Saturday, 29 March, 2008

सहर



क्या कौंधा कि उम्मीदों-सी नज़र हुई है,

ठहरे हुए समंदर में इक लहर हुई है।


बहुत दिनों तक मौसम ये मायूस रहा,

आंखें आज बहारों की मुंतज़र हुई हैं।


कांटों के ऊपर से कितने दिन गुजरे,

कितनी मुश्किल से मंजिल ये डगर हुई है।


आफ़ताब बन गए आज ये चांद-सितारे,

बहुत दिनों के बाद शाम ये सहर हुई है।


फिर से आए शाम, तो आए क्या ग़म है,

यों ही अब तक कहां हमारी सहर हुई है।

Thursday, 27 March, 2008

क्या हमें सभ्य कहलाना अच्छा नहीं लगेगा...?

अनिल चमड़िया



आखिर क्या कारण है कि भूमंडलीकरण की नीति की शुरुआत के साथ कई विकसित देशों ने उन देशों से माफी मांगने की जरूरत महसूस की जहां की जातियों को उनके दुर्व्यवहार और भेदभाव की नीति का शिकार होना पड़ा है। 1990 में पूर्वी जर्मनी की ससंद ने इस्राइल से यहूदियों की प्रताड़ना के लिए माफी मांगी। सोवियत संघ ने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जेलों में बंद हजारों अधिकारियों को मारने के बाद जंगल में दफना दिए जाने के लिए माफी मांगी। 1998 में कनाडा ने अपने मूल निवासियों से माफी मांगी जिसकी संस्कृति को नष्ट-भ्रष्ट करने के लिए सरकार योजनाएं बनाती रही है। यहां तक कि 1992 में दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति एफडब्ल्यूडी क्लार्क ने तीन करोड़ काले लोगों पर पचास लाख गोरों के शासन के लिए, काले लोगों को दशकों तक प्रताड़ित करने की नीति जारी रखने के लिए माफी मांगी। भारत में जालियांवाला बाग कांड के लिए ब्रिटेन की प्रधानमंत्री मार्ग्रेट थेचर ने इसी दौर में अमृतसर आकर डायर के, ब्रिटिश सरकार के इस कुकृत्य के लिए माफी मांगी।
इसकी सबसे ताजा कड़ी 13 फरवरी को आस्ट्रेलिया में देखने को मिली जहां लेबर पार्टी के प्रधानमंत्री केविन रड ने कैनबरा की गणतांत्रिक संसद में खड़े होकर देश के मूलवासी आदिवासियों के साथ अब तक की दमनकारी संस्कृति और नीति के खिलाफ 'राष्ट्रीय माफी' मांगी। आस्ट्रेलिया मानव सभ्यता के इतिहास का सबसे पुराना दस्तावेज है। भारत की तरह वहां सत्रहवीं सदी की शुरूआत में ब्रिटिशों ने अपना कब्जा जमाना शुरू किया और तब से इन आदिवासियों के खिलाफ लगातार दमन, अत्याचार, रंगभेदी अमानवीय व्यवहार जारी है। शुरूआती दौर में तो ब्रिटेन से अपराधियों को बतौर सजा यहां भेजा जाता था, ताकि वे आदिवासियों के खिलाफ गुंडई कर सकें। गोरे मर्दों के संबंध से जो आदिवासी महिलाएं बच्चे को जन्म देती उन बच्चों को उठा कर ले जाया जाता था। उन बच्चों के साथ हर संभव अत्याचार होते थे। 1910-70 तक तो इस चुराई जाने वाली पीढियों के साथ खुलेआम कुकर्म होते रहे और किसी भी 'सभ्य सरकार' ने उसका विरोध नहीं किया।


