<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><rss xmlns:atom='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' version='2.0'><channel><atom:id>tag:blogger.com,1999:blog-9014245926951665678</atom:id><lastBuildDate>Sat, 31 Oct 2009 06:50:58 +0000</lastBuildDate><title>चार्वाक</title><description>इन समाजों के बनाए हुए बंधन से निकल चल. चल मेरे साथ ही चल... ऐ मेरी जाने ग़ज़ल...</description><link>http://charwakshesh.blogspot.com/</link><managingEditor>noreply@blogger.com (शेष)</managingEditor><generator>Blogger</generator><openSearch:totalResults>20</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>25</openSearch:itemsPerPage><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-9014245926951665678.post-1815843455402043521</guid><pubDate>Thu, 14 May 2009 06:42:00 +0000</pubDate><atom:updated>2009-05-13T23:46:59.123-07:00</atom:updated><category domain='http://www.blogger.com/atom/ns#'>सांप्रदायिकता</category><category domain='http://www.blogger.com/atom/ns#'>राजनीति</category><category domain='http://www.blogger.com/atom/ns#'>आईना</category><title>नफरत की बुनियाद पर उन्माद की राजनीति...</title><description>&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;वरुण गांधी&lt;/span&gt; के बयानों ने जो तूफान पैदा किया है, वह भारतीय राजनीति के लिए क्या सचमुच इतना विस्मयकारी है? क्या ऐसा पहली बार हुआ है, जब भाजपाई हिंदुत्व की रगों में दौड़ती नफरत की बुनियाद पर हिंदू राष्ट्र का हवामहल खड़ा करने का ख्वाब परोसा गया है? और शायद इसे भी एक शुद्ध भाजपाई अभ्यास के तौर पर मान लिया जाना चाहिए कि तीर जब अपना काम कर जाए, तो दिखावे का अफसोस जाहिर कर देने, उससे खुद के अलग रहने या फिर बिना किसी शर्म के पलटी मार देने में कोई हर्ज नहीं है। तो मीडिया में हूबहू बयान आने के बाद वरुण गांधी ने भी कह दिया कि उनके भाषणों के टेप के साथ छेड़छाड़ की गई है; वे राजनीतिक साजिश के शिकार हुए हैं; और कि उन्होंंने वैसा कुछ भी नहीं कहा है जिसके लिए उनकी गर्दन पकड़ने की कोशिश हो रही है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;भाजपा में, लेकिन लोकतंत्र में यकीन रखने वाले वैसे बहुत सारे लोगों को थोड़ी देर के लिए इस बात से राहत मिली होगी कि पार्टी ने वरुण गांधी के बयानों की जिम्मेदारी नहीं ली और कहा कि उनके बयानों से भाजपा का कोई लेना-देना नहीं है। लेकिन भोलेपन और मासूमियत की चाशनी में लिपटा भाजपा का यह ‘सच’ सिर्फ दो दिनों के भीतर सामने आ गया। चुनाव आयोग की नजर में दोषी होने और उसकी एक मरियल-सी फरियाद के बावजूद भाजपा ने ज्यादा हमलावर तरीके से वरुण गांधी का पक्ष लिया। दरअसल, न तो वरुण गांधी इतने मासूम हैं और न भाजपा इतनी भोली कि इस तरह की ‘बाजियों’ के नफा-नुकसान का अंदाजा इन्हें न हो। इसलिए बयानों के असर को और ज्यादा तीखा बनाने के लिए ‘शहीदाना’ अंदाज में वरुण गांधी के आत्मसमर्पण और गिरफ्तारी के नाटक का एक और दृश्य भी पूरा कर लिया गया।&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नब्बे के दशक की शुरुआत में ही मंडल आयोग की सिफारिशों पर अमल के साथ पैदा हुए सामाजिक न्याय के नारे की भ्रूण हत्या के इरादे से निकली ‘रथयात्रा’ आखिरकार बाबरी मस्जिद विध्वंस की मंजिल तक पहुंची। और इस मंजिल तक पहुंचने के लिए लालकृष्ण आडवाणी ने जो राह तैयार की, वरुण गांधी जैसे लोग तो उस पर अपने तरीके से चलने वाले महज कुछ मुसाफिर हैं। दरअसल, तब से लेकर भाजपा ने लगातार भारतीय राजनीति में एक ऐसी जमीन तैयार की है, जिसमें ‘हीरो’ बनने के लिए सिर्फ एक तयशुदा फार्मूले पर अमल की जरूरत होती है। और नरेंद्र मोदी हों या प्रवीण तोगड़िया, या फिर योगी आदित्यनाथ, प्रमोद मुतालिक या वरुण गांधी, इन सबके लिए यह ज्यादा आसान रास्ता है कि संघर्ष का लंबा रास्ता अख्तियार करने के बजाय यही फार्मूला अपनाया जाए। आग लगाने वाले दो-चार बयान, उत्पात और मीडिया में कवरेज का इंतजाम- जिसके लिए किसी खास तैयारी की जरूरत नहीं पड़ती। हाल में उगे प्रमोद मुतालिक को मंगलोर में पब पर हुए हमले से पहले कितने लोग जानते थे? या फिर कितने लोगों को यह पता था कि वरुण गांधी मेनका गांधी का बेटा होने के अलावा भाजपा की सक्रिय राजनीति भी कर रहे हैं? लेकिन पीलीभीत के अपने चंद बयानों से उन्होंने अपनी ही पार्टी में जगह बनाने के लिए दशकों से संघर्ष कर रहे तमाम नेताओं को पीछे छोड़ दिया।&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मगर भाजपा का दुख यह है कि भारतीय भूभाग के पिछले पांच-सात सौ सालों के इतिहास ने यहां ऐसा सामाजिक-राजनीतिक ढांचा खड़ा कर दिया है, जिसका बहुमत इस तरह के उन्माद को ‘इलाज’ के लायक ही मानता है। यह अकारण नहीं है कि पिछले लगभग दो दशक में हिंदुत्व में उफान पैदा करने वाली तमाम कोशिशों के बावजूद आज भी वह केवल अपने बूते देश की सत्ता पर काबिज होने में नाकाम है। अगर ‘गुजरात प्रयोग’ जैसे छिटपुट उदाहरण दिए जाते हैं तो यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि इसे आजादी के बाद देश के सत्ता संचालकों की नाकामी कहें या यथास्थितिवाद को बनाए रखने की महीन राजनीति कि सत्ता के ‘लोकतांत्रिक’ ढांचे के बावजूद हर मोर्चे पर लोकतंत्र को कुंठित करने की कोशिश हो रही है। यही वजह है कि न तो सत्ता अपने मूल स्वरूप में व्यवहार के स्तर पर लोकतांत्रिक हो सकी और न इसके सामाजिक नतीजे हासिल किए जा सके।&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सवाल है कि इन स्थितियों का ज्यों का त्यों बने रहना आखिरकार किसके हित में था या है। समाज को जड़ताओं और विद्रूपों से मुक्त करने के लिए जमीनी स्तर पर कुछ करने की बात तो दूर, क्या कारण है कि पिछले साठ साल की ‘अपनी सत्ता’ के बावजूद हम यह संदेश तक प्रेषित करने में विफल रहे हैं कि हमारा मकसद एक प्रगतिशील मूल्यों के साथ जीने वाले समाज की रचना है? यह कैसे संभव हो सका कि भारत में विकास के पर्याय के रूप में स्थापित होने के बाद कर्नाटक आज कुछ गिरोहों का अभयारण्य बनता जा रहा है? वहां से वे सारे उदाहरण सामने आ रहे हैं जो अफगानिस्तान या पाकिस्तान में तालिबान के प्रभाव वाले इलाकों का चेहरा बन चुके हैं।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;मंगलोर के एक पब में घुस कर युवतियों को मारना-पीटना इस दक्षिणी राज्य की अकेली घटना नहीं थी। इससे पहले गिरजाघरों पर लगातार हमले हो रहे थे, मगर किसी को उसका नोटिस लेना जरूरी नहीं लगा। जबकि याद किया जा सकता है कि 1998 में गुजरात के डांग जिले में कैसे सुनियोजित तरीके से लगातार गिरजाघरों पर हमले किए गए थे। उसके बाद चार साल में जो जमीन तैयार हुई, उस पर गुजरात जनसंहार एक इतिहास बन कर खड़ा है। तो कर्नाटक के दक्षिण कन्नड़ और उडुपी में जो कुछ चल रहा है, क्या वह गुजरात-2002 जैसे प्रयोग की पूर्वपीठिका है? गुजरात में बाबू बजरंगी जैसे लोगों ने जो किया, बजरंग दल और प्रमोद मुतालिक की श्रीराम सेना कर्नाटक में वही कर रही है। उनके लोग कॉलेजों में जाते हैं, दूसरे धर्म के छात्रों से जान-पहचान रखने वालों को मारते-पीटते हैं, अपहरण करते हैं और मुसलिम छात्राओं को बुर्का पहनने के कारण जलील करते हैं। उनका ‘हिंदू समाजोत्सव’ दूसरे धर्म वालों में आतंक पैदा करने का जरिया हो चुका है और इसे कर्नाटक सरकार का घोषित संरक्षण मिला हुआ है। यह ‘लोकतांत्रिक सिद्धांतों’ के तहत चुनी गई सरकार का संरक्षण है। यह ‘बहुमत’ के शासन के सिद्धांत का ‘व्यवहार’ है।&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सिर्फ कुछ महीनों के भीतर यह आश्चर्य अब अभ्यास में तब्दील हो चुका है कि दक्षिण कन्नड़ या उडुपी में अगर आपका कोई दोस्त मुसलमान या ईसाई है तो आपको डरना चाहिए या फिर उसे त्याग देना चाहिए। &lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(153, 0, 0);"&gt;लेकिन क्या-क्या त्यागेंगे आप? पहले मुसलमान या ईसाई, फिर दलित, उसके बाद पिछड़े वर्ग का कोई दोस्त! धार्मिक और सामाजिक वर्णक्रम के विभाजन पर आधारित हिंदुत्व के रास्ते की मंजिल क्या कोई और है? और आखिरी तौर पर इसी क पैरोकार होने का बार-बार सबूत देने वाला आरएसएस और उससे गर्भनाल से जुड़ी भाजपा को रास्ता भी वही चाहिए जो उसे इस मंजिल तक पहंचाए। उसे बहुत अच्छे से मालूम है कि ब्राह्मणवादी हिंदुत्व ने इस समाज के असंख्य, लेकिन हर खंड को उसकी जड़ताओं से इस कदर बांध रखा है, जहां यह सोचने की गुंजाइश नहीं है कि वरुण गांधी या प्रमोद मुतालिक ने क्या और क्यों कहा? जहां यह गुंजाइश बची होती है, वहां से यह सवाल उठता है कि चुनावों के ठीक पहले इस तरह की घिनौनी भाषा का इस्तेमाल करने वाला व्यक्ति या तो जाहिल है या शातिर।&lt;/span&gt; मगर जाहिल की जिद और शातिराना जिद में बड़ा फर्क होता है। और इस नाते वरुण गांधी जाहिल नहीं हैं।&lt;br /&gt;दरअसल, इस्लामी चेहरा लिए तालिबान से ऊपरी तौर पर नफरत करने वाली भाजपा, विहिप, बजरंग दल या श्रीराम सेना जैसी संघी जमातें उसी आबोहवा के निर्माण में लगी हैं, जो तालिबान का मकसद है। फर्क सिर्फ काले और भगवे चोले का है। शरीअत पर अमल से लेकर महिलाओं के पर्दे के भीतर रहने, लड़कियों के स्कूल जाने पर पाबंदी, आॅनर किलिंग यानी ‘सम्मान’ बचाने के लिए हत्या या मजहबी पोंगापंथ जैसी तमाम बातों में से एक भी बात ऐसी नहीं है, जो हिंदुत्व के ठेकेदारों को तालिबान से अलग करती हो।&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यह दुनिया के लिए एक बेहतरीन लतीफा हो सकता है कि जिस तरह टीवी, मोबाइल, मोटरगाड़ियों, एके-47 या टैंकों-मोर्टारों या दूसरे अत्याधुनिक हथियारों जैसे विज्ञान के रहम की बदौलत तालिबान सभ्यता की इच्छा रखने वाले एक समाज को जंगली कबीले में तब्दील करने की कोशिश में है, ठीक उसी तरह ‘वाइब्रेंट गुजरात’ दरअसल हिंदुत्व के खौफ से थर्रा रहा है और हमारे ‘सिलिकॉन वैली’ वाले राज्य में अब भगवा का भय पसरता जा रहा है। तो क्या हमारा आगे बढ़ना अब पूरा हो चुका है और क्या हम लौट रहे हैं?&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भारतीय राजनीति की शतरंजी बिसात पर संघ के मुकाबले का माहिर खिलाड़ी-समूह कोई नहीं है। वह अपनी हर चाल के बरक्स सामने वाले को भी वही चाल चलने को मजबूर करता है जिसकी बाजी संघी झोले में जाए। यह महज संयोग नहीं है कि धर्मनिरपेक्ष और तमाम वैज्ञानिक प्रगतिशील मूल्यों के प्रवक्ता जवाहरलाल नेहरू के ही परिवार का एक सदस्य आज अचानक प्रतिगामी धारा का प्रतीक बन गया और हर बार की तरह उनकी कांग्रेस पार्टी लाचार मुंह बाए खड़ी है। क्या यह सचमुच की लाचारी है? क्या वास्तव में हमारे देश का कानून और संविधान इस हद तक मजबूर है कि प्रमोद मुतालिक या वरुण गांधी जैसे लोग वह करने का हक पा चुके हैं जो वे कर रहे हैं? फिर अकेले सिमी जैसे संगठनों को ही हम क्यों खत्म होते देखना चाहते हैं?&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यह अनायास नहीं है कि मुंबई में देश पर अब तक के सबसे बड़े आतंकवादी हमले के बावजूद ‘इस्लामी आतंकवाद’ का सुर कुछ शांत-सा लगा। दरअसल, ईसाइयों और उनके गिरजाघरों पर हिंदुत्व के झंडाबरदारों के हमले से लेकर राज ठाकरे के आतंक तक पर जो बहस जोर पकड़ती जा रही थी, उसमें इस्लामी आतंकवाद के अमेरिकी राग पर टिके रहना संभव नहीं रह गया था। रही-सही कसर महाराष्ट्र एटीएस ने आतंकवाद के हिंदुत्ववादी चेहरे का पर्दाफाश करके पूरी कर दी। अब चूंकि असुरक्षा और भय के ध्रुवीकरण की गुंजाइश कम हुई, तो इसके बरक्स गुजरात में आजमाया हुआ नफरत का नुस्खा एक आसान औजार के रूप में सामने है। यह कौन जानता है कि वरुण गांधी ने मुसलमानों और सिखों के खिलाफ जवानी के जोश में आकर जहर उगला या फिर यह सब कुछ ठंडे दिमाग से सोच-समझ कर सामूहिक रूप से लिया गया फैसला था।&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सत्ता पर कब्जा करने से पहले उसके तंत्र पर कब्जा करना जरूरी होता है। हिंदुत्व की सामाजिक सत्ता पर तो पहले ही संघी व्यवस्था काबिज है। तंत्र में भी इसका चेहरा बार-बार दिखता है। लेकिन राजनीतिक सत्ता पूरी तरह संघ के कब्जे में आना थोड़ा मुश्किल है क्योंकि उसके सूत्रों को कांग्रेस भी अच्छी तरह समझती है और कई-कई ‘उदार’ चेहरों के साथ अक्सर उस पर अमल भी करती दिखती है। और दूसरे, कि उन सूत्रों की बारीकियों की परतें उघाड़ने वाले लोग भी रह-रह कर उठ खड़े होते हैं। कन्नड़ के विख्यात लेखक यूआर अनंतमूर्ति ‘मोदी-सावरकर-गोड्से’ की त्रिमूर्ति को संघ परिवार का मॉडल मानते हैं। यानी मोदी जैसा प्रशासक, सावरकर का दर्शन और गोड्से को पीड़ित मानने का फार्मूला, यानी एक आम हिंदू मानस की ‘आकांक्षाओं’ का मॉडल। नरेंद्र मोदी के बाद पहली बार भाजपा या संघ परिवार को अपने मॉडल के लायक कोई ‘हीरो’ मिला है। यह अलग बात है कि नरेंद्र मोदी, प्रमोद मुतालिक, योगी आदित्यनाथ या वरुण गांधी जैसों के उगले जहर की जमीन पर जो देश या समाज खड़ा होगा, उसका बोझ संभाल पाना शायद खुद भाजपा के लिए भी मुश्किल होगा।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-weight: bold; font-style: italic;"&gt;(जनसत्ता में प्रकाशित)&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9014245926951665678-1815843455402043521?l=charwakshesh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://charwakshesh.blogspot.com/2009/05/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (शेष)</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>3</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-9014245926951665678.post-6696272024396971405</guid><pubDate>Mon, 26 Jan 2009 13:32:00 +0000</pubDate><atom:updated>2009-01-26T05:34:51.853-08:00</atom:updated><category domain='http://www.blogger.com/atom/ns#'>बहस</category><title>स्री विमर्श बरास्ते सविता भाभी डॉट कॉम...!</title><description>बात कहां तक पहुंचेगी, मुझे नहीं मालूम। लेकिन फिलहाल निवेदन है कि मोहल्ले पर शुरू हुआ "सविता भाभी डॉट कॉम" मार्का स्त्री विमर्श देखिए-सुनिए, गुनिए और अपना ही सिर धुनिए...।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिन में घुसते ही बड़े संघर्ष के बाद इस कथित विमर्श के पार उतरा और रात में दूरदर्शन (शनिवार को) पर एक देखी हुई फिल्म "अस्तित्व" देखा। उसी समय दिन का विमर्श याद आया और वासुदेव भट्टाचार्य की फिल्म "आस्था" में एक प्रोफेसर दंपति की कहानी भी याद आई। अफसोस कि दोनों फिल्मों की नायिकाओं को किसी "सीन" में सविता भाभी टाईप का कोई डॉट कॉम देखते हुए नहीं दिखाया गया। अव्वल तो शायद उस वक्त "सविता भाभी..." पैदा नहीं हुआ था (पता नहीं, तब इस तरह के दूसरे डॉट कॉम थे या नहीं) और दूसरे कि अगर कोई और "एक्साइटिंग साइट" का सहारा ले लिया जाता तो इन दोनों फिल्मों की नायिकाओं को अपने "अस्तित्व" के लिए उतना जद्दोजहद करने की जरूरत ही कहां पड़ती। फिर कहानी भी नहीं बढ़ती। सॉरी, फिर कहानी तो अइसा बढ़ती कि "सविता भाभी..." की तरह फिल्मों की धारावाहिक ही चलाना पड़ता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब आगे बढ़ते हैं। (बहुत ज्यादा बढ़ने की न तो इश्कोप है और न इर्रादा- इसलिए धीरज को पकड़े रहिएगा। नही त बरॉड माइंडेड लोगों में आपका गिनती नहीं होगा। (भाषा में लिंग की भयानक गड़बड़ियां है न!) कोई बात नहीं। बात कहने का कोशिश करता हूं)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"सविता भाभी..." पर एक "लड़की" के कमेंट के बहाने स्त्री विमर्श के व्याख्याकार फरमा रहे हैं कि "तमाम की तरह की मुक्ति और बदलावों की बात कर लेने के बाद कोई स्त्री सेक्स पर बात करती है।" लेखाक (गलती से ले के बाद एक ठो (बिहारियों को किसी संख्या के बाद "ठो" कहने की आदत होती है) आ का डंडा लग गया है। माफ किजिएगा, अब कोन पीछे जेके डी-लिट करे। (लगता है डिलीट में भी मात्रा गड़बड़ा गया। कोई बात नहीं। बात है तो आगे बढ़ेगी।) महोदय "स्त्री विमर्श" की बात को "तमाम तरह की मुक्ति" में शामिल नहीं करते। खैर! करते हैं बदलाव की बात।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बदलाव के किन-किन चरणों को पार कर एक स्त्री "सविता भाभी..." पर पहुंचती है? बदलाव और मुक्ति की आपकी अवधारणा क्या है? एक स्त्री और पुरुष के दिमागी ढांचे का हमारे इस सामाजिक ढांचे से क्या कोई ताल्लुक है? इस सामाजिक ढांचे का सत्ता-सूत्र किनकी उंगलियों से जुड़ा और संचालित होता है? और दूसरे बहुत सारे सवालों को छोड़ कर एक आखिरी सवाल कि इस पूरे ढांचे में वे कौन-कौन से बदलाव हैं, जिन्हें पार कर एक स्त्री खुल कर सेक्स के स्तर पर बात करना चाहती है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माफ करिएगा दोस्तों! इस आखिरी सवाल के बाद मैं कई और सवालों से जूझने लगता हूं। मसलन, सबसे आधुनिक दिखते हुए (और जाहिर है, यह आधुनिकता कपड़ों और फैशन के स्तर पर ही होगी) जब हम सड़क पर अपना गुरूर बिखेर रहे होते हैं, क्या हम उस वक्त अपने भीतर की हिंदू-मुस्लिम या किसी और मजहब या फिर ब्राह्मण या चमार की चेतना से मुक्त हो चुके होते हैं? लो-वेस्ट जींस या फंकी टाईप आधुनिकता ओढ़े हम अपने अस्तित्व को बाजार के गटर में गिरवी रख चुके होते हैं और गुमान में फूले नहीं समाते कि हम आधुनिक हो गए! डॉक्टरी, इंजीनियरी, पीएचडी, कलक्टरी या ऐसी तमाम पढ़ाइयों के बाद बाप के बहाने ब्याह के रास्ते दहेज के रूप में कीमत तय करते वक्त अपनी ही दलाली कर रहे होते हैं और आधुनिकता का ठेका भी उठाते हैं! मॉडर्न आउटलुक का इनरलुक कितना जातिवादी होता है और जातिवाद के किन महीन औजारों के साथ हैसियत का खेल खेलता है, क्या उसी "सॉफिस्टिकेटेड" ऐयारी को आधुनिकता कहना चाहते हैं हम?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देह के दम पर सबकी नजर अपनी ओर खींचने की कोशिश को मुक्ति का मार्ग समझने वाली या "सविता भाभी..." में अपनी पसंद जाहिर करने वाली लड़की का यह हक है कि अपने वजूद के एक सबसे जरूरी हिस्से के तौर पर यौन आकांक्षाओं को अपनी कसौटी पर कसे। लेकिन जब हम इन्हीं में कइयों को सोलह-श्रृंगार कर सफेद घोड़े पर सवार राजकुमार पति का ख्वाब देखते या चांद को देख कर पति के इंतजार में भूख से ऐंठती अंतड़ियों के तनाव के साथ करवा चौथ निबाहते दिखते हैं, तब भी ये क्या उतनी ही आधुनिक होती हैं? ऐसी बहुत-सी आधुनिक लड़कियां तब पति-परमेश्वर की सारी मर्दानगी को अपने भीतर जज्ब करना अपनी खुशनसीबी समझने लगती हैं। फिर "सविता भाभी..." के जरिए पैदा हुई देह की उत्तेजनाओं की सारी ऊर्जा एक अच्छी बहू और फिर एक सख्त सास बनने की कल्पना में स्खलित होने लगती है। अपनी व्याख्या और जानकारी के दायरे में खुल कर सेक्स बतियाने वाली बहुत-सी औरतें अपने पति की तमाम दैहिक-मानसिक बर्बरताओं को उनका हक मानती हैं। वे औरतें "सविता भाभी..." के बारे में नहीं जानती होंगी, लेकिन जब वे इसे देखने-जानने भी लगेंगी, तब क्या "सविता भाभी..." छाप स्त्री विमर्श उनके दिमागों के ये जाले साफ कर सकेगा?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक लड़की (?) इस डॉट कॉम पर कमेंट करती है और हम इसके स्त्री विमर्श का एक नया अध्याय होने की मुनादी कर देते हैं। करें भी क्यों नहीं। अब तक एक स्त्री का हंसना-रोना, मरते हुए जीना भी तो हम ही तय करते आए हैं। "मित्रो मरजानी" की उस स्त्री से "सविता भाभी..." की तुलना करते हुए हमारे सामने से यह मामूली-सी बात भी क्यों गुजर जाती है कि "मित्रो मरजानी" की उस स्त्री के फैसले का सामाजिक परिप्रेक्ष्य क्या है। कहीं यह हमारी सेक्स पर खुल कर बात करने की "मर्दाना ताकत" की सीमा तो नहीं है! हमारा पूरा नजरिया किस कदर खंडित है, इसका अंदाजा इससे लगाइए कि "सविता भाभी..." तक अपनी या किसी की पहुंच को हम सशक्तीकरण की कसौटी मानते हैं और मस्तराम मार्का लोग हमारी नजर में पिछड़े और असभ्य होते हैं। क्या फर्क है मस्तराम की किताबों और "सविता भाभी..." में?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समझना है तो ऐसे समझिए कि यह आभिजात्य और गैर-आभिजात्य का फर्क है। वर्गों की पहुंच और चुनाव का फर्क है। देखेंगे-सुनेंगे-गुनेंगे हम वही, लेकिन हमारा लैपटॉप या कंप्यूटर हमें आधुनिक बना देता है, खासतौर पर उनके सामने जो चाह कर भी "मस्तराम"" के दायरे से ऊपर नहीं आ सके हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"आस्था" फिल्म में प्रोफेसर पति दो मिनट में "सब कुछ" निपटा कर घोलट जाता है, जैसे कोई घंटो पान मुंह में चबा कर सेंकेडों में थूक दे। हालात का सिरा थामे पत्नी आखिरकार कहीं और ही मुक्त होती है और "सब कुछ" का विस्तार जान पाती है। क्या हमने अपने गांव-देहातों में "ऊपरी असर" या "भूतों"" के चंगुल में फंसी जवान औरतों को ओझाओं के सामने बाल खोल कर झूमते देखा है? क्या हम अब भी यह अंदाजा लगा पाने में नाकाम हैं कि वे ओझा उन औरतों को किस तरह उनके "भूतों" से मुक्त करते होंगे? हम एक ऐसे अप्रशिक्षित मर्द समाज में जी रहे हैं दोस्तों कि उन्माद के दौरे तक पहुंची स्नावयिक उत्तेजनाओं के शमन के बिना हजारों औरतें हीस्टीरिया का शिकार हो जाती हैं और पंडितों-ओझाओं के अलावा उनका मुक्तिदाता कोई नहीं होता। स्त्री की देह को उसकी मुक्ति का एकमात्र रास्ता बताने वाले कई "मर्द" मित्रों की मस्तराम-छाप यौन जानकारियां और यौनांगों के बारे में मूढ़ धारणाएं मेरे सामने कुछ अजीब से सवाल खड़े करते रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"सविता भाभी..." तक जिनकी पहुंच है, वे देह के स्तर पर खुद को "रिलीज" करने के रास्ते निकाल लेंगी, लेकिन दिमागी जड़ताओं से निपटने का उनका रास्ता क्या होगा? बेशक "सेक्स इज फॉर प्लेजर", लेकिन क्या यह स्त्री को एक व्यक्ति के रूप में स्वीकार किए बिना और यौन-कर्म को दो मिनट में फारिग होने की चीज समझने वाले मर्दों का उत्तेजना-केंद्रों का आविष्कारक हुए बिना मुमकिन है? "ऑरगेज्म" अगर पुरुषों की नियति है तो स्त्री का भी हक है। लेकिन जहां अपनी ही शारिरिक संरचना और उसकी बारिकियों को जानना-समझना एक शर्म का मामला हो और अपराध-बोध जगाता हो, वहां "सविता भाभी..." क्या सचमुच स्त्री विमर्श का एक नया पाठ तैयार कर रहा है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इससे इनकार नहीं कि आज की लड़कियां अपने शरीर के बारे में इतनी अनजान नहीं हैं। मगर क्या इस सवाल के भी खत्म होने के आसार नजर आ रहे हैं कि हमारी औरतों के बरक्स जो मर्द खड़ा है, उसकी निगाह में सेक्स की मांग करने वाली औरत की जगह कहां है? "अस्तित्व" फिल्म का हीरो अपनी बीवी को पच्चीस साल पहले के एक बार के संबंध की "खोज" करने के बाद खारिज कर देता है और अपने कई स्त्रियों के साथ संबंध होने के एक मित्र के सवाल का जवाब यह देता है कि "मैं तो एक मर्द हूं।" यह वही आम मर्द है जो अपने "प्लेजर" के लिए ज्यादा से ज्यादा भोग करने लिए अपनी पहुंच में आई सभी स्त्रियों के सामने जाल फेंकता है और "अपनी" स्त्री के दिमाग में किसी और मर्द की बात की कल्पना से भी दहल जाता है। स्त्री की रोजमर्रा की चर्चा में सेक्स के खुलेआम होने के डर के पीछे भी यही एकाधिकार के बर्बर संस्कार है और डरा हुआ मर्द अहं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जहां तक सामंती और गुलामी की संस्कृति का सवाल है, हमें याद करना चाहिए एम-फिल या पीएचडी करती उन "कनकलताओं" के किस्से, जो पानी का नल छू देती हैं और इस देश का पानी अपवित्र हो जाता है। फिर जाति का हवाला और जलील करने के दौर। क्या इस संस्कृति में भी "सविता भाभी..." -छाप स्त्री विमर्श कोई दखल देने का रास्ता तैयार कर रहा है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह वहम पालने की जरूरत नहीं है कि औरतें अपनी लड़ाई या खुल कर सेक्स पर बात करने या इस मामले में सामने आने को वैधता दिए जाने के लिए इस समाज की "मर्दाना ताकत" के भरोसे बैठी हैं। वे अपने बूते हमारी मर्दानगी को आईना दिखा रही है, जिसमें हम बार-बार नंगे नजर आते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कभी फुर्सत मिले तो बालिका भ्रूण-हत्या की असली वजहों का पता लगाने की कोशिश कीजिएगा कि कितनी भ्रूण-हत्याओं के लिए दहेज जिम्मेदार है और कितने के लिए यह कुंठा कि हमारे भीतर "दूसरी" औरतों के लिए जो "जगह" होती है, वहां पहुंचने से पहले "अपनी" औरतों को हम "बचा" लेते हैं। जिस समाज में औरत के शरीर को ही उसकी हैसियत तय कर दिया गया है, उसे बनाए रखने में "सविता भाभी डॉट कॉम" छाप प्रगतिशीलता कितनी मदद करती है- यह भी खोजने की कोशिश की जानी चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्रांति-क्रांति चिल्लाने और क्रांति जीने में फर्क है। मुझे नहीं लगता कि दिल-दिमाग या बुद्धि की बदौलत अपनी शख्सियत दर्ज करने वाली लड़की के लिए सेक्स कोई वर्जित चीज है और वह कहीं से सेक्स को कम जीती है। हां, वह सविता भाभी जैसे डॉट कॉमों पर जाकर अपनी पसंद दिखाने को अपनी बहादुरी नहीं मानती। इसमें मुझे कोई शक नहीं कि यह लड़की उससे ज्यादा "खतरनाक" जरूर है, जिसका "सविता भाभी डॉट कॉम" पर एक कमेंट करना हमारे लिए एक आकर्षण की चीज बना हुआ है।  और हममें से ज्यादातर सविता भाभी... पर जाकर उसका कमेंट देखने के बाद उसके आकार-प्रकार की कल्पना कर रहे होंगे। हम उस कमेंट करने वाली लड़की का पीठ जरूर थपथपाएंगे, ताकि वह हर अगले पोस्टों में नजर आए...!