Monday 22 October 2007

राम भरोसे हिंदू होटल

डॉ आंबेडकर के बाद कांचा इलैया इस धारा के सबसे बड़े चिंतक रहे हैं। इन्होंने हिंदू सामाजिक व्यवस्था पर कुछ कड़वे सवाल उठाए हैं जो आमतौर पर सवर्ण चेतना को गहरे रूप से असहज करता रहा है। उनके तर्क आमतौर पर नहीं काटे जा सकने लायक माने जाते रहे हैं। राम सेतु को एक बार फिर अपनी डूबती राजनीति का सहारा बनाने की जुगत में भिड़ी भाजपा और द्रमुक के आमने-सामने आने के बहाने उन्होंने तहलका में अपनी राय जाहिर की। मूल लेख अंग्रेजी में है। अनुवाद पंकज चौधरी ने किया हैः



पेरियार हमेशा यह कहते थे कि ईश्वर नाम की कोई सत्ता नहीं है। अब करुणानिधि लगातार यह कह रहे हैं कि राम का कोई अस्तित्व नहीं था। और जयललिता राम की सत्ता में पूरी विश्वास करती हुई जय श्रीराम का नारा लगाती हैं। करुणानिधि का राम की सत्ता में विश्वास नहीं करना उन्हें ई वी रामास्वामी नायकर पेरियार की तमिल और द्रविड़ राजनीति की निरीश्वरवादी और वैज्ञानिक परंपरा के एक रखवाले के रूप में सामने लाता है। दूसरी ओर, जयललिता का राम की सत्ता में विश्वास करना और यह कहना कि उन्हें पेरियार की निरीश्वरवादी अवधारणा में जरा भी विश्वास नहीं है, उनके उस रूप की पोल खोलता है कि वह न सिर्फ जन्मना ब्राह्मण हैं, बल्कि तमाम हिंदू देवी-देवताओं, खासतौर पर राम की आराधक हैं। सेतुसमुद्रम परियोजना पर जब बहस चल रही थी, तब जनता पार्टी के अध्यक्ष सुब्रह्मण्यम स्वामी ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दाखिल कर उससे केंद्र को यह निर्देश देने की गुजारिश की कि वह रामसेतु (एडम्स सेतु) को ध्वस्त नहीं करे। क्योंकि उनका व्श्वास है कि रामसेतु का निर्माण वाल्मीकि रचित रामायण के नायक राम के द्वारा हुआ है। ध्यान रहे कि स्वामी खुद एक तमिल ब्राह्मण हैं, और ब्राह्मण विरोधी द्रविड़ राजनीति से नफरत करते हैं।

उन्होंने यह सुप्रीम कोर्ट से यह गुजारिश तब की जब भारतीय पुरातात्त्विक सर्वेक्षण का यह हलफनामा सामने आ चुका था कि इतिहास में न तो किसी पुल का साक्ष्य मिलता है और न ही राम का। भारतीय पुरातात्त्विक सर्वेक्षण के इस हलफनामे को मीडिया ने जरूरत से ज्यादा तूल दिया, जिससे भाजपा और उसकी सहयोगी पार्टियों को सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह पर हिंदू विरोधी होने का आरोप लगाने में मदद मिली। एक ओर उन्होंने सोनिया गांधी पर ईसाई होने का आरोप लगाया, वहीं मनमोहन सिंह पर सिक्ख होने का। उन दोनों को सिर्फ इसलिए निशाना नहीं बनाया गया कि वे अपने प्रशासनिक कर्तव्य का निर्वहन नहीं कर पाए, बल्कि उन्हें इसलिए भी कि वे अल्पसंख्यक समुदाय से आते हैं। इसमें सोनिया गांधी पर सबसे ज्यादा उंगलियां इसलिए उठीं कि वे ईसाई होने के साथ-साथ विदेशी मूल की भी हैं।

उन पर निशाना साध कर हिंदूवादी ताकतें भारत के पूरे ईसाई समुदाय को एक ओर जहां राष्ट्रविरोधी ठहरा रही हैं, वहीं गुजरात और मध्यप्रदेश जैसे राज्यों में ईसाइयों पर हमले को बढ़ावा दिया जा रहा है। उनकी रणनीति यह है कि इन राज्यों में होने वाले चुनाव को खूनी खेल में बदल दें, जैसा कि संघ परिवार पहले भी कर चुका है। उनके दुर्भाग्य से करुणानिधि ने उनकी उस रणनीति की कब्र खोद दी और हिंदू बहुसंख्यक बनाम ईसाई अल्पसंख्यक की बहस को द्रविड़ बहुसंख्यक बनाम आर्य अल्पसंख्यक में बदल दिया। एक ऐसे समय में करुणानिधि ने देश में एक और गुजरात होने से बचा लिया जो शायद ईसाइयों के खिलाफ होता।

