Wednesday 15 May 2013

एक थी डायनः बर्बरता की संस्कृति की आपराधिक दुकानदारी...





अंधविश्वास के अंधकार में...



त्रासद अंधेरे की आग...

दो साल पहले गांव गया था तो एक दिन पड़ोस में रहने वाली एक तकरीबन सत्तर-बहत्तर साल की वृद्ध महिला घबराई हुई मेरे घर में घुसी और कमरे में रखी चौकी के नीचे बिल्कुल कोने में दुबक गई। इससे पहले उसने मेरे सामने हाथ जोड़ कर गिड़गिड़ाते हुए कहा था कि "बउआ रे बउआ, हम कुछो न कलियइ ह...!" (मैंने कुछ नहीं किया है। मुझे बचा लो।)

मैं कुछ समझ पाता, इससे पहले उस वृद्ध महिला के घर के सामने गली से जोर-जोर से गाली-गलौच की आवाज आने लगी। निकला तो देखा कि लाठियों से लैस दर्जनों लोग मां-बहन की वीभत्स गालियां बकते हुए वृद्धा को घर से निकालने की मांग कर रहे थे। उन सबका कहना था कि वे उस महिला का सिर मूंडेंगे, उसे पाखाना पिलाएंगे, तभी आगे की बात होगी।

वहीं जमी भीड़ में से एक व्यक्ति से मैंने पूछा कि क्या हुआ है तो उसने बताया कि चौक पर वीरेंद्र शर्मा की मिठाई की दुकान है। वहीं चूल्हे पर बड़ी-सी कढाई चढ़ी थी जिसमें तेल था। "भगवानपुर वाली" (वृद्ध महिला) ने हलवाई से कहा कि आज क्या बना रहे हो, कढ़ाई में तेल ज्यादा है। यह कह कर वह वहां से चली गई। इसके बाद कढ़ाई में फटाक-फटाक की आवाज के साथ तेल चारों तरफ उड़ने लगा। दो लोगों के हाथ और गाल पर पड़ गया, जिससे फफोले निकल आए। उसने यह भी बताया कि भगवानपुर वाली "डायन" है और वही कुछ जादू-टोना करके चली आई थी।

लोग बहुत ज्यादा तैश में थे। मैंने उन्हें शांत करने की कोशिश की, लेकिन उनमें से कुछ ने मुझे धमकाना शुरू किया। हार कर मैंने कहा कि ठीक है, मैं पुलिस को फोन करता हूं। इसके बाद अचानक लोग छंटने लगे। तब मैंने जोर से चिल्ला कर धमकी दी कि अगर इस बुजुर्ग महिला को कोई भी नुकसान हुआ तो सबको जेल भिजवा दूंगा। थोड़ी देर में सभी वहां से चले गए। उनमें से कुछ लोग मुझे गालियां भी दे रहे थे।

कितने त्रासद अंधेरे में मरने-सड़ने के लिए छोड़ दिया दिया गया है उन लोगों को जो इतना भी समझ सकने लायक नहीं हैं कि पानी से भीगे ठंडे बर्तन में तेल डाल कर चूल्हे पर चढ़ा देने और बर्तन के गर्म होने पर फटाक-फटाक की आवाज के साथ पानी उड़ेगा ही। उनकी बेअक्ली की सजा एक कमजोर बुजुर्ग महिला को भुगतनी पड़ेगी, जिसे "डायन" मान लिया गया है।

महज संयोग से उस दिन मेरी वजह से भगवानपुर वाली बच गई। लेकिन ऐसी खबरें आम हैं, जिसमें किसी महिला को डायन कह कर सार्वजनिक रूप से निर्वस्त्र कर समूचे गांव में घुमाया गया, जबर्दस्ती पाखाना खिलाया गया, या फिर उसकी हत्या कर दी गई।

मैं अपने में घर लौटा। वह वृद्ध महिला मेरे गले लग कर जोर से रो पड़ी और बार-बार यह कहने लगी कि "बउआ रे बहुआ..., हम कुछो न कलियइ ह...!" वह थर-थर कांप रही थी और मेरी आंखों से आंसू निकल पड़े। गुस्सा इतना ज्यादा था कि लग रहा था कि "डायन" का खयाल पैदा करने या उसे बनाए रखने के जिम्मेदार लोग मिल जाएं तो उन्हें जिंदा जला दूं।

हां, उन धर्माधीशों, पंडों, गुरुओं, महंथों, ओझाओं और तांत्रिकों को, जिन्होंने दिमागी अंधापन फैला कर मर्दवाद और ब्राह्मणवाद की अपनी दुकानदारी बनाए रखने के लिए एक मोहरा "डायन" को भी बनाया था। सदियों पहले अपने जो एजेंट उन्होंने समाज में छोड़े थे, वे आज भी बड़ी शिद्दत से उनके उस अपराध और कुकर्म की परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। कोई यह दलील न दे कि "डायन" की धारणा एशिया-अफ्रीका से लेकर यूरोप तक के समाजों में भी पाई जाती है, फिर इसके लिए ब्राह्मणवाद पर सवाल क्यों? सभी समाजों के अपने-अपने ब्राह्मणवाद हैं और अपने मूल व्यवहार में वे वही हैं। बस सबकी शक्ल थोड़ी अलग-अलग होती है। जहां भी पारलौकिक हवाई घोड़े, भगवान या धर्म की व्यवस्था के जरिए समाज के मुट्ठी भर लोगों के शासन, मजे और ऐय्याशी के इंतजाम होंगे, वहां शासितों को काबू में रखने के लिए "डायन" जैसे तमाम अंधविश्वासों के इंतजाम भी होंगे।

अंधविश्वासों के जहरीले दलाल...

बहरहाल, उसी छल आधारित व्यवस्था के बहुत सारे नए और आधुनिक दल्लों में विशाल भारद्वाज और एकता कपूर भी हैं, जिन बेईमान पाखंडियों (संदर्भः विशाल भारद्वाज की "मकड़ी") को "एक थी डायन" फिल्म की दुकानदारी से पहले शायद एक बार भी यह खयाल नहीं आया होगा कि यह एक शब्द "डायन" किसके लिए और कितनी बड़ी त्रासदी रहा है।

हालांकि जब आप किसी को दुकानदार कहते हैं तो यह मान लेना पड़ता है कि मुनाफा कमाना उसका "धर्म" है। लेकिन क्या किसी दुकान से कोई सामान खरीदते हुए कोई व्यक्ति मुफ्त में अपने खाने के लिए जहर भी लेता है? अगर उसे पता हो तो वह कतई ऐसा नहीं करेगा।

तो "एक थी डायन" के जरिए विशाल भारद्वाज और एकता कपूर ने इसके अलावा और क्या किया है कि मनोरंजन के बहाने अंधविश्वासों के जहर के असर को थोड़ा और गहरा किया है। पहले से ही गैरजानकारी या अज्ञानता के अंधेरे में डूबते-उतराते दर्शक वर्ग की चेतना को थोड़ा और कुंद किया, जो आखिरकार यथास्थितिवाद को बनाए रखने का सबसे बड़ा हथियार है।

कोई यह दलील दे सकता है कि एकता कपूर या विशाल भारद्वाज ने कोई पहली बार इस तरह की फिल्म नहीं बनाई है। हो सकता है, यह सही हो। इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक में जब दुनिया के वैज्ञानिक ब्रह्मांड की गुत्थियों को खोलने के करीब पहुंच चुके हैं, बॉलीवुड ही नहीं, हॉलीवुड में भी धड़ल्ले से भूत-प्रेत या शैतान की कहानियों पर फिल्में बनाई जा रही हैं। मगर रामसे बंधुओं से लेकर आज तक की तमाम हॉरर फिल्मों का हवाला होने के बावजूद विशाल भारद्वाज और एकता कपूर की "एक थी डायन" भारतीय संदर्भों में ज्यादा आपराधिक है, बनिस्बत इसके कि वह कुछ "मनोरंजन" करती है। किसी शातिर चोट्टे ने "काला जादू और डायन" नाम की किताब लिखी और उसके सहारे चलते हुए किस्से में इन दोनों फिल्मकारों ने उन तमाम खामखयालियों की दुकानदारी की, जो "डायन" को लेकर एक अक्ल से हीन समाज में पाई जाती है। "डायन बारह बजे रात से अपनी तंत्र-साधना शुरू करती है; डायन के पांव उल्टे होते हैं; डायन अपने सबसे प्रिय बच्चे की बलि लेकर या उसे "खाकर" ही जिंदा रहती है...!!!" ये सारी बातें गांव से लेकर शहर-महानगर तक अनपढ़ या फिर पढ़े-लिखे चेतनाविहीन अक्ल के दुश्मनों की कल्पना में हर वक्त रहती हैं।




हाईटेक काहिली-जाहिली...

गांव में भगवानपुर वाली को "डायन" कह कर मारपीट पर उतारू वे लोग अनपढ़ और जाहिल थे। मगर इस मामले में शहरों-महानगरों के पढ़े-लिखों की क्या औकात है? कुछ साल पहले दुनिया के एक हाईटेक घोषित शहर गाजियाबाद की एक घटना चर्चा में आई थी। "ऊपरी असर" से परेशान तीन बेटों ने एक तांत्रिक का सहारा लिया, तांत्रिक ने "गहनतम" तंत्र-मंत्र साधना के बाद बेटों की अत्यंत वृद्धा मां को "डायन" घोषित किया और उसकी सलाह से बेटों ने मिल कर अपनी बेहद वृद्ध हो चुकी मां को चप्पलों से तब तक पीटा, जब तक उसकी मौत नहीं हो गई। बर्बरता और मूर्खता का सिर्फ अंदाजा लगाया जा सकता है। इन तीन बेटों में से एक डॉक्टर और एक इंजीनियर था। यानी विज्ञान की पढ़ाई-लिखाई भी उनकी अक्ल पर पड़े परदों को हटा नहीं सकी।

लेकिन इससे एकता कपूर या विशाल भारद्वाज को क्या फर्क पड़ता है। बल्कि यों कहें कि जिस त्रासदी के कायम रहने से ही एकता कपूरों और विशाल भारद्वाजों की दुकानदारी चमकती है, बल्कि इससे उनके सामाजिक सत्ताधारी वर्ग की सत्ता की कुर्सी के पाए और मजबूत होते हैं, उससे उन्हें क्या फर्क पड़ेगा। अब तो लगता है कि "एक थी डायन" जैसी तमाम फिल्में बनाने वाली एकता कपूरों और विशाल भारद्वाजों का मुख्य मकसद जितना इन फिल्मों से पैसा कमाना होता है, उससे ज्यादा ये उन साजिशों को अमल में लाने का जरिया होते हैं, जिनसे इस समूचे समाज को काहिली-जाहिली के अंधेरे में डुबोए रखा जा सके। "मकड़ी" के जरिए "चुड़ैल" की कल्पना के झूठ को सामने रखने वाले "विशाल" पर पता नहीं क्यों उनका "भारद्वाज" चढ़ बैठा और वे "एक थी डायन" के झूठ को बतौर सच पेश करने में लग गए जो एक मर्दवादी और ब्राह्मणवादी सत्ता और उसके प्रभाव को स्थापित करने और विस्तार देने के लिए रचा गया था।

लाचार मायावी-रूहानी ताकतें...

इस फिल्म में पहली "डायन" का नाम "डायना" रखने से लेकर बच्चे की बलि, चोटी में जान जैसे वे सभी तुक्के आजमाए गए और "डायन" के कुछ "करिश्मे" भी दिखाए गए जो एक पिछड़ी हुई चेतना के आम अंधविश्वासी के भीतर पाई जाती है। दिक्कत यह है कि जब इस तरह के खिलवाड़ को "आधुनिक" ट्रीटमेंट दिया जाता है, तो वह चुपके-से अपनी वास्तविक क्षमता के मुकाबले हजार गुणा ज्यादा घातक असर करता है। "एक थी डायन" में महानगर में रहने वाले एक उच्चवर्गीय परिवार में अपनी "मादकता" के सहारे घुसने वाली वह "डायन" पता नहीं उससे पहले मुंबई के ताज होटल में रहती थी या अमेरिका के ह्वाइट हाउस में...! इससे पहले उसे फिल्म के बच्चा बोबो जैसा "हीरो" मिला था या नहीं, जो चुटिया काट कर उसे खाक कर देता है। वही चुटिया, जिससे वह आखिर में चमत्कारी फंदे का काम लेती है! लेकिन वह चमत्कारी फंदा और तमाम चमत्कारी रूहानी शक्तियां उसकी जान बचाने के काम कहां आती हैं? उसकी तो चुटिया बस एक बच्चा बोबो के हाथों साधारण से चाकू से काट दी जानी है, उस खौफनाक और सबको हवा में नचा-नचा कर मारने वाली "डायन" की सभी रूहानी ताकतों को लाचार मुंह ताकते रह जाना है। ठीक उसी तरह, जैसे शहर से गांव तक में किसी लाचार और निचली कही जाने वाली जाति की महिला को "डायन" कह कर बाल मुंड़ दिए जाते हैं, दांत तोड़ दिए जाते हैं, पाखाना घोल कर पिला दिया जाता है, निर्वस्त्र करके पीटते हुए समूचे गांव या बस्ती में घुमाया जाता है या कभी जिंदा जला दिया जाता है, लेकिन "डायन" की "शैतानी" और "मायावी" शक्तियां उसकी कोई मदद नहीं करतीं!

विज्ञान के दुश्मन...

सवाल है कि इस महान सांस्कृतिक अनुष्ठान को अंजाम देने या इसके प्रति श्रद्धाभाव से भरे अक्ल के हीन लोगों के माइंडसेट में परदे पर आधुनिक स्वरूपा "डायन" और उसकी वही पुरानी "करस्माएं" और कैसा जहर घोलेंगी? यह साधारण-सा सच है कि पोंगापंथी, दिमाग से बंद, कूपमंडूक अंधविश्वासी पुजेड़ी जब यह देखता है कि भारत के अंतरिक्ष प्रक्षेपण अनुसंधान संगठन यानी इसरो का मुखिया विज्ञान पर केंद्रित किसी कार्यक्रम में शिरकत करते हुए या किसी उच्च क्षमता के अंतरिक्ष यान के प्रक्षेपण से पहले घंटों किसी मंदिर में घंटा डोलाता है तो उसे कैसा लगेगा? एक औसत दिमाग का आदमी भी यह समझ सकता है कि इस तरह के उदाहरण एक अंधविश्वासी मन की कुंठाओं, हीनताओं और विकृतियों को "जस्टीफिकेशन" देते हैं। बल्कि मेरा दावा है कि इससे किसी भी पोंगापंथी व्यक्ति के भीतर मौजूद अंधविश्वासी पगलापन एक सबसे मजबूत खुराक पाएगा और वह किसी को भी अंगुली दिखा कर कह सकता है कि जब माधवन नायर या राधाकृष्णन जैसे इसरो अध्यक्ष और विज्ञान के पहरुए मंदिर में घंटा हिला कर अंतरिक्ष यानों का कामयाब प्रक्षेपण सुनिश्चित करते हैं तो हम तो सिर्फ "भगवान" की एक "सामान्य व्यवस्था" को ही निबाहते हैं, "डायन" को निर्वस्त्र करके घुमाते हैं, मैला पिलाते हैं या उसे उसकी "हैसियत" दिखाते हैं!


"एक थी डायन" जैसी फिल्में उसी इसरो अध्यक्षों जैसी भूमिका बनाते हैं, जिनमें विज्ञान और आधुनिक तकनीकी के जरिए उन तमाम खयाली घोड़ों और हवा-हवाई बातों को मूर्त देकर परदे पर पेश किया जाता है और पहले से ही चारों तरफ से अंधे विश्वासों में मरता-जीता उसका एक आम दर्शक "डायन" के झूठ को थोड़ा और साकार रूप देने लगता है। इसकी वजह भी वही "जस्टीफिकेशन" है जो विज्ञान और तकनीकी के जरिए उसके सामने साकार की गई, लेकिन जिसका कोई भी आधार नहीं है। और "डायन" अब तक सिर्फ उसकी धारणा थी। (आखिर एक अंधविश्वासी व्यक्ति भी विज्ञान की ताकत को तो समझता ही है।) उन धारणाओं में जो भी बातें शामिल थीं, एकता कपूर और विशाल भारद्वाज ने उन सबका शोषण किया और परदे पर बेचा। ऐसे व्यापारियों को इस बात से कोई मतलब नहीं होता कि "डायन" की समूची कल्पना किस कदर आज भी महिलाओं और खासतौर पर दलित-जनजातीय या निचली जाति की कितनी महिलाओं के लिए त्रासदी की वजह बन चुकी है, या बन रही है। सामाजिक सत्ताधारी वर्गों के मूल से उपजे इन व्यापारियों को इस बात की फिक्र आखिर हो भी क्यों? जो समस्या अपने या अपने वर्गों के सामने होती है, फिक्र उसी की की जाती है!

इस फिल्म की साजिश सबसे ज्यादा खुल कर तब सामने आती है जब इसमें एक पात्र के रूप में मौजूद मनोवैज्ञानिक या मनोचिकित्सक को पहले "डायन" को खारिज करते और फिर उसी "डायन" की मायावी ताकत के जरिए बुरी तरह मारे जाते दिखाया जाता है। यानी अंधविश्वासों के खिलाफ लड़ाई के लिए जो सबसे मजबूत तर्क मनोविज्ञान मुहैया कराता है, उसे हारता हुआ, अंधविश्वासों के सामने, उसके हाथों मुंह की खाता हुआ दिखाया जाए। कल्पना करिए कि एक औसत दिमाग और अपने घोर अंधविश्वासों-पूर्वाग्रहों के साथ सिनेमा हॉल में बैठा दर्शक किसी भी इस तरह की कहानी के इस पहलू से किस तरह प्रभावित होगा। यानी, लोग अंधविश्वासों के अंधेरे में डूबते-उतराते रहें, समाज की यथास्थिति बनी रहे, इसके लिए एकता कपूर या विशाल भारद्वाज जैसे धनपशुओं ने एक जड़ व्यवस्था के संचालकों-कर्णधारों की दलाली में निर्लज्जता की सारी सीमाएं तोड़ दीं।

"डायन" वही क्यों...

दरअसल, "एक थी डायन" में एकता कपूर और विशाल भारद्वाज का पूरा "लोकेशन" बिल्कुल साफ है। उनकी फिल्म का पुरुष जादूगर है, जो सिर्फ सबका मनोरंजन करता है, किसी को नुकसान नहीं पहुंचाता। दूसरी ओर, फिल्म में मुख्य रूप से तीन स्त्री पात्र हैं जिनमें दो साफ तौर पर "डायन" हैं, तीसरी "लगभग" "डायन" के रूप में दर्शकों के लिए खुला अंत छोड़ जाती है। फिल्म में "डायन" का स्वरूप वही है, जो गांव-शहर के अंधविश्वासी लोगों के दिमाग में पाया जाता है। यानी वह सिर्फ नुकसान पहुंचा सकती है। यानी जादूगर के रूप में पुरुष मनोरंजन करता है, तांत्रिक के रूप में वह ("डायन" के) "ऊपरी" हमलों से बचाता है। दिलचस्प है, जादू-टोना करने वाली स्त्री बच्चों को "खा" जाने वाली "डायन" हो जाती है और जादू-टोना अगर पुरुष करेगा तो वह तांत्रिक होगा। और तांत्रिक होना बचाने वाले की भूमिका है।



पितृसत्ता, पुरुषवाद और ब्राह्मणवाद के खेल बड़े निराले हैं। इस खेल में यह कोई नहीं पूछता िक इस साजिश का शिकार हमेशा और सौ फीसद स्त्री ही क्यों होती है? और किसी अजूबे अपवाद को दलील के तौर पर पेश न किया जाए तो "डायन" स्त्री हर बार दलित या निचली कही जाने वाली जाति की ही क्यों होती है?