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिमागी जड़ताओं से जब तक मुक्ति नहीं मिलती, केवल देह के रास्ते मुक्ति मुमकिन नहीं है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9014245926951665678-6696272024396971405?l=charwakshesh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://charwakshesh.blogspot.com/2009/01/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (शेष)</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>6</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-9014245926951665678.post-1082189260878488383</guid><pubDate>Sat, 01 Nov 2008 15:07:00 +0000</pubDate><atom:updated>2009-01-09T23:16:13.713-08:00</atom:updated><category domain='http://www.blogger.com/atom/ns#'>अंधविश्वास</category><category domain='http://www.blogger.com/atom/ns#'>मीडिया</category><category domain='http://www.blogger.com/atom/ns#'>समाज</category><title>अंधविश्वास के अंधकार में</title><description>&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;"किसी को आत्मा के अमरत्व में विश्वास करने के लिए लगा दो और उसका सब कुछ लूट लो। वह हंसते हुए इस लूट में तुम्हारी मदद भी करेगा"-&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#330000;"&gt; अप्टन सिनक्लेयर।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/SWhEO_P7HoI/AAAAAAAAAa0/UmWNw1EuHOc/s1600-h/s-3.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5289552786633727618" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 200px; CURSOR: hand; HEIGHT: 150px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/SWhEO_P7HoI/AAAAAAAAAa0/UmWNw1EuHOc/s200/s-3.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;तंत्र-मंत्र और रूहानी इल्म के माहिर/ खुला चैलेंज/ लाभ 100 प्रतिशत/ 20 मिनट में गारंटी कार्ड के साथ/ जैसा चाहोगे, वैसा होगा/ माई प्रॉमिस/&lt;br /&gt;नोट- अगर आपका विश्वास किसी ज्योतिष, पंडित-बाबा, मियां-मुल्ला, तांत्रिक से उठ गया हो तो एक बार अवश्य मिलें&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मनचाहा वशीकरण स्पेशलिस्ट&lt;br /&gt;कारोबार में रुकावट, बंदिश, गृह-क्लेश, मियां-बीवी के झगड़े, तलाक, दुश्मन और सौतन से छुटकारा, कर्ज मुक्ति, संतानहीनता, कोख बंधन, मुठकरनी, विदेश यात्रा, लव-मैरिज, फिल्मी और मॉडलिंग कैरियर में रुकावट जैसी जीवन की जटिल समस्याओं का समाधान।&lt;br /&gt;चेतावनीः मेरे किए को काटने वाले को 1,51,000 रुपए ईनाम।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सभी इल्मों की काट हमारे पास है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;-प्यार में चोट खाए स्त्री एवं पुरुष एक बार अवश्य मिलें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;-एक अगरबत्ती का पैकेट दो नींबू साथ लाएं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रुहानी और सातों इल्मों के बेताज बादशाह। वर्ल्ड फेमस&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- सिद्ध गुरू अकबर भारती या समीरजी (बंगाली)&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नगर सेवा की बसों, सड़क के किनारे या पेशाबखानों की दीवारों जैसी जगहों पर चिपकाए गए 'गुप्त रोगों का शर्तिया इलाज' की तरह के ऐसे विज्ञापनों पर एक 'पढ़े-लिखे' और 'सभ्य' व्यक्ति होने के नाते हमारी क्या प्रतिक्रिया होती है? हम मुंह बिचकाते हैं, ऐसा विज्ञापन करने वालों को ठग और मक्कार कहते हैं और उनके पास जाने वाले लोगों को मूर्ख मानते हैं। अगर हम ऐसा विज्ञापन करने वाले ठगों और मक्कारों को अपराधी की तरह देखते हैं या उनके खिलाफ हमारे भीतर नफरत के भाव पैदा होते हैं तो शायद यह गलत नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसी राय रखने वाले हम सब आमतौर पर बहुत अच्छी शिक्षा प्राप्त, बहुत अच्छी और साफ-सुथरी जीवनशैली वाले, सूटेड-बूटेड टाईयुक्त कपड़े पहनने वाले और अपनी पहुंच के लगभग सभी आधुनिक उपकरणों-संसाधनों का इस्तेमाल करने वाले होते हैं। वैसे विज्ञापनों पर ऐसे 'सभ्य, शिक्षित और विकसित' समाज का हिस्सा होने के नाते हमारी इस तरह की प्रतिक्रिया के बाद हम अपनी 'सभ्यता' और 'सामाजिक ऊंचाई' में थोड़ा और इजाफा होता हुआ महसूस करते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और जब समूचे समाज और उसकी सभ्यता को 'दिशा' देने वाले मीडिया को भी हम कुछ इसी तरह का या इससे भी ज्यादा असरदार तरीके से ऐसा ही काम करते हुए देखते हैं, तब हमारी क्या प्रतिक्रिया होती है? जब हम टीवी पर सूटेड-बूटेड टाईयुक्त और 'सभ्यता की पराकाष्ठा' पर पहुंचे हुए लोगों को लगभग चिल्ला कर यह कहते हुए देखते-सुनते हैं कि 'प्रलय... अब धरती बस खत्म होने वाली है' तो हमारे भीतर कौन-से भाव पैदा होते हैं? उस वक्त क्या हमें सड़क के किनारे या पेशाबखानों की दीवारों पर चिपकाए हुए वे विज्ञापन याद आते हैं? क्या ऐसे विज्ञापन करने वालों की मक्कारी और 'समस्याओं से मुक्ति' के लिए उन जगहों पर जाने वाले लोगों की मूर्खता याद आती है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शायद नहीं। गहरे सम्मोहन के उस दौर की गुलामी की बात ही निराली है। उदयपुर के राकेश और राजग़ढ़ की छाया ने जो किया, उसी सम्मोहन के उन्माद का चरम है, जिसमें झूमते हुए तो बहुत सारे लोगों को देखा जा सकता है, लेकिन 'अंत' से पहले खुद को खत्म कर लेना सबके लिए मुमकिन नहीं होता। हां, 'जिंदा' रहते हुए मौत की चाहे जितनी पीड़ा वे झेल लें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक टीवी चैनल पर ज्योतिष संबंधी कार्यक्रम देखने के बाद राकेश ने एक कागज पर लिखा- 'कार्यक्रम को देख कर मुझे लगा कि मैं गलत ग्रह-नक्षत्र में पैदा हुआ हूं और इस वजह से मैं काफी परेशान हूं।' इसके बाद उदयपुर के बीएन कॉलेज में स्नातक प्रथम वर्ष के उस छात्र ने गले में फंदा लगा कर जान दे दी। इसी तरह एक ओर 'बिग बैंग' की सच्चाई की खोज में विज्ञान अब तक के सबसे बड़े प्रयोग की तैयार कर रहा था और टीवी चैनल इस प्रयोग के साथ ही 'धरती के अंत' की मुनादी कर रहे थे। पर्दे पर चीखते-चिल्लाते कुछ सूटे़ड-बूटेड टाईयुक्त पत्रकारनुमा लोग डरावने जंगल के वीराने या मौत के खौफ से आच्छादित श्मशान कब्रिस्तान के अघोड़ियों या तांत्रिकों से कम नहीं लग रहे थे। उससे पैदा होने वाली उत्तेजना में छाया ने तो कीटनाशक की दवा खाकर जान दे दी (मरने से पहले उसने पुलिस को बयान भी दिया), लेकिन हजारो-लाखों जानते हैं कि उस पूरे दौर में वे किस तरह तिल-तिल कर मरने के अहसास से गुजरते रहे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ समय पहले विज्ञान और वैज्ञानिक चेतना के प्रचार-प्रसार के लिए काम करने वाली संस्था 'स्पेस' ने इस बात पर गहरा क्षोभ जताया था कि विज्ञान के जिन आविष्कारों का इस्तेमाल अंधविश्वासों के जाले साफ करने में किया जाना चाहिए, उसी का सहारा लेकर आदमी को और अंधा बनाया जा रहा है। सवाल है कि विज्ञान के कंधों पर सवार ये आधुनिक और विकसित-से दिखने वाले 'प्राणी' ऐसा क्यों कर रहे हैं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरअसल, जब अक्ल को केवल तिजारत का हथियार बना लिया जाता है तो सारी नैतिकताएं पीछे छूट जाती हैं। अगर बात केवल टीवी चैनलों की करें तो जैसा कि कभी-कभी अंदाजा लगाया जाता है, खेल क्या केवल टीआरपी बढ़ाने का है? एक मकसद यह जरूर है। मगर यह सिर्फ दिखाई देने वाला व्यापार है। इसके पीछे जो महीन और शातिर मिजाज काम कर रहा होता है, एकबारगी उस पर यकीन होना मुश्किल है। लेकिन किसी भी गतिविधि को उसके असर की गहराई की बुनियाद पर आंका जाना चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/SWhDz77g4GI/AAAAAAAAAak/kvQfj67kYAA/s1600-h/s-1.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5289552321886347362" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 188px; CURSOR: hand; HEIGHT: 200px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/SWhDz77g4GI/AAAAAAAAAak/kvQfj67kYAA/s200/s-1.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;कई बार लगता है कि जादू-टोना और झाड़-फूंक के चमत्कार से मन की साध पूरी कराने का दावा करने वाले ओझाओं और टीवी चैनलों या अखबार में इस तरह की खुराक परोसने वाले संचालक एक ही पायदान पर खड़े हैं और उन्हें समाज के मनोविज्ञान की गहरी समझ होती है। यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि किसी भी व्यक्ति या समाज का मनोविज्ञान उसका सांस्कृतिक परिवेश तैयार करता है। अनंत ब्रह्मांड में सैर करती हमारी कल्पनाएं और जीवन की सीमाओं के बीच झूलती उम्मीदें और मायूसियां। जिन चीजों तक हमारी पहुंच होती हैं और जो किसी भी तरह से हमारे सामने मुहैया हो जाती हैं या जो कम-से-कम साक्षात हैं, उससे इतर कुछ भी पाने के लिए तो चमत्कार का ही आसरा है न! पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही चमत्कार या अदृश्य शक्तियों की धारणाएं हमारी चेतना में इस कदर गहरे पैठी होती हैं कि तुरत-फुरत कुछ हासिल कर लेने की हसरत या एक छोटी नाकामी भी हमें बेबस या लाचार बना देती है। फिर शुरू होता है दिमागी काहिली का दौर, जो जिंदगी को आखिरकार चमत्कार के रहमोकरम पर ले जाकर छोड़ देता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और चमत्कारों या अदृश्य दुनिया के खयाल का तिजारत करने वाले लोग हमारी उसी बेबसी का शोषण करते हैं। हम बिल्कुल भरे-पूरे, हर तरह से खुद को सेहतमंद महसूस करेंगे, लेकिन ज्यों ही हमें बताया जाएगा कि 'स्वर्ग जाने वाली सीढ़ियां खोज ली गई हैं', हम तुरंत ही अपनी उस ख्वाबों की दुनिया में पहुंच जाते हैं जो हमारे दिमाग में सोच का एक हिस्सा बना बैठा होता है। 'मर्दखोर परियां' एकबारगी हमें जन्नत की हूरों के साथ फूलों की सेज पर ला पटकती हैं। सीता से जुड़ी जगहों को श्रीलंका में खोज लेने की खबर आती है और तत्काल हम खुद को 'तथास्तु' कहते हुए 'श्रीराम' के सामने पाते हैं। भूतों की लड़ाई की 'लाइव कवरेज', रावण की वायुसेना और हवाईअड्डों पर 'ब्रेकिंग न्यूज' हमारी कल्पनाओं की पुष्टि करते लगते हैं। कुछ समय पहले एलियंस 'धरती पर हमला' करने आ रहे थे। ये सारी बातें 'शोधकर्ताओं' के हवाले से कही जाती हैं, ताकि इन्हें ज्यादा से ज्यादा विश्वसनीय बनाया जा सके। शकुन-अपशकुन पर आधारित कर्मफल का ब्योरा देता ज्योतिषि केवल कमाई नहीं कर रहा होता है। वह खूब जान रहा होता है कि इन सबसे कैसे उसका वर्गहित कायम रहता है और सामाजिक शासन और शोषण-परंपरा की बुनियाद और मजबूत होती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारी त्रासदी केवल पंडे-तांत्रिक या मीडिया तक ही सीमित नहीं है। तल्ख हकीकतों से लबरेज 'सत्या' जैसी फिल्म बनाने वाले रामगोपाल वर्मा 'फूंक' बना कर यह खुली चुनौती पेश करते हैं कि अगर कोई थियेटर में अकेले इस फिल्म को देख लेगा तो उसे पांच लाख रुपए ईनाम के तौर पर दिए जाएंगे। 'फूंक' में भूत-प्रेत या भगवान में यकीन नहीं रखने वाले नायक के साथ-साथ विज्ञान, चिकित्सा-विज्ञान और एक प्रगतिशील सोच को हारते और 'काला जादू' को जीतते दिखाया गया है। यह हजारों सालों से 'काला जादू' की गिरफ्त में जीते समाज के भावनात्मक शोषण के अलावा और क्या है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/SWhGFlAWfRI/AAAAAAAAAa8/ykdsNSJhm5s/s1600-h/s-4.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5289554823993523474" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 200px; CURSOR: hand; HEIGHT: 141px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/SWhGFlAWfRI/AAAAAAAAAa8/ykdsNSJhm5s/s200/s-4.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;लेकिन बात अगर यहीं खत्म हो जाती तो बात और थी। विज्ञान की बुनियाद पर अपनी पहचान कायम करने वाले एक पूर्व राष्ट्रपति से लेकर इस देश के कई शीर्ष नेताओं तक को 'चमत्कारी बाबाओं' के पांव पखारने में शर्म के बजाय गर्व ही महसूस होता रहा है। मानव संसाधन विभाग (यह मंत्रालय देश में वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देने के लिए जिम्मेदार है) के एक पूर्व राज्यमंत्री ने तो बाकायदा ओझाओं-तांत्रिकों का सम्मेलन ही करा डाला था। हाल ही में एक विधायक ने एक बड़े आयोजन में 265 भेड़ों की बलि दी, क्योंकि परमाणु करार के मुद्दे में खतरे में पड़ी यूपीए सरकार 'किसी तरह' विश्वासमत में जीत सकी। कुछ विधायकों की उनके कार्यकाल में अलग-अलग कारणों से हुई मौत के चलते विधानसभा भवन को भूत-प्रेत से ग्रस्त मान लिया जाता है। यह महज संयोग नहीं है कि ज्योतिष शास्त्र को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाए जाने की वकालत सिर्फ इसलिए की जाती है क्योंकि यह भारतीय संस्कृति का अभिन्न हिस्सा रहा है। देश को नेतृत्व देने का दावा करने वाले ऐसे राजनेताओं को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि इससे देश-समाज कितना पीछे जाता है या आधुनिक दुनिया में देश की कैसी छवि बनती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सवाल है कि अगर कोई तांत्रिक या व्यक्ति किसी बच्चे की बलि देता है तो उसके लिए कौन-सी स्थितियां जिम्मेदार हैं? सुना है कि कानून अपराध के लिए प्रेरित करने वाले को भी अपराधी ही मानता है। तांत्रिकों-ज्योतिषियों सहित ताजा फिल्में- 'फूंक' या '1920' जैसी फिल्में बनाने वाले ऐसे लोगों को क्या अंधविश्वासों और सामाजिक जड़ता को बनाए रखने का अपराधी नहीं माना जा सकता? इनके लिए कौन-सा कानून लागू होता है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह सब जवाहरलाल नेहरू के उस देश में हो रहा है, जो समाज को एक वैज्ञानिक सोच की जमीन पर खड़े होकर देखना चाहते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हाल ही में एक अति पिछड़े माने जाने वाले समाज की एक सांस्कृतिक गतिविधि के साक्षात के दौरान इन पंक्तियों के लेखक ने देखा कि किस तरह करीब हजार लोगों की भीड़ के बीच भयानक उन्माद पैदा करते ओझाओं ने भेड़ों की बलि दी और उसके खून से खुद को नहाया। यह सुदूर देहात के एक पिछड़े इलाके की घटना है। लोग भूले नहीं होंगे कि सारी आधुनिकताओं से लैस देश की राजधानी के एक उपनगर गाजियाबाद में, जो संयोग से 'हाईटेक' भी घोषित हो चुका है, तीन बेटों ने अपनी मां की पीट-पीट कर इसलिए बलि दी क्योंकि एक तांत्रिक ने उन्हें ऐसा करने की सलाह दी थी। लेकिन विज्ञान की डिग्रियों की मार्फत इंजीनियर या डॉक्टर बने उन बेटों की मूढ़ता और त्रासदी पर हमक्या अफसोस जताएं। हमारे देश के अंतरिक्ष शोध संस्थान, यानी 'इसरो' का मुखिया जब पीएसएलवी जैसे अंतरिक्ष यानों के सफल प्रक्षेपण के लिए मंदिरों में पूजा आयोजित करता है और भगवान से खुद को कामयाब करने की याजना करता है तो एक पिछड़े समाज के सामने ओझाओं के उस उन्माद प्रदर्शन पर कौन-सा सवाल उठाया जाए?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूरदराज के इलाकों में बहुत सारे मां-बाप अपने बच्चों की ओर आज भी यह जुमला उछालते हुए मिल जाएंगे कि 'देह बढ़ गया और दिमाग वहीं रह गया।' तो क्या हमारा समाज आधुनिकता की तमाम ऊंचाइयों को छूने की कोशिश के बावजूद अब भी किसी एक जगह पर ठहरा हुआ है? या उसे जड़ बनाए रखने की साजिश चल रही है? क्यों हम अब तक ऐसा कोई कारगर कानून बना सकने में नाकाम रहे हैं जो ओझाओं-तांत्रिकों, ग्रह-नक्षत्रों का पाठ पढ़ाने वाले ज्योतिषियों, चमत्कारों और अमूर्त दुनिया के किस्से परोसने वाले मीडिया आदि के ठगी के धंधे से समाज को बचा सकें?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन सवालों के जवाब शायद विश्व हिंदू परिषद के 'अंतरराष्ट्रीय मुख्यमंत्री' रहे प्रवीण तोगड़िया के उस बयान में मिल जाते हैं, जो उन्होंने कुछ साल पहले गोलवलकर गुरु के सौंवे जन्म दिवस के मौके पर आयोजित 'विराट हिंदू सम्मेलन' में दिया था। महाराष्ट्र सरकार द्वारा लाए गए अंधविश्वास विरोधी कानून के मसले पर उनका कहना था कि हिंदुओं को इस कानून का विरोध करना चाहिए क्योंकि यह हिंदुत्व को खत्म करने की साजिश है। साफ है कि एक तरह से वे यह भी कर रहे थे कि हिंदुत्व की बुनियाद इन अंधविश्वासों पर ही टिकी है और अंधविश्वासों का खत्म होना, हिंदुत्व के खत्म होने जैसा ही होगा। और विहिप का 'हिंदुत्व' कया है, क्या यह किसी को बताना होगा?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह केवल हिंदुओं के धर्म-ध्वजियों का खयाल नहीं है। सभी धर्म और मत के 'उन्नायक' यही कहते हैं कि सवाल नहीं उठाओ, जो धर्म कहता है, उसका अनुसरण करो। और हमारे भीतर का भय बाहर आने के लिए छटपटाते सारे सवालों की हत्या कर देता है। हमारी विडंबना यह है कि जिनसे हम सवाल उठाने की उम्मीद कर रहे होते हैं, वे खुद एक ऐसा मायावी लोक तैयार करने में लगे होते हैं, जहां कोई सवाल नहीं होता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसमें कोई शक नहीं कि देश-दुनिया से रूबरू कराने में टीवी चैनलों ने हर मुमकिन कोशिश की है। लेकिन असली मुश्किल यह है कि लगभग सारी प्रस्तुतियों में ऐसा कुछ भी नहीं होता जो हमें घटनाओं के विश्लेषण की ताकत देता हो। हम देश-दुनिया को देखें, मगर उसी निगाह से, जिससे हमें दिखाया जाता है। तो क्या यह मीडिया की सीमा है कि वह कुछ 'नया' देने के नाम पर हमें और 'पुराना' बना रहा है? क्या मीडिया इस बात से अनजान है कि भूत-प्रेत, जादू-टोना, ग्रह-नक्षत्र, ज्योतिष, प्रलय-चमत्कार से जुड़े किसी भी कार्यक्रम का एकमात्र असर सामाजिक यथास्थिति और जड़ता को कायम रखना है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मकसद सिर्फ यह है कि समाज सोचने और सवाल उठाने के दौर में न पहुंचे। ऐसे कार्यक्रम परोसने वाले और ऐसी गतिविधियां चलाने वाले धर्मध्वजी यह खूब जानते हैं कि जिस समाज ने सवाल उठाना शुरू कर दिया, उनमें चमत्कारों और तकदीर बताने की दुकान बंद हो जाएगी। इसलिए दिमाग पर पड़े जाले बनाए रखने और नए-नए डिजाइन में नए जाले पेश करने का खेल जारी है। साधना या संस्कार जैसे चैनलों की तो बात छोड़ दें, प्रगतिशील कहे जाने वाले समाचार चैनलों के साथ-साथ इस खेल में हर वह तबका शामिल है, जो दुनिया को दिशा देने का दावा करता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ ही समय पहले एक टीवी चैनल के मुखिया ने इस तरह के पाखंडों वाले कार्यक्रम दिखाने के मसले पर साफ जवाब दिया कि मुझे इस बात के लिए कतई शर्मिंदगी नहीं है। शायद वे सही कह रहे थे। इससे इतना तो जाहिर होता ही है कि जो कुछ हो रहा है, वह अनायास बिल्कुल नहीं है। एक सजग और सचेत समाज केवल यह नहीं देखेगा कि 'क्या' है, बल्कि वह उस 'क्या' के 'क्यों' की भी मांग या खोज करेगा। लेकिन सिर्फ 'क्या' परोस कर 'क्यों' का सवाल सिरे से गायब कर देने की कोशिश लगातार और सायास तरीके से चल रही है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9014245926951665678-1082189260878488383?l=charwakshesh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://charwakshesh.blogspot.com/2008/11/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (शेष)</author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/SWhEO_P7HoI/AAAAAAAAAa0/UmWNw1EuHOc/s72-c/s-3.jpg' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>3</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-9014245926951665678.post-6477916372708400161</guid><pubDate>Wed, 15 Oct 2008 07:39:00 +0000</pubDate><atom:updated>2008-10-15T01:19:23.676-07:00</atom:updated><category domain='http://www.blogger.com/atom/ns#'>आईना</category><title>हिंदुत्व के निशाने पर देश</title><description>&lt;span style="font-size:130%;"&gt;असली खेल तो कुछ और है... &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_Zl-3hmYZQL8/SO3z_FrGR9I/AAAAAAAAEGo/KUacM9jtulQ/s1600-h/kandhmal.jpg" target="_blank"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://2.bp.blogspot.com/_Zl-3hmYZQL8/SO3z_FrGR9I/AAAAAAAAEGo/KUacM9jtulQ/s320/kandhmal.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5255124605391488978" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;strong&gt;भारत&lt;/strong&gt; के नक्सली समूहों की छवि अब भी ऐसी है कि अगर वे किसी घटना की जिम्मेदारी लेते हैं तो उस पर भरोसा किया जा सकता है। लेकिन विश्व हिंदू परिषद के नेता &lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Ashok_Singhal" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;अशोक सिंघल&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) की इस घोषणा को स्वीकार करने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं हैं कि ओडीशा के कंधमाल में स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की हत्या उसने की। भाकपा (माओवादी) की स्वीकारोक्ति के बावजूद विहिप आखिर उसे बरी करने को क्यों तैयार है? क्या वह दिल्ली या अमदाबाद जैसे शहरों में सिलिसलेवार बम धमाकों की कथित जिम्मेवारी लेने वाले इंडियन मुजाहिदीन नाम के अब तक अमूर्त संगठन के बारे में भी ऐसा ही रवैया अपनाने को तैयार हैं? आखिर क्या कारण है कि भाकपा (माओवादी) के प्रति विहिप अचानक ही इतनी उदार हो गयी है और इंडियन मुजाहिदीन केवल विहिप या संघ परिवार ही नहीं, देश के समूचे सत्ता तंत्र के लिए आतंक का एक सहज स्वीकार्य पर्याय बन चुका है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मान लिया जाए कि बजरंग दल या विहिप भाकपा (माओवादी) की घोषित तौर पर लक्ष्मणानंद सरस्वती की हत्या की ली गई जिम्मेवारी स्वीकार कर लेती है। इसके बाद वह किसको निशाना बनाएगी या किससे 'बदला' लेगी? दरअसल, वह नक्सलियों की अपनी ओर से घोषित जिम्मेवारी के बावजूद उनसे टकराने का जोखिम नहीं मोल ले सकती। अव्वल तो इसलिए कि जिस सामाजिक समूह के 'धर्मांतरित' होने का भय विहिप को सताता रहता है, नक्सलियों की पैठ भी सबसे ज्यादा उन्हीं के बीच है। दूसरे, नक्सलियों की बात मानते ही अपने हाथ आया 'मुद्दा' निकल जाने का डर है, जिसको आधार बना कर ईसाइयों पर हमले को जायज ठहराने की कोशिश की जा रही है। सवाल है कि लक्ष्मणानंद सरस्वती की हत्या की 'प्रतिक्रिया' में बजरंग दल ने जो 'खेल' शुरू किया है, वह कितने ईसाइयों का खून पीने, उन्हें जिंदा जलाने या गिरजाघरों को फूंकने के बाद खत्म होगा?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संघ परिवार दरअसल अपने एजेंडे को लेकर जिस धीरज के साथ दूरगामी नीतियां तैयार करता है, वह किसी शोधकर्ता के लिए अध्ययन का विषय होना चाहिए। 1990 के दशक के शुरू में 'जय श्रीराम' के नारे के साथ शुरू हुई लड़ाई बाबरी मसजिद के विध्वंस के साथ ही फुस्स हो गयी थी। हालांकि उसके असर से तैयार हुए मानस के कारण भी भाजपा को आखिरकार देश की गद्दी पर बैठने का मौका मिला। लेकिन यही मौका शायद संघ परिवार के लिए सुयोग और इस देश के लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष स्वरूप में विश्वास रखने वालों के लिए दुर्योग साबित हुआ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छह दिसंबर 1992 को हिंदुत्व के ये उद्धारक देश को यह बता चुके थे कि ये किसकी मर्जी का लोकतंत्र चाहते हैं। उसके लगभग दस साल बाद, यानी मार्च 2002 में एक बार फिर उन्होंने गुजरात जनसंहार की मार्फत दिखाया कि अपने 'दुश्मनों' को काबू में रखने का उनका तरीका क्या है। तब तत्कालीन प्रधानमंत्री &lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Atal_Bihari_Vajpayee" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;अटल बिहारी वाजपेयी&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; समेत हिंदुत्व के समूचे कुनबे के बार-बार रटने के बावजूद 'इस्लामी आतंकवाद' की हवा ने इतना जोर नहीं पकड़ा था। वरना अंदाजा लगाया जा सकता है कि उस सुनियोजित-प्रायोजित दंगे पर देश-समाज और दुनिया की क्या प्रतिक्रिया होती। बहरहाल, इराक पर अमेरिकी कब्जे का मतलब अगर केवल तेल पर कब्जा मान भी लिया जाए, तो 9/11 के हमले के बाद अमेरिका ने जिस 'इस्लामी आतंकवाद' शब्द का ईजाद किया, उसने 'जय श्रीराम' के मरते हुए नारे के सहारे हिंदुत्व को घसीट रही भाजपा और संघ परिवार के लिए जैसे संजीवनी का काम किया। पूरा जोर लगा लेने के बावजूद 'राम' का नाम आरएसएस-भाजपा को वह दे सकने में नाकाम साबित हुआ, जो 'इस्लामी आतंकवाद' ने उसे महज पांच-छह सालों में ही दे दिया। आज कश्मीर से कन्याकुमारी तक किसी भी बम धमाके को आसानी से आतंकवादी हमला करार दिया जा सकता है। इस मामले में संघी एजेंडे की इससे भी बड़ी कामयाबी यह है कि किसी भी विस्फोट के साथ ही एक आम हिंदू मानस पूरी सहजता के साथ इसमें किसी मुसलमान का हाथ होना मान लेता है। और हर विस्फोट के बाद देश का सत्ता तंत्र कुछ मुसलिम नाम वाले लोगों को गिरफ्तार कर या 'मुठभेड़' में मार कर उसकी इस धारणा को स्थापित कर देता है - वह चाहे भाजपा का गुजरात हो, या कांग्रेस की दिल्ली।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस देश के माहौल में ऐसी हवा घुल चुकी है कि आतंकवाद के मसले पर इस आम धारणा से इतर देश के सत्ता तंत्र के 'कारनामों' को शक की निगाह से देखने वाले ही शक की जद में आ सकते हैं। यह अलग बात है कि आतंकवाद का पर्याय मान लिए जाने के बावजूद सिमी या उससे जुड़े होने के आरोपों में जितने भी मुसलमानों को पकड़ा गया है, उन्हें आतंकवादी साबित किया जाना अभी बाकी है। इन कथित आतंकवादियों की प्राथमिक 'स्वीकारोक्तियों' की बुनियाद पर पुलिस जो कहानी मीडिया को सामने पेश करती है, पता नहीं क्यों इस देश की अदालतें (कभी-कभी 'जन भावनाओं को तुष्ट करने' वाले फैसले सुनाने के बावजूद) उसे मानने से इंकार कर देती हैं। अपने देश की न्यायपालिका पर हमें अब भी भरोसा करना चाहिए।