Friday, 28 January 2011

गोहाना, दुलीना, मिर्चपुर… जुल्‍म की कहानी जारी है…

मिर्चपुर की कड़ियां...


पिछले साल अप्रैल में हरियाणा के हिसार जिले में मिर्चपुर गांव में बाल्मीकी बस्ती के एक कुत्ते के भौंक देने के बाद बाल्मीकि बस्ती पर वहां के जाटों ने हमला कर दिया था और कई घर फूंक डाले थे। उसमें एक विकलांग लड़की सुमन को जिंदा जला दिया गया और उसके पिता को भी। उस घटना के बाद कुछ आरोपियों को पकड़ा गया और मुकदमा चल रहा है। लेकिन उन्हें रिहा करने के लिए वहां जो "आंदोलन" चल रहा है और उसके प्रति जो सरकारी रुख है, वह अपने आप में इस बात का सबूत है कि हमारी व्यवस्था किसके लिए और किस तरह काम करती है। आज ही यह खबर छपी है कि मिर्चपुर गांव के भुक्तभोगी बाल्मीकी परिवारों ने डर से गांव छोड़ दिया है। क्या हम एक आजाद देश में रह रहे हैं और क्या हम आज भी यह कहने की हालत में हैं कि हम एक गौरवशाली परंपरा वाले समाज और देश में रहते हैं?



जब
अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारतीय समाज की जाति-व्यवस्था को नस्लीय भेदभाव की तरह वंचित वर्गों के खिलाफ दमन-शोषण के एक मानक के रूप में स्वीकार करने की बात आती है, तो देश की सरकार इस मुद्दे को खारिज करने के लिए अतिरिक्त उत्साह का प्रदर्शन करती दिखती है। इससे दुनिया में यही संदेश जाता है कि यह मांग कुछ असंतुष्ट वर्गों की गैरजरूरी ‘खुराफात’ होगी और जाति-व्यवस्था एक प्रचार से ज्यादा कुछ नहीं है। लेकिन दुनिया के सबसे ताकतवर देशों के साथ सामरिक-आर्थिक समझौते करते और भावी महाशक्ति के रूप में प्रचारित हमारे देश के सामाजिक हालात क्या इतने ही सुखद हैं?

दरअसल, सामाजिक वर्णक्रम का मनोविज्ञान इतना आसान नहीं है कि उसकी गुत्थियां अर्थव्यवस्था के विकास दर के जुमलों से सुलझायी जा सकें। दूसरे कई राज्यों के मुकाबले हरियाणा एक समृद्ध या और ज्यादा समृद्ध होता राज्य है। ‘जिंदल प्रभाव’ से आच्छादित राज्य के एक जिले हिसार का सफर करते हुए कोई यह अंदाजा लगा सकता है कि रास्ते में पड़ने वाले घरों की बनावट और वहां की बहुत अच्छी सड़कें शायद ‘ईमानदार और समग्र’ विकास नीतियों का नतीजा होंगी। मिर्चपुर गांव भी बाहर से ऐसा ही दिखता है। लेकिन पिछले महीने इस गांव की एक घटना ने फिर से इस वहम को तोड़ा है कि आर्थिक विकास सामाजिक शोषण और दमन की स्थितियों से निपटने का एक आखिरी जरिया है।

एक कुत्ते के भौंकने के बाद हुई नोक-झोंक क्या इतना बड़ी वजह हो सकती है कि गांव की समूची बाल्मीकि बस्ती पर हमला करके घरों को फूंक डाला जाए? लेकिन इस बहाने ने ऐसा रूप लिया कि दबंग माने जाने वाले जाट समुदाय के लोगों ने ‘अपनी’ सत्ता और पुलिस प्रशासन में अपने लोगों के साये में बाल्मीकि बस्ती को घेर कर करीब बीस घरों को इत्मीनान से जलाया। खासतौर पर उन घरों को निशाना बनाया गया जो किसी तरह थोड़ी अच्छी हालत में आ चुके थे।

घृणा के उस पैमाने का अंदाजा लगाना भी मुश्किल है जो एक विकलांग लड़की के ऊपर पेट्रोल डालने के बाद घर में बंद कर देने और बाहर से आग लगा देने को मजबूर करता है। शारीरिक रूप से लाचार अठारह साल की सुमन बारहवीं कक्षा में पढ़ रही थी। नफरत की इस आग में सुमन के साथ उसके पिता ताराचंद भी जला दिये गये।

सुव्यवस्थित विकास की दिख सकने वाली तस्वीरों के बीच इस स्थिति की कल्पना भी शायद मुमकिन नहीं कि अपने जलते घरों और खुद को बचाने की कोशिश करते पुरुषों और महिलाओं के सामने हमलावर निर्वस्त्र होकर नाचने लगें! यह किसी भी तरह के विकास के तमाम दावों को खारिज करने के लिए काफी है। यह हजारों साल की ‘महान’ सांस्कृतिक परंपराओं पर शर्म करने के लिए काफी है। यह एक ऐसे कबीले की कल्पना लगती है जिसे अपनी सड़ांधों पर गर्व करना सुहाता है और वह इसी में जीना चाहता है। नहीं तो क्या कारण है कि अपनी प्रकृति में समान गोहाना, दुलीना या मिर्चपुर कांड शृंखला की कड़ियों की तरह आगे बढ़ते जा रहे हैं।

इस तरह की घटनाओं के बावजूद अक्सर खाप पंचायतों में अपनी तीन हजार साल की परंपरा पर गर्व की घोषणा की जाती है। इन पंचायतों में वे लोग भी बैठे होते हैं, जिनके घरों में आधुनिकतम सुख-सुविधाओं के सभी साधन मौजूद होंगे और संभव है कि उनमें से बहुत सारे डॉक्टर-इंजीनियर या स्कूल-कॉलेज में पढ़ाने वाले शिक्षक हों। जिस मिर्चपुर गांव में बाल्मीकि बस्ती को जलाया गया, वहां दूसरी सरकारी नौकरियों के अलावा शिक्षण के पेशे में चार सौ लोग हैं। इन चार सौ में से तीन सौ अस्सी शिक्षक अकेले जाट बिरादरी से हैं। लेकिन मिर्चपुर की घटना के बाद भी इनके बीच का कोई शिक्षक अगर बाल्मीकियों को बदमिजाज और सिरचढ़ा कहता हुआ मिल जाए तो समझा जा सकता है कि अपने समाज पर इन शिक्षकों का क्या असर होगा और अगर होगा तो वह किस तरह का होगा। कहते हैं कि शिक्षा सभी तरह की जड़ताओं और अंधेरों को दूर करती है। लेकिन हकीकत यह भी है कि सत्ता और सत्ता में बने रहने की चाहत शिक्षा को एक साजिश में तब्दील कर देती है। राजनीतिक सत्ताएं आमतौर पर सामाजिक सत्ताओं का ही प्रतिरूप होती हैं। और यह जगजाहिर है कि राजनीतिक सत्ताओं के लिए सामाजिक सत्ताओं के हित क्यों सर्वोपरि होते हैं।

यह अनायास नहीं है कि खाप पंचायतों को न केवल पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला और उनकी पार्टी का, बल्कि हरियाणा के औद्योगिक विकास में अपनी खास जगह रखने वाले कांग्रेसी सांसद नवीन जिंदल का भी खुला समर्थन मिलता है। राज्य सरकार की ओर से मुआवजे की रस्म अदायगी को खारिज करके मिर्चपुर के पीड़ित जब अपनी मांगों के साथ हिसार जिलाधिकारी कार्यालय के बाहर धरने पर बैठे थे, तो उन्हें एक तरह से जबर्दस्ती वहां से हटा दिया गया। वे कौन-सी ताकतें हैं, जो राजनीतिक सत्ताओं को इस तरह के ‘खेल’ को जारी रखने के लिए मजबूर करती हैं? दरअसल, बदलती आर्थिक संरचनाओं का असर वंचित तबकों की सामाजिक और मनोवैज्ञानिक स्थितियों पर जरूर हुआ, जिसमें उन्हें सशक्तीकरण की एक प्रक्रिया में जाने का मौका मिला। नये दौर के संपर्कों के कारण बड़े पैमाने पर दलित अपने पारंपरिक पेशों से बाहर आये और मजदूरी से लेकर दूसरे कई तरह के काम-धंधों में उन्होंने दखल देना शुरू किया। पारंपरिक पेशे जहां उनकी सामाजिक हैसियत और आर्थिक बदहाली को बनाये रखने में ही अपनी भूमिका निभाते थे, वहां अब उन्होंने अपने घर की दीवारें अच्छी बनायीं, टीवी, फ्रिज या मोटरसाइकिल भी खरीदे। निजी स्कूलों का खर्च वे नहीं उठा सकते थे, इसलिए उन्होंने अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में ही सही, भेजना शुरू किया।

