Thursday 27 February 2014

इंसानी सभ्यता पर कलंक वह "शासकीय कत्लेआम"...



27 फरवरी 2002 को हुए गोधरा कांड के परदे में जिस गुजरात कत्लेआम की शुरुआत हुई थी, समूची इंसानी सभ्यता के उस ऐतिहासिक कलंक को दफ़न करने की मंशा से इस तारीख पर अब धुंधली परतें चढ़ाने की कोशिश की जा रही हैं। लेकिन क्या वह सचमुच भूल सकने वाली कोई त्रासद साजिश थी? क्या उसे भूला जाना चाहिए? गुजरात कत्लेआम की पृष्ठभूमि पर लिखी यह कहानी "मास्टर साहब की डायरी" बड़ी जद्दोजहद से किसी तरह "पाखी" में छप सकी थी। इससे पहले "कथादेश" जैसी एकाध पत्रिकाओं में घोषणा के कई महीने के बाद भी नहीं छप सकी थी। कुछ जगहों पर इसमें संपादक ने अपने हिसाब से फेरबदल करने की सलाह दी थी। हमने यह सलाह ख़ारिज़ कर दी। लेकिन प्रेम भारद्वाज ने इसे अपनी शक्ल में छापा था। आज उस कत्लेआम की शर्म पर परदा डालने की कोशिश के बीच उसकी याद बनाए रखने के मकसद से इस कहानी को आप सबके साथ फिर से साझा कर रहा हूं। हां, मैं चाहता हूं कि इंसानियत के लिए शर्मिंदगी और सभ्यता पर कलंक उस "शासकीय" कत्लेआम को याद रखा जाए, तब तक, जब तक हम एक ऐसी जमीन नहीं रच लेते, जहां मजहब या जात का कोई नामलेवा नहीं बचे... जब तक धर्म और जात के नाम पर खूनी दुकानदारी करने वालों की नस्ल जिंदा है! यह ख़्वाब अगर महज ख़्वाब है तो क्या हमें अपनी उम्मीद का कत्ल कर देना चाहिए? नहीं...! हम उम्मीद करेंगे... अपनी जान रहने तक... हम उम्मीद करेंगे... दुनिया के कायम रहने तक... अपने तईं तब तक जान भी देते रहेंगे... जब तक उनकी खून के स्वाद से लिथड़ी जुबान जहर उगलती रहेगी... 


मास्टर साहब की डायरी

अरविंद शेष

राजकीय आदर्श विद्यालय फतेहपुर में तबादले के बाद पिछले तीन महीने में अख़्तर साहब ने कई समझौते किए थे। मसलन, कुर्ता और चौड़े घेरे का पायजामा पहनना छोड़ कर पैंट-शर्ट पहन लगे थे। सिर पर की टोपी हटा ली थी, लंबी दाढ़ी को छोटा करवा लिया था और स्कूल के सभी मास्टर साहबों के साथ-साथ नई भर्ती से आए मास्टर संतलाल को भी दोनों हाथ प्रणाम की मुद्रा में जोड़ कर मिलते ही 'नमस्कार संतलाल जी' कह कर- 'कैसे हैं' कहना नहीं भूलते थे। उन्होंने अब दाहिने हाथ का अंगूठा तलहथियों से लगा कर 'आदाब' या 'अस्सलाम-वालेक़ुम' करना छोड़ दिया था। हालांकि संतलाल को उनकी किसी बात से कभी कोई परेशानी नहीं हुई थी, लेकिन मुश्किल यह थी कि स्कूल संतलाल की सुविधा-असुविधा के हिसाब से नहीं चलता था और अख़्तर  साहब को संतलाल जी की नहीं, बल्कि बाकी चारों शिक्षकों रामाधार शर्मा, महेश तिवारी, हेडमास्टर प्रेमशंकर झा और हरेंद्रगुप्ता की सुविधा-असुविधा का खयाल जरा ज्यादा करना पड़ता था। स्कूल में गणित शिक्षक के रूप में आने के आठ-दस दिन बाद से ही आपसी बैठकी में अख़्तर  साहब पर छोटी-छोटी टिप्पणियां शुरू हो गई थीं, जैसे- 'आप भी अख़्तर  साहब महान हैं। महाराज रहते हैं हिंदुस्तान में और दिखाई देते हैं पाकिस्तानी जैसा।' 'हाथ जोड़ के नमस्कार करने में अपमान बुझाता है क्या अख़्तर  साहब!' -ये टिप्पणियां हंसते हुए की जातीं, लेकिन अख़्तर  साहब लगभग पचास के हो चले थे, सो बातों के छिपे भावों को ताड़ लेते थे और धीरे-धीरे उन्होंने समझौते करने शुरू कर दिए थे।

पिछली फरवरी से स्कूल में 'हिंदुस्तान' की जगह 'दैनिक जागरण' अखबार आने लगा और इस बदलाव के परिणाम उनके चेहरे पर पढ़े जाने लगे तब भी अख़्तर  साहब को कोई खास परेशानी नहीं हुई। लेकिन अट्ठाईस फरवरी को स्कूल पहुंचते ही 'शो काउज़' की तरह जब अखबार उनके सामने पटका गया तो वे प्रेमशंकर झा का मुंह ताकने लगे।

'मुंह क्या ताकते हैं? देखिए, साठ गो कारसेवक को ... मियां सब जला के राख कर दिया।' अखबार की ओर उंगलियां दिखा कर गंदी गाली देते हुए प्रेमशंकर झा ने कहा।

'ये जिसने भी किया है, बहुत गलत किया है।' अख़्तर  साहब बोले।

'अरे जिसने क्या! गोधरा में और रहता कौन है? सब मुसलमाने सब मिल के सबको जिंदा जला दिया महाराज! औरत आ बच्चो को नहीं छोड़ा। एतना क्रूर होता है सब। बाप रे!' रामाधार शर्मा भी कुढ़ते हुए बोले।

'हम भी वही कह रहे हैं। जिसने भी ये हरकत की है, अल्लाह उसे माफ नहीं करेगा।' अख़्तर  साहब ने वहां से हटना चाहा।

'जाइए महाराज! अबहियो जिसने पर अटके हुए हैं।' प्रेमशंकर झा ने कहा और एक छात्र को बुला कर क्लास लगने की घंटी बजा देने को कहा।

और एक मार्च को अखबार वाला बिल दे गया। पता नहीं स्कूल में सरकार अखबार के लिए अलग से पैसे देती है या नहीं, स्कूल में सभी मास्टर साहब सत्रह-सत्रह रुपए मिला कर अखबार मंगाते थे। दो मार्च को अखबार का बिल चुका दिया गया। अख़्तर  साहब से बिना पैसे लिए। सिहरते हुए उन्होंने जब महेश तिवारी से इस बारे में पूछा तो जवाब मिला, 'बिल चुका दिया गया है। आपको देने की जरूरत नहीं है।'?