&lt;br /&gt;यह समझने के लिए भी ज्यादा जोर लगाने की ज़रूरत नहीं है कि नांदेड़ या कानपुर में बम बनाने के दौरान बजरंग दल के लोगों के मारे जाने और कई विस्फोटों में उनका नाम आने के बावजूद उनके लिए 'आतंकवादी' शब्द का इस्तेमाल क्यों नहीं होता है। जबकि कानपुर में बम विस्फोट में दो बजरंग दलियों की मौत के बाद पहुंची पुलिस ने दावा किया कि 'इतना बारूद आधे कानपुर को तबाह करने के लिए काफी था।' नांदेड़ में ऐसी ही घटना के बाद पुलिस ने बजरंग दल के उस 'ठिकाने' से मुसलमानों के पहनने वाले कपड़े, टोपी, बुर्के, नकली दाढ़ी वगैरह भी बरामद किये थे। इतने खुले सबूतों ('स्वीकारोक्तियों' पर आधारित कहानियां नहीं) के बावजूद कोई भी बम विस्फोट या आतंकी घटना के बाद सिमी या इंडियन मुजाहिदीन की तरह बजरंग दल का नाम एक आम मानस के भीतर उतनी ही सहजता से क्यों नहीं उतर पाता है? इंडियन मुजाहिदीन सिमी का नया नाम हो सकता है। लेकिन जिस बजरंग दल के लिए मुसलमानों की वेशभूषा इस्तेमाल करके भ्रम फैलाना आसान काम है, उसके लिए किसी दूसरे संगठन का नाम ओढ़ना क्यों मुश्किल होगा?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे सवाल न तो हमारे देश की पुलिस पर कोई खास असर डालते हैं, न हमारे मीडिया को इस पर सोचना जरूरी लगता है। दरअसल, पुलिस वही करती है, जो सत्ता उससे कराती है। और मीडिया का काम महज इतना रह गया है कि वह पुलिस के पक्ष को ज्यों का त्यों रख दे। खासतौर पर आपराधिक मामलों में तो मीडिया पुलिस के प्रवक्ता से ज्यादा की भूमिका में नहीं है। ऐसा कुछ तो उस खोखली बुनियाद के कारण होता है, जिस पर खड़ा होकर 'पत्रकारिता' करने का दावा किया जाता है और ज्यादा किसी खास घटना का कवरेज करने वाले पत्रकार या उसके समूचे संस्थान के आग्रहों के कारण। वरना क्या वजह है कि ओडीशा या कर्नाटक में गिरजाघरों पर हमले करने वाले बजरंग दल के गिरोह को सिर्फ एक 'भीड़' की संज्ञा दी जाती है, लेकिन अगर कोई 'आतंकवादी' पकड़ा जाता है तो सबसे पहले उसका नाम जोर देकर बताया जाता है। इसिलए कम कि 'आतंकवादी' एक व्यक्ति है, इसलिए ज्यादा कि वह मुसलमान है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ दूसरे शहरों की तरह दिल्ली के बम धमाकों में अठारह लोग मारे गये। निश्चित तौर पर इसे आतंकवादी घटना मानने से किसी को परहेज नहीं होना चाहिए। लेकिन हमारे देश के सत्ता तंत्र, पुलिस और मीडिया पर वह कौन-सी मजबूरी हावी है कि ओडीशा में खुलेआम ईसाइयों पर हुए हमलों में पचास से ज्यादा लोगों के मारे जाने के बावजूद उसे किसी तरह आतंकवाद मानने में परेशानी होती है। गुजरात में 2002 के दंगे और उसके बाद नरेंद्र मोदी ने क्या किया, यह किसी से नहीं छिपा है। कर्नाटक में भी इस देश के संवैधानिक नियम-कायदों के तहत चुन कर आए लोग ईसाइयों पर हमले को जायज करार देते हैं। क्या इससे भी खुला आतंकवाद कुछ और हो सकता है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरअसल, ईसाई समुदाय पहले से ही संघी एजेंडे का दूसरा निशाना रहा है। मुसलमानों को लेकर संघ जो चाहता था, वह कर चुका है। अब मुसलमानों को 'साइज' में रखने के लिए उसे अलग से कुछ करने की जरूरत फिलहाल नहीं है। बाबरी मसजिद के विध्वंस और सैकड़ों दंगों से लेकर गुजरात के कत्लेआम तक से मुसलमानों को बताया जा चुका है कि इस देश में उन्हें किसके रहमोकरम पर रहना है। अब आतंकवाद का मुद्दा खुद-ब-खुद वह काम करता रहेगा, जो राम का नाम भी नहीं कर सका।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन ईसाई समुदाय को आतंक से जोड़ा जाना संभव नहीं दिखता। इसलिए फिलहाल तो उन पर हमले करके और गिरजाघरों में तोड़फोड़ कर उन्हें 'समझाया' जा रहा है। असली मकसद यही है कि ईसाइयों को भी मुसलमानों की तरह इस हाल में पहुंचा दिया जाए कि वे सत्ता और समाज के हिंदू मानस की निगाह में 'संदिग्ध' हो जाएं। अगर अमेरिका आंखें नहीं तरेरे तो मुसलमानों के मुकाबले ईसाई बहुत जल्दी उस हाल में पहुंचा दिए जाएंगे। आरोप भले बलात धर्मांतरण का होगा, उसे साबित करना न हिंदुत्व के ठेकेदारों के लिए जरूरी होगा, न सत्ता तंत्र के लिए। मानव अधिकारों के रक्षक होने का दंभ भरने और लोकतंत्र के प्रहसन के बीच धर्मांतरण विरोधी कानून बनाने और उसे सख्ती से लागू करने के उत्साह में कमी नहीं होगी। बिना इस बात पर विचार किए कि अगर कोई व्यक्ति अपना 'धर्म' बदलना चाहता है तो उसे क्यों रोका जाना चाहिए। लाख चाहने पर भी इस 'आधुनिक' समय में बंदूक की नोक पर धर्मांतरण कराने का आरोप किसी के गले नहीं उतरेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसलिए 'प्रलोभन' का तर्क गढ़ा जाएगा। वे कौन-से कारण हैं कि कोई व्यक्ति 'प्रलोभन' में आकर अपना धर्म बदल लेता है? हिंदुत्व छोड़ कर धर्म परिवर्तन करने वाले व्यक्ति या समूह का सामाजिक दर्जा हिंदुत्व के भीतर क्या होता है? धर्म परिवर्तन के नाम से किस सामाजिक वर्ग को भय और खतरा महसूस होता है? सामाजिक सत्ता और वर्ण-व्यवस्था को बनाये या बचाये रखने के इस खेल को समझना क्या इतना मुश्किल है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जाहिर है, इस खेल को आसानी से खेलने के लिए देश के लोकतंत्र को मुसलमानों और ईसाइयों के 'बोझ' से मुक्त करना जरूरी है। इसे भुलाया नहीं जाना चाहिए कि झज्जर में गोहत्या का 'अपराधी' करार देकर ईंट-पत्थरों से मार-मार कर पांच दलितों की हत्या की गयी थी। गाहे-बगाहे दिखने वाला हिंदुत्व का असली खेल वही है। और संघी एजेंडे का असली मकसद उसी खेल का मैदान तैयार करना है। इसमें विहिप और बजरंग दल जैसे उसके 'सेनानी' अपना काम तो कर ही रहे हैं, उसके राजनीतिक मुखौटे भाजपा के साथ-साथ धर्मनिरपेक्षता की चादर ओढ़े कांग्रेस भी बड़े महीन तरीके से इसमें अपना योगदान कर रही है। उम्मीद इस बात से बंधती है कि इस देश के सामाजिक और राजनीतिक ढांचे का जो स्वरूप है, उसमें किसी के लिए भी इस तरह का खेल खेलना उतना आसान नहीं होगा, जितना समझ लिया गया है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9014245926951665678-6477916372708400161?l=charwakshesh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://charwakshesh.blogspot.com/2008/10/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (शेष)</author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_Zl-3hmYZQL8/SO3z_FrGR9I/AAAAAAAAEGo/KUacM9jtulQ/s72-c/kandhmal.jpg' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>6</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-9014245926951665678.post-8469948485407931648</guid><pubDate>Mon, 22 Sep 2008 10:30:00 +0000</pubDate><atom:updated>2008-09-22T05:10:37.527-07:00</atom:updated><category domain='http://www.blogger.com/atom/ns#'>मुसलमान</category><category domain='http://www.blogger.com/atom/ns#'>आतंकवाद</category><title>ऊंची तालीम से पैदा हुआ "आतंक"...!</title><description>&lt;em&gt;&lt;strong&gt;अंबरीश कुमार&lt;/strong&gt; की ये रिपोर्ट आज के &lt;strong&gt;जनसत्ता&lt;/strong&gt; में छपी है।&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आजमगढ़, सितंबर। आजमगढ़ का सरायमीर इलाका एक बार फिर चर्चा में है। यहां के संजरपुर गांव के दो युवक दिल्ली बम धमाकों के सिलसिले में हुए इन्काउंटर में मारे गए तो एक नौजवान गिरफ्तार हुआ। मुठभेड़ के बाद से ही सरायमीर थाने के संजरपुर गांव में सन्नाटा छाया हुआ है। बीच-बीच में तनाव तब पैदा होता है जब मीडिया या पुलिस की कोई टीम गांव पहुंचती है। गांव के लोग चैनल से लेकर प्रिंटमीडिया की भूमिका से नाराज हैं। सैफ के पड़ोसी मुहम्मद रशीद ने कहा, ‘देखिए आज एक चैनल वाला चिल्ला कर कह रहा था कि ये आतंकवादी जमिया से पढ़े हुए हैं सोचिए पढ़े-लिखे लोग कितने शातिर हो सकते हैं। क्या अगर कोई पढ़-लिख गया तो वह शातिर हो जएगा। इस तरह की भाषा से हम लोगो और दुखी हो चुके हैं। अब हमें लगता है कि बच्चों को तालीम देने से क्या फायदा?’ &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;इस बीच गांव के आहत लोगों ने अपने बच्चों को तालीम न देने का फैसला किया है। इसकी मुख्य वजह मदरसे में जने पर इंटेलीजेंस ब्यूरो और एलआईयू के लोग छात्रों के बारे में पूछताछ करते रहते हैं तो दूसरी तरफ उच्च शिक्षा के लिए दिल्ली गए नौजवान दो महीने में ही आतंकवादी बन कर मार दिए जते हैं। दिल्ली में मुठभेड़ में मारे गए आतिफ और घायल सैफ को पढ़ाने वाले बीना पारा इंटरकालेज के प्रधानाचार्य अंसार अहमद ने कहा, ‘इस गांव के लोग दिल्ली की घटना से बुरी तरह आहत हैं। सैफ और आतिफ को मैंने तालीम दी है। जब तक ये बच्चे मेरे सान्निध्य में रहे इनके बारे में कोई शिकायत नहीं मिली। पर अब अचानक इन्हें आतंकवादी घोषित कर दिए जने से सभी हैरान हैं। मीडिया का एक बड़ा वर्ग तो सीधे फैसला दे देता है। यही वजह है कि गांव के लोग अब तय कर रहे हैं कि बच्चों को न तो मदरसा भेज जए और न उच्च तालीम के लिए बाहर। &lt;br /&gt;गौरतलब है कि दिल्ली मुठभेड़ में मारे गए साजिद की उम्र १७ साल थी और इंटरमीडिएट के बाद कंप्यूटर की शिक्षा लेने दस जुलाई को दिल्ली गया था जबकि आतिफ जमिया से बीटेक की पढ़ाई कर रहा था। सैफ २३ वर्ष का है और वह बीए कर कंप्यूटर की शिक्षा लेने दिल्ली गया था। संजरपुर के लोग हैरान हैं कि किस तरह अचानक दोनों युवक आतंकवादी घटनाओं में शामिल हो गए। साजिद के पिता डा. अंसार अहमद यूनानी दवाखाना चलाते हैं। १७ साल का बेटा होने से हतप्रभ ,हैरान और विक्षिप्त नजर आते हैं। डा. अंसार ने कहा,‘१७ साल तक वह यहीं रहा, गांव से बाहर जने में भी डरता था। इंटरमीडिएट के बाद जिद करने लगा कि ऊंची तालीम के लिए दिल्ली जएगा। उसका कहना था कि ऊंची तालीम नहीं ली तो भविष्य कैसे बनेगा। ऐसे में हम कैसे मान लें कि वह अचानक आतंकवादी हो गया।&lt;br /&gt;सरायमीर के सीईओ शैलें्र कुमार के मुताबिक भी इनके खिलाफ पहले कोई रिपोर्ट नहीं मिली। इससे पहले आजमगढ़ का नाम आने के बाद ही उत्तर प्रदेश पुलिस ने भी साफ किया था कि इन नौजवानों के बारे में कोई प्रतिकूल रिपोर्ट नहीं मिली थी। &lt;br /&gt;दिल्ली के जमियानगर से लेकर आजमगढ़ के सरायमीर तक जो कहानियां सुनाई ज रही हैं उससे मुसलिम समुदाय काफी आहत है। इससे पहले अबू बशर का मामला आया। संजरपुर गांव अबू बशर की ननिहाल है। अबू बशर के बाद खुफिया एजंसियों और पुलिस की निगाह में आजमगढ़ जिला आया तो दिल्ली बम धमाकों के बाद आजमगढ़ के संजरपुर गांव पर सबकी निगाह गई। दिल्ली में मुठभेड़ होते ही मीडिया के कुछ लोग संजरपुर गांव पहुंचे तो गांव वालों के आक्रोश का सामना करना पड़ा। इसकी वजह अबू बशर के बारे में तरह-तरह की भ्रामक खबरों का मीडिया में आना था। पुलिस ने उसे उठाया आजमगढ़ के उसके गांव से था। जबकि गिरफ्तारी लखनऊ से दिखाई गई थी। यह जनकारी होने के बाद भी मीडिया के एक बड़े वर्ग ने वही लिखा जो पुलिस ने कहा। यही वजह है कि अब गांव वालोंे के आक्रोश के चलते मीडिया के लोग संजरपुर गांव जने से बच रहे हैं। &lt;br /&gt;आजमगढ़ के मीरसराय से लेकर संजरपुर गांव तक अचानक इतने मास्टरमाइंड और आतंकवादियों का निकल आना लोगों को हैरान कर रहा है। हालांकि इससे पहले अबू सलेम भी चौदह साल की उम्र में ही रास्ता भटक कर अंडरवर्ड का डान बन गया था। जिसके बाद उसने अकूत संपत्ति इकट्ठा कर ली। लेकिन इस गांव से जो नए नौजवान निकले हैं उनका आतंकवाद की घटनाओं से सीधा रिश्ता जुड़ता नजर नहीं आ रहा है। यह कोई भी नहीं समङा पा रहा है कि शिक्षा लेने गए ये युवक अचानक कैसे आतंकवाद के रास्ते पर चल दिए। सैफ के पिता सादाब अहमद तो अभी भी मानने को तैयार नहीं है कि उनका बेटा आतंकवादी हो सकता है। आहत होकर कहते हैं कि यदि आतंकवादी निकले तो उसे गोली मार दो। पर जंच-पड़ताल करवा कर। रोचक तथ्य यह है कि सैफ के पिता सादाब अहमद आजमगढ़ जिला समाजवादी पार्टी के उपाध्यक्ष भी थे। पर जसे ही मुठभेड़ की खबर आई समाजवादी पार्टी की जिला इकाई अचानक भंग कर दी गई। हालांकि जब अबू बशर का मामला उठा था तो समाजवादी पार्टी ने पहल की थी पर इस मामले में वह फौरन पीछे हट गई। मुसलिम समुदाय मुलायम सिंह को अपना रहनुमा मानता रहा है पर इस घटना से वे भी हैरान हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9014245926951665678-8469948485407931648?l=charwakshesh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://charwakshesh.blogspot.com/2008/09/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (शेष)</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>2</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-9014245926951665678.post-1882384402762153135</guid><pubDate>Mon, 18 Aug 2008 14:53:00 +0000</pubDate><atom:updated>2008-08-18T08:22:06.956-07:00</atom:updated><category domain='http://www.blogger.com/atom/ns#'>आईना</category><title>चमड़ी की सत्ता</title><description>&lt;div&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;काले का यह घोटाला दपदप गोरा है जनाब&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/SKmPsf9m4rI/AAAAAAAAASk/CcR_8r5VH3g/s1600-h/b-1.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5235874036451828402" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/SKmPsf9m4rI/AAAAAAAAASk/CcR_8r5VH3g/s200/b-1.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; हमारे एक मित्र हैं सुनील पी बाबु। यह उनका पंजीकृत नाम है। आपमें से ज्यादातर ने अंदाजा लगा लिया होगा कि वे तमिलनाडु, केरल या किसी दूसरे दक्षिण भारतीय राज्य के ही मूल निवासी होंगे। और जब उधर के होंगे तो आपकी उम्मीद वाजिब है कि वे काले ही होंगे। बहुत होगा तो उनकी कालिमा कुछ लालिमा लिए होगी। तो चलिए, यह रहस्य भी हम खोलते हैं और आपकी उम्मीद को पुख्ता करते हैं। वे शुद्ध काले हैं। इतने काले कि अपने दोस्तों के बीच के मजाक हैं। अब आप उनसे मजाक करने के लिए या उनका मजाक उड़ाने के लिए उनके रंग पर कितना भी कड़वा तंज कस दें, वे अपने गहरे रंग की तरह ही गहराई तक जाता हुआ ठहाका लगा देंगे और आपके चेहरे का पानी उतर जाएगा।&lt;br /&gt;बाबु के जन्म दिन पर एक बार उनके दपदप उजले बॉस ने फेयर एंड लवली का "पांच रुपए वाला &lt;span class=""&gt;पैक"&lt;/span&gt; बतौर तोहफा थमा दिया। बाबु ने छूटते ही कहा- "इसे भी नमूने के तौर पर रखूंगा। पता है, यह कंपनी छह हफ्ते में गोरा बना देना का दावा करती है। छह साल से ज्यादा हो गए, अब तक जैसे का तैसा &lt;span class=""&gt;हूं।"&lt;/span&gt; और यह कहने के साथ ही उन्होंने फिर जोर का ठहाका लगा दिया।&lt;br /&gt;...कौन जानता है कि उनके इन ठहाकों के तले कितनी आहें घुट कर हलक में दम तोड़ जाती हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/SKmQb-LvkaI/AAAAAAAAASs/hJDPtStNdww/s1600-h/rojane13.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5235874852018033058" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/SKmQb-LvkaI/AAAAAAAAASs/hJDPtStNdww/s200/rojane13.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;दिलासा देने के लिए किसी ने भले लिखा हो कि "तू काली है, यह फरिश्तों की भूल है, वह तिल लगा रहा था कि स्याही बिखर &lt;span class=""&gt;गई"&lt;/span&gt;, या फिर फिर कभी "हम काले हैं तो क्या हुआ दिलवाले हैं..." सुन कर हौसला बंधता होगा। लेकिन &lt;span class=""&gt;क्या सचमुच&lt;/span&gt;! क्या इन तुकबंदियों की भी असली जमीन यही नहीं है कि काला होना कमतर होना है। फरिश्ता अगर भूल करता है, तभी कोई काला हो जाता है। वरना वह तो गोरे रंग पर सिर्फ एक तिल रखना चाहता है- उसे और भी खूबसूरत बनाने के लिए। वह तो गलती से स्याही बिखर जाती है और कोई काला हो &lt;span class=""&gt;जाता है!&lt;/span&gt; क्यों किसी काले को ही यह जताने की जरूरत पड़ती है कि उसके पास भी दिल है? क्यों ऐसा है कि अगर कोई गोरा है तो हमेशा ही किसी काले के बरक्स उस पर एक सांस्कारिक और सच कहें तो सामाजिक श्रेष्ठताबोध की ग्रंथि हावी रहती है?&lt;br /&gt;लेकिन बात केवल "&lt;span class=""&gt;कालिया"&lt;/span&gt; या "&lt;span class=""&gt;कालूराम"&lt;/span&gt; जैसे तमगों पर ही खत्म नहीं होती। (यह सवाल आपके लिए खुला है कि कोई कालू -राम- ही क्यों होता है)। "रंग-&lt;span class=""&gt;दृष्टि"&lt;/span&gt; के इस आग्रह का सिरा वहां तक पहुंचता है जहां "&lt;span class=""&gt;समयांतरकारी"&lt;/span&gt; शख्सियतों की निगाह अगर कहीं टिकती भी है तो बोलते समय होठों के किनारे जमे थूक पर। क्या बातों तक पहुंचना इतना मुश्किल होता है? अब यहां भी श्रेष्ठताबोध की ग्रंथि है या थूक प्रेम- कहा नहीं जा सकता। बहरहाल, सिरा तो यह जुड़ा ही हुआ है, मगर "&lt;span class=""&gt;भटकता"&lt;/span&gt; दीख रहा है। इसलिए हम अपने मूल सिरे पर वापस आते हैं- यानी काला का घोटाला।&lt;br /&gt;गौरवर्णी और सुगठित युवतियों के देह-दर्शन से आईपीएल क्रिकेट प्रतियोगिता का "&lt;span class=""&gt;मजा"&lt;/span&gt; बढ़ाने वाले हमारे शुभचिंतकों को कहां अंदाजा था कि चीयर लीडरों की जिस टीम को वे मैदान में भेजने जा रहे थे, उनमें एक-दो का काला रंग सारे "&lt;span class=""&gt;खेल"&lt;/span&gt; को बदमजा कर दे सकता है। यह तय है कि सही वक्त पर किसी "&lt;span class=""&gt;दैव"&lt;/span&gt; ने ही भला किया होगा, तभी उन्होंने दोनों काली चीयर लीडरों को मैदान में जाने से रोक दिया।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/SKmS9hZgbaI/AAAAAAAAAS0/UiHWf1H81ms/s1600-h/Black.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5235877627429940642" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/SKmS9hZgbaI/AAAAAAAAAS0/UiHWf1H81ms/s200/Black.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;इसका सूत्र ढूंढ़ना बहुत मुश्किल नहीं है कि सब बुरा "&lt;span class=""&gt;काला"&lt;/span&gt; क्यों हो गया। मसलन, काला धन, काली कमाई, दाल में काला, बुरी नजर वाले तेरा मुंह काला, मुंह काला करना जैसे काले कारनामों के नहीं खत्म होने वाले सिलसिले। जबकि सिर्फ हमारे समाज में नहीं, दुनिया भर में शोषण, दमन, जुल्म ढाने, बेईमानी और बर्बरताओं के किस्से रचने में इस "&lt;span class=""&gt;गोरेपन"&lt;/span&gt; की क्या भूमिका रही है, यह कोई छिपी बात नहीं है। फिर क्यो हर बुराई, कमतरी और जलील करने वाले हर मानक हमारे लिए "&lt;span class=""&gt;काले"&lt;/span&gt; हो गए?&lt;br /&gt;क्या यह सच नहीं है कि सामाजिक सत्ता की लगाम हमेशा ही "&lt;span class=""&gt;गोरों"&lt;/span&gt; के पास रही और लगभग सभी तौर-तरीके तय करने में यह गौरवर्णी श्रेष्ठताबोध हावी रहा? सत्ता कायम रखने और अपना या अपने वर्ग का ही सब कुछ उच्च ठहराने के लिए श्रेष्ठतर और निम्नतर की परिभाषाएं गढ़ी गईं और एक तरह उसे ही "दैवीय &lt;span class=""&gt;सत्य"&lt;/span&gt; घोषित कर दिया गया- सौंदर्यबोध के सारे मौजूदा मानकों &lt;span class=""&gt;सहित!&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;और जब सारा कुछ "&lt;span class=""&gt;दैव"&lt;/span&gt; है तो औचित्य का सवाल कहां? चमड़ी गोरी नहीं तो आत्मविश्वास हासिल करना होगा कि रंग से कुछ नहीं होता है। और अगर है तो वह भरोसा आप जन्म से लेकर आते हैं। वे कौन-सी जड़ें हैं जिनकी वजह से किसी को "काला-&lt;span class=""&gt;कलूटा"&lt;/span&gt; कहने में हमें एक गुदगुदा देने वाला मजा आता है? क्या हम इसी भाव से किसी -गोरे- को चिढ़ा सकते हैं? &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9014245926951665678-1882384402762153135?l=charwakshesh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://charwakshesh.blogspot.com/2008/08/blog-post_18.html</link><author>noreply@blogger.com (शेष)</author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/SKmPsf9m4rI/AAAAAAAAASk/CcR_8r5VH3g/s72-c/b-1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>5</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-9014245926951665678.post-5816536492720719296</guid><pubDate>Sat, 09 Aug 2008 15:59:00 +0000</pubDate><atom:updated>2008-08-09T09:15:52.283-07:00</atom:updated><category domain='http://www.blogger.com/atom/ns#'>इधर-उधर से</category><title>जम्मू के गुनहगार</title><description>&lt;span style="color:#330000;"&gt;&lt;strong&gt;अपूर्वानंद&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/SJ2_X4eV-LI/AAAAAAAAASU/C-L5bz6_gIM/s1600-h/j-1.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5232548759091935410" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/SJ2_X4eV-LI/AAAAAAAAASU/C-L5bz6_gIM/s200/j-1.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;जम्मू में हालात बेकाबू हो गए हैं. अमरनाथ बोर्ड को जंगल की उस ज़मीन को वापस दिए जाने की मांग को लेकर जिसका यात्रा के लिए अस्थायी उद्देश्य से राज्य सरकार ने अधिग्रहण किया लेकिन बाद में जिसकी अधिसूचना को रद्द कर दिया गया, शुरू हुआ हिन्दुओं का आन्दोलन हिंसक हो उठा है. कुछ अखबार इस आन्दोलन की ख़बर को छापते हुए यह लिख रहे हैं कि आन्दोलन धर्मयुद्ध में बदल गया है. हिंसा की खबरें छपते हुए उनकी खुशी छिपाए नहीं छिपती. पूरे देश में भारतीय जनता पार्टी, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और उनके संगठनों ने यह प्रचारित किया कि हिन्दुओं की अमरनाथ यात्रा पर कोई ख़तरा आ पडा है. भारतीय जनता पार्टी से लगाव रखने वाले तत्कालीन राज्यपाल जेनरल एस.के. सिन्हा ने अमरनाथ की देखभाल के लिए बने अमरनाथ न्यास के अध्यक्ष के रूप में राज्य सरकार पर अमरनाथ यात्रियों के लिए अस्थायी प्रयोग के उद्देश्य से जंगल की इस ज़मीन का अधिग्रहण करने को कहा. कांग्रेस और पी. डी. पी. की सरकार ने पहले तो इससे सम्बंधित अधिसूचना जारी कर दी लेकिन बाद में इसी मुद्दे पर पी.डी.पी. ने इसे दबाव में लिया गया निर्णय बताते हुए ख़ुद को इससे अलग किया और फिर सरकार भी छोड़ दी. कश्मीर के अन्य सभी दलों ने इस पर ऐतराज जताया और विरोध शुरू किया तो सिन्हा के बाद नए राज्यपाल ने अधिसूचना रद्द की. राज्यपाल की इस अधिसूचना से लोगों ने राहत की साँस ली, लेकिन भारतीय जनता पार्टी ने इसे हिंदू विरोधी कदम बताते हुए पूरे देश में इसके विरोध में अभियान चलने की घोषणा कर दी . जम्मू जल रहा है और यह पार्टी इसे आगामी चुनाव में अपनी सीटों की बढोत्तरी के संकेत के रूप में देख रही है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भाजपा ने यह प्रचारित करने की कोशिश की है कि राज्यपाल वोहरा का अधिग्रहण रद्द करने का निर्णय यात्रा विरोधी है. यह बताने की कोशिश भी की गई है कि कश्मीर के मुसलमान यात्रा का विरोध कर रहे हैं. उमर अब्दुल्ला ने हाल में संसद की बहस में ठीक ही कहा कि कश्मीर में जब तक एक भी मुसलमान रहेगा, यात्रा पर कोई आंच नहीं आयेगी. हमने ये खबरें पढ़ी हैं कि जब भाजपा के आन्दोलन के चलते अमरनाथ यात्री बीच में ही फँस गए तो रास्ते के गाँव के मुसलमानों ने उनकी देखभाल की. उन्हें ठहराने, खिलाने पिलाने का इंतजाम मुसलामानों ने किया. हुर्रियत और दूसरे कश्मीरी दलों ने भी बार-बार यह कहा कि उनका इरादा अमरनाथ यात्रा को बाधित करना नहीं है. जैसा उमर अब्दुला ने कहा, ऐतराज इस बात पर था कि जंगल कि ज़मीन इस मकसद के लिए क्यों ली जाए. यह सवाल भी नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता कि आज तक जब कश्मीरी मुसलमानों के सहयोग से हिन्दुओ कि यह पवित्र यात्रा अबाधित चलती रही थी तो फिर इस सरकारी कदम का क्या औचित्य था.&lt;br /&gt;जेनरल एस. के. सिन्हा के राजनीतिक झुकाव को जानने वालों को इस पूरे घटनाक्रम पर बहुत आश्चर्य नही हुआ. जिस तरह अमरनाथ न्यास को उन्होंने अपने नियंत्रण में किया उसी से आगे की स्थितियों का आभास हो जाना चाहिए था. किसी ने यह प्रश्न नहीं किया है कि अगर अमरनाथ न्यास का अध्यक्ष पदेन राजपाल को होना है तो फिर यह क्यों ज़रूरी माना गया कि उसका हिंदू होना अनिवार्य है. क्या यह इस देश के धर्मनिरपेक्ष चरित्र के खिलाफ नहीं? क्या हम यह कहना चाहते हैं कि एक मुसलमान या ईसाई राज्यपाल हिन्दुओं कि धार्मिक आस्था का आदर नहीं कर सकता! बात-बात में मुसलमाओं के तुष्टीकरण का शोर मचाने वाले और छद्म धर्मनिरपेक्षता की निंदा करने वाले बुद्धिजीवियों ने इस पर कोई सवाल नहीं किया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/SJ2_lMoPezI/AAAAAAAAASc/G0sa0JpejAE/s1600-h/j-2.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5232548987840461618" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/SJ2_lMoPezI/AAAAAAAAASc/G0sa0JpejAE/s200/j-2.