यह एक ऐसी स्थिति है जिससे समूची सामाजिक सत्ता-संरचना में टूट-फूट मच सकती है। और संस्कृति का ‘राग- उदार’ गाता हुआ हमारे देश या समाज का प्रभु वर्ग अभी इतना उदार नहीं हुआ है कि अपनी हैसियत की कुर्सी की ओर बढ़ते किसी कदम का वह स्वागत करे। जाहिर है, कमजोर वर्गों के लोगों का अपने अस्तित्व को लेकर जागरूक होना समाज पर पहले से काबिज प्रभु वर्गों को नागवार गुजरा है।

मुश्किल यह है कि सशक्तीकरण की इस प्रक्रिया ने दबंग समुदायों के बीच उदार या मानवीय होने की प्रेरणा भरने के बजाय अपनी परंपरागत हैसियत के छिन जाने का भय पैदा किया। जब तक समाज अपनी परंपराओं के हिसाब से चलता रहा और दलित-दमित तबके ‘अपनी सीमा’ में रहे, यह ‘गर्व’ करने का विषय रहा। और जब सामाजिक सत्ता के सूत्र बिखरने लगे तो इस श्रेष्ठता-बोध के मनोविज्ञान के सामने नयी चुनौतियां खड़ी हुईं। इसी यथास्थितिवाद को कायम रखने या इसे बचाने की कोशिशों के तहत प्रभु वर्ग ज्यादा आक्रामक हुए। गोहाना या मिर्चपुर जैसे कांड दरअसल उसी प्रतिक्रिया का नतीजा कहे जा सकते हैं, जिसकी मार्फत यह संदेश देने की कोशिश की जाती है कि समाज की लगाम किसके हाथों में है और किसे अपनी तय सामाजिक हैसियत से ऊपर आने का हक नहीं है।

मगर सामाजिक सत्ताओं और उसके प्रतिनिधि के रूप में काम कर रहे राजनीतिक-प्रशासनिक तंत्र के सामने स्थितियां क्या पहले की तरह ही आसान रह गयी हैं?

पुलिस प्रशासन के साये में सुनियोजित तरीके से हुए मिर्चपुर कांड के बाद सिर्फ सार्वजनिक शर्म से बचने के लिए हरियाणा सरकार ने जो औपचारिक कार्रवाई की, उसकी असलियत का अंदाजा भी स्थानीय दलितों के इस आरोप से लगाया जा सकता है कि घटना को अंजाम देने वाले अब भी खुलेआम घूम रहे हैं और लोगों को धमका रहे हैं।

गौरतलब है कि मिर्चपुर में दलित उत्पीड़न का लंबा इतिहास रहा है और खासतौर पर दलित महिलाओं का यौन उत्पीड़न और उन्हें नंगा करके घुमाने जैसी घटनाएं पहले भी होती रही हैं। अपनी मर्जी से वोट नहीं डाल पाने या गांव के मंदिर में दलितों का प्रवेश वर्जित होने जैसी स्थितियां अगर आज भी बनी हुई है तो यह किसकी विफलता है? शायद यही वजह है कि हालिया घटना के बाद प्रशासन की ओर से दिये गये सुरक्षा के आश्वासन के बावजूद कुछ भुक्तभोगी गांव में लौटे, लेकिन उन्होंने अपने परिवार की युवतियों और लड़कियों को गांव से दूर अपने रिश्तेदारों के पास रखने का विकल्प चुना।

यह उस इलाके में दलित वर्गों के लिए सम्मान और सुरक्षा के माहौल और प्रशासन के आश्वासन की सच्चाई है। वे कौन-से हालात होंगे, जिनमें स्थानीय दलित परिवारों ने दावा किया कि अगर पुलिस ने चाल नहीं चली होती तो हमारे लड़के इतना बड़ा कांड नहीं होने देते, और कि अब लड़ने के अलावा कोई चारा नहीं बचा? साफ है कि अब दलित भी शायद खुद सामना करने के विकल्प की ओर बढ़ रहे हैं। क्या यह सरकारों के चेतने का समय है? यह बेवजह नहीं है कि घटना के लगभग तीन हफ्ते बाद मिर्चपुर में एक ओर सर्वखाप पंचायत में आठ-दस हजार लोगों की भीड़ के सामने दावा किया जा रहा था कि ‘बाल्मीकि भाइयों ने अब समझौता कर लिया है और वे भाईचारे के साथ गांव में रहने को तैयार हो गये हैं’ और दूसरी ओर, जलायी गयी बस्ती के भुक्तभोगी परिवारों का साफ कहना था कि किसी तरह का समझौता नहीं हो सकता और दोषियों को हर हाल में सजा मिलनी चाहिए।

मगर राज्य की राजनीतिक ताकतों को दलित वर्गों की पीड़ा और उनके गुस्से की कोई परवाह नहीं है। दलितों पर अत्याचारों से लेकर इज्जत बचाने के नाम पर हत्या जैसे बर्बर फरमानों के बावजूद अगर राजनीतिक दल खाप पंचायतों के सामने सिर झुकाये नजर आते हैं तो इसके कारण क्या हो सकते हैं? या तो उनका मकसद सिर्फ वोट लेना है, या फिर वे खुद भी उसी मध्ययुगीन मानसिकता में कैद हैं! परंपरा को बचाने के नाम पर जातीय और राजनीतिक स्वार्थों का यह घालमेल संविधान तक को खारिज करने में नहीं हिचकता।

सामाजिक विकास नीतियों की इससे बड़ी विफलता और क्या हो सकती है कि शिक्षा और सभ्यता के तमाम दावे जाति की जड़ों के सामने हार जाते हैं! देश के सभी हिस्सों में लागू पाठ्यक्रमों में अपनी संस्कृति की उदारता पर गर्व करने का मनोविज्ञान तैयार किया जाता है। लेकिन अलग-अलग रूपों में देश के सभी हिस्सों में कमजोर तबकों के खिलाफ अक्सर होने वाली अत्याचार की घटनाएं व्यवहार में उस उदारता की हकीकत बयान करती हैं। इस सच्चाई को दुनिया के सामने नस्लीय भेदभाव के आईने में देखने से हमारी सरकारें क्या इसलिए कतराती रही हैं कि इससे गोहाना, दुलीना या मिर्चपुर जैसे कांडों पर पड़ा पर्दा उघड़ जाएगा?

(31 मई 2010 को जनसत्ता में प्रक‍ाशित)

Wednesday, 26 January 2011

हमारी सबसे ऊंची अदालत भी सबसे ओछा सोचती है

कौन है रखैल या नौकरानी टा्इप की यह औरत...!!!

