है कि ओडीशा में खुलेआम ईसाइयों पर हुए हमलों में पचास से ज्यादा लोगों के मारे जाने के बावजूद उसे किसी तरह आतंकवाद मानने में परेशानी होती है। गुजरात में 2002 के दंगे और उसके बाद नरेंद्र मोदी ने क्या किया, यह किसी से नहीं छिपा है। कर्नाटक में भी इस देश के संवैधानिक नियम-कायदों के तहत चुन कर आए लोग ईसाइयों पर हमले को जायज करार देते हैं। क्या इससे भी खुला आतंकवाद कुछ और हो सकता है?

दरअसल, ईसाई समुदाय पहले से ही संघी एजेंडे का दूसरा निशाना रहा है। मुसलमानों को लेकर संघ जो चाहता था, वह कर चुका है। अब मुसलमानों को 'साइज' में रखने के लिए उसे अलग से कुछ करने की जरूरत फिलहाल नहीं है। बाबरी मसजिद के विध्वंस और सैकड़ों दंगों से लेकर गुजरात के कत्लेआम तक से मुसलमानों को बताया जा चुका है कि इस देश में उन्हें किसके रहमोकरम पर रहना है। अब आतंकवाद का मुद्दा खुद-ब-खुद वह काम करता रहेगा, जो राम का नाम भी नहीं कर सका।

लेकिन ईसाई समुदाय को आतंक से जोड़ा जाना संभव नहीं दिखता। इसलिए फिलहाल तो उन पर हमले करके और गिरजाघरों में तोड़फोड़ कर उन्हें 'समझाया' जा रहा है। असली मकसद यही है कि ईसाइयों को भी मुसलमानों की तरह इस हाल में पहुंचा दिया जाए कि वे सत्ता और समाज के हिंदू मानस की निगाह में 'संदिग्ध' हो जाएं। अगर अमेरिका आंखें नहीं तरेरे तो मुसलमानों के मुकाबले ईसाई बहुत जल्दी उस हाल में पहुंचा दिए जाएंगे। आरोप भले बलात धर्मांतरण का होगा, उसे साबित करना न हिंदुत्व के ठेकेदारों के लिए जरूरी होगा, न सत्ता तंत्र के लिए। मानव अधिकारों के रक्षक होने का दंभ भरने और लोकतंत्र के प्रहसन के बीच धर्मांतरण विरोधी कानून बनाने और उसे सख्ती से लागू करने के उत्साह में कमी नहीं होगी। बिना इस बात पर विचार किए कि अगर कोई व्यक्ति अपना 'धर्म' बदलना चाहता है तो उसे क्यों रोका जाना चाहिए। लाख चाहने पर भी इस 'आधुनिक' समय में बंदूक की नोक पर धर्मांतरण कराने का आरोप किसी के गले नहीं उतरेगा।

इसलिए 'प्रलोभन' का तर्क गढ़ा जाएगा। वे कौन-से कारण हैं कि कोई व्यक्ति 'प्रलोभन' में आकर अपना धर्म बदल लेता है? हिंदुत्व छोड़ कर धर्म परिवर्तन करने वाले व्यक्ति या समूह का सामाजिक दर्जा हिंदुत्व के भीतर क्या होता है? धर्म परिवर्तन के नाम से किस सामाजिक वर्ग को भय और खतरा महसूस होता है? सामाजिक सत्ता और वर्ण-व्यवस्था को बनाये या बचाये रखने के इस खेल को समझना क्या इतना मुश्किल है?

जाहिर है, इस खेल को आसानी से खेलने के लिए देश के लोकतंत्र को मुसलमानों और ईसाइयों के 'बोझ' से मुक्त करना जरूरी है। इसे भुलाया नहीं जाना चाहिए कि झज्जर में गोहत्या का 'अपराधी' करार देकर ईंट-पत्थरों से मार-मार कर पांच दलितों की हत्या की गयी थी। गाहे-बगाहे दिखने वाला हिंदुत्व का असली खेल वही है। और संघी एजेंडे का असली मकसद उसी खेल का मैदान तैयार करना है। इसमें विहिप और बजरंग दल जैसे उसके 'सेनानी' अपना काम तो कर ही रहे हैं, उसके राजनीतिक मुखौटे भाजपा के साथ-साथ धर्मनिरपेक्षता की चादर ओढ़े कांग्रेस भी बड़े महीन तरीके से इसमें अपना योगदान कर रही है। उम्मीद इस बात से बंधती है कि इस देश के सामाजिक और राजनीतिक ढांचे का जो स्वरूप है, उसमें किसी के लिए भी इस तरह का खेल खेलना उतना आसान नहीं होगा, जितना समझ लिया गया है।

Monday, 22 September, 2008

ऊंची तालीम से पैदा हुआ "आतंक"...!

अंबरीश कुमार की ये रिपोर्ट आज के जनसत्ता में छपी है।


आजमगढ़, सितंबर। आजमगढ़ का सरायमीर इलाका एक बार फिर चर्चा में है। यहां के संजरपुर गांव के दो युवक दिल्ली बम धमाकों के सिलसिले में हुए इन्काउंटर में मारे गए तो एक नौजवान गिरफ्तार हुआ। मुठभेड़ के बाद से ही सरायमीर थाने के संजरपुर गांव में सन्नाटा छाया हुआ है। बीच-बीच में तनाव तब पैदा होता है जब मीडिया या पुलिस की कोई टीम गांव पहुंचती है। गांव के लोग चैनल से लेकर प्रिंटमीडिया की भूमिका से नाराज हैं। सैफ के पड़ोसी मुहम्मद रशीद ने कहा, ‘देखिए आज एक चैनल वाला चिल्ला कर कह रहा था कि ये आतंकवादी जमिया से पढ़े हुए हैं सोचिए पढ़े-लिखे लोग कितने शातिर हो सकते हैं। क्या अगर कोई पढ़-लिख गया तो वह शातिर हो जएगा। इस तरह की भाषा से हम लोगो और दुखी हो चुके हैं। अब हमें लगता है कि बच्चों को तालीम देने से क्या फायदा?’