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;धर्मनिपेक्षता की विशेषता धर्मों से दुराव में नहीं है. जो लोग नेंहरू की इस वजह से आलोचना करते है कि उन्होंने धर्म को लेकर राजकीय संस्थाओं में एक दोष भावना पैदा की, वे उनके और बाद के दौर को भी ध्यान से नहीं देखते. नेहरू ने धर्मों को लेकर एक इत्मीनान का माहौल बनाने की कोशिश की. भारत का प्रधानमंत्री प्रत्येक धर्म के मानने वालों के धार्मिक अधिकारों की हिफाजत के लिए जिम्मेदार है, वैसे ही अन्य सभी राजकीय संस्थाएं. फिर जब आप राज्यपाल होने के कारण किसी संस्था के प्रमुख होते है तो आपका हिंदू या मुसलमान होना गौण हो जाता है. फिर असली धर्मनिरपेक्षता वादियों ने अमरनाथ न्यास के प्रमुख होने की शर्त में अलग से हिंदू होने की अनिवार्यता पर कभी कुछ क्यों नहीं कहा?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अमरनाथ यात्रा की लिए ज़मीन लेने का जहाँ तक प्रश्न है, यह याद रखना आवश्यक है कि कश्मीर की जनता इसे लेकर बहुत संवेदनशील है कि कहीं कश्मीर का बुनियादी चरित्र न बदल जाए. यह भी याद रखिये कि भारत कि सुरक्षा के नाम पर वहां की सैकडों एकड़ ज़मीन पर सेना और अन्य अर्ध सैन्य बालों का कब्जा है. वे कश्मीरियों की पहुँच से पहले ही बाहर हैं. इसी वजह से आपने ध्यान दिया होगा कि ज़मीन लेने कि अधिसूचना के विरोध में कश्मीरी यह भी कह रहे थे कि बाकी ज़मीन भी खाली की जाय. आप को राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ कि वह तजवीज भी भूलनी न चाहिए जिसका इरादा कश्मीर में आबादियों को इस तरह बसाया जाना था कि वहां कि आबाई शकल बदल जाए. यह काम स्तालिन ने गैर रूसी इलाकों में रूसियों को बसा कर, चीन ने तिब्बत में चीनियों को बसा कर किया . उसी तरह कश्मीर को तीन हिस्सों में बाँटने के भाजपा के प्रताव को भी न भूलिए.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भाजपा अभी जम्मू में हिन्दुओं की गोलबंदी करने में जुटी है. उसकी कोई मोहब्बत कश्मीर से नहीं, और न वह जम्मू कश्मीर को एक इकाई के रूप में देखने में दिलचस्पी रखती है. भाजपा के नेताओं की बांछें खिली हुई है कि उन्हें हिन्दुओं को यह बताने का एक मौका और हाथ लग गया है कि वे इस देश में कितने असुरक्षित है. एक बार ठहर कर हमें यह भी देखना चाहिए कि भाजपा ने किन मुद्दों पर राष्ट्रीय आन्दोलन किया है. जनसंघ ने गोरक्षा को मुद्दा बनाया, उसके नए अवतार भाजपा ने उसकी धारा ३७० के खात्मे, समान नागरिक संहता बनाने की मांगों के साथ राम जन्म भूमि मन्दिर का मसला उठाया. कुछ समय से वह रामसेतु को राष्ट्रीय मुद्दा बनाने में जुटी है. अब उसे अमरनाथ यात्रा एक नया राष्ट्रीय मुद्दा दीख रहा है. जो लोग भाजपा को देश का कारोबार सौंपने और अडवानी को प्रधानमंत्री बनाने में कुछ हर्ज नहीं देखते, वे ज़रा इस पर विचार करें कि जिस राजनितिक दल को धार्मिक और नकली सांस्कृतिक मुद्दों के अलावा कोई राजनीतिक मुद्दा नहीं मिलता, उसमें भी जो सिर्फ़ एक धर्म के माने वालों में, जोकि देश के बहुसंख्यक हैं, लगातार असुरक्षा की भावना बनाये रखकर ख़ुद को जीवित रखना चाहता है, उसे कितना जिम्मेवार माना जाय. जो लोगों के मारे जाने पर दुखी न हो, उसके हाथों क्या भारत की आत्मा सुरक्षित रह सकेगी? &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9014245926951665678-5816536492720719296?l=charwakshesh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://charwakshesh.blogspot.com/2008/08/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (शेष)</author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/SJ2_X4eV-LI/AAAAAAAAASU/C-L5bz6_gIM/s72-c/j-1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>2</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-9014245926951665678.post-1344842145766319007</guid><pubDate>Thu, 19 Jun 2008 04:22:00 +0000</pubDate><atom:updated>2008-12-08T22:32:32.517-08:00</atom:updated><category domain='http://www.blogger.com/atom/ns#'>आईना</category><title>तर्क के खिलाफ आस्‍था का हथियार</title><description>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/SEjfiEGPEHI/AAAAAAAAARE/boyl1Ozct5E/s1600-h/sup-1.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5208658745362419826" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/SEjfiEGPEHI/AAAAAAAAARE/boyl1Ozct5E/s200/sup-1.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;कहते हैं&lt;/strong&gt; किसी एक झूठ को बार-बार रटने से या तो वह सच के वहम में तब्दील हो जाता है, या फिर प्रहसन बन जाता है। तो राम भरोसे राजनीति की नाव पर सवार हिंदू कट्टरपंथी समूहों की पीड़ा समझना बहुत मुश्किल नहीं है। बाबरी मस्जिद के बाद राम मंदिर का मुद्दा लगभग पिट चुका है, सो कुछ महीने पहले अचानक ही रामसेतु की राह दिखाई पड़ गई थी। मगर पहले-सी उत्तेजना पैदा कर सकने में कामयाबी नहीं मिली। अब दिल्ली विश्वविद्यालय की एक किताब में फिर से "मुश्किल" में पड़े राम को खोज निकाला गया है और उनके "उद्धार" का अभियान शुरू हो गया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछले दो साल से यह किताब दिल्ली विश्वविद्यालय में स्नातक इतिहास के ऑनर्स पाठ्यक्रम में पढ़ाई जा रही है। इसमें "प्राचीन भारत में संस्कृति" के तहत "तीन सौ रामायण- पांच उदाहरण और अनुवाद पर तीन विचार" शीर्षक से एक अध्याय शामिल है, जिसके लेखर एके रामानुजन हैं। रामानुजन दक्षिण भारत के प्रसिद्ध लोककथाओं के विद्वान, भाषाविद, कवि और अनुवादक थे। उन्होंने शिकागो विश्वविद्यालय में दक्षिण एशिया के अध्ययन कार्यक्रम तैयार करने में काफी अहम अहम भूमिका निभाई। इस लेख में उन्होंने राम के बारे में दुनिया भर में प्रचलित अलग-अलग कहानियों का जिक्र किया है। राम को भारतीय धर्मग्रंथों में एक सबसे ज्यादा लोकप्रिय देवता के रूप में माना जाता रहा है। लेकिन समय के साथ विभिन्न मतों में रामकथा की अलग-अलग तरीके से व्याख्या भी की गई। दिल्ली विश्वविद्यालय में इतिहास विषय से स्नातक ऑनर्स के पाठ्यक्रम में शामिल इस पाठ का मकसद सिर्फ इतना है कि छात्रों को आम हिंदू समाज में पाई जाने वाली पारंपरिक अवधारणा से इतर तमिल, बौद्ध, जैन या कुछ दूसरे मतों में प्रचलित कहानियों के अध्ययन और उनके विश्लेषण का मौका मिले। फिर पाठ्यक्रम में इसे पूरी तरह वैकल्पिक रखा गया है और इसे पढ़ना या नहीं पढ़ना अपनी मर्जी पर निर्भर है। इसे ही सही मान लेने का आग्रह कहीं नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/SEjf-sqmgQI/AAAAAAAAARM/Y3XkPUkncJs/s1600-h/sup-2.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5208659237288706306" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/SEjf-sqmgQI/AAAAAAAAARM/Y3XkPUkncJs/s200/sup-2.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;लेकिन इस मसले पर दिल्ली विश्वविद्यालय में जो हुआ, उससे यह लगता है कि अब शैक्षणिक संस्थानों को भी "हिंदुत्व की प्रयोगशाला" बनाने की मुहिम शुरू हो चुकी है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विश्व हिंदू परिषद के गर्भनाल से जुड़े छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कथित नेताओं ने इस बात का भी लिहाज करना जरूरी नहीं समझा कि वे विश्वविद्यालय परिसर में हैं। लेकिन जब पहले से यह तय हो कि बात करना उतना जरूरी नहीं, जितना उत्पात मचाना, तो उचित-अनुचित जैसे सवाल गैरजरूरी मान लिए जाते हैं। किताब में रामकथा पर आधारित उस अध्याय का विरोध करने के लिए इतिहास विभाग में तोड़फोड़, शिक्षकों को अपमानित करने और उनके साथ मारपीट का दृश्य किसी दंगे के पूर्वाभ्यास से कम नहीं था। ध्यान रहे कि इस मसले पर भाजपा के एक पूर्व सांसद रामविलास वेदांती तालिबानी अंदाज बिखेरते हुए पाठ्यक्रम में रामानुजन का पाठ शामिल करने के लिए जिम्मेदार कुलपति का सिर काट कर लाने वाले को ईनाम देने की घोषणा पहले ही कर चुके हैं। सवाल है कि क्या इसी तरह की "सहिष्णुता" के दम पर हिंदुत्व की गौरवगाथा लिखने की तैयारी की जा रही है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भाजपा के इस छात्र संगठन के नेताओं ने इतिहास विभागाध्यक्ष एजेडएच जाफरी के साथ जिस तरह का बर्ताव किया और मारपीट की, वह इस तरह की कोई पहली घटना नहीं थी। इससे पहले उज्जैन में प्रोफेसर सब्बरवाल की हत्या, पुणे के भंडारकर शोध संस्थान में उत्पात और बड़ौदा विश्वविद्यालरय में वहां के संकाय प्रमुख और छात्रों के साथ मारपीट जैसी "बहादुरी" इसके और इस जैसे कुछ दूसरे संगठनों के चरित्र की मुख्य विशेषता बन चुकी है। उलटबांसी यह कि भारतीय संस्कृति और महान गुरु-शिष्य परंपरा की दुहाई देने के काम में इन्हें कभी थकते नहीं देखा गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;div&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/SEjgGN3K57I/AAAAAAAAARU/rTLW0_iL908/s1600-h/sup-3.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5208659366458877874" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/SEjgGN3K57I/AAAAAAAAARU/rTLW0_iL908/s200/sup-3.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;विडंबना यह है कि एक उदार और लोकतांत्रिक समाज का हिस्सा होने के बावजूद इस तरह के संगठन से जुड़े लोग अपनी आस्थाओं की अभिव्यक्ति के लिए कोई भी रास्ता अख्तियार करने को तैयार रहते हैं। लेकिन खुद से सहमति नहीं रखने वालों की अभिव्यक्ति इन्हें परेशान करती है। इस बात पर तो तरस ही खाई जा सकती है कि कोई यह मान ले कि दुनिया उसकी इच्छाओं या आस्थाओं का खयाल रखे, भले ही वह प्रताड़ित करने की हद तक दूसरों की इच्छाओं का अतिक्रमण करे। अभिव्यक्ति की आजादी का यह हनन किसी फिल्म के प्रदर्शन का विरोध करने से लेकर किसी किताब पर पाबंदी लगाने की मांग के लिए भी हिंसा को एकमात्र रास्ता मानने के रूप में सामने आ रहा है। मुश्किल यह है कि सरकारों को इस बात से कोई लेना-देना नहीं रह गया है कि विचार-विश्लेषण की प्रक्रिया को और मजबूत करने या वैज्ञानिक चेतना के प्रचार-प्रसार के मसले पर दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ प्रतिक्रियावादी ताकतों का मुकाबला किया जाए। उलटे वे "हिंसा की आशंका" को आधार बना कर किसी फिल्म या किताब पर पाबंदी लगाने में देर नहीं लगातीं। दरअसल, इसके पीछे हिंसा की "आशंका" से ज्यादा फिक्र अपनी राजनीति की होती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जहां तक अलग-अलग रूप में प्रचलित रामकथा की जानकारी देने वाले पाठ पर पाबंदी की मांग का सवाल है तो उनका क्या जाए जो "रामचरितमानस" में शूद्रों और स्त्रियों को अधिकतम अपमानित किए जाने का आरोप लगाते हैं? यहां हमारी आस्था का वर्गीकरण क्यों हो जाता है? आस्था का झंडा लेकर देश को "आंदोलित" करने का बीड़ा उठाए लोगों को क्या कभी दलित उत्पीड़न के किसी मामले पर चिंतित होते देखा गया है? ऐसा इसलिए नहीं होगा क्योंकि इससे यथास्थिति भंग होगी और सामाजिक सत्ता का मौजूदा ढांचा बिखरेगा। और चूंकि आस्था इस ढांचे की सुरक्षा में सबसे कारगर हथियार साबित होती है, और इसका इस्तेमाल भी बेहद आसान है, इसलिए सबसे पहले इसी पर चोट पहुंचाए जाने का हौवा खड़ा किया जाता है। फिर इसके लिए किए जाने वाले हिंसक प्रदर्शन एक प्रत्यक्ष दबाव का काम करते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/SEjgGN3K57I/AAAAAAAAARU/rTLW0_iL908/s1600-h/sup-3.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5208659366458877874" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/SEjgGN3K57I/AAAAAAAAARU/rTLW0_iL908/s200/sup-3.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;दरअसल, कट्टरता की बुनियाद पर खड़े किसी समूह के लिए लगातार किसी भावनात्मक मुद्दे की बैसाखी का सहारा एक मजबूरी होती है। आम हिंदू मानस में राम का देव-रूप गहरे तक पैठा है और हिंदुत्व के कथित पैरोकारों के लिए राम एक सहज और सुलभ मुद्दा हैं, इसलिए राम नाम के संकट का हौवा खड़ा कर उसे उकसाना भी उतना ही आसान है। इसकी संवेदनशीलता का अंदाजा इन हिंदूवादी समूहों को बखूबी है और यही वजह है कि राम नाम को बार-बार राजनीति के बाजार में खड़ा किया जाता है। वरना क्या कारण है कि सालों से विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम की एख वैकल्पिक सामग्री अचानक इनके लिए इतनी अहम हो जाती है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो भी हो, अब एक औसत हिंदू भी राम के मुद्दे पर भाजपा-विहिप या दूसरे हिंदूवादी दलों का पाखंड समझ चुका है। राम मंदिर की गर्मी उतर जाना इसका सबूत तो है ही, सेतुसमुद्रम परियोजना में जिस तरह रामसेतु का सवाल घुसा कर लोगों में उन्माद पैदा करने की कोशिश नाकाम रही, उससे यही साबित होता है कि लोग अब इसे महज एक राजनीतिक चाल से ज्यादा अहमियत देने को तैयार नहीं हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके बावजूद दिल्ली विश्वविद्यालय में उत्पात मचाने और दंगे जैसा माहौल पैदा करने के पीछे क्या वजह हो सकती है? दरअसल, तोड़फोड़, हमला या निराधार बातों पर ऊधम मचा कर समय-समय पर अपने वजूद का एहसास कराते रहना कट्टर या सांप्रदायिक संगठनों की मजबूरी होती है। मिसाल के तौर पर विहिप, शिवसेना और अब महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना जैसे संगठन गाहे-बगाहे बिना बात के उत्पात मचाते रहते हैं, जिसका मकसद अपने अस्तित्व का एहसास कराते रहना भर है। आम जन के हितों के मुद्दे उनके लिए बेमानी होते हैं। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के ऊधम को इसकी ताजा कड़ी के रूप में देखा जाना चाहिए। यों भी, महाराष्ट्र में शिवाजी पर एक किताब के विरोध के सिलसिले में शिवसेना ने जो किया और उसमें उसे आखिरकार कामयाबी मिली, विद्यार्थी परिषद शायद उसी को नजीर मान कर चल रही है। इससे पहले भाजपा शिवाजी पर "आपत्तिजनक" टिप्पणियों को आधार बना कर जवाहरलाल नेहरू की किताब "डिस्कवरी ऑफ इंडिया" पर भी प्रतिबंध लगाने की मांग कर चुकी है। यह किताब हिंदी में भी उपलब्ध है और भारत के इतिहास के बारे में इसे एक प्रामाणिक और संदर्भ ग्रंथ के रूप में जाना जाता रहा है।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/SEjf-sqmgQI/AAAAAAAAARM/Y3XkPUkncJs/s1600-h/sup-2.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5208659237288706306" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/SEjf-sqmgQI/AAAAAAAAARM/Y3XkPUkncJs/s200/sup-2.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;आमतौर पर ऐसे संगठन किसी विषय पर बहस के लिए तैयार नहीं होते। तथ्यों और तर्कों के साथ बात करने के लिए मेहनत करनी पड़ती है और इसमें इनकी सीमा किसी से छिपी नहीं है। इसलिए ये बार-बार भावनाओं और आस्था के आहत होने का सवाल उठाते हैं जो इनके लिए महज अपनी राजनीतिक दुकानदारी चमकाने का जरिया भर होते हैं। यहीं ये इस बात का खयाल रखना जरूरी नहीं समझते कि जो इनसे सहमत नहीं हैं, उनकी भावनाओं का क्या जाए। इस तरह के सवाल उठने पर ये जो रवैया अख्तियार कर लेते हैं और ऐसे मसलों पर इन संगठनों का जो चरित्र रहा है, उसे देते हुए इनसे किसी मसले पर बहस की उम्मीद बेमानी ही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतिहास पर आस्था को तरजीह देना इस लिहाज से इनके हित में है कि इतिहास की परतें खुलने पर बहुत सारी आस्थाएं एक झटके में खंडित हो जा सकती हैं। और भावनात्मक मुद्दे जिनके टिके रहने का एकमात्र सहारा हैं, वे इस पर विचार करना क्यों जरूरी समझेंगे? इनके लिए इतिहास इसलिए भी एक अप्रिय विषय है क्योंकि हिंदुत्व की जिस सहिष्णुता का ढिंढोरा पीटा जाता है, इतिहास के पन्ने उसकी कलई खोलने लगते हैं। सेतुसमुद्रम परियोजना में अड़ंगा डालने के लिए जिस प्राकृतिक संरचना को वे समुद्र पार करने के लिए राम द्वारा बनवाया गया सेतु और इतिहास की एक सच्चाई सिद्ध करने पर तुले थे, उसके साथ-साथ रामायण के सारे विवरण को सच मानने का आग्रह इन्हें असहज कर देता है। इसी तरह महज जन्म के आधार पर नब्बे फीसद लोगों का किसी न किसी बहाने रोज-रोज जलील होना किस बारीक तरीके से नियति बना दी गई और उस यातना पर गर्व करने की घुट्टी पिला दी गई, अब उसकी व्याख्याएं सामने आने लगी हैं। यह निश्चित तौर पर "हिंदुत्व की प्रयोगशालाओं" की खोज में लगे रहने वालों के लिए एक अप्रिय स्थिति पैदा करती है और वहां इनके लिए आस्था एकमात्र महत्त्वपूर्ण चीज हो जाती है। जाहिर है, ध्यान बंटाने के लिए भावनात्मक मुद्दे उठाने और हिंसा या उत्पात का सहारा लेने को ये अपना मुख्य धर्म समझते हैं, जो इनकी सीमा भी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/SEjhoa-rzDI/AAAAAAAAAR0/X6u7ant2BCA/s1600-h/childbig.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5208661053607234610" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/SEjhoa-rzDI/AAAAAAAAAR0/X6u7ant2BCA/s200/childbig.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;मुश्किल यह है कि मीडिया का एक हिस्सा भी इन मसलों पर जिस तरह गैरजिम्मेदारी से भरा रवैया अपनाता है, वह विमर्श या संवाद की संभावनाओं को खत्म करता है। दिल्ली विश्वविद्यालय में हमले से पहले टीवी चैनलों को बुला कर बाकायदा प्रायोजित तरीके से हिंसा की गई। यह उत्साह इस मुद्दे पर बातचीत करने के मामले में नहीं दिखाया गया। इस तरह की ज्यादातर खबरें या तो गैरजरूरी होती हैं, या इनकी रिपोर्टिंग में एक तटस्थ विश्लेषण के बजाय संबंधित व्यक्ति का आग्रह हावी रहता है। रामकथा से संबंधित ताजा विवाद में भी यह साफ-साफ देखा गया कि कैसे किसी मामले को जबर्दस्ती खबर बना कर उसे इस हद तक संवेदनशील बना दिया गया कि कट्टरपंथी और सांप्रदायिक गुटों को अपनी रोटी सेंकने का मौका मिल गया।&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9014245926951665678-1344842145766319007?l=charwakshesh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://charwakshesh.blogspot.com/2008/06/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (शेष)</author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/SEjfiEGPEHI/AAAAAAAAARE/boyl1Ozct5E/s72-c/sup-1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>2</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-9014245926951665678.post-2992664007161985102</guid><pubDate>Sat, 29 Mar 2008 07:40:00 +0000</pubDate><atom:updated>2008-12-08T22:32:32.714-08:00</atom:updated><category domain='http://www.blogger.com/atom/ns#'>उम्मीद</category><title>सहर</title><description>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/R-4GMEre-uI/AAAAAAAAAQg/6VrRjy7X0Cc/s1600-h/sadness.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5183087025634343650" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/R-4GMEre-uI/AAAAAAAAAQg/6VrRjy7X0Cc/s200/sadness.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;क्या कौंधा कि उम्मीदों-सी नज़र हुई है,&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;ठहरे हुए समंदर में इक लहर हुई है। &lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;br /&gt;बहुत दिनों तक मौसम ये मायूस रहा,&lt;/p&gt;&lt;p align="center"&gt;आंखें आज बहारों की मुंतज़र हुई हैं। &lt;/p&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;br /&gt;कांटों के ऊपर से कितने दिन गुजरे,&lt;/p&gt;&lt;p align="center"&gt;कितनी मुश्किल से मंजिल ये डगर हुई है। &lt;/p&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;br /&gt;आफ़ताब बन गए आज ये चांद-सितारे,&lt;/p&gt;&lt;p align="center"&gt;बहुत दिनों के बाद शाम ये सहर हुई है। &lt;/p&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;br /&gt;फिर से आए शाम, तो आए क्या ग़म है,&lt;/p&gt;&lt;p align="center"&gt;यों ही अब तक कहां हमारी सहर हुई है।&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9014245926951665678-2992664007161985102?l=charwakshesh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://charwakshesh.blogspot.com/2008/03/blog-post_29.html</link><author>noreply@blogger.com (शेष)</author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/R-4GMEre-uI/AAAAAAAAAQg/6VrRjy7X0Cc/s72-c/sadness.jpg' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>2</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-9014245926951665678.post-7152986568275307789</guid><pubDate>Thu, 27 Mar 2008 13:17:00 +0000</pubDate><atom:updated>2008-12-08T22:32:33.143-08:00</atom:updated><category domain='http://www.blogger.com/atom/ns#'>इधर उधर से</category><title>क्या हमें सभ्य कहलाना अच्छा नहीं लगेगा...?</title><description>&lt;strong&gt;अनिल चमड़िया&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/R-ue_kre-rI/AAAAAAAAAQI/AnJNiVvc4rM/s1600-h/dalit-quotes.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5182410611234896562" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/R-ue_kre-rI/AAAAAAAAAQI/AnJNiVvc4rM/s200/dalit-quotes.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;आखिर क्या कारण है कि भूमंडलीकरण की नीति की शुरुआत के साथ कई विकसित देशों ने उन देशों से माफी मांगने की जरूरत महसूस की जहां की जातियों को उनके दुर्व्यवहार और भेदभाव की नीति का शिकार होना पड़ा है। 1990 में पूर्वी जर्मनी की ससंद ने इस्राइल से यहूदियों की प्रताड़ना के लिए माफी मांगी। सोवियत संघ ने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जेलों में बंद हजारों अधिकारियों को मारने के बाद जंगल में दफना दिए जाने के लिए माफी मांगी। 1998 में कनाडा ने अपने मूल निवासियों से माफी मांगी जिसकी संस्कृति को नष्ट-भ्रष्ट करने के लिए सरकार योजनाएं बनाती रही है। यहां तक कि 1992 में दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति एफडब्ल्यूडी क्लार्क ने तीन करोड़ काले लोगों पर पचास लाख गोरों के शासन के लिए, काले लोगों को दशकों तक प्रताड़ित करने की नीति जारी रखने के लिए माफी मांगी। भारत में जालियांवाला बाग कांड के लिए ब्रिटेन की प्रधानमंत्री मार्ग्रेट थेचर ने इसी दौर में अमृतसर आकर डायर के, ब्रिटिश सरकार के इस कुकृत्य के लिए माफी मांगी।&lt;br /&gt;इसकी सबसे ताजा कड़ी 13 फरवरी को आस्ट्रेलिया में देखने को मिली जहां लेबर पार्टी के प्रधानमंत्री केविन रड ने कैनबरा की गणतांत्रिक संसद में खड़े होकर देश के मूलवासी आदिवासियों के साथ अब तक की दमनकारी संस्कृति और नीति के खिलाफ 'राष्ट्रीय माफी' मांगी। आस्ट्रेलिया मानव सभ्यता के इतिहास का सबसे पुराना दस्तावेज है। भारत की तरह वहां सत्रहवीं सदी की शुरूआत में ब्रिटिशों ने अपना कब्जा जमाना शुरू किया और तब से इन आदिवासियों के खिलाफ लगातार दमन, अत्याचार, रंगभेदी अमानवीय व्यवहार जारी है। शुरूआती दौर में तो ब्रिटेन से अपराधियों को बतौर सजा यहां भेजा जाता था, ताकि वे आदिवासियों के खिलाफ गुंडई कर सकें। गोरे मर्दों के संबंध से जो आदिवासी महिलाएं बच्चे को जन्म देती उन बच्चों को उठा कर ले जाया जाता था। उन बच्चों के साथ हर संभव अत्याचार होते थे। 1910-70 तक तो इस चुराई जाने वाली पीढियों के साथ खुलेआम कुकर्म होते रहे और किसी भी 'सभ्य सरकार' ने उसका विरोध नहीं किया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/R-ufrkre-sI/AAAAAAAAAQQ/AaeQCsW5Bx4/s1600-h/art.widow.cnn.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5182411367149140674" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; CURSOR: hand" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/R-ufrkre-sI/AAAAAAAAAQQ/AaeQCsW5Bx4/s200/art.widow.cnn.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;पिछले चुनाव में लेबर पार्टी ने चुनावी घोषणा पत्र में उन आदिवासियों से राष्ट्र की तरफ माफी मांगने का वायदा किया और उसे इसका समर्थन मिला। 