Thursday 27 March 2008

क्या हमें सभ्य कहलाना अच्छा नहीं लगेगा...?

अनिल चमड़िया



आखिर क्या कारण है कि भूमंडलीकरण की नीति की शुरुआत के साथ कई विकसित देशों ने उन देशों से माफी मांगने की जरूरत महसूस की जहां की जातियों को उनके दुर्व्यवहार और भेदभाव की नीति का शिकार होना पड़ा है। 1990 में पूर्वी जर्मनी की ससंद ने इस्राइल से यहूदियों की प्रताड़ना के लिए माफी मांगी। सोवियत संघ ने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जेलों में बंद हजारों अधिकारियों को मारने के बाद जंगल में दफना दिए जाने के लिए माफी मांगी। 1998 में कनाडा ने अपने मूल निवासियों से माफी मांगी जिसकी संस्कृति को नष्ट-भ्रष्ट करने के लिए सरकार योजनाएं बनाती रही है। यहां तक कि 1992 में दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति एफडब्ल्यूडी क्लार्क ने तीन करोड़ काले लोगों पर पचास लाख गोरों के शासन के लिए, काले लोगों को दशकों तक प्रताड़ित करने की नीति जारी रखने के लिए माफी मांगी। भारत में जालियांवाला बाग कांड के लिए ब्रिटेन की प्रधानमंत्री मार्ग्रेट थेचर ने इसी दौर में अमृतसर आकर डायर के, ब्रिटिश सरकार के इस कुकृत्य के लिए माफी मांगी।
इसकी सबसे ताजा कड़ी 13 फरवरी को आस्ट्रेलिया में देखने को मिली जहां लेबर पार्टी के प्रधानमंत्री केविन रड ने कैनबरा की गणतांत्रिक संसद में खड़े होकर देश के मूलवासी आदिवासियों के साथ अब तक की दमनकारी संस्कृति और नीति के खिलाफ 'राष्ट्रीय माफी' मांगी। आस्ट्रेलिया मानव सभ्यता के इतिहास का सबसे पुराना दस्तावेज है। भारत की तरह वहां सत्रहवीं सदी की शुरूआत में ब्रिटिशों ने अपना कब्जा जमाना शुरू किया और तब से इन आदिवासियों के खिलाफ लगातार दमन, अत्याचार, रंगभेदी अमानवीय व्यवहार जारी है। शुरूआती दौर में तो ब्रिटेन से अपराधियों को बतौर सजा यहां भेजा जाता था, ताकि वे आदिवासियों के खिलाफ गुंडई कर सकें। गोरे मर्दों के संबंध से जो आदिवासी महिलाएं बच्चे को जन्म देती उन बच्चों को उठा कर ले जाया जाता था। उन बच्चों के साथ हर संभव अत्याचार होते थे। 1910-70 तक तो इस चुराई जाने वाली पीढियों के साथ खुलेआम कुकर्म होते रहे और किसी भी 'सभ्य सरकार' ने उसका विरोध नहीं किया।