इस बीच गांव के आहत लोगों ने अपने बच्चों को तालीम न देने का फैसला किया है। इसकी मुख्य वजह मदरसे में जने पर इंटेलीजेंस ब्यूरो और एलआईयू के लोग छात्रों के बारे में पूछताछ करते रहते हैं तो दूसरी तरफ उच्च शिक्षा के लिए दिल्ली गए नौजवान दो महीने में ही आतंकवादी बन कर मार दिए जते हैं। दिल्ली में मुठभेड़ में मारे गए आतिफ और घायल सैफ को पढ़ाने वाले बीना पारा इंटरकालेज के प्रधानाचार्य अंसार अहमद ने कहा, ‘इस गांव के लोग दिल्ली की घटना से बुरी तरह आहत हैं। सैफ और आतिफ को मैंने तालीम दी है। जब तक ये बच्चे मेरे सान्निध्य में रहे इनके बारे में कोई शिकायत नहीं मिली। पर अब अचानक इन्हें आतंकवादी घोषित कर दिए जने से सभी हैरान हैं। मीडिया का एक बड़ा वर्ग तो सीधे फैसला दे देता है। यही वजह है कि गांव के लोग अब तय कर रहे हैं कि बच्चों को न तो मदरसा भेज जए और न उच्च तालीम के लिए बाहर।
गौरतलब है कि दिल्ली मुठभेड़ में मारे गए साजिद की उम्र १७ साल थी और इंटरमीडिएट के बाद कंप्यूटर की शिक्षा लेने दस जुलाई को दिल्ली गया था जबकि आतिफ जमिया से बीटेक की पढ़ाई कर रहा था। सैफ २३ वर्ष का है और वह बीए कर कंप्यूटर की शिक्षा लेने दिल्ली गया था। संजरपुर के लोग हैरान हैं कि किस तरह अचानक दोनों युवक आतंकवादी घटनाओं में शामिल हो गए। साजिद के पिता डा. अंसार अहमद यूनानी दवाखाना चलाते हैं। १७ साल का बेटा होने से हतप्रभ ,हैरान और विक्षिप्त नजर आते हैं। डा. अंसार ने कहा,‘१७ साल तक वह यहीं रहा, गांव से बाहर जने में भी डरता था। इंटरमीडिएट के बाद जिद करने लगा कि ऊंची तालीम के लिए दिल्ली जएगा। उसका कहना था कि ऊंची तालीम नहीं ली तो भविष्य कैसे बनेगा। ऐसे में हम कैसे मान लें कि वह अचानक आतंकवादी हो गया।
सरायमीर के सीईओ शैलें्र कुमार के मुताबिक भी इनके खिलाफ पहले कोई रिपोर्ट नहीं मिली। इससे पहले आजमगढ़ का नाम आने के बाद ही उत्तर प्रदेश पुलिस ने भी साफ किया था कि इन नौजवानों के बारे में कोई प्रतिकूल रिपोर्ट नहीं मिली थी।
दिल्ली के जमियानगर से लेकर आजमगढ़ के सरायमीर तक जो कहानियां सुनाई ज रही हैं उससे मुसलिम समुदाय काफी आहत है। इससे पहले अबू बशर का मामला आया। संजरपुर गांव अबू बशर की ननिहाल है। अबू बशर के बाद खुफिया एजंसियों और पुलिस की निगाह में आजमगढ़ जिला आया तो दिल्ली बम धमाकों के बाद आजमगढ़ के संजरपुर गांव पर सबकी निगाह गई। दिल्ली में मुठभेड़ होते ही मीडिया के कुछ लोग संजरपुर गांव पहुंचे तो गांव वालों के आक्रोश का सामना करना पड़ा। इसकी वजह अबू बशर के बारे में तरह-तरह की भ्रामक खबरों का मीडिया में आना था। पुलिस ने उसे उठाया आजमगढ़ के उसके गांव से था। जबकि गिरफ्तारी लखनऊ से दिखाई गई थी। यह जनकारी होने के बाद भी मीडिया के एक बड़े वर्ग ने वही लिखा जो पुलिस ने कहा। यही वजह है कि अब गांव वालोंे के आक्रोश के चलते मीडिया के लोग संजरपुर गांव जने से बच रहे हैं।
आजमगढ़ के मीरसराय से लेकर संजरपुर गांव तक अचानक इतने मास्टरमाइंड और आतंकवादियों का निकल आना लोगों को हैरान कर रहा है। हालांकि इससे पहले अबू सलेम भी चौदह साल की उम्र में ही रास्ता भटक कर अंडरवर्ड का डान बन गया था। जिसके बाद उसने अकूत संपत्ति इकट्ठा कर ली। लेकिन इस गांव से जो नए नौजवान निकले हैं उनका आतंकवाद की घटनाओं से सीधा रिश्ता जुड़ता नजर नहीं आ रहा है। यह कोई भी नहीं समङा पा रहा है कि शिक्षा लेने गए ये युवक अचानक कैसे आतंकवाद के रास्ते पर चल दिए। सैफ के पिता सादाब अहमद तो अभी भी मानने को तैयार नहीं है कि उनका बेटा आतंकवादी हो सकता है। आहत होकर कहते हैं कि यदि आतंकवादी निकले तो उसे गोली मार दो। पर जंच-पड़ताल करवा कर। रोचक तथ्य यह है कि सैफ के पिता सादाब अहमद आजमगढ़ जिला समाजवादी पार्टी के उपाध्यक्ष भी थे। पर जसे ही मुठभेड़ की खबर आई समाजवादी पार्टी की जिला इकाई अचानक भंग कर दी गई। हालांकि जब अबू बशर का मामला उठा था तो समाजवादी पार्टी ने पहल की थी पर इस मामले में वह फौरन पीछे हट गई। मुसलिम समुदाय मुलायम सिंह को अपना रहनुमा मानता रहा है पर इस घटना से वे भी हैरान हैं।

Monday, 18 August, 2008

चमड़ी की सत्ता

काले का यह घोटाला दपदप गोरा है जनाब


हमारे एक मित्र हैं सुनील पी बाबु। यह उनका पंजीकृत नाम है। आपमें से ज्यादातर ने अंदाजा लगा लिया होगा कि वे तमिलनाडु, केरल या किसी दूसरे दक्षिण भारतीय राज्य के ही मूल निवासी होंगे। और जब उधर के होंगे तो आपकी उम्मीद वाजिब है कि वे काले ही होंगे। बहुत होगा तो उनकी कालिमा कुछ लालिमा लिए होगी। तो चलिए, यह रहस्य भी हम खोलते हैं और आपकी उम्मीद को पुख्ता करते हैं। वे शुद्ध काले हैं। इतने काले कि अपने दोस्तों के बीच के मजाक हैं। अब आप उनसे मजाक करने के लिए या उनका मजाक उड़ाने के लिए उनके रंग पर कितना भी कड़वा तंज कस दें, वे अपने गहरे रंग की तरह ही गहराई तक जाता हुआ ठहाका लगा देंगे और आपके चेहरे का पानी उतर जाएगा।
बाबु के जन्म दिन पर एक बार उनके दपदप उजले बॉस ने फेयर एंड लवली का "पांच रुपए वाला पैक" बतौर तोहफा थमा दिया। बाबु ने छूटते ही कहा- "इसे भी नमूने के तौर पर रखूंगा। पता है, यह कंपनी छह हफ्ते में गोरा बना देना का दावा करती है। छह साल से ज्यादा हो गए, अब तक जैसे का तैसा हूं।" और यह कहने के साथ ही उन्होंने फिर जोर का ठहाका लगा दिया।
...कौन जानता है कि उनके इन ठहाकों के तले कितनी आहें घुट कर हलक में दम तोड़ जाती हैं।