13 फरवरी को सार्वजनिक तौर पर माफी मांगे जाने की घटना के समय जॉन हार्वड को छोड़ कर देश के सभी जीवित प्रधानमंत्री मौजूद थे। कंजरवेटिव पार्टी के 1975-83 तक प्रधानमंत्री रहे मैलकालन फ्रेजर ने तो यह अफसोस जाहिर किया कि काश वे खुद ये काम कर पाते। मौजूदा प्रधानमंत्री तो रो पड़े। लेकिन उन्होंने जो कहा वह महत्वपूर्ण है। उनके अनुसार यह माफी आस्ट्रेलिया के इतिहास में एक नये युग का सूत्रपात करेगी। उनके अनुसार देश के उन सभी लोगों के एकजुट होने का अब समय आ गया है जो आस्ट्रेलिया के मूल निवासी हैं या मूल निवासी नहीं रहे हैं। इस दृश्य को देखने के लिए वंचित और दमित समाज हजारों किलोमीटर चल कर संसद तक पहुंचे थे। यह दुनिया भर में जातियों के खिलाफ शासक जातियों और वर्गों द्वारा माफी मांगने की एक नई मिसाल है। अगर इतिहास के जानकार जिन अन्य माफियों के लिए अपेक्षा करते हैं और उनमें अभी तक जो सामने नहीं आई है, तो वह है अमेरिका द्वारा रेड इंडियन से माफी मांगना। विश्व स्तर पर माफीनामे की कड़ियों को विश्लेषित किया जा सकता है। भूमंडलीकरण के दौर में शासक उन घावों को भरने की कोशिश कर रहे हैं जो संबंधों को सहज करने में बाधा होता है। लेकिन यह किसी देश द्वारा किसी बाहरी समाज से संबंध बनाने तक ही सीमित नहीं है बल्कि अपने आप को मजबूत करने के लिए अंदरूनी तौर पर भी संबंधों की खाई पाटना जरूरी लगता है। आस्ट्रेलिया अपने देश के मूल निवासियों से माफी मांगकर उन्हें बराबर की हिस्सेदारी देने के लिए खुद को तैयार कर रहा है। अपने देश में शासकों द्वारा अतीत के कुकृत्यों के लिए ही माफी मांगते नहीं देखा जाता है जबकि हाल के दिनों में लंदन और आस्ट्रेलिया में सरकारों ने अपने तंत्र द्वारा निर्दोषों की गिरफ्तारी या हत्या के लिए भी बाकायदा माफी मांगी। इस नजरिये से इन घटनाक्रमों को देखा जा सकता है। एक तो भूमंडलीकरण के दौर में ऐसे देशों की सरकारों ने रणनीति के तौर पर अतीत की गलतियों को सुधारने का प्रयास किया है, लेकिन ऐसी रणनीति को स्वीकार्य बनाने के लिए सांस्कृतिक बाधाओं को तोड़ना और जड़ता पर हमला जरूरी होता है। क्या ऐसे देशों और शासकों को उनके यहां के वैचारिक आंदोलनों की पृष्ठभूमि इसकी इजाजत देती है? वे अपने देश में जातियों के बीच के भेदभाव को दूर करने का साहस उसी पृष्ठभूमि से प्राप्त कर रहे हैं। भारत जैसे देशों के इतिहास के बारे में यह सर्वविदित है कि यहां के गहरे जातीय भेदभावों और शासक जातियों के अत्याचार की वजह से, आपसी बंटवारे ने विदेशी शासकों को अपनी जड़ें जमाने का यहां मौका दिया। सांस्कृतिक वर्चस्व रखने वाली जातियों की तरह आधुनिक राजनीतिक राष्ट्र-राज्य व्यवस्था के शासकों ने भी भेदभाव को बढ़ाने की नीतियां ही जारी रखीं। क्या अपने यहां की वैचारिक पृष्ठभूमि अपने कुकृत्यों को स्वीकार करने और फिर माफी मांगने के साहस की ही इजाजत नहीं देती है? यह कैसी जड़ता है? अपने भारतीय समाज में बार-बार कुकृत्यों को भूल जाने की सलाह दी जाती है और वह भी इस तरह से कि कुकृत्यों के दोबारा अंजाम देने की स्थितियां बनी रहें। कोई ऐसा कुकृत्य बताया जाए जो विदेशियों के देश से जाने के बाद भी पिछले पचास वर्षों से बार-बार देखने को नहीं मिलता हो? बजाय इस जड़ता को तोड़ने के हम कितने शर्मनाक तरीके से अपने समाज की जातियों पर ही यह आरोप लगाते हैं कि उन्होंने विदेशियों का साथ दिया। अपने अपने लिए विदेशियों की खोज में जातियां लगी रहती हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/R-ugQEre-tI/AAAAAAAAAQY/5bH9om6rMGc/s1600-h/d-4.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5182411994214365906" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/R-ugQEre-tI/AAAAAAAAAQY/5bH9om6rMGc/s200/d-4.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;हर स्तर पर समाज पर वर्चस्व रखने वाला समूह ऐसे किसी भी माफीनामे का विरोध करता है जो कि उसके वर्चस्व को खत्म करने में कोई भूमिका अदा करता हो। आस्ट्रेलिया में भी यह देखने को मिला। गौरतलब है कि नई पूंजी वाला मीडिया इसमें बड़ी भूमिका अदा कर रहा है। प्रधानमंत्री केविन रड ने जब संसद के पटल पर माफीनामा रखा था तो आस्ट्रेलिया के मीडिया में कोई उत्साह नहीं था। दूसरे दिन माफीनामे को सुनने के लिए उमड़ती भीड़ को देख कर चैनलों ने उसका सीधा प्रसारण तो किया लेकिन इस तरह के विचारों को ही ज्यादा जगह दी जिसमें इस तरह के माफीनामे की जरूरत नहीं बताई गई और न आदिवासी इलाकों में किसी परिवार के साथ उनके दुर्व्यवहार को दिखाया। यही रुख नई पूंजी वाला भारतीय भाषाओं का मीडिया का है। भारत के मीडिया के बड़े हिस्से में आमतौर पर वंचितों को न्याय देने की नीति के वक्त यही प्रवृत्ति दिखाई देती है। भाषाई मीडिया ने भी आस्ट्रेलिया की इस घटना को प्रचारित करने से परहेज किया। लेकिन भारत में सामाजिक, धार्मिक और क्षेत्रीय स्तर की जातियों के साथ कुकृत्यों से माफी मांगने और उन्हें न्याय के समान स्तर पर लाकर खड़ा करने से ऐसे कितने दिनों तक रोका जा सकता है? भारतीय समाज में माफीनामा आंतरिक ऊर्जा का स्रोत है जिसकी ताकत को सार्वभौमिक एवं आत्मनिर्भर राष्ट्र निर्माण में लगाया जा सकता है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9014245926951665678-7152986568275307789?l=charwakshesh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://charwakshesh.blogspot.com/2008/03/blog-post_27.html</link><author>noreply@blogger.com (शेष)</author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/R-ue_kre-rI/AAAAAAAAAQI/AnJNiVvc4rM/s72-c/dalit-quotes.jpg' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>1</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-9014245926951665678.post-474593183652976806</guid><pubDate>Sat, 08 Mar 2008 14:48:00 +0000</pubDate><atom:updated>2008-12-08T22:32:33.250-08:00</atom:updated><category domain='http://www.blogger.com/atom/ns#'>आईना</category><title>पढ़ी-लिखी मैम और वे...</title><description>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/R9KoIDryeKI/AAAAAAAAAP4/zCWe4fYpjgE/s1600-h/indianwomen.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5175383778183510178" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/R9KoIDryeKI/AAAAAAAAAP4/zCWe4fYpjgE/s200/indianwomen.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;जब मेट्रो लिंक सर्विस में चलने वाली एक छोटी बस  के ड्राइवर ने निराश होकर अपने कंडक्टर और हेल्पर को डांट पिलाई कि कहता हूं कि पढ़ी-लिखी मैमों को ना बिठाया कर; तो उसकी फिक्र वाजिब थी। पढ़ी-लिखी मैम को उस दिन बस कंडक्टर ने शास्त्री पार्क मेट्रो स्टेशन कह कर बिठाया था और उस्मानपुर में ही गाड़ी खाली करने की हांक लगा दी थी। लेकिन सभी लोगों के उतर जाने के बावजूद उस पढ़ी-लिखी मैम ने साफ कर दिया कि तुम्हें शास्त्री पार्क मेट्रो स्टेशन पहुंचाना होगा। नहीं तो नतीजा भुगतने के लिए तैयार रहो। मैं पुलिस बुलाऊंगी, तुम्हारी परमिट कैंसिल करवाऊंगी। और वह बस शास्त्री पार्क मेट्रो स्टेशन की ओर चल पड़ी थी। इसी परेशानी में ड्राइवर-कंडक्टर और दो बाकी हेल्पर इस पढ़ी-लिखी मैम को बस में चढ़ाने पर अफसोस जाहिर कर रहे थे।&lt;br /&gt;पढ़ी-लिखी मैम हमारी दोस्त हैं। जब उन्होंने उस दिन मुझे यह वाकया सुनाया तो उन पर मुग्ध होते हुए मैंने भी उसी दिन अपने रास्ते का दूसरा वाकया सुनाना शुरू किया। सौरव विहार से ऑटोरिक्शा से मथुरा रोड जाने का किराया पांच रुपए हैं। बीच में मीठापुर पड़ता है, जहां के तीन रुपए लगते हैं। लेकिन ऑटो से मीठापुर उतरी उस औरत से ऑटो वाले ने जुबान के लिए अभ्यस्त हो चुकी एक गाली के साथ पांच रुपए मांगे। उस वक्त कोई जलजला नहीं आया था, जब फटेहाल-सी दिखती हुई पांच का सिक्का हाथ में लिए वह औरत ऑटो ड्राइवर की मुंह पर उंगली बताते और कुछ "मर्दाना" गालियां बरसाते हुए बोली कि चल दो रुपए लौटा, नहीं तो १०० नंबर को बुलाऊंगी और रोड में चलना बंद करवा दूंगी। ऑटो में बैठे एक मर्द के मुंह से जो निकलना था, वही निकला कि बड़ी कमीनी औरत है। कैसे इसके मुंह से गाली निकला। मैंने उसे सिर्फ इतना कहा कि कभी फुर्सत मिले तो सेचना कि ये ड्राइवर क्यों तुम्हें बेइमान नहीं लगा और वह औरत कमीनी लगी।&lt;br /&gt;कुछ ही दिन पहले दिल्ली में ऑटो चलाने वाली पहली औरत ने उस बेलगाम वर्दीधारी के एक थप्पड़ की पूरी कीमत चुकाई। वह ट्रैफिक पुलिस वाला अपनी रगों में उतर चुके वर्दी के रंग की अकड़ में था। इतना तो तय है कि बेचारे का दिमाग नहीं चलता था। हां, हाथ चलाने में शायद महारत हासिल थी, सो बिना किसी पूछताछ के सीधे हाथ की ताकत आजमा ली। उसके बाद उस ऑटो ड्राइवर ने १०० नंबर बुलाया। चले हुए हाथ ने बात आगे बढ़ा दी और अब सस्पेंड होने के बाद उम्मीद है कि उस बेलगाम घोड़े के दिमाग ने शायद सरकना शुरू कर दिया होगा।&lt;br /&gt;बहरहाल, हमारी उस दोस्त को "मर्दाना" गालियां लफ्ज का इस्तेमाल शायद अच्छा नहीं लगा था। हम सवाल उठा सकते हैं कि ऐसा "इंपॉवरमेंट" किस काम का जो आखिरी तौर पर व्यापक स्त्री समाज के खिलाफ जाता है। लेकिन क्या सिर्फ इस तर्क पर हमें उसके आक्रोश को खारिज कर देना चाहिए? गलत के खिलाफ तुरंत और कामयाब तरीके से खड़ा होने की उसकी ताकत क्या एक पढ़ी-लिखी मैम से कम हो जाती है- सिर्फ इसलिए कि उसने गालियों का इस्तेमाल किया? लेकिन जितना अभी तक समझ सका हूं, यही लगता है कि गालियां सवर्ण और मर्द मानस का हथियार हैं, जिसका वह अपने खिलाफ इस्तेमाल बर्दाश्त नहीं कर सकता।&lt;br /&gt;हमारी वह दोस्त जिस सुचिंतित तरीके से इंपॉवरमेंट की प्रक्रिया से गुजरी होंगी, उसके बारे में सोच पाना भी उस औरत के लिए कहां संभव हुआ होगा? दिल्ली में ऑटो चलाने वाली उस पहली औरत ने भी शायद इस बारे में कुछ नहीं सोचा होगा। लेकिन तीनों ने विरोध किया, और तीनों कामयाब हुईं- रास्ते चाहे जो भी रहे हों। जो जिस आबो-हवा में रहेगा, उसके गंध और स्वाद का असर भी उस पर दिखाई देगा।&lt;br /&gt;अभी तो हम उस ऑटो ड्राइवर को गाली देती हुई औरत का भी खै़रमकदम करेंगे, ऑटो चलाने वाली उस औरत का भी पीठ ठोंकेंगे, और अपनी उस दोस्त, यानी पढ़ी-लिखी मैम पर तो मुग्ध होंगे ही। &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9014245926951665678-474593183652976806?l=charwakshesh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://charwakshesh.blogspot.com/2008/03/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (शेष)</author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/R9KoIDryeKI/AAAAAAAAAP4/zCWe4fYpjgE/s72-c/indianwomen.jpg' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-9014245926951665678.post-2839306060742341904</guid><pubDate>Wed, 06 Feb 2008 09:26:00 +0000</pubDate><atom:updated>2008-12-08T22:32:33.875-08:00</atom:updated><category domain='http://www.blogger.com/atom/ns#'>आईना</category><title>क्या किसी का जूता चोरी हो गया है...?</title><description>उस सुबह घर में वापस घुसने के बाद समझ नहीं आ रहा था कि खुद पर हंसें, कि रोएं, कि क्या करें। जिस शहर में हम रहते हैं, वहां सुबह की नींद आमतौर पर मुर्गे की बांग से नहीं, मोबाइल की घंटियों या मोटरगाड़ियों की पीं-पीं से खुलती है। लेकिन उस सुबह किसी की चीखों ने हमारी नींद में खलल डाला। पहले तल्ले पर अपने किराए के घर की बालकनी पर निकले तो देखा कि एक सात-आठ साल की बच्ची का लगातार चीखना भी उस सुबह का अंधेरा दूर नहीं कर पा रहा था। साठ-सत्तर लोगों की भीड़ के बीच में सात-आठ लोगों के थप्पड़ों से वह इधर-उधर गिर रही थी। जिसके भी पांव पकड़ कर वह बचाने की गुहार लगाती, उसी का थप्पड़ उसके गाल पर पड़ता। वे लोग आज ही अपने हाथ की ताकत आजमा लेना चाहते थे।&lt;br /&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/R6mAawceeaI/AAAAAAAAAPE/wvJgkQU1x3Y/s1600-h/childrags2.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5163799644926278050" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/R6mAawceeaI/AAAAAAAAAPE/wvJgkQU1x3Y/s200/childrags2.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;पहले सकपकाए, दूसरे पल 'चला मुरारी हीरो बनने' की तर्ज पर जैसे थे, वैसे ही नीचे भागे। बीच में जाकर बच्ची को छुड़ाते हुए जब जोर से चिल्लाए कि क्या कर रहे हैं आप लोग? तो जवाब में एक साथ शायद पचास आवाजें गूंजीं होंगी कि यह कूड़ा नहीं बीनती है, यह चोर है, इसने जूते चुराए हैं। उस बच्ची का बोरा खुला बिखरा पड़ा था, उसमें जूते नहीं मिले थे और इसीलिए वे सब वीर-बहादुर उसे पीटते हुए जूते का पता पूछ रहे थे।&lt;br /&gt;हमने बहस शुरू कर दी कि अगर यह बच्ची चोर है तो पुलिस बुलाइए! ऐसे तो लगता है कि आपलोग मार डालेंगे इसे। हमारे अचानक हमले और पुलिस के जिक्र से वह भीड़ सकते में थी और हमसे बहस करने लगी। इसी बीच मौका हाथ लगा और वह बच्ची निकल भागी। शायद हम चाहते भी यही थे।&lt;br /&gt;अब भीड़ की नजर में हम चोरों को बचाने वाले, चोरों को शह देने वाले और उनके चुराए सामान खरीद कर अपना गुजारा करने वालों में से एक थे।&lt;br /&gt;हमियाते हुए आप-आप का अंदाज बिखेर कर अपना बिहारीपना हम पहले ही जाहिर कर चुके थे। सो, जुबानचढ़ी गालियां और बिहारी-बिहारी का तमगा बरसाते हुए आठ-दस बलिष्ठ बहादुरों ने हमारा गिरेबान पकड़ा और उस 'चोर' बच्ची को भगाने की जिम्मेदारी तय करते हुए हम पर हाथ आजमाने की मुद्रा बनाने लगे।&lt;br /&gt;अचानक हमारे मुंह से निकल गया कि अखबार में काम करता हूं, सब के सब मुश्किल में पड़ जाओगे।&lt;br /&gt;अखबार का आदमी और दिल्ली का टोन। असर अचानक हुआ। दो मिनट के भीतर समझने और समझाने का दौर शुरू हुआ कि आप नहीं जानते कि ये लोग कूड़ा बीनने के बहाने सामान चुराते हैं। पिटाई से राहत के साथ दिमाग ने काम करना शुरू किया और किसी तरह पिंड छुड़ा कर हम घर में भाग कर वापस आ गए थे।&lt;br /&gt;इसके पखवाड़े भर पहले किसी और की जेब कट रही थी, हमारी नजर पड़ गई, हमने बता दिया कि भाई, ये लड़का तुम्हारी जेब से कुछ निकाल रहा था, और जेबकतरा अपने छह-सात साथियों के साथ हम पर पिल पड़ा था। वहां भी बातों की कलाकारी ही काम आई और किसी तरह मार खाने से बच सके थे। यानी आदत अब तक नहीं छूटी थी।&lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/R6mB9QceebI/AAAAAAAAAPM/l_gmWykrXLY/s1600-h/scream.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5163801337143392690" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/R6mB9QceebI/AAAAAAAAAPM/l_gmWykrXLY/s200/scream.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;...सोचते हैं कि राजापाकर में, मोतिहारी में, भागलपुर में या आदि-आदि जगहों पर हमारे जैसे बातों के कलाकार क्यों नहीं होते। फिर सोचते हैं कि हम तो यहां दिल्ली में बैठे हैं, वहां क्यों होंगे।&lt;br /&gt;फिर सिहर जाते हैं कि अगर हमने अखबार का आदमी होने का हथियार नहीं भांजा होता तो क्या हम भी उस दिन राजापाकर में मार दिए गए 'चोरों' की तरह किसी 'चोर' में शुमार हो जाते! मुंबई में पंद्रह मिनट तक सत्तर-अस्सी वीर-बांकुरों की भीड़ दो लड़कियों के कपड़े तार-तार करती रही और भले ही अलग-अलग कोणों से एक अखबार का आदमी तस्वीरों उतारता रहा, लेकिन पुलिस को खबर तो की। वरना गुवाहाटी में उस आदिवासी लड़की को सिर्फ पांच लोग नंगा करके दौड़ा रहे थे और पचास लोग तस्वीरें उतारते रहे। पटियाला में मुनादी करके आग में जलते हुए व्यापारी की मौत का तमाशा भी हमें मीडिया के आदमियों ने ही दिखाया था।&lt;br /&gt;सुनते थे कि दिल्ली जैसे शहरों में संवेदनाएं सूख चुकी हैं। लेकिन राजापाकर में, या भागलपुर में, या खैरलांजी में, या गोहाना में, या सुहानी शाम के लिए मशहूर जुहू के समंदरी किनारे पर ही कहां बची हैं? मगर वह कैसे सूखती होंगी? वे कौन-सी वजहें होती होंगी? चाक-चौबंद सोसाइटियों के मजबूत और बुलंद दरवाजों पर तैनात सुरक्षा गार्डों के बीच तीन-चार कमरों की बंद दुनिया! या जाति की जड़ों में पलता जहर! या फिर उस बच्ची की चीखें सुनते ही खुले दरवाजे से सीधे निकल कर उसे छुड़ाने की 'बिना सोची-समझी कोशिश!'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/R9FHaTryeJI/AAAAAAAAAPw/5biDfZFBJ0c/s1600-h/Street.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5174995964111517842" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/R9FHaTryeJI/AAAAAAAAAPw/5biDfZFBJ0c/s200/Street.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिल्ली आने के बाद खगोलविद प्रो यश पाल एक बार मिले थे तो उन्होंने कहा था कि चारों तरफ से बंद और जगह-जगह सुरक्षा गार्ड तैनात होने के बावजूद इन सोसाइटियों की हर महीने होने वाली मीटिंगों में सुरक्षा के मसले की ही सबसे ज्यादा फिक्र होती है।&lt;br /&gt;हमारे मोहल्ले में भी एक पहरेदार रात भर सीटियां बजाता हुआ बिजली के खंभों में डंडा पीटता रहता है। लोगों के घरों के दरवाजों में कुत्तों के घुसने के लिए भी कोई फांट नहीं होती। फिर भी कूड़ा बीनने वाली कोई सात-आठ साल की बच्ची जूता चुरा लेती है!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/R6mC4AceedI/AAAAAAAAAPc/37GxgfTfICw/s1600-h/3.Street%20children%20billboard.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5163802346460707282" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/R6mC4AceedI/AAAAAAAAAPc/37GxgfTfICw/s200/3.Street%2520children%2520billboard.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9014245926951665678-2839306060742341904?l=charwakshesh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://charwakshesh.blogspot.com/2008/02/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (शेष)</author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/R6mAawceeaI/AAAAAAAAAPE/wvJgkQU1x3Y/s72-c/childrags2.jpg' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>7</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-9014245926951665678.post-2973125883923637244</guid><pubDate>Thu, 29 Nov 2007 06:46:00 +0000</pubDate><atom:updated>2008-12-08T22:32:34.722-08:00</atom:updated><category domain='http://www.blogger.com/atom/ns#'>इधर उधर से</category><title>आई पकड़ में "आत्मा"</title><description>&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#330000;"&gt;अमिताभ पांडेय&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/R05uUfnWRmI/AAAAAAAAAGI/OoJpkaLbgj0/s1600-h/a_death_0910.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5138165523239290466" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/R05uUfnWRmI/AAAAAAAAAGI/OoJpkaLbgj0/s200/a_death_0910.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#330000;"&gt;मौत का विज्ञान&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;बचपन में किसी दोस्त ने एक वैज्ञानिक प्रयोग की बात बताई थी। एक मरते हुए आदमी को कांच के बक्से में सीलबंद कर दिया गया, जैसे ही मरा, कांच चटक गया और उसकी आत्मा बाहर निकल गई। यह प्रयोग आज तक मेरे लिए पहेली है। कोई नहीं जानता कि इसे कब, कहां और किसने किया था और न ही यह समझ पाया हूं कि आत्मा जिसे न आग जला सकती और न ही कोई शस्त्र जिसे भेद सकता है, उसे शीशा चटका कर बाहर निकलने की क्या जरूरत थी? क्या वह रोशनी से भी ज्यादा मोटी होती है?&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#330000;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#330000;"&gt;&lt;strong&gt;पहेली&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जिंदगी और मौत की पहेली हमेशा से इंसान को उलझाए हुए है। वह क्या है जो हमें जीवित रखता है और जिसके न रहने पर हम वापस मिट्टी हो जाते हैं। गुनी-ज्ञानीजन कहते आए हैं, क्या जीवन उसी के खेल है? क्या इस पर सिर्फ मानव का विशेष अधिकार है या सारे पशु, पेड़ों को भी हासिल है? फिर क्या बाकी अचेतन जगत मिट्टी, पत्थर, पहाड़, नदी, समंदर, धरती, आदि ग्रहों और तारों-गैलेक्सियों की भी आत्मा होती है? सारे प्राचीन प्रागैतिहासिक धर्म इसका जवाब हां में देते आए हैं और आज के लगभग सभी धर्म एक परमात्मा या विश्वआत्मा की परिकल्पना करते हैं, जिसने सारी सृष्टि की रचना की और उसे चलाती है। आज का विज्ञान क्या कहता है विश्वआत्मा और जीवन के बारे में, दर्शन और धर्मशास्त्रों के शब्दजाल में उलझे बिना, विज्ञान छोटे-छोटे सवालों को सुलझाने में यकीन रखता है, बड़े-बड़े सवालों की परतें बिना सर्वज्ञाता होने के दंभ के खुलती जा रही हैं। जो आंखों से, टेलिस्कोप से, खुर्दबीन से दिखता है और दूसरों को दिखाया जा सकता है, जिसे परखा जा सकता है और बिना शक साबित किया जा सकता है, उसे ही विज्ञान का सर्टीफिकेट मिलता है। ज्ञान के पर्वत पर आंखों पर आस्था की पट्टी बांध कर चढ़ना नामुमकिन है, उसकी ढलानों पर न जाने कितनी परिकल्पनाओं के कंकाल बिखरे बड़े हैं। विज्ञान में जो प्रत्यक्ष प्रयासों से सिद्ध हो जाए, उसे ही सिद्धांत का दर्जा मिलता है।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#330000;"&gt;केमिकल लोचा&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/R05vofnWRnI/AAAAAAAAAGQ/VPObiQKtAPs/s1600-h/superstitions-300-01132006.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5138166966348301938" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/R05vofnWRnI/AAAAAAAAAGQ/VPObiQKtAPs/s200/superstitions-300-01132006.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; इलेक्ट्रॉन, परमाणु, अणु, पत्थर, पहाड़, नदी, समंदर, धरती आदि ग्रह और तारे-गैलेक्सियां जीवित नहीं हैं, यह आज सब जानते हैं, तो कैसे मानें कि उनकी आत्मा होगी। इनके गुण-धर्म उनमें निहित पदार्थों के आपसी और वातावरण से व्यवहार पर निर्भर हैं, जिनकी व्याख्या भौतिकी के नियम बिना किसी अपवाद के कर सकते हैं। रसायन विज्ञान बिना किसी खारी या मीठी आत्मा के सहारे, बिना गुड़ की मिठास और समंदर के खारेपन के समझा जा सकता है। क्या आपने मुर्दा नमक चखा या देखा है? जीवजगत का मामला थोड़ा ज्यादा ही पेचीदा है, पर विज्ञान धीरे-धीरे ये पेच भी खोल रहा है। मुन्नाभाई की जुबान में बोलें तो &lt;strong&gt;&lt;em&gt;जीवन एक केमिकल लोचा&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt; है। यहां भी वैज्ञानिकों को आत्मा के कोई सबूत नहीं मिल रहे हैं।&lt;br /&gt;हमारा शरीर खरबों कोशिकाओं का बना होता है जो आमतौर पर इतनी छोटी होती हैं कि उनको खुर्दबीन की मदद से ही देखा जा सकता है। इनमें से हर एक कोश उतना ही जीवित होता है जितने कि हम। एक कोशिका भी जबर्दस्त जटिल रचनाओं वाली होती है। कोशिका दीवार के अंदर तो पूरा एक औद्योगिक क्षेत्र ही पसरा होता है। जिसमें परतदार रचनाओं पर स्थित राइबोसोम आरएनए की मदद से लाखों किस्म के प्रोटीनों का उत्पादन करते हैं। आरअनए कोशिका के कंट्रोल केंद्र से डीएनए से हर कार्य व्यापार का आदर्श और खाका लेकर आते हैं। प्राणियों में आदि बैक्टीरिया के वंशज माइटोकांड्रिया जो उनके कोशों में शायद दो अरब साल पहले रच-बस गए हैं, भोज्य पदार्थों से ऊर्जा निकाल कर इस्तेमाल लायक अणुओं- एटीपी- में सहेज कर जरूरत की जगह पर भेजते हैं। हरे पौधों में क्लोरोप्लास भी आदि सहयोगी बैक्टीरिया हैं जो सूरज की रोशनी से भोजन बना कोशिकाओं के साथ बांट कर खाते हैं।&lt;br /&gt;आज प्रयोगशाला में कोशिका के सारे प्रोटीनों- आरएनए और डीएनए का कृत्रिम तौर पर बनाया जा चुका है और शायद आने वाले दस साल में कृत्रिम कोशिका भी बिना "आत्मा"  की छौंक लगाए बना ली जाएगी। इसकी उम्मीद बढ़ती जा रही है। कोशिका की जीवंतता का रहस्य रसायन विज्ञान की पहुंच में है- यह किसी से छिपा नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#330000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#330000;"&gt;उम्रदराज अमर बैक्टीरिया&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/R05wovnWRoI/AAAAAAAAAGY/EQVAFteE1tI/s1600-h/soul.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5138168070154897026" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; CURSOR: hand" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/R05wovnWRoI/AAAAAAAAAGY/EQVAFteE1tI/s200/soul.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; जीवन के इतिहास में, धरती पर ३.८ खरब साल में आज से सौ करोड़ साल पहले तक सिर्फ एककोशीय जीवों जैसे बैक्टीरिया, अर्किया और अमीबा जैसे जीवों का साम्राज्य था। बैक्टीरिया आदि की सिर्फ अकाल मृत्यु होती है, अन्यथा अनुकूल आबोहवा में तो वे&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#330000;"&gt; "अमर"&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; ही होते हैं। बैक्टीरिया बंट कर एक से दो, दो से चार और चार से आठ, इस तरह मुद्रास्फीति की तरह बढ़ते ही जाते हैं, जब तक खुराक और ऊर्जा मिलती रहे। खराब हालात में ये सुप्तावस्था में चले जाते हैं और जरूरत पड़े तो लाखों साल तक अलसाए पड़े रहते हैं अपने खोल में। हाल ही में जमीन में मीलों नीचे से और ध्रुवीय बर्फ में से तीन करोड़ साल से ज्यादा उम्रदराज बैक्टीरिया को निकाल कर जगाने में वैज्ञानिकों को सफलता मिली है।&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#330000;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#330000;"&gt;&lt;strong&gt;पहला पाप&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/R05yIvnWRqI/AAAAAAAAAGk/8OGl4qLvDro/s1600-h/pair-of-nude-legs.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5138169719422338722" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/R05yIvnWRqI/AAAAAAAAAGk/8OGl4qLvDro/s200/pair-of-nude-legs.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; बैक्टीरिया के ही जमाने में सेक्स का चलन शुरू हुआ था, पर तब वह जरा चालू किस्म का था। यों ही घूमते-फिरते मौका मिलने पर वे कुछ जींस का आदान-प्रदान कर लिया करते और इसमें वे जात-कुजात की भी परवाह नहीं करते थे। बिल्ली में मछली के जींस और मटर में मिले खून बनाने वाले &lt;strong&gt;"कबाड़ जीन"&lt;/strong&gt; शायद इसी तरह की हेरा-फेरी का नतीजा हैं। पैंसठ करोड़ साल पहले जब बहुकोशीय जीव स्वतंत्र कोशिकाओं के सहकार से बने और आगे चलकर नर और मादा जीव मिल कर &lt;strong&gt;"सभ्य"&lt;/strong&gt; तरीके संतान पैदा करने लगे तो दुनिया में मौत का भी आगाज हुआ। मशहूर खगोल विज्ञानी कार्ल सेगन का यह रोचक सुझाव ईसाई, यहूदी और इस्लामिक आदिग्रंथ ओल्ड टेस्टामेंट की धारणा की स्वीकृति नहीं है। क्या तब के हमारे जीव पुरखे ने शैतान के बहकाने पर -जीवन वृक्ष- का फल खाया था और आदम और हव्वा की तरह वे भी नासमझ थे। मौत की वजह -पहला पाप- नहीं, बल्कि जटिल जीवों में "&lt;strong&gt;सहकार से जुड़ी कोशिकाओं"&lt;/strong&gt; में तालमेल बिगाड़ना होता है।