तो...! एक व्यापक की त्रासदी को खत्म या कम करने की औकात विशाल भारद्वाज या एकता कपूर के पास नहीं है, तो उस दुख को मनोरंजन बना कर बेचना और इस तरह "डायन" की झूठी अवधारणा को आधुनिक तकनीकी के जरिए मूर्त बना कर पेश करने का उन्हें क्या हक है? क्या उन्हें यह मामूली बात समझ में नहीं आती कि समाज का माइंडसेट या मानस तैयार करने या उसे बनाए रखने में आज का सिनेमा कितनी अहम भूमिका में आ चुका है? अगर वे सब कुछ जानते-समझते हैं तो क्या वे ऐसा जान-बूझ कर रहे हैं?

व्यवस्था के शातिर और छिपे हुए अपराधियों ने कभी आम जन की मजबूरी और उनके अज्ञान का फायदा उठा कर "डायन" की कल्पना को सामाजिक धारणा के रूप में स्थापित किया होगा। तब किसी अकेली या संपत्ति की वारिस स्त्री पर अत्याचार ढाने या उसे लूट लेने के लिए उस काल्पनिक सामाजिक धारणा में कहानियां गूंथी गई होंगी और फिर जनमानस में उसका प्रचार किया गया होगा। आज के दौर में "एक थी डायन" जैसी तमाम व्यवस्थावादी फिल्में समाज में यही भूमिका निभा रही हैं।

राजनीति का परदा...

अब यह किसी से छिपा नहीं है कि पिछले कुछ सालों में समाज में सोचने या विश्लेषण करने की प्रक्रिया को बाधित करने,  अंधविश्वास फैलाने, स्त्री की स्थिति को हीनतर बनाने, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण या आम लोगों के सांप्रदायीकरण के एजेंडे पर फिल्में बन रही हैं। और अगर इसमें कोई दक्षिणपंथी कट्टर धार्मिक समूह बड़े पैमाने पर पैसा लगा रहा हो तो हैरान होने की बात नहीं होगी। अंधविश्वासों को विस्तार देना या धार्मिक-सामाजिक और लैंगिक पूर्वाग्रहों-विद्रूपों को मजबूत करना यथास्थितिवाद की नियामक ताकतों की असली राजनीति है। और चूंकि एक सबसे ज्यादा असर डालने वाले "मनोरंजन" कला माध्यम के रूप में सिनेमा की आम जनता के बीच व्यापक पहुंच है, इसलिए अथाह पैसा लगा कर इसे नियंत्रित और अपने मुताबिक संचालित करने की कोशिशों की रफ्तार बहुत तेज है। शीतयुद्ध के दौरान और आज भी खासतौर पर अमेरिका ने दुनिया के मानस तैयार करने के लिए फिल्मों का कैसा इस्तेमाल किया है, यह किसी से छिपा नहीं है।

मुश्किल यह है कि अगर कोई व्यक्ति सिनेमा के सामाजिक पहलू या सिनेमा के सामाजिक असर की बात करता है तो व्यवस्थावादियों की ओर से एक झटके में उसे शुद्धतावादी घोषित कर दिया जाता है। दलील दी जाती है कि सिनेमा बदलते सामाजिक ढांचे और भावनाओं को दर्शाता है, और समाज में बदलाव से ही सिनेमा में बदलाव आते हैं। फिलहाल सिर्फ "एक थी डायन" का ही संदर्भ लें तो क्या सच केवल यह है कि समूचा समाज आज भी "डायन" की गिरफ्त में है और उसी की गिरफ्त में रहना चाहता है? क्या "डायन" प्रथा के खिलाफ कहीं भी कोई स्वर नहीं है? क्या अंधविश्वासों के बरक्स विज्ञान और तर्क इस समाज में बिल्कुल अनुपस्थित है? सिनेमा में समाज का यथार्थ परोसने के नाम परोसा गया विभ्रम ऐसे ही विद्रूप रचता है।

दरअसल, सिनेमा के समाज के हिसाब से चलने की बात इतनी चालाक दलील है कि इसके सहारे वे एक जड़ व्यवस्था को बनाए रखने में एक कला-माध्यम के इस्तेमाल करने के अपने तमाम कुकर्मों को ढकना चाहते हैं। क्या किसी समाज का अध्ययन और उसके निष्कर्ष उसे टुकड़ों में बांट कर देखने से सही-सही सामने आएगा? सेलेक्टिव तरीके से एक व्यापक जनसमुदाय के बीच जड़ता को बनाए रखने के इन अपराधियों की इस बेहद उथली साजिश को समझना इतना मुश्किल नहीं है, बस इनकी बोलियों के हर्स्व और दीर्घ मात्राओं पर ध्यान रखिए...!

मधुमाला देवी की अदालत में...

थोड़े समय पहले बिहार से एक खबर आई कि मधेपुरा जिले के एक गांव मिठाही की मुखिया ने यह घोषणा की कि समूचे पंचायत क्षेत्र में अगर किसी ने किसी महिला को "डायन" कहा तो उसे इक्कीस सौ रुपए जुर्माना देना होगा। गांव में रहने वाली, कम पढ़ी-लिखी, कम आधुनिक और कम पैसे वाली मधुमाला देवी संघर्ष के बाद पंचायत की मुखिया के एक छोटे-से पद पर किसी तरह पहुंचते ही इतना बड़ा क्रांतिकारी फैसला लेती है। लेकिन बहुत पढ़ी-लिखी, बेहद धनाढ्य, "अति आधुनिक" एकता कपूर और बौद्धिक परदाधारी विशाल भारद्वाज अक्ल से पैदल या शातिर पंडों-तांत्रिकों की साजिश के नतीजे में उपजी "डायन" के सिर पर एक हथौड़ा और मारते हैं। पद और हैसियत का इस्तेमाल मधुमाला देवी ने भी किया है और एकता कपूर और विशाल भारद्वाज ने भी। मगर मधुमाला देवी के बरक्स एकता कपूर और विशाल भारद्वाज को कैसे देखा जाए? क्या एकता कपूर और विशाल भारद्वाज को मधुमाला देवी की पंचायत-अदालत में खड़ा करके इक्कीस सौ रुपए जुर्माने के अलावा और सख्त सजा देने की जरूरत नहीं है? अगर "एक थी डायन" जैसी फिल्मों के जरिए समाज की मूर्खता और हजारों स्त्रियों की त्रासदी की दुकानदारी करने वाली एकता कपूरों और विशाल भारद्वाजों को जेल में बंद करने के लिए कोई कानून नहीं है तो भारत सरकार से मैं मांग करता हूं कि वह इस मसले पर सख्त से सख्त कानून बनाए और ऐसे तमाम एकता कपूरों और विशाल भारद्वाजों को गिरफ्तार करके जेल में सड़ने के लिए छोड़ दे, क्योंकि "एक थी डायन" के जरिए इन लोगों ने वैसे ठगों, बाबाओं और तांत्रिकों से अलग कोई काम नहीं किया है जो समाज को दिमागी तौर पर अंधा और चेतना से हीन बनाए रखने के अपराधी हैं...!

Wednesday 24 April 2013

हां, ऑनरेबल कबीर, यह टुकड़ों में बंटे समाज का सच है...!!!



इस साल एक जनवरी से पंद्रह अप्रैल तक अकेले दिल्ली में चार सौ तिरेसठ बलात्कार की घटनाएं पुलिस में दर्ज हुईं, इनमें दो सौ अड़तीस नाबालिग या बहुत कम उम्र की बच्चियां हैं। (बलात्कार के मामले दर्ज न होने की स्थितियों के बारे में तो शायद अब बात करना भी बेमानी है।) लेकिन पांच महीने के भीतर यह सिर्फ दूसरी बार है, जब दिल्ली की घटना के बाद दिल्ली और देश के दूसरी राज्य-राजधानियों में गम और गुस्सा उमड़ा है। जो हो, इससे यह उम्मीद बंधी है कि कभी न कभी इस आक्रोश में मुजफ्फरपुर के गांव मंडई की सकली देवी जैसी तमाम महिलाओं और देश के दूरदराज के इलाकों में मासूम बच्चियों के साथ हुई वीभत्सता और बर्बरता की पीड़ा को भी जगह मिलेगी। यह एक मांग भी है, क्योंकि जो अगुवा होते हैं, अगर वे किसी की अनदेखी करेंगे तो उनसे अपने लिए किसी जगह या सम्मान की उम्मीद करने का उन्हें हक नहीं है और उनकी प्रतिबद्धता पर सवाल उठेंगे...!!!

पिछले महीने महिला दिवस के मौके पर सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश अल्तमस कबीर ने इस देश के बेईमान मध्यवर्ग और सत्ता-केंद्रों के खिलाफ एक जलता हुआ सवाल उछाला। उन्होंने कहा कि पिछले साल दिल्ली में सोलह दिसंबर को सामूहिक बलात्कार की बर्बर घटना दुखद जरूर थी, लेकिन यह ऐसा कोई अकेला मामला नहीं है। जिस दिन यह वारदात हुई उसके अगले दिन मीडिया की सुर्खियों में घटना के खिलाफ चीख-चीख कर आक्रोश जाहिर किए जा रहे थे। लेकिन उसी दिन दस साल की एक मासूम दलित बच्ची के साथ भी सामूहिक बलात्कार किया गया, फिर उसे जिंदा जला दिया गया। मगर इस घटना को चुपके से दबा दिया गया, या फिर अंदर के पेज पर पांच से दस लाइनों में समेट दिया गया। दिल्ली में सामूहिक बलात्कार की दिवंगत पीड़ित के परिवार को सरकार के साथ-साथ दूसरे कई पक्षों ने भी भारी मुआवजा और मदद दी, लेकिन उस मासूम छोटी-सी बच्ची के लिए क्या किया गया?

भारत के चीफ जस्टिस के इस सवाल का जवाब इस देश की सरकार, समाज और मीडिया के भाग्य-विधाताओं के पास शायद होगा, मगर वे कुछ नहीं बोलेंगे। लेकिन ऑनरेबल जस्टिस अल्तमस कबीर... मैं आपके इस सवाल का जवाब देना चाहता हूं। हां, जस्टिस कबीर... ऐसा इसलिए, क्योंकि इस देश में बलात्कार और बलात्कार में फर्क है।


इस देश के सत्ताधारी सामाजिक वर्गों की महिला के खिलाफ यौन हिंसा की कोई घटना होगी तो राजधानी का राजपथ एक झटके में क्रांतिपथ की शक्ल में तब्दील हो जाएगा, लेकिन महिला किसी "नीच" कही जाने वाली जाति या वर्ग की हुई, तो जंतर-मंतर या इंडिया गेट पर मोमबत्तियां जलाना तो दूर, एक पल के लिए भी किसी को इस पर सोचना तक जरूरी नहीं लगेगा।

चुने हुए दुःख...

इस साल की होली गुजरे ज्यादा दिन नहीं बीते। मार्च के आखिरी दिनों में, जब यह हिंदू समाज होली की खुमारी उतारने में लगा हुआ होगा, बिहार के ही मुजफ्फरपुर में सकरा प्रखंड में मंडई गांव की सकली देवी (बदला हुआ नाम) अपने पति के साथ अपने एक संबंधी की मृत्यु के क्रिया-कर्म में शामिल होकर लौट रही थी, दोनों को घेर कर पति के हाथ-पैर बांध कर उसके सामने सकली देवी के साथ छह-सात लोगों ने सामूहिक बलात्कार किया, विरोध करने पर उसके पूरे शरीर को दांतों से काटा गया, भयानक यातनाएं दी गईं, और निजी अंगों में कपड़े, पत्थर, मिट्टी और कीचड़ डाल कर क्षत-विक्षत कर दिया गया और तड़पते हुए मरने के लिए छो़ड़ दिया गया। किसी तरह पति और कुछ लोग उसे अस्पताल ले गए। लेकिन जब तक उसकी जान जा चुकी थी।

पुलिस से लेकर अस्पताल तक में पोस्टमार्टम रिपोर्ट में घपले के जरिए रफा-दफा करने की तमाम कोशिशों के बावजूद एकाध जगह आधी-अधूरी खबर छप गई। जनवादी महिला समिति ने स्थानीय स्तर पर जरूर विरोध प्रदर्शन किया। लेकिन दिल्ली की घटना के बाद "देश" को आंदोलित कर देने वालों को मुजफ्फरपुर की घटना में कुछ भी ऐसा नहीं लगा कि वह उसे उतना ही महत्त्व दे। दिल्ली की घटना के बाद दिल्ली के राजपथ, जनपथ, इंडिया गेट या जंतर मंतर की क्रांति से देश और दुनिया को हिला देने वाले देश के श्रेष्ठिवर्ग, क्रांति का ठेका उठाने वाले मध्यवर्ग की छाती मंडई जैसे गांवों की सकली देवियों के दुःख से नहीं फटती।

मैंने दिल्ली की घटना के बाद आक्रोश और गुस्से से भरे स्त्री-पुरुषों को देखा था, कई-कई महिलाओं-युवतियों को हाथ में जलती मोमबत्ती लिए सचमुच के आंसुओं के साथ रोते देखा था। मीडिया किसके लिए आंदोलन को ताकत और प्रसार दे रहा था? हमारे देश के श्रेष्ठिवर्ग के लोग किसके लिए इतने आक्रोशित थे और मोमबत्ती थामे युवक-युवतियां किसके लिए रो रही थीं? दरअसल, ये लोग, इनके वर्ग सिर्फ "अपनों" को पहचानते हैं। और "अपनों" के साथ किसी भी तरह की त्रासदी घटे, दुख और गुस्सा लाजिमी है! वर्ग और अपनापे के साथ एक बड़ी शर्त यह है कि इस तरह की किसी घटना का दिल्ली में होना जरूरी है। मोहन भागवत जैसा आदमी यों ही यह मुनादी नहीं करता है कि बलात्कार शहरों-महानगरों में होता है, गांवों में नहीं। न मामला दर्ज होगा, न उसे गिना जाएगा।

बर्बरता के चेहरे... 

सकली देवी पर ढाए गए जुल्म का जितना ब्योरा सामने आ सका, उस घटना के दौरान के दृश्य की कल्पना भर समूची दुनिया का नाश कर देने के बराबर गुस्सा पैदा करती है। दिल्ली में सोलह दिसंबर को हुए सामूहिक बलात्कार की घटना के संदर्भ में सबसे ज्यादा जोर देकर यह कहा गया कि अपराधियों में से एक ने पीड़ित युवती के यौनांगों को लोहे के रॉड से क्षत-विक्षत कर दिया था। यह कुंठा, विकृति और वीभत्सता की पराकाष्ठा थी और यह अकेली वजह किसी संवेदनशील इंसान को अवसाद में डाल दे सकती है, या उसके गुस्से को बेलगाम कर दे सकती है। इसलिए दिल्ली के राजपथ से लेकर देश भर में जहां-जहां गुस्से का इजहार किया गया, वह किसी समाज के बचे होने का सबूत है।


लेकिन अपने बचे हुए का सबूत देने वाला वह समाज दरअसल किसका है? उसी दिन सामूहिक बलात्कार के बाद जिंदा जला दी गई दस साल की या सामूहिक बलात्कार के बाद हाथ और गर्दन तोड़ कर मार डाली गई आठ साल की बच्ची के मामले लोगों के गुस्से में शामिल क्यों नहीं हो सके? सकली देवी के साथ जो हुआ, बर्बरता की वह कौन-सी सीमा है, जिसे अपराधियों ने पार नहीं की? मगर तथाकथित मुख्यधारा के मीडिया के लिए यह बिकने वाली "चीज" नहीं थी। कुछ लोगों ने अपनी सीमा में इस खबर का प्रसार भी किया। इसके बावजूद मध्यवर्गीय और सामाजिक सत्ताधारी तबकों के साथ-साथ मीडिया का भी जमीर क्यों गहरी नींद में सोया रहा? कोई मुझे एक भी वाजिब वजह बताए कि सकली देवी के साथ जो हुआ, वह बर्बरता के पैमाने पर दिल्ली की घटना से कहीं ज्यादा वीभत्स होने के बावजूद नजरअंदाज करने लायक था!

चुप्पी की राजनीति और चु्प्पी की साजिश की परतें उधेड़ना कोई खेल नहीं है। जिस चुप्पी को "महानता" के पर्याय के तौर पर प्रचारित किया जाता है है, उसी हथियार से व्यवस्था पर काबिज वर्गों ने अपनी सत्ता को बनाए रखने के लिए बड़ी-बड़ी लड़ाइयां जीती हैं। इसीलिए सकली देवी के साथ जो हुआ, वह इन वर्गों के जमीर को झकझोर नहीं पाता और दिल्ली की घटना से उपजे आक्रोश से देश और यों कहें कि दुनिया हिल उठती है।

लेकिन सकली देवी कौन थी...!!!

लेकिन सकली देवी कौन थी? अपने इलाके में मनरेगा और पीडीएस, यानी जनवितरण प्रणाली में घोटालों के खिलाफ आवाज उठाने वाली सकली देवी कौन थी? समूचे बिहार के हरेक पंचायत में शराब के दो ठेके खोल कर "सुशासनी" सरकार ने स्थानीय समाज को जिन दुःशासनों की फौज के हवाले कर दिया है, उनके खिलाफ खड़ा होने वाली और शराब के ठेके बंद करने के आंदोलन में मुखर वह सकली देवी किसकी दुश्मन थी?


ऐसी कोई भी सकली देवी हर उस शख्स की दुश्मन होगी, जिसकी सामाजिक सत्ता को उससे खतरा पैदा होता हो। सामाजिक सत्ताधारी तबकों ने अपने असली चेहरे का खुलासा करने वाले अपनी ही जाति-वर्ग के किसी व्यक्ति को जिंदा जला कर मारा डाला है, फिर कोई दलित, और उसमें भी एक स्त्री यह हिम्मत कैसे कर सकती है? निचली कही जाने वाली जातियों के लिए उत्पीड़न और यातना की तय कर दी गई नियति के निशाने पर जब स्त्री आती है तो सबसे बेशर्म बर्बरताएं और वीभत्सताएं भी शर्म से पानी-पानी हो जाती हैं।

क्या यहां किसी को राजस्थान की वह साथिन भंवरी बाई याद आ रही है?

साथिन भंवरी की साथिन सकली...