करुणानिधि न सिर्फ राम की सर्वव्यापकता को नकारते हैं, बल्कि उनके प्रति आक्रामक रुख अपनाते हुए उन्हें एक किताब में एक चरित्र से ज्यादा कुछ नहीं मानते हैं। राम के बारे में वे कहते हैं कि क्या राम का वर्णन वाल्मीकि ने एक शराबी के रूप में नहीं किया है? क्या राम के पास इंजीनियरिंग की डिग्री थी? अगर नहीं, तो फिर कैसे उन्होंने एक ऐसे पुल का निर्माण करवाया, जिससे होकर श्रीलंका पहुंचा जा सकता था? करुणानिधि के तर्कपूर्ण सवालों ने राम से संबंधित बहस पर जबर्दस्त असर छोड़ा है। हिंदुत्ववादी ताकतें कभी भी तमिल-द्रविड़ राष्ट्रीयता को बर्दाश्त नहीं कर सकतीं। अगर जयललिता ऐसा करतीं, तो उसका समर्थन खो देतीं। सुब्रह्मण्यम स्वामी की तो कोई बात ही नहीं, क्योंकि राज्य में उनकी कोई खास हैसियत नहीं है। इस मुद्दे पर सोनिया गांधी की रणनीति ने उतना काम नहीं किया, जितना उनकी चुप्पी और उदासीनता ने।

भारतीय पुरातात्त्विक सर्वेक्षण के हलफनामे ने भाजपा और उसके दिवालिये नेतृत्व की पोल खोल दी है। बड़े आर्थिक मुद्दे या समस्याओं पर भाजपा को मुख्य विपक्षी पार्टी की तह कभी भी आलोचनात्मक रवैया अपनाते हुए नहीं देखा गया। हां, वामपंथी पार्टियां जरूर इस मोर्चे पर अपनी भूमिका पूरी गंभीरता से निभाती रही हैं। रामसेतु अभियान बाबरी मस्जिद के खिलाफ चलाए गए अभियान की तरह नहीं है, जिसमें मुसलमानों को लक्ष्य बनाया गया था। यह संघर्ष मुख्य रूप से द्रविड़ तमिलों के साथ हैं, जिसके गंभीर नतीजे हो सकते हैं। यह जेहोवा या अल्लाह की तरह भी नहीं है। हिंदू धर्म में राम एक भगवान के रूप में बड़े पैमाने पर स्वीकार्य नहीं है। संघ परिवार और मुख्य संगठन सभी भारतीयों को यह समझाने में विफल रहे हैं कि राम एक मर्यादा पुरुषोत्तम हैं। हो सकता है कि मुसलमान और ईसाई राम के खिलाफ बात नहीं करें, लेकिन तमिल द्रविड़ ऐसा क्यों करें?

संघ परिवार अगर सच्चाई जानना चाहता है तो उसे यह स्वीकार कर लेना चाहिए कि दक्षिण भारत में राम उस तरह से लोकप्रिय नहीं हैं, जिस तरह शिरडी के साईं बाबा। आंध्र प्रदेश के भद्राचलम में, जहां राम का सबसे बड़ा मंदिर है, जरा-सी भी व्यस्त जगह नहीं है। बहुत कम लोग वहां जाते हैं। अगर भाजपा सोचती है कि राम का नारा उछाल कर एक बार फिर वह हिंदू वोटों की गोलबंदी कर रही है तो यह उसकी भूल है। दूसरी ओर, करुणानिधि जिस तरह से राम के प्रति आक्रामक रुख अपनाए हुए हैं और सेतुसमुद्रम का राजनीतिकरण करने में कामयाब रहे हैं, वह निश्चित रूप से तमिल वोटों के ध्रुवीकरण में मदद करेगा।

4 comments:

मिहिरभोज said...

बहुत दूर की कौङी लाए उस्ताद बैसे तिरूपति बालाजी और रामेश्वरम् आआदि हिंदू धार्मिक स्थल ही है,पूरे दक्षिण भारत में घूमा हूं और उत्तर से कहीं ज्यादा धार्मिक आस्था दक्षिण में देखी,पता नहीं किस मंदिर की बात की आपने .हिंदुत्व इस देश का प्राण है,था और रहने वाला है

अनिल रघुराज said...

अरविंद जी, बहुत ही काम की जानकारी आपने इस लेख के माध्यम से पेश की है। वह भी तमिल राजनीति के संदर्भ में। शुक्रिया...

मिहिरभोज said...

मेरे विचार से तिरूपति और रामेश्वरम् जैसे हिंदू तीर्थ दक्षिण में ही हैं.पूरा दक्षिण घूमा हूं में उत्तर से ज्यादा भीङ देखी मंदिरों में ,पता नहीं किस मंदिर के बारे में लेखक बताना चाहते हैं,मित्र हिंदुत्व देश का प्राण है,था और रहेगा.

Anonymous said...

Matlab Kancha Illaiah is baat se khush hai ki Karunanidhi ne Tamil Dravid rashtriya bhavna ko badhava diya hai (BJP ke jawab mein). Kal ko wo is baat par bhi khush honge ki Karunanidhi ne alag Tamil rajya bana liya hai. aakhirkar baaki bache hue bharat mein to sirf brahman/BJP wale hi rahte hai na