पिछले चुनाव में लेबर पार्टी ने चुनावी घोषणा पत्र में उन आदिवासियों से राष्ट्र की तरफ माफी मांगने का वायदा किया और उसे इसका समर्थन मिला। 13 फरवरी को सार्वजनिक तौर पर माफी मांगे जाने की घटना के समय जॉन हार्वड को छोड़ कर देश के सभी जीवित प्रधानमंत्री मौजूद थे। कंजरवेटिव पार्टी के 1975-83 तक प्रधानमंत्री रहे मैलकालन फ्रेजर ने तो यह अफसोस जाहिर किया कि काश वे खुद ये काम कर पाते। मौजूदा प्रधानमंत्री तो रो पड़े। लेकिन उन्होंने जो कहा वह महत्वपूर्ण है। उनके अनुसार यह माफी आस्ट्रेलिया के इतिहास में एक नये युग का सूत्रपात करेगी। उनके अनुसार देश के उन सभी लोगों के एकजुट होने का अब समय आ गया है जो आस्ट्रेलिया के मूल निवासी हैं या मूल निवासी नहीं रहे हैं। इस दृश्य को देखने के लिए वंचित और दमित समाज हजारों किलोमीटर चल कर संसद तक पहुंचे थे। यह दुनिया भर में जातियों के खिलाफ शासक जातियों और वर्गों द्वारा माफी मांगने की एक नई मिसाल है। अगर इतिहास के जानकार जिन अन्य माफियों के लिए अपेक्षा करते हैं और उनमें अभी तक जो सामने नहीं आई है, तो वह है अमेरिका द्वारा रेड इंडियन से माफी मांगना। विश्व स्तर पर माफीनामे की कड़ियों को विश्लेषित किया जा सकता है। भूमंडलीकरण के दौर में शासक उन घावों को भरने की कोशिश कर रहे हैं जो संबंधों को सहज करने में बाधा होता है। लेकिन यह किसी देश द्वारा किसी बाहरी समाज से संबंध बनाने तक ही सीमित नहीं है बल्कि अपने आप को मजबूत करने के लिए अंदरूनी तौर पर भी संबंधों की खाई पाटना जरूरी लगता है। आस्ट्रेलिया अपने देश के मूल निवासियों से माफी मांगकर उन्हें बराबर की हिस्सेदारी देने के लिए खुद को तैयार कर रहा है। अपने देश में शासकों द्वारा अतीत के कुकृत्यों के लिए ही माफी मांगते नहीं देखा जाता है जबकि हाल के दिनों में लंदन और आस्ट्रेलिया में सरकारों ने अपने तंत्र द्वारा निर्दोषों की गिरफ्तारी या हत्या के लिए भी बाकायदा माफी मांगी। इस नजरिये से इन घटनाक्रमों को देखा जा सकता है। एक तो भूमंडलीकरण के दौर में ऐसे देशों की सरकारों ने रणनीति के तौर पर अतीत की गलतियों को सुधारने का प्रयास किया है, लेकिन ऐसी रणनीति को स्वीकार्य बनाने के लिए सांस्कृतिक बाधाओं को तोड़ना और जड़ता पर हमला जरूरी होता है। क्या ऐसे देशों और शासकों को उनके यहां के वैचारिक आंदोलनों की पृष्ठभूमि इसकी इजाजत देती है? वे अपने देश में जातियों के बीच के भेदभाव को दूर करने का साहस उसी पृष्ठभूमि से प्राप्त कर रहे हैं। भारत जैसे देशों के इतिहास के बारे में यह सर्वविदित है कि यहां के गहरे जातीय भेदभावों और शासक जातियों के अत्याचार की वजह से, आपसी बंटवारे ने विदेशी शासकों को अपनी जड़ें जमाने का यहां मौका दिया। सांस्कृतिक वर्चस्व रखने वाली जातियों की तरह आधुनिक राजनीतिक राष्ट्र-राज्य व्यवस्था के शासकों ने भी भेदभाव को बढ़ाने की नीतियां ही जारी रखीं। क्या अपने यहां की वैचारिक पृष्ठभूमि अपने कुकृत्यों को स्वीकार करने और फिर माफी मांगने के साहस की ही इजाजत नहीं देती है? यह कैसी जड़ता है? अपने भारतीय समाज में बार-बार कुकृत्यों को भूल जाने की सलाह दी जाती है और वह भी इस तरह से कि कुकृत्यों के दोबारा अंजाम देने की स्थितियां बनी रहें। कोई ऐसा कुकृत्य बताया जाए जो विदेशियों के देश से जाने के बाद भी पिछले पचास वर्षों से बार-बार देखने को नहीं मिलता हो? बजाय इस जड़ता को तोड़ने के हम कितने शर्मनाक तरीके से अपने समाज की जातियों पर ही यह आरोप लगाते हैं कि उन्होंने विदेशियों का साथ दिया। अपने अपने लिए विदेशियों की खोज में जातियां लगी रहती हैं।


हर स्तर पर समाज पर वर्चस्व रखने वाला समूह ऐसे किसी भी माफीनामे का विरोध करता है जो कि उसके वर्चस्व को खत्म करने में कोई भूमिका अदा करता हो। आस्ट्रेलिया में भी यह देखने को मिला। गौरतलब है कि नई पूंजी वाला मीडिया इसमें बड़ी भूमिका अदा कर रहा है। प्रधानमंत्री केविन रड ने जब संसद के पटल पर माफीनामा रखा था तो आस्ट्रेलिया के मीडिया में कोई उत्साह नहीं था। दूसरे दिन माफीनामे को सुनने के लिए उमड़ती भीड़ को देख कर चैनलों ने उसका सीधा प्रसारण तो किया लेकिन इस तरह के विचारों को ही ज्यादा जगह दी जिसमें इस तरह के माफीनामे की जरूरत नहीं बताई गई और न आदिवासी इलाकों में किसी परिवार के साथ उनके दुर्व्यवहार को दिखाया। यही रुख नई पूंजी वाला भारतीय भाषाओं का मीडिया का है। भारत के मीडिया के बड़े हिस्से में आमतौर पर वंचितों को न्याय देने की नीति के वक्त यही प्रवृत्ति दिखाई देती है। भाषाई मीडिया ने भी आस्ट्रेलिया की इस घटना को प्रचारित करने से परहेज किया। लेकिन भारत में सामाजिक, धार्मिक और क्षेत्रीय स्तर की जातियों के साथ कुकृत्यों से माफी मांगने और उन्हें न्याय के समान स्तर पर लाकर खड़ा करने से ऐसे कितने दिनों तक रोका जा सकता है? भारतीय समाज में माफीनामा आंतरिक ऊर्जा का स्रोत है जिसकी ताकत को सार्वभौमिक एवं आत्मनिर्भर राष्ट्र निर्माण में लगाया जा सकता है।

Saturday, 8 March, 2008

पढ़ी-लिखी मैम और वे...


