Thursday 21 July 2016

गुजरात दलित विद्रोहः स्वागत, इस सामाजिक क्रांति का...


गले का फांस बनी गाय की सियासत




गुजरात में दलितों का विद्रोह खास क्यों है? यह इसलिए कि जिस गाय के सहारे आरएसएस-भाजपा अपनी असली राजनीति को खाद-पानी दे रहे थे, वही गाय पहली बार उसके गले की फांस बनी है। बल्कि कहा जा सकता है कि गाय की राजनीति के सहारे आरएसएस-भाजपा ने हिंदू-ध्रुवीकरण का जो खेल खेला था, उसके सामने बाकी तमाम राजनीतिक दल एक तरह से लाचार थे और उसके विरोध का कोई जमीनी तरीका नहीं निकाल पा रहे थे। गुजरात में दलित समुदाय के विद्रोह ने देश में आरएसएस-भाजपा की ब्राह्मणवादी राजनीति का सामना करने का एक ठोस रास्ता तैयार किया है।

देश में भाजपा की सरकार बनने के बाद पिछले लगभग दो सालों से लगातार कुछ ऐसे मुद्दे सुर्खियों में रहे हैं, जिनसे एक ओर वास्तविक मुद्दों से समूचे समाज का ध्यान बंटाए रखा जा सके और दूसरी ओर पहले से ही धार्मिक माइंडसेट में जीते ज्यादा से ज्यादा लोगों के दिमागों का सांप्रदायीकरण किया जा सके। साक्षी महाराज, योगी आदित्यनाथ या दूसरे साधुओं-साध्वियों की जुबान से अक्सर निकलने वाले जहरीले बोल के अलावा जो एक मोहरा सबसे कामयाब हथियार के तौर पर आजमाया गया, वह था गाय को लेकर हिंदू भावनाओं का शोषण और फिर उसे आक्रामक उभार देना। हाल में इसकी चरम अभिव्यक्ति उत्तर प्रदेश के दादरी इलाके में हुई, जहां सितंबर, 2015 में हिंदू अतिवादियों की एक भीड़ ने गाय का मांस रखने का आरोप लगा कर मोहम्मद अख़लाक के घर पर हमला कर दिया और उनके परिवार के सामने तालिबानी शैली में उन्हें ईंट-पत्थरों से मारते हुए मार डाला।

लेकिन इस तरह की यह कोई पहली घटना नहीं थी। अक्टूबर 2000 में हरियाणा में झज्जर जिले के दुलीना इलाके में पांच दलित एक मरी हुई गाय की खाल अलग कर रहे थे। उसी जगह से हिंदुओं के एक धार्मिक आयोजन से लौटती भीड़ ने उन पांचों को घेर लिया और गोहत्या का आरोप लगा कर उन्हें भी ईंट-पत्थरों से मार-मार कर मार डाला था। तब आरएसएस की एक शाखा विश्व हिंदू परिषद के एक नेता आचार्य गिरिराज किशोर ने कहा था कि एक गाय की जान पांच दलितों की जान से ज्यादा कीमती है।

गुजरात में मरी हुई गाय की खाल उतारने ले जाते दलितों को बर्बरता से पीटे जाने की घटना से पैदा हुए तूफान के बाद भी एक बार फिर विश्व हिंदू परिषद ने अपनी वास्तविक राजनीति के अनुकूल बयान ही जारी किया। परिषद ने कहा- "नैसर्गिक रूप से मरी गायों और पशुओं के निपटान की हिंदू समाज में व्यवस्था है और वह परंपरागत रूप से चली आ रही है। इस व्यवस्था को गोहत्या कह कर कुछ तत्त्वों द्वारा जो अत्याचार हो रहा है, उसका विश्व हिंदू परिषद विरोध करती है।"

यानी सैद्धांतिक तौर पर आरएसएस या विश्व हिंदू परिषद मरी गायों और पशुओं के निपटान के लिए हिंदू समाज में 'परंपरागत व्यवस्था' होने की बात कहते हैं और व्यावहारिक तौर पर उन्हें जब भी अपनी राजनीति के लिए जरूरत होगी, मरी गायों को ले जाते या उनकी खाल उतारते दलितों को देख कर उन्हें गो-हत्यारा घोषित कर देंगें और फिर उनकी जान तक ले लेंगे। विश्व हिंदू परिषद या आरएसएस का रवैया इस मसले पर बिल्कुल हैरानी नहीं पैदा करता। बल्कि अच्छा यह है कि कई बार दबाव में आकर ये हिंदू संगठन अपना असली चेहरा दिखाते रहते हैं।

बौद्धिक हलकों में शायद इन सब पहलुओं से विचार किया गया होगा, इसके बावजूद सच यह है कि हिंदुत्व की सियासत में गाय के इस मोहरे का जवाब नहीं ढूंढ़ा जा सका था। पिछले तकरीबन दो सालों से देश के अलग-अलग इलाकों से आने वाली खबरें यह बताती रहीं कि समाज में 'गाय का जहर' हिंदू पोंगापंथियों के सिर पर चढ़ कर बोल रहा है और जगह-जगह पर जिंदा या मरी हुई गाय ले जाते लोगों के साथ गऊ-रक्षक बेहद बर्बरता से पेश आते हैं। इसके अलावा, समूचे समाज में गाय अब एक मुद्दा बन चुकी है। बहुत साधारण रोजी-रोजगार में लगे लोग, जिन्हें गाय से कोई वास्ता नहीं है, वे 'गऊ-हत्या' के नाम पर उन्माद में चले जाते हैं। कुछ समय पहले उत्तर प्रदेश के दनकौर में पंद्रह से पच्चीस वर्ष के तकरीबन पंद्रह युवाओं से एक साथ बात करते हुए मुझे हैरानी इस बात पर हुई थी कि वे यह कहने में बिल्कुल नहीं हिचक रहे थे कि 'कोई गऊमाता को मारेगा तो हम उसे काट देंगे जी...!' इन युवाओं में कुछ दलित पृष्ठभूमि से भी थे। दस मिनट की बातचीत के बाद 'गऊमाता' के सवाल पर दलित किशोर चुप हो गए, लेकिन बाकी अपनी राय पर कायम थे।

हालांकि गाय को लेकर उन्माद पैदा करने की कोशिशें हिंदुत्व की राजनीति का एक औजार रही हैं, लेकिन पिछले दो-तीन सालों के लगातार आबो-हवा में गाय के नाम पर जहर घोलने का ही नतीजा है कि एक जानवर के नाम पर लोग इंसानों को मारने-काटने की बातें सरेआम करने लगे हैं। सड़कों पर गोरक्षक गुंडे खुले तौर पर कानून हाथ में लेते हैं और मवेशी ले जाते वाहनों को रोक कर लोगों को बुरी तरह मारते-पीटते हैं या मार भी डालते हैं। झारखंड के लातेहर और हिमाचल प्रदेश से गोरक्षक गुंडों द्वारा मवेशी ले जाते लोगों को पकड़ कर मार डालने की खबरें सामने आईं। लातेहर में एक किशोर और एक युवक को मार कर पेड़ पर लटका दिया गया था। जहां-जहां भाजपा की सरकार है, वहां तो जैसे इन्हें अभयदान मिला हुआ है।
गुजरात के ऊना में जिन लोगों ने चार दलित युवकों को सरेआम बर्बरता से मारा-पीटा, वे भी एक तरह से बाकायदा जिस पुलिस से संरक्षण प्राप्त थे, वह भी भाजपा सरकार की ही है। यों भी, पुलिस अपने राज की सरकार के रुख के हिसाब से ही किसी को खुला छोड़ती है या उसके खिलाफ कोई कार्रवाई करती है। कम से कम गुजरात में तो सन 2002 के दंगों से लेकर अब तक पुलिस ने यही साबित किया है।

लेकिन उन गोरक्षक गुंडों से लेकर शायद आरएसएस-भाजपा तक को इस बात का अंदाजा शायद नहीं रहा होगा कि जिस गाय के हथियार से वे बाकी मुद्दों को दफ्न करने की कोशिश में थे, वह इस रूप में उनके सामने खड़ा हो जाएगा। पिछले दो-ढाई सालों में यह पहली बार है जब गाय की राजनीति को इस कदर और मुंहतोड़ तरीके से जवाब मिला है। ऊना में मरी हुई गाय की खाल उतारने ले जाते दलितों पर बर्बरता ढाई गई, उसी के जवाब में गुजरात के कई इलाकों में दलित समुदाय में मरी हुई गायों को ट्रकों में भर कर लाए और कलक्टर और दूसरे सरकारी दफ्तरों में फेंक दिया। संदेश साफ था। जिस सामाजिक व्यवस्था ने उन्हें इस पेशे में झोंका था, अगर उससे भी उन्हें अपने जिंदा रहने के इंतजामों से रोका जाता है, उसके चलते उन पर बर्बरता ढाई जाती है तो वे यह काम सरकार और प्रशासन के लिए छोड़ते हैं। अब वही करें गायों के मरने के बाद उनका निपटान।

अपने ऊपर हुए जुल्म के खिलाफ खड़ा होने का यह नायाब तरीका है, यह अपने खिलाफ एक राजनीति का करारा जवाब है, यह एक समूची ब्राह्मणवादी सत्ता की राजनीति की जड़ पर हमला है। अच्छा यह है कि मुख्यधारा के मीडिया के सत्तावादी रवैये के चलते गुजरात में आए इस तूफान की अनदेखी और सच कहें तो इसे दबाने की कोशिशों के बावजूद विरोध के इस तरीके की खबर देश के दूसरे इलाकों तक भी पहुंची है और इसके संदेश ने व्यापक असर छोड़ा है। अब जरूरत यह है कि मरी हुई या जिंदा गायों को इस देश में गोरक्षा का कथित आंदोलन चलाने वाले आरएसएस-भाजपा और उनके दूसरे संगठनों के सदस्यों के घर छोड़ दिया जाए, ताकि वे अपनी 'गऊमाता' के प्रति अपनी निष्ठा दर्शा सकें। मरी या जिंदा गाय से पेट भरने लायक जितनी आमदनी होती है, उससे ज्यादा दूसरे किसी रोजगार में हो सकती है।

जाहिर है, यह एक ऐसा जवाब है जिससे आरएसएस-भाजपा की समूची ब्राह्मणवादी राजनीति की चूलें हिल सकती हैं। अगर यह आंदोलन आगे बढ़ा और समूचे देश के दलितों ने मरे हुए जानवरों के निपटान के काम सहित मैला ढोने, शहरों-महानगरों से लेकर गली-कूचों या फिर सीवर में घुस कर सफाई करने या जातिगत पेशों से जुड़े तमाम कामों को छोड़ कर रोजगार के दूसरे विकल्पों की ओर रुख करते हैं तो बर्बर और अमानवीय ब्राह्मणवादी समाज के ढांचे को इस सामंती शक्ल में बनाए रखना मुश्किल होगा।

गुजरात में दलित समुदाय ने पहली बार मरी हुई गायों और दूसरे जानवरों के जरिए आरएसएस-भाजपा और हिंदुत्ववादी राजनीति के सामने एक ठोस चुनौती रखी है। इसके अलावा, उन्होंने सड़क पर उतर कर और उनमें से कुछ ने आत्महत्या की कोशिश में छिपे दुख को जाहिर कर अपनी मौजूदगी का अहसास कराया है। इस स्वरूप के आंदोलन के महत्त्व आरएसएस को मालूम है और वह अपनी ओर से इससे ध्यान बंटाने के लिए कुछ भी कर सकता है। इसलिए इस विद्रोह की अनदेखी करने या दूसरे कम महत्त्व के मुद्दों में उलझने के बजाय अब दलित समुदाय की ओर से शुरू की गई इस सामाजिक क्रांति का स्वागत और उसे आगे बढ़ाने की कोशिश उन सब लोगों को करने की जरूरत है, जो आरएसएस-भाजपा की ब्राह्मणवादी राजनीति को दुनिया का एक सबसे अमानवीय सामाजिक राजनीति मानते हैं।

Wednesday 15 June 2016

कैराना के झूठ के सहारे



साक्षी महाराज या साध्वी प्राची जैसे नफरत की आग उगलने वाले लोगों की बेलगाम बातों को अब तक भाजपा उनकी व्यक्तिगत राय बता कर दिखने के लिए खुद को दूर करती रही है। हालांकि अब सब जानते हैं कि ये बेलगाम हिंसक बयान किस राजनीति का हिस्सा हैं, लेकिन अब वह परदा भी उठ रहा है।

भाजपा के सांसद हुकुम सिंह की ओर से उठाए गए मुद्दे के बाद बाकायदा भाजपा अध्यक्ष की हैसियत से अमित शाह ने कहा कि 'उत्तर प्रदेश को कैराना की घटनाओं को हलके में नहीं लेना चाहिए, यह एक सदमे में डालने वाली घटना है... कैराना से (हिंदुओं का) भगाया जाना कोई साधारण घटना नहीं है!'

वे उस दिन भी सार्वजनिक रूप से यह कह रहे थे जब हुकुम सिंह की ओर से जारी लिस्ट की कलई खुल चुकी थी और कैराना के झूठ की खबरें चारों तरफ चलने लगी थीं। हालांकि भाजपा के लिए यह कोई नया 'प्रयोग' नहीं है, लेकिन अब शायद भाजपा ने तय कर लिया है कि उत्तर प्रदेश में सत्ता के लिए मैदान में उसकी भावी राजनीति क्या होगी! यानी कैराना के झूठ को बेशर्म तरीके से मुद्दा बनाने के साथ ही अब यह साफ हो गया लगता है कि भाजपा उत्तर प्रदेश के भावी विधानसभा चुनावों के मद्देनजर किस तरह का खेल खेलने जा रही है। हालांकि दादरी में मोहम्मद अख़लाक के मारे जाने के बावजूद अब नए सिरे से कथित फोरेंसिक जांच के बहाने कथित गोवंश के मांस का मुद्दा उठा कर वह यही करने की कोशिश में है। तो एक तरह से भाजपा ने मान लिया है कि उत्तर प्रदेश में सत्ता हासिल करने के लिए उसके पास अब शायद 'विकास' का जुमला भी नहीं रह गया है।

दरअसल, पिछले दो-ढाई दशक के दौरान सत्ता की उसकी राजनीति के केंद्र में यही अफवाह फैलाने या किसी भी रास्ते सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का फार्मूला रहा है। लेकिन केंद्र की सत्ता के लिए तात्कालिक तौर पर 'विकास' के जुमले का परदा ओढ़ा गया था। अपने इस जुमले के बारे में भाजपा खुद कितनी आश्वस्त है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि चुनावी जीत के लिए उसे अपने इस नारे पर भरोसा नहीं रह गया है। अपने नारे के प्रति ईमानदार नहीं रहना किसी भी व्यक्ति या समूह को इसी हालत में पहुंचा दे सकता है। सो, दो साल के भीतर-भीतर देश में इस कथित विकास के जुमले की हकीकत साधारण लोगों तक पहुंचने लगी है और इसमें खुद भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह ने पंद्रह लाख रुपए जैसे शिगूफों को जुमला घोषित कर मदद की।

दिक्कत यह भी है कि इस ओढ़े गए परदे के अलावा भाजपा के पास अपनी राजनीति के लिए सनातनी या हिंदुत्व की राजनीति के सिवा और क्या है, जिसके सहारे वह मैदान उतरे!

सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की तमाम कोशिशों के नाकाम हो जाने के बाद बिहार में 'विकास' के नारे की परीक्षा हो चुकी थी और लोग समझ चुके थे कि भाजपाई विकास का मतलब क्या होता है! इसलिए वहां बेहद बुरी हार के बाद भाजपा ने असम में अपने एजेंडे का खुला खेल खेला और जीत हासिल की। तो वही आदर्श लेकर अब वह उत्तर प्रदेश का मैदान आजमाने की फिराक में है।

थोड़ी राहत की बात यह जरूर है कि दो-तीन दिन के भीतर ही कुछ हलकों की ओर से कैराना के झूठ पर से परदा उठाने की कोशिश की गई और कैराना का खुला भाजपाई फर्जीवाड़ा अब सामने है। सवाल है कि कैराना से कथित तौर पर भगाए लोगों की लिस्ट में से कई लोग जब खुद कह रहे हैं कि उनके साथ ऐसा कुछ नहीं हुआ, यह लिस्ट फर्जी है, मनगढ़ंत है, तब भी सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष की हैसियत से अमित शाह 'कैराना से हिंदुओं के निकाले जाने' पर क्यों 'चिंता' जता रहे हैं!

क्या अब भाजपा के पास चुनावी जीत के लिए यही रास्ता बच गया है? क्या भारत के इस लोकतंत्र और संविधान के उसूलों को वह ताक पर रख चुकी है? भारत में सत्ता पर काबिज जिस पार्टी के अध्यक्ष खुद झूठ के सहारे नफरत की राजनीति करने वालों को बढ़ावा दे रहे हों, प्रधानमंत्री को अपनी राजनीतिक पार्टी की इस तरह की गतिविधियों पर सख्ती से रोक लगाने की जरूरत नहीं पड़ रही हो, तो क्या यह भारत के संविधान और लोकतंत्र के तहत भारत में शासन करने की उसकी क्षमता पर सवालिया निशान है?

जिस तरह बहुत मामूली मुद्दों को भी सांप्रदायिक ध्रुवीकरण में तब्दील करने की कोशिश की जा रही है, उसका हासिल क्या होना है? देशभक्ति और देश की एकता के लिए मर-मिटने का आह्वान करने वाले ही शायद देश को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाते हैं!

Tuesday 31 May 2016

नस्ल और जाति के खिलाफ नफरत के 'मामूली' औजार


फौजी रहे और फिलहाल देश के विदेश राज्यमंत्री वीके सिंह की नजर में सबसे त्रासद और कई बार देश के सामने असुविधाजनक हालत खड़ी करने वाली घटनाएं भी 'मामूली' होती हैं। इसलिए जब दिल्ली में अफ्रीकी नागरिकों पर हमले के मामले पर व्यापक पैमाने पर चिंता जताई जा रही है, तो उन्होंने अपने विचार प्रकट किए कि ये हमले 'मामूली झड़प' थे और इसे महज मीडिया 'बढ़ा-चढ़ा कर' पेश कर रहा है। वीके सिंह के ये खयाल तब भी सबसे सामने हैं जब उनके ही महकमे की कैबिनेट मंत्री सुषमा स्वराज ने इस मामले की त्वरित सुनवाई के आदेश दिए हैं। ये वही वीके सिंह हैं जिन्होंने फरीदाबाद में दलित बच्चों को जिंदा जला दिए जाने की घटना पर कहा था कि 'कोई कुत्ते को पत्थर मारें, तो भी क्या सरकार जिम्मेवार है'।

सवाल है कि किसी अफ्रीकी मूल के व्यक्ति की सरेआम हत्या कर दी जाती है या उन पर बिना वजह के जानलेवा हमले किए जाते हैं, तो ऐसी घटनाएं वीके सिंह की नजर में 'मामूली' क्यों होती हैं? कहीं दो बच्चों को जिंदा जला दिया जाता है और उस घटना पर प्रतिक्रिया जाहिर करने के लिए वीके सिंह को कुत्ते का ही उदाहरण क्यों मिलता है? सामाजिक दुराग्रहों और आपराधिक कुंठाओं के साथ-साथ सीधे-सीधे व्यवस्था की नाकामी से उपजी घटनाओं के मामले में सरकार उन्हें पूरी तरह मासूम क्यों लगती है? आखिर कानून-व्यवस्था से लेकर सामाजिक विकास की कसौटी पर सरकार की जिम्मेदारी उन्हें इतनी 'मामूली' क्यों लगती है? वे फौजी रहे हैं, लेकिन अब वे विदेश राज्यमंत्री हैं। तो क्या उन्हें अपने पद की गरिमा और दायित्व का भी अहसास नहीं है?