&lt;br /&gt;जीवों के जटिल होने के साथ उनकी उम्र बढ़ने लगी और साथ ही जीनों की जटिलता भी बढ़ने लगी। इससे उम्र चढ़ते जीनों में खराबी आने की संभावना ज्यादा होती है। शरीर की कोशिकाएं अब अनिश्चितकाल तक विभाजन नहीं कर सकती हैं। बार-बार विभाजन से गुणसूत्रों से सिरे छीजते हैं और कोशिकाओं की रिपेयर प्रणाली बार-बार चूक करने लगती है। उम्र बढ़ने पर सत्रहवें गुणसूत्र पर स्थित टीडी-५३ जीन में खराबी होने पर शरीर के अलग-अलग कोशिकाएं अनियंत्रित होकर विभाजन कर कैंसर के ट्यूमर बना सकती हैं। कोशिकाओं की जन्म-मृत्यु तो हमारे जन्म से ही शुरू हो जाती है। कोशिका का विभाजन से जन्म और टीडी-५३ जैसे जीनों से नियंत्रित मृत्यु दोनों ही जरूरी है। अगर एक कोशिका बिना मरे दिन में पचास बार भी विभाजित हो तो साल भर में ब्रह्मांड में मौजूद सारे परमाणुओं से ज्यादा संतानें बनाएगी, जो वैसे भी संभव नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#330000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#330000;"&gt;ऑयल की तरह आत्मा&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/R05zWPnWRsI/AAAAAAAAAG0/pVhjvOzHX5E/s1600-h/hedeath.gif"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5138171050862200514" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/R05zWPnWRsI/AAAAAAAAAG0/pVhjvOzHX5E/s200/hedeath.gif" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; खैर, बचपन में कोशिकाएं ज्यादा बनती हैं और मरती कम हैं, पर १८-२० की उम्र तक जन्म और मृत्यु का पलड़ा बराबरी पर आ जाता है। और फिर? चौंकिए मत। फिर जिंदगी की ढलान शुरू। चालीस की उम्र हमारी प्राकृतिक सीमा है, उसके बाद की जिंदगी तो तकनीक और विज्ञान की गिफ्ट है। दस हजार साल पहले पशुपालन और कृषि के आविष्कार के पहले बिरलों को ही पचास तक पहुंचना नसीब होता था। जो भी हो, आज का चिकित्सा विज्ञान भी अस्सी के पार शायद कुछ मदद कर पाएगा। दिमाग, दिल, जोड़ और पेट की क्या दशा होती, उससे तो सब वाकिफ ही हैं। एक १९७० के मॉडल की कार की तरह कारबोरेटर संभालो तो गियर खड़खड़ाने लगते हैं। पर ऐसा धीरे-धीरे क्यों होता है? क्या आत्मा ऑयल की तरह धीरे-धीरे लीक हो रही है? या फिर दिल की धड़कन बंद होते ही &lt;strong&gt;"प्राण पखेरू"&lt;/strong&gt; उड़ जाते हैं। ऑक्सीजन की सप्लाई बंद होने पर दिमाग सबसे पहले जवाब दे देता है। अगर ताप कम हो तो दिल, फेफड़े, गुर्दे, जिगर, आंखें और खाल खुछ घंटों तक जीवित रह सकती हैं।&lt;br /&gt;अगर इनको किसी जरूरतमंद को प्रत्यारोपित कर दिया जाए तो हम अपने शरीर को कुछ हिस्सों को न सिर्फ अपनी &lt;strong&gt;&lt;span style="color:#330000;"&gt;"आत्मा"&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; से बिछड़ने के बाद भी जिंदा रख सकते हैं, बल्कि कुछ पुण्य भी कमा सकते हैं। कोमा की बेहोशी में हमारे दिमाग का सचेत हिस्सा खराब हो जाता है, फिर भी शरीर जिंदा रहता है और इसके उलट पक्षाघात में शरीर तो खराब हो जाता है, पर दिमाग पूरा चुस्त-दुरुस्त रहता है। तो क्या कोमा में आत्मा शरीर में अटकी रहती है और पक्षाघात में दिमाग में? वैज्ञानिक मत से दो ऐसा है कि मरने पर कोई आत्मा-वात्मा बाहर नहीं निकलती, क्योंकि वह अंदर कभी आई ही नहीं थी। माता के गर्भ में अंडाणु और पिता के शुक्राणु से जो दोनों ही जीवित हैं, गर्भ बनता है, वह भी जीवित गर्भ से पनपे हम भी जीवित, तो फिर हमारी खास आत्मा ने प्रवेश कब किया?&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#330000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#330000;"&gt;टलेगा बुढ़ापा&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/R05yq_nWRrI/AAAAAAAAAGs/M7EdQt4N8vY/s1600-h/restoreth_soul_600.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5138170307832858290" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; CURSOR: hand" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/R05yq_nWRrI/AAAAAAAAAGs/M7EdQt4N8vY/s200/restoreth_soul_600.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; एक तरह से देखें तो हम, हमारे सारे पुरखे, उनकी हर कोशिका &lt;strong&gt;&lt;span style="color:#330000;"&gt;"गर्मी प्रेमी"&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; आदि बैक्टीरिया की संतान हैं, जो आज से लगभग चार अरब साल पहले महासागर के गर्भ में ज्वालामुखियों की आंच में पैदा हुआ और पनपा था। इस मायने में तो हम अमर हैं। हम, पुरखों और संतानों की अटूट शृंखला है और हम अपने मन और विचारों को संस्कृति के द्वारा जिंदा रखने में कामयाब हैं। वैसे पुराने का मरना भी जरूरी है, नहीं तो नए को जगह कहां से मिलेगी। पर हां, बुढ़ापे को सौ या दौ सो साल तक टालना इस शताब्दी के अंत तक संभव हो सकता है। &lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9014245926951665678-2973125883923637244?l=charwakshesh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://charwakshesh.blogspot.com/2007/11/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (शेष)</author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/R05uUfnWRmI/AAAAAAAAAGI/OoJpkaLbgj0/s72-c/a_death_0910.jpg' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>3</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-9014245926951665678.post-8405786826162071899</guid><pubDate>Thu, 01 Nov 2007 06:02:00 +0000</pubDate><atom:updated>2008-12-08T22:32:35.508-08:00</atom:updated><category domain='http://www.blogger.com/atom/ns#'>आईना</category><title>कि ये साजिश अब समझने लगे हैं लोग...</title><description>&lt;p&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/RylwA3GNE8I/AAAAAAAAAEg/rjKFO3F8D6w/s1600-h/gujarat_020322.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5127752810830304194" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/RylwA3GNE8I/AAAAAAAAAEg/rjKFO3F8D6w/s200/gujarat_020322.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#660000;"&gt;&lt;strong&gt;अप्टन सिन्क्लेयर&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; ने कहीं लिखा है- &lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color:#660000;"&gt;"आदमी को आत्मा के अमरत्व में विश्वास करने के लिए लगा दो और उसका सब कुछ लूट लो। वह हंसते हुए इसमें तुम्हारी मदद भी करेगा।"&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt; गुजरात-२००२ का कुछ भी छिपा हुआ नहीं था। फर्क सिर्फ यह है कि &lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;strong&gt;तहलका&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; ने वह सब कुछ दिखा दिया है। अब वह सब कुछ भूल जाने को कहा जा रहा है। आगे बढ़ने की बात हो रही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आगे बढ़ने के लिए तथ्‍यों और तर्कों की ज़रूरत पड़ती है, जिस पर मेहनत करनी पड़ती है- सभी स्‍तरों पर, और भावनाओं में बहाने या भावुकता में बहने के लिए मेहनत नहीं करनी पड़ती, इसलिए आसान है। यह पूरी की पूरी सांस्‍कृतिक समस्‍या है। हमारे यहां ज़्यादातर लोग मान कर चलते हैं, जान कर चलने की ज़रूरत उन्‍हें कभी महसूस नहीं होती। सभी नैतिक शास्त्रों में तयशुदा &lt;strong&gt;&lt;span style="color:#660000;"&gt;'श्रेष्‍ठता'&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; के मानदंडों के सामने सीधे-सीधे सिर झुकाने की प्रवृत्ति ने आदमी की आंखों को इस कदर बंद कर दिया है, कि जो श्रेष्‍ठ प्रस्‍तुत है, वही सत्‍य है- पर कोई सवाल उठाने की प्रवृत्ति सिरे से ग़ायब है। हिंदू सांप्रदायिकता के उफान और उसकी प्रतिस्‍थापना के संघर्षों को इसी संदर्भ में देखा जा सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color:#660000;"&gt;नीचे तस्वीर- खैरलांजी हत्याकांड&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5127752402808411058" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/RylvpHGNE7I/AAAAAAAAAEY/Ez7Bd006kjc/s200/Buddhistmassacre.jpg" border="0" /&gt;आज एक ओर क्‍लोन क्रांति के रास्‍ते आदमी का दिमाग़ समूची प्राकृतिक व्‍यवस्‍था के सामने चुनौती के रूप में खड़ा होने को तैयार है, वहीं हमारे यहां अचानक ही कभी पत्‍थर की मूर्तियां समूचे देश में दूध पीने लगती हैं, तो कभी लाखों की भीड़ एक पुरानी इमारत के नाम पर पागल हो जाती है। धार्मिक उन्‍माद से पीड़ि‍त यह भीड़ उन लोगों को मार कर या ज़ि‍न्‍दा जला कर या औरतों का बलात्‍कार कर अट्टहास करती है, गौरव यात्राएं निकालती हैं, जिनका इस तरह के पागलपन से कोई लेना-देना नहीं होता। मारे गये लोगों का कसूर सिर्फ इतना होता कि उन पर किसी ख़ास धर्म के होने का ठप्‍पा लगा होता है। समाज और धर्म के चंद ठेकेदारों की हांक पर इकट्ठा हुई लाखों की भीड़ को यह नहीं मालूम होता कि उनका पूरा अस्तित्‍व उन ठेकेदारों का गुलाम है जो केवल उस भीड़ का खून पीकर खुश होते हैं। लोगों को दंगों की आग में जलते हुए देखना ही जिनका &lt;strong&gt;&lt;span style="color:#660000;"&gt;'यज्ञ'&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; है, और इसी से उनकी &lt;span style="color:#660000;"&gt;&lt;strong&gt;'मोक्ष' &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;प्राप्ति का रास्‍ता तय होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये धार्मिक लुटेरे इस बात से अच्‍छी तरह वाकिफ होते हैं कि जिन पारलौकिक भ्रमों की बुनियाद पर इस समाज को खड़ा किया गया है, उनका कायम रहना उनकी दु‍कानदारी के हित में है। यहां आम लोगों को यह सोचने की छूट एकदम नहीं है कि अगर भगवान है तो उसकी रक्षा और सेवा हम करेंगे या वह हमारी सेवा ओर रक्षा करेगा। लेकिन हजारों धार्मिक दावानलों में नवजात शिशुओं तक को जिंदा राख होते रेख कर भी हमारी आंखें आज भी बंद हैं। ईंट-पत्‍थरों की बेजान और निरर्थक इमारतों में अपने 'भगवान' की प्रतिस्‍थापना के लिए गर्भवती औरतों का पेट चीर कर बच्‍चे के साथ उसे आग में झोंक कर खुशी से नाचने को कुछ लोग संस्‍कृति की रक्षा की लड़ाई कह रहे हैं। अगर यही संस्कृति है तो मुझे शर्म है इस संस्कृति पर और इसके मूल निहितार्थों को समझना मेरे लिए बहुत ज्‍यादा मुश्किल नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/RylwWHGNE9I/AAAAAAAAAEo/NS4zho5SkMk/s1600-h/india.span.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5127753175902524370" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/RylwWHGNE9I/AAAAAAAAAEo/NS4zho5SkMk/s200/india.span.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;दरअसल, परजीविता या निकम्मापन जिस समाज का या समाज के जिस वर्ग का भी आदर्श होगा, वह अपनी सुविधा की आकांक्षा की आग में समूचे समाज को झुलसाता रहेगा, राख बनाता रहेगा। हिंदुत्व की रक्षा की लड़ाई के मूल में छिपी यह चिंता साफ-साफ देखा और समझी जा सकती है। आज़ादी के बाद और ख़ास तौर पर पिछले डेढ़ दो दशकों में समाज के दलित और पिछड़े तबकों में जिस तेज़ी से वैचारिक आलोड़न हो रहा था, उसका अंतिम नतीजा समाज के उस ताने-बाने का छिन्‍न-भिन्‍न होना था, जहां कुछ परजीवियों की दुकानदारी कायम थी। और ज़ाहिर है कि मुसलमान, ईसाई और लोकतंत्र इस श्रेष्‍ठ वर्ग की परजीविता और निठल्‍लेपन के साथ-साथ सामाजिक &lt;strong&gt;&lt;span style="color:#660000;"&gt;'श्रेष्‍ठता'&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; के सिद्धांत के मुख्‍य बाधक तत्‍व हैं। और दलितों और पिछड़ों के विकास में एक संतुलन तत्‍व के रूप में काम कर रहे हैं। इसलिए प्राथमिक टारगेट मुसलमान और ईसाई हैं। हिंदुत्‍व के कथित संरक्षकों के हिसाब से इन दोनों के ख़त्‍म होने के बाद लोकतंत्र अपने आप ख़त्‍म हो जाएगा। और तब इस हिंदू समाज का प्राचीन &lt;strong&gt;&lt;span style="color:#660000;"&gt;'गौरव'&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; फिर से कायम हो सकेगा, जहां ढोल, गंवार, शूद्र, पशु और नारी सिर्फ ताड़न के अधिकारी होंगे और ब्रह्मा के कमर के ऊपर के हिस्से से पैदा हुए लोग भूदेवों के रूप में 'संस्‍कृति रक्षा' का अभियान उसी तरह चला सकेंगे, जिस तरह हरियाणा के झज्‍जर में गोहत्‍या के नाम पर पांच दलितों की ईंट-पत्‍थरों से मार-मार कर हत्‍या कर दी गई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color:#330000;"&gt;इसी संस्‍कृति निर्माण की प्रक्रिया के लिए पारलौकिक भ्रमों की बुनियाद को और मज़बूत करने की ज़रूरत समझी गयी, जहां आदमी का खुद पर से भरोसा उठ जाता है, और उसका दिमाग़ अंधी सुरंग में भटकते हुए जीवन के 'सत्‍य' की तलाश में मारा-मारा फिरता है- जीवन के ख़त्‍म हो जाने तक।&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;हिंदुत्‍व की &lt;strong&gt;&lt;span style="color:#660000;"&gt;'रक्षा' &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;की लड़ाई की साज़ि‍श का ही यह भी एक हिस्‍सा भर है कि जब आदमी का दिमाग़ आकार लेने लगता है, उसी समय से उसे इस तरह शिक्षित किया जाए ताकि वह बड़ा होकर या तो ज्‍योतिष 'विज्ञान' का डिग्रीधारी बने या फिर तिलक-चोटीधारी ज्‍योति‍षाचार्यों की सलाह से ही अपने शौचालय जाने तक का समय तय करे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/RylxnXGNE-I/AAAAAAAAAEw/IPPQgGKY31k/s1600-h/06trishul.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5127754571766895586" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/RylxnXGNE-I/AAAAAAAAAEw/IPPQgGKY31k/s200/06trishul.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;ऐसा नहीं है कि हिंदुत्‍व ने जिस तरह गुजरात को ग्रास लिया है, उससे दूसरे बचे हुए हैं। गुजरात में सिर्फ सुविधा यह है कि वहां न्यूटन के गति के नियम की नई व्याख्या करने वाला राजा मौजूद है। दरअसल, मोदी जैसा चेहरा किसी को एक बार धोखा दे सकता है, वाजपेयी जैसों का चेहरा लोगों को बार-बार छलता है। गुजरात में मुसलमानों के कत्लेआम के समय गुजरात पुलिस ने भी जान बचाने की भीख मांगती औरतों और बच्चों को बचने के लिए जो रास्ता बताया, उसमें वे उन्मादी पागलों की ज्यादा बड़ी भीड़ में जा फंसे और जिंदा जला दिए गए। जहां तक दूसरी जगहों की बात है, तो राम के उद्धार के लिए शुरू की गई रथयात्रा से समय से ही संघ-परिवार और उसके गर्भनाल से जुड़ी भाजपा-विहिप-बजरंग दल या शिवसेना ने जिस क्रूर प्रहसन युग की शुरुआत की थी, गुजरात में उसकी झलक भर दिखाई गई।&lt;br /&gt;लेकिन समय कभी रुकता नहीं है। जो लोग इतिहास से सबक नहीं लेते, इतिहास उन्हें कभी माफ नहीं करता। हिटलर या मुसोलिनी को अपना आदर्श मानने वाले केवल उनके सत्ताकाल को याद रखते हैं। बेहतर हो इन दोनों इतिहास के तथाकथित नायकों के अंतिम दिनों को याद रखा जाए, जब नस्लवाद, नाजीवाद और जर्मन श्रेष्ठ हैं के प्रणेता हिटलर को तहखाने में छिप कर अपनी पत्नी के साथ खुदकुशी करनी पड़ी। और कि फासीवाद के प्रवर्तक मुसोलिनी के मरने के बाद भी इटली के लोगों ने उसकी लाश को शहर के चौराहे पर रख कर उसे जूते-चप्पलों से पीटा और उस पर थूका।&lt;br /&gt;कहते हैं कि किसी एक चीज़ को बार-बार रटने से वह सच बन जाता है या फिर प्रहसन। इनके राम और राष्ट्र के राग के लगातार आलाप ने इन दोनों शब्दों को सिर्फ प्रहसन की एक त्रासदी बना दिया है। इन्हें इस बात की कोई फिक्र नहीं है इनके राष्ट्रवाद को पूरी दुनिया में जंगली, असभ्य और बर्बर लोगों का अभियान कहा जाने लगे। इन्हें इस बात की भी कोई फिक्र नहीं कि उन्होंने अपने राम को कितने लोगों के लिए भय और घृणा का पात्र बना दिया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सवाल है कि अगर किसी मुसलमान के सड़क पर नमाज पढ़ने या मदरसे में बच्‍चों को पढ़ने या ज्‍यादा बच्‍चे पैदा करने या गाय का मांस खाने या पाकिस्‍तानी टीम के जीतने पर पटाखे छोड़ने से देश टूटता है, तो हिंदूवादियों का कौन-सा ऐसा काम है, जिससे देश जुड़ता है।&lt;br /&gt;एक और बात, कि किसी को राष्‍ट्रद्रोही या गद्दार घोषित करने के बाद उससे राष्‍ट्रभक्ति की उम्‍मीद करने का हमें क्‍या हक़ है? दरअसल विचार या विश्‍लेषण धर्म के ठेकेदारों के लिए सबसे बड़े ख़तरे हैं। क्‍योंकि यही अपनी रोज़ी-रोज़गार जैसे ज़ि‍न्‍दगी के असली सवाल उठा कर उस ठेकेदारी की संभावनाओं को ख़त्‍म करता है। इसलिए पहला हमला इसी पर किया जाता है। और &lt;span style="color:#660000;"&gt;&lt;em&gt;कुछ ऐसी ही वजहों से हिंदू कहे जाने वाले नब्‍बे फीसदी से ज्‍यादा लोगों का किसी न किसी बहाने रोज़ जलील होना उनके भीतर किसी तरह का शर्म नहीं पैदा करता। &lt;/em&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9014245926951665678-8405786826162071899?l=charwakshesh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://charwakshesh.blogspot.com/2007/10/blog-post_31.html</link><author>noreply@blogger.com (शेष)</author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/RylwA3GNE8I/AAAAAAAAAEg/rjKFO3F8D6w/s72-c/gujarat_020322.jpg' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>5</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-9014245926951665678.post-6833166727323256054</guid><pubDate>Fri, 26 Oct 2007 06:28:00 +0000</pubDate><atom:updated>2008-12-08T22:32:35.885-08:00</atom:updated><category domain='http://www.blogger.com/atom/ns#'>इधर उधर से</category><title>राम इतिहास हैं, तो शंबूक का वध...?</title><description>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/RyGnO3GNE1I/AAAAAAAAADs/RipD_Ld3P1I/s1600-h/img_sm_ramayana.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5125561724674315090" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/RyGnO3GNE1I/AAAAAAAAADs/RipD_Ld3P1I/s200/img_sm_ramayana.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;em&gt;आस्थावादियों की दलील है कि धर्म निजी आस्था का सवाल है और इसमें दखल देने का हक किसी को नहीं है। मेरा मानना है कि कोई भी धर्म या मौजूदा सामाजिक व्यवस्था इंसानी समाज पर पूरी तरह एक थोपी गई चीज है। यहां तक कि आस्था भी। बहुत आसानी से हम अपनी आस्था को तार्किक आधार देने के लिए मिथकों को इतिहास घोषित करने लगते हैं। बिना इस बात पर गौर किए कि इसके बाद जो कड़वे सवाल उठेंगे, उसका जवाब हमारे पास क्या होगा। पिछले दिनों &lt;strong&gt;जनसत्ता&lt;/strong&gt; में &lt;strong&gt;शंभुनाथ&lt;/strong&gt; ने कुछ ऐसे ही सवाल उठाए। रामसेतु के मसले पर राम की ऐतिहासिकता का वितंडा पीटते हुए क्या हम उससे जुड़े कुछ सवालों पर गौर करना चाहेंगे?&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="color:#660000;"&gt;&lt;strong&gt;धर्म की हिंसा&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दुनिया के प्रायः सभी बड़े धर्मों के इतिहास से पता चलता है कि ये युद्ध, हिंसा और अत्याचारों के बीच से पैदा हुए। और लंबे समय तक खून-खराबे के बीच से ही इनका विकास हुआ। चिंताजनक यह है कि सभ्यता का दावा करने वाले समाजों में आज भी हिंसा का एक प्रधान औजार है धर्म। अभी सेतुसमुद्रम परियोजना के संदर्भ में राम का मुद्दा फिर गरम है। यह प्रस्तावित है कि पौराणिक कथा या पुराकथा को इतिहास के रूप में देखा जाए। इसके संदेह नहीं कि हर जाति के कुछ मिथकीय लोक विश्वास होते हैं, जिनका तार्किक आधार नहीं होता और इस पर आश्चर्य नहीं करना चाहिए, अगर वे किसी सार्वभौम जीवन सत्य की ओर संकेत करते दिखाई दें। राम, कृष्ण और शिव हिंदुओं के प्राचीन लोकविश्वास हैं, जिनकी रचना हजारों साल में हुई है। इन लोकविश्वासों के भीतर से करोड़ों लोग अपने जीवन के दुख-सुख, हंसी-खुशी, पर्व-उत्सव और रीति-नीति व्यक्त करते आए हैं। वे अपने भौतिक कष्टों के क्षणों में कहीं आश्रय न पाकर इन्हीं लोकविश्वासों की छाया में जाते हैं। यह समझ में आ सकता है कि तार्किक आधार न होने के बावजूद ये कितनी निष्कलंक जगहें हैं। फिर भी आज से नहीं, हजारों साल से इन लोकविश्वासों को पहले धर्म ने अपनी रणभूमि में बदल दिया। अब ये राजनीति और बाजार के खेल के मैदान हैं। यह कितनी आसानी से समझाने की कोशिश होती है कि सेतुसमुद्रम योजना के तहत जल के अंदर समाए जिस सेतु को तोड़ा जा रहा है, वह भगवान राम ने बनाया था। &lt;strong&gt;&lt;em&gt;एक प्राकृतिक घटना को पुरातात्त्विक साक्ष्य बताया जा रहा है, जबकि हिंदुत्ववादियों के शासन में ही इसकी योजना नए सिरे से बनी थी।&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#660000;"&gt;यह लोकविश्वासों की डकैती है&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/RyGVY3GNEyI/AAAAAAAAADY/stxCmOOLXCA/s1600-h/worship.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5125542105263706914" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/RyGVY3GNEyI/AAAAAAAAADY/stxCmOOLXCA/s200/worship.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; यह एक लोकविश्वास है कि हनुमान और नल-नील के नेतृत्व में बंदरों ने सेतु बनाया। इसमें एक गिलहरी का भी योगदान था। यह भी एक लोकविश्वास है कि हनुमान ने पूंछ में लगी आग से सोने की लंका जला दी, पर खुद उनकी पूंछ तक नहीं जली। भारत के लोग जो भी सोचें, श्रीलंका के लोग कभी मानने के लिए तैयार नहीं होंगे कि मिथकीय रावण की लंका यही है। वहां के लोकविश्वास दूसरे हैं, वह दूसरा देश है। इसी तरह, इतिहास ने कभी नूह की नौका के पुरातात्त्विक साक्ष्य ढूंढ़ने का दावा किया था। प्राचीन धार्मिक ग्रंथों में पहले विज्ञान खोजा जाता था। पर अब इतिहास ढूंढ़ा जाता है। धार्मिक मिथकों, पुराकथाओं या पुराणों का इतिहासीकरण दरअसल, एक राजनीतिक परिघटना है। इसका लक्ष्य लोकविश्वासों की राजनीतिक घेरेबंदी है। धर्मध्वजधारियों ने लोकविश्वासों का अपने वर्ण और वर्ग हित में इस्तेमाल किया। बाजारपतियों ने इनको एक आंतरिक भावना से उत्पाद बना दिया, आस्था का बाजारीकरण किया। राजनीतिज्ञों ने इन्हें सत्ता के लिए रणभूमि में बदल दिया। अब अयोध्या की जगह रामसेतु का मुद्दा है- फोकस अब उत्तर से हट कर दक्षिण के प्रसंग की ओर मुड़ गया है। अब भेद, घृणा और रक्त की लहलहाती खेती पीछे छोड़ती हुई एक नई रथयात्रा शुरू होगी। &lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;दरअसल, इसी तरह धर्म, बाजार और सुविधावादी राजनीति साधारण लोक को ठगते आए हैं। यह लोकविश्वासों की डकैती है। लोक अपने विश्वासों की व्याख्या खुद नहीं करेगा तो जाहिर है धर्मध्वजधारी, बाजारपति और सुविधावादी राजनीति अपनी-अपनी व्याख्याएं देंगे। ये लोक से उसके विश्वास छीन लेंगे और उसे सांस्कृतिक खोखलेपन में धकेल देंगे।&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#660000;"&gt;फिर निकलेंगे असंख्य विषैले सर्प&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#660000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;किसी भी धार्मिक महाकाव्य में &lt;span style="color:#660000;"&gt;&lt;strong&gt;"अच्छाई"&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; और &lt;span style="color:#660000;"&gt;&lt;strong&gt;"बुराई"&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; के बीच जो लड़ाई है, वही सच है। बाकी चीजें काव्यात्मक कल्पनाएं हैं या धर्मध्वजधारियों की कूटनीतिक सेंधें। क्या कोई मानेगा कि वाल्मीकि रामायण में बुद्ध को चोर कहा गया है? कहां रामायण, कहां बुद्ध। जाबालि को नास्तिक कह कर लोकायत परंपरा की आलोचना की गई है। संभवतः बौद्ध धर्म के ही असर से रामायण में एक जगह राम से सीता राम से हिंसा के विरोध में कहती हैं, आप बिना वैर के ही दंडकारण्य के राक्षसों का वध करना चाहते हैं। यह विचार त्याग दें, क्योंकि बिना अपराध के किसी को मारने को लोग अच्छा नहीं कहेंगे। राम ने जवाब दिया, राक्षसों के अत्याचार से तपस्यारत मुनि बहुत दुखी हैं। मैं तुम्हारा और लक्ष्मण का परित्याग कर सकता हूं, पर ब्राह्मणों को &lt;span style="color:#660000;"&gt;&lt;strong&gt;" नरभक्षियों"&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; से रक्षा के लिए दिया गया वचन तोड़ नहीं सकता (अरण्यकांड, नौंवां और दसवां सर्ग) । रामायण में राम ने तलवार से शंबूक का सिर काटा है, जबकि राम के लोक बिंब में धनुष-बाण है, तलवार नहीं। जाहिर है कि बुद्ध को चोर कहने से लेकर शंबूक के वध तक के प्रसंग को भी अगर इतिहास मान लिया जाए तो राम को भगवान कहना कठिन होगा। इतना ही नहीं, इतिहास की पिटारी के सैकड़ों नए विषैले सर्प निकलेंगे। हम किसे ऐतिहासिक तथ्य मानें- वाल्मीकि रामायण में शंबूक वध दिखाया गया उसे, या तुलसी के रामचरितमानस में नहीं दिखाया गया उसे? अगर रामायण को इतिहास मान कर पढ़ा जाएगा, इसमें मिथक ही मिथक मिलेगा, मिथक मान कर पढ़ा जाएगा तो इतिहास ही इतिहास मिलेगा। अतीत का सामाजिक इतिहास।