जब मेट्रो लिंक सर्विस में चलने वाली एक छोटी बस के ड्राइवर ने निराश होकर अपने कंडक्टर और हेल्पर को डांट पिलाई कि कहता हूं कि पढ़ी-लिखी मैमों को ना बिठाया कर; तो उसकी फिक्र वाजिब थी। पढ़ी-लिखी मैम को उस दिन बस कंडक्टर ने शास्त्री पार्क मेट्रो स्टेशन कह कर बिठाया था और उस्मानपुर में ही गाड़ी खाली करने की हांक लगा दी थी। लेकिन सभी लोगों के उतर जाने के बावजूद उस पढ़ी-लिखी मैम ने साफ कर दिया कि तुम्हें शास्त्री पार्क मेट्रो स्टेशन पहुंचाना होगा। नहीं तो नतीजा भुगतने के लिए तैयार रहो। मैं पुलिस बुलाऊंगी, तुम्हारी परमिट कैंसिल करवाऊंगी। और वह बस शास्त्री पार्क मेट्रो स्टेशन की ओर चल पड़ी थी। इसी परेशानी में ड्राइवर-कंडक्टर और दो बाकी हेल्पर इस पढ़ी-लिखी मैम को बस में चढ़ाने पर अफसोस जाहिर कर रहे थे।
पढ़ी-लिखी मैम हमारी दोस्त हैं। जब उन्होंने उस दिन मुझे यह वाकया सुनाया तो उन पर मुग्ध होते हुए मैंने भी उसी दिन अपने रास्ते का दूसरा वाकया सुनाना शुरू किया। सौरव विहार से ऑटोरिक्शा से मथुरा रोड जाने का किराया पांच रुपए हैं। बीच में मीठापुर पड़ता है, जहां के तीन रुपए लगते हैं। लेकिन ऑटो से मीठापुर उतरी उस औरत से ऑटो वाले ने जुबान के लिए अभ्यस्त हो चुकी एक गाली के साथ पांच रुपए मांगे। उस वक्त कोई जलजला नहीं आया था, जब फटेहाल-सी दिखती हुई पांच का सिक्का हाथ में लिए वह औरत ऑटो ड्राइवर की मुंह पर उंगली बताते और कुछ "मर्दाना" गालियां बरसाते हुए बोली कि चल दो रुपए लौटा, नहीं तो १०० नंबर को बुलाऊंगी और रोड में चलना बंद करवा दूंगी। ऑटो में बैठे एक मर्द के मुंह से जो निकलना था, वही निकला कि बड़ी कमीनी औरत है। कैसे इसके मुंह से गाली निकला। मैंने उसे सिर्फ इतना कहा कि कभी फुर्सत मिले तो सेचना कि ये ड्राइवर क्यों तुम्हें बेइमान नहीं लगा और वह औरत कमीनी लगी।
कुछ ही दिन पहले दिल्ली में ऑटो चलाने वाली पहली औरत ने उस बेलगाम वर्दीधारी के एक थप्पड़ की पूरी कीमत चुकाई। वह ट्रैफिक पुलिस वाला अपनी रगों में उतर चुके वर्दी के रंग की अकड़ में था। इतना तो तय है कि बेचारे का दिमाग नहीं चलता था। हां, हाथ चलाने में शायद महारत हासिल थी, सो बिना किसी पूछताछ के सीधे हाथ की ताकत आजमा ली। उसके बाद उस ऑटो ड्राइवर ने १०० नंबर बुलाया। चले हुए हाथ ने बात आगे बढ़ा दी और अब सस्पेंड होने के बाद उम्मीद है कि उस बेलगाम घोड़े के दिमाग ने शायद सरकना शुरू कर दिया होगा।
बहरहाल, हमारी उस दोस्त को "मर्दाना" गालियां लफ्ज का इस्तेमाल शायद अच्छा नहीं लगा था। हम सवाल उठा सकते हैं कि ऐसा "इंपॉवरमेंट" किस काम का जो आखिरी तौर पर व्यापक स्त्री समाज के खिलाफ जाता है। लेकिन क्या सिर्फ इस तर्क पर हमें उसके आक्रोश को खारिज कर देना चाहिए? गलत के खिलाफ तुरंत और कामयाब तरीके से खड़ा होने की उसकी ताकत क्या एक पढ़ी-लिखी मैम से कम हो जाती है- सिर्फ इसलिए कि उसने गालियों का इस्तेमाल किया? लेकिन जितना अभी तक समझ सका हूं, यही लगता है कि गालियां सवर्ण और मर्द मानस का हथियार हैं, जिसका वह अपने खिलाफ इस्तेमाल बर्दाश्त नहीं कर सकता।
हमारी वह दोस्त जिस सुचिंतित तरीके से इंपॉवरमेंट की प्रक्रिया से गुजरी होंगी, उसके बारे में सोच पाना भी उस औरत के लिए कहां संभव हुआ होगा? दिल्ली में ऑटो चलाने वाली उस पहली औरत ने भी शायद इस बारे में कुछ नहीं सोचा होगा। लेकिन तीनों ने विरोध किया, और तीनों कामयाब हुईं- रास्ते चाहे जो भी रहे हों। जो जिस आबो-हवा में रहेगा, उसके गंध और स्वाद का असर भी उस पर दिखाई देगा।
अभी तो हम उस ऑटो ड्राइवर को गाली देती हुई औरत का भी खै़रमकदम करेंगे, ऑटो चलाने वाली उस औरत का भी पीठ ठोंकेंगे, और अपनी उस दोस्त, यानी पढ़ी-लिखी मैम पर तो मुग्ध होंगे ही।

Wednesday, 6 February, 2008

क्या किसी का जूता चोरी हो गया है...?

उस सुबह घर में वापस घुसने के बाद समझ नहीं आ रहा था कि खुद पर हंसें, कि रोएं, कि क्या करें। जिस शहर में हम रहते हैं, वहां सुबह की नींद आमतौर पर मुर्गे की बांग से नहीं, मोबाइल की घंटियों या मोटरगाड़ियों की पीं-पीं से खुलती है। लेकिन उस सुबह किसी की चीखों ने हमारी नींद में खलल डाला। पहले तल्ले पर अपने किराए के घर की बालकनी पर निकले तो देखा कि एक सात-आठ साल की बच्ची का लगातार चीखना भी उस सुबह का अंधेरा दूर नहीं कर पा रहा था। साठ-सत्तर लोगों की भीड़ के बीच में सात-आठ लोगों के थप्पड़ों से वह इधर-उधर गिर रही थी। जिसके भी पांव पकड़ कर वह बचाने की गुहार लगाती, उसी का थप्पड़ उसके गाल पर पड़ता। वे लोग आज ही अपने हाथ की ताकत आजमा लेना चाहते थे।