दरअसल, वीके सिंह जो भी कहते रहे हैं, वे भारतीय आम जनमानस में घुले आग्रहों-पूर्वाग्रहों का प्रतिनिधित्व करते हैं। क्या यह छिपा हुआ है कि सड़कों पर जैसे ही अफ्रीकी मूल अश्वेत चेहरे देखते ही भारत के परंपरागत पिछड़ी मानसिकता में जीने वाले लोगों के भीतर कौन-से खयाल उमड़ने लगते हैं? अश्वेत लोगों के खिलाफ सीधे-सीधे नफरत के भाव का सिरा कहां से शुरू होता है? आखिर वे कौन-सी वजहें हैं कि अश्वेत समुदाय के लोगों को देखते ही भारत के ज्यादातर लोगों के मन में शायद ही कोई सकारात्मक भाव उभरता है? अश्वेत या काले रंग के लोगों के प्रति ये दुराग्रह किस तरह की सोशल कंडीशनिंग का नतीजा हैं?

कई बार खुद जनप्रतिनिधि कहे जाने वाले लोगों का व्यवहार ऐसा होता है कि समाज को अपने आग्रहों के साथ और ज्यादा ठोस होने की खुराक मिलती है। दिल्ली में पहली बार जब आम आदमी पार्टी की सरकार बनी थी तब उसके एक मंत्री सोमनाथ भारती और उनके साथियों ने स्थानीय लोगों के साथ मिल कर अफ्रीकी मूल की चार महिलाओं के साथ जैसा अपमानजनक बर्ताव किया था, वह अश्वेत लोगों के प्रति सामाजिक दुराग्रहों का ऐसा ही उदाहरण था।

एक लोकतांत्रिक समाज में सरकारें तमाम ऐसे इंतजाम करती हैं जिनमें सभी नागरिकों के भीतर इंसान के प्रति बराबरी और संवेदनशीलता के भाव का विकास हो। लेकिन किन वजहों से एक मंत्री को अफ्रीकी मूल के लोगों पर किया गया 'नस्लीय हमला' कोई मामूली घटना लगती है? क्या यह सामाजिक सत्ताधारी तबकों के बीच नस्ल और जाति की सामाजिक हैसियत की वजह से अपमान और यातनाओं को एक सहज स्थिति मान लेने का प्रतिनिधि स्वर है?

यों, दुनिया भर में अश्वेत समुदायों के खिलाफ श्वेत माने जाने वाले समुदायों के बीच धारणाओं और व्यवहार का एक त्रासद इतिहास रहा है। लेकिन भारत में यह ज्यादा जटिल हो जाता है। यहां चूंकि पहले ही दलित-वंचित जातियों को उनकी सामाजिक अवस्थिति के अलावा शरीर के रंग से भी चिहि्नत किया जाता रहा है, उसमें जो लोग गौर-वर्ण नहीं हैं, उनके लिए सत्ताधारी तबकों के बीच सिर्फ हेय दृष्टि ही है। जातीय ऊंच-नीच की बुनियाद से तय होने वाले रंगों के प्रति यही आग्रह अश्वेत समुदाय तक पहुंचते-पहुंचते नस्लीय घृणा में तब्दील हो जाता है। समाज के स्तर पर इस भाव और सोच के बने रहने की अपनी वजहे हैं जहां पैदा होने के बाद से ही जाति और रंग को लेकर एक दुराग्रह का भाव पाला-पोसा जाता है। लेकिन विडंबना यह है कि सरकार के स्तर पर भी फौरी प्रशासनिक कदमों के अलावा सामाजिक विकास के पैमाने पर कुछ भी ऐसा नहीं किया जाता है, जिससे साधारण लोगों के बीच इस तरह के भावों से दूरी बनाने की स्थिति बने, माइंडसेट के स्तर पर कोई बदलाव हो।

Monday 23 May 2016

"बुद्धा इन ए ट्राफिक जाम" : सियासी परदे में किसका एजेंडा...!



देश के 'सबसे बड़े दुश्मनों' और 'सबसे बड़ी समस्याओं' से लड़ने के तरीके और उनसे पार पाने के 'रास्ते' अब वॉलीवुड के फिल्मकारों ने बताना शुरू कर दिया है! हालांकि सिनेमा के परदे पर 'उपदेश' तो पहले भी होते थे, लेकिन उन्हें 'फिल्मी' कह और मान कर माफ कर दिया जाता था! लेकिन अब फिल्में बाकायदा राजनीतिक एजेंडे के तहत दर्शकों को संबोधित करती हैं।

इस लिहाज से देखें तो 'बुद्धा इन ए ट्राफिक जाम' के निर्माता-निर्देशकों ने नक्सलवाद और सरकारी तंत्र के फंसे आदिवासियों की सभी तकलीफों या समस्याओं का हल निकाल लिया है, आदिवासियों के उद्धारकों की खोज कर ली है! यह उद्धारक है 'बिजनेस' और जाहिर है 'बिजनेसमैन' यह उद्धार करने के लिए अपने और आदिवासियों के बीच के सारे 'मिडिलमैन' यानी बिचौलिये को खत्म करना चाहता है!

परदे पर शुरुआती दो दृश्यों में पिछले डेढ़ दशक से एक हालत में अभाव की जिंदगी जीते एक निरीह, लाचार आदिवासी को सत्ता और नक्सलियों के बीच पिसने के 'मार्मिक' दृश्यों के जरिए हॉल में बैठे दर्शकों को सहानुभूति के सागर में गोते लगाने पर मजबूर किया जाता है, फिर 'लोक-स्पर्श' के गीत के जरिए बिजनेस मैनेजमेंट की पढ़ाई कराने वाले आधुनिक लड़के-लड़कियों को अपना 'सरोकार' जताते दिखाया जाता है। इस 'सरोकार' प्रदर्शन में पश्चिमी अंगरेजी मादकता है, शराब है, नशा है, एक बिंदास उन्माद है, 'नैतिक पुलिस' का हमला है... और सब पर 'सरोकार' का संगीत है..!

खैर, फिल्म आगे बढ़ती है और बताती है कि कैसे एक प्रोफेसर (अनुपम खेर) इतने बड़े बिजनेस स्कूल में घुसपैठ करके वहां के विद्यार्थियों को नक्सली बनाने की फिराक में है, एक 'भोले' स्टूडेंट (अरुणोदय) सिंह को वह इसके लिए फंसाना चाहता है, नक्सलियों के कमांडर तक कैसे प्रोफेसर की सीधी पहुंच है, घर में उसका दोहरा चेहरा है और उसकी पत्नी तक को नहीं मालूम कि वह नक्सली है! एक एनजीओ चलाने वाली या कार्यकर्ता कैसे सरकार से फंड लेकर वह पैसा नक्सलियों तक पहुंचाती हैं, वह प्रोफेसर कैसे सीधे आदिवासियों की मदद के प्रस्ताव को खारिज कर देता है। नक्सली राष्ट्रद्रोही हैं, उन्होंने जितने जवानों को मारा, उतने तो कारगिल जैसी लड़ाइयों में भी नहीं मारे गए! ये नक्सली एनजीओ वाले और बिजनेस स्कूल के प्रोफेसर की तरह चेहरा बदल कर सिस्टम के हर कोने में पैठ चुके हैं और अमेरिका की चकाचौंध को ठुकरा कर भारत में बिजनेस के जरिए उद्धार करने की आकांक्षा पाले एक 'लाचार' नौजवान को कैसे इन सबसे डरना चाहिए। परदे पर परदा, विरोधाभासों के बीच..!

बहरहाल, इसमें बदलाव का सपना लिए 'पिंक चड्ढी कैंपेन' चलाने वाले इस बिजनेस के दीवाने नौजवान के अलावा एक और 'लाचार' पक्ष है- सत्ता! सत्ता पूरी तरह निर्दोष है, मासूम है, वह आदिवासियों का कल्याण करने के लिए एनजीओ वालों को पैसा देती है और वे लोग वह पैसा नक्सलियों तक पहुंचा देते हैं! इसका हल सिर्फ और सिर्फ बिजनेस है, जो हर तरह के बिचौलियों को खत्म करके सीधे आदिवासियों का 'कल्याण' करेगा! वह बिचौलिया चाहे एनजीओ वाले हों या सरकार हो!

नक्सली क्यों और कैसे उगे, एनजीओ कैसे और क्यों उगे, सरकार की क्या जवाबदेही है, व्यवस्था की नाकामी के लिए कौन जिम्मेदार है, इससे सबसे फिल्मकार को कोई मतलब नहीं। उसकी निगाह में आदिवासियों का भला सिर्फ और सिर्फ इंडियन बिजनेस स्कूल, बिजनेस और बिजनेसमैन ही कर सकते हैं! आदिवासियों के लिए संवेदना का समंदर हाथ में लिए बिजनेस-सॉल्यूशन-मॉडल में समूचे देश में जमीन कब्जाने के खेल पर सोचने की कोई जरूरत नहीं, इस मॉडल में मजदूरों के सवालों के लिए कोई जगह नहीं, इससे सरकार या तंत्र की जरूरत और उसकी जिम्मेदारियों का क्या होगा, इसकी फिक्र नहीं, सरकार की जिम्मेदारियों पर सवाल खड़े करने के बजाय उसे नाकारा बना कर पेश करना मकसद, लेकिन इस समूचे मसले पर एक खास राजनीतिक धारा के नजरिए का विस्तार...! इसी लोकेशन से मां शब्द से जुड़ी वीभत्स गाली का इतनी बार इस्तेमाल है कि जुगुप्सा हो जाती है...! लगता है कि फिल्मकार का मन इसी गाली में डूबा हुआ है..!

दिखने के लिए 'भारत माता की जय' के साथ मां की सबसे 'मशहूर' और वीभत्स गाली परोसने के सिरे से लगता है कि इसमें किसी के पक्ष से नहीं खेला गया है, लेकिन इस 'औपचारिकता' के अलावा जिन-जिन राजनीतिक धाराओं और संस्थानों को कठघरे में किया गया है, सरकार और तंत्र को बख्श दिया गया है, उससे इस फिल्म की मंशा पर सवाल खड़े होते हैं! नक्सली संगठनों के बारे में अलग से कुछ भी ऐसा नहीं दिखाया गया, जो प्रचारित है। लेकिन सरकार क्या करती है, आदिवासी किन वजहों से उस हालत में पहुंचे, उसमें सरकार की क्या भूमिका या जिम्मेदारियां हैं, दो पाटों के बीच से वे कैसे निकलेंगे, इस पर जानबूझ कर परदा..! जवाब होगा कि एक फिल्म क्या-क्या करेगी! ठीक है! तो फिर यही क्यों किया..!

फिल्में अगर राजनीति नहीं हैं, एक एजेंडे के तहत नहीं बनाई गई, मनोरंजन हैं तो सलमान खान या कपिल शर्मा टाइप क्यों नहीं! एक ऐसा विषय क्यों, उसके साथ खिलवाड़ क्यों, उसमें सरकार से लेकर राजनीतिक दलों तक भूमिका की अनदेखी क्यों, जिसमें एक बड़ी आबादी कीड़ों-मकोड़ों की तरह समझी जा रही है, जमीन कब्जाने का व्यापक खेल चल रहा है! मारी जा रही आबादी की तकलीफों के साथ खिलवाड़ का अधिकार-पत्र कहां से जारी हुआ है..!

...और! एक जिक्र कि 'बुद्ध के समय का एक गांव इसलिए आज भी मौलिक कलाकृतियों के जरिए अपनी संस्कृति और इतिहास बता रहा है कि आज तक वहां कोई 'बाहरी' नहीं पहुंचा', शायद इस फिल्म के नाम 'बुद्धा इन ए ट्राफिक जाम' का आधार है। लेकिन क्या यह नाम इतना भोला और मासूम है..!

Wednesday 13 April 2016

आरएसएस-भाजपा: आंबेडकर से अनुराग का पाखंड





सन 2015 के नवंबर महीने में अपने ब्रिटेन दौरे के दौरान जब लंदन स्थित आंबेडकर हाउस का उद्घाटन नरेंद्र मोदी के हाथों के होने की खबर आई तो वहां के सबसे बड़े दलित संगठन 'कास्ट वाच यूके' के अलावा दूसरे दलित संगठनों ने भी सख्त आपत्ति जताई। 'कास्ट वाच यूके' ने अपने एक बयान में कहा कि भारतीय प्रधानमंत्री जिस तरह आंबेडकर की स्मृतियों को अपने राजनीतिक औजार की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं, वह घिनौना है और उन दलितों को भ्रमित करने की कोशिश है जो आज भारत में अपने मानवाधिकारों के लिए जंग लड़ रहे हैं और ब्रिटेन में भी बराबरी के लिए अपनी मांग को सशक्त तरीके से दर्ज कर रहे हैं।

यह बयान अपने आप में यह बताने के लिए काफी है कि अभी भी बाबा साहेब आंबेडकर के दर्शन से खौफ खाने वाली और वास्तव में उसे अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानने वाली आरएसएस-भाजपा के लिए आज आंबेडकर क्यों प्रिय होते दिख रहे हैं। यहां 'दिख रहे हैं' का इस्तेमाल जानबूझ कर किया गया है, क्योंकि 'दिखने' और 'होने' में कई बार बड़ा फासला होता है। ब्रिटेन में आंबेडकर हाउस का उद्घाटन करने से पहले महाराष्ट्र में भाजपा की सरकार बनने के बाद वहां आंबेडकर स्मृति स्थल निर्माण की प्रक्रिया शुरू हुई। लेकिन भाजपा को कुछ समय पहले ही यह अंदाजा हो गया था कि आने वाले दौर की सामाजिक राजनीति की दिशा कैसे तय होगी। इसलिए लोकसभा चुनावों के पहले से ही खालिस ब्राह्मणवादी राजनीति करने की अभ्यस्त आरएसएस और उसके सहयोगी संगठनों की जमीनी गतिविधियों में आंबेडकर, ज्योतिबा फुले आदि दलित प्रतीक शख्सियतों की तस्वीरें आ गई थीं। खासतौर पर आंबेडकर का नाम भाजपा ने ऐसे ढोना शुरू किया गोया कि वह अपने गोलवलकर के दर्शन से हार गई हो।

लेकिन सच यह नहीं था। पिछले दो-तीन दशकों के दौरान हुई राजनीतिक उठा-पटक ने एक तरह से अगले कुछ दशकों की राजनीति की दिशा कर दी है। यों चेतना और जागरूकता की दिशा तो जाति से मुक्त व्यवस्था की ओर होनी चाहिए, लेकिन फिलहाल जितना भी हुआ है, उसमें ऐतिहासिक तौर पर नाइंसाफी के शिकार सामाजिक तबकों ने अपने लिए न्याय की मांग करनी शुरू कर दी और इसे अपने हक की तरह देखा। यही आवाज आज दलित-वंचित तबके की ओर से लगातार उठते हुए राजनीति और समाज-व्यवस्था के सामने एक जबर्दस्त दखल बन चुकी है। अब चाह कर भी कोई राजनीतिक दल या समूह ऐतिहासिक रूप से सामाजिक वर्चस्व बनाए रखने वाले समूहों-जातियों की खुली पैरोकारी नहीं कर सकता है।

यही वजह है कि दलित-वंचित जातियों के लगातार बढ़ते एसर्शन और इस वर्ग की राजनीतिक उपयोगिता को देखते हुए इसे 'कोऑप्ट' करने या खुद में समा लेने की जो होड़ चली, उसमें आरएसएस और भाजपा ने प्रतीकों का सबसे ज्यादा और निर्लज्जता से इस्तेमाल किया है। आंबेडकर को अपने एक आदर्श-पुरुष के रूप में प्रचारित करने के पीछे मकसद सिर्फ दलित-वंचित तबकों को अपने मत-समूह के रूप में आकर्षित करना है। दरअसल, पिछले तीन-चार दशकों के दौरान इन वर्गों के बीच कई वजहों से हुए सामाजिक सशक्तीकरण ने इनकी चेतना को भी सशक्त किया है और अब वे अपने लिए कोई मेहरबानी नहीं, अधिकार मांग रहे हैं।

भारत का समाज यों भी प्रतीकों में जीने वाला, प्रतीकों से ताकत हासिल करने वाला समाज रहा है। अब चूंकि ये प्रतीक राजनीतिक अर्थों में अपनी अहमियत स्थापित करने और सत्ता में भागीदारी के लिए अहम औजार या संघर्ष के हथियार के तौर पर उपयोग हो रहे हैं, इसलिए आरएसएस-भाजपा ने भी इन प्रतीकों को अपनी राजनीति में शामिल कर लिया है। वरना आंबेडकर के रूप में जिस प्रतीक को वह आज अपनी राजनीति के लिए इस्तेमाल करना चाह रही है या कर रही है, वही आंबेडकर आरएसएस की राजनीति के प्रस्थान-बिंदु के सबसे खिलाफ हैं। बल्कि कायदे से कहें तो आंबेडकर अपने विचार और अपने समग्र प्रतीक के रूप में जिस समाज और व्यवस्था की पैरोकारी करते हैं, उसके लिए आंदोलन करते हैं, वह आरएसएस के सपनों के समाज के बरक्स है, खिलाफ है, बराबरी और सम्मान पर आधारित एक नई दुनिया की योजना है।

हम सिर्फ कल्पना कर सकते हैं कि आंबेडकर ने जब ब्राह्मण-धर्म से पूरी तरह मुक्ति की बात की, तब आरएसएस के दिल पर क्या गुजरी होगी! लेकिन जिस आरएसएस के लिए ब्राह्मण-धर्म का पुनरोत्थान और उसकी स्थापना आज भी मूल मकसद है, उसके राजनीतिक मोर्चे पर आंबेडकर को खड़ा किया गया है। क्या यह समझना इतना मुश्किल है कि हिंदू कहे जाने वाले ब्राह्मण-धर्म के तहत जीने-मरने वाले समाज के जिस हिस्से यानी दलित-पिछड़ी जातियों पर उसे फिर से कब्जा चाहिए तो उसके लिए आंबेडकर से बेहतर 'राजनीतिक हथियार' और कुछ नहीं हो सकता? मगर दिलचस्प यह है कि आंबेडकर का झंडा आगे करने के बावजूद आरएसएस ने अब तक शायद यह कहीं और कभी नहीं कहा कि हम हिंदुत्व के ढांचे से ब्राह्मणों का वर्चस्व खत्म करेंगे, फिर जाति-व्यवस्था का जड़-मूल से नाश करेंगे। और अगर जाति-व्यवस्था को बनाए रखते हुए या इसे मजबूत करते हुए आरएसएस-भाजपा आंबेडकर को अपने हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर दलित-पिछड़ी जातियों को अपनी ओर लुभाने की कोशिश कर रही है तो वह एक बार फिर किस सामाजिक व्यवस्था की दीवारों और जंजीरों को मजबूत करने की फिराक में है?