दिलासा देने के लिए किसी ने भले लिखा हो कि "तू काली है, यह फरिश्तों की भूल है, वह तिल लगा रहा था कि स्याही बिखर गई", या फिर फिर कभी "हम काले हैं तो क्या हुआ दिलवाले हैं..." सुन कर हौसला बंधता होगा। लेकिन क्या सचमुच! क्या इन तुकबंदियों की भी असली जमीन यही नहीं है कि काला होना कमतर होना है। फरिश्ता अगर भूल करता है, तभी कोई काला हो जाता है। वरना वह तो गोरे रंग पर सिर्फ एक तिल रखना चाहता है- उसे और भी खूबसूरत बनाने के लिए। वह तो गलती से स्याही बिखर जाती है और कोई काला हो जाता है! क्यों किसी काले को ही यह जताने की जरूरत पड़ती है कि उसके पास भी दिल है? क्यों ऐसा है कि अगर कोई गोरा है तो हमेशा ही किसी काले के बरक्स उस पर एक सांस्कारिक और सच कहें तो सामाजिक श्रेष्ठताबोध की ग्रंथि हावी रहती है?
लेकिन बात केवल "कालिया" या "कालूराम" जैसे तमगों पर ही खत्म नहीं होती। (यह सवाल आपके लिए खुला है कि कोई कालू -राम- ही क्यों होता है)। "रंग-दृष्टि" के इस आग्रह का सिरा वहां तक पहुंचता है जहां "समयांतरकारी" शख्सियतों की निगाह अगर कहीं टिकती भी है तो बोलते समय होठों के किनारे जमे थूक पर। क्या बातों तक पहुंचना इतना मुश्किल होता है? अब यहां भी श्रेष्ठताबोध की ग्रंथि है या थूक प्रेम- कहा नहीं जा सकता। बहरहाल, सिरा तो यह जुड़ा ही हुआ है, मगर "भटकता" दीख रहा है। इसलिए हम अपने मूल सिरे पर वापस आते हैं- यानी काला का घोटाला।
गौरवर्णी और सुगठित युवतियों के देह-दर्शन से आईपीएल क्रिकेट प्रतियोगिता का "मजा" बढ़ाने वाले हमारे शुभचिंतकों को कहां अंदाजा था कि चीयर लीडरों की जिस टीम को वे मैदान में भेजने जा रहे थे, उनमें एक-दो का काला रंग सारे "खेल" को बदमजा कर दे सकता है। यह तय है कि सही वक्त पर किसी "दैव" ने ही भला किया होगा, तभी उन्होंने दोनों काली चीयर लीडरों को मैदान में जाने से रोक दिया।

इसका सूत्र ढूंढ़ना बहुत मुश्किल नहीं है कि सब बुरा "काला" क्यों हो गया। मसलन, काला धन, काली कमाई, दाल में काला, बुरी नजर वाले तेरा मुंह काला, मुंह काला करना जैसे काले कारनामों के नहीं खत्म होने वाले सिलसिले। जबकि सिर्फ हमारे समाज में नहीं, दुनिया भर में शोषण, दमन, जुल्म ढाने, बेईमानी और बर्बरताओं के किस्से रचने में इस "गोरेपन" की क्या भूमिका रही है, यह कोई छिपी बात नहीं है। फिर क्यो हर बुराई, कमतरी और जलील करने वाले हर मानक हमारे लिए "काले" हो गए?
क्या यह सच नहीं है कि सामाजिक सत्ता की लगाम हमेशा ही "गोरों" के पास रही और लगभग सभी तौर-तरीके तय करने में यह गौरवर्णी श्रेष्ठताबोध हावी रहा? सत्ता कायम रखने और अपना या अपने वर्ग का ही सब कुछ उच्च ठहराने के लिए श्रेष्ठतर और निम्नतर की परिभाषाएं गढ़ी गईं और एक तरह उसे ही "दैवीय सत्य" घोषित कर दिया गया- सौंदर्यबोध के सारे मौजूदा मानकों सहित!
और जब सारा कुछ "दैव" है तो औचित्य का सवाल कहां? चमड़ी गोरी नहीं तो आत्मविश्वास हासिल करना होगा कि रंग से कुछ नहीं होता है। और अगर है तो वह भरोसा आप जन्म से लेकर आते हैं। वे कौन-सी जड़ें हैं जिनकी वजह से किसी को "काला-कलूटा" कहने में हमें एक गुदगुदा देने वाला मजा आता है? क्या हम इसी भाव से किसी -गोरे- को चिढ़ा सकते हैं?

Saturday, 9 August, 2008

जम्मू के गुनहगार

अपूर्वानंद

जम्मू में हालात बेकाबू हो गए हैं. अमरनाथ बोर्ड को जंगल की उस ज़मीन को वापस दिए जाने की मांग को लेकर जिसका यात्रा के लिए अस्थायी उद्देश्य से राज्य सरकार ने अधिग्रहण किया लेकिन बाद में जिसकी अधिसूचना को रद्द कर दिया गया, शुरू हुआ हिन्दुओं का आन्दोलन हिंसक हो उठा है. कुछ अखबार इस आन्दोलन की ख़बर को छापते हुए यह लिख रहे हैं कि आन्दोलन धर्मयुद्ध में बदल गया है. हिंसा की खबरें छपते हुए उनकी खुशी छिपाए नहीं छिपती. पूरे देश में भारतीय जनता पार्टी, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और उनके संगठनों ने यह प्रचारित किया कि हिन्दुओं की अमरनाथ यात्रा पर कोई ख़तरा आ पडा है. भारतीय जनता पार्टी से लगाव रखने वाले तत्कालीन राज्यपाल जेनरल एस.के. सिन्हा ने अमरनाथ की देखभाल के लिए बने अमरनाथ न्यास के अध्यक्ष के रूप में राज्य सरकार पर अमरनाथ यात्रियों के लिए अस्थायी प्रयोग के उद्देश्य से जंगल की इस ज़मीन का अधिग्रहण करने को कहा. कांग्रेस और पी. डी. पी. की सरकार ने पहले तो इससे सम्बंधित अधिसूचना जारी कर दी लेकिन बाद में इसी मुद्दे पर पी.डी.पी. ने इसे दबाव में लिया गया निर्णय बताते हुए ख़ुद को इससे अलग किया और फिर सरकार भी छोड़ दी. कश्मीर के अन्य सभी दलों ने इस पर ऐतराज जताया और विरोध शुरू किया तो सिन्हा के बाद नए राज्यपाल ने अधिसूचना रद्द की. राज्यपाल की इस अधिसूचना से लोगों ने राहत की साँस ली, लेकिन भारतीय जनता पार्टी ने इसे हिंदू विरोधी कदम बताते हुए पूरे देश में इसके विरोध में अभियान चलने की घोषणा कर दी . जम्मू जल रहा है और यह पार्टी इसे आगामी चुनाव में अपनी सीटों की बढोत्तरी के संकेत के रूप में देख रही है.