पहले सकपकाए, दूसरे पल 'चला मुरारी हीरो बनने' की तर्ज पर जैसे थे, वैसे ही नीचे भागे। बीच में जाकर बच्ची को छुड़ाते हुए जब जोर से चिल्लाए कि क्या कर रहे हैं आप लोग? तो जवाब में एक साथ शायद पचास आवाजें गूंजीं होंगी कि यह कूड़ा नहीं बीनती है, यह चोर है, इसने जूते चुराए हैं। उस बच्ची का बोरा खुला बिखरा पड़ा था, उसमें जूते नहीं मिले थे और इसीलिए वे सब वीर-बहादुर उसे पीटते हुए जूते का पता पूछ रहे थे।
हमने बहस शुरू कर दी कि अगर यह बच्ची चोर है तो पुलिस बुलाइए! ऐसे तो लगता है कि आपलोग मार डालेंगे इसे। हमारे अचानक हमले और पुलिस के जिक्र से वह भीड़ सकते में थी और हमसे बहस करने लगी। इसी बीच मौका हाथ लगा और वह बच्ची निकल भागी। शायद हम चाहते भी यही थे।
अब भीड़ की नजर में हम चोरों को बचाने वाले, चोरों को शह देने वाले और उनके चुराए सामान खरीद कर अपना गुजारा करने वालों में से एक थे।
हमियाते हुए आप-आप का अंदाज बिखेर कर अपना बिहारीपना हम पहले ही जाहिर कर चुके थे। सो, जुबानचढ़ी गालियां और बिहारी-बिहारी का तमगा बरसाते हुए आठ-दस बलिष्ठ बहादुरों ने हमारा गिरेबान पकड़ा और उस 'चोर' बच्ची को भगाने की जिम्मेदारी तय करते हुए हम पर हाथ आजमाने की मुद्रा बनाने लगे।
अचानक हमारे मुंह से निकल गया कि अखबार में काम करता हूं, सब के सब मुश्किल में पड़ जाओगे।
अखबार का आदमी और दिल्ली का टोन। असर अचानक हुआ। दो मिनट के भीतर समझने और समझाने का दौर शुरू हुआ कि आप नहीं जानते कि ये लोग कूड़ा बीनने के बहाने सामान चुराते हैं। पिटाई से राहत के साथ दिमाग ने काम करना शुरू किया और किसी तरह पिंड छुड़ा कर हम घर में भाग कर वापस आ गए थे।
इसके पखवाड़े भर पहले किसी और की जेब कट रही थी, हमारी नजर पड़ गई, हमने बता दिया कि भाई, ये लड़का तुम्हारी जेब से कुछ निकाल रहा था, और जेबकतरा अपने छह-सात साथियों के साथ हम पर पिल पड़ा था। वहां भी बातों की कलाकारी ही काम आई और किसी तरह मार खाने से बच सके थे। यानी आदत अब तक नहीं छूटी थी।
...सोचते हैं कि राजापाकर में, मोतिहारी में, भागलपुर में या आदि-आदि जगहों पर हमारे जैसे बातों के कलाकार क्यों नहीं होते। फिर सोचते हैं कि हम तो यहां दिल्ली में बैठे हैं, वहां क्यों होंगे।
फिर सिहर जाते हैं कि अगर हमने अखबार का आदमी होने का हथियार नहीं भांजा होता तो क्या हम भी उस दिन राजापाकर में मार दिए गए 'चोरों' की तरह किसी 'चोर' में शुमार हो जाते! मुंबई में पंद्रह मिनट तक सत्तर-अस्सी वीर-बांकुरों की भीड़ दो लड़कियों के कपड़े तार-तार करती रही और भले ही अलग-अलग कोणों से एक अखबार का आदमी तस्वीरों उतारता रहा, लेकिन पुलिस को खबर तो की। वरना गुवाहाटी में उस आदिवासी लड़की को सिर्फ पांच लोग नंगा करके दौड़ा रहे थे और पचास लोग तस्वीरें उतारते रहे। पटियाला में मुनादी करके आग में जलते हुए व्यापारी की मौत का तमाशा भी हमें मीडिया के आदमियों ने ही दिखाया था।
सुनते थे कि दिल्ली जैसे शहरों में संवेदनाएं सूख चुकी हैं। लेकिन राजापाकर में, या भागलपुर में, या खैरलांजी में, या गोहाना में, या सुहानी शाम के लिए मशहूर जुहू के समंदरी किनारे पर ही कहां बची हैं? मगर वह कैसे सूखती होंगी? वे कौन-सी वजहें होती होंगी? चाक-चौबंद सोसाइटियों के मजबूत और बुलंद दरवाजों पर तैनात सुरक्षा गार्डों के बीच तीन-चार कमरों की बंद दुनिया! या जाति की जड़ों में पलता जहर! या फिर उस बच्ची की चीखें सुनते ही खुले दरवाजे से सीधे निकल कर उसे छुड़ाने की 'बिना सोची-समझी कोशिश!'



दिल्ली आने के बाद खगोलविद प्रो यश पाल एक बार मिले थे तो उन्होंने कहा था कि चारों तरफ से बंद और जगह-जगह सुरक्षा गार्ड तैनात होने के बावजूद इन सोसाइटियों की हर महीने होने वाली मीटिंगों में सुरक्षा के मसले की ही सबसे ज्यादा फिक्र होती है।
हमारे मोहल्ले में भी एक पहरेदार रात भर सीटियां बजाता हुआ बिजली के खंभों में डंडा पीटता रहता है। लोगों के घरों के दरवाजों में कुत्तों के घुसने के लिए भी कोई फांट नहीं होती। फिर भी कूड़ा बीनने वाली कोई सात-आठ साल की बच्ची जूता चुरा लेती है!