यों राजनीतिक और स्वाभाविक रूप से आंबेडकर के प्रतीक और विचार से आरएसएस-भाजपा की सीधे-सीधे दुश्मनी बनी रहनी चाहिए। मुख्य वजह है आंबेडकर के स्थायी विचार। हिंदुत्व के बारे में अपने वक्तव्य 'जाति का उन्मूलन' में आंबेडकर कहते हैं- "हमें यह मानना होगा कि हिंदू समाज एक मिथक है। 'हिंदू' नाम ही विदेशी है। मुसलमानों ने यहां के निवासियों से अपनी अलग पहचान बनाने की गरज से इन्हें हिंदू नाम दिया। ...उन्होंने कभी एक सामान्य नाम की आवश्यकता नहीं समझी, क्योंकि अपने को एक समुदाय के रूप में बांधने की अवधारणा उनके पास थी ही नहीं। इस प्रकार से हिंदू समाज का कोई अस्तित्व नहीं है। यह तो जातियों का समूह मात्र है। हरेक जाति अपने अस्तित्व के प्रति सचेत है। इनका अस्तित्व जाति-व्यवस्था के जारी रहने का कुल परिणाम है। जातियां एक संघ भी नहीं बनातीं। कोई जाति दूसरी जातियों से जुड़ने की भी भावना नहीं रखती, सिर्फ हिंदू-मुसलिम दंगे के समय ये आपस में जुड़ती हैं। ...हरेक जाति केवल आपस में विवाह करती है। ...वास्तव में एक आदर्श हिंदू, बिल में रहने वाले उस चूहे की तरह है, जो अन्य लोगों (चूहों) के संपर्क में नहीं आना चाहता।

...हिंदुओं में सामूहिक चेतना की भारी कमी पाई जाती है। ...प्रत्येक हिंदू में जो चेतना होती है, वह अपनी जाति के लिए है। इसी कारण से यह नहीं कहा जा सकता कि ये एक समाज या राष्ट्र बनाते हैं। फिर भी ऐसे काफी भारतीय हैं जिनकी देशभक्ति उन्हें यह मानने की स्वीकृति नहीं देती कि भारत एक राष्ट्र नहीं है, बल्कि यह केवल असंगठित लोगों की भीड़ है।"


यानी बाबा साहेब आंबेडकर ने हिंदुत्व के नाम पर ब्राह्मणवाद के जिस ढांचे पर इतना तीखा सवाल उठाया और उसे ध्वस्त करने का आह्वान किया, उसी को बनाए रखने की राजनीति करने वाले समूह आज बाबा साहेब आंबेडकर को अपना राजनीतिक हथियार बना रहे हैं। जाहिर है, इसके पीछे एक गहरी साजिश है।

सिर्फ राजनीतिक तौर पर, बल्कि आंबेडकर-पथ पर चलने वालों के समूचे समुदाय में घुस कर पहले उसे अपने असर में लेना, फिर धीरे-धीरे ब्राह्मण धर्म का गुलाम बने रहने पर मजबूर कर देना। बौद्ध धर्म से लेकर तमाम ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं कि ब्राह्मणवाद के बरक्स जैसे ही कोई ऐसा ध्रुव खड़ा होता हो जो इसकी समूची व्यवस्था को खत्म करने की ताकत रखता हो, एक नई व्यवस्था और समाज रच देने की क्षमता रखता हो, और ब्राह्मणवाद उससे सीधे निपट सकने की क्षमता नहीं रखता तो वह उसमें चुपके से सुनियोजित तरीके से घुसना शुरू कर देता है। उसके बाद किसी भी मत या विचारधारा का क्या हुआ है, यह किसी से छिपा नहीं है। यह बेवजह नहीं है कि सबसे प्रगतिशील विचारधारा तक पर ब्राह्मणवाद बरतने के आरोप लगाने में मुश्किल नहीं होती।

लेकिन एक लंबे दौर में हुआ यह है कि ब्राह्मणवाद के बरक्स खड़े संघर्षों के बीच में उसकी इस चाल की एक राजनीतिक प्रवृत्ति के तौर पर पहचान कर ली गई और इसी असलियत का परदाफाश होना ब्राह्मणवाद के लिए परेशानी का सबसे बड़ा कारण है। आज उसे अपने असली एजेंडे को जमीन पर उतारना इसीलिए थोड़ा मुश्किल होगा कि 'हिंदुत्व' नाम के एक बड़े पहचान के बरक्स इसके ढांचे में छोटी पहचानें भी संघर्ष के लिए खड़ी हुईं और अपनी सामाजिक अवस्थिति के कारकों को सामने रख कर सवालों का जवाब मांगने लगीं। और चूंकि दलित-वंचित तबकों के लिए कभी समझौता नहीं करने और ब्राह्मणवाद की परतों को उघाड़ कर सम्मान, गरिमा और स्वाभिमान के समाज का सपना देने वाले आंबेडकर का मॉडल अब सामने है, इसलिए आरएसएस-भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती भी। आज अगर आरएसएस-भाजपा आंबेडकर को अपने माथे पर उठाए दिखने की कोशिश कर रही है तो उसकी मजबूरी यही है। अगर हिंदू कहे जाने वाले समाज में सबसे निचले तबके के तौर पर शुमार दलित-पिछड़े तबके किसी तरह ब्राह्मणवाद के ढांचे से छिटकने लगे तो आरएसएस के सपनों के समाज पर संकट आएगा।

लेकिन इस हकीकत के बावजूद आरएसएस कभी-कभी अपने भीतर के सच को पूरी तरह ढक नहीं पाता। बिहार विधानसभा चुनाव के पहले आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने जिस तरह सामाजिक यानी जाति के आधार पर मौजूदा आरक्षण-व्यवस्था पर पुनर्विचार करने का खयाल जाहिर किया, वह उसी मूल का सबूत है। हालांकि इस आरक्षण को खत्म करने का विचार आरएसएस का नया नहीं है, लेकिन भागवत के बयान के बहाने इस पर पर्याप्त बहस हुई और एक तरह से आरएसएस और भाजपा दोनों ही इस मसले पर फंसे हुए दिखे। जाहिर है, आंबेडकर के प्रतीक को अपनी राजनीति बनाना और आरक्षण का विरोध, दोनों एक साथ नहीं चल सकते। लेकिन फिर भी क्या वजह है कि आरएसएस-भाजपा आज आंबेडकर से प्रेम दर्शाने और उसे स्वीकार किए जाने का गुहार लगा रही है?

जबकि आरएसएस-भाजपा इस बात से अनभिज्ञ नहीं होगी कि हिंदू धर्म के बारे में आंबेडकर ने कितना कुछ कहा है। मसलन, अपनी पुस्तक 'दलित वर्ग को धर्मांतरण की आवश्यकता क्यों है' में उन्होंने हिंदू धर्म को लेकर काफी सख्त बातें की थीं- "यदि आपको इंसानियत से मुहब्बत है तो धर्मांतरण करो। हिंदू धर्म का त्याग करो। तमाम दलित अछूतों की सदियों से गुलाम रखे गए वर्ग की मुक्ति के लिए एकता, संगठन, करना हो तो धर्मांतरण करो। समता प्राप्त करनी है तो धर्मांतरण करो। आजादी प्राप्त करनी है तो धर्मांतरण करो। अपने जीवन की सफलता चाहते हो तो धर्मांतरण करो। मानवी सुख चाहते हो तो धर्मांतरण करो। ...हिन्दू धर्म को त्यागने में ही तमाम दलित, पददलित, अछूत, शोषित पीड़ित वर्ग का वास्तविक हित है, यह मेरा स्पष्ट मत बन चुका है।"

इसके अलावा, 'जाति के उन्मूलन' में वे आरएसएस के हिंदुत्व के बारे में साफ कहते हैं कि "...हिंदू जिसे धर्म कहते हैं, वह कुछ और नहीं, आदेशों और प्रतिबंधों की भीड़ है। ...अगर आपको हिंदू समाज में जाति-प्रथा के खिलाफ लड़ना है तो आपको तर्क न मानने वाले और नैतिकता को नकारने वाले वेदों और शास्त्रों को बारूद से उड़ा देना होगा। श्रुति और स्मृति के धर्म को खत्म करना होगा। इसके अलावा, कुछ और करना लाभदायक नहीं होगा। इस मामले में मेरा मत यही है।" (जाति का उन्मूलन से।)

तो जो आंबेडकर हिंदुत्व और स्पष्ट कहें तो ब्राह्मणवाद के खिलाफ एक ठोस योजना देते हैं, वेदों और शात्रों को बारूद से उड़ा देने की बात करते हैं, वे आंबेडकर हिंदुत्व और सच कहें तो ब्राह्मणवाद की राजनीति करने वालों के लिए अचानक कैसे प्रिय हो गए? बात फिर वहीं घूम कर आती है कि आरएसएस को बहुत अच्छे से मालूम है कि पिछले सौ सालों के दौरान जो सामाजिक आलोड़न हुए हैं, उसमें ब्राह्मणवाद की कुर्सी के पाए थोड़े हिले हैं, दलित-वंचित तबके ने सामाजिक साजिशों की पहचान की है।

बहरहाल, इन सब सच्चाइयों के बरक्स चौदह अप्रैल, 2015 यानी आंबेडकर के जन्मदिवस के मौके पर भाजपा-आरएसएस ने आंबेडकर को राष्ट्रवादी और हिंदुत्व के तौर पर पेश करना चाहा। लेकिन यह वही भाजपा-आरएसएस है, जिसके सदस्य रहते हुए अरुण शौरी ने कुछ साल पहले अपनी किताब 'वर्शिपिंग फॉल्स गॉड' में आंबेडकर के खिलाफ अधिकतम जहर फैला दिया था... बेलगाम भाषा में आंबेडकर की शख्सियत को ध्वस्त करने में लगे थे और भाजपा-आरएसएस बल्लियों उछल कर उस किताब को आंबेडकर के खिलाफ हथियार बना रही थी। सवाल है कि उसकी नजर में आंबेडकर आज राष्ट्रवाद के प्रणेता कैसे हो गए! 
आंबेडकर के 'राष्ट्रवाद' का अंदाजा इससे लगा सकते हैं कि आंबेडकर ने राष्ट्रवाद की हकीकत यह बयान की कि "मजदूरों के सबसे गंभीर विरोधी निश्चित ही राष्ट्रवादी हैं। ...मजदूरों को चाहिए कि वे राजनीति के रूपांतरण और पुनर्निर्माण के जरिए लोगों के जीवन में लगातार नई जान फूंकने पर जोर दें। अगर जीवन के इस पुनर्निर्माण और पुनर्गठन के रास्ते में राष्ट्रवाद बाधा बन कर खड़ा होता है तब मजदूरों को चाहिए कि वह राष्ट्रवाद को खारिज कर दे...!"

जाहिर है, आंबेडकर दरअसल, आरएसएस-भाजपा के समूचे सियासी एजेंडे के खिलाफ खड़े होते हैं। लेकिन अब यह समझना मुश्किल नहीं होना चाहिए कि जब एक विचार और व्यवस्था के रूप में आंबेडकर के दबाव को हिंदुत्व की राजनीति अपने तमाम धतकरमों के बावजूद रोक सकने में सक्षम नहीं हुई तो अब वह आंबेडकर को ही अपना मोहरा बनाने की फिराक में है। यह न सिर्फ आंबेडकर के खिलाफ एक साजिश है, बल्कि हाशिये के या वंचित वर्गों के जितने भी लोगों या समाजों ने आंबेडकर से चेतना और ताकत हासिल की और अब भाजपा-आरएसएस की ब्राह्मणवादी राजनीति की झांसे में नहीं आ रहे हैं, उनके सामने यह एक नया भ्रम परोसने का खेल है।

Tuesday 9 December 2014

विज्ञान बनाम आस्था के द्वंद्व का समाज...


(कर्नाटक में अपने रोग को दूर करने की मनोकामना के साथ ब्राह्मणों के जूठन पर लोटते दलित )

भारतीय जनता पार्टी के सत्ता में आने के बाद पिछले छह-सात महीने में जिस तरह की खबरें सबसे ज्यादा चर्चा में रहीं, बल्कि दीनानाथ बतरा जैसे लोगों के बेवकूफी भरे विचारों और उनकी किताबों को नीतिगत स्तर पर भी लागू करने की कोशिश चल रही है, उसमें यह समझना जरूरी हो जाता है कि आखिर अंधविश्वासों पर आधारित मान्यताओं की स्वीकृति के लिए भी विज्ञान का सहारा क्यों लिया जाता है। क्या यह अपने आप में यह नहीं बताता कि अंधविश्वासों की पैरोकारों को भी अपनी राजनीति और कूढ़मगजी को स्थापित करने के लिए एक साजिश करने की जरूरत पड़ रही है, ताकि हर तरह के शोषण पर आधारित एक खास वर्ग की व्यवस्था कायम रहे और बाकी लोग अंधविश्वासों के अंधेरे में डूबे रहें? कुछ समय पहले प्रभात खबर अखबार के दीपावली विशेषांक पत्रिका के लिए यह लेख लिखा था। आजकल तमाम अंधविश्वासों को विज्ञान का सहारा लेकर स्थापित करने की जो कोशिश की जा रही है, उसमें लगा कि इसे ब्लॉग पर भी डाल देना चाहिए।

कुछ वाकये हमें उस तरह की सैद्धांतिकी के व्यावहारिक पहलुओं को समझने में मदद करते हैं, जिसमें यह बताया जाता है कि व्यक्ति की शिक्षा-दीक्षा उसकी चेतना पर अनिवार्य रूप से असर डालते हैं। इस लिहाज से विज्ञान और तकनीक के साथ समाज का साबका और उसका व्यक्ति के सोचने-समझने या दृष्टि पर असर का विश्लेषण सामाजिक विकास के कई नए आयाम से रूबरू कराता है। कुछ साल पहले की एक घटना है। राजधानी दिल्ली से सटे और तब ‘हाईटेक सिटी’ के रूप में मशहूर शहर गाजियाबाद में एक काफी वृद्ध महिला को उनके तीन बेटे तब तक (शायद चप्पलों से) पीटते रहे, जब तक उनकी जान नहीं निकल गई। किसी ‘ऊपरी असर’ से छुटकारा दिलाने के मकसद से ऐसा करने का निर्देश एक तांत्रिक बाबा का था।

अंधविश्वासों के अंधेरे कुएं में डूबते-उतराते हमारे समाज में साधारण लोगों के हिसाब से देखें तो इस तरह की यह घटना न अकेली थी और न नई। लेकिन यह घटना मेरी निगाह में इसलिए खास थी कि उस बुजुर्ग महिला को तांत्रिक के आदेश पर पीटते-पीटते मार डालने वाले तीन में से कम से कम दो बेटों की शैक्षिक पृष्ठभूमि विज्ञान विषय थी। उनमें से एक ने डॉक्टरी और दूसरे ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की थी। यानी जिस विज्ञान और तकनीकी विकास ने समाज में अज्ञानता के अंधकार को दूर करने और समाज को अंधविश्वासों की दुनिया से काफी हद तक बाहर लाने में अपनी अहम भूमिका निभाई है, उस विषय की शिक्षा-दीक्षा भी उन बेटों की चेतना पर पड़े अंधविश्वासों के जाले को साफ नहीं कर सकी। क्या यह विज्ञान की शिक्षा के ‘लेन-देन’ में वैज्ञानिक दृष्टि के अभाव का नतीजा नहीं है?

हाल ही में एक दिलचस्प अनुभव से रूबरू हुआ। हालांकि फिल्मों, टीवी धारावाहिकों और समाज में इस तरह की बातें आम हैं। एक बेहद सक्षम, जानकार और अनुभवी सर्जन-डॉक्टर के क्लीनिक में इस आशय का बड़ा पोस्टर दीवार टंगा था कि ‘हम केवल माध्यम हैं। आपका ठीक होना, न होना भगवान की कृपा पर निर्भर है! -आपका चिकित्सक।’ दूसरी ओर, अंतरिक्ष यानों के प्रक्षेपण जैसी विज्ञान, तकनीक और प्रौद्योगिकी की चरम उपलब्धियों को मुंह चिढ़ाते हुए हमारे इसरो, यानी अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के मुखिया जैसे पद पर बैठे लोग भी किसी यान के प्रक्षेपण की कामयाबी के लिए ‘ईश्वरीय कृपा’ हासिल करने के मकसद से किसी मंदिर में पूजा-अर्चना करते हैं। 24 सितंबर, 2014 को भारत के मंगलयान की शानदार कामयाबी इसरो के हमारे तमाम वैज्ञानिकों की काबिलियत की मिसाल है। मगर यह वही मंगलयान है, जिसके प्रक्षेपण के पहले चार नवंबर, 2013 इसरो के अध्यक्ष के. राधाकृष्णन ने तिरुपति वेकंटेश्वर मंदिर में पूजा-अर्चना की और इसकी अभियान की कामयाबी के लिए प्रार्थना की थी। राधाकृष्णन के पूर्ववर्ती इसरो अध्यक्ष माधवन नायर भी यही करते रहे थे।

वैज्ञानिक चेतना के बगैर विज्ञान का समाज

यह साधारण-सा सच है कि कोई भी पोंगापंथी, दिमाग से बंद, कूपमंडूक अंधविश्वासी व्यक्ति जब यह देखता है कि भारत के अंतरिक्ष प्रक्षेपण अनुसंधान संगठन, यानी इसरो का मुखिया विज्ञान पर केंद्रित किसी कार्यक्रम में शिरकत करते हुए या किसी उच्च क्षमता के अंतरिक्ष यान के प्रक्षेपण से पहले घंटों किसी मंदिर में पूजा करता है तो यह उसके भीतर बैठी हीनताओं को तुष्ट करता है। इसे उदाहरण बना कर वह कह पाता है कि इसरो जैसे विज्ञान के संगठन के वैज्ञानिक ऐसा करते हैं तो उसका कोई आधार तो होगा ही। जाहिर है, हमारे समाज में विज्ञान की पढ़ाई-लिखाई और उस क्षेत्र में अच्छी-खासी उपलब्धियों में कोई कमी नहीं रही है। लेकिन वैज्ञानिक चेतना या दृष्टि का लगभग अभाव रहा है। चिकित्सा के क्षेत्र में महान खोजों से प्रशिक्षित, मस्तिष्क, तंत्रिका या हृदय की बेहद जटिल शल्य-क्रिया करके किसी मरीज को जीवन देने वाले सक्षम डॉक्टर जब अपनी काबिलियत और कामयाबी का श्रेय वैज्ञानिक खोजों के साथ-साथ अपनी मेहनत और कुशलता को देने के बजाय ‘अज्ञात शक्ति’ या भगवान को देते हैं तो इससे क्या साबित होता है! ऐसा करके या मान कर क्या हम उन तमाम लोगों की क्षमता, सालों की दिन-रात की मेहनत और वैज्ञानिक दृष्टि को खारिज नहीं करते हैं, जिनके जरिए कई बार हमारा जिंदा बच पाना मुमकिन होता है?

यह कोई नया आकलन नहीं है कि मानव समाज के विकास के क्रम में एक दौर ऐसा रहा होगा, जब मनुष्य ने अपनी सीमाओं के चलते मुश्किलों का हल किसी पारलौकिक शक्ति की कृपा में खोजने की कोशिश की होगी। लेकिन आज जब मंगल पर कदम रखने से लेकर ब्रह्मांड की तमाम जटिल गुत्थियों को खोलते हुए दुनिया का विज्ञान हर रोज अपने कदम आगे बढ़ा रहा है तो ऐसे में अलौकिक-पारलौकिक काल्पनिक धारणाओं में जीते समाज और उसके ढांचे को बनाए रखने का क्या मकसद हो सकता है?

विज्ञान और वैज्ञानिक चेतना का द्वंद्व

यहीं आकर एक बिंदु उभरता है जिसके तहत समाज में चंद लोगों या कुछ खास समूहों की सत्ता एक सामाजिक व्यवस्था के रूप में आकार पाती है। यह व्यवस्था अगर शोषण-दमन और भेदभाव पर आधारित हुई तो संभव है कि भविष्य में प्रतिरोध की स्थिति पैदा हो, क्योंकि वैज्ञानिक चेतना से लैस कोई भी व्यक्ति यह समझता है कि दुनिया में मौजूद तमाम अंधविश्वास का सिरा पारलौकिक आस्थाओं से अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है। इसी स्थिति को पैदा होने से रोकने के लिए लौकिक यथार्थों पर पारलौकिक धारणाओं का मुलम्मा चढ़ा दिया जाता है। ऐसी कवायदों का संगठित रूप धर्म के रूप में देखा जा सकता है। हालांकि मानव समाज के लिए धर्म की अलग-अलग व्याख्याएं पेश की जाती रही हैं, लेकिन इसके नतीजे के रूप में सामाजिक सत्ताओं का ‘केंद्रीकरण’ ही देखा गया है। और चूंकि विज्ञान लौकिक यथार्थों पर चढ़े अलौकिक भ्रमों की परतें उधेड़ता है, इसलिए वह स्वाभाविक रूप से धर्म का घोषित-अघोषित दुश्मन हो जाता है।

विडंबना यह है कि ब्रह्मांड और मानव सभ्यता के विकास का आधार होने के बावजूद विज्ञान अब तक दुनिया भर में धर्म के बरक्स एक सत्ता या व्यवस्था के रूप में खुद को खड़ा कर सकने में नाकाम रहा है। जबकि विज्ञान, तकनीकी या प्रौद्यागिकी के सहारे कई देश अपने आर्थिक-राजनीतिक ‘साम्राज्यवाद’ के एजेंडे को कामयाब करते हैं। हालांकि इसकी वजहों की पड़ताल कोई बहुत जटिल काम नहीं है। पहले से ही हमारे सामने अगर ‘राज्य की उत्पत्ति के दैवीय सिद्धांत’ जैसी व्याख्याएं हैं तो ‘विकासवादी सिद्धांत’ भी है। लेकिन आखिर क्या वजह है कि सामाजिक व्यवहार में ‘दैवीय सिद्धांत’ अक्सर हावी दिखता है!