साथिन भंवरी का भी कसूर क्या था, सिवाय इसके कि उसने अपने आसपास पिछड़ेपन, अशिक्षा और अज्ञान के अंधेरे में अपना वक्त काटते लोगों को थोड़ा हिलाने-डुलाने की कोशिश की थी? यह कोई मामूली खतरा नहीं था कि वे लोग नींद से जाग उठें, जिनका सदियों से सोए रहना ही इस समूची व्यवस्था के कायम रहने के लिहाज से ज्यादा बेहतर रहा है। इसलिए व्यवस्था के रखवालों ने पति के सामने भंवरी के साथ सामूहिक बलात्कार किया और एक तरह से भंवरी से उपजे "खतरों" को दफन करने की कोशिश की।

सकली देवी का "गुनाह" भी साथिन भंवरी के गुनाह जैसा था। कोई दलित और वह भी स्त्री अगर इस तरह के "गुनाह" करे तो उसके लिए वह सजा निर्धारित है जो भंवरी बाई को मिली, सकली देवी को मिली। भंवरी को जो सजा दी गई, वह उसके गांव के गुंडा सवर्ण सामंतों ने सुनाई थी तो भारत के कानून के मंदिरों में बैठे एक मनुपुत्र ने उससे भी बड़ा फैसला दिया था कि अगर एक ऊंची जात का आदमी किसी दलित को छू नहीं सकता तो उसके साथ बलात्कार कैसे कर सकता है! सकली देवी के साथ जो हुआ, उसके लिए स्थानीय पुलिस ने पहले उसके पति को ही गिरफ्तार कर लिया था। पति के हाथ-पांव बांध कर उसके सामने जिसके साथ सामूहिक बलात्कार किया गया, यौनांगों में पत्थर, कपड़े, मिट्टी, कंकड़ आदि डाल कर क्षत-विक्षत कर दिया गया, उसके बारे में पुलिस ने घोषणा की कि उसके साथ बलात्कार की पुष्टि नहीं हुई। अब हम अदालत से "इंसाफ" के फैसले की मुनादी का इंतजार करेंगे, जिसकी बुनियाद पुलिस की एफआइआर और प्राथमिक जांच रिपोर्ट होती है, जिसका इंतजाम पुलिस ने पहले ही कर लिया है।

मोहन भागवत जैसा आदमी यों ही यह मुनादी नहीं करता है कि बलात्कार शहरों-महानगरों में होता है, गांवों में नहीं। न मामला दर्ज होगा, न उसे गिना जाएगा।

बहरहाल, दिल्ली में सामूहिक बलात्कार की बर्बरता (वैसे बलात्कार अपने आप में क्या बर्बरता का पर्याय नहीं है?) के खिलाफ इस देश के सभ्य समाज और मीडिया ने राजपथ को क्रांतिपथ बना दिया, तो सकली देवी के साथ कहीं त्रासद पैमाने की बर्बरता (अगर बर्बरता ही पैमाना है तो...) और वीभत्सता से उस सभ्य समाज और मीडिया का दिल क्यों नहीं दहला? क्या इसलिए कि सकली देवी इन सबके लिए कहीं से भी "अपनी" नहीं थी? अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति ने मुजफ्फरपुर में जरूर एक सार्थक विरोध आंदोलन किया, पटना में भी धरना दिया और सकली देवी के परिवार को थोड़ी राहत दिला सकी। लेकिन दिल्ली की घटना के खिलाफ राजपथ पर आंदोलन का आगाज करने वालों में सबसे अहम भूमिका निभाने वाली एडवा को सकली देवी के मामले को लेकर दिल्ली में अब तक एक औपचारिक प्रतिरोध दर्ज करना जरूरी क्यों नहीं लगा? जबकि सकली देवी एक मामूली दलित महिला, भारत में एक कमजोर वर्ग की गरीब नागरिक थी, बल्कि जनवादी महिला समिति की सदस्य भी थी।

अपने-अपने लोग...

दिल्ली की दोनों घटनाओं पर आक्रोश की लहरें पटना की सड़कों पर भी उमड़ीं। कई महिला संगठनों ने पटना में दिल्ली की घटना पर गम और गुस्से का इजहार किया। इसके अलावा, एपवा, यानी अखिल भारतीय प्रगतिशील महिला संगठन एक जुल्मी विधायक की हत्या करने वाली रूपम पाठक की रिहाई के लिए अभियान चलाती है, मानव शृंखलाएं बनाती है, लेकिन उसकी नजर में सकली देवी की त्रासदी अनदेखा करने लायक क्यों थी? क्या इसलिए कि वह एपवा के बजाय एडवा की सदस्य थी? महिलाओं पर अत्याचारों के खिलाफ पटना की सड़कों पर सबसे मुखर दिखने वाली एपवा के लिए सकली देवी के साथ घटी घटना किस वजह से चुप रह जाने लायक थी? उससे यह मांग क्यों नहीं की जानी चाहिए कि रूपम पाठक के दुख के बराबर शिद्दत का प्रदर्शन वह सकली देवी के दुःख पर भी करती? किसी स्त्री पर ढाए गए जुल्म का विरोध करने के लिए अगर अपने समूह या वर्ग का चुनाव करना प्राथमिक शर्त है तो इंतजार करिए कि कब आपके वर्ग की कोई महिला दरिंदों का शिकार बने! फिर कोई आंदोलन खड़ा करिएगा और बताइगा कि आप दुनिया की महिलाओं के सम्मान, गरिमा और सुरक्षा की बहाली की लड़ाई लड़ रहे हैं।

दिल्ली में पांच साल की गरीब बच्ची के साथ हुई बर्बरता के बाद दिल्ली एक बार फिर खौली है। इस उबाल में सारे देश को शामिल होना चाहिए। जितना गुस्सा, सदमा और संवेदनाएं दिख रही हैं, उसे ज्यादा की जरूरत है। इस मामले में आरोपी पकड़ा गया। पुलिस वालों को धन्यवाद। विरोध में आंदोलन हो रहे हैं। आंदोलनकारियों को धन्यवाद! दुख जताने के लिए नरेंद्र मोदी के गुजरात के लिए भाड़े पर ब्रांड एंबेसडरी करने वाले अमिताभ बच्चन का भी धन्यवाद...! लेकिन जिस अपराधी के पकड़े जाने के बाद बिहार के मुजफ्फरपुर का नाम आज मशहूर हो गया है, महज एक पखवाड़े पहले उसी जिले के एक गांव मंडई में तो सकली देवी के साथ भी इससे ज्यादा बड़ी वीभत्सता हुई! मुजफ्फरपुर और मंडई का नाम किसने जाना? हां, याद आया! मुजफ्फरपुर पर चर्चा करने के लिए भी मुजफ्फरपुर का दिल्ली में होना जरूरी है...!!! वरना ऐसे तमाम मुजफ्फरपुर, सहरसा, बुलंदशहर, कैथल, करनाल, हिसार, जींद जैसे इलाकों की त्रासदी पर बात करना या उस पर उबलना गैरजरूरी है, क्योंकि वह दिल्ली नहीं है...!!!

खैरलांजी में वीभत्सता और बर्बरता का जो नंगा नाच हुआ था, उस जैसी तमाम घटनाएं घटती हैं और चुपचाप दफन कर दी जाती हैं। किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता। टुकड़ों में बंटे समाज की प्रतिक्रिया भी टुकड़ों में ही होगी। सभी अपने-अपने वर्गों की लड़ाई लड़ रहे हैं। इसमें जिस वर्ग के पास जितना ‘सामर्थ्य’ है, वह व्यवस्था पर उतना ‘सार्थक’ दबाव डाल पाता है। इसमें उन वर्गों की तकलीफ को व्यापक दुख के लायक नहीं समझा जाना स्वाभाविक है, जिनके पास न सत्ता-केंद्रों की ताकत है, न उनकी चीखें सुनने वाला कोई है।

टुकड़ों में क्रांति...

कुछ घटनाओं के चर्चित होने के बाद आंदोलन करते दिखते लोगों को अभी इस सवाल से जूझना बाकी है कि दहेज से लेकर दूसरे तमाम घरेलू हिंसा और भेदभाव और दोयम दरजे पर आधारित समूची सामाजिक दृष्टि ही जहां मीसोजीनिस्ट, यानी स्त्री विरोधी हो, वहां एक बलात्कार को स्त्री की कोई एकमात्र पीड़ा मान कर कैसे इसके खिलाफ लड़ा जाएगा और क्या हासिल कर लिया जाएगा। वैसे जिस सामाजिक ढांचे में हम रहते हैं, उसमें हिंसा की हाइरार्की पर अलग से बात करने की जरूरत है।

बहरहाल, जस्टिस कबीर ने दस साल की एक दलित बच्ची के बलात्कार और उसे जिंदा जला देने की घटना का जिक्र किया। सोलह दिसंबर के ही एक दिन बाद बिहार के सहरसा जिले के बेलरवा गांव में भी एक आठ साल की दलित बच्ची के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया, उसके पांव और गर्दन तोड़ दिए गए, फिर उसे मार कर एक पोखर में फेंक दिया गया। कहीं ज्यादा वीभत्सता और बर्बरता के बावजूद उसी दौरान बलात्कार के खिलाफ धधकती ज्वाला में इन बच्चियों की त्रासदी को रत्ती भर भी जगह देने लायक नहीं समझा गया। हाशिये के बाहर मर-जी रहे समुदाय की महिलाओं-बच्चियों के साथ ये बर्बरताएं रोजाना की हकीकत हैं, मगर हमारे "आंदोलनकारी" वीर-बहादुरों के लिए ये कोई मुद्दा नहीं है या फिर "सेलेक्टिव" होना उनकी मजबूरी है। और जाहिर है, फिर सरकार को इस बात की फिक्र क्यों होगी!

इस सवाल का जवाब वक्त मांगेगा कि दिल्ली की घटना के बाद राजधानी में राजपथ पर उमड़ी भीड़, मीडिया, नारीवादियों के संगठन और स्त्री अधिकारों के झंडाबरदार दूसरी तमाम महिला संगठनों की निगाह में सकली देवी की त्रासदी "इग्नोरेबल" क्यों रही? एक पिछड़े हुए राज्य के गुमनाम-से गांव में हाशिये पर मर-जी रही सकली देवी गरीब थी, दलित थी! शायद इसीलिए सकली देवी इस समाज की बेटी, बहन या मां नहीं हो सकती, दामिनी, अमानत या निर्भया नहीं हो सकती, स्त्री की त्रासदी का प्रतिनिधि मामला नहीं हो सकती है और देश का चेहरा होना तो न कभी मुमकिन रहा है, न शायद कभी होगा...!!!

चलते-चलतेः

दिल्ली में पांच साल की बच्ची के साथ हुई बर्बरता का आरोपी बिहार के मुजफ्फरपुर जिले का निकला, इसलिए बिहार के सुशासन बाबू मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी घटना पर अपने दुखी मन का इजहार किया। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार साहब ने कहा कि दिल्ली की घटना बर्बर है, इसने मानवता को शर्मसार किया है और अपराधी को सबसे सख्त सजा दी जानी चाहिए। इसी तरह उनके उप-साहब उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी ने भी कहा कि यह घटना मानवता पर कलंक है। दोनों ने अपने "भीतर की मानवीय संवेदना" का जो उदाहरण पेश किया है, उसके लिए इनके प्रति आभारी होना चाहिए, इनकी तारीफ की जानी चाहिए! लेकिन ये दोनों वही साहब हैं जिनकी संवेदना पर मुजफ्फरपुर के मंडई गांव में सकली देवी के साथ बर्बर बलात्कार और उसकी हत्या से कोई फर्क नहीं पड़ा और पटना के सामूहिक बलात्कार एक एमएमएस कांड से लेकर सहरसा तक के दर्जनों वीभत्स और बर्बर बलात्कार के मामलों पर कभी शर्म नहीं आई! क्यों? मंडई में उनकी पुलिस ने जो किया, उस पर भी उन्हें शर्म नहीं आई और दुःखी होना जरूरी नहीं लगा। क्यों? अक्सर औपचारिकता वह परदा होती है, जिसके तले तमाम पाखंडों को निबाहना आसान होता है...!!!

Monday 1 April 2013

"असली मर्द" चेतन भगत को "मेन्स डे" की जरूरत है...!!!



चेतन भगत के नाम खुला पत्र... 


प्यारे चेतन भगत जी,




अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के हिसाब से उसके एक दिन पहले महिलाओं के नाम लिखे गए आपके खुले चिट्ठीनुमा उपदेश "महिलाओं को बड़े सपने देखना चाहिए" पढ़ने का मौका मिला। मैं आपके इस उपदेश-खंड के लिए उपमा तलाश रहा था कि मुझे वह पुरानी उक्ति याद आई कि "नया में आके साधु बने तो पानी को बोले जल...!" आप सोच रहे होंगे कि ये मैंने कौन-सा तुक्का कहां से जोड़ा! दरअसल, उपमाओं की सुविधा यह होती है कि आप अपनी सुविधा से किसी विचार या स्थिति की व्याख्या को सहज बनाने के लिए इसका इस्तेमाल कर सकते हैं। इस लिहाज से देखें तो अपने उपदेश-अध्याय में आपने महिलाओं को जो कई सलाह पेश किए, उस क्रम में न सिर्फ आपके व्यक्तित्व का "पुरुष" सिर कर चढ़ बोलता दिखा, बल्कि चुपके-से आपने अपने प्रवचन में ऐसे खेल किए जो प्रथम दृष्ट्या प्रगतिशीलता का स्वागत लगता है, मगर वास्तव में मुक्ति और अपनी अस्मिता के लिए जद्दोजहद करती स्त्री को "डिग्रेड" करता है, उसे खारिज करता है और उसकी खिल्ली उड़ाता है।

लेकिन इसमें नया क्या है! कुछ समय पहले आपकी एक किताब "रिवोल्यूशन- 2020" का विज्ञापन प्रसारित हुआ था। यहां आपको नहीं, जरा अपनी भुलक्कड़ जनता को याद दिलाना चाहिए। एक लड़का बेडरूम में बिस्तर पर लेटा आपकी किताब पढ़ रहा है। कमरे में एक युवती आती है, अदाएं बिखेरती हैं, एक-एक कर अपने सारे कपड़े उतार देती है, लड़के को "आमंत्रित" करती है। लेकिन यह सब देखता हुआ लड़का किताब में "मगन" है और उस युवती की उपेक्षा करता है। युवती हार कर लड़के के बगल में लेट जाती है और वह भी किताब के पन्नों को देखने लगती है। अपनी किताब के प्रचार के लिए स्त्री के "व्यक्ति" पक्ष को इतना डि-ग्रेड करना, अपमानित करना शायद आपसे ही संभव था भगत जी! जबकि आपको पता होगा कि आपकी किताबों का सबसे बड़ा पाठक वर्ग युवा महिलाएं ही हैं और शायद इसीलिए आप संदर्भ दूसरा देते हैं, मगर घोषणा करते हैं "अधिकांश भारतीय महिलाएं भावनात्मक रूप से मूर्ख होती है।" मेरा मानना है कि मूर्खता की आपकी परिभाषा पर जिस दिन उनका ध्यान जाएगा तो वे सबसे पहले आपकी किताबों को ही कूड़े में डालेंगी।

आपकी किताब में क्या है, था, इस पर सिर खपाना अपनी ही बेवकूफी का विज्ञापन होगा। लेकिन एक बचकाना-सा सवाल आपसे है भगत महोदय कि क्या आप अपनी "किताब" के विज्ञापन में लड़के और लड़की की जगह अदला-बदली नहीं कर सकते थे? मुझे लगता है कि नहीं कर सकते थे। मैने कई "माइसोजिनिस्टों" को अपनी स्वीकार्यता के प्रसार के लिए "प्रोग्रेसिव" चोला ओढ़े देखा है। लेकिन आखिरकार मामला नजरिये या "माइंडसेट" का होता है, जिससे वह व्यक्ति संचालित होता है। बस उसकी चाल पर थोड़ी-सी नजर रखी जाए और किसी वक्त एक पेड़ की आड़ में होकर धीरे-से "हुआं" कर दिया जाए! वह खुद-ब-खुद "हुआं-हुआं..." गाना शुरू कर देगा।
 
बहरहाल, आपकी इस चिट्ठी को पढ़ने के बाद साफ हो जाता है कि आपने इसे लिखने के पहले खूब तैयारी की, एक-एक बिंदु पर खूब सोचा और फिर अपनी "तलवार" के साथ-साथ एक बहुत मजबूत-सी ढाल का भी प्रदर्शन किया जो आखिरकार एक लिजलिजा परदा भर साबित हुआ।

यह आपके लिए शायद नई बात होगी कि सामाजिक इतिहास में प्राकृतिक बाध्यताओं का फायदा उठा कर पुरुष ने स्त्री पर कब्जा जमाया तो उसे एक विधान का शक्ल देना भी उसे जरूरी लगा होगा। सो, वेदों-शास्त्रों को खींचते हुए उसने (मनु)- स्मृति तक सफर तय किया। आपकी "प्रगतिशील" बातें उन्हीं "स्मृतियों" का आधुनिक रूपांतर लगती हैं। इस आधुनिक कहे जाने वाले वक्त में अपने "प्राचीन स्वरूप में स्मृतियां" जिंदा रह भी कैसे सकती थीं! उस प्राचीनता में आधुनिकता की छौंक जरूरी थी। सो, यह आपके चेहरे के जरिए भी संभव हुआ।

दरअसल, सामाजिक सत्ताओं की शक्ल में कायम कोई भी व्यवस्था इसी तरह चेहरे बदल कर व्यवस्था विरोधी तत्त्वों के बीच घुसती है और फिर उसकी कमजोरियों का फायदा उठा कर उसे अपने कब्जे में ले लेती है। इसी सूत्र को आजमाते हुए आपने भी ऐसी ही घुसपैठ की कोशिश की है। आप जानते हैं कि आपको इसका मौका कैसे और क्यों मिला। यह सामान्य समझ वाला व्यक्ति भी अपने सहज ज्ञान से आकलन कर सकता है कि किसी भी रास्ते महंत बन जाया जाए, उसके बाद प्रवचन सामाजिक विशेषाधिकार हो जाते हैं। तो अपने महंत बनने का रास्ता भी आप अच्छी तरह जानते होंगे!

वैसे आप तो यह भी जानते ही होंगे कि "मैज़ोकिज्म" के अभ्यस्त बना दिए गए हमारे समाज में जो लोग इसका शिकार होते हैं, उनसे सबसे पहले उनका अस्तित्व ही छिन जाता है। त्रासदी यह कि इसका उसे पता भी नहीं चल पाता। तमाम धर्माधिकारियों की सत्ता इसी सूत्र की वजह से खड़ी होती है, पलती और मोटाती है।

कुछ "लोकप्रिय" किताबों के "लोकप्रिय" होने और फिर आपके "मशहूर" होने के बाद कुछ अखबारों ने आपका नाम अधिक बिक्री योग्य समझा और आपके कॉलम भी "लोकप्रिय" होने लगे। फिर जब आपने गुजरात जनसंहार के नायक की आरती गाना और उसके साथ फोटू खिंचवाना शुरू किया तो सामाजिक सत्ता-केंद्रों को आपको महंत के तौर पर कबूल करने में कोई उज्र नहीं हुआ।

एक स्वघोषित महंत पहले जबर्दस्ती प्रवचन देता है, फिर मजबूरी की स्वीकृति के बाद उससे प्रवचन मांगे जाने लगते हैं। भगत जी! मुमकिन है कि आप इस प्रक्रिया को समझते नहीं हों, लेकिन चूंकि इससे गुजर रहे हैं, इसलिए थोड़े रोमांचित जरूर होते रहे होंगे।

बहरहाल, आप थोड़े दया के पात्र इसलिए भी हैं कि महिलाओं के लिए अपने उपदेश जारी करते हुए आप लगभग शुरू में यह बताते हैं कि आप सौ फीसद और चौबीस कैरेट मर्द हैं और  घोषणा करते हैं "जोखिम उठाना (हम) मर्दों के लिए कोई नई बात नहीं है।" आपकी इस बात पर मेरे कान में दो-तीन बातें गूंजने लगीं- "जबर्दस्ती महंत बनना "मर्दों" के लिए कोई नई बात नहीं है...!", " हर मामले में अपनी नाक घुसेड़ना "मर्दों" के लिए कोई नई बात नहीं है...!", "अपनी रीढ़ को किसी के हाथों गिरवी रख देना "मर्दों" के लिए कोई नई बात नहीं है...!"