“अगर एक मर्द अपनी यौन भूख मिटाने के लिए कोई “रखैल ” या नौकरानी रखता है और इसके बदले उसकी आर्थिक कीमत चुकाता है, तो यह हमारी राय में विवाह की प्रकृति का कोई संबंध नहीं है। …और एक रात गुजारने या सप्ताहांत बिताने वाली महिलाओं को घरेलू हिंसा कानून, 2005 के तहत कोई भी सुरक्षा पाने का हक नहीं है। अगर वह इस कानून के तहत मिलने वाले ‘फायदे ‘ उठाना चाहती है तो उसे हमारे द्वारा उल्लेख किये गये शर्तों के हिसाब से सबूतों के साथ साबित करना होगा…”

-लिव-इन रिलेशनशिप के सवाल पर सुप्रीम कोर्ट में 21 अक्टूबर 2010 को मार्कंडेय काट्जू और टीएस ठाकुर की राय।

इस फैसले के एक दिन बाद उपमहाधिवक्ता इंदिरा जयसिंह किसी मामले की सुनवाई के दौरान जब अदालत में खड़ी हुईं तो न्यायाधीश मार्कंडेय काट्जू ने कहा – “कहिए, घरेलू हिंसा कानून की सर्जक, क्या कहना है…” यों, फैसले के बाद इंदिरा जयसिंह पर यह कटाक्ष ही यह बताने के लिए काफी है कि काट्जू ने मैदान मार लेने के बाद दंभ से झूमते किसी “विजेता” से अलग बर्ताव नहीं किया। लेकिन काट्जू शायद यह भूल गये थे कि जिस शख्स ने महिलाओं के खिलाफ घरेलू हिंसा कानून को जमीन पर उतारने में सबसे मुख्य भूमिका निभायी, वह उन्हें यों ही जाने देगी। उन्होंने न सिर्फ “रखैल” या “एक रात गुजारने” जैसे शब्दों का इस्तेमाल करने वाले दोनों जजों को आड़े हाथों लिया, बल्कि यह भी कह डाला कि (किसी भी मामले में) ऐसे जजों की बेंच के सामने कोई बात करने के बजाय मैं बाहर जाना पसंद करूंगी। यहां एक और अच्छी बात यह भी थी कि ऐसा कहते हुए दिखावे की शालीनता बरतने के बजाय उन्होंने अपने भीतर का गुस्सा छिपाना जरूरी नहीं समझा।

सलाम इंदिरा जयसिंह...

इस देश में अपने समाज के वंचित तबकों के लिए थोड़ी-सी भी संवेदना रखने वाले लोगों की ओर से इंदिरा जयसिंह को सलाम भेजा जाना चाहिए।

आगे बढ़ने से पहले सुविधा के लिए एक और प्रसंग ध्यान में रखने की जरूरत। अपने ताजा फैसले में ‘क्रांतिकारी’ प्रस्थापनाएं करने वाले ये वही न्यायाधीश मार्कंडेय काट्जू हैं, जिन्होंने अपने एक फैसले में यह कहा था कि ‘शैक्षिक संस्थाओं में दाढ़ी रखने की अनुमति देकर देश के ‘तालिबानीकरण’ की इजाजत नहीं दी जा सकती।’

धारणा यही बनायी जाती रही है कि इस देश की अदालतें “वीमेन फ्रेंडली” रही हैं। लेकिन यह दुनिया की महाशक्तियों में अपना नाम शुमार कराने की हसरत में जी रहे हमारे देश की इक्कीसवीं सदी का यथार्थ है, जिस देश की सर्वोच्च अदालत का फैसला एकबारगी किसी खाप पंचायत के फैसले से अलग नहीं लगता है। मद्रास हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए सुप्रीम कोर्ट ने जो ताजा प्रस्थापनाएं दी हैं, वह कितनी आधुनिक हैं और कितनी या किस तरह की संवेदनाएं साथ लिये हैं, इसका अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं कि उसने यह फैसला सुनाते हुए शब्द भी ठीक वही इस्तेमाल किये, जो इस व्यवस्था के रग-रग में घुले हुए हैं। अब जजों के इस दंभ में “समाज” को “बचाने” की ठेकेदारी लिये उन लोगों की खुशी को भी शामिल कर सकते हैं, जिनका कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले से घरेलू हिंसा कानून के दुरुपयोग पर लगाम लगेगा। क्या अब भी समाज को “बचाने” वाले इस महान फैसले के गुणसूत्रों की तलाश बाकी रह गयी है?

सदियों की “महान” परंपरा...

इंदिरा जयसिंह की आपत्ति के बाद मार्कंडेय काट्जू ने सफाई दी कि यह लफ्ज (रखैल) सदियों से प्रयोग किया जा रहा है और उन्होंने कोई नया काम नहीं किया है। इस राय के लिए काट्जू का शुक्रिया अदा किया जाना चाहिए कि इस तरह उन्होंने दरअसल न्यायिक व्यवस्था में फैले उन जड़ों की झलक भी स्वीकृति के रूप में पहली बार दिखाई है, जो “सदियों से चली आ रही (महान) व्यवस्था” को ही अपना आदर्श मानता है। इसी आदर्श की दुनिया के हिसाब से तो अयोध्या में रामलला को “बाबरी मस्जिद के बीच वाले गुंबद के ठीक नीचे पैदा हुए थे!”

अगर इस अदालत की मानें तो अव्वल तो यही कि “रखैल” या “नौकरानी” से अपनी यौन भूख मिटाइए, उसके बदले उसकी आर्थिक कीमत दीजिए और सारी जिम्मेदारियों से मुक्त। अब बताइए कि इस परिभाषा में “सामाजिक” और “पारिवारिक” जीवन गुजारने वाली कौन-सी महिला नहीं आएगी? इसके अलावा हरियाणा और पंजाब के इलाकों में भ्रूण हत्या और कई दूसरे कारणों के चलते घटती औरतों की तादाद के कारण झारखंड या उड़ीसा से खरीद कर लायी जाने वाली उन गरीब औरतों के बारे में सोचिए, जिन्हें सिर्फ सेक्स के लिए खरीद कर लाया जाता है और जिन्हें बदले में सिर्फ पेट भरने के लिए खाना दिया जाता है। उनकी पीड़ा का अंदाजा लगा सकें तो लगाइए कि वे कई-कई मर्दों की भूख मिटाती वे औरतें अपनी पीड़ा भी किसी से इसलिए बयान नहीं कर पातीं क्योंकि वे अपनी भाषा के अलावा कोई भाषा बोलना (और समझना भी) नहीं जानतीं।

माननीय न्यायाधीश मार्कंडेय काट्जू और टीएस ठाकुर, आपकी परिभाषा में ये औरतें कहां खड़ी हैं…?

रात गुजारने वाली औरत...!!!

बहरहाल, बहुत दिन नहीं बीते हैं, जब जगनणना संबंधी आंकड़े इकट्ठा करने के लिए प्रयोग में आने वाले फॉर्म में गैर-उत्पादक श्रेणी में घरेलू औरतों को वेश्याओं के समक्ष रखे जाने पर बवाल खड़ा हो गया था। तो आर्थिक भरण-पोषण के बदले घर में बैठी एक “गैर-उत्पादक” घरेलू औरत का क्या दर्जा होगा? और बराबर की “सेवा” करने वाली एक औरत क्या सिर्फ इसलिए सारे अधिकारों से वंचित रहेगी, क्योंकि उसके पास “सामाजिक विवाह प्रमाण पत्र” नहीं है?

सवाल है कि भारतीय समाज की महिलाओं का कितना हिस्सा पश्चिमी समाजों की महिलाओं की बराबरी करने को तैयार खड़ा है और कितने मर्द किसी महिला के साथ “रात गुजारने” को ही अपनी मर्दानगी की परीक्षा, प्रमाण-पत्र और तमगा नहीं मानते हैं? इस मर्द समाज में “रखैल” रखने वालों को समाज में कौन-सी जगह हासिल है और उसे किस नजरिये से देखा जाता है और कितनी महिलाओं को सिर्फ इस बात के लिए हत्या तक कर देने लायक समझा जाता है कि अपनी किसी जरूरत के लिए उन्होंने किसी मर्द से जरा-सी बात कर ली थी? इंदिरा जयसिंह के सवाल के साथ देखें तो अगर एक औरत कहे कि उसने किसी मर्द को “रखा हुआ है” तो यही समाज क्या उसे उसी नजरिये से देखेगा, जिसके साथ वह “रखैल” रखने वाले एक मर्द को देखता है? भारतीय समाज की यह “मर्दाना ताकत” अक्सर औरत को अपमानित करने के लिए “यार” रखने जैसे जुमले का इस्तेमाल करती है। जबकि एक मर्द के इसी बर्ताव को वह उसकी “उपलब्धि” और “सत्ता” मानता है।

यों, हमारा समाज भूलने के मामले में बहुत “उदार” है, लेकिन उम्मीद की जानी चाहिए कि लोग अभी भूले नहीं होंगे कि एक विश्वविद्यालय का नेतृत्व संभालता और पीढ़ियों का मनोविज्ञान तैयार करता हुआ एक पूर्व पुलिस अधिकारी उपकुलपति एक तरह से घर की दहलीज के बाहर अपने पांव पर चलती औरतों के बारे में राय जाहिर कर रहा था कि उनमें “छिनाल” बनने की होड़ लगी है। इसी आदमी को एक जगह स्त्री को कामोन्माद से छटपटाती हुई कुतिया कहने में जरा भी गुरेज नहीं हुआ।

यह छिनाल और निंफोमेनियाक...!!!