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="color:#660000;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="color:#660000;"&gt;&lt;strong&gt;"उद्धारार्थ हत्या"&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;दरअसल, रामकथा को लेकर प्राचीन काल से ही पॉलीमिक्स होता आया है। राम को लेकर राजनीति नई घटना नहीं है। राम को सामाजिक भेदभाव वाली सामाजिक-राजनीतिक अवधारणा की कठपुतली बनाने के प्रयास आगे भी चलेंगे। रामचरितमानस से लगभग दो सौ वर्ष पहले रचे गए अध्यात्म रामायण में राम कहते हैं कि स्त्री-पुरुष का भेद या वर्ण भेद या आश्रय मेरे भजन में बाधक नहीं बन सकते। भक्ति हो ते कोई भी मेरा भजन कर सकता है। यहां तक भक्ति आंदोलन का असर स्पष्ट दिखाई देता है क्योंकि इस ग्रंथ में शंबूक वध अनुपस्थित नहीं है। रामायण से भिन्नता यह है कि रामायण में शंबूक राम के हाथों वध के बाद भी स्वर्ग नहीं जा पाता, बल्कि उसके स्वर्ग न जा पाने से प्रसन्न देवता राम पर फूलों की वर्षा करते हैं। अध्यात्म रामायण में शंबूक स्वर्ग चला जाता है। अध्यात्म रामायण का रचनाकार जो भी रहा हो, उसने वाल्मीकि रामायण जरूर पढ़ी होगी। अगर वह सब इतिहास था तो उसने तथ्य क्यों बदले?रामायण में शंबूक के प्रति की गई क्रूरता शूद्र विरोधी तदयुगीन ब्राह्मणों की क्रूरता है, जबकि अध्यात्म रामायण लिखने वाले ब्राह्मण ने सोचा होगा कि वध ठीक है, पर चलो इसको कम से कम स्वर्ग भेज दो- &lt;span style="color:#660000;"&gt;&lt;strong&gt;"उद्धारार्थ हत्या।"&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="color:#660000;"&gt;&lt;strong&gt;आधुनिक रथयात्री&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;रामकथा में हजारों साल से इतने प्रसंग आते-जाते रहे हैं कि आम हिंदू जनता के मन में जो मुख्य कथा है, वह दरअसल इसके केवल कुछ जीवन-उदबोधक प्रसंगों में उसका विश्वास है- उसमें कुछ भी तथ्य नहीं है। भारत के लोगों ने राम कथा को इतिहास के रूप में न कभी देखा और न देखी की जरूरत महसूस की। अगल-अगल कवियों ने राम कथा को अलग-अलग सृजनात्मक दृष्टि से देखा- वाल्मीकि से निराला तक। अगर राम कथा को इतिहास माना जाता, उसकी कथा में कहीं उलटफेर नहीं होता। भवभूति के उत्तररामचरित में सीता से राम के प्रेम और स्त्री के सामाजिक अधिकार की स्वीकृति के अनेक दृश्य हैं। तुलसी ने कई फेरबदल किए। ये सब समय-समय पर अपनी परंपराओं को जांचने और जरूरत पड़ने पर उन्हें बदल देने के जातीय साहस के चिन्ह हैं। एक ये आधुनिक रथयात्री हैं, जो बदलना बिल्कुल नहीं चाहते। &lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/RyGVIXGNExI/AAAAAAAAADQ/SAljgQbDrIA/s1600-h/mainimg_literature.jpg"&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9014245926951665678-6833166727323256054?l=charwakshesh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://charwakshesh.blogspot.com/2007/10/blog-post_25.html</link><author>noreply@blogger.com (शेष)</author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/RyGnO3GNE1I/AAAAAAAAADs/RipD_Ld3P1I/s72-c/img_sm_ramayana.jpg' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>3</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-9014245926951665678.post-1957094368190341941</guid><pubDate>Mon, 22 Oct 2007 12:44:00 +0000</pubDate><atom:updated>2008-12-08T22:32:36.202-08:00</atom:updated><category domain='http://www.blogger.com/atom/ns#'>इधर उधर से</category><title>राम भरोसे हिंदू होटल</title><description>&lt;em&gt;डॉ आंबेडकर के बाद &lt;strong&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;कांचा इलैया&lt;/span&gt; &lt;/strong&gt;इस धारा के सबसे बड़े चिंतक रहे हैं। इन्होंने हिंदू सामाजिक व्यवस्था पर कुछ कड़वे सवाल उठाए हैं जो आमतौर पर सवर्ण चेतना को गहरे रूप से असहज करता रहा है। उनके तर्क आमतौर पर नहीं काटे जा सकने लायक माने जाते रहे हैं। &lt;span style="color:#660000;"&gt;&lt;strong&gt;राम सेतु&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; को एक बार फिर अपनी डूबती राजनीति का सहारा बनाने की जुगत में भिड़ी भाजपा और द्रमुक के आमने-सामने आने के बहाने उन्होंने &lt;span style="color:#330000;"&gt;&lt;strong&gt;तहलका&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; में अपनी राय जाहिर की। मूल लेख अंग्रेजी में है। अनुवाद &lt;span style="color:#330000;"&gt;&lt;strong&gt;पंकज चौधरी &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;ने किया हैः&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/Rxyb0lCtbNI/AAAAAAAAAC8/V5SMcUtueGQ/s1600-h/ram_bridge_lanka.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5124141803639762130" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/Rxyb0lCtbNI/AAAAAAAAAC8/V5SMcUtueGQ/s200/ram_bridge_lanka.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;पेरियार हमेशा यह कहते थे कि ईश्वर नाम की कोई सत्ता नहीं है। अब करुणानिधि लगातार यह कह रहे हैं कि राम का कोई अस्तित्व नहीं था। और जयललिता राम की सत्ता में पूरी विश्वास करती हुई जय श्रीराम का नारा लगाती हैं। करुणानिधि का राम की सत्ता में विश्वास नहीं करना उन्हें ई वी &lt;strong&gt;&lt;em&gt;रामास्वामी नायकर पेरियार&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt; की तमिल और द्रविड़ राजनीति की निरीश्वरवादी और वैज्ञानिक परंपरा के एक रखवाले के रूप में सामने लाता है। दूसरी ओर, जयललिता का राम की सत्ता में विश्वास करना और यह कहना कि उन्हें पेरियार की निरीश्वरवादी अवधारणा में जरा भी विश्वास नहीं है, उनके उस रूप की पोल खोलता है कि वह न सिर्फ जन्मना ब्राह्मण हैं, बल्कि तमाम हिंदू देवी-देवताओं, खासतौर पर राम की आराधक हैं। &lt;strong&gt;&lt;em&gt;सेतुसमुद्रम परियोजना&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt; पर जब बहस चल रही थी, तब जनता पार्टी के अध्यक्ष सुब्रह्मण्यम स्वामी ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दाखिल कर उससे केंद्र को यह निर्देश देने की गुजारिश की कि वह &lt;strong&gt;&lt;em&gt;रामसेतु (एडम्स सेतु)&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt; को ध्वस्त नहीं करे। क्योंकि उनका व्श्वास है कि रामसेतु का निर्माण वाल्मीकि रचित रामायण के नायक राम के द्वारा हुआ है। ध्यान रहे कि स्वामी खुद एक तमिल ब्राह्मण हैं, और ब्राह्मण विरोधी द्रविड़ राजनीति से नफरत करते हैं।&lt;/p&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/RxyfZVCtbOI/AAAAAAAAADE/WTcvCxVGZy0/s1600-h/250px-Adams_Bridge_aerial.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5124145733534837986" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/RxyfZVCtbOI/AAAAAAAAADE/WTcvCxVGZy0/s200/250px-Adams_Bridge_aerial.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;div align="left"&gt;&lt;p&gt;उन्होंने यह सुप्रीम कोर्ट से यह गुजारिश तब की जब भारतीय पुरातात्त्विक सर्वेक्षण का यह हलफनामा सामने आ चुका था कि इतिहास में न तो किसी पुल का साक्ष्य मिलता है और न ही राम का। भारतीय पुरातात्त्विक सर्वेक्षण के इस हलफनामे को मीडिया ने जरूरत से ज्यादा तूल दिया, जिससे भाजपा और उसकी सहयोगी पार्टियों को सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह पर हिंदू विरोधी होने का आरोप लगाने में मदद मिली। एक ओर उन्होंने सोनिया गांधी पर ईसाई होने का आरोप लगाया, वहीं मनमोहन सिंह पर सिक्ख होने का। उन दोनों को सिर्फ इसलिए निशाना नहीं बनाया गया कि वे अपने प्रशासनिक कर्तव्य का निर्वहन नहीं कर पाए, बल्कि उन्हें इसलिए भी कि वे अल्पसंख्यक समुदाय से आते हैं। इसमें सोनिया गांधी पर सबसे ज्यादा उंगलियां इसलिए उठीं कि वे ईसाई होने के साथ-साथ विदेशी मूल की भी हैं।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उन पर निशाना साध कर हिंदूवादी ताकतें भारत के पूरे ईसाई समुदाय को एक ओर जहां राष्ट्रविरोधी ठहरा रही हैं, वहीं गुजरात और मध्यप्रदेश जैसे राज्यों में ईसाइयों पर हमले को बढ़ावा दिया जा रहा है। उनकी रणनीति यह है कि इन राज्यों में होने वाले चुनाव को खूनी खेल में बदल दें, जैसा कि संघ परिवार पहले भी कर चुका है। उनके दुर्भाग्य से करुणानिधि ने उनकी उस रणनीति की कब्र खोद दी और हिंदू बहुसंख्यक बनाम ईसाई अल्पसंख्यक की बहस को द्रविड़ बहुसंख्यक बनाम आर्य अल्पसंख्यक में बदल दिया। एक ऐसे समय में करुणानिधि ने देश में एक और गुजरात होने से बचा लिया जो शायद ईसाइयों के खिलाफ होता।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;करुणानिधि न सिर्फ राम की सर्वव्यापकता को नकारते हैं, बल्कि उनके प्रति आक्रामक रुख अपनाते हुए उन्हें एक किताब में एक चरित्र से ज्यादा कुछ नहीं मानते हैं। राम के बारे में वे कहते हैं कि क्या राम का वर्णन वाल्मीकि ने एक शराबी के रूप में नहीं किया है? क्या राम के पास इंजीनियरिंग की डिग्री थी? अगर नहीं, तो फिर कैसे उन्होंने एक ऐसे पुल का निर्माण करवाया, जिससे होकर श्रीलंका पहुंचा जा सकता था? करुणानिधि के तर्कपूर्ण सवालों ने राम से संबंधित बहस पर जबर्दस्त असर छोड़ा है। हिंदुत्ववादी ताकतें कभी भी तमिल-द्रविड़ राष्ट्रीयता को बर्दाश्त नहीं कर सकतीं। अगर जयललिता ऐसा करतीं, तो उसका समर्थन खो देतीं। सुब्रह्मण्यम स्वामी की तो कोई बात ही नहीं, क्योंकि राज्य में उनकी कोई खास हैसियत नहीं है। इस मुद्दे पर सोनिया गांधी की रणनीति ने उतना काम नहीं किया, जितना उनकी चुप्पी और उदासीनता ने।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भारतीय पुरातात्त्विक सर्वेक्षण के हलफनामे ने भाजपा और उसके दिवालिये नेतृत्व की पोल खोल दी है। बड़े आर्थिक मुद्दे या समस्याओं पर भाजपा को मुख्य विपक्षी पार्टी की तह कभी भी आलोचनात्मक रवैया अपनाते हुए नहीं देखा गया। हां, वामपंथी पार्टियां जरूर इस मोर्चे पर अपनी भूमिका पूरी गंभीरता से निभाती रही हैं। रामसेतु अभियान बाबरी मस्जिद के खिलाफ चलाए गए अभियान की तरह नहीं है, जिसमें मुसलमानों को लक्ष्य बनाया गया था। यह संघर्ष मुख्य रूप से द्रविड़ तमिलों के साथ हैं, जिसके गंभीर नतीजे हो सकते हैं। यह जेहोवा या अल्लाह की तरह भी नहीं है। हिंदू धर्म में राम एक भगवान के रूप में बड़े पैमाने पर स्वीकार्य नहीं है। संघ परिवार और मुख्य संगठन सभी भारतीयों को यह समझाने में विफल रहे हैं कि राम एक मर्यादा पुरुषोत्तम हैं। हो सकता है कि मुसलमान और ईसाई राम के खिलाफ बात नहीं करें, लेकिन तमिल द्रविड़ ऐसा क्यों करें?&lt;/p&gt;&lt;p&gt;संघ परिवार अगर सच्चाई जानना चाहता है तो उसे यह स्वीकार कर लेना चाहिए कि दक्षिण भारत में राम उस तरह से लोकप्रिय नहीं हैं, जिस तरह शिरडी के साईं बाबा। आंध्र प्रदेश के भद्राचलम में, जहां राम का सबसे बड़ा मंदिर है, जरा-सी भी व्यस्त जगह नहीं है। बहुत कम लोग वहां जाते हैं। अगर भाजपा सोचती है कि राम का नारा उछाल कर एक बार फिर वह हिंदू वोटों की गोलबंदी कर रही है तो यह उसकी भूल है। दूसरी ओर, करुणानिधि जिस तरह से राम के प्रति आक्रामक रुख अपनाए हुए हैं और सेतुसमुद्रम का राजनीतिकरण करने में कामयाब रहे हैं, वह निश्चित रूप से तमिल वोटों के ध्रुवीकरण में मदद करेगा।&lt;/p&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9014245926951665678-1957094368190341941?l=charwakshesh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://charwakshesh.blogspot.com/2007/10/blog-post_22.html</link><author>noreply@blogger.com (शेष)</author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/Rxyb0lCtbNI/AAAAAAAAAC8/V5SMcUtueGQ/s72-c/ram_bridge_lanka.jpg' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>4</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-9014245926951665678.post-8782914221105939755</guid><pubDate>Mon, 08 Oct 2007 14:03:00 +0000</pubDate><atom:updated>2008-12-08T22:32:36.345-08:00</atom:updated><category domain='http://www.blogger.com/atom/ns#'>आईना</category><title>यह विश्वसनीयता और दोहरेपन का दोहरा सवाल है</title><description>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/Rwo89FCtbII/AAAAAAAAACU/BYZV-rBEDmU/s1600-h/ash.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://2.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/Rwo89FCtbII/AAAAAAAAACU/BYZV-rBEDmU/s200/ash.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5118970946483219586" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;एक पुरानी कहावत है कि दूसरों के घरों की ओर उंगलियां उठाने से पहले अपने घर का दरवाजा साफ कर लेना चाहिए। &lt;strong&gt;हिंदुस्तान&lt;/strong&gt; से जुड़ी पत्रकार &lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;मृणाल वल्लरी&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; की तरह बहुतों को यह शिकायत होगी कि एक बड़े बदलाव का वाहक बन सकने वाले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया अपने भीतर इतनी संवेदना क्यों नहीं पैदा कर पाता कि किसी भी छोटी-बड़ी खबर को ब्रेकिंग बना कर पेश करने की तरह कभी अपने आईने में देखने की ईमानदार कोशिश करे।&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहुत दिन नहीं बीते हैं जब नोएडा से चलने वाले एक प्रसिद्ध और राष्ट्रीय कहे जाने वाले टीवी चैनल की एक एंकर ने खुदकुशी कर ली। उसकी नौकरी छूट गई थी और वह लगातार तनाव से गुजर रही थी। इसके कुछ ही दिन बाद देश की राजधानी से ही चलने वाले एक और चैनल की एक और एंकर ने खुदकुशी कर ली। मरने से पहले उसने अपने नोट में खुद को लगातार प्रताड़ित किए जाने की बात लिखी थी। और यह भी कि कैसे उसका बॉस उसके काम को नजरअंदाज कर अपनी बेटी को तरजीह दे रहा था।&lt;br /&gt;वक्त-बेवक्त पति-पत्नी के झगड़ों को भी लाइव दिखाने और किसी भी छोटी-बड़ी घटना पर एसएमएस मंगाने में आगे रहने वाले सभी चैनलों ने इन दोनों एंकरों की खुदकुशी पर किसी की बाइट लेना तो दूर, इसकी खबर तक चलाना जरूरी नहीं समझा।&lt;br /&gt;लेकिन इसी दौरान एक टीवी चैनल ने &lt;strong&gt;&lt;em&gt;मॉडल बनी भिखारन&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt; शीर्षक से एक &lt;em&gt;&lt;strong&gt;ब्रेकिंग स्टोरी&lt;/strong&gt;&lt;/em&gt; दिखाई। यह एक ऐसे मॉडल की कहानी थी, जो मिस यूनिवर्स सुष्मिता सेन के साथ काम कर चुकी है। चैनल के कैमरामैनों को देखते ही उस अर्द्धविक्षिप्त मॉडल ने जिस तरह से मॉडलिंग की विभिन्न मुद्राएं बनानी शुरू कर दी, उससे उसकी प्रतिभा का अंदाजा लगाया जा सकता था। फलक से फुटपाथ पर पहुंची वह मॉडल इस हालत में भी फर्राटेदार अंग्रेजी में फैशन और ग्लैमर के बारे में बता रही थी। उसके आत्मविश्वास को देख कर कोई भी आश्चर्य कर सकता था, तो दिल्ली के प्रतिष्ठित लेडी श्रीराम कॉलेज से ग्रेजुएट उस लड़की की हालत देख कर कोई भी तरस खा सकता था। इस &lt;strong&gt;&lt;em&gt;ब्रेकिंग स्टोरी&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt; की मार्फत चैनल ने इस मॉडल की तकलीफ बयान करने में कोई कमी नहीं छोड़ी।&lt;br /&gt;तस्वीर बिल्कुल साफ है। किसी मरी हुई खबर को भी ब्रेकिंग बना कर टीआरपी बटोरने वाले चैनलों के लिए दोनों एंकरों की खुदकुशी की खबर शायद ज्यादा मसालेदार साबित होती। लेकिन फिर उस तिलिस्म की परतें भी उघड़ जातीं, जिसकी चकाचौंध में सब कुछ सुहाना और महान दिखता है।&lt;br /&gt;दरअसल, खुद को सबसे तेज या अव्वल साबित करने की कोशिश में पत्रकारिता का ढोंग रचते ज्यादातर चैनलों के लिए लगातार धमाकेदार &lt;strong&gt;&lt;em&gt;ब्रेकिंग न्यूज&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt; की शरण लेना मजबूरी बनती जा रही है। भले ही इस प्रवृत्ति से उनकी प्रतिबद्धता और ईमानदारी पर गहरे सवाल उठने लगें। उमा खुराना पर किए गए तथाकथित स्टिंग ऑपरेशन के पर्दाफाश के बाद जो तस्वीर उभरी है, उससे पार पाना चैनलों के क्या इतना सहज होगा?&lt;br /&gt;दूसरा सच यह भी है कि कम से कम इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में ग्लैमर और प्रतिभा के इस घालमेल के इस दौर ने एक टीवी एंकर और रैंप की मॉडल में कोई खास फर्क नहीं रहने दिया है। पच्चीस साल की होते-होते किसी मॉडल के कैरियर पर खतरा मंडराने लगता है। उसके शरीर पर बढ़ती चर्बी, चेहरे पर आती मेच्योरिटी, और उसके बाद आने वाली पतली-छरहरी लड़ी उसके कैरियर के लिए खतरे की घंटी होती है। यही हालत टीवी एंकर की भी है। भले आप उमा भारती को उत्तर प्रदेश की सांसद बता दें या फिर टोनी ब्लेयर को अमेरिका का राष्ट्रपति- आपका चेहरा सुदर्शन है तो सब कुछ आराम से खप जाएगा। कौन जानता है कि कास्टिंग काउच का सिरा बॉलीवुड से चल कर कहां-कहां पहुंचता है। आज का हिडेन कैमरा दीवारों के पार की तस्वीरें आसानी से उतार लेता है, लेकिन चैनलों की चहारदीवारी के भीतर जाने किस धुंध का शिकार हो जाता है। शायद ऐसी ही कुछ वजहों से कहा जाने लगा है कि समाज, राजनीति या दुनिया के अंधेरे कोनों का पर्दाफाश करने चैनलों के अंदर की दुनिया भी उतनी ही लिजलिजी है।&lt;br /&gt;जैसे-जैसे चैनलों ने गांव-गांव तक अपने पांव पसारे हैं- सुष्मिता सेन या मलईका अरोड़ा या टीवी पर दिखने वाले खूबसूरत चेहरे लड़कियों के आदर्श बने। खासतौर पर शहरी समाज में मेकओवर जैसे शब्दों को पहचान मिली और ग्लैमर की अंधी दौड़ ने कम से कम इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को टीआरपी का खेल बना दिया। अगर कोई लड़की टीवी में एंकरिंग करती है तो देश-दुनिया की खबरों से ज्यादा फिक्र उसे एक मॉडल की तरह अपने शारीरिक समीकरण की होती है। अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा वह खुद को मेनटेन रखने पर खर्च करती है, ताकि ज्यादा से ज्यादा दिनों तक उसकी मांग बनी रहे।&lt;br /&gt;&lt;em&gt;एक आधुनिक होती लड़की ने चाहा था कि उसे सामाजिक बेड़ियों और वर्जनाओं से मुक्ति मिलेगी, लेकिन उसे मुक्ति मिली उसके कपड़ों से।&lt;br /&gt;&lt;/em&gt;हमारे यहां पुरुषों पर फिटनेस का दबाव आज भी ज्यादा नहीं है। जबकि महिलाओं पर काम और ग्लैमर की दोहरी मार पड़ रही है। मनोवैज्ञानिक भी मानते हैं कि आज के दौर में यहां नौकरीशुदा औरतों पर दबाव बहुत ज्यादा है और शरीर को सुंदर या आकर्षक बनाए रखने की चाह उसे भीतर से घुन की तरह खाए जा रही है। दो साल पहले दिल्ली के एक बंद कमरे से राखी नाम की एक मॉडल की लाश मिली थी। बाद में पता चला कि उसकी मौत भूख से हुई थी। और कि ग्लैमर और रोटी के विकल्प में से उसने ग्लैमर को चुना था।&lt;br /&gt;तो क्या उसी तरह के दबावों के पैदा हुआ अवसाद अब महिला टीवी एंकरों के बीच भी पसरने लगा है? सवाल यह भी है कि चैनलों के लिए उन दो एंकरों की खुदकुशी की खबर क्या इसलिए गैरजरूरी रही कि इससे उनकी टीआरपी में कोई इजाफा नहीं होता? बात शायद इसके उलट साबित होती, अगर उन एंकरों की खुदकुशियों की भी ब्रेकिंग न्यूज बनाया जाता। लेकिन अगर यह होता तो शायद शीशे के इन घरों के भीतर टंगे पर्दों का फाश भी हो जाता।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9014245926951665678-8782914221105939755?l=charwakshesh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://charwakshesh.blogspot.com/2007/10/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (शेष)</author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/Rwo89FCtbII/AAAAAAAAACU/BYZV-rBEDmU/s72-c/ash.jpg' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>7</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-9014245926951665678.post-4075817949080355270</guid><pubDate>Fri, 28 Sep 2007 07:33:00 +0000</pubDate><atom:updated>2008-12-08T22:32:36.496-08:00</atom:updated><category domain='http://www.blogger.com/atom/ns#'>इधर उधर से</category><title>मैं नास्तिक क्यों हूं</title><description>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/RvywVlCtbGI/AAAAAAAAACE/NoviSdIwUkU/s1600-h/bhagat.jpg"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#ff0000;"&gt;&lt;strong&gt;भगत सिंह &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5115157161553259618" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/RvywVlCtbGI/AAAAAAAAACE/NoviSdIwUkU/s200/bhagat.jpg" border="0" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="right"&gt;&lt;em&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/em&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="right"&gt;&lt;em&gt;&lt;strong&gt;भगत सिंह&lt;/strong&gt; का यह लेख सिर्फ उनकी शख्सीयत का आईना नहीं है, बल्कि एक ऐसा जीवन-दर्शन है, जहां आदमी को आदमी के तौर पर जगह मिलती है, न कि किसी खास धर्म या जाति के सम्मानित या अपमानित होने वाले हिस्से के रूप में.&lt;br /&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="right"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;प्रत्येक मनुष्य को, जो विकास के लिए खड़ा है, रूढ़िगत विश्वासों के हर पहलू की आलोचना तथा उन पर अविश्वास करना होगा और उनको चुनौती देनी होगी. प्रत्येक प्रचलित मत की हर बात को हर कोने से तर्क की कसौटी पर कसना होगा. यदि काफ़ी तर्क के बाद भी वह किसी सिद्धांत या दर्शन के प्रति प्रेरित होता है, तो उसके विश्वास का स्वागत है. उसका तर्क असत्य, भ्रमित या छलावा और कभी-कभी मिथ्या हो सकता है. लेकिन उसको सुधारा जा सकता है क्योंकि विवेक उसके जीवन का दिशा-सूचक है.&lt;br /&gt;लेकिन निरा विश्वास और अंधविश्वास ख़तरनाक है. यह मस्तिष्क को मूढ़ और मनुष्य को प्रतिक्रियावादी बना देता है. जो मनुष्य यथार्थवादी होने का दावा करता है उसे समस्त प्राचीन विश्वासों को चुनौती देनी होगी.&lt;br /&gt;यदि वे तर्क का प्रहार न सह सके तो टुकड़े-टुकड़े होकर गिर पड़ेंगे. तब उस व्यक्ति का पहला काम होगा, तमाम पुराने विश्वासों को धराशायी करके नए दर्शन की स्थापना के लिए जगह साफ करना.&lt;br /&gt;यह तो नकारात्मक पक्ष हुआ. इसके बाद सही कार्य शुरू होगा, जिसमें पुनर्निर्माण के लिए पुराने विश्वासों की कुछ बातों का प्रयोग किया जा सकता है.&lt;br /&gt;जहाँ तक मेरा संबंध है, मैं शुरू से ही मानता हूँ कि इस दिशा में मैं अभी कोई विशेष अध्ययन नहीं कर पाया हूँ. एशियाई दर्शन को पढ़ने की मेरी बड़ी लालसा थी पर ऐसा करने का मुझे कोई संयोग या अवसर नहीं मिला. लेकिन जहाँ तक इस विवाद के नकारात्मक पक्ष की बात है, मैं प्राचीन विश्वासों के ठोसपन पर प्रश्न उठाने के संबंध में आश्वस्त हूँ. मुझे पूरा विश्वास है कि एक चेतन, परम-आत्मा का, जो कि प्रकृति की गति का दिग्दर्शन एवं संचालन करती है, कोई अस्तित्व नहीं है.&lt;br /&gt;हम प्रकृति में विश्वास करते हैं और समस्त प्रगति का ध्येय मनुष्य द्वारा, अपनी सेवा के लिए, प्रकृति पर विजय पाना है. इसको दिशा देने के लिए पीछे कोई चेतन शक्ति नहीं है. यही हमारा दर्शन है.&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#660000;"&gt;&lt;em&gt;जहाँ तक नकारात्मक पहलू की बात है, हम आस्तिकों से कुछ प्रश्न करना चाहते हैं-(i) यदि, जैसा कि आपका विश्वास है, एक सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापक एवं सर्वज्ञानी ईश्वर है जिसने कि पृथ्वी या विश्व की रचना की, तो कृपा करके मुझे यह बताएं कि उसने यह रचना क्यों की?&lt;br /&gt;कष्टों और आफतों से भरी इस दुनिया में असंख्य दुखों के शाश्वत और अनंत गठबंधनों से ग्रसित एक भी प्राणी पूरी तरह सुखी नहीं.&lt;br /&gt;कृपया, यह न कहें कि यही उसका नियम है. यदि वह किसी नियम में बँधा है तो वह सर्वशक्तिमान नहीं. फिर तो वह भी हमारी ही तरह गुलाम है.&lt;br /&gt;कृपा करके यह भी न कहें कि यह उसका शग़ल है.&lt;br /&gt;नीरो ने सिर्फ एक रोम जलाकर राख किया था. उसने चंद लोगों की हत्या की थी. उसने तो बहुत थोड़ा दुख पैदा किया, अपने शौक और मनोरंजन के लिए. &lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;और उसका इतिहास में क्या स्थान है? उसे इतिहासकार किस नाम से बुलाते हैं?&lt;br /&gt;सभी विषैले विशेषण उस पर बरसाए जाते हैं. जालिम, निर्दयी, शैतान-जैसे शब्दों से नीरो की भर्त्सना में पृष्ठ-के पृष्ठ रंगे पड़े हैं. एक चंगेज़ खाँ ने अपने आनंद के लिए कुछ हजार ज़ानें ले लीं और आज हम उसके नाम से घृणा करते हैं. तब फिर तुम उस सर्वशक्तिमान अनंत नीरो को जो हर दिन, हर घंटे और हर मिनट असंख्य दुख देता रहा है और अभी भी दे रहा है, किस तरह न्यायोचित ठहराते हो? फिर तुम उसके उन दुष्कर्मों की हिमायत कैसे करोगे, जो हर पल चंगेज़ के दुष्कर्मों को भी मात दिए जा रहे हैं?&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#660000;"&gt;&lt;em&gt;इसलिए मैं पूछता हूँ, ‘‘उस परम चेतन और सर्वोच्च सत्ता ने इस विश्व और उसमें मनुष्यों का सृजन क्यों किया? आनंद लुटने के लिए? तब उसमें और नीरो में क्या फर्क है"&lt;br /&gt;&lt;/em&gt;&lt;/span&gt;मैं पूछता हूँ कि उसने यह दुनिया बनाई ही क्यों थी-ऐसी दुनिया जो सचमुच का नर्क है, अनंत और गहन वेदना का घर है? सर्वशक्तिमान ने मनुष्य का सृजन क्यों किया जबकि उसके पास मनुष्य का सृजन न करने की ताक़त थी? इन सब बातों का तुम्हारे पास क्या जवाब है? तुम यह कहोगे कि यह सब अगले जन्म में, इन निर्दोष कष्ट सहने वालों को पुरस्कार और ग़लती करने वालों को दंड देने के लिए हो रहा है. ठीक है, ठीक है. तुम कब तक उस व्यक्ति को उचित ठहराते रहोगे जो हमारे शरीर को जख्मी करने का साहस इसलिए करता है कि बाद में इस पर बहुत कोमल तथा आरामदायक मलहम लगाएगा?