Wednesday 24 April 2013

हां, ऑनरेबल कबीर, यह टुकड़ों में बंटे समाज का सच है...!!!



इस साल एक जनवरी से पंद्रह अप्रैल तक अकेले दिल्ली में चार सौ तिरेसठ बलात्कार की घटनाएं पुलिस में दर्ज हुईं, इनमें दो सौ अड़तीस नाबालिग या बहुत कम उम्र की बच्चियां हैं। (बलात्कार के मामले दर्ज न होने की स्थितियों के बारे में तो शायद अब बात करना भी बेमानी है।) लेकिन पांच महीने के भीतर यह सिर्फ दूसरी बार है, जब दिल्ली की घटना के बाद दिल्ली और देश के दूसरी राज्य-राजधानियों में गम और गुस्सा उमड़ा है। जो हो, इससे यह उम्मीद बंधी है कि कभी न कभी इस आक्रोश में मुजफ्फरपुर के गांव मंडई की सकली देवी जैसी तमाम महिलाओं और देश के दूरदराज के इलाकों में मासूम बच्चियों के साथ हुई वीभत्सता और बर्बरता की पीड़ा को भी जगह मिलेगी। यह एक मांग भी है, क्योंकि जो अगुवा होते हैं, अगर वे किसी की अनदेखी करेंगे तो उनसे अपने लिए किसी जगह या सम्मान की उम्मीद करने का उन्हें हक नहीं है और उनकी प्रतिबद्धता पर सवाल उठेंगे...!!!

पिछले महीने महिला दिवस के मौके पर सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश अल्तमस कबीर ने इस देश के बेईमान मध्यवर्ग और सत्ता-केंद्रों के खिलाफ एक जलता हुआ सवाल उछाला। उन्होंने कहा कि पिछले साल दिल्ली में सोलह दिसंबर को सामूहिक बलात्कार की बर्बर घटना दुखद जरूर थी, लेकिन यह ऐसा कोई अकेला मामला नहीं है। जिस दिन यह वारदात हुई उसके अगले दिन मीडिया की सुर्खियों में घटना के खिलाफ चीख-चीख कर आक्रोश जाहिर किए जा रहे थे। लेकिन उसी दिन दस साल की एक मासूम दलित बच्ची के साथ भी सामूहिक बलात्कार किया गया, फिर उसे जिंदा जला दिया गया। मगर इस घटना को चुपके से दबा दिया गया, या फिर अंदर के पेज पर पांच से दस लाइनों में समेट दिया गया। दिल्ली में सामूहिक बलात्कार की दिवंगत पीड़ित के परिवार को सरकार के साथ-साथ दूसरे कई पक्षों ने भी भारी मुआवजा और मदद दी, लेकिन उस मासूम छोटी-सी बच्ची के लिए क्या किया गया?

भारत के चीफ जस्टिस के इस सवाल का जवाब इस देश की सरकार, समाज और मीडिया के भाग्य-विधाताओं के पास शायद होगा, मगर वे कुछ नहीं बोलेंगे। लेकिन ऑनरेबल जस्टिस अल्तमस कबीर... मैं आपके इस सवाल का जवाब देना चाहता हूं। हां, जस्टिस कबीर... ऐसा इसलिए, क्योंकि इस देश में बलात्कार और बलात्कार में फर्क है।


इस देश के सत्ताधारी सामाजिक वर्गों की महिला के खिलाफ यौन हिंसा की कोई घटना होगी तो राजधानी का राजपथ एक झटके में क्रांतिपथ की शक्ल में तब्दील हो जाएगा, लेकिन महिला किसी "नीच" कही जाने वाली जाति या वर्ग की हुई, तो जंतर-मंतर या इंडिया गेट पर मोमबत्तियां जलाना तो दूर, एक पल के लिए भी किसी को इस पर सोचना तक जरूरी नहीं लगेगा।

चुने हुए दुःख...