खैर, आपने महिलाओं के लिए जो पांच सलाह जारी किए, वे इस प्रकार शुरू होती हैं- "महिलाओं को दूसरी महिलाओं के बारे में राय बनाने की उत्कट इच्छा होती है; स्कर्ट पहनी किसी लड़की को देख कर महिलाओं के दिमाग में उनके चरित्र को लेकर शंकाएं पैदा होने लगती हैं, जबकि वे खुद भी हर पैमाने पर परफेक्ट नहीं हैं; वे दूसरी महिलाओं को खुल कर सांस लेने का मौका नहीं देतीं।"

तो भगत जी, अव्वल तो किसी भी मूर्ख को आपकी इन बातों पर मुग्ध होना चाहिए। लेकिन आप जब इस तरह स्थापनाएं प्राकृतिक सत्य की तरह "उदघाटित" कर रहे हैं तो क्या आपने कभी ये सोचने की जहमत उठाई कि अगर ऐसा है तो इसकी जड़ों में क्या वजहें हो सकती हैं? चलिए, आपने जो कहा, मैं उसे थोड़ा स्पष्ट करता हूं। हिंदू समाज में दहेज के लिए जिन महिलाओं को मार डाला जाता है, उसमें आमतौर पर सबसे बड़ी भूमिका सास और ननद की होती है। तो आपके फार्मूले के हिसाब से ये हुआ कि महिलाएं ही महिलाओं की सबसे बड़ी दुश्मन हैं। लेकिन चूंकि आप महंत जी हैं, इसलिए आप स्त्री के उद्धार को लेकर फतवा जारी कर सकते हैं और किसी स्त्री के "परफेक्टनेस" के पैमानों की घोषणा कर सकते हैं। ऐसी स्थिति में आपसे यह समझने की उम्मीद करना बेवकूफी होगी कि दहेज के लिए बहू को प्रताड़ित करने या मार डालने में सहयोग करती हुई वह सास या ननद दरअसल उन पितृसत्तात्मक मूल्यों को ही जी रही होती हैं जो पैदा होने के बाद उनके दिमाग में ठूंसी जाती रही हैं, उसी के तहत उसकी कंडीशनिंग होती है। यह भी शायद आपके लिए नई बात होगी कि पितृसत्ता एक संस्कृति है, जिसमें पलने-बढ़ने वाला कोई भी व्यक्ति उन्हीं मूल्यों को जीएगा, उसी माइंडसेट से संचालित होगा- वह पुरुष हो या स्त्री।

और इसीलिए पितृसत्ता सवालों की दुश्मन है। स्त्री के दिमाग में अपनी त्रासदी को लेकर प्रश्न पैदा हो, इससे पहले ही वह उसे दफन करने का हर इंतजाम करती है। बल्कि त्रासदियों का महिमामंडन और इन पर गर्व करने की साजिशों का सफल खेल अगर देखना हो तो खासतौर पर भारतीय हिंदू पितृसत्ता का अध्ययन करना चाहिए। इतनी सहज और साधारण बात अगर आपकी समझ में नहीं आई तो यह स्वाभाविक ही है और आपसे इस पितृसत्तात्मक व्यवस्था के मनोविज्ञान को समझ पाने की उम्मीद करना आपके साथ थोड़ी ज्यादती होगी!

आपकी इसी बेवकूफी से आपकी दूसरी सलाह पैदा होती है कि स्त्रियां पुरुषों के अहं को तुष्ट करने के लिए तत्काल तैयार हो जाती हैं; पुरुषों के चुटकुलों पर हंसती हैं; ऑफिस में मर्दों के मुकाबले कम महत्त्वपूर्ण काम करने के लिए तैयार हो जाती हैं; और सामूहिक रूप से समानता की मांग का कोई मतलब नहीं है, अगर कोई स्त्री व्यक्तिगत स्तर पर पुरुषों को खुश करने के लिए खुद को कमतर और नासमझ दिखाने को तैयार रहती हैं। इसी में आपका तीसरा उपदेश भी जुड़ा हुआ है कि महिलाएं संपत्ति के अपने वैधानिक अधिकार को अपने भाई-बेटे या पति के लिए "छोड़ देती हैं।" इसकी वजह आपकी निगाह में यह है कि "अधिकांश भारतीय महिलाएं भावनात्मक रूप से मूर्ख होती हैं।"

दिलचस्प है! जिस व्यक्ति को इस समाज की सत्ता-संरचना, इसकी बुनियाद पर तैयार होने वाले सामाजिक मनोविज्ञान और व्यक्ति की चेतना के लिए जिम्मेदार सामाजिक पृष्ठभूमि को समझना जरूरी नहीं लगता, लेकिन वह यह फतवा जारी करने में आगे रहना चाहता है कि कोई व्यक्ति या समूह मूर्ख है। तो उसकी दयनीयता की वजह समझी जा सकती है।

भगत जी, किसी भी समाज से लेकर किसी दफ्तर में "पावर" और "पोजीशन" के संबंध और कार्य-व्यवहार पर उसके असर के बारे में आपने कभी सोचा है? अजी छोड़िए! ये भी क्या सवाल कर लिया आपसे! अगर आपने सोचा ही होता तो क्या बात थी! बहरहाल, भगत साहब, "पद" और "हैसियत" एक ऐसी "ताकत" है, जिसके बूते किसी भी मातहत या सहयोगी को मानसिक दबाव की स्थिति में लाया जा सकता है। खासतौर पर आपकी महान भारतीय परंपरा में केवल दफ्तरों में नहीं, बल्कि समाज में हर कदम पर "पद" और "हैसियत" आमतौर पर खुद से एक क्रम "नीचे" वाले को निगल कर ही अपनी सत्ता बचाए रखता है। वहां स्त्री हो या पुरुष, हर जतन से उसे तुष्ट करने की स्वाभाविक कोशिश करेंगे, ताकि खुद को ज्यादा से ज्यादा वक्त तक बचाए रख सकें।

जहां तक पुरुषों के मुकाबले कम महत्त्वपूर्ण काम करने के लिए तैयार हो जाने का सवाल है, तो प्यारे भगत जी, जरा पता कीजिएगा कि किसी भी ऑफिस में सक्षम होने के बावजूद किसी स्त्री को कम महत्त्व के काम ही क्यों सौंपे जाते हैं; कई जगहों पर बराबर महत्त्व और मेहनत के काम के एवज स्त्री को कम मेहनताना क्यों दिया जाता है। अगर किसी स्त्री को महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी दी जाती है तो वे कहां कमतर साबित होती हैं और तब उसके पुरुष मातहत या सहयोगियों का रवैया कैसा रहता है? पुरुषों के "शाही अहं" से क्या आप इतने अनभिज्ञ हैं, प्यारे भगत जी! ऐसा लगता तो नहीं है!

आपकी इस बात में किसी मजेदार लतीफे-सा असर है कि सामूहिक रूप से समानता की मांग बेमानी है, अगर कोई स्त्री व्यक्तिगत स्तर पर पुरुषों को खुश रखने के लिए खुद को कमतर आंकती है। आपको यह सोचना जरूरी क्यों लगे कि निजी स्तर पर खुद को किसी के सामने कमतर आंकना एक व्यक्ति की मजबूरी भी हो सकती है। लेकिन अगर वही व्यक्ति सामूहिक रूप से समानता की मांग करता है तो इसका मतलब यह है कि चेतना के स्तर पर वह अपनी स्थिति को लेकर एक पायदान ऊपर चढ़ चुका है। इसका स्वागत किया जाना चाहिए। निजी स्तर पर विरोध की सीमाओं के कारण ही कोई व्यक्ति सामूहिक स्तर पर उठाई जाने वाली आवाज में शामिल होता है। सामूहिक रूप से समानता की मांग के असर में अगर एक समानता आधारित व्यवस्था की बुनियाद पड़ती है तो व्यक्ति का व्यवहार खुद-ब-खुद उससे निर्धारित होगा, बदलेगा। यह द्विपक्षीय भी हो सकता है। इसलिए सामूहिक और वैयक्तिक व्यवहार को एक तराजू पर हर बार नहीं तोला जा सकता। लेकिन आप चूंकि महंत जी हैं, इसलिए आपको किसी भी मसले के "क्यों" पर सोचना जरूरी नहीं लगता और सीधे तौर पर संपत्ति छोड़ने वाली महिलाओं आप भावनात्मक तौर पर मूर्ख घोषित कर दे सकते हैं। बजाय इसके कि भाई-बेटे, पति या "इमोशनल ब्लैकमेलिंग" पर आधारित पितृसत्तात्मक मनोविज्ञान पर भी जरा विचार कर लें।

बहरहाल, जब आप अपनी चौथी सलाह में कहते हैं कि हमारी सामाजिक संरचना ही शायद ऐसी है कि महिलाओं को पुरुषों की तरह महत्त्वाकांक्षी बनने के लिए प्रोत्साहित नहीं किया जाता, तो एकबारगी ऐसा लगता है कि आप अगर कोशिश करें तो सोच सकते हैं। मगर अपने अगले और आखिरी उपदेश में जब आप महिलाओं को अपनी अहमियत पहचानने के लिए शिव खेड़ा और स्वेट मार्टन टाइप फार्मूले बताते हैं, तो पेट पकड़ कर हंसने का मन करता है। फिर जब आप अपने श्रीमुख से घोषित "भावनात्मक रूप से मूर्ख महिलाओं" के लिए अपने उपदेशों से उपजने वाले संकट का अंदाजा लगा कर अपनी बातों का मतलब और उसके पीछे की भावना को समझने की गुहार लगाते हैं तब जाकर पता लगता है कि मूर्खता दरअसल होती क्या चीज है!

और भगत जी, आखिर में मैं आपको एक उपदेश देना चाहूंगा। आज की जिस स्त्री को आपने संबोधित किया है, वे दरअसल उतनी मूर्ख नहीं रह गई हैं कि आपकी बेसिरपैराना महंतई प्रवचनों के हिसाब से अपनी जिंदगी का फलसफा गढ़ें। वे अपने बूते एक नई जमीन, नई दुनिया रच रही हैं। आप जैसे पितृसत्ता के चौबीस कैरेट मर्द एजेंट के लिए कोई संकट खड़ा करने में वे अपनी ऊर्जा बर्बाद नहीं करेंगी, जिसकी आशंका आपने जताई है। जाहिर है, आने वाले वक्त की स्त्री जो दुनिया गढ़ने वाली है, उसमें अपने बचाव के लिए आप चाहें तो अपने मित्र नरेंद्र मोदी से किसी "मेन्स डे" की व्यवस्था की गुहार लगा सकते हैं, जिसके न होने का डर आपने जाहिर किया है!

शुक्रिया...

Friday 22 February 2013

रसूख वाले बलात्कारी नहीं होते...


सूर्यानेल्ली में लगातार चालीस दिनों तक बयालीस वहशी धोखेबाज मर्दों ने बर्बरता की सारी हदें पार कर सूर्यानेल्ली की उस सोलह साल की बच्ची को जैसे चाहा रौंदा था और लगभग मर जाने के बाद उसके घर के आसपास फेंक दिया था। वह किसी तरह बच गई और आज तैंतीस साल की उम्र में भी वह अपने आसपास के अंधेरों का सामना करती हुई अपनी लड़ाई को अंजाम देने के लिए अपने बूते खड़ी है। अरुंधति राय ने नहीं भी कहा होता तो भी मैं ठीक वही कहता- हां, वह मेरी हीरोईन है, वह सबकी नायिका है।

फिलहाल हकीकत यह है कि दूरदराज के इलाकों में होने वाली ऐसी तमाम घटनाएं हमारी संवेदना को नहीं झकझोर पाती हैं। सवाल करने वाले कर रहे हैं कि क्या हम केवल तभी परेशान होते हैं जब कोई घटना देश की राजधानी में हो, हमारे अपने वर्ग से जुड़ी हो। वरना दिल्ली में हुई सामूहिक बलात्कार की घटना के बाद इंडिया गेट के व्यापक आंदोलन से निकले संदेश के बीच इसी दौर में बिहार में सहरसा जिले के एक गांव में किसी दलित और मजदूर परिवार की आठ साल की बच्ची के साथ सामूहिक बलात्कार करके बर्बरता की सारी हदें पार कर मार ही डाला जाता है... महाराष्ट्र के भंडारा में तीन नाबालिग बच्चियों से बलात्कार के बाद उनकी हत्या कर कुंए में फेंक ही जाती है... और इस तरह की तमाम घटनाएं अपनी त्रासदी के साथ लगातार घट ही रही हैं। लेकिन हमारे भीतर कभी भी गुस्सा पैदा नहीं होता... किसी टीवी वाले को इन घटनाओं पर लोगों को आंदोलित करने की जरूरत नहीं पड़ती...  इंडिया गेट पर कभी शोक की मोमबत्तियां नहीं जलाई जातीं...!

केरल में सूर्यानेल्ली की यह लड़की किसी तरह जिंदा बच गई थी। अगर देश के सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में दफन कर दिए गए मुकदमे पर सवाल नहीं उठाया होता तो इसमें भी अदालतों ने चुपचाप सभी अपराधियों को पवित्र ब्रह्मचारी घोषित कर ही दिया था। इसके बावजूद इस देश की महान पार्टी कांग्रेस के एक महान और "पवित्र" सांसद पीजे कूरियन यह कह ही रहे हैं कि उनके खिलाफ सीपीएम झूठा प्रचार कर रही है। इस देश में सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश की सत्ताधारी पार्टी कूरियन का झंडा उठा कर कूद रही है... सत्ता की दावेदार एक पार्टी अपनी इस बात की फिक्र को दूर करने की फिराक में है कि उसके पूरे गिरोह के भगवा आतंकवाद के आरोप से मुक्त कर दिया जाए...। आगे क्या होगा, सभी अपराधी एक बार फिर से पवित्रीकरण की प्रक्रिया से गुजरेंगे या फिर सूर्यानेल्ली की लड़की पर ढाए गए जुल्म की सजा पा सकेंगे, यह हमारी व्यवस्था, अदालतों, राजनीतिक दलों के रुख पर निर्भर करेगा। लेकिन इसी के साथ राजधानी दिल्ली और ताकतवर मध्यवर्गीय संवेदनाओं से उपेक्षित ये तमाम घटनाएं एक बार फिर सचमुच की समाजी और इंसानी संवेदनाओं की परीक्षा की कसौटी पर भी गुजरेंगी...। रोजाना के अनगिनत ऐसे मामलों की तरह... ।

टाइम्स ऑफ इंडिया में सूर्यानेल्ली की लड़की की यह पीड़ा उसी के शब्दों में प्रकाशित हुई थी। अनुवाद करने की कोशिश मैंने ही की है। अंग्रेजी बहुत अच्छी नहीं है। इसलिए जहां भी जरूरी लगे, एक बार इस लिंक पर क्लिक कर लीजिएगा, लेकिन पढ़िएगा जरूर...
 


मैं सचमुच अपने पहले प्यार का कत्ल कर देना चाहती थी...  


- सूर्यानेल्ली की लड़की

आपने शायद कभी मेरा नाम नहीं सुना हो! मुझे उस पहचान के साथ नत्थी कर दिया है, जिससे मैं छुटकारा नहीं पा सकती- मैं सूर्यानेल्ली की लड़की हूं। पिछले सत्रह सालों से मैं इंसाफ पाने की लड़ाई लड़ रही हूं। कुछ लोग मुझे बाल-वेश्या कहते हैं तो कुछ पीड़ित। लेकिन किसी ने मुझे दामिनी, निर्भया या अमानत जैसा कोई नाम नहीं दिया। मैं कभी भी इस देश के लिए गर्व नहीं बन सकती! या उस महिला का चेहरा भी नहीं, जिसके साथ बहुत बुरा हुआ।

मैं तो स्कूल में पढ़ने वाली सोलह साल की एक मासूम लड़की भी नहीं रह सकी, जिसे पहली बार किसी से प्यार हो गया था। लेकिन उसी के बाद उसने अपनी जिंदगी ही गंवा दी। अब तैंतीस साल की उम्र में मैं रोज  °डरावने सपनों से जंग लड़ रही हूं। मेरी दुनिया अब महज उस काली घुमावदार सड़क के दायरे में कैद है जो मेरे घर से चर्च और मेरे दफ्तर तक जाती है।

लोग अपनी प्रवृत्ति के मुताबिक मुझ पर तब तंज कसते हैं जब मैं उन चालीस दिनों को याद करती हूं, जब मैं सिर्फ एक स्त्री शरीर बन कर रह गई थी और जिसे वे जैसे चाहते थे, रौंद और इस्तेमाल कर सकते थे। मुझे जानवरों की तरह बेचा गया, केरल के तमाम इलाकों में ले जाया गया, हर जगह किसी अंधेरे कमरे में धकेल दिया गया, मेरे साथ रात-दिन बलात्कार किया गया, मुझे लात-घूंसों से होश रहने तक पीटा गया।

वे मुझसे कहते हैं कि मैं कैसे सब कुछ याद रख सकती हूं, और मैं हैरान होती हूं कि मैं कैसे वह सब कुछ भुला सकती हूं? हर रात मैं अपनी आंखों के सामने नाचते उन खौफ़नाक दिनों के साथ किसी तरह थोड़ी देर एक तकलीफदेह नींद काट लेती हूं। और मैं एक अथाह अंधेरे गहरे शून्य में बार-बार जाग जाती हूं जहां घिनौने पुरुष और दुष्ट महिलाएं भरी पड़ी हैं।

मैं उन तमाम चेहरों को साफ-साफ याद कर सकती हूं। सबसे पहले राजू आया था। यह वही शख्स था, जिसे मैंने प्यार किया था और जिस पर भरोसा किया था। और उसी ने मेरे प्यार की इस कहानी को मोड़ देकर मुझे केरल के पहले सेक्स रैकेट की आग में झोंक दिया। रोजाना स्कूल जाने के रास्ते में जिस मर्द का चेहरा मेरी आंखें तलाशती रहती थीं, वही उनमें से एक था जिसे मैंने शिनाख्त परेड में पहचाना था और अदालत के गलियारे में मेरा उससे सामना हुआ। उन दिनों... मैं सचमुच उसका कत्ल कर देना चाहती थी। हां... अपने उस पहले प्रेमी का...।

लगभग मरी हुई हालत में उन्होंने मुझे मेरे घर के नजदीक फेंक दिया। लेकिन मेरे दुख का अंत वहीं नहीं हुआ। मेरा परिवार मेरे साथ खड़ा था। मैंने यह सोच कर मुकदमा दायर किया कि ऐसा किसी और लड़की के साथ नहीं हो। मैंने सोचा कि मैं बिल्कुल सही कर रही हूं। लेकिन इसने मेरे पूरे भरोसे को तोड़ दिया। मेरे मामले की जांच के लिए जो टीम थी, वह मुझे लेकर राज्य भर में कई जगहों पर गई। उसने मुझे अनगिनत बार उस सब कुछ का ब्योरा पेश करने को कहा जो सबने मेरे साथ किया था। उन्होंने मुझे इस बात का अहसास कराया कि एक औरत होना आसान नहीं है, वह पीड़ित हो या किसी तरह जिंदा बच गई हो।