दरअसल, राजनीतिक-सामाजिक सत्ताओं पर कब्जाकरण के बाद इसके विकेंद्रीकरण की प्रक्रिया को रोकने के लिए उन तमाम रास्तों, उपायों को हतोत्साहित-बाधित किया गया, जो पारलौकिकता या दैवीय कल्पनाओं पर आधारित किसी ‘प्रभुवाद’ की व्यवस्था को खंडित करते थे। चार्वाक, गैलीलियो, कोपरनिकस, ब्रूनो से लेकर हाल में नरेंद्र दाभोलकर की हत्या जैसे हजारों उदाहरण होंगे, जिनमें विज्ञान या वैज्ञानिक दृष्टि को बाधित करने के लिए सामाजिक सत्ताओं के रूप में सभी धर्मों में मौजूद ‘ब्राह्मणवाद’ ने बर्बरतम तरीके अपनाए।

दिलचस्प यह है कि विज्ञान का दमन करने वाली ताकतें यह अच्छे से जानती थीं कि विज्ञान की ताकत क्या है। इसलिए एक ओर उन्होंने समाज में वैज्ञानिक नजरिए या चेतना के विस्तार को रोकने के लिए हर संभव क्रूरताएं कीं तो दूसरी ओर धार्मिक और आस्थाओं के अंधविश्वास को मजबूत करने के लिए विज्ञान और तकनीकों का सहारा लिया और उनका भरपूर उपयोग किया। एक समय सोमनाथ के मंदिर में जो मूर्ति बिना किसी सहारे के हवा में लटकी हुई थी और जिसे देख कर लोग चमत्कृत होकर और गहरी आस्था में डूब जाते थे, उसमें चुंबकीय सिद्धांतों की बेहतरीन तकनीक का इस्तेमाल किया गया था। इसे ‘मैग्नेटिक लेविटेशन’ या चुंबकीय उत्तोलन कहते हैं, जिसका अर्थ है चुंबकीय बल के सहारे हवा में तैरना। इसी तरह, किसी सीधे खड़े संगमरमर के पत्थरों से दूध भरे चम्मच का किनारा सटते ही चम्मच में मौजूद दूध का खिंच जाना गुरुत्व के सिद्धांत से संबंधित है और इसकी वैज्ञानिक व्याख्या है। लेकिन इसी का सहारा लेकर तकरीबन दो दशक पहले समूचे देश में गणेश की मूर्तियों को अचानक दूध पिलाया जाने लगा था।

विज्ञान के बरक्स अंधविश्वास का समाज

धार्मिक स्थलों के निर्माण से लेकर जादू-टोना, तंत्र-मंत्र, झाड़फूंक, चमत्कार वगैरह विज्ञान और तकनीक के सहारे ही चलता रहा है। यह बेवजह नहीं है कि मर्सिडीज बेंज या बीएमडब्ल्यू जैसी आधुनिक तकनीकी से लैस कारें चलाने वाले और ऊपर से बहुत आधुनिक दिखने वाले लोग अपनी कार में ‘अपशकुन’ से बचने के लिए नींबू और हरी मिर्च के गुच्छे टांगे दिख जाते हैं। इसी तरह, उच्च तकनीकी के इस्तेमाल से बनने वाली इमारतें बिना भूमि-पूजन के आगे नहीं बढ़तीं। बहुत आधुनिक परिवारों के लोग अपने शानदार और हाइटेक घरों के आगे या कहीं पर एक ‘राक्षस’ के चेहरे जैसी आकृति टांगे दिख जाएंगे, जिसका मकसद मकान को ‘बुरी नजर’ से बचाना होता है! यानी जिन वैज्ञानिक पद्धतियों और तकनीकी का इस्तेमाल अंधविश्वासों को दूर कर समाज को गतिमान बनाने या आगे ले जाने के लिए होना था, वे समाज को जड़ और कई बार प्रतिगामी बनाने के काम में लाई जाती रही हैं।

इसकी वजह यह है कि विज्ञान अपने आप में दृष्टि है, लेकिन वैज्ञानिक सिद्धांत, संसाधन या तकनीक एक ‘उत्पाद’ की तरह है, जिसका इस्तेमाल कोई भी कर सकता है- विज्ञान का दुश्मन भी। बहुत ज्यादा पीछे जाने की जरूरत नहीं है। मौजूदा दौर में ही इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और अखबार के अलावा फेसबुक, ट्विटर, व्हाट्स ऐप जैसे सोशल मीडिया के मंचों और मोबाइल जैसे संचार के साधनों के दौर को हम विज्ञान और तकनीक के चरम विकास का दौर कह सकते हैं। लेकिन हम देख सकते हैं कि इन संसाधनों पर किस तरह वैसे लोगों या समूहों का कब्जा या ज्यादा प्रभाव है जो विज्ञान और तकनीकी का इस्तेमाल वैज्ञानिक चेतना या दृष्टि को कुंद या बाधित करने में कर रहे हैं।

आधुनिकी उन्नत तकनीकों के इस्तेमाल से बनाई गई अंधविश्वास फैलाने वाली फिल्में या धारावाहिक पहले से चारों तरफ से अंधे विश्वासों में मरते-जीते आम दर्शक की जड़ चेतना को ही और मजबूत करते हैं। टीवी चैनलों पर धड़ल्ले से अंधविश्वासों को बढ़ाने या मजबूत करने वाले कार्यक्रम ‘धारावाहिक’ के तौर पर चलते ही रहते हैं, कई बार ‘समाचार’ के रूप में भी दिखाए जाते हैं। यह ‘बाबाओं’ और ‘साध्वियों’ के प्रवचनों और विशेष कार्यक्रमों से लेकर फिल्मों के हीरो-हीरोइनों या मशहूर हस्तियों के जरिए ‘धनवर्षा यंत्र’ या ‘हनुमान यंत्र’ आदि के प्रचारों के अलावा होता है। अखबार इसमें पीछे नहीं हैं। इससे टीवी चैनलों मीडिया संस्थानों को कमाई होती है, मुनाफा होता है, लेकिन समाज को कितना नुकसान होता है, इससे उन्हें कोई मतलब नहीं होता! इसके अलावा, फेसबुक जैसे सोशल मीडिया का मोबाइल पर व्हाट्स ऐप जैसे संवाद-साधनों के जरिए किस तरह सांप्रदायिकता का जहर परोसा जा रहा है, यहां तक कि दंगा भड़काने में भी इनका इस्तेमाल किस पैमाने पर किया जा रहा है, यह जगजाहिर तथ्य है।

यानी विज्ञान के जरिए की वैज्ञानिक दृष्टि या चेतना को कैसे कुंद किया जा रहा है और विज्ञान का सहारा लेकर समाज को किस तरह अंधविश्वासों के अंधेरे में झोका जा रहा है, यह साफ दिखता है। दरअसल, किसी भी धर्म के सत्ताधारी तबकों की असली ताकत आम समाज का यही खोखलापन होता है कि वह विज्ञान के सहारे अपने जीवन की सुविधाएं तो सुनिश्चित करे, लेकिन उसे किसी ‘अज्ञात शक्ति’ की कृपा माने। पारलौकिक भ्रम की गिरफ्त में ईश्वर और दूसरे अंधविश्वासों की दुनिया में भटकते हुए लोग ही आखिरकार बाबाओं-गुरुओं, तांत्रिकों, चमत्कारी फकीरों जैसे ठगों के फेर में पड़ते हैं और अपना बचा-खुचा विवेक गवां बैठते है। यह केवल समाज के आम और भोले-भाले लोगों की बंददिमागी नहीं है, बौद्धिकों, बड़े-बड़े नेताओं, मुख्यमंत्रियों, प्रधानमंत्रियों और राष्ट्रपतियों तक को फर्जी और कथित चमत्कारी बाबाओं के चरणों में सिर नवाने में कोई हिचक नहीं होती।

दलील दी जाती है कि आस्था निजी प्रश्न है। लेकिन विज्ञान की कामयाबियों के साथ आस्था का घालमेल आखिरकार वैज्ञानिक चेतना को भ्रमित करता है। और यही वजह है कि गहन और जटिल ऑपरेशन हो या भूकम्प और बाढ़ जैसी आपदाएं, इनकी वजहें जानने, उसका विश्लेषण करने के बावजूद व्यक्ति या खुद इसके विशेषज्ञ इन सबको किसी भगवान का चमत्कार, कृपा या फिर कोप के रूप में देखते-पेश करते हैं। यह अपने ज्ञान-विज्ञान और खुद पर भरोसा नहीं होने-करने का, अपनी ही क्षमताओं को खारिज करने का उदाहरण है। क्षमताओं के नकार की यह स्थिति किसी विनम्रताबोध का नहीं, बल्कि भ्रम और हीनताबोध का नतीजा होती है। और जब हम विज्ञान के विद्याथियों या वैज्ञानिकों तक को इस तरह के द्वंद्व और भ्रम में जीते देखते हैं तो ऐसे में साधारण इंसान या समाज से क्या उम्मीद हो, जो जन्म से लेकर मौत तक वैज्ञानिक चेतना से बहुत दूर दुनिया के धर्मतंत्र और अलौकिक-पारलौकिक आस्थाओं के चाल में उलझा रह जाता है।

जाहिर है, असली चुनौती यह है कि विज्ञान केवल लोगों के जीवन को सहज नहीं बनाए, बल्कि दुनिया के यथार्थ को समझने के लिए समाज को वैज्ञानिक चेतना से भी लैस करे। यह समाज के ज्यादातर हिस्से को सोचने-समझने के तरीके या माइंडसेट पर कब्जा जमाए पारलौकिक आस्थाओं के बरक्स एक बहुत बड़ी चुनौती है। अगर यह कहा जाए कि जिस पैमाने पर समाज धार्मिकता के जंजाल में उलझा है, अगर उसी पैमाने पर वैज्ञानिक चेतना होती तो हमारा समाज शायद अभी से कई हजार साल आगे होता, तो शायद अतिश्योक्ति नहीं होगी।


Saturday 21 June 2014

ध्रुवीकरण की राजनीति में गुम अस्मिताएं






नरेंद्र मोदी के देश के प्रधानमंत्री के रूप शपथ-ग्रहण के बाद अब शायद यह कहना अप्रासंगिक होगा कि खुद भाजपा को भी इतनी सशक्त जीत की उम्मीद नहीं थी। इसके बावजूद अगर भाजपा ने चुनावों से पहले से ही खुद को एक तरह से जीते हुए पक्ष के रूप में पेश करना शुरू कर दिया था तो इसकी क्या वजहें रही होंगी, सोचने का मसला यह है। सवाल है कि आखिर भाजपा किस भरोसे यह दावा कर रही थी। क्या वह इस बात को लेकर आश्वस्त थी कि सियासी शतरंज पर उसने जो बिसात बिछाई है, उसमें नतीजे उम्मीद के हिसाब से ही आएंगे? वह बिसात बिछाते हुए आरएसएस या भाजपा ने किन-किन चुनौतियों को ध्यान में रखा और उसके बरक्स कौन-से मोर्चे मजबूत किए? उसके सामने चुनौतियों की शक्ल में जितनी भी राजनीतिक ताकतें थीं, उनके लिए यह अंदाजा लगाना क्या इतना मुश्किल था कि वे आरएसएस की चालों को भांप तक नहीं पाए? आम अवाम के पैमाने पर क्या ऐसा किया गया कि अब तक भाजपा के लिए चुनौती रहा एक साधारण वोटर एक खास तरह के "हिप्नोटिज्म" की जद में आकर भाजपा के पाले में जा खड़ा हुआ? क्यों ऐसा हुआ कि यह सब विकास लगभग बिना किसी सवाल या रोकटोक के अपने अंजाम तक पहुंचा?

इसी जगह पर जवाब की तरह यह सवाल सामने आता है कि भारत जैसे देश में सामाजिक विकास फिलहाल जिस पायदान पर है, उसमें उसे अपने पक्ष में खड़ा करने के लिए आखिर कौन-कौन से रास्ते अख्तियार किए जाने चाहिए? इस सवाल से अब तक सबसे बेहतर तरीके से कांग्रेस निपटती आई है। अब शायद यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि आज भाजपा जिस बुनियाद पर अपना महल खड़ा कर सकी है, वह बुनियादी तौर पर कांग्रेस की ही तैयार की हुई है। क्या वजह है कि आजादी के बाद लगभग पूरे समय सत्ता में रहते हुए भी उसने आम जनता की समझदारी को मूल्यांकन या विश्लेषण आधारित बनाने की अपनी जिम्मेदारी की आपराधिक स्तर की न केवल अनदेखी की, बल्कि संवैधानिक तकाजों को भी ताक पर रखते हुए उसने यथास्थितिवाद की जमीन को और मजबूत ही किया? यह यथास्थितिवाद आखिर किस खास व्यवस्था के लिए खाद-पानी का काम कर सकता है, करता रहा है? यह समझने के लिए कोई बहुत ज्यादा मंथन करने की जरूरत शायद नहीं है कि कांग्रेस ने जिस खेल की जमीन तैयार की थी, उसमें भाजपा एक ज्यादा ताकतवर खिलाड़ी के रूप में इस बार सामने आई है। और पता नहीं, यह रिवायत किन हालात में शुरू हुई होगी कि अकेले भारत में नहीं, शायद समूची दुनिया की आम जनता आखिर विजेता के पक्ष में खड़ी होती है, बिना इस बात पर विचार किए कि युद्ध में किसने किसी को पराजित करने के लिए कौन-सा तरीका आजमाया।

अपने पिछले दो शासनकाल में कांग्रेस ने जिस घनघोर स्तर पर सबसे जरूरतमंद वर्गों की उपेक्षा की, उन्हीं आस्थाओं का नरम कारोबार किया, जिस पर भाजपा एक स्पष्ट चेहरे के साथ लोगों के सामने थी, वैसी हालत में अभाव में मरते-जीते लोगों को उनके ‘मूल’ और उनकी ‘परंपरागत’ भावनाओं और सपनों का पोषण करके बड़ी आसानी से अपने पक्ष में किया जा सकता था। यों सपनों को जमीन पर उतारना और जीवन की भूख का हल करना इस देश की किसी भी राजनीतिक पार्टी की जवाबदेहियों-जिम्मेदारियों में शामिल नहीं रहा है। पिछली बार मजबूरी में वामपंथी दलों के सहयोग के चलते उसने जनता के सामने अपने सरोकार की सरकार का दावा किया भी था, लेकिन इस बार सच यही रहा कि कुल मिला कर अपने बीते एक दशक के रिकार्ड के हिसाब से कांग्रेस जनता के सामने यह पांसा भी फेंक सकने की हालत में नहीं थी। दूसरी ओर, उसकी मुख्य प्रतिद्वंद्वी के रूप में भाजपा के पास ‘जड़ों' की खुराक भी थी और अभाव में पलते समाज के सामने ‘विकास’ के मिथकों से लैस सपने भी थे। इससे भी ज्यादा महत्त्वपूर्ण यह कि इन दोनों हथियारों के बेहतर इस्तेमाल के लिए उसके पास एक सुचिंतित तंत्र भी था जो एक ओर आरएसएस के स्वयंसेवकों के रूप में तमाम परंपरागत अवधारणाओं के औजार से लोगों के ‘मूल’ को ‘जगा’ रहा था, तो दूसरी ओर अपने कार्यकर्ताओं से लेकर मीडिया के रूप में उसे हर स्तर पर बने-बनाए कार्यकर्ता मिल गए थे, जो दिन-रात उसकी खेत की सिंचाई कर रहे थे। नतीजा सामने है।

सवाल है कि भाजपा के बरक्स जितनी भी राजनीतिक ताकतें थीं, क्या उन्हें इस बात का अंदाजा नहीं था कि उनका समर्थक वर्ग जिस समाज का हिस्सा है, पिछले दो-ढाई दशकों के दौरान सचेत तौर पर उसकी चेतना में किन-किन तरीकों से किस तरह की व्यवस्था घोल दी गई है? वह व्यवस्था ज्यादातर लोगों के लिए एक नियति की तरह है, जिस पर वे सोचना नहीं चाहते। किसी भी राजनीतिक पार्टी ने शहरों से लेकर दूरदराज के इलाकों तक में छोटे-बड़े जागरण टाइप के उन धार्मिक आयोजनों या पूजा-पाठ की सार्वजनिक गतिविधियों पर गौर करना जरूरी नहीं समझा, जिसके जरिए समाज के हिंदू मानस को तुष्ट किया गया, उसके राजनीतिक दायरे को लगातार छोटा करके एक केंद्र में समेटने की कोशिश की गई, सांप्रदायीकरण किया गया और इस तरह आखिरकार ध्रुवीकरण की राजनीति की जमीन तैयार हुई। यह ध्रुवीकरण बहुत छोटी-छोटी बातों से सक्रिय की जा सकती थी। सामाजिक चेतना के बरक्स धार्मिक चेतना को खड़ा करके उस पर हावी करने के लिए आस्था को बतौर हथियार इस्तेमाल किया गया और उसका सबसे आसाना जरिया रहा नरेंद्र मोदी के रूप में एक प्रतीक को उसी "तैयार की गई" जनता के सामने खड़ा कर देना। ये नरेंद्र मोदी "गुजरात-2002" की छवि वाले मोदी थे, जो एक आम हिंदू मानस को सहलाता है। इसमें आरएसएस पूरी तरह कामयाब रहा।

धर्मनिरपेक्ष और सामाजिक न्याय की राजनीति करने वालों के सामने इस जटिल चुनौती से निपटने का क्या कोई रास्ता नहीं था? जब अपने ही राजनीतिक आदर्शों को ताक पर रख दिया जाता है तब ऐसे हालात का सामना एक स्वाभाविक परिणति होती थी।

मैदान में खड़ा होकर सामने करने का एकमात्र रास्ता था कि शासक अस्मिताओं के बरक्स शासित अस्मिताओं को सीधे संबोधित किया जाए। इसके कामयाब प्रयोग का उदाहरण बहुत पुराना नहीं है। करीब ढाई दशक पहले जब मंडल आयोग की रिपोर्ट पर अमल की घोषणा हुई तो उसके बाद यह हुआ भी। तभी पहली बार यह लगा कि एक सहज-सी दिखने वाली व्यवस्था के जरिए जिस यथास्थितिवाद का पालन-पोषण होता आ रहा था, उसकी परतों के नीचे कितने विद्रूप पल रहे हैं।

उसी दौर में मंडल आंदोलन ने शासित सामाजिक वर्गों की अस्मिता की लड़ाई के जरिए एक ऐसे नेतृत्व वर्ग की शृंखला खड़ी की, जो पहले से चली आ रही शासन और समाज व्यवस्था के ढांचे में सीधे-सीधे तोड़-फोड़ थी। इसका अहसास उसी समय सत्ताधारी तबकों को हो गया था और प्रतिक्रिया भी बहुत तीखी शक्ल में सामने आई थी, लेकिन वह बाद में बहुत सोच-समझ कर किसी दीर्घकालिक योजना का हिस्सा साबित हुई। तब मेरिट की शक्ल में आसानी से "पॉपुलर" होने वाले जुमलों से लैस सवाल उछाले गए, आरक्षण के खिलाफ आत्मदाही ‘आंदोलन’ या दूसरे प्रतिगामी प्रचारों से जब काम नहीं चलता लगा तब लालकृष्ण आडवाणी की ‘रथयात्रा’ चल पड़ी, जिसने शासित अस्मिताओं के उभार को रोकने और आखिरकार इस चुनाव में अपने हिंदू अस्मिता में समाहित कर लेने में कामयाबी हासिल कर ली। आरएसएस और भाजपा को इस "प्रोजेक्ट" को ताजा निष्कर्ष तक लाने में महज सवा दो या ढाई दशक का वक्त लगा।