Wednesday, 28 November, 2007

आई पकड़ में "आत्मा"

अमिताभ पांडेय


मौत का विज्ञान
बचपन में किसी दोस्त ने एक वैज्ञानिक प्रयोग की बात बताई थी। एक मरते हुए आदमी को कांच के बक्से में सीलबंद कर दिया गया, जैसे ही मरा, कांच चटक गया और उसकी आत्मा बाहर निकल गई। यह प्रयोग आज तक मेरे लिए पहेली है। कोई नहीं जानता कि इसे कब, कहां और किसने किया था और न ही यह समझ पाया हूं कि आत्मा जिसे न आग जला सकती और न ही कोई शस्त्र जिसे भेद सकता है, उसे शीशा चटका कर बाहर निकलने की क्या जरूरत थी? क्या वह रोशनी से भी ज्यादा मोटी होती है?

पहेली
जिंदगी और मौत की पहेली हमेशा से इंसान को उलझाए हुए है। वह क्या है जो हमें जीवित रखता है और जिसके न रहने पर हम वापस मिट्टी हो जाते हैं। गुनी-ज्ञानीजन कहते आए हैं, क्या जीवन उसी के खेल है? क्या इस पर सिर्फ मानव का विशेष अधिकार है या सारे पशु, पेड़ों को भी हासिल है? फिर क्या बाकी अचेतन जगत मिट्टी, पत्थर, पहाड़, नदी, समंदर, धरती, आदि ग्रहों और तारों-गैलेक्सियों की भी आत्मा होती है? सारे प्राचीन प्रागैतिहासिक धर्म इसका जवाब हां में देते आए हैं और आज के लगभग सभी धर्म एक परमात्मा या विश्वआत्मा की परिकल्पना करते हैं, जिसने सारी सृष्टि की रचना की और उसे चलाती है। आज का विज्ञान क्या कहता है विश्वआत्मा और जीवन के बारे में, दर्शन और धर्मशास्त्रों के शब्दजाल में उलझे बिना, विज्ञान छोटे-छोटे सवालों को सुलझाने में यकीन रखता है, बड़े-बड़े सवालों की परतें बिना सर्वज्ञाता होने के दंभ के खुलती जा रही हैं। जो आंखों से, टेलिस्कोप से, खुर्दबीन से दिखता है और दूसरों को दिखाया जा सकता है, जिसे परखा जा सकता है और बिना शक साबित किया जा सकता है, उसे ही विज्ञान का सर्टीफिकेट मिलता है। ज्ञान के पर्वत पर आंखों पर आस्था की पट्टी बांध कर चढ़ना नामुमकिन है, उसकी ढलानों पर न जाने कितनी परिकल्पनाओं के कंकाल बिखरे बड़े हैं। विज्ञान में जो प्रत्यक्ष प्रयासों से सिद्ध हो जाए, उसे ही सिद्धांत का दर्जा मिलता है।
केमिकल लोचा
इलेक्ट्रॉन, परमाणु, अणु, पत्थर, पहाड़, नदी, समंदर, धरती आदि ग्रह और तारे-गैलेक्सियां जीवित नहीं हैं, यह आज सब जानते हैं, तो कैसे मानें कि उनकी आत्मा होगी। इनके गुण-धर्म उनमें निहित पदार्थों के आपसी और वातावरण से व्यवहार पर निर्भर हैं, जिनकी व्याख्या भौतिकी के नियम बिना किसी अपवाद के कर सकते हैं। रसायन विज्ञान बिना किसी खारी या मीठी आत्मा के सहारे, बिना गुड़ की मिठास और समंदर के खारेपन के समझा जा सकता है। क्या आपने मुर्दा नमक चखा या देखा है? जीवजगत का मामला थोड़ा ज्यादा ही पेचीदा है, पर विज्ञान धीरे-धीरे ये पेच भी खोल रहा है। मुन्नाभाई की जुबान में बोलें तो जीवन एक केमिकल लोचा है। यहां भी वैज्ञानिकों को आत्मा के कोई सबूत नहीं मिल रहे हैं।
हमारा शरीर खरबों कोशिकाओं का बना होता है जो आमतौर पर इतनी छोटी होती हैं कि उनको खुर्दबीन की मदद से ही देखा जा सकता है। इनमें से हर एक कोश उतना ही जीवित होता है जितने कि हम। एक कोशिका भी जबर्दस्त जटिल रचनाओं वाली होती है। कोशिका दीवार के अंदर तो पूरा एक औद्योगिक क्षेत्र ही पसरा होता है। जिसमें परतदार रचनाओं पर स्थित राइबोसोम आरएनए की मदद से लाखों किस्म के प्रोटीनों का उत्पादन करते हैं। आरअनए कोशिका के कंट्रोल केंद्र से डीएनए से हर कार्य व्यापार का आदर्श और खाका लेकर आते हैं। प्राणियों में आदि बैक्टीरिया के वंशज माइटोकांड्रिया जो उनके कोशों में शायद दो अरब साल पहले रच-बस गए हैं, भोज्य पदार्थों से ऊर्जा निकाल कर इस्तेमाल लायक अणुओं- एटीपी- में सहेज कर जरूरत की जगह पर भेजते हैं। हरे पौधों में क्लोरोप्लास भी आदि सहयोगी बैक्टीरिया हैं जो सूरज की रोशनी से भोजन बना कोशिकाओं के साथ बांट कर खाते हैं।
आज प्रयोगशाला में कोशिका के सारे प्रोटीनों- आरएनए और डीएनए का कृत्रिम तौर पर बनाया जा चुका है और शायद आने वाले दस साल में कृत्रिम कोशिका भी बिना "आत्मा" की छौंक लगाए बना ली जाएगी। इसकी उम्मीद बढ़ती जा रही है। कोशिका की जीवंतता का रहस्य रसायन विज्ञान की पहुंच में है- यह किसी से छिपा नहीं है।