मेरे लिए यह राहत की बात है कि दिल्ली की उस लड़की की मौत हो गई। वरना उसे सभी जगह ठीक वैसे ही अश्लील सवालों से रूबरू होना पड़ता जो उसे उस खौफनाक रात को भुगतना पड़ा। इसकी वजह बताने के लिए उसे बार-बार मजबूर किया जाता। और अकेले बिना किसी दोस्त के वह अपनी ही छाया से डरती हुई जिंदगी का बाकी वक्त किसी तरह काटती।

मेरा भी कोई दोस्त नहीं। मेरे दफ्तर में कोई भी मुझसे बात नहीं करना चाहता। मेरे मां-बाप और कर्नाटक में नौकरी करने वाली मेरी बहन ही बस वे लोग हैं जो मेरी आवाज सुन पाते हैं। हां, कुछ वकील, पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता भी।

मैंने इन दिनों खूब पढ़ा है। फिलहाल केआर मीरा की एक किताब "आराचार" (द हैंगमैन) पढ़ रही हूं।

मेरे परिवार के अलावा कोई भी नहीं जानता कि मैं अपनी गिरती सेहत को लेकर डरी हुई हूं। लगातार सिर दर्द, जो उन चालीस दिनों की त्रासदी का एक हिस्सा है जब उन्होंने मेरे सिर पर लात से मारा था। मेरे डॉक्टर कहते हैं कि मुझे ज्यादा तनाव में नहीं रहना चाहिए। और मैं सोचती हूं कि सचमुच ऐसा कर पाना दिलचस्प है।

मेरा वजन नब्बे किलो हो चुका है। जब मैं अपनी नौकरी से नौ महीने के लिए मुअत्तल कर दी गई थी, उस दौरान मेरा ज्यादातर वक्त बिस्तर पर ही कटता था और इसी वजह से वजन भी बढ़ता गया। अब मैं कुछ व्यायाम कर रही हूं। पूरी तरह ठीक हो पाना एक सपना भर है। लेकिन कुछ प्रार्थनाएं मुझे जिंदा रखे हुए हैं।

भविष्य पर मेरा यह यकीन अब भी जिंदा है कि एक दिन सब कुछ ठीक हो जाएगा। मैं हर सुबह और रात को प्रार्थना करती हूं। मैं नहीं पूछती कि फिर मुझे ही क्यों...! मैं उन दिनों भी उस पर भरोसा करती रही, जब मैं मुश्किल से अपनी आंखें खोल पाती थी या किसी तरह जिंदा थी। मैंने प्रार्थना की। मैं लैटिन चर्च से आती हूं जो कैथोलिक चर्च में सबसे बड़ा चर्च है। मगर पिछले सत्रह सालों से कहीं भी और किसी भी चर्च में मेरे लिए कोई प्रार्थना नहीं की गई। पवित्र मरियम को कोई गुलाब की माला अर्पित नहीं की गई और न ही कोई फरिश्ता अपने दयालु शब्दों के साथ मेरे दरवाजे पर आया।

लेकिन मेरा भरोसा टूटा नहीं है। इसने मुझे हफ्ते के सातों दिन चौबीसों घंटे चलने वाले टीवी चैनल देखने की ताकत बख्शी है, जहां कानून के रखवाले मुझे बाल-वेश्या बता रहे हैं, और कुछ मशहूर लोग इस बात पर चर्चा कर रहे हैं कि मेरे मुकदमा टिक नहीं पाएगा। यहां तक कि जब मैं दफ्तर में वित्तीय धोखाधड़ी के मामले में फंसाई गई हूं और मेरे माता-पिता बहुत बीमार चल रहे हैं, तब भी मैं खुद को समझाती हूं कि यह भी ठीक हो जाएगा... एक दिन..!!!

Tuesday 16 October 2012

मानेसर-मारुति कांडः यकीनन साजिश, लेकिन किसकी...?



मौसम "खराब" हैः माओवादियों का हाथ है...

हाल ही में एक अंग्रेजी टेबलायड ने अपने पहले पूरे पन्ने (इसके अलावा एक और लगभग पूरे पन्ने पर) पर बड़े अक्षरों में लीड स्टोरी छापी, जिसके रिपोर्टर ने खुफिया विभाग के हवाले से बड़े उत्साह के साथ बताया कि हरियाणा में मानेसर के मारुति फैक्ट्री में हुई हिंसा के पीछे माओवादियों का हाथ है। कुछ सत्ता-तंत्र के सुरक्षा विशेषज्ञों के सहारे मामले पर रोशनी डालते हुए रिपोर्टर ने लिखा कि यह दहलाने वाला खुलासा सिर्फ उन आशंकाओं की पुष्टि करता है, जो लंबे समय से जताई जा रही थी। रिपोर्टर के मुताबिक खुफिया एजेंसियों का मानना है के कि शहरी इलाकों में वामपंथी अतिवादियों का आधार फैल रहा है और दिल्ली और समूचा एनसीआर, या राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (फरीदाबाद, गुड़गांव, गाजियाबाद, नोएडा आदि) इलाकों (मजदूरों की हकमारी और शोषण के अड्डे ) में तेजी से फैल रहे हैं। रिपोर्टर कहता है कि अब यह एक तथ्य है। जबकि शुरुआती दौर में हरियाणा पुलिस ने अपनी जांच में मानेसर की घटना में माओवादियों का हाथ होने की बात को खारिज कर दिया था। इस पर रिपोर्टर बड़े राहत-भाव के साथ लिखता है कि "आज यह साबित हो गया है कि वह (हरियाणा पुलिस) गलत थी।"

यह अंदाजा लगाने में मुश्किल नहीं होना चाहिए कि सरकार किसके लिए काम करती है और क्या स्थापित करना चाहती है। पिछले डेढ़-दो दशक के दौरान आतंकवाद और माओवाद से निपटने के नाम पर किस कदर हिंसक और बर्बर खेल खेला गया है, यह किसी से छिपा नहीं है। जहां भी सरकार विफल होती है, अपनी जिम्मेदारियों से भागना चाहती है, या हक और मांगों को खारिज करना या उसका दमन करना चाहती है, वह संबंधित पक्षों को आतंकवादी या माओवादी घोषित कर देती है, ताकि उनके मानवाधिकारों से जुड़े सारे सवाल अपने-आप खारिज हो जाएं और इनके खिलाफ किसी भी हद तक जाने को आम जनता तक सही मान ले।

मनमोहनी उदारवादः सोचना बंद करो...

तो क्या मानेसर-मारुति कांड, उसकी पृष्ठभूमि और उसके बाद के हालात को भारत में मनमोहनी नवउदारवाद की एक स्वाभाविक परिणति के संकेत के तौर पर देखा जा सकता है? और, क्या यह कांड यह समझने के लिए एक संदर्भ है कि पिछले दो दशकों में इस देश की सरकारों ने खालिस दुकानदार की तरह काम किया और एक दुकानदार आखिरकार दूसरे दुकानदार का पेट भरेगा और उसी की ओर से मोर्चा लेगा?

यों इस मानेसर कांड के पहले भी हीरो होंडा से लेकर कई ऐसे मौके आए हैं जो सीधे नब्बे के दशक से जारी मजदूरों की दुश्मन सरकारों की कारगुजारियों का नतीजा थीं। लेकिन भारत की तमाम राजनीतिक-सामाजिक सत्ताओं को अपनी शासित "प्रजा" की लाचारी का शोषण करने और बगावतों से निपटने का सदियों पुराना अनुभव रहा है। इसलिए मजदूरों के असंतोष से खेलने और फिर उन्हें "निपटा" देने में उन्हें कोई दिक्कत पेश नहीं आती। इस लिहाज से मानेसर-मारुति कांड को भविष्य में एक पैमाने के तौर पर इस्तेमाल किया जाएगा, जिसमें निजी क्षेत्र में मजदूरों की ओर से खड़ी होने वाली सबसे जटिल चुनौती से निपटने का एक फार्मूला ईजाद किया गया है।

यह फार्मूला एक तरह से इतना "फुल प्रूफ" था कि शायद ही किसी को ठीक उन बातों पर भरोसा नहीं हुआ जो मारुति के प्रबंधन और पुलिस ने लोगों के सामने परोसा। हालांकि उस वक्त भी कम से कम मानवीय लिहाज से एक बार यह सोचने की गुंजाइश बची थी कि जिन मजदूरों की निर्भरता वह फैक्ट्री है, वे उसे क्यों खाक करेंगे। लेकिन कुछ कर्मचारियों की पिटाई के अलावा एक एचआर मैनेजर को हाथ-पांव बांध कर जिंदा जला दिए जाने की घटना ने सोचने के सारे दरवाजे बंद कर दिए। खबरें सिर्फ उतनी सामने आ रही थीं जितनी प्रबंधन चाह रहा था। पुलिस से लेकर राज्य का समूचा तंत्र मारुति के सामने हाथ-पांव जोड़ने में लगा था।

सौ लोगों की कारगुजारी...!

खबर परोसने की तमाम साजिशें भुक्तभोगियों और मजदूरों के सीने में दफन हो जातीं, अगर विशेष जांच टीम के मुखिया और गुड़गांव पुलिस के एक डीसीपी महेश्वर दयाल का बयान (धोखे से सही) एक अंग्रेजी अखबार ने नहीं छाप दिया होता। नौ अगस्त 2012 के "टाइम्स ऑफ इंडिया" में डीसीपी (पूर्व), महेश्वर दयाल का बयान छपा कि "मारुति-मानेसर कांड में हुई सभी तरह की हिंसा को अंजाम देने वालों में ज्यादा से ज्यादा सौ लोग शामिल थे।" प्रबंधन और पुलिस ने यह तादाद पहले बारह सौ, फिर बाद में साढ़े छह सौ मजदूरों की बताई थी।

सवाल है कि अगर हिंसा को अंजाम देने वाली भीड़ की तादाद ज्यादा से ज्यादा सौ थी तो यह संख्या क्या संकेत देती है? खबरों की भीड़ में से ही किसी तरह कुछ लोगों की नजर घटना के बाद शुरुआती दौर में आई उस खबर पर जरूर गई होगी कि मारुति कंपनी ने 18 जुलाई की हिंसा के डेढ़-दो महीने पहले ही एक से डेढ़ सौ "बाउंसरों" की भर्ती की थी, ताकि वे फैक्ट्री के भीतर "सुरक्षा-व्यवस्था" बनाए रखें। 18 जुलाई को भी जब जियालाल को जातिसूचक गाली दी गई और बात के तूल पकड़ने पर पहली शिफ्ट के कामगार धरने पर बैठ गए तो उन "बाउंसरों" को इन मजदूरों को इर्द-गिर्द खड़ा कर दिया गया। इसके बाद की खबर बस यही है कि हिंसा शुरू हो गई और एक एचआर मैनेजर को जला कर मार डाला गया। यह भी ध्यान रखना चाहिए कि गुड़गांव पुलिस की उपर्युक्त रपट में यह बताया गया कि स्थिति के बेकाबू होने के पहले पचास से ज्यादा की तादाद में पुलिसकर्मी फैक्ट्री में मौजूद थे। यानी सिर्फ सौ लोगों द्वारा की जा रही हिंसा को रोक सकने में पचास से ज्यादा पुलिसकर्मी अक्षम थे। डीसीपी दयाल का कहना है कि पुलिसवाले गेट के बाहर थे और "कामगार" उन्हें धक्का देकर परिसर मे घुस गए।

पूरा मामला ही संदिग्ध लगता है।

आइए कल्पना करें...

चलिए, इसके बरक्स हम एक काल्पनिक दृश्य की रचना करते हैं। मारूति प्रबंधन, हरियाणा सरकार, पुलिस और अदालतें मेरे गढ़े गए इस दृश्य को महज खयाल और तुक्केबाजी मानें।

तो दृश्य यह है कि जियालाल पर जातिगत टिप्पणी के बाद नाराज होकर धरने पर बैठे मजदूरों को धीरे-धीरे सुरक्षा के नाम पर "बाउंसरों" ने घेर लिया। मजदूर सुपरवाइजर के खिलाफ कार्रवाई की मांग पर अड़े थे। शाम को अचानक मजदूरों को पता चला कि फैक्ट्री के भीतर आगजनी शुरू हो गई है। स्वाभाविक रूप से फैक्ट्री के भीतर और बाहर खड़े मजदूर पुलिस के हाथों पकड़े जाने के डर से भाग गए। वहां पुलिस भी मौजूद थी और अंदर कुछ कर्मचारियों के साथ मारपीट की घटना हो रही थी। हिंसा करने वाले लोगों ने जो वर्दी पहनी हुई थी, वह बिल्कुल मारुति के कामगारों की तरह ही थीं। वे कर्मचारियों को पकड़ते, थोड़ी-बहुत उनकी पिटाई करते और छोड़ देते। वह हिंसक जत्था एचआर डिपार्टमेंट पहुंचा। पहले एचआर मैनेजर को मारते-पीटते उसके पांव तोड़ दिए और विभाग में आग लगा कर उसे भी उसमें झोंक दिया। इसके अलावा, दो-तीन और जगहों पर आगजनी हुई, जिसमें कुछ भी महत्त्वपूर्ण नहीं जला। (माना जाता है कि वह एचआर मैनेजर कामगारों की निगाह में काफी मानवीयता से पेश आता था, मजदूरों से उसके अच्छे संबंध थे, वह सहृदय और विनम्र था!)

ईश्वरीय कृपा-सी हिंसा...!!!

जैसी कि सूचनाएं सामने आईं, "इतनी बड़ी" हिंसा में इस तरह की ईश्वरीय कृपा का जोड़ा नहीं मिलता कि कारों के प्रोडक्शन यूनिटों और संयंत्रों को जरा भी नुकसान नहीं पहुंचा और यों कहें कि हिंसा खत्म होने के ठीक बाद भी वहां कारों का उत्पादन सहज तरीके से हो सकता था। एक सबसे जरूरी बात- इस पूरी हिंसा के दौरान कंपनी में जगह-जगह लगे सीसीटीवी कैमरे कहां चले गए थे। शुरुआती दौर में किसी अखबार ने खबर दी थी कि "मजदूरों" ने हिंसा के वक्त सीसीटीवी कैमरों को या तो तोड़ दिया था या फिर उसका रुख छत की ओर कर दिया था।

वे गजब के सुनियोजित और सुशिक्षित "मजदूर" थे! जाहिर है, कंपनी प्रबंधन, मीडिया और पुलिस ही शायद सही कह रही होगी, वे मजदूर नहीं, जिनका कहना है कि उन्हें तो इस बात का पता भी नहीं था कि कंपनी में सीसीटीवी कैमरे लगे थे।

यानी इस पूरी हिंसा की पटकथा पहले से तैयार थी और सिर्फ इसके प्रदर्शन का इंतजार था। सिर्फ एक बहाने की तलाश थी जो जियालाल को जातिसूचक गालियां देने के बाद कामगारों के धरने ने मुहैया करा दिया था।

यह छब्बीस सितंबर, 2012 को पीपुल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स यानी पीयूडीआर की जांच रपट की जारी प्रेस विज्ञप्ति से भी साफ होता है कि जेल में बंद करीब डेढ़ सौ मजदूरों में से बहुत सारे का उस तथाकथित अपराध से किसी तरह का लेना-देना नहीं था। बल्कि 18-19 जुलाई 2012 को जो तिरानबे मजदूर गिरफ्तार हुए, उनमें से कई घटना के समय फैक्ट्री में मौजूद तक नहीं थे। आमतौर पर चिह्नित और सूचीबद्ध उन मजदूरों को गिरफ्तार किया गया जो 2011 के मध्य में हुए विरोध में सक्रिय थे और खुल कर बोलने वाले थे। इस बात का जवाब तो सिर्फ मारुति प्रबंधन, बल्कि श्रम कानूनों के पहरुओं और भारत सरकार को देना होगा कि इस देश के किस कानून के तहत मारूति ने तहकीकात पूरी होने के पहले ही लगभग साढ़े पांच सौ मजदूरों को बर्खास्त कर दिया। श्रम कानून के रखवाले किसके इशारों पर काम करते हैं, इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि किसी का किसी से चेहरा भर मिलने से गिरफ्तार कर लिया गया, किसी नामजद के परिवार वालों को प्रताड़ित किया गया, तो गिरफ्तार मजदूरों को हिरासत में भयानक थर्ड डिग्री की यातनाएं दी गईं और सादे कागज पर दस्तखत करने के लिए उन्हें मजबूर किया गया। यानी पुलिस की मंशा साफ है कि वह किसके इशारे पर और किसके हित में काम कर रही है।

बहरहाल, दिलचस्प है कि बिना किसी मजबूत आधार के मारुति साढ़े पांच सौ कामगारों को निकाल देती है, लेकिन उस सुपरवाइजर के खिलाफ कोई भी कार्रवाई करने की सूचना नहीं मिल सकी है, जिसकी जातिबोधक गाली के चलते सारा फसाद खड़ा किया गया।

यकीनन साजिश...

तो क्या 18 जुलाई के फसाद की योजना पहले से तैयार थी और सिर्फ बहाने और मौके का इंतजार किया जा रहा था? लेकिन यह योजना किसकी थी और कौन इंतजार कर रहा था? यह मानना अपने आप में अपनी ही बुद्धि को कटघरे में खड़ा करना होगा कि यह मजदूरों की सुनियोजित साजिश थी। जो मजदूर पिछले साल तीन चरणों में अट्ठावन दिनों की हड़ताल के बावजूद धीरज, संयम और पूरी परिपक्वता के साथ सिर्फ अपने हक का सवाल उठाते रहे, वे इस बार भी सिर्फ इतनी-सी मांग कर रहे थे कि जियालाल को जाति की गाली देने वाले कर्मचारी के खिलाफ कार्रवाई हो। पिछले साल जब उतनी बड़ी तादाद में मजदूरों का धरना शांतिपूर्ण रहा तो इस बार उन्हें नियंत्रित करने के लिए मारुति को सौ या डेढ़ सौ "बाउंसरों" (गुंडों) की जरूरत क्यों पड़ गई? उन सभी बाउंसरों को मजदूरों का ही ड्रेस क्यों पहनाया गया था? क्या यह संयोग है कि विशेष जांच टीम का नेतृत्व करने वाले गुड़गांव के एक डीसीपी महेश्वर दयाल ने आखिरकार बताया कि फसाद में ज्यादा से ज्यादा सौ लौग शामिल थे और मारूति के "बाउंसरों" की संख्या भी उतनी ही बताई जाती है? डीसीपी की रिपोर्ट के मुताबिक अगर यह मान भी लिया जाए कि वे सौ लोग मजदूर ही थे, तो मारुति के वे एक-डेढ़ सौ "बाउंसर" और पचास से ज्यादा पुलिसकर्मी क्या उन सौ मजदूरों को रोक सकने में सक्षम नहीं थे? (कुछ ही देर में वह पूरा इलाका पुलिस छावनी में तब्दील हो गया था!)