जिन अस्मिताओं से हिंदुत्व के मूल ढांचे को नुकसान हो सकता था, उनके बीच से कुछ हिम्मती चेहरे सामने तो आए, लेकिन एक ओर सत्ता और तंत्र के बीच फर्क समझ सकने में नाकामी और अदूरदर्शिता के साथ-साथ दूसरी ओर इनके बीच से ही कुछ स्वार्थी, महत्त्वाकांक्षी और अवसरवादी तत्त्वों ने सत्ता में पहुंचने के लिए उस समूचे आंदोलन का बेड़ा गर्क करने में अपनी पूरी भूमिका निबाही। अस्मिता के संघर्ष का मकसद जहां इसके जरिए ऐतिहासिक रूप से छीने गए अधिकारों को हासिल करके भेदभाव पर आधारित एक व्यापक पहचान, यानी हिंदुत्व के ढांचे को तोड़ना था, वहां अस्मिता ही राजनीति का एक हथियार बन गया।  ऐसी स्थिति में जो होना था, वही हुआ। संघर्ष मुक्ति के लिए होना था, लेकिन उसने अपने लिए ऐसे दायरे पैदा किए, जिसके भीतर ही उसे गोल-गोल घूमना था। जबकि मकसद उसी दायरे को तोड़ कर आगे का रास्ता अख्तियार करना होना चाहिए था। क्या इस दायरे की दीवार इतनी मजबूत है कि उससे पार न पाया जा सके? यह शायद आखिरी सच नहीं है। लेकिन किसी दबाव से उपजे संघर्ष की दिशा कई बार भ्रम का शिकार हो जाती है। जबकि यही संघर्ष अगर किसी सुचिंतित योजना का हिस्सा हो तो नई व्यवस्था की जमीन तैयार कर सकता है।

जाति की अस्मिता धर्म की व्यापक अस्मिता के दायरे के भीतर की चीज थी। इसलिए जब अधिकारों के लिए खड़ी हुई अस्मिताएं संघर्ष का रास्ता छोड़ कर वैचारिक रूप से भी जातिगत दायरे में सिमटने लगीं तो ऐसे में उस पर उसकी व्यापक अस्मिता का हावी होना लाजिमी था। हिंदुत्व की व्यवस्था चलाने वाले एक सक्षम समूह के रूप में आरएसएस को यह बहुत अच्छे से मालूम है कि अगर उसकी व्यवस्था के मूल ढांचे को खतरा हो तो उसे समान हथियार से ही वापस मोड़ा जा सकता है। तो जिस तरह सामाजिक वंचना के नतीजे में छीने गए अधिकारों को हासिल करने के लिए जाति की अस्मिता आंदोलन की शक्ल में खड़ी हुई, उसी जाति को मंडल आयोग की सिफारिशें लागू होने के बाद आरक्षण विरोधी आंदोलन के साए में आरएसएस ने उसकी व्यापक अस्मिता, यानी हिंदुत्व में समाहित करने के लिए रथयात्रा से अपना अभियान शुरू किया और फिर गुजरात जनसंहार से लेकर हिंदू-मुसलिम तनाव को एक मुद्दे के रूप में जिंदा रखने की कामयाब कोशिश की।

लेकिन यह अगर आरएसएस की राजनीति का प्रत्यक्ष और हावी पहलू रहता तो देश से लेकर दुनिया भर में यह साबित करना मुश्किल होता कि उनकी यह राजनीति ‘प्रतिगामी’ नहीं है। इसलिए गुजरात जनसंहार के बाद कट्टर हिंदुत्व के नायक के चेहरे के रूप में उभरे नरेंद्र मोदी नेतृत्व में ही विकास के ‘गुजरात मॉडल’ का मिथक खड़ा किया गया, ठीक उसी तरह जिस तरह धर्म और पारलौकिक मिथकों के सहारे सामाजिक सत्ताएं अपना शासन बनाए रखती हैं, शासित तबकों के सोचने-समझने, विश्लेषण करने के दरवाजों को बंद रखती हैं।

इन सबको जमीनी स्तर पर पहुंचाने के लिए जहां आरएसएस के पास अपने स्वयंसेवक थे, वहीं इस सामाजिक सत्ता-तंत्र में पहले से ही एक ‘इम्यून सिस्टम’ की तरह काम करने वाले वाचाल तंत्र को सिर्फ शह की जरूरत थी। इसके अलावा, आज दूरदराज के इलाकों तक अपनी मजबूत पहुंच और दखल बना चुके मीडिया ने अपने सामाजिक ढांचे और कारोबारी क्षमता का अपूर्व प्रदर्शन करते हुए आरएसएस की तमाम परोक्ष कवायदों को स्थापना दी। मूल तत्त्व हिंदुत्व की व्यापक अस्मिता में जातीय अस्मिताओं को समाहित करना था, लेकिन उस पर विकास के ‘गुजरात मॉडल’ की चमकीली चादर टांग दी गई। यानी ‘प्रतिगामी’ होने के तमाम आरोप अब ‘अग्रगामी’ संदेशों में तब्दील हो गए। इसके बाद इस ढांचे से लड़ने की चुनौती इस रूप में खड़ी हुई कि अस्मिता के संघर्ष को राजनीति में झोंकने वालों की जमीन खिसक गई और उस पर हिंदुत्व की अस्मिता का महल खड़ा हो गया।

इसलिए कम से कम यह न कहा जाए कि लोकसभा चुनावों में भाजपा की जीत ने साबित किया है कि जाति की राजनीति खत्म हो गई। जाति या अस्मिता की राजनीति खत्म नहीं हुई। बल्कि वह ज्यादा बड़ी अस्मिता में विलीन हुई है और उसमें घुल-मिल जाने के बाद जो अस्मिता की राजनीति मुखर होगी, वह ज्यादा खतरनाक साबित होगी, जिसकी गाज आखिरकार वंचित और कमजोर जातियों पर ही गिरनी है। इस वंचना की सबसे बड़ी त्रासदी की तुलना पारलौकिक अंधविश्वासों में डूबी उस गुलाम चेतना से लैस समाज के अंत से की जा सकती है जिसमें कोई व्यक्ति कुछ मनचाहे की कामना पूरी होने के लालच में किसी पत्थर की मूर्ति के सामने हाथ जोड़ने के बाद अपने ही हाथों से अपनी गर्दन काट लेता है।

बहरहाल, भारतीय राजनीति में भारतीय जनता पार्टी के एक सक्षम सत्ताधारी ताकत के तौर पर उभरने के बाद अब इसके पीछे कॉरपोरेट, पूंजी-जगत, सत्ता-तंत्र, हजारों करोड़ रुपए खर्च कर तैयार की गई चुनावी ‘परियोजना’ के सूत्रधारों की खोज और व्याख्या की जाएगी और की जानी चाहिए। लेकिन भारत जैसे देश में आग्रहों-पूर्वाग्रहों-दुराग्रहों, भक्ति, व्यक्ति पूजा, प्रचार, अफवाहों पर मारने-मरने पर उतर जाने वाले समाज में एक अर्धविकसित मतदाता अगर दक्षिणपंथ के लिए अपना हाथ उठाता है तो यह किसी भी विकासमान समाज की नाकामी है। वह मतदाता विकास नहीं समझता। उसे विकास का ‘गुजरात मॉडल’ समझाया जाता है, जो दरअसल एक नफरत की एक अनदेखी बुनियाद पर खड़ा होता है। लेकिन उस अनदेखी बुनियाद पर परदा उतारने का जिम्मा आखिर किसका है?

अब चुनौती उन ताकतों के सामने है जो हिंदुत्व की मौजूदा धारा के खिलाफ एक तरह से व्यवस्था विरोधी प्रतीक के रूप में खड़े हुए थे, लेकिन बाद में उन्होंने भी नरम कार्ड खेलना शुरू किया था। बिना इस सच को समझे कि उनकी मूल ताकत और चुनौती क्या है और कौन है...! नब्बे के दशक में राजनीति की एक वैकल्पिक जमीन तैयार करने के साथ-साथ विचारधारा के स्तर पर व्यवस्था-विरोधी प्रतीक के रूप में देखे जाने वाले राजनीतिक समूहों के सामने अब खुद को बचाए रखने का सवाल सबसे अहम है। अगर वे पहचान सकें कि इस प्रतीक के रूप में उन पर कहीं व्यवस्था के एजेंट तो हावी नहीं है और उन्हें दूर करना उनका सबसे पहला मकसद होना चाहिए, तो शायद बचने-बढ़ने और एक विकल्प की उम्मीद को जमीन पर उतारा जा सकता है...!

Thursday 27 February 2014

इंसानी सभ्यता पर कलंक वह "शासकीय कत्लेआम"...



27 फरवरी 2002 को हुए गोधरा कांड के परदे में जिस गुजरात कत्लेआम की शुरुआत हुई थी, समूची इंसानी सभ्यता के उस ऐतिहासिक कलंक को दफ़न करने की मंशा से इस तारीख पर अब धुंधली परतें चढ़ाने की कोशिश की जा रही हैं। लेकिन क्या वह सचमुच भूल सकने वाली कोई त्रासद साजिश थी? क्या उसे भूला जाना चाहिए? गुजरात कत्लेआम की पृष्ठभूमि पर लिखी यह कहानी "मास्टर साहब की डायरी" बड़ी जद्दोजहद से किसी तरह "पाखी" में छप सकी थी। इससे पहले "कथादेश" जैसी एकाध पत्रिकाओं में घोषणा के कई महीने के बाद भी नहीं छप सकी थी। कुछ जगहों पर इसमें संपादक ने अपने हिसाब से फेरबदल करने की सलाह दी थी। हमने यह सलाह ख़ारिज़ कर दी। लेकिन प्रेम भारद्वाज ने इसे अपनी शक्ल में छापा था। आज उस कत्लेआम की शर्म पर परदा डालने की कोशिश के बीच उसकी याद बनाए रखने के मकसद से इस कहानी को आप सबके साथ फिर से साझा कर रहा हूं। हां, मैं चाहता हूं कि इंसानियत के लिए शर्मिंदगी और सभ्यता पर कलंक उस "शासकीय" कत्लेआम को याद रखा जाए, तब तक, जब तक हम एक ऐसी जमीन नहीं रच लेते, जहां मजहब या जात का कोई नामलेवा नहीं बचे... जब तक धर्म और जात के नाम पर खूनी दुकानदारी करने वालों की नस्ल जिंदा है! यह ख़्वाब अगर महज ख़्वाब है तो क्या हमें अपनी उम्मीद का कत्ल कर देना चाहिए? नहीं...! हम उम्मीद करेंगे... अपनी जान रहने तक... हम उम्मीद करेंगे... दुनिया के कायम रहने तक... अपने तईं तब तक जान भी देते रहेंगे... जब तक उनकी खून के स्वाद से लिथड़ी जुबान जहर उगलती रहेगी... 


मास्टर साहब की डायरी

अरविंद शेष

राजकीय आदर्श विद्यालय फतेहपुर में तबादले के बाद पिछले तीन महीने में अख़्तर साहब ने कई समझौते किए थे। मसलन, कुर्ता और चौड़े घेरे का पायजामा पहनना छोड़ कर पैंट-शर्ट पहन लगे थे। सिर पर की टोपी हटा ली थी, लंबी दाढ़ी को छोटा करवा लिया था और स्कूल के सभी मास्टर साहबों के साथ-साथ नई भर्ती से आए मास्टर संतलाल को भी दोनों हाथ प्रणाम की मुद्रा में जोड़ कर मिलते ही 'नमस्कार संतलाल जी' कह कर- 'कैसे हैं' कहना नहीं भूलते थे। उन्होंने अब दाहिने हाथ का अंगूठा तलहथियों से लगा कर 'आदाब' या 'अस्सलाम-वालेक़ुम' करना छोड़ दिया था। हालांकि संतलाल को उनकी किसी बात से कभी कोई परेशानी नहीं हुई थी, लेकिन मुश्किल यह थी कि स्कूल संतलाल की सुविधा-असुविधा के हिसाब से नहीं चलता था और अख़्तर  साहब को संतलाल जी की नहीं, बल्कि बाकी चारों शिक्षकों रामाधार शर्मा, महेश तिवारी, हेडमास्टर प्रेमशंकर झा और हरेंद्रगुप्ता की सुविधा-असुविधा का खयाल जरा ज्यादा करना पड़ता था। स्कूल में गणित शिक्षक के रूप में आने के आठ-दस दिन बाद से ही आपसी बैठकी में अख़्तर  साहब पर छोटी-छोटी टिप्पणियां शुरू हो गई थीं, जैसे- 'आप भी अख़्तर  साहब महान हैं। महाराज रहते हैं हिंदुस्तान में और दिखाई देते हैं पाकिस्तानी जैसा।' 'हाथ जोड़ के नमस्कार करने में अपमान बुझाता है क्या अख़्तर  साहब!' -ये टिप्पणियां हंसते हुए की जातीं, लेकिन अख़्तर  साहब लगभग पचास के हो चले थे, सो बातों के छिपे भावों को ताड़ लेते थे और धीरे-धीरे उन्होंने समझौते करने शुरू कर दिए थे।

पिछली फरवरी से स्कूल में 'हिंदुस्तान' की जगह 'दैनिक जागरण' अखबार आने लगा और इस बदलाव के परिणाम उनके चेहरे पर पढ़े जाने लगे तब भी अख़्तर  साहब को कोई खास परेशानी नहीं हुई। लेकिन अट्ठाईस फरवरी को स्कूल पहुंचते ही 'शो काउज़' की तरह जब अखबार उनके सामने पटका गया तो वे प्रेमशंकर झा का मुंह ताकने लगे।

'मुंह क्या ताकते हैं? देखिए, साठ गो कारसेवक को ... मियां सब जला के राख कर दिया।' अखबार की ओर उंगलियां दिखा कर गंदी गाली देते हुए प्रेमशंकर झा ने कहा।

'ये जिसने भी किया है, बहुत गलत किया है।' अख़्तर  साहब बोले।

'अरे जिसने क्या! गोधरा में और रहता कौन है? सब मुसलमाने सब मिल के सबको जिंदा जला दिया महाराज! औरत आ बच्चो को नहीं छोड़ा। एतना क्रूर होता है सब। बाप रे!' रामाधार शर्मा भी कुढ़ते हुए बोले।

'हम भी वही कह रहे हैं। जिसने भी ये हरकत की है, अल्लाह उसे माफ नहीं करेगा।' अख़्तर  साहब ने वहां से हटना चाहा।

'जाइए महाराज! अबहियो जिसने पर अटके हुए हैं।' प्रेमशंकर झा ने कहा और एक छात्र को बुला कर क्लास लगने की घंटी बजा देने को कहा।

और एक मार्च को अखबार वाला बिल दे गया। पता नहीं स्कूल में सरकार अखबार के लिए अलग से पैसे देती है या नहीं, स्कूल में सभी मास्टर साहब सत्रह-सत्रह रुपए मिला कर अखबार मंगाते थे। दो मार्च को अखबार का बिल चुका दिया गया। अख़्तर  साहब से बिना पैसे लिए। सिहरते हुए उन्होंने जब महेश तिवारी से इस बारे में पूछा तो जवाब मिला, 'बिल चुका दिया गया है। आपको देने की जरूरत नहीं है।'?

यही बात अख़्तर  साहब को अखर गई। उन्हें लगा कि जैसे गोधरा में ट्रेन उन्होंने ही जला दिया और उसी की सजा उन्हें मिल रही है।

संतलाल जी थोड़ा खुल कर अख़्तर  साहब से बात करते थे। इस पर उन्हें भी थोड़ा आश्चर्य हुआ, क्योंकि उन्हें भी सिर्फ सत्रह रुपए लगे थे। यानी बाकी के पैसे उन लोगों ने आपस में बांट कर अदा किए। कायदे से अख़्तर  साहब को पैसे नहीं लगने का मतलब संतलाल के पैसों में बढ़ोतरी होनी थी।

लेकिन चार-पांच मार्च से अखबार के रुख की तरह प्रेमशंकर झा, शर्मा जी और तिवारी जी का रुख भी बदलने लगा। हरेंद्र गुप्ता अब अपनी ओर से अख़्तर  साहब को प्रणाम करने लगे और झा जी क्लास लगने से पहले अखबार पढ़ने-पढ़ाने काम उत्साहपूर्वक करते। अख़्तर  साहब को भी प्रथम पृष्ठ की खबरें दिखाई जातीं। जाहिर है, अखबार गुजरात के दंगों से पटे पड़े होते थे। एक बार प्रेमशंकर झा और एक बार महेश तिवारी अख़्तर  साहब को कह चुके थे- 'आपने ठीक कहा था अख़्तर  साहब, अल्लाह माफ नहीं करेगा।'

अख़्तर  साहब सब कुछ समझते। लेकिन खुद को बच्चों में झोंके रहते। बावजूद इसके उनके दिमाग में सीतामढ़ी दंगे का दृश्य बार-बार घूम जाता और वे गुजरात की कल्पना कर दिन--ब-दिन और ज्यादा सिहरते जा रहे थे।

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तब वे सीतामढ़ी मध्य विद्यालय में पदस्थापित थे। उस साल मोहर्रम उन्होंने वहीं बिताया था। अंसारी टोले का ताजिए का जुलूस खैरका रैन पर तीन घंटे में चल कर पहुंचता था। दूसरे कई ताजिए उस रैन पर पहुंचते थे। अंसारी टोले के उस्मान और उसका पड़ोसी रामबदन राय जब लाठी से भिड़ते तो दो घंटे में भी फैसला नहीं हो पाता था। मुकाबला हमेशा बराबर रहा। इस मुकाबले को देखने वालों की भीड़ हिंदू ज्यादा होते थे कि मुसलमान- कहना मुश्किल था। उसी साल दशहरे में दुर्गा की प्रतिमा के विसर्जन जुलूस में भी कितने हिंदू थे और कितने मुसलमान, कोई नहीं कह सकता था।

...और कोई नहीं कह सकता था कि किसने पत्थर फेंका और किसने दुर्गा की प्रतिमा का सिर काट दिया। लेकिन इसके बाद कितने लोगों के सिर कटे- यह भी कोई नहीं कह सकता था।

अख़्तर  साहब दशमी को अपने घर मोतिहारी के मुरैना से सीतामढ़ी के गणेशपुरा में अपनी बहन के घर आ गए थे कि परसों से स्कूल खुलेगा। लेकिन स्कूल क्या खुलेगा, दंगा शहर और आसपास के इलाकों में बुरी तरह फैल चुका था। रात साढ़े ग्यारह बजे गणेशपुरा में भी चीख-पुकार मची। अख़्तर  साहब की बहन का घर उत्तर की तरफ था। दंगाई दक्षिण से आए थे। बहन और तीनों बच्चों को लेकर अख़्तर  साहब और उत्तर की ओर भागे। बहनोई लंबा चाकू लेकर चीख-पुकार की दिशा में भागा, फिर कभी नहीं लौटा। उत्तर की ओर भागते हुए रास्ते में गांव से बाहर लखना डोम का घर था। उसके थोड़ी दूर के बाद गणेशपुरा का एक और मुस्लिम टोला था। पहले लखना को देख कर अख़्तर  साहब डरे, लेकिन लखना ने अपने घर का दरवाजा खोल दिया। एक पल उन्होंने लखना को देखा, फिर बच्चों औऱ बहन को लेकर लखना के घर में घुस गए। घर में पहले से आठ और लोग छिपे थे। लखना ने घर का दरवाजा बाहर से लगा दिया और बरामदे पर बिछे बिछावन पर लेट गया।

गणेशपुरा को आग में झोंकने के बाद दंगाइयों की भीड़ जब इसी ओर बढ़ने लगी तो दरवाजे की झिर्रियों से झांकते अख़्तर  साहब का खून सूखने लगा। भीड़ लखना के घर के सामने थी। अंधेरे में किसको पहचानें। लखना जन्म से ही गांव में था। वह भी किसी को नहीं पहचान रहा था। लेकिन उसने जयराम शर्मा को जरूर पहचाना। जयराम शर्मा ने यही सोचा कि भागने वाला टोले की ओर भागा होगा। इस डोम के घर में कौन घुसेगा! भीड़ में से किसी ने पूछा कि किधर भागा है सब? लखना ने बेसाख्ता पूरब की ओर उंगली बता दिया। लेकिन भीड़ जयराम शर्मा के इशारे पर उत्तर की ओर मुस्लिम टोले की तरफ बढ़ गई। पांच मिनट में ही वहां से भी चीख-पुकार की आवाज और धधकती हुई आग नजर आने लगी।