उम्रदराज अमर बैक्टीरिया
जीवन के इतिहास में, धरती पर ३.८ खरब साल में आज से सौ करोड़ साल पहले तक सिर्फ एककोशीय जीवों जैसे बैक्टीरिया, अर्किया और अमीबा जैसे जीवों का साम्राज्य था। बैक्टीरिया आदि की सिर्फ अकाल मृत्यु होती है, अन्यथा अनुकूल आबोहवा में तो वे "अमर" ही होते हैं। बैक्टीरिया बंट कर एक से दो, दो से चार और चार से आठ, इस तरह मुद्रास्फीति की तरह बढ़ते ही जाते हैं, जब तक खुराक और ऊर्जा मिलती रहे। खराब हालात में ये सुप्तावस्था में चले जाते हैं और जरूरत पड़े तो लाखों साल तक अलसाए पड़े रहते हैं अपने खोल में। हाल ही में जमीन में मीलों नीचे से और ध्रुवीय बर्फ में से तीन करोड़ साल से ज्यादा उम्रदराज बैक्टीरिया को निकाल कर जगाने में वैज्ञानिकों को सफलता मिली है।

पहला पाप
बैक्टीरिया के ही जमाने में सेक्स का चलन शुरू हुआ था, पर तब वह जरा चालू किस्म का था। यों ही घूमते-फिरते मौका मिलने पर वे कुछ जींस का आदान-प्रदान कर लिया करते और इसमें वे जात-कुजात की भी परवाह नहीं करते थे। बिल्ली में मछली के जींस और मटर में मिले खून बनाने वाले "कबाड़ जीन" शायद इसी तरह की हेरा-फेरी का नतीजा हैं। पैंसठ करोड़ साल पहले जब बहुकोशीय जीव स्वतंत्र कोशिकाओं के सहकार से बने और आगे चलकर नर और मादा जीव मिल कर "सभ्य" तरीके संतान पैदा करने लगे तो दुनिया में मौत का भी आगाज हुआ। मशहूर खगोल विज्ञानी कार्ल सेगन का यह रोचक सुझाव ईसाई, यहूदी और इस्लामिक आदिग्रंथ ओल्ड टेस्टामेंट की धारणा की स्वीकृति नहीं है। क्या तब के हमारे जीव पुरखे ने शैतान के बहकाने पर -जीवन वृक्ष- का फल खाया था और आदम और हव्वा की तरह वे भी नासमझ थे। मौत की वजह -पहला पाप- नहीं, बल्कि जटिल जीवों में "सहकार से जुड़ी कोशिकाओं" में तालमेल बिगाड़ना होता है।
जीवों के जटिल होने के साथ उनकी उम्र बढ़ने लगी और साथ ही जीनों की जटिलता भी बढ़ने लगी। इससे उम्र चढ़ते जीनों में खराबी आने की संभावना ज्यादा होती है। शरीर की कोशिकाएं अब अनिश्चितकाल तक विभाजन नहीं कर सकती हैं। बार-बार विभाजन से गुणसूत्रों से सिरे छीजते हैं और कोशिकाओं की रिपेयर प्रणाली बार-बार चूक करने लगती है। उम्र बढ़ने पर सत्रहवें गुणसूत्र पर स्थित टीडी-५३ जीन में खराबी होने पर शरीर के अलग-अलग कोशिकाएं अनियंत्रित होकर विभाजन कर कैंसर के ट्यूमर बना सकती हैं। कोशिकाओं की जन्म-मृत्यु तो हमारे जन्म से ही शुरू हो जाती है। कोशिका का विभाजन से जन्म और टीडी-५३ जैसे जीनों से नियंत्रित मृत्यु दोनों ही जरूरी है। अगर एक कोशिका बिना मरे दिन में पचास बार भी विभाजित हो तो साल भर में ब्रह्मांड में मौजूद सारे परमाणुओं से ज्यादा संतानें बनाएगी, जो वैसे भी संभव नहीं है।

ऑयल की तरह आत्मा
खैर, बचपन में कोशिकाएं ज्यादा बनती हैं और मरती कम हैं, पर १८-२० की उम्र तक जन्म और मृत्यु का पलड़ा बराबरी पर आ जाता है। और फिर? चौंकिए मत। फिर जिंदगी की ढलान शुरू। चालीस की उम्र हमारी प्राकृतिक सीमा है, उसके बाद की जिंदगी तो तकनीक और विज्ञान की गिफ्ट है। दस हजार साल पहले पशुपालन और कृषि के आविष्कार के पहले बिरलों को ही पचास तक पहुंचना नसीब होता था। जो भी हो, आज का चिकित्सा विज्ञान भी अस्सी के पार शायद कुछ मदद कर पाएगा। दिमाग, दिल, जोड़ और पेट की क्या दशा होती, उससे तो सब वाकिफ ही हैं। एक १९७० के मॉडल की कार की तरह कारबोरेटर संभालो तो गियर खड़खड़ाने लगते हैं। पर ऐसा धीरे-धीरे क्यों होता है? क्या आत्मा ऑयल की तरह धीरे-धीरे लीक हो रही है? या फिर दिल की धड़कन बंद होते ही "प्राण पखेरू" उड़ जाते हैं। ऑक्सीजन की सप्लाई बंद होने पर दिमाग सबसे पहले जवाब दे देता है। अगर ताप कम हो तो दिल, फेफड़े, गुर्दे, जिगर, आंखें और खाल खुछ घंटों तक जीवित रह सकती हैं।
अगर इनको किसी जरूरतमंद को प्रत्यारोपित कर दिया जाए तो हम अपने शरीर को कुछ हिस्सों को न सिर्फ अपनी "आत्मा" से बिछड़ने के बाद भी जिंदा रख सकते हैं, बल्कि कुछ पुण्य भी कमा सकते हैं। कोमा की बेहोशी में हमारे दिमाग का सचेत हिस्सा खराब हो जाता है, फिर भी शरीर जिंदा रहता है और इसके उलट पक्षाघात में शरीर तो खराब हो जाता है, पर दिमाग पूरा चुस्त-दुरुस्त रहता है। तो क्या कोमा में आत्मा शरीर में अटकी रहती है और पक्षाघात में दिमाग में? वैज्ञानिक मत से दो ऐसा है कि मरने पर कोई आत्मा-वात्मा बाहर नहीं निकलती, क्योंकि वह अंदर कभी आई ही नहीं थी। माता के गर्भ में अंडाणु और पिता के शुक्राणु से जो दोनों ही जीवित हैं, गर्भ बनता है, वह भी जीवित गर्भ से पनपे हम भी जीवित, तो फिर हमारी खास आत्मा ने प्रवेश कब किया?