सवाल है कि स्त्री के लिए “छिनाल”, “निंफोमेनियाक कुतिया” या “रखैल” जैसे शब्द कहां से निकलते हैं? इस मानसिक ढांचे के साथ “सत्ताओं” की कुर्सी पर बैठे लोगों के किस तरह के न्याय की उम्मीद की जानी चाहिए? एक तरफ अपने दम पर अपनी अस्मिता अरजती औरत को कोई “छिनाल” कह देगा, तो दूसरी ओर किसी “सामाजिक प्रमाण-पत्र” की मेहरबानी का रास्ता चुनने के बजाय कोई स्त्री और पुरुष साथ रहते हैं, तो उनमें स्त्री की तुलना तो आप “रखैल” से कर देंगे, लेकिन मर्द आपकी नजर में पहले की तरह पवित्र, गौरवान्वित और साथ-साथ “पीड़ित” भी रहेगा! इसके बावजूद कि अपने पारंपरिक ढांचे में जीते किसी भी पुरुष के लिए स्त्री की हैसियत आज भी “ताड़न की अधिकारी” से ज्यादा की नहीं रही है और इसे वह अपनी “सामाजिक प्रमाण-पत्र” प्राप्त पत्नी पर लागू करता है, (अतिरिक्त) यौन भूख मिटाने के लिए रखी गयी “रखैल” या “नौकरानी” पर लागू करता है और लिव-इन रिलेशन में अपने साथ रहने वाली स्त्री को भी वह इससे अलग कोई स्त्री नहीं मानता है।

लिव-इन रिलेशन के रूप में जो संबंध पश्चिमी समाजों में द्विपक्षीय तौर पर एक ज्यादा सशक्तीकृत आकार ले चुका है, उसमें भी हमारे यहां स्त्री तो विद्रोह लेकर आती है, लेकिन मर्द पितृसत्ता और पुरुष मनोविज्ञान के तंतुओं के साथ जीना चाहता है। घर में एक पालक की मानसिकता में जीने वाला पुरुष इस संबंध को अपने “उन्मुक्त” संबंध निबाहने का भी अधिकार मानता है, मगर एक स्तर पर विद्रोह को जीती स्त्री को यहां किसी भी तरह के विरोध का हक नहीं होता। उसके “इलाज” के लिए वे सब तरीके अपनाये जाते हैं, जो “सामाजिक प्रमाण-पत्र” प्राप्त कोई भी पति अपनी पत्नी के मामले में अपनाता है। तो लिव-इन संबंध में जाने के बाद भी अगर एक औरत अघोषित रूप से पत्नी से ज्यादा का दर्जा हासिल नहीं कर पाती, तो उसे उसके स्वाभाविक अधिकारों से वंचित करने लायक कैसे मान लिया गया।

ये “PUNCH” परमेश्वर...

बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट के किन्हीं दूसरे जजों की बेंच में यह मामला जाता तो भी शायद फैसला “कानून के दायरे” में ही आता। हां, संभव है शब्दों का कुछ फेर-बदल होता। यानी अगर हम इस तरह के फैसलों पर खुद को सवाल करने के लायक संवेदनशील हो गया मानते हैं तो इसके लिए केवल परमआदरणीय जजों को ही कसूरवार नहीं ठहरा सकते। हमारे देश की पवित्र संसद में बैठ कर भारत को दुनिया का सिरमौर बनाने का सपना दिखाने वाले रहनुमाओं की नजर में अगर यह सब कुछ जायज है, तो इक्कसवीं सदी का सफर करते हुए भी हम तथ्यों-तर्कों और मानवीय अधिकारों की बात नहीं कर सकते।

कई बार हम भूल जाते हैं कि हमारे सामने पंच की कुर्सी पर जो बैठा है, वह प्रेमचंद का पंच-परमेश्वर नहीं है, वह दरअसल “PUNCH” परमेश्वर है, जिनके फैसलों से कई बार हमारा मुंह टूट जाता है।
(२८ अक्टूबर, २०१० को मोहल्लालाइव पर)

अर्चना वर्मा के अश्लीलता के तराजू पर मायावती और शीला दीक्षित!

कथादेश के इसी साल के अप्रैल अंक में शलाका सम्मान विवाद के संदर्भ में साहित्य की राजनीति पर प्रकाश डालते हुए अर्चना वर्मा ने इस मुद्दे पर बड़ी गंभीरता से प्रकाश डाला था कि श्लील और अश्लील क्या है – [ यह ख्याति कृष्ण बलदेव वैद के हिस्से में बदी थी ]। उनका कहना है कि रचना के संदर्भ में शील, श्लील और अश्लील का निर्णय करने का अधिकार किसके पास है।

इसके बाद रचना जगत में श्लील और अश्लील के पैमाने का विश्लेषण करते हुए इस बहस के दायरे को विस्तार देते हुए वे कहती हैं – “अश्लील को हमने मोटे तौर पर लिंग और लैंगिकता और देह और लालसा तक सीमित करके अपने नैसर्गिक अस्तित्व को स्वयं अपने लिए तो अवरुद्ध कर ही लिया है, अपने आसपास कोने-कोने में बिखरी अश्लीलता को देखने और उसके प्रति असहिष्णु होने की क्षमता खोकर उसे निर्बन्ध फलने-फूलने-फैलने की इजाजत भी दे दी है।”

इसके बाद वे उदाहरण सहित अश्लीलता के इस पहलू पर प्रकाश डालती हैं – “…वरना मार्च महीने की पंद्रह-सोलह तारीखों में हर न्यूज चैनल, हर समाचारपत्र के मुख पृष्ठ पर मायवती के मुस्कुराते मुखड़े को घेरे हजार-हजार के नोटों से गुंथी बारह-बाईस-इक्यावन करोड़ की विराटकाय माला से अधिक अश्लील क्या हो सकता है।”

(बारह-बाईस-इक्यावन…!!! बारह के बाद सीधे बाईस, यानी दस और उसके बाद मामला सीधे इक्यावन यानी एक कम उनतीस फर्लांग आगे जाकर गिरता है…। मेरा कमअक्ल दिमाग एक-डेढ़ करोड़ के जुमले पर भी पगलाने लगता है यह जान कर कि एक और डेढ़ करोड़ के बीच में पचास लाख का फासला है। बहरहाल…)

इसके बाद वे कहती हैं – “…इस सिलसिले में समरेश बसु का बांग्ला उपन्यास “बैरंग और लावारिस” भी याद आता है। अपने इस उपन्यास में उन्होंने खोखले वैभव के तथाकथित सभ्य सुसंस्कृत सर्वांग-सुंदर शिष्ट सलीके को सड़ांध और अश्लीलता की तरह देखा है।”

“लोलिटा” और मिरांडा हाउस की छात्रा

इस प्रसंग के पहले वे दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित की सांस्कृतिक सूझ-बूझ, सुरुचि, संस्कार को असंदिग्ध मानते हुए कवि-पत्रकार विमल कुमार की दी गयी सूचना की मार्फत बताती हैं कि माननीया मुख्यमंत्री उसी मिरांडा हाउस की छात्रा रही हैं, जिसकी छात्राओं को पंडित नेहरू से नोबोकोव की रचना ‘लोलिटा’ और जेम्स जॉयस की रचना ‘यूलिसिस’ पर से प्रतिबंध हटवाने का श्रेय जाता है।