आधे घंटे में भीड़ लौटी। भीड़ को चुपचाप अपना काम करना था, वह चुपचाप अपना काम करके जा रही थी। लखना के घरके सामने से जब भीड़ गुजर गई तो पीछे से जयराम शर्मा लखना के पास आया। सौ-सौ के पांच नोट लखना के हाथ में देते हुए चुप रहने की हिदायत दी। लखना ने हसरत भरी निगाहों से नोटों की ओर देखा और 'हां'? में सिर हिलाया। आश्वस्त होकर जयराम शर्मा आगे बढ़ा कि पीछे से कत्ते का भारी वार गर्दन पर पड़ा। मुंह से आवाज भी निकली।

भीड़ गुजर चुकी थी। किसी का ध्यान भी नहीं गया। या गया भी होगा, तो भीड़ को अब जयराम शर्मा की जरूरत नहीं थी।

उधर गांव से ट्रकों से खुलने और जाने की आवाज आई। जिन ट्रकों में भीड़ आई थी, उसी में चली गई। बाद में घायल और बचे हुए लोगों ने भी पुलिस को बताया कि हमारे पड़ोसियों ने हमें नहीं मारा। हथियारों से लैस लोग बाहर से ट्रकों में भर कर आए थे। उस भीड़ में जयराम शर्मा को छोड़ कोई भी गांव का आदमी नहीं था। उसी की लाश अब लखना के घर के सामने थी। जयराम शर्मा की लाश की तरह सब कुछ शांत पड़ चुका था। लेकिन गणेशपुरा गांव और टोले- दोनों तरफ से रोने-पीटने और कराहने की आवाजें लगातार आ रही थीं।

लखना ने घर का दरवाजा खोला और कहा, 'सब चला गया। आप सभे गोरा रात में नहीं जाइए। जयराम शर्मा के साफ कर दिए। ऊहे सार सब करवाया। हम ओकर लाश के गांव में फेंक के आते हैं। एहे में खप जाएगा। सार तहिने, भरल चौक पर बांस के फट्ठा से मार के बन-बन फोड़ दिया था, जानते हैं, काहेला? मरल बिलाई फेंके, आ खाली पांच गो रुपइया मांगे थे। ऊ दुइए गो दे रहा था। आज सार के सभे निकाल दिए।'

गजब की संतुष्टि भी लखना के चेहरे पर। वह फिर दरवाजा बाहर से बंद कर बलराम शर्मा की लाश कंधे पर उठा कर गांव में सबसे पूरब उसी के घर के सामने फेंक आया। अपने घर के सामने कुदाल से खून सनी मिट्टी भी हटा दिया। सुबह जब पुलिस आई, तब लखना ने सबको अपने घर से जाने दिया। अख़्तर  साहब को बहनोई की लाश मिल गई थी, वे बहन और बच्चों को संभालने में लग गए थे। दहशत में लगभग सारा गांव खाली हो गया था। मुसलमान अगले हमले की आशंका और हिंदू पुलिस से पकड़े जाने के डर से गांव छोड़ कर भाग चुके थे। हालांकि जाते हुए हताहत मुसलमानों ने पुलिस से एक भी शिकायत गांव के हिंदुओं के बारे में नहीं की थी। दूसरे दिन तक दंगे पर नियंत्रण हो चुका था। कर्फ्यू लग चुका था। अख़्तर  साहब भी अपनी बहन और बच्चों को लेकर किसी तरह अपने घर मुरैना लौट चुके थे। कर्फ्यू और तनाव के बाद स्कूल छठ तक छुट्टी के बाद ही खुल सका था।

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सीतामढ़ी शहर अब सामान्य दिखता है, लेकिन इतना कमजोर कि जरा-सा उंगली लगाओ तो भरभरा कर गिर जाने का खतरा। दंगे के इतने साल बाद भी हालत यह है कि अभी कुछ दिन पहले रेलवे स्टेशन पर किसी की बारात उतरी थी। स्टेशन से बस रिजर्व थी। लोग उसमें बैठ चुके थे। छह-सात लोग पान खाने नीचे किसी दुकान पर रुके थे कि किसी की नजर धीरे-धीरे बढ़ चुकी बस पर पड़ी। छहो-सातों लोग आगे जा रही बस को पकड़ने तेजी से दौड़ पड़े। दौड़ते हुए लोगों को देख कर आसपास के सारे लोग घबरा गए। किसी ने किसी से कुछ नहीं पूछा। अचानक सिर्फ दुकानों के शटर गिरने की आवाज आने लगी। जिसको जिधर बन पड़ा, भाग चले। उस बस को भी जहां जाना था, चली गई। दस मिनट के भीतर शहर में पूरी तरह सन्नाटा छा गया और आधे घंटे के भीतर चप्पे-चप्पे पर पुलिस के जवान तैनात हो गए। खुद एसपी और डीएम ने मेहसौल चौक पर डेरा डाल दिया, मामले के साफ होने तक। एक तेरह साल के पप्पा बिस्कुट बेचने वाले लड़के ने एसपी के सामने मामला साफ किया था। लेकिन तनाव को हरा होना था, हरा हो गया। दशहरे का हो या मोहर्रम का जुलूस, बसें शहर के दो किलोमीटर बाहर रोक दी जाती हैं। सरकार ने सीतामढ़ी शहर को सांप्रदायिक दृष्टि से अति-संवेदनशील क्षेत्र घोषित कर रखा है।

तो आज फिर अख़्तर  साहब स्कूल में टिफिन यानी मध्यावकाश में लगे बच्चों के साथ खेलने। संतलाल भी खेल में शामिल थे। खेल में पहली से चौथी कक्षा तक के बच्चे भाग ले रहे थे, लेकिन पूरे स्कूल के बच्चे दर्शक थे। खेल का शीर्षक था- 'बोल भाई कितने, आप चाहें जितने...।' लगभग बीस बच्चों को गोल घेरा बना कर खड़ा किया गया था। घेरे में अख़्तर  साहब भी थे। संतलाल बीच में बोलते हुए तेजी से घूम रहे थे- 'बोल भाई कितने', बच्चे जवाब देते- 'आप चाहें जितने।' घूमते-घूमते अचानक संतलाल ने कहा- 'पांच।' पूरा गोला घेरा टूट कर पांच-पांच के समूह में बंट गया। जो एक बच गया, अब उसकी बारी थी, गोल घेरे में 'बोल भाई कितने' बोलते हुए घूमते हुए। ऐसे ही बाकी बच्चों को भी अन्य खेलों में शामिल किया जाता।

बच्चों के साथ अख़्तर  साहब और संतलाल का खेलना, खेलने के साथ-साथ पढ़ाना भी होता था। खाली समय के अलावे अक्सर ये दोनो ही कक्षा में धमाचौकड़ी मचा देते थे। हेडमास्टर प्रेमशंकर झा की नाराजगी के बात ये खेल मध्यावकाश और शाम की छुट्टी के समय होने लगे थे।

ऐसे मामलों में नाराज होने के लिए किसी कारण नहीं, बल्कि सिर्फ द्वेष की जरूरत होती है। और कुछ लोगों में द्वेष के लिए सिर्फ दूसरे के सुख की जरूरत होती है। तो चूंकि सारे के सारे बच्चे अख़्तर  साहब और संतलाल में सर जी- सर जी कहते हुए जहां उलझे होते थे, वहीं बाकी सर जीयों से सिहरे रहते। उन सर जीयों को इस बात से बड़ा सुख मिलता कि बच्चे उनसे डरते हैं, लेकिन अख़्तर  साहब और संतलाल में उलझे रहते हैं- इससे उन्हें परेशानी होती थी। यही परेशानी बैठकी में फूटती थी।

'मरदे स्कूल को मजाक बनाके रख दिया है।' महेश तिवारी ने हेडमास्टर प्रेमशंकर झा का मूड भांपते हुए कहा।

'समझे में नहीं आता है कि क्या किया जाए। ऐसे में तो बच्चा सब माथा पर चढ़बे करेगा।' रामाधार शर्मा ने भी तुक्का जोड़ा।

गुप्ता जी कैसे पीछे रहते- 'देखते हैं, पहिले टिफिने में सब ससुरी भाग जाता था। अब छुट्टियो के बाद घरे जाने का नाम नहीं लेता है सब।'

'क्या कीजिएगा! सरकारो सार नया-नया ट्रेनिंग चला दिया है कि गतिविधि आधारित पढ़ाई कराइए। इससे बच्चा सब ज्यादा समझेगा। समझेगा ... ! मूस मोटाएगा त लोढ़ा होगा। अरे इ स्कीम-उस्कीम से कुछो होता है। जिसको जो काम करना है उ करबे करेगा। हं..., इ खेले-कुदे वाला बात से लइका सब आदर करना छोड़ दिया है। कुछो होय, हमरा त अबहियो लइका सब प्रणाम सर जी कहबे करेता है।' निराशा और संतुष्टि के भाव से प्रेमशंकर झा बोले।

'कुछो कहिए, स्कूल का माहौल पहिले ऐसा नहीं था। जब से इ मियां जी आया है, क्लास रूम को खेल का मैदान बना दिया है।' महेश तिवारी ने फिर कुढ़ते हुए कहा।

'आ ताड़कोला! ठीके कहते हैं, सोलकन के सोलह आना धन हुआ नहीं कि लगा फुदकने।' रामाधार शर्मा ने खैनी मलते हुए संतलाल की व्याख्या की।

संतलाल के चाचा अब भी ताड़ के पेड़ से ताड़ी उतारते थे।

'अब हेडमास्टरे साहब को कुछो करना पड़ेगा। हम सब त कहेंगे त कह देगा कि तुम कौन होता है। हेडमास्टरो साहब नहीं कुछ किए, त बूझिए कि लइका सब नाच पार्टी में जाएगा। लौंडा बनेगा, नाटक करेगा। हं..., त निर्लज्ज बनेगा त नाचे पाटी में न जाएगा।' गुप्ता जी इस वक्त सोलकन से फॉरवर्ड बनने पर तुले हुए थे, सो उन्होंने हेडमास्टर साहब को चुनौती दी। शांति से सिर हिलाते हुए हेडमास्टर साहब बोले- 'अच्छा धीरज धरिए। कहीं गुजरात वाला हवा एनहू बह गया न...!'

इसी के बाद हेडमास्टर साहब ने कक्षा में खेलों को लेकर अख़्तर  साहब से अपनी नाराजगी जताई थी और संतलाल को भी हिदायत दी। संतलाल ने अकेले में अख़्तर  साहब से कहा- 'जो अपने दुख से दुखी होता है, उसका तो इलाज है, लेकिन जो दूसरो के सुख से दुखी है, उसका क्या इलाज है?'

संतलाल अगर दर्शन की भाषा में अख़्तर  साहब को तसल्ली देते थे, तो इसलिए कि बीए करने के बाद पटना घूमने गए। उस वक्त पटना के गांधी मैदान में पुस्तक मेला चल रहा था, सो वह भी घूम लिए। आठ-दस किताबें खरीदीं और तभी से किताबें खरीदने हर साल पुस्तक मेले में पटना जाते रहे। इसलिए बीए की पढ़ाई बेकार नहीं गई और धीरे-धीरे आदमी बनने लगे। हो सकता है कि अनुसूचित जाति के आरक्षण पर शिक्षक की नौकरी हासिल कर ली हो, लेकिन साहित्य और सामयिक किताबों से खुद को लगातार समृद्ध करते रहे। डायरी लिखने की आदत भी इसी दौरान पड़ी।

तो संतलाल ने फिर आज रात में सोते वक्त सिरहाने की ओर चौकी पर लालटेन रखा। पेट के बल लेट कर डायरी लिखने लगे- '...! अमर्त्य सेन ने कहा भी है, 'धार्मिक कट्टरवाद या सांप्रदायिक फासीवाद या संकीर्ण राष्ट्रवाद के लिए निरक्षरता का होना जरूरी नहीं है। लेकिन लड़ाकू कठमुल्लापन को कायम रखने के लिए निरक्षरता की अहमियत को नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता।'

संतलाल ने डायरी बंद की। एक ग्लास पानी पिया। लालटेन धीमा किया, और सो गए।

छब्बीस मई को स्कूल में गर्मी की छुट्टियों के बाद अख़्तर  साहब अपने गांव मुरैना जाने को तैयार थे। उसी दिन फतेहपुर के धनी-मानी राजपूत जयकांत सिंह के बेटे की बारात मोतिहारी से आगे मुरैना होते हुए फूलपुर जाने वाली थी। जयकांत सिंह ने दो-तीन मजदूर अख़्तर  साहब को जानते थे। उन तीनों को ट्रैक्टर पर बारात में जाने वाली मिठाइयों और पकवानों के साथ जाना था। उन लोगों ने अख़्तर  साहब को उसी पर बैठा लिया कि रास्ते में मुरैना है, उतर जाइएगा।

लेकिन मोतिहारी में प्रवेश करने के पहले ही सड़क की एक पुलिया टूटी थी। नीचे पानी नहीं था। दक्षिण से खेत में होकर रास्ता लगा हुआ था जो आगे सड़क में मिल जाता था। एक दिन पहले की बारिश में रास्ता पूरा कीचड़ हो चुका था और उसी कीचड़ में एक जीप फंसी हुई थी। रास्ता पूरी तरह बाधित था। वहां ट्रैक्टर काम तो आ सकता था, लेकिन जीप के आगे होता तब। ढाई घंटे इंतजार के बाद विपरीत दिशा से एक ट्रैक्टर आया। उसी से जीप को खींच कर निकालने की जुगत हुई और रास्ता खुल सका। मोतिहारी पहुंचते-पहुंचते ट्रैक्टर को रात आठ बज गए। लड़की वालों की तरफ से दो लोग मुख्य चौक पर इसी ट्रैक्टर के इंतजार में खड़े थे। रास्ता बताया गया कि मुरैना होकर रास्ता बहुत खराब हो चुका है, इसलिए परशुरामपुर होकर चलिए।

मुश्किल केवल अख़्तर  साहब को थी। यहां से मुरैना नौ किलोमीटर था और फूलपुर से दो किलोमीटर। ट्रैक्टर पर बैठे जगरनाथ ने कहा कि इतनी रात को अब पैदल कहां जाइएगा। फूलपुर चलिए, वहां से सबेरे चले जाइएगा। अख़्तर  साहब को भी यही ठीक लगा। फूलपुर पहुंचने में दस बज गए। सूखी और चांदनी रात होती तो इस वक्त भी चले जाते, लेकिन बरसात और कीचड़ के कारण रुक गए और जनवासे के शामियाने में एक कोना पकड़ लिया। तीनों मजदूर ट्रैक्टर का सामान लेकर लड़की वालों के घर की ओर जा चुके थे। बारात भी चल चुकी थी।

एक घंटे में द्वार-पूजा और नाश्ते के बाद लोग लौट आए। तब तक सब ठीक था। लेकिन भोजन के लिए बुलाने आए कुछ लोग जब बारातियों से चलने का आग्रह करते-करते अख़्तर  साहब के पास पहुंचे तो बखेड़ा हो गया। अख़्तर  साहब की दाढ़ी छोटी थी, लेकिन उसकी कटिंग देख कर उनमें से एक व्यक्ति ने कहा- 'इ त लगता है मुसलमान है। इहां कइसे आया।'

सबके कान खड़े हो गए। मुसलमान है, मुसलमान है- भनभनाहट होने लगी। जितने लोग थे, सभी अख़्तर  साहब के चारों तरफ घेरा बना कर खड़े हो गए। दो-तीन लोगों ने अख़्तर  साहब से पूछताछ शुरू कर दी। अख़्तर  साहब ने सब कुछ बताया कि किन हालात में वे यहां आ गए हैं। लेकिन उन्हें जानने वाले तीनों मजदूर लड़की वालों के दरवाजे पर थे। सो इन्क्वायरी चल रही थी। किसी के मुंह से निकला- 'अरे एकरा सब पर भरोसा करना खतरा खरीदना है। बेग चेक कीजिए।'

और मौखिक इन्क्वायरी चेकिंग पर पहुंच गई। अख़्तर  साहब का बैग लेकर उसमें से एक-एक सामान बाहर निकाल दिया गया- तौलिया, भागलपुरिया चादर, पैंट-शर्ट, शेविंग सेट, कुछ किताबें, कलम और कपड़े में लपेटी हुई एक तस्वीर। कपड़ा हटा कर तस्वीर निकाली गई। तस्वीर किसी युवती की थी।

'देखिए! सार अपने बुढ़ा गया है, आ बेटी के उमर के बीबी रखे हुए है।' फोटो देखने वाले ने कहा।

'अरे एकरा सब में एहे सब होएबे करता है। चार-चार गो रखता है सब! क्या कीजिएगा!' दूसरे ने जोड़ा।

अख़्तर  साहब का धीरज छूटा- 'नहीं बाबू, यह मेरी बेटी की तस्वीर है।'

लेकिन तस्वीर चटखारेदार विश्लेषणों के साथ भीड़ में घूमने लगी। साथ-साथ अख़्तर  साहब की आवाज भी घूमती रही कि 'नहीं बाबू, ये मेरी बेटी की तस्वीर है।' एक आवाज यहां तक आ गई कि 'क्या मरदे अकेल्ले आ गया है। जौरे इसको भी लेते आता। बाई जी के नाच के कमी पूरा हो जाता।'

अख़्तर  साहब दोनों हाथ सिर पर रख कर बैठ गए। लाचार-से बोले- 'ऐसा मत कहिए बाबू! यहां भी किसी बेटी की ही शादी है। ऐसा मत कहिए।'

पटना से बारात में आए दूल्हे के एक दोस्त से देखा नहीं गया। उसने तस्वीर लगभग छीन कर अपने हाथ में ले लिया और जोर से बोला- 'क्या करने पर तुले हैं आप लोग? क्या जरा भी आदमीयत नहीं बची है?' और उसने अख़्तर  साहब के हाथ में वह तस्वीर दे दी।

'इ कोन है हो? मियां जी के दमाद है का? इसको हटाओ त...! आ मियां जी के जेबी चेक करो। कोनो ठीक नहीं है। नेपाल माहे आईएसआई वाला सार सब देस में घुस रहा है।' और दो लोगों ने ऊपर से लेकर नीचे तक अख़्तर  साहब की एक-एक पर्ची तक चेक कर डाला। जब कुछ हाथ नहीं लगा, तब दूल्हे के चाचा ने कहा, 'अच्छा छोड़ दीजिए, सबेरे चले जाएंगे।'

शांति की प्रक्रिया शुरू हुई और बात यहां तक पहुंची कि 'अच्छा मौलवी साहब, छोड़िए, चलिए खाना खा लीजिए। लइका सब है, नहीं समझता है।'

'अब क्या खाएं बाबू! इतना खा चुके कि अब कुछ नहीं बचा।' अख़्तर  साहब रोने लगे। बेआवाज! उन्हें खुद याद नहीं कि कितने दिनों के बाद उनकी आंखों से आंसू बह रहे थे कि रुक नहीं रहे थे।

बैग और सामान अब भी उनके सामने बिखरा पड़ा। लोग उन्हें जिद्दी और नाटकबाज कहके जा चुके थे। धकिया के अलग कर दिया गया पटना से आया वह दूल्हे का दोस्त अब भी खाने नहीं गया था। वह धीरे-धीरे अख़्तर  साहब के पास आकर सामान समेटने में उनकी मदद करने लगा। अख़्तर  साहब के कंधे पर हाथ रखके उसने उन्हें दिलासा दिया- 'जाहिलों की जमात से आप क्या उम्मीद करते हैं बाबा।'

अख़्तर  साहब ने आंख उठा कर उसकी ओर देखा और हल्के से फफक पड़े।

और सुबह अख़्तर  साहब कब चले गए। किसी को खबर भी नहीं हुई। एक हल्ला हुआ कि देखो कहीं किसी का कोई सामान तो लेकर नहीं भागा है। सबके-सब ईमानदार निकले और कहा कि उनका सब कुछ ठीक है।

एकदम सुबह पहुंचते ही अख़्तर  साहब की पत्नी ने सवाल किया तो चुपचाप कमरे में चले गए और पत्नी के पास आते ही उसकी छाती में मुंह छिपा कर रोने लगे। पत्नी ने भी बच्चों की तरह थपकाते हुए पूछा- 'क्या हुआ...?' मुंह हटा कर सिर्फ इतना कह सके- 'इतना गैरयकीनी! इतना शक! इतनी नफरत!' थोड़ा रुक कर बोले- 'थोड़ी चाय बनाओ।' और पत्नी को सब कुछ बता दिया।

'वह लड़का कौन था?' पत्नी ने दूल्हे के उस दोस्त के बारे में पूछा।

'नहीं मालूम। लेकिन ऐसे ही लोगों के भरोसे चलना पड़ता है।' अख़्तर  साहब ने कहा।

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गर्मी की छुट्टियों के खत्म होने के बाद स्कूल फिर से खुल गया था। बच्चे संतलाल और अख़्तर  साहब के और ज्यादा करीब होते जा रहे थे। अख़्तर  साहब के साथ लगे होने की वजह से संतलाल भी बाकी सबकी नजरों में चढ़ते जा रहे थे।

एक दिन प्रेमशंकर झा ने व्यंग्य मारा- 'हं..., लगे रहिए। लइका सब कलक्टर नहीं त आपके जइसा मास्टरो बन जाए।'

हरेंद्र गुप्ता से भी नहीं रहा गया- 'क्या संतलाल! चाय के पइसा अख्त..रे साहब देते हैं क्या?'