भाजपा ने यह प्रचारित करने की कोशिश की है कि राज्यपाल वोहरा का अधिग्रहण रद्द करने का निर्णय यात्रा विरोधी है. यह बताने की कोशिश भी की गई है कि कश्मीर के मुसलमान यात्रा का विरोध कर रहे हैं. उमर अब्दुल्ला ने हाल में संसद की बहस में ठीक ही कहा कि कश्मीर में जब तक एक भी मुसलमान रहेगा, यात्रा पर कोई आंच नहीं आयेगी. हमने ये खबरें पढ़ी हैं कि जब भाजपा के आन्दोलन के चलते अमरनाथ यात्री बीच में ही फँस गए तो रास्ते के गाँव के मुसलमानों ने उनकी देखभाल की. उन्हें ठहराने, खिलाने पिलाने का इंतजाम मुसलामानों ने किया. हुर्रियत और दूसरे कश्मीरी दलों ने भी बार-बार यह कहा कि उनका इरादा अमरनाथ यात्रा को बाधित करना नहीं है. जैसा उमर अब्दुला ने कहा, ऐतराज इस बात पर था कि जंगल कि ज़मीन इस मकसद के लिए क्यों ली जाए. यह सवाल भी नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता कि आज तक जब कश्मीरी मुसलमानों के सहयोग से हिन्दुओ कि यह पवित्र यात्रा अबाधित चलती रही थी तो फिर इस सरकारी कदम का क्या औचित्य था.
जेनरल एस. के. सिन्हा के राजनीतिक झुकाव को जानने वालों को इस पूरे घटनाक्रम पर बहुत आश्चर्य नही हुआ. जिस तरह अमरनाथ न्यास को उन्होंने अपने नियंत्रण में किया उसी से आगे की स्थितियों का आभास हो जाना चाहिए था. किसी ने यह प्रश्न नहीं किया है कि अगर अमरनाथ न्यास का अध्यक्ष पदेन राजपाल को होना है तो फिर यह क्यों ज़रूरी माना गया कि उसका हिंदू होना अनिवार्य है. क्या यह इस देश के धर्मनिरपेक्ष चरित्र के खिलाफ नहीं? क्या हम यह कहना चाहते हैं कि एक मुसलमान या ईसाई राज्यपाल हिन्दुओं कि धार्मिक आस्था का आदर नहीं कर सकता! बात-बात में मुसलमाओं के तुष्टीकरण का शोर मचाने वाले और छद्म धर्मनिरपेक्षता की निंदा करने वाले बुद्धिजीवियों ने इस पर कोई सवाल नहीं किया.


धर्मनिपेक्षता की विशेषता धर्मों से दुराव में नहीं है. जो लोग नेंहरू की इस वजह से आलोचना करते है कि उन्होंने धर्म को लेकर राजकीय संस्थाओं में एक दोष भावना पैदा की, वे उनके और बाद के दौर को भी ध्यान से नहीं देखते. नेहरू ने धर्मों को लेकर एक इत्मीनान का माहौल बनाने की कोशिश की. भारत का प्रधानमंत्री प्रत्येक धर्म के मानने वालों के धार्मिक अधिकारों की हिफाजत के लिए जिम्मेदार है, वैसे ही अन्य सभी राजकीय संस्थाएं. फिर जब आप राज्यपाल होने के कारण किसी संस्था के प्रमुख होते है तो आपका हिंदू या मुसलमान होना गौण हो जाता है. फिर असली धर्मनिरपेक्षता वादियों ने अमरनाथ न्यास के प्रमुख होने की शर्त में अलग से हिंदू होने की अनिवार्यता पर कभी कुछ क्यों नहीं कहा?

अमरनाथ यात्रा की लिए ज़मीन लेने का जहाँ तक प्रश्न है, यह याद रखना आवश्यक है कि कश्मीर की जनता इसे लेकर बहुत संवेदनशील है कि कहीं कश्मीर का बुनियादी चरित्र न बदल जाए. यह भी याद रखिये कि भारत कि सुरक्षा के नाम पर वहां की सैकडों एकड़ ज़मीन पर सेना और अन्य अर्ध सैन्य बालों का कब्जा है. वे कश्मीरियों की पहुँच से पहले ही बाहर हैं. इसी वजह से आपने ध्यान दिया होगा कि ज़मीन लेने कि अधिसूचना के विरोध में कश्मीरी यह भी कह रहे थे कि बाकी ज़मीन भी खाली की जाय. आप को राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ कि वह तजवीज भी भूलनी न चाहिए जिसका इरादा कश्मीर में आबादियों को इस तरह बसाया जाना था कि वहां कि आबाई शकल बदल जाए. यह काम स्तालिन ने गैर रूसी इलाकों में रूसियों को बसा कर, चीन ने तिब्बत में चीनियों को बसा कर किया . उसी तरह कश्मीर को तीन हिस्सों में बाँटने के भाजपा के प्रताव को भी न भूलिए.