टलेगा बुढ़ापा

एक तरह से देखें तो हम, हमारे सारे पुरखे, उनकी हर कोशिका "गर्मी प्रेमी" आदि बैक्टीरिया की संतान हैं, जो आज से लगभग चार अरब साल पहले महासागर के गर्भ में ज्वालामुखियों की आंच में पैदा हुआ और पनपा था। इस मायने में तो हम अमर हैं। हम, पुरखों और संतानों की अटूट शृंखला है और हम अपने मन और विचारों को संस्कृति के द्वारा जिंदा रखने में कामयाब हैं। वैसे पुराने का मरना भी जरूरी है, नहीं तो नए को जगह कहां से मिलेगी। पर हां, बुढ़ापे को सौ या दौ सो साल तक टालना इस शताब्दी के अंत तक संभव हो सकता है।

Wednesday, 31 October, 2007

कि ये साजिश अब समझने लगे हैं लोग...



अप्टन सिन्क्लेयर ने कहीं लिखा है- "आदमी को आत्मा के अमरत्व में विश्वास करने के लिए लगा दो और उसका सब कुछ लूट लो। वह हंसते हुए इसमें तुम्हारी मदद भी करेगा।" गुजरात-२००२ का कुछ भी छिपा हुआ नहीं था। फर्क सिर्फ यह है कि तहलका ने वह सब कुछ दिखा दिया है। अब वह सब कुछ भूल जाने को कहा जा रहा है। आगे बढ़ने की बात हो रही है।

आगे बढ़ने के लिए तथ्‍यों और तर्कों की ज़रूरत पड़ती है, जिस पर मेहनत करनी पड़ती है- सभी स्‍तरों पर, और भावनाओं में बहाने या भावुकता में बहने के लिए मेहनत नहीं करनी पड़ती, इसलिए आसान है। यह पूरी की पूरी सांस्‍कृतिक समस्‍या है। हमारे यहां ज़्यादातर लोग मान कर चलते हैं, जान कर चलने की ज़रूरत उन्‍हें कभी महसूस नहीं होती। सभी नैतिक शास्त्रों में तयशुदा 'श्रेष्‍ठता' के मानदंडों के सामने सीधे-सीधे सिर झुकाने की प्रवृत्ति ने आदमी की आंखों को इस कदर बंद कर दिया है, कि जो श्रेष्‍ठ प्रस्‍तुत है, वही सत्‍य है- पर कोई सवाल उठाने की प्रवृत्ति सिरे से ग़ायब है। हिंदू सांप्रदायिकता के उफान और उसकी प्रतिस्‍थापना के संघर्षों को इसी संदर्भ में देखा जा सकता है।

नीचे तस्वीर- खैरलांजी हत्याकांड

आज एक ओर क्‍लोन क्रांति के रास्‍ते आदमी का दिमाग़ समूची प्राकृतिक व्‍यवस्‍था के सामने चुनौती के रूप में खड़ा होने को तैयार है, वहीं हमारे यहां अचानक ही कभी पत्‍थर की मूर्तियां समूचे देश में दूध पीने लगती हैं, तो कभी लाखों की भीड़ एक पुरानी इमारत के नाम पर पागल हो जाती है। धार्मिक उन्‍माद से पीड़ि‍त यह भीड़ उन लोगों को मार कर या ज़ि‍न्‍दा जला कर या औरतों का बलात्‍कार कर अट्टहास करती है, गौरव यात्राएं निकालती हैं, जिनका इस तरह के पागलपन से कोई लेना-देना नहीं होता। मारे गये लोगों का कसूर सिर्फ इतना होता कि उन पर किसी ख़ास धर्म के होने का ठप्‍पा लगा होता है। समाज और धर्म के चंद ठेकेदारों की हांक पर इकट्ठा हुई लाखों की भीड़ को यह नहीं मालूम होता कि उनका पूरा अस्तित्‍व उन ठेकेदारों का गुलाम है जो केवल उस भीड़ का खून पीकर खुश होते हैं। लोगों को दंगों की आग में जलते हुए देखना ही जिनका 'यज्ञ' है, और इसी से उनकी 'मोक्ष' प्राप्ति का रास्‍ता तय होता है।