यही बात अख़्तर  साहब को अखर गई। उन्हें लगा कि जैसे गोधरा में ट्रेन उन्होंने ही जला दिया और उसी की सजा उन्हें मिल रही है।

संतलाल जी थोड़ा खुल कर अख़्तर  साहब से बात करते थे। इस पर उन्हें भी थोड़ा आश्चर्य हुआ, क्योंकि उन्हें भी सिर्फ सत्रह रुपए लगे थे। यानी बाकी के पैसे उन लोगों ने आपस में बांट कर अदा किए। कायदे से अख़्तर  साहब को पैसे नहीं लगने का मतलब संतलाल के पैसों में बढ़ोतरी होनी थी।

लेकिन चार-पांच मार्च से अखबार के रुख की तरह प्रेमशंकर झा, शर्मा जी और तिवारी जी का रुख भी बदलने लगा। हरेंद्र गुप्ता अब अपनी ओर से अख़्तर  साहब को प्रणाम करने लगे और झा जी क्लास लगने से पहले अखबार पढ़ने-पढ़ाने काम उत्साहपूर्वक करते। अख़्तर  साहब को भी प्रथम पृष्ठ की खबरें दिखाई जातीं। जाहिर है, अखबार गुजरात के दंगों से पटे पड़े होते थे। एक बार प्रेमशंकर झा और एक बार महेश तिवारी अख़्तर  साहब को कह चुके थे- 'आपने ठीक कहा था अख़्तर  साहब, अल्लाह माफ नहीं करेगा।'

अख़्तर  साहब सब कुछ समझते। लेकिन खुद को बच्चों में झोंके रहते। बावजूद इसके उनके दिमाग में सीतामढ़ी दंगे का दृश्य बार-बार घूम जाता और वे गुजरात की कल्पना कर दिन--ब-दिन और ज्यादा सिहरते जा रहे थे।

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तब वे सीतामढ़ी मध्य विद्यालय में पदस्थापित थे। उस साल मोहर्रम उन्होंने वहीं बिताया था। अंसारी टोले का ताजिए का जुलूस खैरका रैन पर तीन घंटे में चल कर पहुंचता था। दूसरे कई ताजिए उस रैन पर पहुंचते थे। अंसारी टोले के उस्मान और उसका पड़ोसी रामबदन राय जब लाठी से भिड़ते तो दो घंटे में भी फैसला नहीं हो पाता था। मुकाबला हमेशा बराबर रहा। इस मुकाबले को देखने वालों की भीड़ हिंदू ज्यादा होते थे कि मुसलमान- कहना मुश्किल था। उसी साल दशहरे में दुर्गा की प्रतिमा के विसर्जन जुलूस में भी कितने हिंदू थे और कितने मुसलमान, कोई नहीं कह सकता था।

...और कोई नहीं कह सकता था कि किसने पत्थर फेंका और किसने दुर्गा की प्रतिमा का सिर काट दिया। लेकिन इसके बाद कितने लोगों के सिर कटे- यह भी कोई नहीं कह सकता था।

अख़्तर  साहब दशमी को अपने घर मोतिहारी के मुरैना से सीतामढ़ी के गणेशपुरा में अपनी बहन के घर आ गए थे कि परसों से स्कूल खुलेगा। लेकिन स्कूल क्या खुलेगा, दंगा शहर और आसपास के इलाकों में बुरी तरह फैल चुका था। रात साढ़े ग्यारह बजे गणेशपुरा में भी चीख-पुकार मची। अख़्तर  साहब की बहन का घर उत्तर की तरफ था। दंगाई दक्षिण से आए थे। बहन और तीनों बच्चों को लेकर अख़्तर  साहब और उत्तर की ओर भागे। बहनोई लंबा चाकू लेकर चीख-पुकार की दिशा में भागा, फिर कभी नहीं लौटा। उत्तर की ओर भागते हुए रास्ते में गांव से बाहर लखना डोम का घर था। उसके थोड़ी दूर के बाद गणेशपुरा का एक और मुस्लिम टोला था। पहले लखना को देख कर अख़्तर  साहब डरे, लेकिन लखना ने अपने घर का दरवाजा खोल दिया। एक पल उन्होंने लखना को देखा, फिर बच्चों औऱ बहन को लेकर लखना के घर में घुस गए। घर में पहले से आठ और लोग छिपे थे। लखना ने घर का दरवाजा बाहर से लगा दिया और बरामदे पर बिछे बिछावन पर लेट गया।

गणेशपुरा को आग में झोंकने के बाद दंगाइयों की भीड़ जब इसी ओर बढ़ने लगी तो दरवाजे की झिर्रियों से झांकते अख़्तर  साहब का खून सूखने लगा। भीड़ लखना के घर के सामने थी। अंधेरे में किसको पहचानें। लखना जन्म से ही गांव में था। वह भी किसी को नहीं पहचान रहा था। लेकिन उसने जयराम शर्मा को जरूर पहचाना। जयराम शर्मा ने यही सोचा कि भागने वाला टोले की ओर भागा होगा। इस डोम के घर में कौन घुसेगा! भीड़ में से किसी ने पूछा कि किधर भागा है सब? लखना ने बेसाख्ता पूरब की ओर उंगली बता दिया। लेकिन भीड़ जयराम शर्मा के इशारे पर उत्तर की ओर मुस्लिम टोले की तरफ बढ़ गई। पांच मिनट में ही वहां से भी चीख-पुकार की आवाज और धधकती हुई आग नजर आने लगी।

आधे घंटे में भीड़ लौटी। भीड़ को चुपचाप अपना काम करना था, वह चुपचाप अपना काम करके जा रही थी। लखना के घरके सामने से जब भीड़ गुजर गई तो पीछे से जयराम शर्मा लखना के पास आया। सौ-सौ के पांच नोट लखना के हाथ में देते हुए चुप रहने की हिदायत दी। लखना ने हसरत भरी निगाहों से नोटों की ओर देखा और 'हां'? में सिर हिलाया। आश्वस्त होकर जयराम शर्मा आगे बढ़ा कि पीछे से कत्ते का भारी वार गर्दन पर पड़ा। मुंह से आवाज भी निकली।