भाजपा अभी जम्मू में हिन्दुओं की गोलबंदी करने में जुटी है. उसकी कोई मोहब्बत कश्मीर से नहीं, और न वह जम्मू कश्मीर को एक इकाई के रूप में देखने में दिलचस्पी रखती है. भाजपा के नेताओं की बांछें खिली हुई है कि उन्हें हिन्दुओं को यह बताने का एक मौका और हाथ लग गया है कि वे इस देश में कितने असुरक्षित है. एक बार ठहर कर हमें यह भी देखना चाहिए कि भाजपा ने किन मुद्दों पर राष्ट्रीय आन्दोलन किया है. जनसंघ ने गोरक्षा को मुद्दा बनाया, उसके नए अवतार भाजपा ने उसकी धारा ३७० के खात्मे, समान नागरिक संहता बनाने की मांगों के साथ राम जन्म भूमि मन्दिर का मसला उठाया. कुछ समय से वह रामसेतु को राष्ट्रीय मुद्दा बनाने में जुटी है. अब उसे अमरनाथ यात्रा एक नया राष्ट्रीय मुद्दा दीख रहा है. जो लोग भाजपा को देश का कारोबार सौंपने और अडवानी को प्रधानमंत्री बनाने में कुछ हर्ज नहीं देखते, वे ज़रा इस पर विचार करें कि जिस राजनितिक दल को धार्मिक और नकली सांस्कृतिक मुद्दों के अलावा कोई राजनीतिक मुद्दा नहीं मिलता, उसमें भी जो सिर्फ़ एक धर्म के माने वालों में, जोकि देश के बहुसंख्यक हैं, लगातार असुरक्षा की भावना बनाये रखकर ख़ुद को जीवित रखना चाहता है, उसे कितना जिम्मेवार माना जाय. जो लोगों के मारे जाने पर दुखी न हो, उसके हाथों क्या भारत की आत्मा सुरक्षित रह सकेगी?

Wednesday, 18 June, 2008

तर्क के खिलाफ आस्‍था का हथियार


कहते हैं किसी एक झूठ को बार-बार रटने से या तो वह सच के वहम में तब्दील हो जाता है, या फिर प्रहसन बन जाता है। तो राम भरोसे राजनीति की नाव पर सवार हिंदू कट्टरपंथी समूहों की पीड़ा समझना बहुत मुश्किल नहीं है। बाबरी मस्जिद के बाद राम मंदिर का मुद्दा लगभग पिट चुका है, सो कुछ महीने पहले अचानक ही रामसेतु की राह दिखाई पड़ गई थी। मगर पहले-सी उत्तेजना पैदा कर सकने में कामयाबी नहीं मिली। अब दिल्ली विश्वविद्यालय की एक किताब में फिर से "मुश्किल" में पड़े राम को खोज निकाला गया है और उनके "उद्धार" का अभियान शुरू हो गया है।

पिछले दो साल से यह किताब दिल्ली विश्वविद्यालय में स्नातक इतिहास के ऑनर्स पाठ्यक्रम में पढ़ाई जा रही है। इसमें "प्राचीन भारत में संस्कृति" के तहत "तीन सौ रामायण- पांच उदाहरण और अनुवाद पर तीन विचार" शीर्षक से एक अध्याय शामिल है, जिसके लेखर एके रामानुजन हैं। रामानुजन दक्षिण भारत के प्रसिद्ध लोककथाओं के विद्वान, भाषाविद, कवि और अनुवादक थे। उन्होंने शिकागो विश्वविद्यालय में दक्षिण एशिया के अध्ययन कार्यक्रम तैयार करने में काफी अहम अहम भूमिका निभाई। इस लेख में उन्होंने राम के बारे में दुनिया भर में प्रचलित अलग-अलग कहानियों का जिक्र किया है। राम को भारतीय धर्मग्रंथों में एक सबसे ज्यादा लोकप्रिय देवता के रूप में माना जाता रहा है। लेकिन समय के साथ विभिन्न मतों में रामकथा की अलग-अलग तरीके से व्याख्या भी की गई। दिल्ली विश्वविद्यालय में इतिहास विषय से स्नातक ऑनर्स के पाठ्यक्रम में शामिल इस पाठ का मकसद सिर्फ इतना है कि छात्रों को आम हिंदू समाज में पाई जाने वाली पारंपरिक अवधारणा से इतर तमिल, बौद्ध, जैन या कुछ दूसरे मतों में प्रचलित कहानियों के अध्ययन और उनके विश्लेषण का मौका मिले। फिर पाठ्यक्रम में इसे पूरी तरह वैकल्पिक रखा गया है और इसे पढ़ना या नहीं पढ़ना अपनी मर्जी पर निर्भर है। इसे ही सही मान लेने का आग्रह कहीं नहीं है।

लेकिन इस मसले पर दिल्ली विश्वविद्यालय में जो हुआ, उससे यह लगता है कि अब शैक्षणिक संस्थानों को भी "हिंदुत्व की प्रयोगशाला" बनाने की मुहिम शुरू हो चुकी है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विश्व हिंदू परिषद के गर्भनाल से जुड़े छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कथित नेताओं ने इस बात का भी लिहाज करना जरूरी नहीं समझा कि वे विश्वविद्यालय परिसर में हैं। लेकिन जब पहले से यह तय हो कि बात करना उतना जरूरी नहीं, जितना उत्पात मचाना, तो उचित-अनुचित जैसे सवाल गैरजरूरी मान लिए जाते हैं। किताब में रामकथा पर आधारित उस अध्याय का विरोध करने के लिए इतिहास विभाग में तोड़फोड़, शिक्षकों को अपमानित करने और उनके साथ मारपीट का दृश्य किसी दंगे के पूर्वाभ्यास से कम नहीं था। ध्यान रहे कि इस मसले पर भाजपा के एक पूर्व सांसद रामविलास वेदांती तालिबानी अंदाज बिखेरते हुए पाठ्यक्रम में रामानुजन का पाठ शामिल करने के लिए जिम्मेदार कुलपति का सिर काट कर लाने वाले को ईनाम देने की घोषणा पहले ही कर चुके हैं। सवाल है कि क्या इसी तरह की "सहिष्णुता" के दम पर हिंदुत्व की गौरवगाथा लिखने की तैयारी की जा रही है?

भाजपा के इस छात्र संगठन के नेताओं ने इतिहास विभागाध्यक्ष एजेडएच जाफरी के साथ जिस तरह का बर्ताव किया और मारपीट की, वह इस तरह की कोई पहली घटना नहीं थी। इससे पहले उज्जैन में प्रोफेसर सब्बरवाल की हत्या, पुणे के भंडारकर शोध संस्थान में उत्पात और बड़ौदा विश्वविद्यालरय में वहां के संकाय प्रमुख और छात्रों के साथ मारपीट जैसी "बहादुरी" इसके और इस जैसे कुछ दूसरे संगठनों के चरित्र की मुख्य विशेषता बन चुकी है। उलटबांसी यह कि भारतीय संस्कृति और महान गुरु-शिष्य परंपरा की दुहाई देने के काम में इन्हें कभी थकते नहीं देखा गया।