&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#330000;"&gt;&lt;em&gt;ग्लैडिएटर संस्था के व्यवस्थापकों तथा सहायकों का यह काम कहाँ तक उचित था कि एक भूखे-खूँख्वार शेर के सामने मनुष्य को फेंक दो कि यदि वह उस जंगली जानवर से बचकर अपनी जान बचा लेता है तो उसकी खूब देख-भाल की जाएगी?&lt;br /&gt;&lt;/em&gt;&lt;/span&gt;इसलिए मैं पूछता हूँ, ‘‘उस परम चेतन और सर्वोच्च सत्ता ने इस विश्व और उसमें मनुष्यों का सृजन क्यों किया? आनंद लुटने के लिए? तब उसमें और नीरो में क्या फर्क है?’’ मुसलमानों और ईसाइयों. हिंदू-दर्शन के पास अभी और भी तर्क हो सकते हैं. मैं पूछता हूँ कि तुम्हारे पास ऊपर पूछे गए प्रश्नों का क्या उत्तर है?&lt;br /&gt;तुम तो पूर्व जन्म में विश्वास नहीं करते. तुम तो हिन्दुओं की तरह यह तर्क पेश नहीं कर सकते कि प्रत्यक्षतः निर्दोष व्यक्तियों के कष्ट उनके पूर्व जन्मों के कुकर्मों का फल है. मैं तुमसे पूछता हूँ कि उस सर्वशक्तिशाली ने विश्व की उत्पत्ति के लिए छः दिन मेहनत क्यों की और यह क्यों कहा था कि सब ठीक है. उसे आज ही बुलाओ, उसे पिछला इतिहास दिखाओ. उसे मौजूदा परिस्थितियों का अध्ययन करने दो. फिर हम देखेंगे कि क्या वह आज भी यह कहने का साहस करता है- सब ठीक है.&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#330000;"&gt;&lt;em&gt;कारावास की काल-कोठरियों से लेकर, झोपड़ियों और बस्तियों में भूख से तड़पते लाखों-लाख इंसानों के समुदाय से लेकर, उन शोषित मजदूरों से लेकर जो पूँजीवादी पिशाच द्वारा खून चूसने की क्रिया को धैर्यपूर्वक या कहना चाहिए, निरुत्साहित होकर देख रहे हैं.&lt;br /&gt;और उस मानव-शक्ति की बर्बादी देख रहे हैं जिसे देखकर कोई भी व्यक्ति, जिसे तनिक भी सहज ज्ञान है, भय से सिहर उठेगा; और अधिक उत्पादन को जरूरतमंद लोगों में बाँटने के बजाय समुद्र में फेंक देने को बेहतर समझने से लेकर राजाओं के उन महलों तक-जिनकी नींव मानव की हड्डियों पर पड़ी है...उसको यह सब देखने दो और फिर कहे-‘‘सबकुछ ठीक है.’’ क्यों और किसलिए?&lt;/em&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;यही मेरा प्रश्न है. तुम चुप हो? ठीक है, तो मैं अपनी बात आगे बढ़ाता हूँ.&lt;br /&gt;और तुम हिंदुओ, तुम कहते हो कि आज जो लोग कष्ट भोग रहे हैं, ये पूर्वजन्म के पापी हैं. ठीक है.&lt;br /&gt;तुम कहते हो आज के उत्पीड़क पिछले जन्मों में साधु पुरुष थे, अतः वे सत्ता का आनंद लूट रहे हैं.&lt;br /&gt;मुझे यह मानना पड़ता है कि आपके पूर्वज बहुत चालाक व्यक्ति थे. उन्होंने ऐसे सिद्धांत गढ़े जिनमें तर्क और अविश्वास के सभी प्रयासों को विफल करने की काफी ताकत है. लेकिन हमें यह विश्लेषण करना है कि ये बातें कहाँ तक टिकती हैं.&lt;br /&gt;न्यायशास्त्र के सर्वाधिक प्रसिद्ध विद्वानों के अनुसार, दंड को अपराधी पर पड़नेवाले असर के आधार पर, केवल तीन-चार कारणों से उचित ठहराया जा सकता है. वे हैं प्रतिकार, भय तथा सुधार.&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color:#660000;"&gt;आज सभी प्रगतिशील विचारकों द्वारा प्रतिकार के सिद्धांत की निंदा की जाती है. भयभीत करने के सिद्धांत का भी अंत वही है.&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;केवल सुधार करने का सिद्धांत ही आवश्यक है और मानवता की प्रगति का अटूट अंग है. इसका उद्देश्य अपराधी को एक अत्यंत योग्य तथा शांतिप्रिय नागरिक के रूप में समाज को लौटाना है.&lt;br /&gt;लेकिन यदि हम यह बात मान भी लें कि कुछ मनुष्यों ने (पूर्व जन्म में) पाप किए हैं तो ईश्वर द्वारा उन्हें दिए गए दंड की प्रकृति क्या है? तुम कहते हो कि वह उन्हें गाय, बिल्ली, पेड़, जड़ी-बूटी या जानवर बनाकर पैदा करता है. तुम ऐसे 84 लाख दंडों को गिनाते हो. &lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;मैं पूछता हूँ कि मनुष्य पर सुधारक के रूप में इनका क्या असर है? तुम ऐसे कितने व्यक्तियों से मिले हो जो यह कहते हैं कि वे किसी पाप के कारण पूर्वजन्म में गदहा के रूप में पैदा हुए थे? एक भी नहीं? अपने पुराणों से उदाहरण मत दो. मेरे पास तुम्हारी पौराणिक कथाओं के लिए कोई स्थान नहीं है. और फिर, क्या तुम्हें पता है कि दुनिया में सबसे बड़ा पाप गरीब होना है? गरीबी एक अभिशाप है, वह एक दंड है.&lt;br /&gt;मैं पूछता हूँ कि अपराध-विज्ञान, न्यायशास्त्र या विधिशास्त्र के एक ऐसे विद्वान की आप कहाँ तक प्रशंसा करेंगे जो किसी ऐसी दंड-प्रक्रिया की व्यवस्था करे जो कि अनिवार्यतः मनुष्य को और अधिक अपराध करने को बाध्य करे?&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color:#330000;"&gt;क्या तुम्हारे ईश्वर ने यह नहीं सोचा था? या उसको भी ये सारी बातें-मानवता द्वारा अकथनीय कष्टों के झेलने की कीमत पर-अनुभव से सीखनी थीं? तुम क्या सोचते हो.&lt;br /&gt;किसी गरीब तथा अनपढ़ परिवार, जैसे एक चमार या मेहतर के यहाँ पैदा होने पर इन्सान का भाग्य क्या होगा? चूँकि वह गरीब हैं, इसलिए पढ़ाई नहीं कर सकता.&lt;br /&gt;वह अपने उन साथियों से तिरस्कृत और त्यक्त रहता है जो ऊँची जाति में पैदा होने की वजह से अपने को उससे ऊँचा समझते हैं.&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;उसका अज्ञान, उसकी गरीबी तथा उससे किया गया व्यवहार उसके हृदय को समाज के प्रति निष्ठुर बना देते हैं. मान लो यदि वह कोई पाप करता है तो उसका फल कौन भोगेगा? ईश्वर, वह स्वयं या समाज के मनीषी? और उन लोगों के दंड के बारे में तुम क्या कहोगे जिन्हें दंभी और घमंडी ब्राह्मणों ने जान-बूझकर अज्ञानी बनाए रखा तथा जिन्हें तुम्हारी ज्ञान की पवित्र पुस्तकों-वेदों के कुछ वाक्य सुन लेने के कारण कान में पिघले सीसे की धारा को सहने की सज़ा भुगतनी पड़ती थी? यदि वे कोई अपराध करते हैं तो उसके लिए कौन ज़िम्मेदार होगा और उसका प्रहार कौन सहेगा?&lt;br /&gt;मेरे प्रिय दोस्तो. ये सारे सिद्धांत विशेषाधिकार युक्त लोगों के आविष्कार हैं. ये अपनी हथियाई हुई शक्ति, पूँजी तथा उच्चता को इन सिद्धान्तों के आधार पर सही ठहराते हैं.&lt;br /&gt;जी हाँ, &lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;em&gt;शायद वह अपटन सिंक्लेयर ही था, जिसने किसी जगह लिखा था कि मनुष्य को बस (आत्मा की) अमरता में विश्वास दिला दो और उसके बाद उसका सारा धन-संपत्ति लूट लो.&lt;br /&gt;वह बगैर बड़बड़ाए इस कार्य में तुम्हारी सहायता करेगा. धर्म के उपदेशकों तथा सत्ता के स्वामियों के गठबंधन से ही जेल, फाँसीघर, कोड़े और ये सिद्धांत उपजते हैं.&lt;br /&gt;&lt;/em&gt;&lt;/span&gt;मैं पूछता हूँ कि तुम्हारा सर्वशक्तिशाली ईश्वर हर व्यक्ति को उस समय क्यों नहीं रोकता है जब वह कोई पाप या अपराध कर रहा होता है? ये तो वह बहुत आसानी से कर सकता है. उसने क्यों नहीं लड़ाकू राजाओं को या उनके अंदर लड़ने के उन्माद को समाप्त किया और इस प्रकार विश्वयुद्ध द्वारा मानवता पर पड़ने वाली विपत्तियों से उसे क्यों नहीं बचाया?&lt;br /&gt;मैं पूछता हूँ कि तुम्हारा सर्वशक्तिशाली ईश्वर हर व्यक्ति को उस समय क्यों नहीं रोकता है जब वह कोई पाप या अपराध कर रहा होता है?&lt;br /&gt;ये तो वह बहुत आसानी से कर सकता है. उसने क्यों नहीं लड़ाकू राजाओं को या उनके अंदर लड़ने के उन्माद को समाप्त किया और इस प्रकार विश्वयुद्ध द्वारा मानवता पर पड़ने वाली विपत्तियों से उसे क्यों नहीं बचाया?&lt;br /&gt;उसने अंग्रेज़ों के मस्तिष्क में भारत को मुक्त कर देने हेतु भावना क्यों नहीं पैदा की?&lt;br /&gt;वह क्यों नहीं पूँजीपतियों के हृदय में यह परोपकारी उत्साह भर देता कि वे उत्पादन के साधनों पर व्यक्तिगत संपत्ति का अपना अधिकार त्याग दें और इस प्रकार न केवल सम्पूर्ण श्रमिक समुदाय, वरन समस्त मानव-समाज को पूँजीवाद की बेड़ियों से मुक्त करें.&lt;br /&gt;आप समाजवाद की व्यावहारिकता पर तर्क करना चाहते हैं. मैं इसे आपके सर्वशक्तिमान पर छोड़ देता हूँ कि वह इसे लागू करे.&lt;br /&gt;चलो, आपका परमात्मा आए और वह हर चीज़ को सही तरीके से कर दें.&lt;br /&gt;अब घुमा-फिराकर तर्क करने का प्रयास न करें, वह बेकार की बातें हैं. मैं आपको यह बता दूँ कि अंग्रेज़ों की हुकूमत यहाँ इसलिए नहीं है कि ईश्वर चाहता है, बल्कि इसलिए कि उनके पास ताक़त है और हम में उनका विरोध करने की हिम्मत नहीं. वे हमें अपने प्रभुत्व में ईश्वर की सहायता से नहीं रखे हुए हैं बल्कि बंदूकों, राइफलों, बम और गोलियों, पुलिस और सेना के सहारे रखे हुए हैं. यह हमारी ही उदासीनता है कि वे समाज के विरुद्ध सबसे निंदनीय अपराध-एक राष्ट्र का दूसरे राष्ट्र द्वारा अत्याचारपूर्ण शोषण-सफलतापूर्वक कर रहे हैं.&lt;br /&gt;कहाँ है ईश्वर? वह क्या कर रहा है? क्या वह मनुष्य जाति के इन कष्टों का मज़ा ले रहा है? वह नीरो है, चंगेज़ है, तो उसका नाश हो.&lt;br /&gt;क्या तुम मुझसे पूछते हो कि मैं इस विश्व की उत्पत्ति और मानव की उत्पत्ति की व्याख्या कैसे करता हूँ? ठीक है, मैं तुम्हें बतलाता हूँ. चार्ल्स डारविन ने इस विषय पर कुछ प्रकाश डालने की कोशिश की है. उसको पढ़ो. सोहन स्वामी की ‘सहज ज्ञान’ पढ़ो. तुम्हें इस सवाल का कुछ सीमा तक उत्तर मिल जाएगा. यह (विश्व-सृष्टि) एक प्राकृतिक घटना है. विभिन्न पदार्थों के, निहारिका के आकार में, आकस्मिक मिश्रण से पृथ्वी बनी. कब? इतिहास देखो. इसी प्रकार की घटना का जंतु पैदा हुए और एक लंबे दौर के बाद मानव. डारविन की ‘जीव की उत्पत्ति’ पढ़ो. और तदुपरांत सारा विकास मनुष्य द्वारा प्रकृति से लगातार संघर्ष और उस पर विजय पाने की चेष्टा से हुआ. यह इस घटना की संभवतः सबसे संक्षिप्त व्याख्या है.&lt;br /&gt;तुम्हारा दूसरा तर्क यह हो सकता है कि क्यों एक बच्चा अंधा या लँगड़ा पैदा होता है, यदि यह उसके पूर्वजन्म में किए कार्यों का फल नहीं है तो?&lt;br /&gt;जीवविज्ञान-वेत्ताओं ने इस समस्या का वैज्ञानिक समाधान निकाला है. उनके अनुसार इसका सारा दायित्व माता-पिता के कंधों पर है जो अपने उन कार्यों के प्रति लापरवाह अथवा अनभिज्ञ रहते हैं जो बच्चे के जन्म के पूर्व ही उसे विकलांग बना देते हैं. स्वभावतः तुम एक और प्रश्न पूछ सकते हो-यद्यपि यह निरा बचकाना है. वह सवाल यह कि यदि ईश्वर कहीं नहीं है तो लोग उसमें विश्वास क्यों करने लगे? मेरा उत्तर संक्षिप्त तथा स्पष्ट होगा-जिस प्रकार लोग भूत-प्रेतों तथा दुष्ट-आत्माओं में विश्वास करने लगे, उसी प्रकार ईश्वर को मानने लगे. अंतर केवल इतना है कि ईश्वर में विश्वास विश्वव्यापी है और उसका दर्शन अत्यंत विकसित.&lt;br /&gt;ईश्वर की उत्पत्ति के बारे में मेरा अपना विचार यह है कि मनुष्य ने अपनी सीमाओं, दुर्बलताओं व कमियों को समझने के बाद, परीक्षा की घड़ियों का बहादुरी से सामना करने स्वयं को उत्साहित करने, सभी खतरों को मर्दानगी के साथ झेलने तथा संपन्नता एवं ऐश्वर्य में उसके विस्फोट को बाँधने के लिए-ईश्वर के काल्पनिक अस्तित्व की रचना की&lt;br /&gt;कुछ उग्र परिवर्तनकारियों (रेडिकल्स) के विपरीत मैं इसकी उत्पत्ति का श्रेय उन शोषकों की प्रतिभा को नहीं देता जो परमात्मा के अस्तित्व का उपदेश देकर लोगों को अपने प्रभुत्व में रखना चाहते थे और उनसे अपनी विशिष्ट स्थिति का अधिकार एवं अनुमोदन चाहते थे.&lt;br /&gt;यद्यपि मूल बिंदु पर मेरा उनसे विरोध नहीं है कि सभी धर्म, सम्प्रदाय, पंथ और ऐसी अन्य संस्थाएँ अन्त में निर्दयी और शोषक संस्थाओं, व्यक्तियों तथा वर्गों की समर्थक हो जाती हैं. राजा के विरुद्ध विद्रोह हर धर्म में सदैव ही पाप रहा है. अपने व्यक्तिगत नियमों और अविभावकीय उदारता से पूर्ण ईश्वर की बढ़ा-चढ़ाकर कल्पना एवं चित्रण किया गया. जब उसकी उग्रता तथा व्यक्तिगत नियमों की चर्चा होती है तो उसका उपयोग एक डरानेवाले के रूप में किया जाता है, ताकि मनुष्य समाज के लिए एक खतरा न बन जाए. जब उसके अविभावकीय गुणों की व्याख्या होती है तो उसका उपयोग एक पिता, माता, भाई, बहन, दोस्त तथा सहायक की तरह किया जाता है.&lt;br /&gt;इस प्रकार जब मनुष्य अपने सभी दोस्तों के विश्वासघात और उनके द्वारा त्याग देने से अत्यंत दुखी हो तो उसे इस विचार से सांत्वना मिल सकती है कि एक सच्चा दोस्त उसकी सहायता करने को है, उसे सहारा देगा, जो कि सर्वशक्तिमान है और कुछ भी कर सकता है. वास्तव में आदिम काल में यह समाज के लिए उपयोगी था. विपदा में पड़े मनुष्य के लिए ईश्वर की कल्पना सहायक होती है.&lt;br /&gt;समाज को इस ईश्वरीय विश्वास के विरूद्ध उसी तरह लड़ना होगा जैसे कि मूर्ति-पूजा तथा धर्म-संबंधी क्षुद्र विचारों के विरूद्ध लड़ना पड़ा था. &lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;मेरी स्थिति आज यही है. यह मेरा अहंकार नहीं है. मेरे दोस्तों, यह मेरे सोचने का ही तरीका है जिसने मुझे नास्तिक बनाया है. मैं नहीं जानता कि ईश्वर में विश्वास और रोज़-बरोज़ की प्रार्थना-जिसे मैं मनुष्य का सबसे अधिक स्वार्थी और गिरा हुआ काम मानता हूँ-मेरे लिए सहायक सिद्घ होगी या मेरी स्थिति को और चौपट कर देगी.&lt;br /&gt;मैंने उन नास्तिकों के बारे में पढ़ा है, जिन्होंने सभी विपदाओं का बहादुरी से सामना किया, अतः मैं भी एक मर्द की तरह फाँसी के फंदे की अंतिम घड़ी तक सिर ऊँचा किए खड़ा रहना चाहता हूँ.&lt;br /&gt;देखना है कि मैं इस पर कितना खरा उतर पाता हूँ. मेरे एक दोस्त ने मुझे प्रार्थना करने को कहा.&lt;br /&gt;जब मैंने उसे अपने नास्तिक होने की बात बतलाई तो उसने कहा, ‘देख लेना, अपने अंतिम दिनों में तुम ईश्वर को मानने लगोगे.’ मैंने कहा, ‘नहीं प्रिय महोदय, ऐसा नहीं होगा. ऐसा करना मेरे लिए अपमानजनक तथा पराजय की बात होगी.&lt;br /&gt;स्वार्थ के लिए मैं प्रार्थना नहीं करूँगा.’ पाठकों और दोस्तो, क्या यह अहंकार है? अगर है, तो मैं इसे स्वीकार करता हूँ. &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9014245926951665678-4075817949080355270?l=charwakshesh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://charwakshesh.blogspot.com/2007/09/blog-post_28.html</link><author>noreply@blogger.com (शेष)</author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_G8TAsMG9BUA/RvywVlCtbGI/AAAAAAAAACE/NoviSdIwUkU/s72-c/bhagat.jpg' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>1</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-9014245926951665678.post-2094325017647884401</guid><pubDate>Tue, 04 Sep 2007 13:23:00 +0000</pubDate><atom:updated>2007-09-04T06:31:18.651-07:00</atom:updated><category domain='http://www.blogger.com/atom/ns#'>मेरा शहर</category><title>मेरा शहर</title><description>एक शहर छोड़ के आया हूं&lt;br /&gt;एक नए शहर में आया हूं&lt;br /&gt;जो शहर छोड़ के आया हूं&lt;br /&gt;तो खुद को तोड़ के आया हूं&lt;br /&gt;कुछ दरवाजे छूटे होंगे&lt;br /&gt;कुछ रिश्ते भी टूटे होंगे&lt;br /&gt;किसने छोड़ा, किसने तोड़ा&lt;br /&gt;यह तय करना तो मुश्किल है&lt;br /&gt;पर इतना तो तय है फिर भी&lt;br /&gt;जब सीने के खूं से सन कर&lt;br /&gt;घर कोई जोड़ा जाता है&lt;br /&gt;तब अश्क लहू बन रिसते हैं&lt;br /&gt;जब घर वह छोड़ा जाता है&lt;br /&gt;यह मिट्टी-गारे क्या समझें&lt;br /&gt;पानी क्या है और खूं क्या है&lt;br /&gt;बस सीना थोड़ा दुखता है&lt;br /&gt;बस सांसें थोड़ी रुकती हैं&lt;br /&gt;जब सांसें रुकने लगती हैं&lt;br /&gt;दरवाजा तभी छूटता है&lt;br /&gt;और शहर तभी छूटता है&lt;br /&gt;धीरे-धीरे&lt;br /&gt;अंदर ही अंदर&lt;br /&gt;कोई महल टूटता है&lt;br /&gt;पर कहीं किसी के कानों में&lt;br /&gt;आवाज नहीं जा पाती है&lt;br /&gt;और कोई आवाज कहीं&lt;br /&gt;चुपचाप दफन हो जाती है&lt;br /&gt;पर उम्मीदों का क्या कीजै&lt;br /&gt;सुन ले कोई&lt;br /&gt;बस यही सोच कर&lt;br /&gt;नए शहर में जाती हैं&lt;br /&gt;पर क्या कीजै&lt;br /&gt;इस नए शहर में&lt;br /&gt;रंग बहुत ही ज्यादा हैं&lt;br /&gt;गलियां गर चौड़ी हैं इसकी&lt;br /&gt;तो भीड़ बहुत ज्यादा भी है&lt;br /&gt;जो भीड़ बहुत ज्यादा है तो&lt;br /&gt;कुछ चेहरे पीछे छूटेंगे&lt;br /&gt;लोगों के बोझ तले दब कर&lt;br /&gt;कुछ घर की छत भी टूटेगी&lt;br /&gt;कुछ लोगों के सिर फूटेंगे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर भीड़ रुकेगी क्यों आखिर&lt;br /&gt;किसकी मंजिल है कहां किधर&lt;br /&gt;इन बातों से है क्या मतलब&lt;br /&gt;किसके जूतों से कौन दबा&lt;br /&gt;रुक कर रोया&lt;br /&gt;पर भीड़ रुकी किसकी खातिर&lt;br /&gt;जो ठोकर खाकर गिरे यहां&lt;br /&gt;जज्बातों में बह गए यहां&lt;br /&gt;यह भीड़ उन्हें ही रौंदेगी&lt;br /&gt;उन पर यह भीड़ हंसेगी भी&lt;br /&gt;गिरने वाला&lt;br /&gt;रोने वाला&lt;br /&gt;लाचार टूट कर शायद तब&lt;br /&gt;हो जाएगा जब खत्म यहां&lt;br /&gt;जब भीड़ गुजर जाएगी तब भी&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;strong&gt;शेष&lt;/strong&gt;&lt;/em&gt; बचा रह जाएगा&lt;br /&gt;चल देगा फिर से उस रस्ते&lt;br /&gt;जो नए शहर को जाता है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9014245926951665678-2094325017647884401?l=charwakshesh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://charwakshesh.blogspot.com/2007/09/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (शेष)</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>4</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-9014245926951665678.post-6462475615152354407</guid><pubDate>Fri, 31 Aug 2007 17:07:00 +0000</pubDate><atom:updated>2008-12-08T22:32:36.622-08:00</atom:updated><category domain='http://www.blogger.com/atom/ns#'>इधर उधर से</category><title>ये दरअसल हमारे मुल्‍क़ की वीरानी है</title><description>&lt;a href="http://dilli-darbhanga.blogspot.com/2007/08/blog-post_9789.html" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;अविनाश&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;a onclick="window.open(this.href,this.target,'status=no,scrollbars=no,resizable=yes,width=409,height=269'); return false;" href="http://www.bbc.co.uk/mediaselector/check/hindi/meta/dps/2007/08/070821_qurratul_ain_haider?size=au&amp;amp;bgc=003399&amp;lang=hi&amp;amp;nbram=1&amp;nbwm=1" target="avaccesswin"&gt;&lt;img class="buttonpadding" src="http://www.bbc.co.uk/hindi/images/furniture/button_audio.gif" title="" alt="" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_Zl-3hmYZQL8/Rs5wfO7yakI/AAAAAAAAA84/RczjW1pCMcA/s1600-h/kurrtul-en-haider.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://3.bp.blogspot.com/_Zl-3hmYZQL8/Rs5wfO7yakI/AAAAAAAAA84/RczjW1pCMcA/s200/kurrtul-en-haider.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5102139109744470594" /&gt;&lt;/a&gt;जिस वीरानी में &lt;strong&gt;कुर्तुल आपा&lt;/strong&gt; ने पूरी ज़‍िंदगी गुज़ारी, वही वीरानी अस्‍पताल में उनके साथ अब भी मौजूद थी, जब उनकी सांस थम गयी थी। शव उनके वार्ड से निकाल कर उस कमरे में रख दिया गया था, जहां दरअसल शव ही रखे जाते हैं। रिसेप्‍शनिस्‍ट के पास कोई ज़्यादा जानकारी नहीं थी। टीवी वाला कहने पर अस्‍पताल के प्रशासनिक रूम का रास्‍ता ज़रूर बता दिया। वहां से पता चला, सुबह तीन बजे ही इंतक़ाल हुआ। साथ के लोग शव छोड़ कर घर चले गये हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दफ्तर में काम के बोझ से थोड़ा हल्‍का होने के लिए हम स्‍मोकिंग ज़ोन में खड़े थे कि &lt;a href="http://naisadak.blogspot.com" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;रवीश कुमार&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; ने फोन किया- &lt;a href="http://www.bbc.co.uk/hindi/regionalnews/story/2007/08/070821_hyder_contribution.shtml" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;कुर्तुल एन हैदर&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; नहीं रहीं। हम दौड़ते हुए न्‍यूज़ रूम पहुंचे। ब्रेकिंग न्‍यूज़ की पट्टी टीवी स्‍क्रीन पर चल रही थी। खेल बुलेटिन के बीच में रवीश के हल्‍ला करने पर हमने चार लाइन की इनफॉर्मेशन एंकर के लिए लिखी- उर्दू की मशहूर लेखिका कुर्तुल एन हैदर का आज सुबह नोएडा के कैलाश अस्‍पताल में निधन हो गया है। उनकी मशहूर किताब आग का दरिया की अब तक लाखों प्रतियां बिक चुकी हैं। उन्‍हें ज्ञानपीठ पुरस्‍कार भी मिल चुका है। आज शाम साढ़े चार बजे उन्‍हें जामिया के क़ब्रिस्‍तान में सुपुर्दे ख़ाक किया जाएगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;... और वीटी लाइब्रेरी से टेप लेकर सीढ़‍ियों पर लगभग दौड़ते हुए स्‍टोर की तरफ भागे। ओबी वैन पहले ही रवाना हो चुकी थी। जिस अफरातफरी के आलम में ये क़यास लगाते हुए पहुंचे कि अस्‍पताल में भारी भीड़ होगी, वहां वे तमाम लोग मौजूद थे, जिन्‍हें शायद नहीं पता होगा कि यहीं एक इतिहास शव कक्ष में खामोश लेटा हुआ है। जानने वालों को शायद आपा के इंतक़ाल की ख़बर नहीं थी या हम इस समझ से भागना चाहते थे कि हमारे मुल्‍क में कुर्तुल जैसी शख्‍सीयत के नहीं रहने के कोई मायने नहीं हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम भी कहां जानते हैं कुर्तुल एन हैदर को! दफ्तर से अस्‍पताल तक, जितनी देर गाड़ी ने वक्‍त तय किया, इधर उधर फोन मारते रहे। लगभग आधा दर्जन दोस्‍तों से कुर्तुल के नहीं होने का मतलब टटोलते रहे।&lt;blockquote&gt;&lt;em&gt;(मुंबई में &lt;a href="http://www.blogger.com/profile/11952815871710931417" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;प्रमोद सिंह&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; ने कहा था- आग का दरिया कहीं से लहा लो। लहा नहीं पाये। नये नये एनडीटीवी में आये तो एक दिन &lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Vinod_Dua" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;विनोद दुआ&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; के हाथ में दिख गया। हमने कहा- दे दीजिए, पढ़कर लौटा देंगे। उन्‍होंने कहा- किस पब्लिकेशन का चाहिए? ये एक टीवी पत्रकार का सवाल था। हम लाजवाब थे। उन्‍होंने समझाया कि दो पब्लिकेशन से ये किताब शाया हुई है। किताबघर वाला अनुवाद ज़्यादा अच्‍छा है, लेकिन वे उन दिनों उसे पढ़ रहे थे। पढ़कर देने का वादा अब भी वादा ही है, जिसे शायद वे भूल चुके होंगे।)&lt;/em&gt;&lt;/blockquote&gt;अस्‍पताल से ही घर का पता मिला। सेक्‍टर 21 ई 55, हम वहां गये। वहां भी अस्‍पताल जैसी वीरानी ही तैर रही थी। बाहर कुछ किताबें रखी थीं, जिसके पन्ने टीवी के कुछ कैमरामैन पलट रहे थे। अंदर आम-फहम से दिखने वाले तीन-चार पड़ोसी जैसे लोग हाथों में उर्दू की पतली सी कोई पाक किताब लेकर प्रार्थना जैसा कुछ बुदबुदा रहे थे। अगरबत्ती की गंध घर से बाहर बरामदे में आकर पसर चुकी थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आपा की किताबों से कुछ बेहद ही ख़ूबसूरत तस्‍वीरें हमारे कैमरामैन ने उतारी। उन दिनों की तस्‍वीरें, जब कुर्तुल जवान थीं और जब अपनी जवानी को उन्‍होंने वीरानी का हमक़दम बनाने का फ़ैसला लिया होगा। प्रमोद &lt;a href="http://azdak.blogspot.com/2007/08/blog-post_21.html" target="_blank"&gt;सही कहते हैं&lt;/a&gt; कि जबकि एक हिंदुस्‍तानी औरत के लिए इस तरह का जीवन मुश्किल है- अपने वक़्त में अविवाहित, अकेली रहीं। उनकी तीस बरस पुरानी दोस्‍त &lt;strong&gt;शुग़रा मेहदी&lt;/strong&gt;, जो हमें वहीं मिल गयी, कैमरे के सामने की गुफ्तगू में हमें बताया कि वे इस मस'ले पर कुछ भी पूछो ख़फ़ा हो जाती थीं। कहती थीं, पूरी दुनिया संग-साथ शादी-ब्‍याह में रची-बसी है, एक मैं ही अकेली हूं तो क़हर क्‍यों बरपा होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अकेले रहना दरअसल अपने साथ होना होता है। अपने साथ होकर आप तबीयत से दुनिया के रहस्‍य सुलझा सकते हैं। उन्‍होंने सुलझाया। आग का दरिया का नीलांबर रामायण-महाभारत के वक्‍त से लेकर आधुनिक वक्‍त तक से संवाद करता है। महफिलों वाला आदमी तो कायदे से अपने वक्‍त से भी संवाद नहीं कर पाता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ख़ैर दोपहर बाद से लोगबाग आने शुरू हुए। डेड बॉडी भी आयी। टेलीविज़न की ढेरों गाड़‍ियों से निकल कर पत्रकार ई 55 के आगे चहलक़दमी करने लगे। लेकिन तब तक कुर्तुल के नहीं होने की ख़बर का कोई मतलब नहीं रह गया था। देश में दूसरे बड़े डेवलपमेंट टेलीविज़न से पूरा-पूरा वक्‍त की मांग कर रहे थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नाइट शिफ्ट के बाद की जगी दुपहरी में आंख का गर्दा परेशान करने लगा। सुपुर्दे-खाक से पहले हमने घर का रुख कर लिया।&lt;/blockquote&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9014245926951665678-6462475615152354407?l=charwakshesh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://charwakshesh.blogspot.com/2007/08/blog-post_31.html</link><author>noreply@blogger.com (शेष)</author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_Zl-3hmYZQL8/Rs5wfO7yakI/AAAAAAAAA84/RczjW1pCMcA/s72-c/kurrtul-en-haider.jpg' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>1</thr:total></item></channel></rss>