संतलाल तुरंत मतलब समझ गए। लेकिन आज उन्हें भी नहीं रहा गया- 'हां, आप पीजिएगा त आपका भी पैसा उन्हीं से दिलवा देंगे। खाली कहिए त सही!'

'देखिएगा, चाय पीते-पीते कहीं संतलाल से सलीम न बन जाइए!' हरेंद्र गुप्ता कुढ़ते हुए जाने लगे।

'अभिए आप कोन अपना माने बैठे हैं।' संतलाल ने भी जड़ा और दूसरी ओर चले गए।

उस रात संतलाल ने अपनी डायरी में लिखा- 'इस प्रकार के द्वेष की जड़ें आखिर कहां हैं? बाकी तीनों का आग्रह तो समझ में आता है। लेकिन हरेंद्र गुप्ता! वे शिक्षक भी हैं। क्या कभी विश्लेषण के दौर में नहीं जाते?' और आगे उन्होंने पढ़ी हुई किसी किताब का एक अंश लिखा- ' ...चीखते हुए दादू ने हिंदू राष्ट्र का घोष करने वाले उन दस-बारह लड़कों के झुंड से कहा- पता है कहां थे तुमलोग जब उज्जयिनी की सड़कों पर वसंत सेना की पालकी निकलती थी? तुम उसको कंधा देते थे। कहां थे जब जगन्नाथ का रथ निकलता था? तुम उसका रस्सा खींचते थे। और कहां थे, जब राजाओं की अश्वमेध होता था? तुम भट्टी के सामने बैठ कर तलवार बनाते थे। तुम हमेशा सिर्फ सीढ़ियां रहे हो। और सीढ़ियां खुद कहीं नहीं जातीं। केवल दूसरे लोग उस पर पांव रख कर ऊपर जाते हैं। आज भी तुम वही हो- सबसे नीचे की सीढ़ियां, जो सिर्फ इस्तेमाल होती हैं।'

उधर गुजरात गौरव-यात्रा का दंश झेल कर 'गौरवान्वित' हो रहा था, तो इधर अख़्तर  साहब को अखबारों में छपी दंगों की खबरों का पाठ बड़े उत्साह से सुनाया जाता। और गुजरात में फिर से दो-तिहाई की जीत पर राजकीय आदर्श विद्यालय फतेहपुर में भी मिठाइयां बंटीं। दूसरे लोगों के साथ संतलाल को भी एक लड्डू मिला, लेकिन अख़्तर  साहब को दो लड्डू मिले। अख़्तर  साहब और संतलाल ने एक-दूसरे का मुंह देखते हुए लड्डू खा लिया।

पिछले स्वतंत्रता दिवस पर झंडा फहराने के बाद 'जन-गण-मन अधिनायक जय है' हुआ और एक जलेबी देकर छुट्टी दे दी गई। सो, इस बार गणतंत्र दिवस पर अख़्तर  साहब ने अपना एक आइटम बच्चों के साथ मिल कर तैयार करना शुरू कर दिया। आइटम सिर्फ यही था कि कुछ बच्चे कोरस में 'सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा' की तैयारी कर रहे थे। संतलाल ने भी गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस के बारे में पूरी जानकारी देने वाला नाटक तैयार करा लिया। इसी को देख कर महेश तिवारी ने कुछ बच्चों से 'वंदे मातरम' तैयार करा लिया। तय हुआ कि झंडोत्तोलन के बाद पहले 'वंदे मातरम' होगा, उसके नाटक, फिर 'सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा।'

पच्चीस जनवरी को नाटक के पूर्वाभ्यास में राष्ट्रगीत औऱ राष्ट्रगान के लेखकों का नाम आने पर हेडमास्टर साहब ने अख़्तर  साहब ने पूछा- 'इ सारे जहां से अच्छा किसका लिखा हुआ है?'

अख़्तर  साहब ने बताया- 'इकबाल।'

उसी शाम छुट्टी के बाद जब अख़्तर  साहब और संतलाल बच्चों में उलझे थे, बैठकी में प्रेमशंकर झा ने कहा- 'अब बुझाया! मौलाना को वंदे मातरम काहे नहीं सूझा। इहो अगर कोनो इकबाल का लिखा हुआ रहता जरूर सूझता।'

और कल होकर झंडोत्तोलन हुआ, राष्ट्रगान हुआ और जलेबी बंट गई। सभी बच्चे ताकते रह गए कि अब उनके द्वारा तैयार आइटम पेश होगा। लेकिन जलेबी बंट चुकी थी। अख़्तर  साहब और संतलाल बच्चों को लेकर स्कूल के प्रांगण में चले गए और 'बोल भाई कितने, आप चाहें जितने' खेलने लगे।

गणतंत्र दिवस की रात संतलाल ने अपनी डायरी में यह भी जोड़ा- '...फासीवादी ताकतें दूसरी-दूसरी पहचानों की ओर में काम करते हैं। आमतौर पर वह अपनी ओट बनाते हैं राष्ट्रवाद के एक अतिवादी रूप को, जिसके चलते राष्ट्रवाद के साथ ही एक फासीवादी परिभाषा नत्थी हो जाती है।' संतलाल ने डायरी बंद की और आज अपने चुप रह जाने के कारणों पर विचार करने लगे। ...तो क्या आज भी मेरी चेतना पर वही मानसिकता हावी है, जो सिर्फ मूकदर्शक रहना सिखाती है?

राजकीय मध्य विद्यालय फतेहपुर का अगला एक महीना बेहद तनावों भरा गुजरा। अख़्तर  साहब ज्यादा समय चुप रहने लगे थे। बच्चों के खेल में भाग नहीं लेते, बस खेलते हुए देखते। उन्हें कभी-कभी चक्कर आने लगा था। डॉक्टर ने आखिरकार स्थायी रूप से उच्च रक्तचाप की दवा लेने की सलाह दे दी। संतलाल ने अपने तबादले के लिए हाथ-पांव मारना शुरू कर दिया। लेकिन उसके साथ ही हेडमास्टर प्रेमशंकर झा तक को खरी-खरी सुनाना भी शुरू कर दिया।

लक्षणा में एक दिन प्रेमशंकर झा ने जड़ा- 'क्या संतलाल! सुनते हैं कि आपके अंबेडकर मुसलमान को देखना तक नहीं चाहते थे! आप त इहां...।' कि पलट कर संतलाल ने सीधा जवाब दिया- 'सोझे बजरंग दल के टिकट पर एमपीये का चुनाव लड़ न जाइए महाराज! काहेला मास्टरगीरी में चले आए हैं?'

उस दिन से प्रेमशंकर झा ने संतलाल से सीधे कभी बात नहीं की। संतलाल ने भी जिला शिक्षा अधिकारी के यहां स्थानांतरण के लिए सीधी अर्जी देने को सोच लिया। अपनी पहली पसंद अपना गांव लगमा बताया, फिर लिख दिया कि आप जहां चाहें, वहीं मुझे सुविधा होगी। रात में ही अर्जी तैयार भी कर ली।

इधर अख़्तर  साहब तबीयत ज्यादा खराब होते जाने के बावजूद कक्षाओं में बच्चों में उलझे रहते। उन्होंने संतलाल से भी धीरे-धीरे कटना शुरू कर दिया था। यह देख कर कि उनके चलते संतलाल को भी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे ही समय में क्रिकेट विश्व कप का बुखार तेजी से बढ़ता जा रहा था। खास कर एक मार्च को भारत-पाकिस्तान के मैच को लेकर माहौल तनाव की हद तक पहुंच चुका था। बयान-दर-बयान और शुभकामनाएं-दर-शुभकामनाएं आ रही थीं कि भारत और किसी से जीते न जीते, पाकिस्तान से मैच जीत जाना विश्व कप जीतने के बराबर होगा। या यों कहिए कि पाकिस्तान पर फतह होगा।

बाईस फरवरी को अख़्तर  साहब ने आवेदन दे दिया कि मेरी तबीयत ज्यादा खराब होती जा रही है, थोड़े आराम की जरूरत है। सोचा कि बंबई से बेटा भी आया हुआ है, उसके सात पटना जाकर ठीक से इलाज भी करा लेंगे।

आवेदन देते समय चौकड़ी जमी हुई थी। महेश तिवारी ने खैनी मलते हुए पूछा- 'तब अख़्तर  साहब! फटक्का भारत में छूटेगा कि पाकिस्तान में!' संदर्भ क्रिकेट मैच को लक्षित था।

'इसके लिए पाकिस्तान जाने की क्या जरूरत है! हर गांव आ शहर में कहीं-न-कहीं पाकिस्तान हइये है की!' रामाधार शर्मा ने तुक मिलाया।

अख़्तर  साहब मुस्कराए। सिर्फ इतना कहा- 'मेरा भरोसा अभी टूटा नहीं है।' और बाहर निकल गए। कल होकर ही मुरैना के लिए निकल पड़े। घर में स्वास्थ्य लाभ कर रहे थे। वेतन उठाने के बाद बेटे के साथ पटना जाने का भी मन बना चुके थे। बीच में ही ब्लड प्रेशर की नियमित दवाई खत्म हो गई। टालने में दो दिन टल गए।

सुबह चाय पीकर कुछ पैसों के इंतजाम में अपने गांव से दो किलोमीटर दूर शाहपुर एक संबंधी के घर गए। संबंधी आज भारत-पाकिस्तान मैच देने के लिए बैटरी चार्ज कराने गए थे। लौटने तक रुक गए। उनके आने पर पैसे भी मिल गए। पैसे लेकर घर को लौट रहे थे कि बीच रास्ते में ही छाती में बांईं ओर कचोटने जैसा दर्द शुरु हो गया। बांईं बांह में लगा कि जैसे कोई जोर-जोर से चुटकी काट रहा हो। एक रिक्शे वाले से मदद मांग कर किसी तरह घर पहुंचे। पत्नी गोद में सिर रख कर तेल लगा कर जोर से मलने लगी। बेटा छाती और बांह मलने लगा। इसी बीच अख़्तर  साहब ने दाहिने हाथ से बांईं छाती को जोर से भींचा। मुंह खोल कर कुछ कहना चाहा, लेकिन अचानक ठहर गए। गर्दन पत्नी की गोद में दाहिनी ओर ढलक गई। दोनों हाथों से अपनी छाती पीट कर 'या अल्लाह' कहती हुई पत्नी पीछे की ओर बेहोश होकर गिर पड़ी। बेटा पहले 'अब्बा' कह कर चिल्लाया, फिर 'अम्मी' कहते हुए संभालने दौड़ा।

तीन मार्च को अख़्तर  साहब का बेटा स्कूल में पहुंचा। हेडमास्टर प्रेमशंकर झा से बोला- 'मैं शकील अख़्तर ...। ...शमीम अख़्तर  का बेटा। ...अब्बा का शनीचर के रोज इंतकाल हो गया। ...मैं बाद में फिर आऊंगा। ...अभी खबर देने आ गया था।'

इतना कह वह जाने लगा कि प्रेमशंकर झा ने पूछा कि कैसे हो गया। अख़्तर  साहब के लड़के ने रुक-रुक कर बता दिया। जाते वक्त संतलाल उसे वस तक दिलासा देते हुए छोड़ने आए और कहा- 'जैसी भी मदद की जरूरत हो, बेहिचक कहना।'

संतलाल स्कूल में वापस आए। चौकड़ी की बैठकी चुटकियों के साथ चल रही थी।

'मैचवा के पहिले मरा कि बाद में हो?' रामाधार शर्मा ने पूछा।

'न..., दुपहरे में में खत्तम हो गया था।' प्रेमशंकर झा ने कहा।

'हो सकता है कि बेचारा के पहिलहिं आभास हो गया हो।' महेश तिवारी ने सुर मिलाया।

'अब इ न सोचिए कि अपने त चलिए गया, लेकिन बेटा के नौकरी दे के गया।' हरेंद्र गुप्ता ने जोड़ा।

'हं, इहे त एगो दुख के बात है कि बेटा के नौकरी हो जाएगा। न त आपलोगों को असली मिठाई त आजे बांटना चाहिए था।' संतलाल ने कमरे में घुसते हुए कहा और अपना हाथ में टांगने वाला थैला लेकर निकलते हुए बोले- 'आज त कम-से-कम स्कूल बंद रखिएगा?' और सभी व्यंग्य की नजर फेंकते हुए बाहर निकल गए।

और आज संतलाल ने डायरी के पन्नों की सीमा तोड़ दी। लिखते गए, लिखते गए ' ...अब सवाल यह नहीं रह गया लगता है कि पूर्वाग्रहों को त्याग कर तथ्यों और तर्कों के सहारे आगे कैसे बढ़ा जाए। बल्कि सवाल अब यही रह गया लगता है कि भावुकता के सहारे पीछे कैसे लौटा जाए। आगे बढ़ने के लिए तथ्यों और तर्कों की जरूरत पड़ती है, जिस पर मेहनत करना पड़ता है- सभी स्तरों पर। और भावनाओं में बहाने या भावुकता में बहने के लिए मेहनत की जरूरत नहीं पड़ती, इसलिए आसान है...। अख़्तर  साहब की मौत पर हमारे स्कूल में की टिप्पणियां इसलिए साधारण नहीं हैं, क्योंकि ये टिप्पणियां समाज के एक ऐसे तबके की गई हैं जो समाज की बुनियाद तैयार करता है। और जब बुनियाद डालने वाले हाथ ही पूरी तरह संवेदनहीन औऱ खोखले हों तो? दरअसल, धार्मिक कट्टरता से त्रस्त व्यक्ति जिस गुलामी को भोग रहा होता है, उसे न वह देख पाता है, न समझ पाता है। इससे बड़ी त्रासदी यह है कि यह गुलामी उसे अच्छी लगती है। एक डरे हुए शंकाग्रस्त व्यक्ति से 'मनुष्य' होने की उम्मीद भी कैसे की जा सकती है। लेकिन उम्मीद कहां है...?'

कल मुरैना जाऊंगा...। पता नहीं, अख़्तर  साहब के परिवार वाले किस हाल में होंगे। यही सोचते-सोचते संतलाल सोने लगे कि ध्यान आया कि ट्रांसफर के लिए अर्जी देने भी जाना है...। अब थोड़े ही दिनों में मैं भी चला जाऊंगा। ...तब वे लोग आराम से रह सकेंगे। ...लेकिन बच्चे! मैं भी भाग जाऊं तो बच्चे!

...नहीं-नहीं कहते हुए वे उठ बैठे। एक ग्लास पानी पिया और ट्रांसफर के लिए जो अर्जी उन्होंने तैयार की थी, उसे लेकर एक बार पढ़ा और अगले ही पल उसे फाड़ डाला।

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                                                                  (समाप्त) 
                                                         (पाखी में प्रकाशित)

Saturday 4 January 2014

सामंतवाद की दीवार में सिर फोड़ता सामाजिक न्याय...



नवंबर 2005 में जब बिहार में लालू प्रसाद की पार्टी का तथाकथित "जंगल राज" खत्म हुआ और तय हो गया कि भाजपा के सहारे से नीतीश कुमार बिहार के मुखिया बन जाएंगे, उस वक्त मैं बिहार के सीतामढ़ी जिले मे अपने गांव से पांच किलोमीटर दूर गाढ़ा चौक पर था। जदयू-भाजपा की जीत की मुनादी पीटती हुई भीड़ चौक की तरफ आ रही थी। पास आने पर "नीतीश कुमार जिंदाबाद" जैसे नारों के साथ जो मुझे सुनाई पड़ा, वह किसी भी होशमंद शख्स को दहलाने के लिए काफी था। लगभग दो सौ लोगों की भीड़ गुलाल-अबीर से होली खेलती उन्माद में चीख रही थी कि "हमारा राज वापस आ गया... हमारा राज वापस आ गया...।"

यहां मुझे यह साफ करने की जरूरत शायद नहीं है कि वे लोग कौन थे जो इस बात की होली मना रहे थे कि "हमारा राज वापस आ गया...।" मैं अंदाजा लगा सकता था, लेकिन फिर भी मैंने वहां पिछले कई साल से कंधे पर डोलची टांग कर पान बेचते सुखो भाई से पूछा कि ये कौन लोग हैं। उन्होंने मुझे जवाब के तौर पर सवाल दिया कि इस चौक पर और किसकी हिम्मत होगी दिवाली के साथ होली मनाने की। फिर उन्होंने धीरे और सहमी हुई आवाज में बताया कि सब बाबू साहब हैं।

लालू प्रसाद की तरह नीतीश कुमार भी पिछड़ी जाति, यानी ओबीसी की ही पृष्ठभूमि से आते हैं। लेकिन गाढ़ा चौक पर "बाबू साहबों" की भीड़ क्यों खुशी मना रही थी और नारे लगा रही थी कि "हमारा राज वापस आ गया...।"

मैं नहीं जानता कि कुछ उदार कहे जाने वाले लोगों को आज भी यह वहम क्यों है कि नीतीश भाजपा के साथ खड़े हैं, लेकिन भाजपाई नहीं हैं। इस देश की असली मुश्किल यही है कि यहां ब्योरा जमा करना और उसे पेश करना अपनी जिम्मेदारी का पूरा होना मान लिया जाता है। हमें यह ध्यान रखने की जरूरत है कि अगर हमें यहां से आगे बढ़ना है तो किसी भी क्या के क्यों पर बात करनी होगी, उसकी करनी होगी।

गाढ़ा चौक पर "हमारा राज वापस आ गया..." की मुनादी पीटते हुए लोग कोई चाणक्य नहीं थे, लेकिन वे क्यों निश्चिंत थे कि उनका "राज" वापस आ गया? क्या सिर्फ इसलिए कि भाजपा सत्ता की हिस्सेदार थी? मामला केवल हिस्सेदारी का नहीं था, बल्कि उस भरोसे का था जो नीतीश कुमार ने दिया था और उस मानसिकता का था, जिसमें नीतीश कुमार जीते हैं। यहां शायद बिहार में अति पिछड़ी जातियों और महादलितों के लिए की गई उनकी तथाकथित "क्रांति" की हकीकत का बयान करने का मौका नहीं है।

लेकिन 2005 के नवंबर से आज तक अलग-अलग मौकों पर गाढ़ा चौक पर गूंजते वे नारे अगर मुझे जिंदा दिखे हैं तो इसलिए कि नीतीश कुमार और उनकी सरकार ने हर मौके पर उसे पाला-पोसा और मजबूत किया है।

सत्ता में आने के महज तीसरे महीने उन्होंने अपना सबसे पहला बड़ा फैसला लिया और उस पर तुरंत अमल किया वह था अमीरदास आयोग को भंग करना। मुझे अक्सर यह शक होता है कि कहीं यह नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री बनने की पूर्व शर्त तो नहीं थी! वरना क्या वजह हो सकती है कि जो अमीरदास आयोग अपनी लगभग सारी रिपोर्ट पूरी कर चुका था, बस उसके सौंपे जाने की औपचारिकता बाकी थी, उसे आखिरी वक्त में भंग कर दिया गया?