भीड़ गुजर चुकी थी। किसी का ध्यान भी नहीं गया। या गया भी होगा, तो भीड़ को अब जयराम शर्मा की जरूरत नहीं थी।

उधर गांव से ट्रकों से खुलने और जाने की आवाज आई। जिन ट्रकों में भीड़ आई थी, उसी में चली गई। बाद में घायल और बचे हुए लोगों ने भी पुलिस को बताया कि हमारे पड़ोसियों ने हमें नहीं मारा। हथियारों से लैस लोग बाहर से ट्रकों में भर कर आए थे। उस भीड़ में जयराम शर्मा को छोड़ कोई भी गांव का आदमी नहीं था। उसी की लाश अब लखना के घर के सामने थी। जयराम शर्मा की लाश की तरह सब कुछ शांत पड़ चुका था। लेकिन गणेशपुरा गांव और टोले- दोनों तरफ से रोने-पीटने और कराहने की आवाजें लगातार आ रही थीं।

लखना ने घर का दरवाजा खोला और कहा, 'सब चला गया। आप सभे गोरा रात में नहीं जाइए। जयराम शर्मा के साफ कर दिए। ऊहे सार सब करवाया। हम ओकर लाश के गांव में फेंक के आते हैं। एहे में खप जाएगा। सार तहिने, भरल चौक पर बांस के फट्ठा से मार के बन-बन फोड़ दिया था, जानते हैं, काहेला? मरल बिलाई फेंके, आ खाली पांच गो रुपइया मांगे थे। ऊ दुइए गो दे रहा था। आज सार के सभे निकाल दिए।'

गजब की संतुष्टि भी लखना के चेहरे पर। वह फिर दरवाजा बाहर से बंद कर बलराम शर्मा की लाश कंधे पर उठा कर गांव में सबसे पूरब उसी के घर के सामने फेंक आया। अपने घर के सामने कुदाल से खून सनी मिट्टी भी हटा दिया। सुबह जब पुलिस आई, तब लखना ने सबको अपने घर से जाने दिया। अख़्तर  साहब को बहनोई की लाश मिल गई थी, वे बहन और बच्चों को संभालने में लग गए थे। दहशत में लगभग सारा गांव खाली हो गया था। मुसलमान अगले हमले की आशंका और हिंदू पुलिस से पकड़े जाने के डर से गांव छोड़ कर भाग चुके थे। हालांकि जाते हुए हताहत मुसलमानों ने पुलिस से एक भी शिकायत गांव के हिंदुओं के बारे में नहीं की थी। दूसरे दिन तक दंगे पर नियंत्रण हो चुका था। कर्फ्यू लग चुका था। अख़्तर  साहब भी अपनी बहन और बच्चों को लेकर किसी तरह अपने घर मुरैना लौट चुके थे। कर्फ्यू और तनाव के बाद स्कूल छठ तक छुट्टी के बाद ही खुल सका था।

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सीतामढ़ी शहर अब सामान्य दिखता है, लेकिन इतना कमजोर कि जरा-सा उंगली लगाओ तो भरभरा कर गिर जाने का खतरा। दंगे के इतने साल बाद भी हालत यह है कि अभी कुछ दिन पहले रेलवे स्टेशन पर किसी की बारात उतरी थी। स्टेशन से बस रिजर्व थी। लोग उसमें बैठ चुके थे। छह-सात लोग पान खाने नीचे किसी दुकान पर रुके थे कि किसी की नजर धीरे-धीरे बढ़ चुकी बस पर पड़ी। छहो-सातों लोग आगे जा रही बस को पकड़ने तेजी से दौड़ पड़े। दौड़ते हुए लोगों को देख कर आसपास के सारे लोग घबरा गए। किसी ने किसी से कुछ नहीं पूछा। अचानक सिर्फ दुकानों के शटर गिरने की आवाज आने लगी। जिसको जिधर बन पड़ा, भाग चले। उस बस को भी जहां जाना था, चली गई। दस मिनट के भीतर शहर में पूरी तरह सन्नाटा छा गया और आधे घंटे के भीतर चप्पे-चप्पे पर पुलिस के जवान तैनात हो गए। खुद एसपी और डीएम ने मेहसौल चौक पर डेरा डाल दिया, मामले के साफ होने तक। एक तेरह साल के पप्पा बिस्कुट बेचने वाले लड़के ने एसपी के सामने मामला साफ किया था। लेकिन तनाव को हरा होना था, हरा हो गया। दशहरे का हो या मोहर्रम का जुलूस, बसें शहर के दो किलोमीटर बाहर रोक दी जाती हैं। सरकार ने सीतामढ़ी शहर को सांप्रदायिक दृष्टि से अति-संवेदनशील क्षेत्र घोषित कर रखा है।

तो आज फिर अख़्तर  साहब स्कूल में टिफिन यानी मध्यावकाश में लगे बच्चों के साथ खेलने। संतलाल भी खेल में शामिल थे। खेल में पहली से चौथी कक्षा तक के बच्चे भाग ले रहे थे, लेकिन पूरे स्कूल के बच्चे दर्शक थे। खेल का शीर्षक था- 'बोल भाई कितने, आप चाहें जितने...।' लगभग बीस बच्चों को गोल घेरा बना कर खड़ा किया गया था। घेरे में अख़्तर  साहब भी थे। संतलाल बीच में बोलते हुए तेजी से घूम रहे थे- 'बोल भाई कितने', बच्चे जवाब देते- 'आप चाहें जितने।' घूमते-घूमते अचानक संतलाल ने कहा- 'पांच।' पूरा गोला घेरा टूट कर पांच-पांच के समूह में बंट गया। जो एक बच गया, अब उसकी बारी थी, गोल घेरे में 'बोल भाई कितने' बोलते हुए घूमते हुए। ऐसे ही बाकी बच्चों को भी अन्य खेलों में शामिल किया जाता।

बच्चों के साथ अख़्तर  साहब और संतलाल का खेलना, खेलने के साथ-साथ पढ़ाना भी होता था। खाली समय के अलावे अक्सर ये दोनो ही कक्षा में धमाचौकड़ी मचा देते थे। हेडमास्टर प्रेमशंकर झा की नाराजगी के बात ये खेल मध्यावकाश और शाम की छुट्टी के समय होने लगे थे।