देश की राजधानी में महिलाओं के बलात्कार या छेड़छाड़ को लेकर उठाये गये सवाल पर माननीया मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के ये खयाल शायद कुछ लोगों को याद हो, जिसमें उन्होंने कहा था कि लड़कियां अगर देर रात बाहर घूमेंगी, तो उन्हें खतरे का सामना तो करना ही पड़ेगा। अब माननीया मुख्यमंत्री के इस खयाल को उनके ‘लोलिटा’ और ‘यूलिसिस’ पर से प्रतिबंध हटवाने वाली छात्राओं की पुण्यस्थली मिरांडा हाउस की निवासी रह चुकी एक ‘बोल्ड’ महिला के खयाल के रूप में मत देखिएगा। वरना ‘लोलिटा’ से बिखरते बोल्डनेस का पर्दा उतर जाएगा।

अब शीला दीक्षित के “असंदिग्ध सांस्कृतिक सूझ-बूझ, सुरुचि और संस्कार” को अर्चना वर्मा के ही अश्लीलता के तराजू पर रखते हैं। हजार-हजार के नोटों से गुंथी “बारह-बाईस-इक्यावन” करोड़ की विराटकाय माला से घिरे मायावती के मुस्कुराते मुखड़े से अधिक अश्लील क्या हो सकता है।

हम अपनी ओर से मायावती के आंबेडकर पार्क आदि की योजना को भी उस ‘बारह-बाईस-इक्यावन’ करोड़ की विराटकाय माला के आसपास खड़ा कर देते हैं।

…लेकिन अब अर्चना वर्मा ही बताएंगी कि उनकी अश्लीलता के इसी तराजू पर असंदिग्ध सांस्कृतिक सूझ-बूझ, सुरुचि और संस्कारों से लैस दिल्ली की माननीया मुख्यमंत्री शीला दीक्षित का वजन कितना है।

सांस्कृतिक सूझ-बूझ, रुचि और संस्कार

पिछले महज दो सालों से जिन लोगों की निगाह दिल्ली और दिल्ली के बाजार पर होगी, वे जानते होंगे कि शीला दीक्षित की सांस्कृतिक सूझ-बूझ, सुरुचि और संस्कार किसको-किसको निगल कर किसको समृद्ध बना रहे हैं।

करीब साढ़े सात सौ करोड़ रुपये का वह धन राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारियों के मद में घुसा दिया गया जो दलितों के विकास के लिए था।

अर्चना वर्मा को यह अश्लील नहीं लगेगा, क्योंकि इसे अंजाम देने वाली शख्सियत की सांस्कृतिक सूझ-बूझ, सुरुचि और संस्कार असंदिग्ध मानी जाती है।

यमुना बन गयी टेम्स

अभी तो छिट-पुट रिपोर्टें आनी शुरू ही हुई थी कि यह राष्ट्रमंडल खेल किस तरह भ्रष्ट कारनामों की एक गंगा लेकर आयी है, जिसमें समूची शीला दीक्षित सरकार ऊब-डूब रही है, कि “मीडिया राहत कोष” की सरकारी घोषणा हो गयी और अचानक ही अखबारों और टीवी चैनलों को राष्ट्रमंडल खेलों के बहाने संवरती दिल्ली सुहाने लगी। अगर छिपाने लायक होता तो शायद ध्वस्त हो गया वह फ्लाईओवर भी छिपा लिया गया होता। आखिर लाखों झुग्गियों से दिल्ली को चुपचाप ‘मुक्ति’ दिला दी गयी न…!!!

यमुना किनारे बसी झुग्गियों से यमुना की आबोहवा बिगड़ रही थी, अब पर्यावरण नियमों के तमाम तकाजों को ताक पर रख कर कछार में बनायी गयीं करोड़ों-अरबों की अट्टालिकाएं और अक्षरधाम मंदिर यमुना को टेम्स बना रहे हैं! मेरा कमअक्ल दिमाग अभी तक तो पता नहीं लगा पाया है कि जब हरियाणा बाढ़ में डूब रहा था, तब हथिनीकुंड से दो लाख या छह लाख या सात लाख क्यूसेक पानी क्यों नहीं छोड़ा गया। और जब हरियाणा में पानी उतर गया तो पानी छोड़ने की जल्दी हो गयी। जल्दी-जल्दी कई बार छह-सात या आठ लाख क्यूसेक पानी छोड़े जाने से कोई बस्ती डूबे तो डूबे, (और बस्ती भी क्या कोई ग्रेटर कैलाश डूब रही थी कि नदी की धार मोड़ दी जाती…!)

दिल्ली की जो यमुना दशकों से महान कार्ययोजनाओं और हजारों करोड़ रुपये अपने साथ बहा ले जाने के बावजूद जहरीला नाला की नाला रही, वह इसी तीन बार पानी छोड़े जाने के बाद अब फिलहाल तो नदी की तरह दिखने ही लगी है। अभी खेलगांव के स्वर्ग में बनी अट्टालिकाओं से परदेसी मेहमान दिल्ली की इस टेम्स में आंखों से नहाएंगे, फिर इनके जाने के बाद हमारे देसी राजागण इस यमुना जी से अपने रक्त को शुद्ध करेंगे।

दस दिन की अय्याशी…

इस दस दिन की अय्याशी के लिए जिस तरह दिल्ली को लूटा गया है, दुनिया के इतिहास के इस सबसे बड़े घोटाले का सही ब्योरा तो शायद ही कभी आये। लेकिन सिर्फ लूट के मकसद से आयोजित इस खेल का खमियाजा जिस-जिस को उठाना पड़ रहा है, उसकी हूक भी शायद किसी को न सुनाई दे। मंदी से सारी दुनिया के तबाह होने की खबरें आ गयीं, लेकिन एक सांस्कृतिक सूझ-बूझ, सुरुचि और संस्कार वाली महिला के नेतृत्व में दिल्ली अनवरत दस दिन की अय्याशी के इंतजाम में लगी रही। मंदी की मार देखिए कितनी सुहानी होती है कि साढ़े चार सौ करोड़ की शुरुआती लागत अब एक लाख करोड़ के आंकड़े को भी पार कर रही है और अंदाजा लगाया जा रहा है कि आखिर तक यह ढाई लाख करोड़ तक जाएगी। यह रकम कुलांचे भरती हुई आगे, और आगे जा रही है तो क्यों जा रही है और इसमें कितना किधर जा रही है, यह बात पता नहीं कभी सामने आ भी पाएगी या नहीं।

यह असंदिग्ध सांस्कृतिक सूझ-बूझ, सुरुचि और संस्कारों का नतीजा है!