ये सारी स्थितियां किसकी साजिश की ओर इशारा करती हैं? जिसकी साजिश कामयाब हुई है, उसे तो हक है मजदूरों को अपराधी करार देने का, लेकिन पुलिस, प्रशासन और पूरी सरकार से लेकर समूचा मीडिया किन वजहों से मजदूरों के खिलाफ हाय-हाय करता रहा और अपने "मालिकों" के सामने अंधा होकर सिर नवाता रहा? क्या नया संविधान बनाया जा चुका है, जिसमें मजदूरों को अब खुद को गुलाम मान कर काम करना होगा? जब मारुति जैसी देश की "नाक" कंपनी मजदूरों के दमन के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार है, तो दूसरी जगहों की क्या हालत होगी, क्या इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है? इस देश के तमाम "सेजों" (विशेष आर्थिक क्षेत्रों) को तो किसी भी तरह की कानूनी बाध्यताओं से पहले ही आजाद किया जा चुका है। बाकी जगहों पर भी बचे-खुचे श्रम कानूनों पर अमल की व्यावहारिक हकीकत जिस बर्बर शक्ल में है, वह अध्ययन का विषय है। सवाल है कि जनकल्याण के सिद्धांतों पर काम करने का दायित्व उठाने वाली हमारे देश की तथाकथित लोकतांत्रिक सरकारें किसकी सेवा में हाजिरी बजा रही हैं?

पूंजीवाद के घोड़े पर सवार सामंतवाद...

पिछले साल तीन चरणों में लगभग दो महीने की हड़ताल की कामयाबी इस बात का साफ संकेत थी कि मजदूरों की बिखरी हुई लड़ाई अगर ठोस शक्ल लेती है तो पिछले दो दशकों में कॉरपोरेटों और पूंजीपतियों की दलाल सरकार की मदद से तैयार वह ढांचा ढह जा सकता है, जो मजदूरों के ज्यादा से ज्यादा शोषण से मालिकानों के लिए ज्यादा से ज्यादा मुनाफा सुनिश्चित करता है। जाहिर है, 2011 के अट्ठावन दिनों के हड़ताल के बाद छह महीने में वे तमाम इंतजाम किए गए जो पिछले दो दशकों की "उपलब्धियों" को बचा सके और उसे पुख्ता आधार दे सके।

इसलिए चार-पांच या छह-सात हजार रुपए महीने की तनख्वाह उठाने वाले ज्यादातर ठेका मजदूरों से स्थायी कर्मचारियों को अलगाने की सभी कोशिशें की गईं। लेकिन सच यह है कि एक अंतरराष्ट्रीय मानदंडों के तहत अपना धंधा चलाने का दावा करने वाली इस कंपनी के भीतर श्रम की स्थितियां दरअसल शोषण चक्र की बर्बर दास्तान थी। इसके बारे में कई ब्योरे अनेक रिपोर्टों में आ चुके हैं। इसका सिर्फ अंदाजा लगाया जा सकता है कि अगर कोई कामगार अचानक तबियत खराब होने की वजह से काम पर नहीं जा पाता तो न सिर्फ उसकी तनख्वाह से एक दिन के तीन सौ बीस रुपए काट लिए जाएंगे, बल्कि महीने भर की तनख्वाह के मद में ही जुड़ी अठारह सौ की राशि भी हड़प ली जाएगी, तो हालत क्या होगी। यह वहां का नियम था। लोकतंत्र की चादर ओढ़ कर किस बर्बर लुटेरी सरकार ने किसी दुकानदार को इंसान का लहू चूसने का हक दिया? क्या यहां के दुकानदारों की तमाम दुकानें आजाद देश हैं और वहां उनका अपना संविधान चलता है? क्या अब उनके हक में संविधान को बदल दिया जाएगा या बदल दिया गया है?

पूंजीवाद के परदे के पीछे से सत्रहवीं-अठारहवीं सदी के यूरोप के सामंतवाद की रगों में बहते वर्णवाद ने पिछले दो-ढाई दशक में मजदूरों के व्यापक हितों और खासतौर पर ट्रेड यूनियनों के खिलाफ जो जहर फैलाया है वह अब अपने पूरे असर के साथ सामने आ रहा है। काम और जरूरत के बीच के प्रबंधन में अपनी बेईमानी, काहिली और अक्षमताओं को छिपाने के लिए ट्रेड यूनियनों पर यह आरोप मढ़ देना आसान है कि उनके चलते काम की संस्कृति बिगड़ी। लेकिन इसके पीछे असली मंशा क्या होती है, यह बताने में इसलिए शर्म आती है क्योंकि फिर इससे यह परदा उतर जाएगा कि मकसद यह है कि कम से कम मजदूरों का ज्यादा से ज्यादा शोषण करके अपने मुनाफे को कितना ज्यादा बढ़ाया जा सकता है।

पूंजीवाद के घोड़े पर सवार सामंतवादियों को यह अच्छे से पता है कि भारत जैसे देश की सरकारों को अब वे इतनी छूट देने की हालत में ला चुके हैं कि वे चाहें तो किसी मजदूर के जिंदा रहने भर के लिए पेट भर कर उसके लहू का एक-एक कतरा तक चूस ले सकते हैं, यहां कोई रोक-टोक नहीं है। देश के कई इलाकों के औद्योगिक क्षेत्रों से यह मांग उठ चुकी है कि ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना की वजह से उद्योगों को "सही मजदूरी" पर काम करने वाले लोग मिलने बंद हो गए हैं, इसलिए नरेगा जैसी योजना को बंद कर देना चाहिए। अंदाजा लगाया जा सकता है कि सौ दिन के बजाय अगर साल भर के रोजगार की गारंटी सुनिश्चित कर दी जाए तो शोषण के इन कारखानों की क्या दशा होगी। यह भी ध्यान रखने की जरूरत है कि मनरेगा जैसी योजनाओं का वास्तविक लाभार्थी कौन है और किसे इस योजना से आपत्ति है और कौन इसे खत्म करने की मांग कर रहा है। तमाम सरकारी कल्याण कार्यक्रमों के तहत मिलने वाले लाभों की जरूरत समाज के किस तबके को है और सब कुछ का हल निजीकरण और विदेशी पूंजी निवेश में देखने वाले लोग आखिरकार किसके हित की वकालत कर रहे हैं? सिर्फ एक उदाहरण काफी है। नब्बे के दशक में पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षण लागू हुआ, उसके बाद सरकारी नौकरियां लगातार कम होती गईं और निजी क्षेत्र के लिए मैदान खुला छोड़ दिया गया। दरअसल, आरक्षण की "समस्या" का सीधा जवाब निजीकरण था और नब्बे के बाद अब तक की पूंजीपरस्त सरकारों का मकसद जितना आर्थिक सुधार है, उससे ज्यादा बड़ी लड़ाई वह सामाजिक मोर्चे पर लड़ने में लगी है।

जनतंत्र की नाक और सामंती सत्ता-तंत्र...

पिछले दो दशक में मजदूरों के हक में बनाए गए तमाम कानूनों की क्या गत कर दी गई है, यह जानने के लिए देश के तथाकथित लोकतंत्र की नाक दिल्ली और इससे सटे गुड़गांव, फरीदाबाद, नोएडा या गाजियाबाद जैसे इलाकों में तमाम फैक्ट्रियों या काम देने वाले संस्थानों का अध्ययन किया जा सकता है। देश का श्रम मंत्रालय और श्रम निरीक्षक अब श्रम कानून पर अमल सुनिश्चित करने के बजाय मालिकों की सुविधा सुनिश्चित करने में लगे हैं।

कितनी न्यूनतम तनख्वाह होनी चाहिए; काम के अधिकतम घंटे कितने होने चाहिए; काम और श्रमिकों का क्या अनुपात होना चाहिए; लागत और मुनाफे का क्या अनुपात होगा; मुनाफे में मजदूरों को कितना न्यायपूर्ण हिस्सा मिलना चाहिए; मजदूरों के लिए सामाजिक सुरक्षा नीतियों के क्या इंतजाम हैं या इन पर अमल की क्या हकीकत है... जैसे न जाने कितने सवाल हैं। लेकिन इन पर बात करना अब पिछड़ेपन की निशानी मान लिया गया है। यानी मानवीयता के तमाम तकाजों को ताक पर रख कर ही "अगड़ेपन" का झंडा उठाया जा सकता है। फिर भी, दुनिया से सबसे बड़ा लोकतंत्र होने का दावा...! ठीक है...! तो क्या यहीं यह सवाल भी उठा दिया जाए कि अगर यही सच है तो यह "सिस्टम" बताए कि क्या वह अनंतभूतकाल से "अगड़ेपन" का आसन जमाए तबकों की प्रतिनिधि है?

आठ घंटे काम और उसके हिसाब से मेहनताना अब केवल बचे हुए सरकारी नौकरों के खाते में है। वहां भी निजी ठेकेदारी का बोलबाला है और सरकार खुद ठेकेदार बन कर और मजदूरों को बंधुआ गुलाम बना कर भर्ती करने की रिवायत शुरू कर चुकी है। बाकी ज्यादातर जगहों पर रजिस्टर पर आठ घंटे की ड्यूटी और छह हजार रुपए की तनख्वाह दर्ज कर मजदूरों से हस्ताक्षर कराने वाले ठेकेदार कंपनियां किस तरह मजदूरों को चार हजार रुपए पर बारह घंटे खटवाती हैं, इसका हिसाब लेने वाला कोई नहीं है। पहले इस्तीफा लिखवा कर किन शर्तों पर नौकरी दी जाती है या किन हालात में मजदूरों को काम करना पड़ता है; महंगाई के नाम पर लगातार बढ़ती लूट के बीच कितने लोग न्यूनतम खर्चे लायक भी आमदनी भी नहीं हो पाने की वजह से अपने गांव लौट गए; विकास के नाम पर दिल्ली जैसे शहरों को चुपके-चुपके किनके लिए टिक सकने लायक बनाया जा रहा है; अपना और अपने परिवार का पेट नहीं पाल पाने की हताशा में खुदकुशी कर लेने के फैसलों के पीछे कौन-सी वजहें हैं; इन सबकी सच्चाई अगर आम हो जाए तो यह तय करना मुश्किल होगा कि यह देश कैसे आधुनिक पैमानों पर आगे बढ़ता एक लोकतांत्रिक देश है और क्यों नहीं इसे आदिम या मध्ययुगीन बर्बर नियम-कायदों में मरने-जीने वाले किसी सामंती समाज के सत्ता-तंत्र और उसी व्यवस्था के तौर पर देखा जाए...!

Monday 1 October 2012

गैंग्स ऑफ वासेपुरः नकली यथार्थ का हिंसक चेहरा...




अनुराग कश्यप और अनुराग बसु के जातिबोधक पुछल्ले को छोड़ कर कई चीजें संयोग से समान हैं। दोनों के नाम एक ही हैं, दोनों ही बॉलीवुड में पुरबिए हैं और दोनों ने लगभग एक साथ फिल्में बनानी शुरू कीं। बतौर सह-स्क्रिप्ट लेखक "सत्या" के यथार्थ का सिरा थाम कर अनुराग कश्यप "गुलाल" और "पांच" होते हुए "गैंग्स ऑफ वासेपुर" का नकली यथार्थ रचने तक आते हैं, जहां हिंसा के वीभत्सतम शक्ल समाज के एकमात्र यथार्थ हैं। इसमें प्रेम एक खेल भर है, जिसे हिंसा के सामने हार जाना है, खुदकुशी कर लेना है। दूसरी ओर अनुराग बसु हैं जो "गैंग्स्टर" से "बर्फी" तक में हजारों सालों से क्रमशः सभ्य होते समाज के मूल-तत्त्व प्रेम और संवेदना को ही स्वीकार करते हैं, उसे थोड़ा और निखारते हैं। लेकिन इस बीच वे सामाजिक हिंसा के उस पहलू से बड़े करीने से तंज की तरह आपको रूबरू कराते हैं जो आपके आसपास हर पल घटित हो रही होती है। मुमकिन है, हम खुद उस हिंसा के शिकार हों या फिर खुद ही हिंसा करने वाले।

खासतौर पर "बर्फी" में नायिका की मां के महज अपनी सुविधाजनक जिंदगी के लिए प्रेमी को छोड़ देने से लेकर एक अल्पविकसित बच्ची के बाप के अपने घर के तमाम नौकरों को लात मार कर नौकरी से निकाल देना या धन के लोभ में अपनी उस बच्ची की हत्या तक की योजना पर अमल करना स्वार्थ से उपजी हिंसा की वे शक्लें हैं जो हम सबके लिए सिनेमा के परदे पर घटने वाली कहानी नहीं है। यह आम सामाजिक जिंदगी में घुली वे तल्ख हकीकतें हैं जिनसे हमारा समाज अक्सर दो-चार होता है। बहरहाल...

हिंसा का रूमान...

"गैग्स ऑफ वासेपुर- II" के रिलीज होने के पहले अनुराग कश्यप ने एक टीवी चैनल पर जो कहा था उसका आशय लगभग यही था कि वे हिंसा को लेकर एक रूमान में चले जाते हैं। यह भी अखबारों में छपा कि "गैंग्स ऑफ वासेपुर" में उन्होंने जानबूझ कर इतनी वीभत्स हिंसा का सहारा लिया। इसके पहले की उनकी फिल्म "पांच" पर भी हिंसा को लेकर सवाल उठ चुके हैं। इंसानी समाज के लाखों सालों और इस "सनातनी" समाज के तीन-चार या पांच हजार साल के विकास के इतिहास में किसी भी व्यक्ति के जीवन में वे कौन-से दौर हो सकते हैं या कैसी बुनियाद हो सकती है कि वह "हिंसा" को लेकर इस हद तक रूमानी हो जाता है? जज्बात और दिमाग की कसौटी पर इंसान ने अब तक खुद को जितना सभ्य बनाया है, उसमें नफरत का एकमात्र सकारात्मक इस्तेमाल "हिंसा" से नफरत करना हो सकता है। लेकिन इसी नफरत के दूसरे चेहरे के मूल से हिंसा जन्म लेती है।



तो जाहिर है, अगर कोई व्यक्ति हिंसा से प्रेम करेगा तो स्वाभाविक रूप से यह हिंसा उसके भीतर के नफरत के दूसरे प्रकार से पैदा हुई होगी। सवाल है कि अनुराग कश्यप के भीतर किस बात पर और किसके खिलाफ इतनी नफरत भरी हुई है कि वे हिंसा को लेकर रूमान में चले जाते हैं!

किसी व्यक्ति के हिंसा का प्रेमी होने की दो वजहें हो सकती हैं। एक, हिंसा उसके पारिवारिक-सामाजिक परिवेश का हिस्सा हो और वहीं से वह उसके स्वभाव में घुली हो। हिंसा के इस पैमाने से भी दो सिरे फूटते हैं। पहला, सामाजिक सत्ताधारियों का अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए हिंसा का एक औजार के रूप में इस्तेमाल और दूसरा, लगातार हिंसक दमन और शोषण के चक्र में पिसते हुए उसका अभ्यस्त हो जाना।

अगर कोई सामाजिक सत्ताधारियों के वर्ग से आता है तो उसके हिंसा प्रेमी होने की दूसरी वजह यह हो सकती है कि पारिवारिक-सामाजिक तौर पर व्यक्ति का जो मनोविज्ञान तैयार होता है, उसकी शासित और शोषित वर्गों के खिलाफ अभिव्यक्ति हुई तो ठीक, वरना वह दूसरे रास्ते तलाशने लगता है। अब एक आधुनिक समाज में चूंकि मध्ययुगीन सामंती तौर-तरीकों से हिंसा को अभिव्यक्त कर पाना मुश्किल होता गया है, इसलिए ऐसा व्यक्ति किसी न किसी रास्ते और रूप में अपनी एक सत्ता खड़ा करता है; और उसे वैध और स्वीकार्य बनाता है। इसके बाद शुरू होता है हरेक कुंठाओं की अभिव्यक्ति और फिर इसके जरिए अपनी "सत्ता" को मजबूत करने के खेल। और स्वाभाविक रूप से इसका शिकार शासित वर्ग ही होगा, बस शक्ल थोड़ी दूसरी होगी।

इस तरह हिंसा से प्रेम करने वाला सत्तावादी आखिरकार यथास्थितिवाद का संरक्षक और वाहक बनता है।

(स्पष्टीकरणः हिंसा के प्रति यह भाव और विचार इन पंक्तियों के लेखक का शुचितावाद है।)

यानी अनुराग कश्यप का हिंसा के प्रति रूमान एक सामंती ढांचे की रचना करता है, या फिर उसी से संचालित होता है। यहां संदर्भ चूंकि "गैंग्स ऑफ वासेपुर" है, इसलिए इस अभिव्यक्ति को इसी के जरिए समझना होगा और इसी का सिरा पकड़ कर चेतना में पैठी ग्रंथियों तक जाना होगा।

स्त्री के खिलाफ व्यवस्थागत हिंसा की शक्लें...

एक शुद्ध सामंती समाज में हिंसा की जितनी शक्लें हो सकती हैं, "गैंग्स ऑफ वासेपुर" के दोनों हिस्सों में सबका खुला इस्तेमाल किया गया। दिक्कत यह है कि इस प्रवृत्ति की पड़ताल करने के बजाय उसे इस रूप में प्रदर्शित किया गया जो इन्हीं ग्रंथियों की बुनियाद पर मरते-जीते समाज की कुंठाओं को तुष्ट और मजबूत करने का जरिया बना। यह फिल्म इस बात का कोई सबूत नहीं देती कि फिल्मकार की ठीक यही मंशा नहीं रही होगी। एक दृश्य में जो पत्नी वेश्यालय गए अपने पति को डंडे से फटकारते और वीभत्स गालियां बकते हुए खदेड़ती है, वही अगले किसी दृश्य में यह कहते हुए पति को जम कर खाना खिलाती है कि "बाहर जाकर नाम खराब मत करना...।" कल्पना कीजिए कि यह दृश्य कितना यथार्थ हो सकता है। लेकिन इसके जरिए फिल्मकार ने सिनेमा के इस दृश्य को देख कर सीटियां बजाते दर्शकों की किस मर्द कुंठा को तुष्ट किया और कैसे उनके दिमाग में इसके अपने लिए सच होने की कामना की रचना की? जब यथार्थ के प्रयोग के नाम पर झूठ ही परोसना था तो क्या पति-पत्नी की जगह की अदला-बदली की जा सकती थी?

लेकिन अगर इसे अनुरागी यथार्थ मान भी लिया जाए कि पत्नी पति को "बाहर नाम करने" के लिए मर्दाना ताकत से लैस करती है, तो सवाल है कि स्त्री के खिलाफ व्यवस्थागत हिंसा किन-किन शक्लों में काम करती रहती है और उसे बनाए रखने के लिए कौन-कौन से कारक जिम्मेदार होते हैं? अगर इस देश की तिरपन फीसद से ज्यादा महिलाएं कहती हैं कि उनका पति उन्हें पीटता है तो इसमें कुछ भी गलत नहीं, तो इसके पीछे कौन-सा माइंडसेट काम कर रहा होता है? दिल्ली के साउथ एक्सटेंशन या रजौरी गार्डन जैसे पॉश इलाकों से कई मामले कुछ काउंसिलरों के पास गए। मर्द अपनी बीवी को कहता है कि मैंने तुम्हें इतना बड़ा शानदार घर दिया है; बीएमडब्ल्यू कार दी है; यहां के सबसे महंगे मार्केट में जाने के लिए पैसे की कोई कमी होने दी मैंने; तेरा बेटा इस शहर के सबसे महंगे स्कूल में जाता है न; फिर तुझे यह पूछने का हक किसने दिया कि मैं किस औरत के पास जाता हूं और क्या करता हूं? शायद इसी से मिलता-जुलता डायलॉग एक फिल्म "ब्रेकिंग न्यूज" में भी था।

"गैंग्स ऑफ वासेपुर" के एक दृश्य में पति के वेश्या के पास जाने पर डंडा फटकारने और गालियां देने के बरक्स दूसरे दृश्य में उसके बाहर जाकर "नाम खराब करने" के डर से उसे "मर्दाना" ताकत से लैस करने के विरोधाभास को छोड़ भी दिया जाए और अगर पत्नी को पति का वेश्या के पास जाना आपत्तिजनक नहीं लगता है, तो अपने अस्तित्व के खिलाफ इस हिंसा को गलत नहीं मानने वाली स्त्री का यह माइंडसेट कहां से संचालित होता है? और इस दृश्य के सामूहिक-सार्वजनिक प्रदर्शन के असर के तौर पर दर्शक सीटियां और तालियां बजाते हैं तो इस दर्शक-वर्ग के अंतस में पैठी पुरुष ग्रंथि को जस्टीफाइ करने में इस दृश्य की क्या भूमिका है? ...और इस रास्ते व्यवस्थागत हिंसा के इस शक्ल को खाद-पानी मुहैया करने में ऐसे दृश्यों की क्या भूमिका है?