इस साल की होली गुजरे ज्यादा दिन नहीं बीते। मार्च के आखिरी दिनों में, जब यह हिंदू समाज होली की खुमारी उतारने में लगा हुआ होगा, बिहार के ही मुजफ्फरपुर में सकरा प्रखंड में मंडई गांव की सकली देवी (बदला हुआ नाम) अपने पति के साथ अपने एक संबंधी की मृत्यु के क्रिया-कर्म में शामिल होकर लौट रही थी, दोनों को घेर कर पति के हाथ-पैर बांध कर उसके सामने सकली देवी के साथ छह-सात लोगों ने सामूहिक बलात्कार किया, विरोध करने पर उसके पूरे शरीर को दांतों से काटा गया, भयानक यातनाएं दी गईं, और निजी अंगों में कपड़े, पत्थर, मिट्टी और कीचड़ डाल कर क्षत-विक्षत कर दिया गया और तड़पते हुए मरने के लिए छो़ड़ दिया गया। किसी तरह पति और कुछ लोग उसे अस्पताल ले गए। लेकिन जब तक उसकी जान जा चुकी थी।

पुलिस से लेकर अस्पताल तक में पोस्टमार्टम रिपोर्ट में घपले के जरिए रफा-दफा करने की तमाम कोशिशों के बावजूद एकाध जगह आधी-अधूरी खबर छप गई। जनवादी महिला समिति ने स्थानीय स्तर पर जरूर विरोध प्रदर्शन किया। लेकिन दिल्ली की घटना के बाद "देश" को आंदोलित कर देने वालों को मुजफ्फरपुर की घटना में कुछ भी ऐसा नहीं लगा कि वह उसे उतना ही महत्त्व दे। दिल्ली की घटना के बाद दिल्ली के राजपथ, जनपथ, इंडिया गेट या जंतर मंतर की क्रांति से देश और दुनिया को हिला देने वाले देश के श्रेष्ठिवर्ग, क्रांति का ठेका उठाने वाले मध्यवर्ग की छाती मंडई जैसे गांवों की सकली देवियों के दुःख से नहीं फटती।

मैंने दिल्ली की घटना के बाद आक्रोश और गुस्से से भरे स्त्री-पुरुषों को देखा था, कई-कई महिलाओं-युवतियों को हाथ में जलती मोमबत्ती लिए सचमुच के आंसुओं के साथ रोते देखा था। मीडिया किसके लिए आंदोलन को ताकत और प्रसार दे रहा था? हमारे देश के श्रेष्ठिवर्ग के लोग किसके लिए इतने आक्रोशित थे और मोमबत्ती थामे युवक-युवतियां किसके लिए रो रही थीं? दरअसल, ये लोग, इनके वर्ग सिर्फ "अपनों" को पहचानते हैं। और "अपनों" के साथ किसी भी तरह की त्रासदी घटे, दुख और गुस्सा लाजिमी है! वर्ग और अपनापे के साथ एक बड़ी शर्त यह है कि इस तरह की किसी घटना का दिल्ली में होना जरूरी है। मोहन भागवत जैसा आदमी यों ही यह मुनादी नहीं करता है कि बलात्कार शहरों-महानगरों में होता है, गांवों में नहीं। न मामला दर्ज होगा, न उसे गिना जाएगा।

बर्बरता के चेहरे... 

सकली देवी पर ढाए गए जुल्म का जितना ब्योरा सामने आ सका, उस घटना के दौरान के दृश्य की कल्पना भर समूची दुनिया का नाश कर देने के बराबर गुस्सा पैदा करती है। दिल्ली में सोलह दिसंबर को हुए सामूहिक बलात्कार की घटना के संदर्भ में सबसे ज्यादा जोर देकर यह कहा गया कि अपराधियों में से एक ने पीड़ित युवती के यौनांगों को लोहे के रॉड से क्षत-विक्षत कर दिया था। यह कुंठा, विकृति और वीभत्सता की पराकाष्ठा थी और यह अकेली वजह किसी संवेदनशील इंसान को अवसाद में डाल दे सकती है, या उसके गुस्से को बेलगाम कर दे सकती है। इसलिए दिल्ली के राजपथ से लेकर देश भर में जहां-जहां गुस्से का इजहार किया गया, वह किसी समाज के बचे होने का सबूत है।