विडंबना यह है कि एक उदार और लोकतांत्रिक समाज का हिस्सा होने के बावजूद इस तरह के संगठन से जुड़े लोग अपनी आस्थाओं की अभिव्यक्ति के लिए कोई भी रास्ता अख्तियार करने को तैयार रहते हैं। लेकिन खुद से सहमति नहीं रखने वालों की अभिव्यक्ति इन्हें परेशान करती है। इस बात पर तो तरस ही खाई जा सकती है कि कोई यह मान ले कि दुनिया उसकी इच्छाओं या आस्थाओं का खयाल रखे, भले ही वह प्रताड़ित करने की हद तक दूसरों की इच्छाओं का अतिक्रमण करे। अभिव्यक्ति की आजादी का यह हनन किसी फिल्म के प्रदर्शन का विरोध करने से लेकर किसी किताब पर पाबंदी लगाने की मांग के लिए भी हिंसा को एकमात्र रास्ता मानने के रूप में सामने आ रहा है। मुश्किल यह है कि सरकारों को इस बात से कोई लेना-देना नहीं रह गया है कि विचार-विश्लेषण की प्रक्रिया को और मजबूत करने या वैज्ञानिक चेतना के प्रचार-प्रसार के मसले पर दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ प्रतिक्रियावादी ताकतों का मुकाबला किया जाए। उलटे वे "हिंसा की आशंका" को आधार बना कर किसी फिल्म या किताब पर पाबंदी लगाने में देर नहीं लगातीं। दरअसल, इसके पीछे हिंसा की "आशंका" से ज्यादा फिक्र अपनी राजनीति की होती है।

जहां तक अलग-अलग रूप में प्रचलित रामकथा की जानकारी देने वाले पाठ पर पाबंदी की मांग का सवाल है तो उनका क्या जाए जो "रामचरितमानस" में शूद्रों और स्त्रियों को अधिकतम अपमानित किए जाने का आरोप लगाते हैं? यहां हमारी आस्था का वर्गीकरण क्यों हो जाता है? आस्था का झंडा लेकर देश को "आंदोलित" करने का बीड़ा उठाए लोगों को क्या कभी दलित उत्पीड़न के किसी मामले पर चिंतित होते देखा गया है? ऐसा इसलिए नहीं होगा क्योंकि इससे यथास्थिति भंग होगी और सामाजिक सत्ता का मौजूदा ढांचा बिखरेगा। और चूंकि आस्था इस ढांचे की सुरक्षा में सबसे कारगर हथियार साबित होती है, और इसका इस्तेमाल भी बेहद आसान है, इसलिए सबसे पहले इसी पर चोट पहुंचाए जाने का हौवा खड़ा किया जाता है। फिर इसके लिए किए जाने वाले हिंसक प्रदर्शन एक प्रत्यक्ष दबाव का काम करते हैं।


दरअसल, कट्टरता की बुनियाद पर खड़े किसी समूह के लिए लगातार किसी भावनात्मक मुद्दे की बैसाखी का सहारा एक मजबूरी होती है। आम हिंदू मानस में राम का देव-रूप गहरे तक पैठा है और हिंदुत्व के कथित पैरोकारों के लिए राम एक सहज और सुलभ मुद्दा हैं, इसलिए राम नाम के संकट का हौवा खड़ा कर उसे उकसाना भी उतना ही आसान है। इसकी संवेदनशीलता का अंदाजा इन हिंदूवादी समूहों को बखूबी है और यही वजह है कि राम नाम को बार-बार राजनीति के बाजार में खड़ा किया जाता है। वरना क्या कारण है कि सालों से विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम की एख वैकल्पिक सामग्री अचानक इनके लिए इतनी अहम हो जाती है?

जो भी हो, अब एक औसत हिंदू भी राम के मुद्दे पर भाजपा-विहिप या दूसरे हिंदूवादी दलों का पाखंड समझ चुका है। राम मंदिर की गर्मी उतर जाना इसका सबूत तो है ही, सेतुसमुद्रम परियोजना में जिस तरह रामसेतु का सवाल घुसा कर लोगों में उन्माद पैदा करने की कोशिश नाकाम रही, उससे यही साबित होता है कि लोग अब इसे महज एक राजनीतिक चाल से ज्यादा अहमियत देने को तैयार नहीं हैं।

इसके बावजूद दिल्ली विश्वविद्यालय में उत्पात मचाने और दंगे जैसा माहौल पैदा करने के पीछे क्या वजह हो सकती है? दरअसल, तोड़फोड़, हमला या निराधार बातों पर ऊधम मचा कर समय-समय पर अपने वजूद का एहसास कराते रहना कट्टर या सांप्रदायिक संगठनों की मजबूरी होती है। मिसाल के तौर पर विहिप, शिवसेना और अब महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना जैसे संगठन गाहे-बगाहे बिना बात के उत्पात मचाते रहते हैं, जिसका मकसद अपने अस्तित्व का एहसास कराते रहना भर है। आम जन के हितों के मुद्दे उनके लिए बेमानी होते हैं। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के ऊधम को इसकी ताजा कड़ी के रूप में देखा जाना चाहिए। यों भी, महाराष्ट्र में शिवाजी पर एक किताब के विरोध के सिलसिले में शिवसेना ने जो किया और उसमें उसे आखिरकार कामयाबी मिली, विद्यार्थी परिषद शायद उसी को नजीर मान कर चल रही है। इससे पहले भाजपा शिवाजी पर "आपत्तिजनक" टिप्पणियों को आधार बना कर जवाहरलाल नेहरू की किताब "डिस्कवरी ऑफ इंडिया" पर भी प्रतिबंध लगाने की मांग कर चुकी है। यह किताब हिंदी में भी उपलब्ध है और भारत के इतिहास के बारे में इसे एक प्रामाणिक और संदर्भ ग्रंथ के रूप में जाना जाता रहा है।

आमतौर पर ऐसे संगठन किसी विषय पर बहस के लिए तैयार नहीं होते। तथ्यों और तर्कों के साथ बात करने के लिए मेहनत करनी पड़ती है और इसमें इनकी सीमा किसी से छिपी नहीं है। इसलिए ये बार-बार भावनाओं और आस्था के आहत होने का सवाल उठाते हैं जो इनके लिए महज अपनी राजनीतिक दुकानदारी चमकाने का जरिया भर होते हैं। यहीं ये इस बात का खयाल रखना जरूरी नहीं समझते कि जो इनसे सहमत नहीं हैं, उनकी भावनाओं का क्या जाए। इस तरह के सवाल उठने पर ये जो रवैया अख्तियार कर लेते हैं और ऐसे मसलों पर इन संगठनों का जो चरित्र रहा है, उसे देते हुए इनसे किसी मसले पर बहस की उम्मीद बेमानी ही है।