रहना है तो रहो, नहीं तो भागो…

अर्चना वर्मा को इससे क्या फर्क पड़ता है कि बिहारीलाल जितनी दूरी दस रुपये में तय करता था, उसके लिए अब उसे अट्ठाइस रुपये चुकाने पड़ते हैं। मुंगेरी लाल अब अपने घर और फैक्ट्री के बीच की दूरी में से छह किलोमीटर की दूरी पैदल तय कर लेता है और इससे उसे हर रोज चौदह-पंद्रह रुपये की बचत होती है, यानी लगभग साढ़े चार सौ रुपये। बिहारी लाल और मुंगेरीलाल पिछले तीन साल से तीन हजार रुपये महीने की तनख्वाह पर अटके हुए हैं।

मकानमालिक ने साल भर के भीतर दूसरी बार किराया बढ़ा दिया कि भइया अब तो मेट्रो यहां से शुरू हो गयी। दो सौ रुपये बढ़ाओ और इतने में रहना है तो रहो, नहीं तो जाओ…।

राशन की दुकान वाला कहता है कि फलां चीज का दाम इतना हो गया है, लेना है तो लो, नहीं तो जाओ…।

दस की जगह अब बस का कंडक्टर अट्ठाइस रुपये कॉलर पकड़ के वसूलता है और गाली देके कहता है कि इतने पैसे लगेंगे… देना हो दो, नहीं तो उतर जाओ।

और… दो लाख रुपये महीना पाने वाला इनका बॉस अब कहता है कि इतने पैसे में काम करना है तो करो, नहीं तो जाओ…।

इन रोज-रोज की जलालतों को झेलने वाले मुंगरीलाल और बिहारीलाल अब हार रहे हैं अर्चना जी। चूंकि तमाम झुग्गी-झोपड़ियां उजाड़ दी गयी हैं, इसलिए जैतपुर गड्ढा कॉलोनी जैसे मोहल्ले को छोड़ कर वे किसी गंदे नाले के किनारे बसी झुग्गी बस्ती में किराये का मकान ढूंढ़ने नहीं जा सकते। जो किसी तरह (सरकार की दया नहीं, उसके पास समय की कमी के कारण) कहीं बच गयी थीं, उन्हें छिपाने के लिए घने बांस लगाये गये और अब बड़े-बड़े होर्डिंग उनके चेहरे को विदेशी मेहमानों की निगाह से बचाये रखेंगे। शायद इसलिए कि वे यह देखने से बच सकें कि गुलामी के लंबे दौर से आजादी हासिल करने वाले इस देश में आज भी गुलामी के दौर की सबसे बदतरीन तस्वीर जिंदा मौजूद है।

दस-बारह दिन की अय्याशी के लिए किये गये इंतजामों का असर सड़कों पर सबसे बदतरीन हालात के साथ मौजूद हैं। खास सड़कें, खास गाड़ियां, खास लोग… सड़कों पर ऐसा आतंक रच दिया गया है कि जिनके पास अपनी कार है, वे भी डरते-डरते निकल रहे हैं। बड़े पैमाने पर ब्लूलाइन बसों को सड़कों से हटा लिया गया है। एकाध डीटीसी बस अगर दिखाई भी पड़ती है तो रूई की तरह लोगों से ऐसी ठुंसी होती है कि सड़क पर मूक खड़े उसे देखने के सिवा कोई चारा नहीं। (जरा बस में सफर करने वाली कामकाजी स्त्रियों के बारे सोचिएगा कभी) हां, सभी डिपो में चमकती देश की नाक बनी हुई लाल-हरी शान बसें खड़ी हैं या फिर परदेसी मेहमानों के आगे-पीछे चक्कर लगा रही हैं, ताकि मेहमान खुश होकर जाएं।

भुखमरो… वापस जाओ…

सड़कों पर घर से दफ्तर या फैक्ट्री या दुकान की नौकरी पर जाने के लिए छटपटाते-रिरियाते, रोते-कलपते, सिर धुनते लोगों की क्या औकात…! ज्यादा से ज्यादा नौकरी से ही मालिक निकालेगा न…! ज्यादा से ज्यादा भूख का ही सामना करना पड़ेगा न…! दिल्ली सरकार अपनी कवायद से गांव वापस जाने के लिए ट्रेनों की कमी नहीं पड़ने देगी। दिल्ली का आंकड़ा आएगा कभी, गुड़गांव से बीस फीसद कामगार पिछले हफ्ते भर में गायब हो गये। क्यों…? कितने लोग चले गये… कितने लोगों के लिए यह “दिल्ली ये… मेरी जान… ” अब फिर कितनी दूर हो गयी… कौन जानता है…!!!

एक असंदिग्ध सांस्कृतिक सूझ-बूझ, रुचियों और संस्कार वाली माननीया मुख्यमंत्री ने यह मान लिया है कि दिल्ली में लोग बस में शौक से चढ़ते हैं, इसलिए साठ या सत्तर लाख खर्च कर चमकदार शाही हरियाली बसें और इससे ज्यादा सुख देने वाली एयरकंडीशंड लाल बसों का इंतजाम किया गया है। और अगर कभी बसों की तकलीफ होगी तो कुछ दिन अपनी कार से जाएंगे। (दिल्ली उनकी है, जिनके पास कार है) अपने दिल से जानिए, पराये दिल का हाल…। दिल्ली की अय्याशी का इंतजाम हो चुका है, तो बाकी सबको भी इसमें झूमना ही पड़ेगा। ठीक उसी तरह, जिस तरह हाल ही में एक दोपहर दिल्ली की बाढ़ में डूबते एक इलाके का दौरा करके लौटी असंदिग्ध सांस्कृतिक सूझ-बूझ, रुचियों और संस्कार वाली यह माननीया मुख्यमंत्री शाम को पलाश सेन के साथ एक गीत “दिल्ली मेरी जान…” के धुन पर ठुमक रही थीं और गुनगुना रही थीं। और ओलंपिक के लिए तैयार मंडली के साथ खड़ी मुंह में उंगली लगा कर सीटी बजा रही थी।

अश्लीलता का पैमाना लेकर मायावती जैसों की माप बताने निकली अर्चना जी जैसों को बताना चाहिए कि उसी पैमाने से दिल्ली की इस असंदिग्ध सांस्कृतिक सूझ-बूझ, रुचियों और संस्कारों वाली माननीया मुख्यमंत्री शीला दीक्षित, और इसके बाद भारत की सरकार का चेहरा कैसा दिखता है…!
(१३ अक्टूबर, २०१० को मोहल्लालाइव पर)

गोया तालिबानी होना कोई आलू का अचार होना है…

क्या स्त्री या दलित अस्मिता को ख़ारिज करने या अपमानित करने को मुहम्मद पैगंबर या कुरान के खिलाफ कही गयी किसी बात के आईने में देखा जाना चाहिए? क्या इस अपमान पर दुख या विरोध जताना शुद्ध तालिबानी मानसिकता है और बौद्धिक लोकतंत्र के बरक्स धार्मिक फासीवाद है? जनचेतना का प्रगतिशील कथा मासिक ‘हंस’ के संपादक का मानना है कि महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के कुलपति विभूति नारायण राय ने ऐसा कुछ भी नहीं किया है कि उन्हें कुलपति पद से हटाने की मांग की जाए और विभूति राय को पद से हटाने या घर से निकलवाने या ‘मौत की सजा’ सुना देने वालों का समूह दरअसल क्षुब्ध मानसिकता से पीड़ित लोगों की भीड़ है। वे मानते हैं कि ‘इस भीड़ के बरक्स यह साहित्य और विचारों की दुनिया है, हड़ताली मजदूरों की गेट-मीटिंग नहीं, जहां सिर्फ ‘हाय-हाय’ ही मची हो।’

इसी सुर में आगे बढ़ते हुए वे याद दिलाते हैं कि ‘जब धर्मवीर द्वारा महिलाओं के लिए अपशब्द लिखे गये तो एक गोष्ठी में दलित लेखिकाओं ने उन पर चप्पलें फेंकीं, मैं तब भी इसका विरोधी था।’ राजेंद्र जी स्त्रियों के बारे में आपत्तिजनक विचार जाहिर करने वालों को ‘बख्शना नहीं चाहते।’ लेकिन इस संबंध में विचार करते हुए वे नहीं बता पाते कि इनके विरोध का तरीका क्या हो या सदियों से दमन-शोषण की संस्कृति में निर्मित व्यक्ति जब अपनी अस्मिता और व्यवस्था की साजिशों की पहचान की ओर बढ़ने लगता है, तो उसके भीतर व्यवस्था के खिलाफ पैदा हुआ गुस्सा अचानक लोकतंत्र के वाहक के रूप में कैसे पैदा हो।

हम जिस सामाजिक व्यवस्था में जी-मर रहे हैं, उसमें लोकतंत्र की कौन-सी संस्कृति रही है; लोकतंत्र अस्मिता की पहचान, समानता की मांग या लड़ाई और उसकी स्थापना की एक प्रक्रिया से निकल कर आएगा; या फिर हम इस वहम में जी रहे हैं कि एक सामंती संस्कृति के गर्भ से लोकतंत्र अचानक पैदा हो जाएगा!