लेकिन अपने बचे हुए का सबूत देने वाला वह समाज दरअसल किसका है? उसी दिन सामूहिक बलात्कार के बाद जिंदा जला दी गई दस साल की या सामूहिक बलात्कार के बाद हाथ और गर्दन तोड़ कर मार डाली गई आठ साल की बच्ची के मामले लोगों के गुस्से में शामिल क्यों नहीं हो सके? सकली देवी के साथ जो हुआ, बर्बरता की वह कौन-सी सीमा है, जिसे अपराधियों ने पार नहीं की? मगर तथाकथित मुख्यधारा के मीडिया के लिए यह बिकने वाली "चीज" नहीं थी। कुछ लोगों ने अपनी सीमा में इस खबर का प्रसार भी किया। इसके बावजूद मध्यवर्गीय और सामाजिक सत्ताधारी तबकों के साथ-साथ मीडिया का भी जमीर क्यों गहरी नींद में सोया रहा? कोई मुझे एक भी वाजिब वजह बताए कि सकली देवी के साथ जो हुआ, वह बर्बरता के पैमाने पर दिल्ली की घटना से कहीं ज्यादा वीभत्स होने के बावजूद नजरअंदाज करने लायक था!

चुप्पी की राजनीति और चु्प्पी की साजिश की परतें उधेड़ना कोई खेल नहीं है। जिस चुप्पी को "महानता" के पर्याय के तौर पर प्रचारित किया जाता है है, उसी हथियार से व्यवस्था पर काबिज वर्गों ने अपनी सत्ता को बनाए रखने के लिए बड़ी-बड़ी लड़ाइयां जीती हैं। इसीलिए सकली देवी के साथ जो हुआ, वह इन वर्गों के जमीर को झकझोर नहीं पाता और दिल्ली की घटना से उपजे आक्रोश से देश और यों कहें कि दुनिया हिल उठती है।

लेकिन सकली देवी कौन थी...!!!

लेकिन सकली देवी कौन थी? अपने इलाके में मनरेगा और पीडीएस, यानी जनवितरण प्रणाली में घोटालों के खिलाफ आवाज उठाने वाली सकली देवी कौन थी? समूचे बिहार के हरेक पंचायत में शराब के दो ठेके खोल कर "सुशासनी" सरकार ने स्थानीय समाज को जिन दुःशासनों की फौज के हवाले कर दिया है, उनके खिलाफ खड़ा होने वाली और शराब के ठेके बंद करने के आंदोलन में मुखर वह सकली देवी किसकी दुश्मन थी?


ऐसी कोई भी सकली देवी हर उस शख्स की दुश्मन होगी, जिसकी सामाजिक सत्ता को उससे खतरा पैदा होता हो। सामाजिक सत्ताधारी तबकों ने अपने असली चेहरे का खुलासा करने वाले अपनी ही जाति-वर्ग के किसी व्यक्ति को जिंदा जला कर मारा डाला है, फिर कोई दलित, और उसमें भी एक स्त्री यह हिम्मत कैसे कर सकती है? निचली कही जाने वाली जातियों के लिए उत्पीड़न और यातना की तय कर दी गई नियति के निशाने पर जब स्त्री आती है तो सबसे बेशर्म बर्बरताएं और वीभत्सताएं भी शर्म से पानी-पानी हो जाती हैं।

क्या यहां किसी को राजस्थान की वह साथिन भंवरी बाई याद आ रही है?

साथिन भंवरी की साथिन सकली...