ऐसे मामलों में नाराज होने के लिए किसी कारण नहीं, बल्कि सिर्फ द्वेष की जरूरत होती है। और कुछ लोगों में द्वेष के लिए सिर्फ दूसरे के सुख की जरूरत होती है। तो चूंकि सारे के सारे बच्चे अख़्तर  साहब और संतलाल में सर जी- सर जी कहते हुए जहां उलझे होते थे, वहीं बाकी सर जीयों से सिहरे रहते। उन सर जीयों को इस बात से बड़ा सुख मिलता कि बच्चे उनसे डरते हैं, लेकिन अख़्तर  साहब और संतलाल में उलझे रहते हैं- इससे उन्हें परेशानी होती थी। यही परेशानी बैठकी में फूटती थी।

'मरदे स्कूल को मजाक बनाके रख दिया है।' महेश तिवारी ने हेडमास्टर प्रेमशंकर झा का मूड भांपते हुए कहा।

'समझे में नहीं आता है कि क्या किया जाए। ऐसे में तो बच्चा सब माथा पर चढ़बे करेगा।' रामाधार शर्मा ने भी तुक्का जोड़ा।

गुप्ता जी कैसे पीछे रहते- 'देखते हैं, पहिले टिफिने में सब ससुरी भाग जाता था। अब छुट्टियो के बाद घरे जाने का नाम नहीं लेता है सब।'

'क्या कीजिएगा! सरकारो सार नया-नया ट्रेनिंग चला दिया है कि गतिविधि आधारित पढ़ाई कराइए। इससे बच्चा सब ज्यादा समझेगा। समझेगा ... ! मूस मोटाएगा त लोढ़ा होगा। अरे इ स्कीम-उस्कीम से कुछो होता है। जिसको जो काम करना है उ करबे करेगा। हं..., इ खेले-कुदे वाला बात से लइका सब आदर करना छोड़ दिया है। कुछो होय, हमरा त अबहियो लइका सब प्रणाम सर जी कहबे करेता है।' निराशा और संतुष्टि के भाव से प्रेमशंकर झा बोले।

'कुछो कहिए, स्कूल का माहौल पहिले ऐसा नहीं था। जब से इ मियां जी आया है, क्लास रूम को खेल का मैदान बना दिया है।' महेश तिवारी ने फिर कुढ़ते हुए कहा।

'आ ताड़कोला! ठीके कहते हैं, सोलकन के सोलह आना धन हुआ नहीं कि लगा फुदकने।' रामाधार शर्मा ने खैनी मलते हुए संतलाल की व्याख्या की।

संतलाल के चाचा अब भी ताड़ के पेड़ से ताड़ी उतारते थे।

'अब हेडमास्टरे साहब को कुछो करना पड़ेगा। हम सब त कहेंगे त कह देगा कि तुम कौन होता है। हेडमास्टरो साहब नहीं कुछ किए, त बूझिए कि लइका सब नाच पार्टी में जाएगा। लौंडा बनेगा, नाटक करेगा। हं..., त निर्लज्ज बनेगा त नाचे पाटी में न जाएगा।' गुप्ता जी इस वक्त सोलकन से फॉरवर्ड बनने पर तुले हुए थे, सो उन्होंने हेडमास्टर साहब को चुनौती दी। शांति से सिर हिलाते हुए हेडमास्टर साहब बोले- 'अच्छा धीरज धरिए। कहीं गुजरात वाला हवा एनहू बह गया न...!'

इसी के बाद हेडमास्टर साहब ने कक्षा में खेलों को लेकर अख़्तर  साहब से अपनी नाराजगी जताई थी और संतलाल को भी हिदायत दी। संतलाल ने अकेले में अख़्तर  साहब से कहा- 'जो अपने दुख से दुखी होता है, उसका तो इलाज है, लेकिन जो दूसरो के सुख से दुखी है, उसका क्या इलाज है?'

संतलाल अगर दर्शन की भाषा में अख़्तर  साहब को तसल्ली देते थे, तो इसलिए कि बीए करने के बाद पटना घूमने गए। उस वक्त पटना के गांधी मैदान में पुस्तक मेला चल रहा था, सो वह भी घूम लिए। आठ-दस किताबें खरीदीं और तभी से किताबें खरीदने हर साल पुस्तक मेले में पटना जाते रहे। इसलिए बीए की पढ़ाई बेकार नहीं गई और धीरे-धीरे आदमी बनने लगे। हो सकता है कि अनुसूचित जाति के आरक्षण पर शिक्षक की नौकरी हासिल कर ली हो, लेकिन साहित्य और सामयिक किताबों से खुद को लगातार समृद्ध करते रहे। डायरी लिखने की आदत भी इसी दौरान पड़ी।

तो संतलाल ने फिर आज रात में सोते वक्त सिरहाने की ओर चौकी पर लालटेन रखा। पेट के बल लेट कर डायरी लिखने लगे- '...! अमर्त्य सेन ने कहा भी है, 'धार्मिक कट्टरवाद या सांप्रदायिक फासीवाद या संकीर्ण राष्ट्रवाद के लिए निरक्षरता का होना जरूरी नहीं है। लेकिन लड़ाकू कठमुल्लापन को कायम रखने के लिए निरक्षरता की अहमियत को नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता।'

संतलाल ने डायरी बंद की। एक ग्लास पानी पिया। लालटेन धीमा किया, और सो गए।

छब्बीस मई को स्कूल में गर्मी की छुट्टियों के बाद अख़्तर  साहब अपने गांव मुरैना जाने को तैयार थे। उसी दिन फतेहपुर के धनी-मानी राजपूत जयकांत सिंह के बेटे की बारात मोतिहारी से आगे मुरैना होते हुए फूलपुर जाने वाली थी। जयकांत सिंह ने दो-तीन मजदूर अख़्तर  साहब को जानते थे। उन तीनों को ट्रैक्टर पर बारात में जाने वाली मिठाइयों और पकवानों के साथ जाना था। उन लोगों ने अख़्तर  साहब को उसी पर बैठा लिया कि रास्ते में मुरैना है, उतर जाइएगा।