खैर, इस फिल्म और फिल्मकार का मकसद केवल स्त्री के अस्तित्व को खारिज करना भर नहीं है। "वीर भोग्या वसुंधरा" की "सैद्धांतिकी" के तहत उसे इस खारिज करने को विस्तार देकर महज एक शरीर और पुरुष के चरम-सुख के इंतजाम भर की हैसियत में समेट कर रख देना भी है। और हमारी भारतीय संस्कृति के वीर पुरुष अपने तमाम सुखों के भोग के क्रम में किस हद तक अराजक और असभ्य-अविकसित रहे हैं, यह ज्यादातर स्त्री अपने अनुभव से बता सकती है। और जब किसी मर्द के इसी बर्ताव की मनचाही अभिव्यक्ति नहीं हो पाती है तो फिर मन के किसी कोने में वह कुंठा बन कर बैठ जाती है। फिर जैसे ही संसाधनों का मालिकाना और बेलगाम अभिव्यक्ति की सत्ता अपने हाथ में आती है, वह कुंठा एक निर्लज्ज नाच नाचती है।

बेतुकेपन का बेजोड़ वितंडा...

"गैंग्स ऑफ वासेपुर" के पहली किस्त में जहां गोलियों से छलनी सरदार खान के झूमने के नेपथ्य में बजता "जीय हो बिहार के लाला..." फिल्म की राजनीति का आईना है, वहीं दूसरी किस्त में फैजल खान के हाथों रामाधीर सिंह के मारे जाने का दृश्य कुंठाओं का वीभत्स, बर्बर और बेलज्ज प्रदर्शन है। और कुंठाएं कैसे बेतुकेपन का वितंडा रचती हैं, यह भी इससे साफ होता है।

जिस दृश्य में फैजल खान हिंसा के तमाम पहलुओं पर "विचार" करते हुए "अफसोस से भर कर" जार-जार आंसू बहा रहा होता है, उसके कुछ ही मिनट बात वह एक अस्पताल में रामाधीर सिंह को घेर लेता है। एक-दो गोली से मर जाने के बावजूद फैजल खान दर्जनों एके- 47 राइफलों की हजारों गोलियां रामाधीर सिंह पर बरसाता है। इस फिल्म के फिल्मकार का कोई दीवाना गंजेड़ी फैजल खान की इस "बहादुरी" पर झूम उठता है तो भी इसे उसकी "दीवानगी" का नतीजा मान लिया जा सकता है। लेकिन यह फैसला इसके बाद के दृश्य पर होना है।

पश्चिमी शैली से शौचालय के कमोड पर हजारों गोलियों से छलनी रामाधीर सिंह की छाती में हुए छेद में फैजल खान अपने हाथ के एके- 47 की नली का अगला सिरा घुसेड़ता है और उसके बाद जो करता है, वह सिर्फ और सिर्फ इसी बात का सबूत है कि चरम यौन-हिंसक कुंठाओं की बर्बर अभिव्यक्ति के जरिए भी दरअसल वही राजनीति साधी गई है, जिसका मकसद समूची मुसलिम जमात के खिलाफ एक खास धारणा और खयाल को "आम" हिंदू मानस में "इंजेक्ट" करना है।

यहां कोई चाहे तो फिल्मकार को यह सोच कर बख्श दे सकता है कि जिसके पास संसाधन और सत्ता है और वह जैसे चाहे खुद को अभिव्यक्त कर सकता है। लेकिन गुंजाइश इसकी भी बनती है कि आप फिल्मकार के दिमाग की दाद दें कि बेहद "सस्ते" और "चलताऊ" दृश्यों के जरिए उसने कितने बारीक खेल किए हैं! निश्चित रूप से यह काम कोई साधारण दिमाग का शख्स तो नहीं ही कर सकता। लेकिन उसकी परतें उधेड़ पाना भी उतना ही जटिल है।

मन की हजार परतों के पार की कुंठा...

इस दृश्य की राजनीति के बरक्स अगर इसका सिरा ढूंढ़ें तो वह उस सामंती मानसिक ढांचे में मिलता है, जो न सिर्फ हिंसा को लेकर रूमान में चला जाता है, बल्कि स्त्री और उसका शरीर भी इस हिंसक रूमान का एक अच्छा शिकार ही हैं। यानी, जो व्यक्ति सेक्स के दौरान अपनी स्त्री साथी को सिर्फ चरम-सुख मुहैया कराने वाली एक खिलौना समझेगा और उसी हिसाब से हिंसक व्यवहार भी करेगा, उसी के अवचेतन से ऐसे दृश्य निकलेंगे। बदला लेने का आक्रोश ऐसी हरकत का महज एक परदा भर हैं। और यह भी ध्यान रखने की जरूरत है कि हमारे सामाजिक ढांचे में बदला लेने को बलात्कार के सबसे अहम कारणों के तौर पर दर्ज किया गया है। यानी किसी पुरुष से बदला लेना है तो उसके परिवार की किसी स्त्री के साथ बलात्कार। एकबारगी आपके सामने इस व्यवस्था में स्त्री की स्थिति और स्त्री इस स्थिति में बनाए रखने वाले औजारों के पुर्जे खुल जाते हैं। तो क्या फैजल खान का रामाधीर सिंह पर हजारों गोलियां बरसा कर उसके सीने में बने छेद में बंदूक की नली घुसेड़ कर आगे-पीछे करना और बैकग्राउंड में "कह के लेंगे..." की गूंज इन्हीं मनोवैज्ञानिक परिस्थितियों का समुच्चय है?

इस दृश्य के रचेता चाहे जो हों, इतना तय है कि इस सामंती व्यवस्था के बुनकरों ने ऐसी ही बारीक बुनाई करके सत्ता और शासित का मनोविज्ञान तैयार किया होगा। किसी मर्द को जलील करना हो तो उसके परिवार की स्त्रियों की देह को लक्ष्य करके गालियां दो, यानी मौखिक बलात्कार करो; स्त्री को जलील करना है तो इसी की शारीरिक अभिव्यक्ति और यहां तक कि मर्द से भी बदला लेना है तो उसके शरीर में भी "स्त्री" ढूंढ़ लो। इतना महीन व्यवस्थावादी दृश्य का जोड़ा खोजना मुश्किल होगा।

परदे के पीछेः खेल चालू आहे...

बहरहाल, "गैंग्स ऑफ वासेपुर" पर लिखे के पहले हिस्से के आखिर में एक तुक्का था कि बॉलीवुड में आरएसएस ने ढाई हजार करोड़ रुपए का परोक्ष निवेश किया है। इस तुक्के से कुछ अनुराग भक्त इतने डर गए कि इसे यानी "बॉलीवुड" को उन्होंने "गैंग्स ऑफ वासेपुर" समझ लिया और मुझे निशाना बना कर एक तरह का अभियान चल पड़ा था। मुझे इतना महत्त्व देने की क्या जरूरत थी! फिल्मों में अंडरवर्ल्ड के पैसे के बारे में भी तो ऐसी ही बातें कही-सुनी जाती रही हैं। कही-सुनी जाने वाली सभी बातें सही ही हों, यह जरूरी तो नहीं। यह जितना आरएसएस के लिए सच है, उतना ही अंडरवर्ल्ड के लिए भी। लेकिन अब इसका क्या करेंगे कि अखबारों ने बताना शुरू कर दिया है कि "कहीं मोदीवुड न बन जाए बॉलीवुड...।"  एक भाड़े का ब्रांड एंबेसडर तो पहले ही मोदी के नमक के साथ-साथ उसका तलुवा चाटने में लगा है, अब अजय देवगन, अक्षय कुमार, सन्नी दयोल जैसे कई महानायकों को भी मोदी अपना (जहर वाला) दूध पिला रहा है। संजय दत्त... आदि सब मोदी का चरण-रज धोकर पीने को तैयार हैं तो क्या यह सिर्फ इसलिए हो रहा है कि मोदी सबको प्रशासनिक सुरक्षा मुहैया करा सकते हैं। यह ध्यान रखना चाहिए कि हमारे ये तमाम "महानायक" खालिस दुकानदार हैं, इनके हंसने और रोने की कीमत होती है और इन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि पैसे और सुविधाओं के बदले नरेंद्र मोदी को इनसे क्या चाहिए! जैसे एक जहर के विक्रेता को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसकी दुकान से खरीदे गए जहर से कौन मरा! और मोदी केवल दुकानदार नहीं हैं, यह एक ऐसे (सांप्रदायिक) राजनीतिक व्यक्ति का भी नाम भी हैं, जो जानता है कि इन खूब बिकने वाले चेहरों का क्या इस्तेमाल किया जा सकता है। तथाकथित विकास की चमक से "थरथराते" गुजरात में लगभग मुफ्तिया, यानी बिना लागत के "इंटरटेनमेंट" दुकानदारी चलाने के एवज में नरेंद्र मोदी क्या इन भाड़े के परदेबाजों को यों ही इतनी रियायत देने जा रहे हैं? अगर कोई ऐसा सोच रहा है तो उसकी मासूमियत पर तरस खाइए!

नरेंद्र मोदी को बहुत अच्छे से मालूम है कि आईने में उनका चेहरा कैसे कभी नीरो तो कभी हिटलर जैसा दिखता है। इस चेहरे पर एक परदा वे ही डाल सकते हैं जो खुद अपने तमाम धतकर्मों के बावजूद परदे के जरिए जनमानस के "हीरो" बने हुए हैं। और एक "नायक-छवि" जब किसी वास्तविक खलनायक को भी अपने पहलू में खड़ा कर लेता है तो हमारी "दिल-दरिया" जनता उसे बड़ी आसानी से पहले सह-नायक और फिर नायक के रूप में कबूल कर लेती है।

तो नरेंद्र मोदी इसी फिराक में हैं कि परदे के नायकों पर मेहरबानी बरसाने के नाते जनता उन्हें नायकों का नायक घोषित कर दे। (और कुछ भाड़े के "नायक" इसके लिए जीभ चटकारते हुए खुद ही रिरियाने में लगे हैं)। यों यह प्रक्रिया काफी पहले शुरू हो चुकी है। अपनी दुकानदारी के जरिए "व्यवस्था" कायम रखने के लिए तमाम मानवीय तकाजों को ताक रखने वाला "इंडिया-इंक" अपने सहधर्मी नरेंद्र मोदी को अपना पसंदीदातम प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर चुका है; और एक फर्जी इंटरनेशनल पत्रिका "टाइम" ने भी अपने कवर पर मोदी का फोटू छाप कर यह बता दिया है कि प्रोपेगेंडा-वार के मोर्चे कहां-कहां खुलते हैं। पिछले एक-डेढ़ साल से देख लीजिए कि आक्रामक हिंदुत्व ने कहां-कहां अपना मोर्चा खोल दिया है। असम से पसरी साजिश को समझना बहुत मुश्किल नहीं है। एक ऐसी हवा बहाई जा रही है जिसका सिरा एक खास ध्रुव से जुड़ता है और वहीं आकर खत्म होता है।

किसका खून असरदार...

बहरहाल, "गैंग्स ऑफ वासेपुर- II" का इन आरोपों से कोई लेना-देना नहीं है। बस फिल्म को फिल्म की तरह मासूमियत से देखिए। इसका अंतिम दृश्य है- रामाधीर सिंह को मारने के बाद पुलिस फैजल खान और डेफनिट को जीप में ले जा रही है। एक चाय की दुकान पर गाड़ी रुकती है। पुलिस की मिलीभगत से डेफनिट फैजल खान को गोली मार देता है। एक खास भाव के साथ डेफनिट आगे बढ़ रहा है कि सामने उसकी मां "दुर्गा" अपनी भव्य छवि, विजयी भाव और गजब का संतोष चेहरे पर लिए उभरती है। ... और फिल्म खत्म...!

अगर आपने फिल्म देखी होगी तो याद करिएगा कि एक दृश्य में रामाधीर सिंह "दुर्गा" को क्यों कहता है कि "डेफनिट में तुम्हारा खून कम है।" यानी सरदार खान का खून ज्यादा है और यानी एक हिंदू का खून कम है औऱ एक मुसलमान का खून ज्यादा है। ...और "दुर्गा" के सामने यह चुनौती थी कि वह साबित करे कि उसके बेटे के शरीर में उसका खून ज्यादा है। "दुर्गा" ने साबित किया कि डेफनिट उसका बेटा ज्यादा है!

(क्षेपकः यथार्थ इतना मजेदार होता है...

इसके अलावा, "आम" लोगों को पहली बार लगा होगा कि यथार्थ इतना "मजेदार" होता है। एक यथार्थवादी फिल्म का यथार्थ देखिए और उसके दृश्यों को याद कर-कर के मजा लीजिए। गर्दन काटने पर खून के छर्रे के यथार्थ दृश्य के साथ-साथ फैजल खान और उसकी पत्नी की शादी के बाद उनके घर में तूफानी ढकर-ढकर भी शायद यथार्थ ही होगा। और इस फिल्म का सबसे बड़ा यथार्थ तो वे दृश्य हैं जिसमें सरदार खान के मारे जाने के बाद उसके घर के दरवाजे पर उसकी लाश रखी है और बगल में आर्केस्ट्रा के साथ झमकउआ गायक "याद तेरी आएगी... " गा रहा है, और फिर सरदार खान के बेटे दानिश के मारे जाने के बाद भी वही दृश्य है। बस गाना बदल गया है- "तेरी मेहरबानियां...तेरी कदरदानियां...।"

अभी तक मैं मतिमंद पटना से लेकर दिल्ली तक में मुस्लिम समाज को जितना जान सका, उसमें मुझे कभी यह पता नहीं चल सका कि किसी जवान-जहान की मौत या हत्या पर कहां ऐसी रिवायत है कि लाश सामने रखी हो और शोक जताने के लिए ऑर्केस्ट्रा पार्टी को बुलाया गया हो। जाने किस शरीयत या मजहबी नियम-कायदों में दर्ज है यह और कहां इस पर अमल होता ! हिंदुओं में भी किसी बहुत बुजुर्ग के मरने पर ही ढोल-पिपही पर केवल यही बजते सुन सका- "रघुपति राघव राजा राम...।" बहरहाल, यथार्थ के पिक्चराइजेशन से मिलने वाला मजा "यथार्थ" से हजार गुना ज्यादा मजेदार होता है...!)

बहरहाल, इस सबमें "गैंग्स ऑफ वासेपुर" के फिल्मकार की क्या गलती है। उसने तो वही कहा, जो उसे कहना था! अब अगर किसी फिल्मकार की फिल्म को उसकी तरह नहीं समझा जाए तो इसमें गलती किसकी है?

हजारों सालों के तमाम उतार-चढ़ाव के बावजूद इस "सनातनी-व्यवस्था" ने अगर खुद बचाए और बनाए रखा है तो इसलिए कि वह एक साथ सैंकड़ों मोर्चों पर राजनीति करती है। बॉलीवुड एक मामूली-सा औजार है।

Monday 6 August 2012

"गैंग्स ऑफ वासेपुर" : फिल्म नहीं, सामंती कुंठाओं की राजनीति...





स्पष्टीकरणः "आप फिल्म को फिल्म की तरह देखते हैं। आप समाज को भी फिल्म की तरह देखते हैं। ...मैं फिल्म को समाज की तरह देखता हूं... और समाज को राजनीति की तरह देखता हूं।"





"सच्ची" कहानी का वासेपुर...

क्या आरएसएस ने नरेंद्र मोदी ब्रांड हिंदुत्व को जमीन पर उतारने के लिए फिल्मी दुनिया में किसी नए मोर्चे पर कुछ लोगों को बहाल किया है? मेरी दरख्वास्त है कि इस तुक्के को महज अतिशयोक्ति मान कर खारिज़ कर दिया जाए। लेकिन "गैंग्स ऑफ वासेपुर" फिल्म के पहले हिस्से ने जो तल्ख सवाल छोड़े हैं, उसका जवाब यह नहीं हो सकता है कि अनुराग कश्यप ने महज एक "सच्ची" घटना को फिल्माया है, और कि फिल्में समाज का आईना होती हैं और सिर्फ मनोरंजन होती हैं। विरोधाभासों के सम्मिश्रण की अपनी राजनीति होती है।

अगर सिर्फ एक सच्ची कहानी को फिल्माया है, या यह समाज का आईना है या सिनेमा सिर्फ मनोरंजन होता है तो इस सच्ची कहानी का संयोग ऐसा क्यों है कि यह मुसलमानों के खिलाफ पिछले डेढ़-दो दशक से सुनियोजित तरीके से फैलाए जा रहे जहर को और बारीक असर देता है, सामाजिक ढांचे के हिसाब में दबंग जातियों के तमाम अपराधों और कुकर्मों को ग्लैमराइज करता है, निचली जातियों के खिलाफ नफरत के मनोविज्ञान को और पुख्ता करता है और स्त्री को उसकी देह की हैसियत में समेट कर कदम-कदम पर जलील करता है। इनमें से कौन-सा पहलू ऐसा है जो आरएसएस के एजेंडे को खाद-पानी मुहैया नहीं करता है। कुछ लोग यह सफाई पेश करने में लगे हैं कि इस फिल्म की कहानी का लेखक एक मुसलमान ही है। कई जगहों पर उसका नाम जीशान कुरैशी छपा है। यह ध्यान रखना चाहिए कि उसका नाम "सैयद जीशान कादरी" है।

मैंने पहले घोषणा की है कि मैं फिल्म को समाज की तरह देखता हूं और समाज को राजनीति की तरह देखता हूं। तो "गैंग्स ऑफ वासेपुर" का समाज क्या है और इसके जरिए अनुराग कश्यप ने कौन-सी राजनीति करने या उसे मजबूत करने की कोशिश की है? यह बात करने की जरूरत शायद नहीं होती, अगर अनुराग कश्यप ने यह मुनादी न की होती कि यह फिल्म वासेपुर की सच्ची घटनाओं पर आधारित है।

चिदंबरम का आजमगढ़ बनाम अनुराग कश्यप का वासेपुर...