दरअसल, अमीरदास आयोग शायद चाह कर भी उन हकीकतों को नजरअंदाज नहीं कर सकता था कि भूमिहारों की रणवीर सेना को खाद-पानी से सींचने और पालने-पोसने वाले लोग भाजपा और जदयू के वैध साए में जनतांत्रिक राजनीति कर रहे थे और उसके पांव राजद के भीतर भी फैले हुए थे। इसलिए इस आयोग का भंग किया जाना सबके लिए सुविधाजनक था और शायद इसीलिए किसी को भी इस पर हंगामा खड़ा करना जरूरी नहीं लगा। लालू प्रसाद की उस राजद के लिए भी नहीं, जिसके सत्ताकाल में रणवीर सेना द्वारा किए गए कत्लेआमों की पड़ताल और उसके तारों की जांच के लिए वह आयोग बिठाया गया था।

अमीरदास आयोग को भंग किए जाने को मैं नीतीश कुमार की सामाजिक राजनीति की दृष्टि मानता हूं। और उनकी सरकार की समूची कार्यशैली ने इसे बार-बार पुष्ट किया है। फर्क सिर्फ यह है कि उनके कामकाज का आलकन एक लगभग बिके हुए और समर्पित मीडिया के "ट्रांसफॉर्म्ड बिहार" टाइप रिपोर्टों के आधार पर होता रहा है। सवाल है कि नीतीश कुमार की मेहरबानी से बिहार को ट्रांसफॉर्म्ड बताने वालों का समाज कौन-सा है और उसे अपने निष्कर्षों का आधार बनाने वाले लोग कौन हैं? पैदा होने के बाद रणवीर सेना की बर्बरताओं को राजद सरकार की नाकामी करार देना सही था, लेकिन इसी मीडिया के लिए अमीरदास आयोग को भंग करना किसी परेशानी की वजह नहीं था। क्यों?

यही वही दौर था जब 2002 में रणवीर सेना का मुखिया ब्रह्मेश्वर सिंह पकड़े जाने के बाद से जेल में बंद था और बथानी टोला जैसे तमाम कत्लेआमों के सिलसिले में जहां भी अदालतों में उसकी खोज होती, नीतीश सरकार के सिपाही उसके "फरार" होने की खबर दे देते। और आखिरकार नीतीश कुमार की दोस्ताना मेहरबानी से जब ब्रह्मेश्वर सिंह जेल से बाहर आ गया तो इस पर क्यों किसी को हैरान होना चाहिए? यहां तक कि लालू प्रसाद या रामविलास पासवान को भी इस पर चुप रहना जरूरी लगा तो इसके कुछ तो कारण रहे होंगे।

और जब पटना हाईकोर्ट के जजों ने लक्ष्मणपुर बाथे या बथानी टोला कत्लेआम के निचली अदालत में साबित तमाम अपराधियों को रिहा किया तो कम से कम मुझे सचमुच कोई हैरानी नहीं हुई। लालू प्रसाद की राजद सरकार ने बहुतेरे धतकरम किए होंगे, लेकिन कम से कम लक्ष्मणपुर बाथे और बथानी टोला मामले में उसने पीड़ितों के पक्ष में इतना जरूर किया कि सेशन कोर्ट ने कइयों को छोड़ने के बावजूद कइयों को फांसी और उम्रकैद की सजा दी थी। लेकिन जब "अपना राज" वाली सरकार आ गई तो राज्य की बदली हुई तस्वीर का असर अदालतों पर भी तो पड़ना चाहिए! सो हाईकोर्ट के जजों को स्वाभाविक रूप से उस कत्लेआम के गवाह भरोसेमंद नहीं लगे। निचली जातियों के लोग सिर्फ जान देते वक्त भरोसेमंद होते हैं। वे अदालत के कठघरे में भरोसेमंद नहीं होते हैं।

अभी बहुत दिन नहीं बीते हैं जब दिल्ली में रोहिणी की एक अदालत की जज कामिनी लाउ ने भी हरियाणा के मिर्चपुर कांड के पीड़ितों को "गैरभरोसेमंद" गवाह घोषित किया था और तीन को छोड़ कर तमाम आरोपियों को मासूम होने का तमगा देकर रिहा कर दिया था। दलितों पर अत्याचार के मुकदमों में सजा की दर महज दो प्रतिशत के आसपास है। खुद केंद्र सरकार कहती है कि दलितों पर जुल्म से संबंधित लगभग अस्सी फीसद मामले लंबित हैं। यानी सौ में करीब अस्सी मामले अदालतों तक पहुंचे ही नहीं। और हममें से बहुत सारे लोग हैं जो न्यायिक सेवाओं में आरक्षण की मांग को एक पिछड़ा और द्वेषपूर्ण मांग करार देते हैं! हो सकता है, यह शक सही हो। लेकिन वे कौन-सी वजहें होंगी कि उसी पटना हाईकोर्ट को अमौसी हत्याकांड में दस लोगों को फांसी की सजा देने में कोई हिचक नहीं हुई। क्या इसलिए कि नीतीश सरकार की परिभाषा के हिसाब से वे आरोपी महादलित थे और अदालत को वे सभी गवाह "भरोसेमंद" लगे जो सवर्ण थे? यह देश के दूसरे इलाकों का भी सच हो सकता है। लेकिन बिहार में पुलिस थानों के दारोगा को शायद जज भी बना दिया गया है जो उत्पीड़न, अत्याचार या अपराध के मामले दर्ज नहीं करता है, तत्काल थाने में ही निपटा देता है। आंकड़ों में अपराध में कमी वैसे ही नहीं होती है। और दलितों-पिछड़ों पर जुल्म ढाने वाली सामंती ताकतों ने नीतीश कुमार को यों ही नहीं बिठाया है बिहार की कुर्सी पर!

नीतीश एक अच्छे प्रतिनिधि साबित हुए हैं उन ताकतों के, जो उनके पहले के तकरीबन डेढ़ दशक के तथाकथित जंगल राज में निराश हो गए थे। लालू प्रसाद अपने शुरुआती सत्ताकाल में कहते थे- "गाय चराने वालों, सुअर चराने वालों, पढ़ना लिखना सीखो, पोथी-पतरा फेंको, पढ़ना-लिखना सीखो।" सुअर या बकरी चराने वालों के पढ़ने-लिखने और पंडितों का पोथी-पतरा फेंक देने के "खतरे" का अंदाजा किसे नहीं था। फिर लालू के ही नाम से प्रचारित "परवल का भुजिया खाओ" या "भूरा बाल साफ करो..." जैसे जुमलों ने सचमुच बहुत सारे लोगों के दिमाग में कुछ गड़बड़ पैदा की। लालू की खासियत यही थी और शायद उनकी सीमा भी कि इससे ज्यादा वे कुछ नहीं कर सके। शायद कर भी नहीं सकते थे। और उनके जुमले आखिरकार एक खास तरह का दिशाभ्रम परोसने से ज्यादा का दर्जा हासिल नहीं सके। बाद में उन्होने जो रास्ता पकड़ा, उसे उम्मीदों के साथ धोखा करना कहा जाए, तो वह भी कम होगा। पोथी-पतरा फेंको का नारा देने वाले वही लालू प्रसाद आज मंदिरों में दर-दर भटकते हुए जेल पहुंच चुके हैं और अपने भविष्य के लिए तंत्र-मंत्र, पूजा-पाठ और पंडितों के आगे दंडवत हैं।

लेकिन असली मुश्किल शायद भाकपा (माले) की थी। 2004 तक मैं पटना में ही था और मैंने देखा है कि भाकपा (माले) की रैलियों में किसी भी दूसरी पार्टी की रैलियों से बहुत ज्यादा भीड़ होती थी। लेकिन उस भीड़ को वे शायद कभी अपनी ताकत के रूप में तब्दील नहीं कर पाए। समूचे मध्य बिहार में जिस संघर्ष की लहर भाकपा (माले) ने पैदा की, उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। लेकिन वे कौन-सी वजहें रहीं कि उसकी जमीन पर कब्जा किसी और का हो गया। क्यों इसके भीतर वे तमाम लोग किनारे लगा दिए गए, जिन्होंने इसे खड़ा किया? यह पार्टी जिनके लिए लड़ाई लड़ने का दावा करती रही है, उनके बीच का कोई भी चेहरा पटल पर नहीं दिखता है तो क्यों?

वैसे यह अकेले माले की दिक्कत नहीं है। माकपा और भाकपा ने भी इसी पैमाने पर जो खाली, लेकिन बेहद उपजाऊ जमीन छोड़ी, उस पर किसी न किसी को तो फसल उगाना था! कम्युनिस्ट पार्टियों के लिए जो लोग अपने हो सकते थे, उन्हें ये पार्टियां अपनी नहीं लगीं, क्यो? क्यों उन नक्सली समूहों को मौका मिला जिन्होंने दलित-पिछड़ी जातियों के सबसे कमजोर तबकों को रणवीर सेना और सरकारी पुलिस के बीच में खड़ा कर दिया? जिस स्थिति में नक्सली समूह रहे हैं, उसमें उत्पीड़ित तबकों को वे इससे ज्यादा क्या दे सकते थे? लक्ष्मणपुर बाथे या बथानी टोला के बदले सेनारी कर दिया जाएगा, लेकिन पटना हाईकोर्ट में कौन खड़ा होगा लक्ष्मणपुर बाथे या बथानी टोला के भुक्तभोगियों के लिए? क्या इस देश के समाज को समझना इतना मुश्किल है?

नब्बे के दशक में बिहार में दलितों और पिछड़ी जातियों का जो उभार हुआ था, उसका नेतृत्व वामपंथी दलों को करना था। लेकिन क्यो यह ताकत लालू का दामन थाम कर आगे बढ़ी और नीतीश के जरिए फिर वहीं वापस लौट गई, जहां वह थी। सोशल जस्टिस के नारे को सोशल इंजीनियरिंग में तब्दील करने के जितने बड़े अपराधी नीतीश कुमार हैं, लालू की जिम्मेदारी उससे कम नहीं बनती। लेकिन वामपंथी पार्टियों ने क्या किया? क्यों नीतीश जैसे फर्जी लोगों को निचली जातियों का उद्धारक घोषित कर दिया जाता है, जबकि नीतीश की मूल दृष्टि सामंती ताकतों की जड़ें मजबूत करती हैं? कुछ सपने दिखाए गए और ढेर सारी उम्मीदों के साथ लोग इंतजार करते रहे और कोई सोशल जस्टिस से बेईमानी करता रहा, कोई सोशल इंजीनियरिंग को पुख्ता करता रहा तो कोई इसे पचड़ा कह कर दूर भागता रहा।

इस देश में जाति से निपटे कौन-सा वर्ग खड़ा किया जा सकता है? इस देश में वर्ग के परदे से जाति को ढकना क्या एक मजाक नहीं लगता?

खैर, कोई भी सत्ता बिना तंत्र पर कब्जे के मन-मुताबिक नहीं चल सकती। लालू प्रसाद के कथित "जंगल राज" में जो थोड़ी तोड़-फोड़ हुई थी, नीतीश के चेहरे के जरिए उसी को दुरुस्त किया जा रहा है। नौकरशाही को खुली छूट दे दो, वह आपको सत्ता का मुखौटा बने रहने में कोई अड़चन नहीं पैदा करेगा। और किसी को यह समझने के लिए बहुत मेहनत नहीं करनी होगी कि बिहार की नौकरशाही और बिहार का तंत्र आज भी किसका है, किसके लिए है। साइकिल वितरण टाइप योजनाएं दरअसल वे परदे हैं जिसके पीछे दो दशकों में सामाजिक यथास्थितिवाद के मनोविज्ञान के गड़बड़ाए हुए पुर्जे दुरुस्त किए जा रहे हैं। सभी मोर्चों पर...!

बिहार का मीडिया हमें दिखाता है कि नीतीश सरकार ने स्कूलों-अस्पतालों की हालत अच्छी कर दी है। वह हमें यह नहीं बताता कि स्कूल-अस्पताल की इमारतों पर रंग-रोगन के अलावा पढ़ाई-लिखाई या डॉक्टर-इलाज की हकीकत क्या है। हम अखबारों के पन्नों पर बिहार की चमकती सड़कों की खबरें पढ़ कर खुश होते हैं। कोई नहीं बताता कि हर वक्त पैसे का रोना रोने वाली बिहार सरकार अपने कुल बजट का अड़तीस फीसद हिस्सा केवल सड़कों के लिए देती है तो इसके पीछे मकसद क्या केवल सड़कें दुरुस्त करना है? कंस्ट्रक्शन और सेवा क्षेत्र की चमकती तस्वीर पर ग्रोथ-रेट के फर्जीवाड़े से किसका चेहरा खिल रहा है? यह पता लगाने की जरूरत है कि सड़क निर्माण से लेकर कंस्ट्रक्शन के तमाम ठेके समाज के किस वर्ग के हिस्से जा रहे हैं।

बहुत अच्छी सड़कों वाले हरियाणा से कोई खबर आ जाती है कि किसी दलित ने किसी सवर्ण के घड़े से पानी पी लिया और उसके हाथ काट दिए गए। और बहुत चमकती सड़कों की ओर तेजी बढ़ते और दावा करने वाले बिहार में भी एक दलित किसी सवर्ण के घर के आगे लगे सरकारी हैंडपंप से पानी पी लेता है तो उसे पीट-पीट कर मार डाला जाता है। फारबिसगंज में जो हुआ था, वह अररिया की तरह चुपचाप दफन हो जाता, अगर चोरी से बनाया गया वीडियो क्लिप बाहर नहीं आ जाता। हमारी बहुत अच्छी सड़कों की मंजिल कहां हैं?

हम लक्ष्मणपुर बाथे या बथानी टोला पर हाईकोर्ट के फैसले से परेशान होते हैं। लेकिन इस व्यवस्था में इससे अलग कोई फैसला होना भी कहां है? लक्ष्मणपुर बाथे या बथानी टोला कत्लेआम को अंजाम देने वाली रणवीर सेना के गुंडे जब ब्रह्मेश्वर सिंह की हत्या के बाद राजधानी पटना में नंगा नाच करते हैं और उसे पोसने वाली सरकार इस तांडव का मजा लेते हुए कहती है कि उन्हें रोकने से दंगा भड़क जाता तो हम किससे उम्मीद कर रहे हैं? रणवीर सेना के गुंडों का तांडव दंगा नहीं था और उसे रोकने से दंगा भड़क जाता! याद कीजिए कि बथानी टोला कत्लेआम पर पटना हाईकोर्ट के फैसले के बाद नीतीश कुमार ने कुछ भी कहा हो।

नीतीश सरकार ठीक कहती है। उन्हें रोका जाता तो समाज की दबी-कुचली पिछड़ी जातियों को यह संदेश कैसे पहुंचता कि रणवीर सेना के नेतृत्व में सवर्ण वर्चस्व आज भी कितनी ताकत रखता है। यानी एक मोर्चे पर तंत्र चुपचाप अपना काम कर रहा है और अब दूसरा मोर्चा भय का मनोविज्ञान रच रहा है।

नीतीश कुमार की यह वही सरकार है जिसके हाथ सरकारी स्कूल के टीचरों से लेकर आशा की महिला कार्यकर्ताओं के शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों पर बर्बर लाठी चार्ज करते हुए नहीं कांपते। लेकिन रणवीर सेना का नंगा नाच शायद वह मंत्रमुग्ध होकर देखती है। कॉमरेड एबी बर्धन जब कहते हैं कि नीतीश कुमार ने लालू प्रसाद से सत्ता पाने के लिए रणवीर सेना जैसे सामंती संगठनों का सहारा लिया तो उसे एक विवादित बयान कहा जाता है। लेकिन नीतीश सरकार का वह कौन-सा चरित्र है जो उसे एबी बर्धन की राय से उसे अलग करता है। वैसे कॉमरेड एबी बर्धन ने सिर्फ वही कहा जो बहुत सारे लोगों के साथ-साथ खुद नीतीश सरकार भी पहले से जानती है। क्या यह बेवजह होगा कि जातिगत आतंक और कत्लेआम का प्रतीक बन चुका रणवीर सेना का मुखिया कहता है कि नीतीश बिहार में अच्छा काम कर रहे हैं? (हालांकि यही कॉमरेड एबी बर्धन अब मानते हैं कि नीतीश कुमार बिल्कुल धर्मनिरपेक्ष हैं और लालू प्रसाद उनके सामने संकट पैदा कर रहे हैं। पता नहीं, यह दिशाभ्रम कॉमरेडों को कहां लेकर जाएगा।)

ब्रह्मेश्वर सिंह की रिहाई, बथानी टोला और लक्ष्मणपुर बाथे जनसंहार पर पटना हाईकोर्ट का फैसला, ब्रह्मेश्वर की हत्या के बाद पटना में तांडव- सभी एक ही जगह पहुंचने वाले अलग-अलग रास्ते हैं।

ब्रह्मेश्वर सिंह की हत्या के बाद अगले कम से कम पंद्रह दिन तक के बिहार के कम से कम हिंदी अखबारों के पन्ने पलटे जा सकते हैं। करीब दो हफ्ते में इन अखबारों ने बताया कि बिहार के सत्ताधारी सामाजिक वर्ग का चरित्र क्या है, वह कैसे काम करती है। लगातार दस-बारह दिनों से अगर पहले पन्ने पर आठ कालम हत्यारों के किसी सरगना को "मुखिया जी" या दूसरे संबोधनों के साथ समर्पित हो तो क्या इसके मायने समझने में किसी को दिक्कत होनी चाहिए? यहां तक कि ब्रह्मेश्वर के श्राद्ध के भोज के एक दिन पहले जब सत्ताईस गैस सिलेंडर फटे और उसमें बहुत कुछ खाक हुआ तो उसे भी किसी आरती की तरह पेश किया गया। उसी में एक सरकारी स्कूल के खाक हो जाने पर एक लाइन की चिंता नहीं दिखी। वह सरकारी स्कूल किसका था और किसने उसके इस्तेमाल की इजाजत दी? लेकिन जब राज ही अपना हो तो इजाजत कैसी?

एक दुर्दांत हत्यारे की हत्या के बाद उसका महिमामंडन करता यह वही मीडिया है जिसे बथानी टोला या लक्ष्मणपुर बाथे कत्लेआम पर हाईकोर्ट के फैसले की खबर भीतर के पन्नों के लायक लगी। फैसले पर सवाल तो दूर, पीड़ितों की राय तक के लिए जगह नहीं थी। यही आपराधिक निर्लज्जता फिलहाल बिहार के मीडिया की सबसे बड़ी खासियत है जिसके सहारे चेतना के स्तर पर सामंती शासन को स्वीकार करने की जमीन मजबूत की जा रही है।

लेकिन इन सबके बीच चुपचाप जो हुआ, क्या खुद नीतीश कुमार उस पर गौर कर रहे हैं।  ब्रह्मेश्वर सिंह की हत्या के बाद बिहार के अखबारों में उनकी तथाकथित सेवा यात्रा की जगह क्या थी?  उनकी जिन यात्राओं का ब्योरा अखबारों के पहले पन्ने का आभूषण होता था, वह भीतर के नवें-दसवें या बारहवें-तेरहवें पन्ने पर क्यों खिसक गया? क्या यह नीतीश कुमार के लिए कोई चेतावनी है? हां, उन्हें ध्यान रखना होगा कि वे जिनके मोहरे हैं, वे उनके खिलाफ नहीं जा सकते, बल्कि उनकी अनदेखी भी नहीं कर सकते। परना जिस व्यवस्था के वे नुमाइंदगी कर रहे हैं, वह उन्हें झटकने में एक पल की भी देरी नहीं करेगी।

इसीलिए वे अमीरदास आयोग को भंग करते हैं, बद्योपाध्याय कमिटी की सिफारिशों को खारिज करते हैं, सवर्ण आयोग बनाते हैं, बथानी टोला या लक्ष्मणपुर बाथे जनसंहार पर पटना हाईकोर्ट के शर्मनाक फैसले पर चुप रहते है और रणवीर सेना का सरगना ब्रह्मेश्वर सिंह के गुंडो को पटना में आग लगाने की पूरी आजादी देते हैं।

2002 में नरेंद्र मोदी ने भी गुजरात में यही किया था। हिंदुओं को अपना गुस्सा निकालने की पूरी आजादी दी गई और अब वहां सब कुछ सहज दिखता है। विकास के जिस परदे से नरेंद्र मोदी के अपराधों को ढका जा रहा है वही परदा नीतीश कुमार ने अपने आगे टांग रखा है।

(यह लेख कुछ समय पहले लिखा गया था। अपने आलसीपने का क्या जवाब हो सकता है?)