ये धार्मिक लुटेरे इस बात से अच्‍छी तरह वाकिफ होते हैं कि जिन पारलौकिक भ्रमों की बुनियाद पर इस समाज को खड़ा किया गया है, उनका कायम रहना उनकी दु‍कानदारी के हित में है। यहां आम लोगों को यह सोचने की छूट एकदम नहीं है कि अगर भगवान है तो उसकी रक्षा और सेवा हम करेंगे या वह हमारी सेवा ओर रक्षा करेगा। लेकिन हजारों धार्मिक दावानलों में नवजात शिशुओं तक को जिंदा राख होते रेख कर भी हमारी आंखें आज भी बंद हैं। ईंट-पत्‍थरों की बेजान और निरर्थक इमारतों में अपने 'भगवान' की प्रतिस्‍थापना के लिए गर्भवती औरतों का पेट चीर कर बच्‍चे के साथ उसे आग में झोंक कर खुशी से नाचने को कुछ लोग संस्‍कृति की रक्षा की लड़ाई कह रहे हैं। अगर यही संस्कृति है तो मुझे शर्म है इस संस्कृति पर और इसके मूल निहितार्थों को समझना मेरे लिए बहुत ज्‍यादा मुश्किल नहीं है।

दरअसल, परजीविता या निकम्मापन जिस समाज का या समाज के जिस वर्ग का भी आदर्श होगा, वह अपनी सुविधा की आकांक्षा की आग में समूचे समाज को झुलसाता रहेगा, राख बनाता रहेगा। हिंदुत्व की रक्षा की लड़ाई के मूल में छिपी यह चिंता साफ-साफ देखा और समझी जा सकती है। आज़ादी के बाद और ख़ास तौर पर पिछले डेढ़ दो दशकों में समाज के दलित और पिछड़े तबकों में जिस तेज़ी से वैचारिक आलोड़न हो रहा था, उसका अंतिम नतीजा समाज के उस ताने-बाने का छिन्‍न-भिन्‍न होना था, जहां कुछ परजीवियों की दुकानदारी कायम थी। और ज़ाहिर है कि मुसलमान, ईसाई और लोकतंत्र इस श्रेष्‍ठ वर्ग की परजीविता और निठल्‍लेपन के साथ-साथ सामाजिक 'श्रेष्‍ठता' के सिद्धांत के मुख्‍य बाधक तत्‍व हैं। और दलितों और पिछड़ों के विकास में एक संतुलन तत्‍व के रूप में काम कर रहे हैं। इसलिए प्राथमिक टारगेट मुसलमान और ईसाई हैं। हिंदुत्‍व के कथित संरक्षकों के हिसाब से इन दोनों के ख़त्‍म होने के बाद लोकतंत्र अपने आप ख़त्‍म हो जाएगा। और तब इस हिंदू समाज का प्राचीन 'गौरव' फिर से कायम हो सकेगा, जहां ढोल, गंवार, शूद्र, पशु और नारी सिर्फ ताड़न के अधिकारी होंगे और ब्रह्मा के कमर के ऊपर के हिस्से से पैदा हुए लोग भूदेवों के रूप में 'संस्‍कृति रक्षा' का अभियान उसी तरह चला सकेंगे, जिस तरह हरियाणा के झज्‍जर में गोहत्‍या के नाम पर पांच दलितों की ईंट-पत्‍थरों से मार-मार कर हत्‍या कर दी गई।

इसी संस्‍कृति निर्माण की प्रक्रिया के लिए पारलौकिक भ्रमों की बुनियाद को और मज़बूत करने की ज़रूरत समझी गयी, जहां आदमी का खुद पर से भरोसा उठ जाता है, और उसका दिमाग़ अंधी सुरंग में भटकते हुए जीवन के 'सत्‍य' की तलाश में मारा-मारा फिरता है- जीवन के ख़त्‍म हो जाने तक।

हिंदुत्‍व की 'रक्षा' की लड़ाई की साज़ि‍श का ही यह भी एक हिस्‍सा भर है कि जब आदमी का दिमाग़ आकार लेने लगता है, उसी समय से उसे इस तरह शिक्षित किया जाए ताकि वह बड़ा होकर या तो ज्‍योतिष 'विज्ञान' का डिग्रीधारी बने या फिर तिलक-चोटीधारी ज्‍योति‍षाचार्यों की सलाह से ही अपने शौचालय जाने तक का समय तय करे।

ऐसा नहीं है कि हिंदुत्‍व ने जिस तरह गुजरात को ग्रास लिया है, उससे दूसरे बचे हुए हैं। गुजरात में सिर्फ सुविधा यह है कि वहां न्यूटन के गति के नियम की नई व्याख्या करने वाला राजा मौजूद है। दरअसल, मोदी जैसा चेहरा किसी को एक बार धोखा दे सकता है, वाजपेयी जैसों का चेहरा लोगों को बार-बार छलता है। गुजरात में मुसलमानों के कत्लेआम के समय गुजरात पुलिस ने भी जान बचाने की भीख मांगती औरतों और बच्चों को बचने के लिए जो रास्ता बताया, उसमें वे उन्मादी पागलों की ज्यादा बड़ी भीड़ में जा फंसे और जिंदा जला दिए गए। जहां तक दूसरी जगहों की बात है, तो राम के उद्धार के लिए शुरू की गई रथयात्रा से समय से ही संघ-परिवार और उसके गर्भनाल से जुड़ी भाजपा-विहिप-बजरंग दल या शिवसेना ने जिस क्रूर प्रहसन युग की शुरुआत की थी, गुजरात में उसकी झलक भर दिखाई गई।
लेकिन समय कभी रुकता नहीं है। जो लोग इतिहास से सबक नहीं लेते, इतिहास उन्हें कभी माफ नहीं करता। हिटलर या मुसोलिनी को अपना आदर्श मानने वाले केवल उनके सत्ताकाल को याद रखते हैं। बेहतर हो इन दोनों इतिहास के तथाकथित नायकों के अंतिम दिनों को याद रखा जाए, जब नस्लवाद, नाजीवाद और जर्मन श्रेष्ठ हैं के प्रणेता हिटलर को तहखाने में छिप कर अपनी पत्नी के साथ खुदकुशी करनी पड़ी। और कि फासीवाद के प्रवर्तक मुसोलिनी के मरने के बाद भी इटली के लोगों ने उसकी लाश को शहर के चौरा