साथिन भंवरी का भी कसूर क्या था, सिवाय इसके कि उसने अपने आसपास पिछड़ेपन, अशिक्षा और अज्ञान के अंधेरे में अपना वक्त काटते लोगों को थोड़ा हिलाने-डुलाने की कोशिश की थी? यह कोई मामूली खतरा नहीं था कि वे लोग नींद से जाग उठें, जिनका सदियों से सोए रहना ही इस समूची व्यवस्था के कायम रहने के लिहाज से ज्यादा बेहतर रहा है। इसलिए व्यवस्था के रखवालों ने पति के सामने भंवरी के साथ सामूहिक बलात्कार किया और एक तरह से भंवरी से उपजे "खतरों" को दफन करने की कोशिश की।

सकली देवी का "गुनाह" भी साथिन भंवरी के गुनाह जैसा था। कोई दलित और वह भी स्त्री अगर इस तरह के "गुनाह" करे तो उसके लिए वह सजा निर्धारित है जो भंवरी बाई को मिली, सकली देवी को मिली। भंवरी को जो सजा दी गई, वह उसके गांव के गुंडा सवर्ण सामंतों ने सुनाई थी तो भारत के कानून के मंदिरों में बैठे एक मनुपुत्र ने उससे भी बड़ा फैसला दिया था कि अगर एक ऊंची जात का आदमी किसी दलित को छू नहीं सकता तो उसके साथ बलात्कार कैसे कर सकता है! सकली देवी के साथ जो हुआ, उसके लिए स्थानीय पुलिस ने पहले उसके पति को ही गिरफ्तार कर लिया था। पति के हाथ-पांव बांध कर उसके सामने जिसके साथ सामूहिक बलात्कार किया गया, यौनांगों में पत्थर, कपड़े, मिट्टी, कंकड़ आदि डाल कर क्षत-विक्षत कर दिया गया, उसके बारे में पुलिस ने घोषणा की कि उसके साथ बलात्कार की पुष्टि नहीं हुई। अब हम अदालत से "इंसाफ" के फैसले की मुनादी का इंतजार करेंगे, जिसकी बुनियाद पुलिस की एफआइआर और प्राथमिक जांच रिपोर्ट होती है, जिसका इंतजाम पुलिस ने पहले ही कर लिया है।

मोहन भागवत जैसा आदमी यों ही यह मुनादी नहीं करता है कि बलात्कार शहरों-महानगरों में होता है, गांवों में नहीं। न मामला दर्ज होगा, न उसे गिना जाएगा।

बहरहाल, दिल्ली में सामूहिक बलात्कार की बर्बरता (वैसे बलात्कार अपने आप में क्या बर्बरता का पर्याय नहीं है?) के खिलाफ इस देश के सभ्य समाज और मीडिया ने राजपथ को क्रांतिपथ बना दिया, तो सकली देवी के साथ कहीं त्रासद पैमाने की बर्बरता (अगर बर्बरता ही पैमाना है तो...) और वीभत्सता से उस सभ्य समाज और मीडिया का दिल क्यों नहीं दहला? क्या इसलिए कि सकली देवी इन सबके लिए कहीं से भी "अपनी" नहीं थी? जनवादी महिला समिति ने मुजफ्फरपुर में जरूर एक विरोध आंदोलन किया, पटना में भी धरना दिया और सकली देवी के परिवार को थोड़ी राहत दिला सकी। लेकिन दिल्ली की घटना के खिलाफ राजपथ पर आंदोलन का आगाज करने वालों में सबसे अहम भूमिका निभाने वाले संगठनों को सकली देवी के मामले को लेकर दिल्ली में एक औपचारिक प्रतिरोध भी दर्ज करना जरूरी क्यों नहीं लगा? जबकि सकली देवी एक मामूली दलित महिला, भारत में एक कमजोर वर्ग की गरीब नागरिक थी, बल्कि एक महिला संगठन की सदस्य भी थी।

अपने-अपने लोग...