इतिहास पर आस्था को तरजीह देना इस लिहाज से इनके हित में है कि इतिहास की परतें खुलने पर बहुत सारी आस्थाएं एक झटके में खंडित हो जा सकती हैं। और भावनात्मक मुद्दे जिनके टिके रहने का एकमात्र सहारा हैं, वे इस पर विचार करना क्यों जरूरी समझेंगे? इनके लिए इतिहास इसलिए भी एक अप्रिय विषय है क्योंकि हिंदुत्व की जिस सहिष्णुता का ढिंढोरा पीटा जाता है, इतिहास के पन्ने उसकी कलई खोलने लगते हैं। सेतुसमुद्रम परियोजना में अड़ंगा डालने के लिए जिस प्राकृतिक संरचना को वे समुद्र पार करने के लिए राम द्वारा बनवाया गया सेतु और इतिहास की एक सच्चाई सिद्ध करने पर तुले थे, उसके साथ-साथ रामायण के सारे विवरण को सच मानने का आग्रह इन्हें असहज कर देता है। इसी तरह महज जन्म के आधार पर नब्बे फीसद लोगों का किसी न किसी बहाने रोज-रोज जलील होना किस बारीक तरीके से नियति बना दी गई और उस यातना पर गर्व करने की घुट्टी पिला दी गई, अब उसकी व्याख्याएं सामने आने लगी हैं। यह निश्चित तौर पर "हिंदुत्व की प्रयोगशालाओं" की खोज में लगे रहने वालों के लिए एक अप्रिय स्थिति पैदा करती है और वहां इनके लिए आस्था एकमात्र महत्त्वपूर्ण चीज हो जाती है। जाहिर है, ध्यान बंटाने के लिए भावनात्मक मुद्दे उठाने और हिंसा या उत्पात का सहारा लेने को ये अपना मुख्य धर्म समझते हैं, जो इनकी सीमा भी है।


मुश्किल यह है कि मीडिया का एक हिस्सा भी इन मसलों पर जिस तरह गैरजिम्मेदारी से भरा रवैया अपनाता है, वह विमर्श या संवाद की संभावनाओं को खत्म करता है। दिल्ली विश्वविद्यालय में हमले से पहले टीवी चैनलों को बुला कर बाकायदा प्रायोजित तरीके से हिंसा की गई। यह उत्साह इस मुद्दे पर बातचीत करने के मामले में नहीं दिखाया गया। इस तरह की ज्यादातर खबरें या तो गैरजरूरी होती हैं, या इनकी रिपोर्टिंग में एक तटस्थ विश्लेषण के बजाय संबंधित व्यक्ति का आग्रह हावी रहता है। रामकथा से संबंधित ताजा विवाद में भी यह साफ-साफ देखा गया कि कैसे किसी मामले को जबर्दस्ती खबर बना कर उसे इस हद तक संवेदनशील बना दिया गया कि कट्टरपंथी और सांप्रदायिक गुटों को अपनी रोटी सेंकने का मौका मिल गया।


Saturday, 29 March, 2008

सहर



क्या कौंधा कि उम्मीदों-सी नज़र हुई है,

ठहरे हुए समंदर में इक लहर हुई है।


बहुत दिनों तक मौसम ये मायूस रहा,

आंखें आज बहारों की मुंतज़र हुई हैं।


कांटों के ऊपर से कितने दिन गुजरे,

कितनी मुश्किल से मंजिल ये डगर हुई है।


आफ़ताब बन गए आज ये चांद-सितारे,

बहुत दिनों के बाद शाम ये सहर हुई है।


फिर से आए शाम, तो आए क्या ग़म है,

यों ही अब तक कहां हमारी सहर हुई है।

Thursday, 27 March, 2008

क्या हमें सभ्य कहलाना अच्छा नहीं लगेगा...?

अनिल चमड़िया



आखिर क्या कारण है कि भूमंडलीकरण की नीति की शुरुआत के साथ कई विकसित देशों ने उन देशों से माफी मांगने की जरूरत महसूस की जहां की जातियों को उनके दुर्व्यवहार और भेदभाव की नीति का शिकार होना पड़ा है। 1990 में पूर्वी जर्मनी की ससंद ने इस्राइल से यहूदियों की प्रताड़ना के लिए माफी मांगी। सोवियत संघ ने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जेलों में बंद हजारों अधिकारियों को मारने के बाद जंगल में दफना दिए जाने के लिए माफी मांगी। 1998 में कनाडा ने अपने मूल निवासियों से माफी मांगी जिसकी संस्कृति को नष्ट-भ्रष्ट करने के लिए सरकार योजनाएं बनाती रही है। यहां तक कि 1992 में दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति एफडब्ल्यूडी क्लार्क ने तीन करोड़ काले लोगों पर पचास लाख गोरों के शासन के लिए, काले लोगों को दशकों तक प्रताड़ित करने की नीति जारी रखने के लिए माफी मांगी। भारत में जालियांवाला बाग कांड के लिए ब्रिटेन की प्रधानमंत्री मार्ग्रेट थेचर ने इसी दौर में अमृतसर आकर डायर के, ब्रिटिश सरकार के इस कुकृत्य के लिए माफी मांगी।
इसकी सबसे ताजा कड़ी 13 फरवरी को आस्ट्रेलिया में देखने को मिली जहां लेबर पार्टी के प्रधानमंत्री केविन रड ने कैनबरा की गणतांत्रिक संसद में खड़े होकर देश के मूलवासी आदिवासियों के साथ अब तक की दमनकारी संस्कृति और नीति के खिलाफ 'राष्ट्रीय माफी' मांगी। आस्ट्रेलिया मानव सभ्यता के इतिहास का सबसे पुराना दस्तावेज है। भारत की तरह वहां सत्रहवीं सदी की शुरूआत में ब्रिटिशों ने अपना कब्जा जमाना शुरू किया और तब से इन आदिवासियों के खिलाफ लगातार दमन, अत्याचार, रंगभेदी अमानवीय व्यवहार जारी है। शुरूआती दौर में तो ब्रिटेन से अपराधियों को बतौर सजा यहां भेजा जाता था, ताकि वे आदिवासियों के खिलाफ गुंडई कर सकें। गोरे मर्दों के संबंध से जो आदिवासी महिलाएं बच्चे को जन्म देती उन बच्चों को उठा कर ले जाया जाता था। उन बच्चों के साथ हर संभव अत्याचार होते थे। 1910-70 तक तो इस चुराई जाने वाली पीढियों के साथ खुलेआम कुकर्म होते रहे और किसी भी 'सभ्य सरकार' ने उसका विरोध नहीं किया।