वासेपुर की वह "सच्ची" तस्वीर अनुराग कश्यप की निगाह में कैसी है इसका अंदाजा बीबीसी पर छपी उस खबर के हिस्से से लगाया जा सकता है जिसमें पटना में उनके किसी साक्षात्कार का हवाला है। उसमें उनका कहना है कि "वासेपुर के लोग अपराधी हैं, गैरकानूनी कामों में लिप्त रहते हैं और फुट-सोल्जर्स हैं।" अगर यह सच है तो यह है (अनुराग) कश्यप ब्रांड "सच्ची" घटनाओं के गहनतम "रिसर्च" का नतीजा... और निष्कर्ष। अब वासेपुर के तमाम लोग चाहे अनुराग कश्यप को झूठा कहते रहें, रिरियाते हुए आपको हाथ पकड़ कर अपने मुहल्लों में ले जाकर घुमाएं, दिखाएं कि देखो, हम अपराधी नहीं हैं। मेहरबानी करके यह भी देखो कि यहां वैज्ञानिक, इंजीनियर, डॉक्टर, आइएएस-आइपीएस, कारोबारी और बुद्धिजीवी भी हैं। फहीम खान और शबीर खान के परिवार की आपसी रंजिश और वर्चस्व की लड़ाई, जिसका कोयले से कोई नाता नहीं था , वासेपुर का चेहरा न कभी थे, न हैं। लेकिन तथ्यों के तमाम साक्षात दस्तावेज "गैंग्स ऑफ वासेपुर" के फिल्मकार के रिसर्च की अदालत में बेमानी साबित होने हैं, जैसे चिदंबरम की अदालत में आजमगढ़ के मायने आतंक का गढ़ है, वैसे ही अनुराग की अदालत की अदालत में वासेपुर के मायने गुंडों की बस्ती। आजमगढ़ सिर्फ मुसलमानों की वजह से आतंक का गढ़ और वासेपुर की लगभग पनचानबे फीसदी आबादी की पहचान मुसलमान होना! फर्क क्या है?

हो सकता है यह सब कुछ महज संयोग हो! लेकिन कोई बताए तो सही कि इस फिल्म के बारे में अनुराग के दावे और फिर वासेपुर के लोगों के बारे में अनुराग कश्यप के "महानतम" खयालों के बाद वासेपुर की कौन-सी तस्वीर उभरती है?

एक जेनरल नॉलेज का बेहद साधारण सवाल- वासेपुर को किसलिए जाना जाता है? अब एक सामान्य जवाब इसके सिवाय क्या हो सकता है कि "वासेपुर के लोग अपराधी हैं, गैरकानूनी कामों में लिप्त रहते हैं और फुट-सोल्जर्स हैं?" अनुराग कश्यप के रिसर्च में वासेपुर को उसकी ऐतिहासिकता के साथ खोज लिया गया है, इसलिए वासेपुर में रहने वाले या वहां से उपजे वैज्ञा्निक, डॉक्टर, इंजीनियर, आइएएस-आइपीएस या बुद्धिजीवी- सब दरअसल किसी दुश्मन मुस्लिम देश से सर्टिफिकेट लेकर आ गए यहां और यहीं रह कर भारत से भितरघात करने में लगे हैं!

"सैयद" का "कुरैशी" कमाल...

बहरहाल, वासेपुर को जानने और वहां रहने वाले के हिसाब से दूसरे शहरों की तरह वहां भी कुछ परिवारों के बीच आपसी रंजिश और वर्चस्व की लड़ाई थी; फहीम खान और शबीर खान गुट मुख्य थे। सवाल है कि एक हकीकत का दावा करने वाली फिल्म में इन दोनों मुख्य "खान" में से एक मुख्य एहसान या सुल्तान कुरैशी को कैसे ढूंढ़ लिया गया? बल्कि यहां यह पूछा जाना चाहिए कि "क्यों" ढूंढ़ लिया गया। (यह फिल्म-लेखक "सैयद" जीशान कादरी का कमाल है या फिर खुद अनुराग कश्यप का!)

यही "क्यों" दरअसल फिल्मकार के एक अगले खेल को खोलता है। बल्कि शुरू से आखिर तक समूची फिल्म में "खान" और "कुरैशी" का जो समग्र चरित्र-चित्रण है, वह आम दर्शकों की कंडिशनिंग करने में भले कारगर साबित हो, लेकिन इसकी राजनीति समझने के लिए बहुत मेहनत करने की जरूरत नहीं है। मुसलमानों में खान, यानी पठान सवर्ण माने जाते हैं और कुरैशी पसमांदा।

तो वासेपुर की इस "सच्ची" कहानी में शबीर खान और फहीम खान में से एक पक्ष का "कुरैशी" हो जाना क्या अनायास है? नब्बे के दशक के राजनीतिक हालात पर थोडी-सी भी गहरी नजर रखने वाले इंसान को इसके निहितार्थ समझने में दिक्कत नहीं आएगी। मंडल आयोग की सिफारिशों  के लागू होने के बाद जिस तरह आडवाणी की रथयात्रा से लेकर सत्ता के तमाम तंत्र सामाजिक छवियों, प्रतीकों और मनोविज्ञान के "गड़ब़ड़ाए" हुए पुर्जों को "दुरुस्त" करने के लिए सक्रिय हो गए थे, वह अलग-अलग रूप में आज भी जारी है। अनुराग कश्यप की वासेपुर की कहानी दरअसल उसी की एक कड़ी है।

पूजिय विप्र शील-गुन हीना...

वैसे भी यह गुंडों-चोरों और कुकर्मियों को आदर्श नायक के रूप में परोसने का दौर है। वे जमाने गए जब सिनेमा के परदे का गब्बर सिंह बिना गाली के खौफ और नफरत का पर्याय बन गया था। कितनी ऐसी फिल्मों के नाम गिनाए जा चुके हैं, जिसका यथार्थ कहीं कमजोर नहीं पड़ा। हाल ही में पानसिंह तोमर ने गाली प्रेमी सामंतों को एक करारा झापड़-सा रसीद किया।

बहुत ज्यादा साफ करने की जरूरत नहीं है। एक तरफ सरदार खान का पिता, सरदार खान और उसके पक्ष से जुड़े सभी के सभी उस इलाके के सिरमौर गुंडे और अपराधी होने के बावजूद दर्शकों की नजर में नायक, सहानुभूति के लायक आदि "सकारात्मक" भाव लूट ले जाते हैं और दूसरी ओर एहसान कुरैशी या सुल्तान कुरैशी हैं, जिनमें कोई भैंस या गाय काटने में माहिर है, अपने "मालिक" को धोखा देता है, उन्हें खरीदा जा सकता है, बल्कि यों कहें कि वे आसानी से बिक जाते हैं; इतने नफरत से भरे हैं कि सरदार खान के बेटे की गुजारिश के बाद शादी के जरिए हुई सुलह को धोखा देकर खत्म कर देते हैं, अपने बूचड़खाने में इंसानी लाश के टुकड़े-टुकड़े कर खपा देते हैं और वासेपुर के "नायक" को आखिर में गोलियों से छलनी कर देते हैं। यानी अपनी हर कवायद से वह अपने खिलाफ घृणा पैदा करता है। यानी हीरो "खान" और विलेन "कुरैशी!" और होना भी क्या था!

यही है अनुराग कश्यप के "खान" और "कुरैशी" का चरित्र-चित्रण। जबकि पहले यह बात आ चुकी है कि वासेपुर के दोनों मुख्य अपराधी गिरोहों के मुखिया "खान" थे। लेकिन अनुराग कश्यप जब कहते हैं कि यह वासेपुर की सच्ची कहानी है तो क्या उसका सच यही है? अव्वल तो हमलावर हिंदू सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के दौर में पनचानबे फीसद मुस्लिंम आबादी वाले इलाके को अपराधी और फुट-सोल्जर्स कहना। दूसरे, पठानों और कुरैशियों के चरित्र-चित्रण में हर कदम पर पठानों को महिमामंडित करना और उन्हीं कसौटियों पर कुरैशियों के खिलाफ घृणा पैदा करना...। क्या ये अनायास हुआ है? अगर अनायास हुआ है तो यह इसलिए ज्यादा खतरनाक है क्योंकि "व्यवस्था" अपनी रक्षा के हथियार खुद तैयार करती चलती है और यही अगर सायास है तो यह दूसरी शक्ल में आरएसएस के एजेंडे पर अमल करना है; यानी मुस्लिम समाज के प्रति नफरत को बढ़ावा देना है; उसमें भी ऊंची कही जाने वाली जाति के तौर पर "खानों" को हीरो के रूप में और "कुरैशियों" को खून में डूबे रहने वाले, विलेन, धोखेबाज के तौर पर पेश किया जाना है। यानी कि कोई गुंडा और कुकर्मी अगर ऊंची जाति का तो वह "प्रेरक" और सहानुभूति का पात्र है, लेकिन अगर नीची कही जाने वाली जाति का है तो घृणास्पद है। "पूजिए विप्र शील-गुन हीना..."

किस लोकेशन से बात कर रहे हैं अनुराग कश्यप? क्या वे अपनी इस फिल्म की तल्ख हकीकत से मुंह चुराएंगे या फिर इनकार करेंगे?

बात अभी बाकी है!


जीय हो बिहार के लाला, यानी बरमेसर मुखिया अमर रहें...

इस फिल्म को देखने वाले सभी दर्शकों को कुछ याद रहे, न रहे, आखिरी दृश्य जरूर याद रहेगा।

सरदार खान और उसका बेटा इतना उदार हो गया है कि उसने सुल्तान कुरैशी की बहन से शादी करके "सदियों" पुरानी दुश्मनी खत्म करने की "पहल" की। लेकिन धोखेबाज, कट्टर, संकीर्ण, बर्बर, पिछड़ा और हिंदू (रामाधीर सिंह) के हाथों बिकाऊ सुल्तान कुरैशी अपने लोगों के साथ मिल कर धोखे से सरदार खान को गोलियों से भून देता है। इसके बाद का नाटक फिल्मकार की असली मंशा को खोल देता है- पता नहीं, जाने या अनजाने! गोलियों से छलनी, खून से लथपथ सरदार खान जिंदा है, कार से निकल कर हाथ में पिस्तौल लिए झूम रहा है और गाना बज रहा है (नारा लग रहा है)- "जीय हो बिहार के लाला... जीय तू हजार साला...!"

बस महज संयोग है कि इस "अमरगान" के सिनेमाघरों में बजने के आसपास ही यह दृश्य वास्तव में घटित हुआ। सैकड़ों दलितों का कातिल रणवीर सेना के सरगना ब्रह्मेश्वर सिंह को उसके प्रतिद्वंद्वी गिरोह ने धोखा देकर गोलियों से भून दिया। उसके बाद आरा से लेकर पटना का तांडव... नारे... "मुखिया जी अमर रहें...", "बरमेसर मुखिया जिंदाबाद...", " जब तक सूरज चांद रहेगा, मुखिया जी तेरा नाम रहेगा...!" यानी कुल मिला कर "जीय हो बिहार के लाला...!"

"गैंग्स ऑफ वासेपुर" के रचेता, सिरजनहार, उनके झंडाबरदार.... क्या सुन रहे हैं वे नारे... यानी "जीय हो बिहार के लाला...?" बिहार के किसी "लाल" का जिंदाबाद होना है तो वह सरदार खान होगा... रणवीर ब्रह्मेश्वर सिंह होगा...!

बहरहाल, ब्रह्मेश्वर सिंह के गिरोह ने हमेशा "सबकी कह के ली।" इसलिए उनका झंडा लहराने वाले इससे अलग क्या करेंगे! जब भी किसी दलित बस्ती पर हमला किया, नक्सलियों की तरह केवल "मर्दों" को नहीं, बल्कि औरतों को सबसे पहले काट-काट कर मारा, क्योंकि वे बाद में नक्सली पैदा करेंगी। जिस तरह इन रणवीरों को तीन महीने की बच्ची हवा में उछाल कर काटने में मजा आता है, मां-बहन की गालियां दरअसल उस तलवार से भी गहरा और स्थायी असर पैदा करती हैं। (फिलहाल यहां से जल्दी भागता हूं, लेकिन इस पर जल्दी ही।) गालियां एक औरत को उसकी "हैसियत" में कैद रखने का हथियार हैं, गालियां एक "नीच" जात के आदमी को यह याद दिलाती हैं कि उसकी सामाजिक औकात क्या है।

यों, मां-बहन-बेटी की वीभत्स गालियों के जरिए मौखिक बलात्कार करने वालों और उनके झंडाबरदार, वकील इन गालियों को भी शायद उसी तरह सांस्कृतिक विरासत और आभूषण की तरह सजा कर रखना चाहेंगे- "चूहड़े कहीं के...", "भंगी की औलाद...", "भंगी कहीं के...", "चोरी-चमारी", "डोम के जना..." आदि-आदि...! असली साजिश यही है।

सच्ची कहानी का वासेपुर... झूठी कहानी पानसिंह तोमर...

लेकिन "वासेपुर..." का फिल्मकार कहता है कि "जैसा मैंने देखा है, वो मेरी फिल्म में है... " और कि "जो (गालियों को) नहीं पचा सकते, वे कल के दर्शक थे।" उनके वकील इसे यथार्थ का निरूपण कहते हैं। मजेदार है। फिल्म का एक पात्र ही सूत्रधार है। लेकिन सबसे मजेदार यही है। याद नहीं आता कि पात्र के रूप में उसने फिल्म में कहां गाली बकी, लेकिन सूत्रधार साहब फिल्म और फिल्मकार की मंशा के हिसाब से दर्शकों को "अफसोस" के तौर पर "हरामी" और "साला" का हाजमोला तोहफे में देते हैं। इसके अलावा, गालियां इस फिल्म का गहना हैं, भले ही निहायत गैरजरूरी और थोपी हुई लगती हैं। लेकिन अगर यही यथार्थ की कसौटी है, तो पानसिंह तोमर एक झूठी और महा-बेकार फिल्म है।

अंदाजा लगाइए कि धोखे से सिनेमा हॉल में बैठी "वासेपुर..." देख रही महिला को कैसा लगता होगा जब हर एक गाली पर सिनेमा हॉल में मर्द ठहाके अट्टहास बन कर गूंज रहे थे। ऐसा लगता है कि  "गैंग्स ऑफ वासेपुर" का फिल्मकार बेहद गहरे तक "माइसोजिनिस्ट" यानी स्त्री-विरोधी है और उसकी यह कुंठा फिल्म में कूट-कूट कर भरी गई है। (अभी इस नजरिए से इसकी व्याख्या होनी बाकी है।)

...और गुलाब थियेटर में गैंग्स ऑफ वासेपुर...

बहरहाल, इन सब पर परेशान होना वाजिब नहीं है! आप बिहार के सालाना सोनपुर मेले में जाइए। वहां आपको अरबी नस्ल के बेहतरीन घोड़े और भव्य हाथियों के अलावा सभी नस्ल के कुत्ते बिकते हुए मिल जाएंगे। खरीदने न सही तो देखने के लिए सही! लेकिन उस मेले में अगर आप धोखा खाना नहीं चाहते तो कोई आपको धोखा नहीं देता। वह गुलाब थियेटर भी नहीं, जो केवल अपने तंबूनुमा हॉल के बाहर नहीं, बल्कि पटना और मुजफ्फरपुर या बक्सर तक के पेशाबघरों की दीवारों पर चिपकाए पोस्टरों में भी साफ तौर पर बताता और दिखाता है कि आप वहां पचास या सौ रुपए की टिकट लेकर एक-दो या चार बेबस औरतों को लगभग नंगा किए जाते देख कर मजा लेने जाते हैं।

"गैंग्स ऑफ वासेपुर" के फिल्मकार ने भी इस मामले में कोई बेईमानी नहीं की। उसने अपनी फिल्म के प्रचार में ही देश के बौद्धिक मठों से लेकर शहरों-कस्बों की सड़कों के किनारे के पेशाबखानों की दीवारों तक पर बोल और लिख कर आपको कहा कि "कह के लेंगे (मादर... की) ...!" अपने पोस्टरों पर लगभग नंगी की गई औरत की तस्वीर छापने वाले गुलाब थियेटरों की तरह "गैंग्स ऑफ वासेपुर" के फिल्मकार ने भी कोई धोखा कहां किया किसी दर्शक के साथ... समाज के साथ...!!!

बल्कि उसने तो जिस समाज की बड़े सलीके से सिंचाई की है, उसके लिए तो परलोक से बाबा गोलवलकर भी उसका शुक्रिया अदा कर रहे होंगे, इस अहसास के साथ कि कुछ लोग देर से दुनिया में क्यों आते हैं!

बहरहाल, मुझे याद है कि तकरीबन दो साल पहले दिल्ली के एकाध लोगों ने सिनेमा के समाज पर अनुराग कश्यप से एकाध सवाल पूछ लिया था। उन्होंने तब भी लिख के यही कहते हुए ललकारा था कि "जिसकी ... में दम है, वो बना के दिखाए।" तब शायद सवालों की चोट सही जगह पर लगी थी। लेकिन वे जानते थे कि किसकी .... में कितना दम है। इसलिए उन्होंने अपने "दम" की चुनौती पोस्टरों पर परोसी, और परदे पर खिलाई कि "कह के लेंगे...।"

वे मेहरबानी जताते हैं कि उन्होंने बिहार का विषय उठाया है। वीभत्स हिंसा, सेक्स, गालियां, सामंती कुंठाओं के विस्फोट के लिए उन्होंने वासेपुर के साथ जो फर्जीवाड़ा किया, उस सब के लिए उन्होंने नब्बे के दशक के मध्य बिहार को क्यों नहीं चुना?

बथानी टोला, लक्ष्मणपुर बाथे आदि-आदि कत्लेआम (फिल्मकार के लिए हिंसा), बलात्कार (फिल्मकार के लिए सेक्स), जातिगत और सामंती जुल्म (फिल्मकार के लिए गालियों और गुलामी की जंजीरों के मनोहारी प्रयोग) के शानदार मौके के कितने किस्से चाहिए उन्हें! लेकिन तब फिर गोलवलकर बाबा की आत्मा कैसे प्रसन्न होगी?

(क्षेपक- एकः कान फिल्म फेस्टिवल के तमगे को लेकर श्रद्धा पैदा ऐसे किया जाता है- कान में साल भर फिल्म फेस्टिवल चलता रहता है। बल्कि यों कहें कि कान की अर्थव्यवस्था ही फिल्म फेस्टिवल से चलती है। फिल्म फेस्टिवल्स की शृंखला में वहां पोर्न फिल्मों का भी एक फेस्टिवल होता है। आप अपनी फिल्म बनाइए। वहां जाकर किसी सत्र में अपनी फिल्म के लिए किसी सिनेमा हॉल का स्लॉट खरीदिए। मिले हुए वक्त या स्लॉट पर अपनी फिल्म चला दीजिए। आपकी फिल्म को कान फिल्म फेस्टिवल का तमगा मिल गया, जिसे आप अपनी फिल्म के शुरू में गर्व से झलका सकते हैं। ...और जरा सोचिए कि अगर "द गैंग्स ऑफ न्यूयॉर्क" माफ कीजिए... जैसी "महान" फिल्म को सुबह छह बजे का स्लॉट मिले तो...!!!)

(क्षेपक- दोः इन पंक्तियों के नास्तिक लेखक की सदिच्छा है कि भगवान करे कि कही-सुनी जा रही यह बात झूठी साबित हो कि आरएसएस ने बॉलीवुड में ढाई हजार करोड़ रुपए का परोक्ष निवेश किया है। एजेंडा क्या है और पोलटिक्स क्या है साहब...)

(गैंग्स ऑफ) वासेपुर की सच्ची कहानी की शायद यही हकीकत है...!!!