लेकिन मोतिहारी में प्रवेश करने के पहले ही सड़क की एक पुलिया टूटी थी। नीचे पानी नहीं था। दक्षिण से खेत में होकर रास्ता लगा हुआ था जो आगे सड़क में मिल जाता था। एक दिन पहले की बारिश में रास्ता पूरा कीचड़ हो चुका था और उसी कीचड़ में एक जीप फंसी हुई थी। रास्ता पूरी तरह बाधित था। वहां ट्रैक्टर काम तो आ सकता था, लेकिन जीप के आगे होता तब। ढाई घंटे इंतजार के बाद विपरीत दिशा से एक ट्रैक्टर आया। उसी से जीप को खींच कर निकालने की जुगत हुई और रास्ता खुल सका। मोतिहारी पहुंचते-पहुंचते ट्रैक्टर को रात आठ बज गए। लड़की वालों की तरफ से दो लोग मुख्य चौक पर इसी ट्रैक्टर के इंतजार में खड़े थे। रास्ता बताया गया कि मुरैना होकर रास्ता बहुत खराब हो चुका है, इसलिए परशुरामपुर होकर चलिए।

मुश्किल केवल अख़्तर  साहब को थी। यहां से मुरैना नौ किलोमीटर था और फूलपुर से दो किलोमीटर। ट्रैक्टर पर बैठे जगरनाथ ने कहा कि इतनी रात को अब पैदल कहां जाइएगा। फूलपुर चलिए, वहां से सबेरे चले जाइएगा। अख़्तर  साहब को भी यही ठीक लगा। फूलपुर पहुंचने में दस बज गए। सूखी और चांदनी रात होती तो इस वक्त भी चले जाते, लेकिन बरसात और कीचड़ के कारण रुक गए और जनवासे के शामियाने में एक कोना पकड़ लिया। तीनों मजदूर ट्रैक्टर का सामान लेकर लड़की वालों के घर की ओर जा चुके थे। बारात भी चल चुकी थी।

एक घंटे में द्वार-पूजा और नाश्ते के बाद लोग लौट आए। तब तक सब ठीक था। लेकिन भोजन के लिए बुलाने आए कुछ लोग जब बारातियों से चलने का आग्रह करते-करते अख़्तर  साहब के पास पहुंचे तो बखेड़ा हो गया। अख़्तर  साहब की दाढ़ी छोटी थी, लेकिन उसकी कटिंग देख कर उनमें से एक व्यक्ति ने कहा- 'इ त लगता है मुसलमान है। इहां कइसे आया।'

सबके कान खड़े हो गए। मुसलमान है, मुसलमान है- भनभनाहट होने लगी। जितने लोग थे, सभी अख़्तर  साहब के चारों तरफ घेरा बना कर खड़े हो गए। दो-तीन लोगों ने अख़्तर  साहब से पूछताछ शुरू कर दी। अख़्तर  साहब ने सब कुछ बताया कि किन हालात में वे यहां आ गए हैं। लेकिन उन्हें जानने वाले तीनों मजदूर लड़की वालों के दरवाजे पर थे। सो इन्क्वायरी चल रही थी। किसी के मुंह से निकला- 'अरे एकरा सब पर भरोसा करना खतरा खरीदना है। बेग चेक कीजिए।'

और मौखिक इन्क्वायरी चेकिंग पर पहुंच गई। अख़्तर  साहब का बैग लेकर उसमें से एक-एक सामान बाहर निकाल दिया गया- तौलिया, भागलपुरिया चादर, पैंट-शर्ट, शेविंग सेट, कुछ किताबें, कलम और कपड़े में लपेटी हुई एक तस्वीर। कपड़ा हटा कर तस्वीर निकाली गई। तस्वीर किसी युवती की थी।

'देखिए! सार अपने बुढ़ा गया है, आ बेटी के उमर के बीबी रखे हुए है।' फोटो देखने वाले ने कहा।

'अरे एकरा सब में एहे सब होएबे करता है। चार-चार गो रखता है सब! क्या कीजिएगा!' दूसरे ने जोड़ा।

अख़्तर  साहब का धीरज छूटा- 'नहीं बाबू, यह मेरी बेटी की तस्वीर है।'

लेकिन तस्वीर चटखारेदार विश्लेषणों के साथ भीड़ में घूमने लगी। साथ-साथ अख़्तर  साहब की आवाज भी घूमती रही कि 'नहीं बाबू, ये मेरी बेटी की तस्वीर है।' एक आवाज यहां तक आ गई कि 'क्या मरदे अकेल्ले आ गया है। जौरे इसको भी लेते आता। बाई जी के नाच के कमी पूरा हो जाता।'

अख़्तर  साहब दोनों हाथ सिर पर रख कर बैठ गए। लाचार-से बोले- 'ऐसा मत कहिए बाबू! यहां भी किसी बेटी की ही शादी है। ऐसा मत कहिए।'

पटना से बारात में आए दूल्हे के एक दोस्त से देखा नहीं गया। उसने तस्वीर लगभग छीन कर अपने हाथ में ले लिया और जोर से बोला- 'क्या करने पर तुले हैं आप लोग? क्या जरा भी आदमीयत नहीं बची है?' और उसने अख़्तर  साहब के हाथ में वह तस्वीर दे दी।

'इ कोन है हो? मियां जी के दमाद है का? इसको हटाओ त...! आ मियां जी के जेबी चेक करो। कोनो ठीक नहीं है। नेपाल माहे आईएसआई वाला सार सब देस में घुस रहा है।' और दो लोगों ने ऊपर से लेकर नीचे तक अख़्तर  साहब की एक-एक पर्ची तक चेक कर डाला। जब कुछ हाथ नहीं लगा, तब दूल्हे के चाचा ने कहा, 'अच्छा छोड़ दीजिए, सबेरे चले जाएंगे।'

शांति की प्रक्रिया शुरू हुई और बात यहां तक पहुंची कि 'अच्छा मौलवी साहब, छोड़िए, चलिए खाना खा लीजिए। लइका सब है, नहीं समझता है।'

'अब क्या खाएं बाबू! इतना खा चुके कि अब कुछ नहीं बचा।' अख़्तर  साहब रोने लगे। बेआवाज! उन्हें खुद याद नहीं कि कितने दिनों के बाद उनकी आंखों से आंसू बह रहे थे कि रुक नहीं रहे थे।