दिल्ली की दोनों घटनाओं पर आक्रोश की लहरें पटना की सड़कों पर भी उमड़ीं। कई महिला संगठनों ने पटना में दिल्ली की घटना पर गम और गुस्से का इजहार किया। इसके अलावा, एपवा, यानी अखिल भारतीय प्रगतिशील महिला संगठन एक जुल्मी विधायक की हत्या करने वाली रूपम पाठक की रिहाई के लिए अभियान चलाती है, मानव शृंखलाएं बनाती है, लेकिन उसकी नजर में सकली देवी की त्रासदी अनदेखा करने लायक क्यों थी? महिलाओं पर अत्याचारों के खिलाफ पटना की सड़कों पर सबसे मुखर दिखने वाली एपवा के लिए सकली देवी के साथ घटी घटना किस वजह से चुप रह जाने लायक थी? उससे यह मांग क्यों नहीं की जानी चाहिए कि रूपम पाठक के दुख के बराबर शिद्दत का प्रदर्शन वह सकली देवी के दुःख पर भी करती? किसी स्त्री पर ढाए गए जुल्म का विरोध करने के लिए अगर अपने समूह या वर्ग का चुनाव करना प्राथमिक शर्त है तो इंतजार करिए कि कब आपके वर्ग की कोई महिला दरिंदों का शिकार बने! फिर कोई आंदोलन खड़ा करिएगा और बताइगा कि आप दुनिया की महिलाओं के सम्मान, गरिमा और सुरक्षा की बहाली की लड़ाई लड़ रहे हैं।

दिल्ली में पांच साल की गरीब बच्ची के साथ हुई बर्बरता के बाद दिल्ली एक बार फिर खौली। इस उबाल में सारे देश को शामिल होना चाहिए। जितना गुस्सा, सदमा और संवेदनाएं दिख रही हैं, उसे ज्यादा की जरूरत है। इस मामले में आरोपी पकड़ा गया। पुलिस वालों को धन्यवाद। विरोध में आंदोलन हो रहे हैं। आंदोलनकारियों को धन्यवाद! दुख जताने के लिए नरेंद्र मोदी के गुजरात के लिए भाड़े पर ब्रांड एंबेसडरी करने वाले अमिताभ बच्चन का भी धन्यवाद...! लेकिन जिस अपराधी के पकड़े जाने के बाद बिहार के मुजफ्फरपुर का नाम आज मशहूर हो गया है, महज एक पखवाड़े पहले उसी जिले के एक गांव मंडई में तो सकली देवी के साथ भी इससे ज्यादा बड़ी वीभत्सता हुई! मुजफ्फरपुर और मंडई का नाम किसने जाना? हां, याद आया! मुजफ्फरपुर पर चर्चा करने के लिए भी मुजफ्फरपुर का दिल्ली में होना जरूरी है...!!! वरना ऐसे तमाम मुजफ्फरपुर, सहरसा, बुलंदशहर, कैथल, करनाल, हिसार, जींद जैसे इलाकों की त्रासदी पर बात करना या उस पर उबलना गैरजरूरी है, क्योंकि वह दिल्ली नहीं है...!!!

खैरलांजी में वीभत्सता और बर्बरता का जो नंगा नाच हुआ था, उस जैसी तमाम घटनाएं घटती हैं और चुपचाप दफन कर दी जाती हैं। किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता। टुकड़ों में बंटे समाज की प्रतिक्रिया भी टुकड़ों में ही होगी। सभी अपने-अपने वर्गों की लड़ाई लड़ रहे हैं। इसमें जिस वर्ग के पास जितना ‘सामर्थ्य’ है, वह व्यवस्था पर उतना ‘सार्थक’ दबाव डाल पाता है। इसमें उन वर्गों की तकलीफ को व्यापक दुख के लायक नहीं समझा जाना स्वाभाविक है, जिनके पास न सत्ता-केंद्रों की ताकत है, न उनकी चीखें सुनने वाला कोई है।

टुकड़ों में क्रांति...