बहरहाल, ‘लोकतंत्र’ की छौंक से लबरेज ये विचार राजेंद्र यादव ने ‘हंस’ के सितंबर अंक के संपादकीय में जाहिर किये हैं। इसे पढ़ने के बाद अव्वल तो किसी को पहला सवाल यही उठाना चाहिए कि राजेंद्र यादव के ‘बौद्धिक लोकतंत्र’ में वे कौन-से मंत्र घुस गये हैं, जिसने लोक का लोप कर दिया है और बुद्धि को इतना भ्रष्ट कि किसी अस्मिता के अपमान का विरोध करने वालों को वे तालिबानी घोषित कर रहे हैं। क्या ये वही राजेंद्र यादव हैं, जो अब भी अक्सर दावा करते फिरते हैं कि उन्होंने ‘हंस’ की मार्फत दलित और स्त्री अस्मिता के सवालों को ‘मुख्यधारा’ के साहित्य के बरक्स खड़ा किया?

अगर राजेंद्र यादव मानते हैं कि स्त्री और दलित इस समाज के वंचित और शोषित तबके रहे हैं तो शोषण के वे सूत्र क्या रहे हैं और विचार से लेकर भाषा और व्यवहार तक में शोषण और वंचना का यह सामाजिक मनोविज्ञान किस-किस भेस में छिपा अपना काम करता रहता है? क्या महिलाओं का मामला सचमुच उतना ‘सैक्रोसेंट’ (परम पावन) नहीं है कि कोई जब चाहे उनके ‘सम्मान’ में उन्हें ‘निंफोमेनियाक कुतिया’ या ‘छिनाल’ कह दे? (राजेंद्र यादव ने किस हैसियत से और किन उदाहरणों, अनुभवों और आधारों पर यह घोषित किया कि महिलाओं का मामला इतना सैक्रोसेंट (परम पावन) नहीं है कि उनके सम्मान में कुछ भी बोलने की सजा दोषी का सिर उतारना हो?) क्या इसके बाद अब वे यह कहना चाहेंगे कि अगर कोई ‘चोर-चमार’ या ‘भंगी कहीं के’ जैसा (आपराधिक) जुमला उछालता है तो इसके बदले उसकी आरती उतारी जानी चाहिए और इसके लिए कोई हाय-तौबा मचाने की जरूरत नहीं? इसका विरोध करना तालिबानी होना है। गोया तालिबानी होना कोई आलू का अचार होना है, जिसे किसी भी मौसम के भोज के लिए तत्काल तैयार कर लिया जाए!

आगे बढ़ने से पहले दो उदाहरणों का एक क्षेपक :

कथादेश के अप्रैल 2003 के अंक में ‘गैर-दलित की अस्मिता क्या है’ शीर्षक से छपे अपने लेख में चंद्रभान प्रसाद ने एक घटना का जिक्र इस प्रकार किया था -

(1) “श्री राजेंद्र यादव जी ने मेरे निवास पर आयोजित एक पार्टी में शरीक होने में अपनी असमर्थता प्रकट की। अवसर था अंग्रेजी दैनिक ‘द पायनियर’ में मेरे पहले साप्ताहिक स्तंभ ‘दलित डायरी’ की प्रथम वर्षगांठ का। … ‘पायनियर’ अखबार के संपादक चंदन मित्रा हैं जिन्होंने भारत में पहली बार किसी दलित को साप्ताहिक स्तंभ दिया। मेरे लिए यह स्वाभाविक ही था कि मैं अतिथि सूची में चंदन मित्रा का नाम सबसे ऊपर रखता। पर श्री राजेंद्र यादव जी को चंदन मित्रा की उपस्थिति से ऐतराज था, क्योंकि उनका चंदन से वैचारिक विरोध है। उक्त पार्टी में मैंने विविध वैचारिक प्रतिबद्धता वाले मित्रों एवं शुभचिंतकों को आंमत्रित किया था, पर किसी अन्य ने चंदन मित्रा के नाम पर कोई आपत्ति नहीं की।’

(2) राजकमल प्रकाशन की ओर से आयोजित एक कार्यक्रम ‘लेखक से मिलिए’ में जब एक बार निर्मल वर्मा बुलाये गये तो राजेंद्र यादव ने अपने दायरे में आने वाले लगभग सभी लोगों से गुहार लगायी थी कि वे वहां न जाएं।

और यही राजेंद्र यादव बौद्धिक लोकतंत्र की दुहाई देंगे कि विश्वरंजन के साथ मंच शेयर करने में क्या हर्ज है और विभूति राय को हटाने की मांग करने वालों को क्षुब्ध मानसिकता से लैस भीड़ कहते हुए उन्माद में यहां तक कह जाएंगे कि यह साहित्य और विचारों की दुनिया है, हड़ताली मजदूरों की गेट-मीटिंग नहीं, जहां सिर्फ ‘हाय-हाय’ मची हो। जरा टोह लेना हो तो लीजिए कि स्त्रियों और दलितों को अपमानित करने वाले विभूति राय के रंग में रंगे हड़ताली मजदूरों के आंदोलन को सिर्फ ‘हाय-हाय’ घोषित करने वाले राजेंद्र यादव के भीतर मजदूरों के आंदोलन को लेकर किस तरह के विचार हैं और ये वास्तव में लोकतंत्र से कितना प्रेम करते हैं।

इसके पहले दिल्ली में विभूति-कालिया के विरोध में आयोजित एक सभा में विभूति राय को उनके पद से हटाने की मांग का विरोध वे यह कहते हुए कर चुके हैं कि मैं किसी के ‘पेट पर लात मारने’ का विरोध करता हूं। ‘पेट पर लात मारने’ जैसे मुहावरे का नया अर्थ शायद लाखों की कमाई करने वाले सामाजिक-आर्थिक रूप से बेईमान और भ्रष्ट लोगों को उनके पदों से हटाना होता है। इस देश के उन तीन-चौथाई लोगों को रोजी-रोटी के अवसरों से वंचित किये जाने से इस मुहावरे को मत जोड़िए।

‘हंस’ के सालाना जलसे में अरुंधति राय के साथ विश्वरंजन को भी बुलाने के सवाल से उपजे विवाद के संदर्भ में जब युवाओं का एक समूह राजेंद्र यादव से मिला था, तो उन्होंने कहा था कि विश्वरंजन को बुलाने की बात तय नहीं हुई थी, लेकिन एक लोकतांत्रिक तकाजे के रूप में उनके नाम पर विचार जरूर हुआ था। फिर, राजेंद्र यादव के मुताबिक, ‘ब्लॉगों पर मचे वितंडे’ के बाद अरुंधति ने आने से मना किया और उसके बाद विश्वरंजन का नाम भी ‘वैदिकी हिंसा, हिंसा न भवति’ के ‘विचारकों’ की सूची में आने से पहले ही गुम हो गया।

बहरहाल, राजेंद्र यादव कोई मामूली कलाकार नहीं हैं। किसी को पता भी नहीं चला और मंच पर विश्वरंजन के ‘स्टेपनी’ के तौर पर उनके अक्स विभूति राय प्रकट हुए। उन्होंने वह सब कुछ कहा, जो विश्वरंजन का ‘इलाका’ था। यानी सलवा जुडूम का इलाका। विभूति राय इससे भी आगे गये और कहा कि माओवादी हिंसा के अलावा कश्मीर में ‘इस्लामी’ आतंकवाद और भारतीय राज्य के बीच मुकाबला है, उसके बरक्स मैं हमेशा राज्य की हिंसा का समर्थन करूंगा। और कि राज्य की हिंसा से हम मुक्त हो सकते हैं, लेकिन इस्लामी आतंकवाद से नहीं।

क्षेपक : चंदन मित्रा से वैचारिक विरोध की वजह से चंद्रभान प्रसाद की निजी पार्टी में शामिल होने से इनकार करने और ‘लेखक से मिलिए’ में निर्मल वर्मा से मिलने जाने के लिए लोगों को मना करने वाले राजेंद्र यादव क्या विश्वरंजन या विभूति नारायण राय से वैचारिक सहमति रखते हैं? और अभी हाल में अपने जन्मदिन के उपलक्ष्य में आयोजित पार्टी में आमंत्रित या आये सभी अतिथियों के साथ उनकी पक्की ‘वैचारिक’ सहमति बनी हुई है? जितने मंचों पर वे जाते हैं, क्या वहां मौजूद सभी लोगों से उनके ‘वैचारिक’ गठबंधन हैं?