बैग और सामान अब भी उनके सामने बिखरा पड़ा। लोग उन्हें जिद्दी और नाटकबाज कहके जा चुके थे। धकिया के अलग कर दिया गया पटना से आया वह दूल्हे का दोस्त अब भी खाने नहीं गया था। वह धीरे-धीरे अख़्तर  साहब के पास आकर सामान समेटने में उनकी मदद करने लगा। अख़्तर  साहब के कंधे पर हाथ रखके उसने उन्हें दिलासा दिया- 'जाहिलों की जमात से आप क्या उम्मीद करते हैं बाबा।'

अख़्तर  साहब ने आंख उठा कर उसकी ओर देखा और हल्के से फफक पड़े।

और सुबह अख़्तर  साहब कब चले गए। किसी को खबर भी नहीं हुई। एक हल्ला हुआ कि देखो कहीं किसी का कोई सामान तो लेकर नहीं भागा है। सबके-सब ईमानदार निकले और कहा कि उनका सब कुछ ठीक है।

एकदम सुबह पहुंचते ही अख़्तर  साहब की पत्नी ने सवाल किया तो चुपचाप कमरे में चले गए और पत्नी के पास आते ही उसकी छाती में मुंह छिपा कर रोने लगे। पत्नी ने भी बच्चों की तरह थपकाते हुए पूछा- 'क्या हुआ...?' मुंह हटा कर सिर्फ इतना कह सके- 'इतना गैरयकीनी! इतना शक! इतनी नफरत!' थोड़ा रुक कर बोले- 'थोड़ी चाय बनाओ।' और पत्नी को सब कुछ बता दिया।

'वह लड़का कौन था?' पत्नी ने दूल्हे के उस दोस्त के बारे में पूछा।

'नहीं मालूम। लेकिन ऐसे ही लोगों के भरोसे चलना पड़ता है।' अख़्तर  साहब ने कहा।

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गर्मी की छुट्टियों के खत्म होने के बाद स्कूल फिर से खुल गया था। बच्चे संतलाल और अख़्तर  साहब के और ज्यादा करीब होते जा रहे थे। अख़्तर  साहब के साथ लगे होने की वजह से संतलाल भी बाकी सबकी नजरों में चढ़ते जा रहे थे।

एक दिन प्रेमशंकर झा ने व्यंग्य मारा- 'हं..., लगे रहिए। लइका सब कलक्टर नहीं त आपके जइसा मास्टरो बन जाए।'

हरेंद्र गुप्ता से भी नहीं रहा गया- 'क्या संतलाल! चाय के पइसा अख्त..रे साहब देते हैं क्या?'

संतलाल तुरंत मतलब समझ गए। लेकिन आज उन्हें भी नहीं रहा गया- 'हां, आप पीजिएगा त आपका भी पैसा उन्हीं से दिलवा देंगे। खाली कहिए त सही!'

'देखिएगा, चाय पीते-पीते कहीं संतलाल से सलीम न बन जाइए!' हरेंद्र गुप्ता कुढ़ते हुए जाने लगे।

'अभिए आप कोन अपना माने बैठे हैं।' संतलाल ने भी जड़ा और दूसरी ओर चले गए।

उस रात संतलाल ने अपनी डायरी में लिखा- 'इस प्रकार के द्वेष की जड़ें आखिर कहां हैं? बाकी तीनों का आग्रह तो समझ में आता है। लेकिन हरेंद्र गुप्ता! वे शिक्षक भी हैं। क्या कभी विश्लेषण के दौर में नहीं जाते?' और आगे उन्होंने पढ़ी हुई किसी किताब का एक अंश लिखा- ' ...चीखते हुए दादू ने हिंदू राष्ट्र का घोष करने वाले उन दस-बारह लड़कों के झुंड से कहा- पता है कहां थे तुमलोग जब उज्जयिनी की सड़कों पर वसंत सेना की पालकी निकलती थी? तुम उसको कंधा देते थे। कहां थे जब जगन्नाथ का रथ निकलता था? तुम उसका रस्सा खींचते थे। और कहां थे, जब राजाओं की अश्वमेध होता था? तुम भट्टी के सामने बैठ कर तलवार बनाते थे। तुम हमेशा सिर्फ सीढ़ियां रहे हो। और सीढ़ियां खुद कहीं नहीं जातीं। केवल दूसरे लोग उस पर पांव रख कर ऊपर जाते हैं। आज भी तुम वही हो- सबसे नीचे की सीढ़ियां, जो सिर्फ इस्तेमाल होती हैं।'

उधर गुजरात गौरव-यात्रा का दंश झेल कर 'गौरवान्वित' हो रहा था, तो इधर अख़्तर  साहब को अखबारों में छपी दंगों की खबरों का पाठ बड़े उत्साह से सुनाया जाता। और गुजरात में फिर से दो-तिहाई की जीत पर राजकीय आदर्श विद्यालय फतेहपुर में भी मिठाइयां बंटीं। दूसरे लोगों के साथ संतलाल को भी एक लड्डू मिला, लेकिन अख़्तर  साहब को दो लड्डू मिले। अख़्तर  साहब और संतलाल ने एक-दूसरे का मुंह देखते हुए लड्डू खा लिया।

पिछले स्वतंत्रता दिवस पर झंडा फहराने के बाद 'जन-गण-मन अधिनायक जय है' हुआ और एक जलेबी देकर छुट्टी दे दी गई। सो, इस बार गणतंत्र दिवस पर अख़्तर  साहब ने अपना एक आइटम बच्चों के साथ मिल कर तैयार करना शुरू कर दिया। आइटम सिर्फ यही था कि कुछ बच्चे कोरस में 'सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा' की तैयारी कर रहे थे। संतलाल ने भी गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस के बारे में पूरी जानकारी देने वाला नाटक तैयार करा लिया। इसी को देख कर महेश तिवारी ने कुछ बच्चों से 'वंदे मातरम' तैयार करा लिया। तय हुआ कि झंडोत्तोलन के बाद पहले 'वंदे मातरम' होगा, उसके नाटक, फिर 'सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा।'

पच्चीस जनवरी को नाटक के पूर्वाभ्यास में राष्ट्रगीत औऱ राष्ट्रगान के लेखकों का नाम आने पर हेडमास्टर साहब ने अख़्तर  साहब ने पूछा- 'इ सारे जहां से अच्छा किसका लिखा हुआ है?'