पिछले चुनाव में लेबर पार्टी ने चुनावी घोषणा पत्र में उन आदिवासियों से राष्ट्र की तरफ माफी मांगने का वायदा किया और उसे इसका समर्थन मिला। 13 फरवरी को सार्वजनिक तौर पर माफी मांगे जाने की घटना के समय जॉन हार्वड को छोड़ कर देश के सभी जीवित प्रधानमंत्री मौजूद थे। कंजरवेटिव पार्टी के 1975-83 तक प्रधानमंत्री रहे मैलकालन फ्रेजर ने तो यह अफसोस जाहिर किया कि काश वे खुद ये काम कर पाते। मौजूदा प्रधानमंत्री तो रो पड़े। लेकिन उन्होंने जो कहा वह महत्वपूर्ण है। उनके अनुसार यह माफी आस्ट्रेलिया के इतिहास में एक नये युग का सूत्रपात करेगी। उनके अनुसार देश के उन सभी लोगों के एकजुट होने का अब समय आ गया है जो आस्ट्रेलिया के मूल निवासी हैं या मूल निवासी नहीं रहे हैं। इस दृश्य को देखने के लिए वंचित और दमित समाज हजारों किलोमीटर चल कर संसद तक पहुंचे थे। यह दुनिया भर में जातियों के खिलाफ शासक जातियों और वर्गों द्वारा माफी मांगने की एक नई मिसाल है। अगर इतिहास के जानकार जिन अन्य माफियों के लिए अपेक्षा करते हैं और उनमें अभी तक जो सामने नहीं आई है, तो वह है अमेरिका द्वारा रेड इंडियन से माफी मांगना। विश्व स्तर पर माफीनामे की कड़ियों को विश्लेषित किया जा सकता है। भूमंडलीकरण के दौर में शासक उन घावों को भरने की कोशिश कर रहे हैं जो संबंधों को सहज करने में बाधा होता है। लेकिन यह किसी देश द्वारा किसी बाहरी समाज से संबंध बनाने तक ही सीमित नहीं है बल्कि अपने आप को मजबूत करने के लिए अंदरूनी तौर पर भी संबंधों की खाई पाटना जरूरी लगता है। आस्ट्रेलिया अपने देश के मूल निवासियों से माफी मांगकर उन्हें बराबर की हिस्सेदारी देने के लिए खुद को तैयार कर रहा है। अपने देश में शासकों द्वारा अतीत के कुकृत्यों के लिए ही माफी मांगते नहीं देखा जाता है जबकि हाल के दिनों में लंदन और आस्ट्रेलिया में सरकारों ने अपने तंत्र द्वारा निर्दोषों की गिरफ्तारी या हत्या के लिए भी बाकायदा माफी मांगी। इस नजरिये से इन घटनाक्रमों को देखा जा सकता है। एक तो भूमंडलीकरण के दौर में ऐसे देशों की सरकारों ने रणनीति के तौर पर अतीत की गलतियों को सुधारने का प्रयास किया है, लेकिन ऐसी रणनीति को स्वीकार्य बनाने के लिए सांस्कृतिक बाधाओं को तोड़ना और जड़ता पर हमला जरूरी होता है। क्या ऐसे देशों और शासकों को उनके यहां के वैचारिक आंदोलनों की पृष्ठभूमि इसकी इजाजत देती है? वे अपने देश में जातियों के बीच के भेदभाव को दूर करने का साहस उसी पृष्ठभूमि से प्राप्त कर रहे हैं। भारत जैसे देशों के इतिहास के बारे में यह सर्वविदित है कि यहां के गहरे जातीय भेदभावों और शासक जातियों के अत्याचार की वजह से, आपसी बंटवारे ने विदेशी शासकों को अपनी जड़ें जमाने का यहां मौका दिया। सांस्कृतिक वर्चस्व रखने वाली जातियों की तरह आधुनिक राजनीतिक राष्ट्र-राज्य व्यवस्था के शासकों ने भी भेदभाव को बढ़ाने की नीतियां ही जारी रखीं। क्या अपने यहां की वैचारिक पृष्ठभूमि अपने कुकृत्यों को स्वीकार करने और फिर माफी मांगने के साहस की ही इजाजत नहीं देती है? यह कैसी जड़ता है? अपने भारतीय समाज में बार-बार कुकृत्यों को भूल जाने की सलाह दी जाती है और वह भी इस तरह से कि कुकृत्यों के दोबारा अंजाम देने की स्थितियां बनी रहें। कोई ऐसा कुकृत्य बताया जाए जो विदेशियों के देश से जाने के बाद भी पिछले पचास वर्षों से बार-बार देखने को नहीं मिलता हो? बजाय इस जड़ता को तोड़ने के हम कितने शर्मनाक तरीके से अपने समाज की जातियों पर ही यह आरोप लगाते हैं कि उन्होंने विदेशियों का साथ दिया। अपने अपने लिए विदेशियों की खोज में जातियां लगी रहती हैं।


हर स्तर पर समाज पर वर्चस्व रखने वाला समूह ऐसे किसी भी माफीनामे का विरोध करता है जो कि उसके वर्चस्व को खत्म करने में कोई भूमिका अदा करता हो। आस्ट्रेलिया में भी यह देखने को मिला। गौरतलब है कि नई पूंजी वाला मीडिया इसमें बड़ी भूमिका अदा कर रहा है। प्रधानमंत्री केविन रड ने जब संसद के पटल पर माफीनामा रखा था तो आस्ट्रेलिया के मीडिया में कोई उत्साह नहीं था। दूसरे दिन माफीनामे को सुनने के लिए उमड़ती भीड़ को देख कर चैनलों ने उसका सीधा प्रसारण तो किया लेकिन इस तरह के विचारों को ही ज्यादा जगह दी जिसमें इस तरह के माफीनामे की जरूरत नहीं बताई गई और न आदिवासी इलाकों में किसी परिवार के साथ उनके दुर्व्यवहार को दिखाया। यही रुख नई पूंजी वाला भारतीय भाषाओं का मीडिया का है। भारत के मीडिया के बड़े हिस्से में आमतौर पर वंचितों को न्याय देने की नीति के वक्त यही प्रवृत्ति दिखाई देती है। भाषाई मीडिया ने भी आस्ट्रेलिया की इस घटना को प्रचारित करने से परहेज किया। लेकिन भारत में सामाजिक, धार्मिक और क्षेत्रीय स्तर की जातियों के साथ कुकृत्यों से माफी मांगने और उन्हें न्याय के समान स्तर पर लाकर खड़ा करने से ऐसे कितने दिनों तक रोका जा सकता है? भारतीय समाज में माफीनामा आंतरिक ऊर्जा का स्रोत है जिसकी ताकत को सार्वभौमिक एवं आत्मनिर्भर राष्ट्र निर्माण में लगाया जा सकता है।