कुछ घटनाओं के चर्चित होने के बाद आंदोलन करते दिखते लोगों को अभी इस सवाल से जूझना बाकी है कि दहेज से लेकर दूसरे तमाम घरेलू हिंसा और भेदभाव और दोयम दरजे पर आधारित समूची सामाजिक दृष्टि ही जहां मीसोजीनिस्ट, यानी स्त्री विरोधी हो, वहां एक बलात्कार को स्त्री की कोई एकमात्र पीड़ा मान कर कैसे इसके खिलाफ लड़ा जाएगा और क्या हासिल कर लिया जाएगा। वैसे जिस सामाजिक ढांचे में हम रहते हैं, उसमें हिंसा की हाइरार्की पर अलग से बात करने की जरूरत है।

बहरहाल, जस्टिस कबीर ने दस साल की एक दलित बच्ची के बलात्कार और उसे जिंदा जला देने की घटना का जिक्र किया। सोलह दिसंबर के ही एक दिन बाद बिहार के सहरसा जिले के बेलरवा गांव में भी एक आठ साल की दलित बच्ची के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया, उसके पांव और गर्दन तोड़ दिए गए, फिर उसे मार कर एक पोखर में फेंक दिया गया। कहीं ज्यादा वीभत्सता और बर्बरता के बावजूद उसी दौरान बलात्कार के खिलाफ धधकती ज्वाला में इन बच्चियों की त्रासदी को रत्ती भर भी जगह देने लायक नहीं समझा गया। हाशिये के बाहर मर-जी रहे समुदाय की महिलाओं-बच्चियों के साथ ये बर्बरताएं रोजाना की हकीकत हैं, मगर हमारे "आंदोलनकारी" वीर-बहादुरों के लिए ये कोई मुद्दा नहीं है या फिर "सेलेक्टिव" होना उनकी मजबूरी है। और जाहिर है, फिर सरकार को इस बात की फिक्र क्यों होगी!

इस सवाल का जवाब वक्त मांगेगा कि दिल्ली की घटना के बाद राजधानी में राजपथ पर उमड़ी भीड़, मीडिया, नारीवादियों के संगठन और स्त्री अधिकारों के झंडाबरदार दूसरी तमाम महिला संगठनों की निगाह में सकली देवी की त्रासदी "इग्नोरेबल" क्यों रही? एक पिछड़े हुए राज्य के गुमनाम-से गांव में हाशिये पर मर-जी रही सकली देवी गरीब थी, दलित थी! शायद इसीलिए सकली देवी इस समाज की बेटी, बहन या मां नहीं हो सकती, दामिनी, अमानत या निर्भया नहीं हो सकती, स्त्री की त्रासदी का प्रतिनिधि मामला नहीं हो सकती है और देश का चेहरा होना तो न कभी मुमकिन रहा है, न शायद कभी होगा...!!!

चलते-चलतेः

दिल्ली में पांच साल की बच्ची के साथ हुई बर्बरता का आरोपी बिहार के मुजफ्फरपुर जिले का निकला, इसलिए बिहार के सुशासन बाबू मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी घटना पर अपने दुखी मन का इजहार किया। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार साहब ने कहा कि दिल्ली की घटना बर्बर है, इसने मानवता को शर्मसार किया है और अपराधी को सबसे सख्त सजा दी जानी चाहिए। इसी तरह उनके उप-साहब उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी ने भी कहा कि यह घटना मानवता पर कलंक है। दोनों ने अपने "भीतर की मानवीय संवेदना" का जो उदाहरण पेश किया है, उसके लिए इनके प्रति आभारी होना चाहिए, इनकी तारीफ की जानी चाहिए! लेकिन ये दोनों वही साहब हैं जिनकी संवेदना पर मुजफ्फरपुर के मंडई गांव में सकली देवी के साथ बर्बर बलात्कार और उसकी हत्या से कोई फर्क नहीं पड़ा और पटना के सामूहिक बलात्कार एक एमएमएस कांड से लेकर सहरसा तक के दर्जनों वीभत्स और बर्बर बलात्कार के मामलों पर कभी शर्म नहीं आई! क्यों? मंडई में उनकी पुलिस ने जो किया, उस पर भी उन्हें शर्म नहीं आई और दुःखी होना जरूरी नहीं लगा। क्यों? अक्सर औपचारिकता वह परदा होती है, जिसके तले तमाम पाखंडों को निबाहना आसान होता है...!!!