अख़्तर  साहब ने बताया- 'इकबाल।'

उसी शाम छुट्टी के बाद जब अख़्तर  साहब और संतलाल बच्चों में उलझे थे, बैठकी में प्रेमशंकर झा ने कहा- 'अब बुझाया! मौलाना को वंदे मातरम काहे नहीं सूझा। इहो अगर कोनो इकबाल का लिखा हुआ रहता जरूर सूझता।'

और कल होकर झंडोत्तोलन हुआ, राष्ट्रगान हुआ और जलेबी बंट गई। सभी बच्चे ताकते रह गए कि अब उनके द्वारा तैयार आइटम पेश होगा। लेकिन जलेबी बंट चुकी थी। अख़्तर  साहब और संतलाल बच्चों को लेकर स्कूल के प्रांगण में चले गए और 'बोल भाई कितने, आप चाहें जितने' खेलने लगे।

गणतंत्र दिवस की रात संतलाल ने अपनी डायरी में यह भी जोड़ा- '...फासीवादी ताकतें दूसरी-दूसरी पहचानों की ओर में काम करते हैं। आमतौर पर वह अपनी ओट बनाते हैं राष्ट्रवाद के एक अतिवादी रूप को, जिसके चलते राष्ट्रवाद के साथ ही एक फासीवादी परिभाषा नत्थी हो जाती है।' संतलाल ने डायरी बंद की और आज अपने चुप रह जाने के कारणों पर विचार करने लगे। ...तो क्या आज भी मेरी चेतना पर वही मानसिकता हावी है, जो सिर्फ मूकदर्शक रहना सिखाती है?

राजकीय मध्य विद्यालय फतेहपुर का अगला एक महीना बेहद तनावों भरा गुजरा। अख़्तर  साहब ज्यादा समय चुप रहने लगे थे। बच्चों के खेल में भाग नहीं लेते, बस खेलते हुए देखते। उन्हें कभी-कभी चक्कर आने लगा था। डॉक्टर ने आखिरकार स्थायी रूप से उच्च रक्तचाप की दवा लेने की सलाह दे दी। संतलाल ने अपने तबादले के लिए हाथ-पांव मारना शुरू कर दिया। लेकिन उसके साथ ही हेडमास्टर प्रेमशंकर झा तक को खरी-खरी सुनाना भी शुरू कर दिया।

लक्षणा में एक दिन प्रेमशंकर झा ने जड़ा- 'क्या संतलाल! सुनते हैं कि आपके अंबेडकर मुसलमान को देखना तक नहीं चाहते थे! आप त इहां...।' कि पलट कर संतलाल ने सीधा जवाब दिया- 'सोझे बजरंग दल के टिकट पर एमपीये का चुनाव लड़ न जाइए महाराज! काहेला मास्टरगीरी में चले आए हैं?'

उस दिन से प्रेमशंकर झा ने संतलाल से सीधे कभी बात नहीं की। संतलाल ने भी जिला शिक्षा अधिकारी के यहां स्थानांतरण के लिए सीधी अर्जी देने को सोच लिया। अपनी पहली पसंद अपना गांव लगमा बताया, फिर लिख दिया कि आप जहां चाहें, वहीं मुझे सुविधा होगी। रात में ही अर्जी तैयार भी कर ली।

इधर अख़्तर  साहब तबीयत ज्यादा खराब होते जाने के बावजूद कक्षाओं में बच्चों में उलझे रहते। उन्होंने संतलाल से भी धीरे-धीरे कटना शुरू कर दिया था। यह देख कर कि उनके चलते संतलाल को भी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे ही समय में क्रिकेट विश्व कप का बुखार तेजी से बढ़ता जा रहा था। खास कर एक मार्च को भारत-पाकिस्तान के मैच को लेकर माहौल तनाव की हद तक पहुंच चुका था। बयान-दर-बयान और शुभकामनाएं-दर-शुभकामनाएं आ रही थीं कि भारत और किसी से जीते न जीते, पाकिस्तान से मैच जीत जाना विश्व कप जीतने के बराबर होगा। या यों कहिए कि पाकिस्तान पर फतह होगा।

बाईस फरवरी को अख़्तर  साहब ने आवेदन दे दिया कि मेरी तबीयत ज्यादा खराब होती जा रही है, थोड़े आराम की जरूरत है। सोचा कि बंबई से बेटा भी आया हुआ है, उसके सात पटना जाकर ठीक से इलाज भी करा लेंगे।

आवेदन देते समय चौकड़ी जमी हुई थी। महेश तिवारी ने खैनी मलते हुए पूछा- 'तब अख़्तर  साहब! फटक्का भारत में छूटेगा कि पाकिस्तान में!' संदर्भ क्रिकेट मैच को लक्षित था।

'इसके लिए पाकिस्तान जाने की क्या जरूरत है! हर गांव आ शहर में कहीं-न-कहीं पाकिस्तान हइये है की!' रामाधार शर्मा ने तुक मिलाया।

अख़्तर  साहब मुस्कराए। सिर्फ इतना कहा- 'मेरा भरोसा अभी टूटा नहीं है।' और बाहर निकल गए। कल होकर ही मुरैना के लिए निकल पड़े। घर में स्वास्थ्य लाभ कर रहे थे। वेतन उठाने के बाद बेटे के साथ पटना जाने का भी मन बना चुके थे। बीच में ही ब्लड प्रेशर की नियमित दवाई खत्म हो गई। टालने में दो दिन टल गए।

सुबह चाय पीकर कुछ पैसों के इंतजाम में अपने गांव से दो किलोमीटर दूर शाहपुर एक संबंधी के घर गए। संबंधी आज भारत-पाकिस्तान मैच देने के लिए बैटरी चार्ज कराने गए थे। लौटने तक रुक गए। उनके आने पर पैसे भी मिल गए। पैसे लेकर घर को लौट रहे थे कि बीच रास्ते में ही छाती में बांईं ओर कचोटने जैसा दर्द शुरु हो गया। बांईं बांह में लगा कि जैसे कोई जोर-जोर से चुटकी काट रहा हो। एक रिक्शे वाले से मदद मांग कर किसी तरह घर पहुंचे। पत्नी गोद में सिर रख कर तेल लगा कर जोर से मलने लगी। बेटा छाती और बांह मलने लगा। इसी बीच अख़्तर  साहब ने दाहिने हाथ से बांईं छाती को जोर से भींचा। मुंह खोल कर कुछ कहना चाहा, लेकिन अचानक ठहर गए। गर्दन पत्नी की गोद में दाहिनी ओर ढलक गई। दोनों हाथों से अपनी छाती पीट कर 'या अल्लाह' कहती हुई पत्नी पीछे की ओर बेहोश होकर गिर पड़ी। बेटा पहले 'अब्बा' कह कर चिल्लाया, फिर 'अम्मी' कहते हुए संभालने दौड़ा।