पिछले चुनाव में लेबर पार्टी ने चुनावी घोषणा पत्र में उन आदिवासियों से राष्ट्र की तरफ माफी मांगने का वायदा किया और उसे इसका समर्थन मिला। 13 फरवरी को सार्वजनिक तौर पर माफी मांगे जाने की घटना के समय जॉन हार्वड को छोड़ कर देश के सभी जीवित प्रधानमंत्री मौजूद थे। कंजरवेटिव पार्टी के 1975-83 तक प्रधानमंत्री रहे मैलकालन फ्रेजर ने तो यह अफसोस जाहिर किया कि काश वे खुद ये काम कर पाते। मौजूदा प्रधानमंत्री तो रो पड़े। लेकिन उन्होंने जो कहा वह महत्वपूर्ण है। उनके अनुसार यह माफी आस्ट्रेलिया के इतिहास में एक नये युग का सूत्रपात करेगी। उनके अनुसार देश के उन सभी लोगों के एकजुट होने का अब समय आ गया है जो आस्ट्रेलिया के मूल निवासी हैं या मूल निवासी नहीं रहे हैं। इस दृश्य को देखने के लिए वंचित और दमित समाज हजारों किलोमीटर चल कर संसद तक पहुंचे थे। यह दुनिया भर में जातियों के खिलाफ शासक जातियों और वर्गों द्वारा माफी मांगने की एक नई मिसाल है। अगर इतिहास के जानकार जिन अन्य माफियों के लिए अपेक्षा करते हैं और उनमें अभी तक जो सामने नहीं आई है, तो वह है अमेरिका द्वारा रेड इंडियन से माफी मांगना। विश्व स्तर पर माफीनामे की कड़ियों को विश्लेषित किया जा सकता है। भूमंडलीकरण के दौर में शासक उन घावों को भरने की कोशिश कर रहे हैं जो संबंधों को सहज करने में बाधा होता है। लेकिन यह किसी देश द्वारा किसी बाहरी समाज से संबंध बनाने तक ही सीमित नहीं है बल्कि अपने आप को मजबूत करने के लिए अंदरूनी तौर पर भी संबंधों की खाई पाटना जरूरी लगता है। आस्ट्रेलिया अपने देश के मूल निवासियों से माफी मांगकर उन्हें बराबर की हिस्सेदारी देने के लिए खुद को तैयार कर रहा है। अपने देश में शासकों द्वारा अतीत के कुकृत्यों के लिए ही माफी मांगते नहीं देखा जाता है जबकि हाल के दिनों में लंदन और आस्ट्रेलिया में सरकारों ने अपने तंत्र द्वारा निर्दोषों की गिरफ्तारी या हत्या के लिए भी बाकायदा माफी मांगी। इस नजरिये से इन घटनाक्रमों को देखा जा सकता है। एक तो भूमंडलीकरण के दौर में ऐसे देशों की सरकारों ने रणनीति के तौर पर अतीत की गलतियों को सुधारने का प्रयास किया है, लेकिन ऐसी रणनीति को स्वीकार्य बनाने के लिए सांस्कृतिक बाधाओं को तोड़ना और जड़ता पर हमला जरूरी होता है। क्या ऐसे देशों और शासकों को उनके यहां के वैचारिक आंदोलनों की पृष्ठभूमि इसकी इजाजत देती है? वे अपने देश में जातियों के बीच के भेदभाव को दूर करने का साहस उसी पृष्ठभूमि से प्राप्त कर रहे हैं। भारत जैसे देशों के इतिहास के बारे में यह सर्वविदित है कि यहां के गहरे जातीय भेदभावों और शासक जातियों के अत्याचार की वजह से, आपसी बंटवारे ने विदेशी शासकों को अपनी जड़ें जमाने का यहां मौका दिया। सांस्कृतिक वर्चस्व रखने वाली जातियों की तरह आधुनिक राजनीतिक राष्ट्र-राज्य व्यवस्था के शासकों ने भी भेदभाव को बढ़ाने की नीतियां ही जारी रखीं। क्या अपने यहां की वैचारिक पृष्ठभूमि अपने कुकृत्यों को स्वीकार करने और फिर माफी मांगने के साहस की ही इजाजत नहीं देती है? यह कैसी जड़ता है? अपने भारतीय समाज में बार-बार कुकृत्यों को भूल जाने की सलाह दी जाती है और वह भी इस तरह से कि कुकृत्यों के दोबारा अंजाम देने की स्थितियां बनी रहें। कोई ऐसा कुकृत्य बताया जाए जो विदेशियों के देश से जाने के बाद भी पिछले पचास वर्षों से बार-बार देखने को नहीं मिलता हो? बजाय इस जड़ता को तोड़ने के हम कितने शर्मनाक तरीके से अपने समाज की जातियों पर ही यह आरोप लगाते हैं कि उन्होंने विदेशियों का साथ दिया। अपने अपने लिए विदेशियों की खोज में जातियां लगी रहती हैं।


हर स्तर पर समाज पर वर्चस्व रखने वाला समूह ऐसे किसी भी माफीनामे का विरोध करता है जो कि उसके वर्चस्व को खत्म करने में कोई भूमिका अदा करता हो। आस्ट्रेलिया में भी यह देखने को मिला। गौरतलब है कि नई पूंजी वाला मीडिया इसमें बड़ी भूमिका अदा कर रहा है। प्रधानमंत्री केविन रड ने जब संसद के पटल पर माफीनामा रखा था तो आस्ट्रेलिया के मीडिया में कोई उत्साह नहीं था। दूसरे दिन माफीनामे को सुनने के लिए उमड़ती भीड़ को देख कर चैनलों ने उसका सीधा प्रसारण तो किया लेकिन इस तरह के विचारों को ही ज्यादा जगह दी जिसमें इस तरह के माफीनामे की जरूरत नहीं बताई गई और न आदिवासी इलाकों में किसी परिवार के साथ उनके दुर्व्यवहार को दिखाया। यही रुख नई पूंजी वाला भारतीय भाषाओं का मीडिया का है। भारत के मीडिया के बड़े हिस्से में आमतौर पर वंचितों को न्याय देने की नीति के वक्त यही प्रवृत्ति दिखाई देती है। भाषाई मीडिया ने भी आस्ट्रेलिया की इस घटना को प्रचारित करने से परहेज किया। लेकिन भारत में सामाजिक, धार्मिक और क्षेत्रीय स्तर की जातियों के साथ कुकृत्यों से माफी मांगने और उन्हें न्याय के समान स्तर पर लाकर खड़ा करने से ऐसे कितने दिनों तक रोका जा सकता है? भारतीय समाज में माफीनामा आंतरिक ऊर्जा का स्रोत है जिसकी ताकत को सार्वभौमिक एवं आत्मनिर्भर राष्ट्र निर्माण में लगाया जा सकता है।

1 comment:

vijay gaur said...

अनिल चमडिया जी की रिपोर्तिन्ग हमेशा से ही पसन्द है.