7 comments:

kriti said...

काफी बेचैन करने वाला लेख है..निश्चित रूप से हमारे यहाँ अधिकाँश आन्दोलन अपनी-अपनी वर्गीय सीमा में ही रहते है..सच तो ये है की भारत में दो नहीं बल्कि सैकड़ो-हजारों भारत बसते है..दिल्ली के राजपथ पर भले ही संविधान की कुछ धाराएं लागू होती हों लेकिन हमारे गाँव आज भी अपनी-अपनी मनु संहिताओं के हिसाब से ही चलते है..
जहाँ तक बात है बलात्कार की, तो मुझे लगता है की अब थोडा और गहराई में सोचने की जरूरत है..महिला आन्दोलन समेत सभी लोगो को अब इसकी जड़ को मुद्दा बनाना चाहिए...केवल सख्त कानून न तो किसी का कुछ बिगाड़ पाए न ही बिगाड़ पायेंगे..हमें अब पितृसत्ता के समूल खात्मे की बात कहनी होगी..लेकिन दिक्कत ये है कि पितृसत्ता कभी भी अपने आप में कोई अलग सी चीज नहीं रही है..बल्कि अपने समय कि सामजिक-राजनीतिक व्यवस्था में अंतर्गुथित रही है..अधिकांश महिला संगठन इसे एक अलग सी चीज मानते हुए इसे उखाड़ फेंकने की बात करते है..पर हाथ कुछ नहीं आता.. हमें इसे समझने की जरूरत है कि पितृसत्ता के खिलाफ लड़ाई अनिवार्यतः आज की सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था के खिलाफ लड़ाई से गुंथी हुई है..
कृति
www.kritisansar.noblogs.org

रजनीश said...

असली दिक्कत यह है कि यहाँ "सिस्टम" के दोनों ध्रुवों पर एक ही किस्म की सामाजिक शक्तियां कुंडली जमाये बैठी हैं। ध्यान से देखिये तो नज़र आएगा कि वर्षों से "व्यवस्था" पर "प्रभुत्व" जमाये बैठी सामाजिक शक्तियां ही यहाँ "विपक्ष" की लगाम थामे हर वो "हरकत" कर रही हैं जिससे उनका अश्लील और अन्यायपूर्ण "वर्चस्व" दरकने के बजाय और मजबूत होता जाता है। आज मीडिया से लेकर राजनीति का हर रंग, चाहे वो तिरंगा हो या फिर भगवा, हरा, लाल और नीला, इन्ही सामाजिक शक्तियों के आगोश में हैं। यह समझना अब बहुत मुश्किल नहीं रहा कि दलित और वंचित जमात की महिलाओं के दुख से किसके पेशानी पर शर्म और चिंता की रेखाएं नहीं उभरती और क्यों।

mukti said...

आँखें खोलने वाला लेख है.

Randhir Singh Suman said...

thik likha hai

spectatorscult said...

Eye opening article about the no of crime against women . With the issue of Media related too.

Pankaj Choudhry said...

Bahut hi critical hokar likha hai aapne. aapki samvedna ka yeh soochak hai. jyada research ke pachde me pade bina aur ek do ghatnaon ko aadhar banakar aapne aankhen kholne wala lekh likha hai. aapki aisi hi lekhni aage bhi padhne ko milti rahe yahi aasha karta hun.

Pankaj Choudhry said...

Bahut hi critical hokar likha hai aapne. aapki samvedna ka yeh soochak hai. jyada research ke pachde me pade bina aur ek do ghatnaon ko aadhar banakar aapne aankhen kholne wala lekh likha hai. aapki aisi hi lekhni aage bhi padhne ko milti rahe yahi aasha karta hun.