तीन मार्च को अख़्तर  साहब का बेटा स्कूल में पहुंचा। हेडमास्टर प्रेमशंकर झा से बोला- 'मैं शकील अख़्तर ...। ...शमीम अख़्तर  का बेटा। ...अब्बा का शनीचर के रोज इंतकाल हो गया। ...मैं बाद में फिर आऊंगा। ...अभी खबर देने आ गया था।'

इतना कह वह जाने लगा कि प्रेमशंकर झा ने पूछा कि कैसे हो गया। अख़्तर  साहब के लड़के ने रुक-रुक कर बता दिया। जाते वक्त संतलाल उसे वस तक दिलासा देते हुए छोड़ने आए और कहा- 'जैसी भी मदद की जरूरत हो, बेहिचक कहना।'

संतलाल स्कूल में वापस आए। चौकड़ी की बैठकी चुटकियों के साथ चल रही थी।

'मैचवा के पहिले मरा कि बाद में हो?' रामाधार शर्मा ने पूछा।

'न..., दुपहरे में में खत्तम हो गया था।' प्रेमशंकर झा ने कहा।

'हो सकता है कि बेचारा के पहिलहिं आभास हो गया हो।' महेश तिवारी ने सुर मिलाया।

'अब इ न सोचिए कि अपने त चलिए गया, लेकिन बेटा के नौकरी दे के गया।' हरेंद्र गुप्ता ने जोड़ा।

'हं, इहे त एगो दुख के बात है कि बेटा के नौकरी हो जाएगा। न त आपलोगों को असली मिठाई त आजे बांटना चाहिए था।' संतलाल ने कमरे में घुसते हुए कहा और अपना हाथ में टांगने वाला थैला लेकर निकलते हुए बोले- 'आज त कम-से-कम स्कूल बंद रखिएगा?' और सभी व्यंग्य की नजर फेंकते हुए बाहर निकल गए।

और आज संतलाल ने डायरी के पन्नों की सीमा तोड़ दी। लिखते गए, लिखते गए ' ...अब सवाल यह नहीं रह गया लगता है कि पूर्वाग्रहों को त्याग कर तथ्यों और तर्कों के सहारे आगे कैसे बढ़ा जाए। बल्कि सवाल अब यही रह गया लगता है कि भावुकता के सहारे पीछे कैसे लौटा जाए। आगे बढ़ने के लिए तथ्यों और तर्कों की जरूरत पड़ती है, जिस पर मेहनत करना पड़ता है- सभी स्तरों पर। और भावनाओं में बहाने या भावुकता में बहने के लिए मेहनत की जरूरत नहीं पड़ती, इसलिए आसान है...। अख़्तर  साहब की मौत पर हमारे स्कूल में की टिप्पणियां इसलिए साधारण नहीं हैं, क्योंकि ये टिप्पणियां समाज के एक ऐसे तबके की गई हैं जो समाज की बुनियाद तैयार करता है। और जब बुनियाद डालने वाले हाथ ही पूरी तरह संवेदनहीन औऱ खोखले हों तो? दरअसल, धार्मिक कट्टरता से त्रस्त व्यक्ति जिस गुलामी को भोग रहा होता है, उसे न वह देख पाता है, न समझ पाता है। इससे बड़ी त्रासदी यह है कि यह गुलामी उसे अच्छी लगती है। एक डरे हुए शंकाग्रस्त व्यक्ति से 'मनुष्य' होने की उम्मीद भी कैसे की जा सकती है। लेकिन उम्मीद कहां है...?'

कल मुरैना जाऊंगा...। पता नहीं, अख़्तर  साहब के परिवार वाले किस हाल में होंगे। यही सोचते-सोचते संतलाल सोने लगे कि ध्यान आया कि ट्रांसफर के लिए अर्जी देने भी जाना है...। अब थोड़े ही दिनों में मैं भी चला जाऊंगा। ...तब वे लोग आराम से रह सकेंगे। ...लेकिन बच्चे! मैं भी भाग जाऊं तो बच्चे!

...नहीं-नहीं कहते हुए वे उठ बैठे। एक ग्लास पानी पिया और ट्रांसफर के लिए जो अर्जी उन्होंने तैयार की थी, उसे लेकर एक बार पढ़ा और अगले ही पल उसे फाड़ डाला।

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                                                                  (समाप्त) 
                                                         (पाखी में प्रकाशित)

3 comments:

Yugalkishore Maheshwari said...

लेखक इस विषय पर चिंतन करते समय १९८४ के दंगों की चर्चा क्यों बचने का प्रयास करते है.२००२ के दंगों के विषय में न्यायिक निर्णय आ चूका है.शासकीय नरसंहार की अवधारणा मिथ्या पाई गयी.लेकिन १९८४ के मामलों में तो न्यायपालिका भी अवधारणा का समर्थन ही करती नज़र आई.स्पष्ट है की लेखक निष्पक्ष नहीं है.पूरा लेखन किसी कांग्रेस प्रवक्ता की तरह लिखा गया है.

PD said...

निःशब्द हूँ मैं....

कुछ शब्द ऊपर आये कमेन्ट पर. आप भी इस कहानी के उन मास्टरों से कुछ अलग व्यवहार नहीं कर रहे हैं. खैर, शुभकामनाएं आपको भी.

kriti said...

अरविन्द जी कहानी मन को छू गयी..गुजरात नरसंहार ऐसी घटना है जिससे इतना आहत हुए थे कि याद करने पे अभी भी सिहर उठती हूँ. इन तिलकधारियों को इतने पे भी संतोष नहीं है...इससे ज्यादा पता नहीं क्या चाहते है...मोदी का एग्रेसिव होना ऐसे ही लोगों कि बदौलत है..ऐसे में आप जैसे लोग ही है जो बार बार याद दिलाते है कि गुजरात कि वो राते अभी ढली नहीं है..८४ में कांग्रेस ने कत्ले आम किया तो मोदी के नरसंहार कि बात ही नहीं कि जानी चाहिए, ये कहाँ का तर्क है..वैसे भी सवर्ण हिंदुओं का तो कत्ले आम का इतिहास काफी समृध्द है...वो किसी को बताने कि जरूरत नहीं है..लिखते रहिये पढ़ने से सुकून मिलता है..
कृति