राजेंद्र यादव जैसे कई ‘साहित्य प्रेमी’ कहते हैं कि चूंकि विभूति राय ने ‘शहर में कर्फ्यू’ जैसा ‘सांप्रदायिकता विरोधी’ उपन्यास लिखने के अलावा बारह साल ‘वर्तमान साहित्य’ पत्रिका का संपादन किया है इसलिए उन्हें महिला लेखिकाओं (पता नहीं, पुरुष लेखिका कैसे होते हैं) के लिए आपत्तिजनक शब्द का प्रयोग नहीं करना ‘चाहिए था।’ (और अगर कर ही दिया तो कौन-सी आफत आ गयी, महिलाओं का मामला उतना ‘सैक्रोसेंट’ यानी परम पावन नहीं है…)

साहित्य की उस त्रासदी का अंदाजा लगाइए कि महज एकाध किताब के लेखक के रूप में अपना नाम छपवा लेने भर के बाद किसी व्यक्ति के तमाम धतकर्मों को नजरअंदाज किये जाने लायक मान लिया जाता है। हिंदी के विकास-प्रचार-प्रसार के मकसद से महात्मा गांधी के नाम पर बनाये गये विश्वविद्यालय के कुलपति के रूप में पिछले एक-दो सालों में विभूति राय के जिन कारनामों की खबरें आयी हैं, उसके बाद व्यक्ति किस मुंह से उन्हें कुलपति बनाये रखने की वकालत करता है या किन नैतिक मानदंडों के तहत विभूति नारायण की फेंकी रोटी पर झपट कर टूट पड़ता है?

‘नया ज्ञानोदय’ में छपे साक्षात्कार में विभूति राय ने जो कहा और रवींद्र कालिया ने जिसे बेबाक कहा, उसके बाद अगर लोग उसका विरोध कर रहे हैं और इन दोनों की बर्खास्तगी की मांग कर रहे हैं, तो इसमें राजेंद्र यादव जैसे लोगों को क्या आपत्तिजनक लग रहा है? क्या यह खुश होने या संतोष करने की बात नहीं है कि जिन शब्दों को हमारे समाज में ‘आम चलन’ बताया जा रहा है, उनके प्रयोग पर एक बड़े वर्ग में बेहद गुस्सा पैदा हुआ? क्या इसे अपने नागरिक समाज में प्रयोग होने वाले उन ‘आम’ शब्दों के प्रति लोगों के सचेत होने के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, जो दलितों-वंचितों या स्त्रियों को अपमानित करने के लिए एक हथियार के तौर पर इस्तेमाल किये जाते रहे हैं? क्या बहुत सारे लोग आज भी इन शब्दों को ‘आम चलन’ वाला बता कर इन्हें नजरअंदाज करने और इस तरह सामाजिक यथास्थितिवाद की वकालत नहीं कर रहे हैं?

विभूति राय या रवींद्र कालिया को हटाने की मांग इसलिए जायज है और जरूरी है क्योंकि ये दोनों किसी न किसी रूप में एक संस्था का नेतृत्व करते हैं। दोनों ही अपने-अपने दायरे में एक संस्कृति निर्माण या सांस्कृतिक विकास को अपने चाल-चलन से प्रभावित कर सकने में सक्षम हैं। जब से विभूति राय वर्धा विश्वविद्यालय के कुलपति बने हैं, तभी से परिसर और परिसर के बाहर उनके चाल-चलन को देखा जा सकता है। इसी तरह जब से रवींद्र कालिया ज्ञानपीठ के अघोषित कर्ता-धर्ता बने हैं, नया ज्ञानोदय से लेकर उसके प्रकाशन की स्थिति देखी जा सकती है।

एक ऐसे व्यक्ति को धर्मनिरपेक्ष या प्रगतिशील का दर्जा कैसे दिया जा सकता है जो महज इस बात के लिए एक प्रोफेसर के खिलाफ नोटिस भेज देता है क्योंकि उसने आंबेडकर दिवस की रैली में हिस्सा लिया। क्या इस देश में कभी गांधी, नेहरु या तमाम दूसरे नेताओं के मृत्यु या जन्म दिवसों के मौके पर आयोजित सम्मान-समारोहों में भाग लेने के लिए किसी को भी नोटिस जारी किया गया है। इसी तरह, परिसर में दलित छात्रों के साथ नामांकन से लेकर पढ़ाई या छात्रावास तक में भीषण भेदभाव करने वाला यह व्यक्ति ‘नया ज्ञानोदय’ में लड़कियों को लड़कों के लिए एक ट्रॉफी बताता है, और स्त्री सशक्तीकरण पर बात करते-करते तमाम महिला लेखकों को ‘निंफोमेनियाक कुतिया’ और ‘छिनाल’ कह देता है। क्या यह अपनी कथित उपलब्धियों से पैदा हुई प्रसिद्धि की भूख से मरते आदमी की हताशा या छटपटाहट है?

स्त्रियों को जिन विशेषणों के साथ विभूति नारायण राय ने याद किया, क्या किसी को लगता है कि ऐसा बोलने वाला आदमी कहीं से इस लायक है कि उसे बहुत सारे बच्चों का नेतृत्व करने के लिए छोड़ दिया जाए? टीवी पर बैठ कर राय ‘छिनाल’ शब्द के मूल और अर्थ की व्याख्या कर रहे थे। पूछने वाले ने उनसे यह नहीं पूछा कि वे जो भी अर्थ बता रहे थे, क्या वे मानते हैं कि लेखिकाएं सचमुच खुद को वही साबित करने की होड़ में लगी हैं? इसके अलावा जब से विवाद शुरू हुआ है, ‘छिनाल’ शब्द के हल्ले में लोग यह भूल गये कि इस व्यक्ति ने स्त्रियों की तुलना ‘निंफोमेनियाक कुतिया’ से करके क्या-क्या बताने की कोशिश की है। इस शब्द का हिंदी रूपांतरण है कामोन्माद से छटपटाती हुई कुतिया। गांवों-मुहल्लों में ‘निंफोमेनियाक कुतिया’ शब्द का जो रूपांतरण होगा, वह आप न लिख सकते हैं, न बोल सकते हैं, अगर आदमी के रूप में थोड़ा भी विकास हो गया हो तो।

लेकिन जो व्यक्ति अपने मानसिक-वैचारिक ढांचे में मूल रूप से सामंती, जातिवादी और स्त्री विरोधी है, उससे आप उम्मीद भी क्या करेंगे! उत्तर-पूर्व की समस्या के संदर्भ में इस व्यक्ति ने एक जगह इस बात का ब्योरा देते हुए कहा था कि आपातकाल के दौरान उनके एक मित्र ने बाकायदा यह सलाह दी कि पंजाब के सरदारों को उत्तर-पूर्व में ले जाकर बसा देना चाहिए। वे इतने ‘बास्टर्ड’ पैदा करेंगे कि समस्या अपने-आप खत्म हो जाएगी। विभूति राय के मुताबिक ‘यह एक बहुत अच्छा उपाय’ था। तो आज जो लोग कुछ स्त्रियों या एक आम स्त्री को ‘निंफोमेनियाक कुतिया’ या ‘छिनाल’ के रूप में देखे जाने को विभूति राय की कोई पहली ‘गलती’ मान रहे होंगे, उनके लिए यह शायद सूचना होगी या वे जान-बूझ कर इसे भी नजरअंदाज कर रहे होंगे कि उत्तर-पूर्व की समस्या के बारे में व्यक्त ये महान विभूति-विचार करीब साढ़े तीन दशक पहले के हैं।

इससे आगे बढ़ते हैं और उनकी दूसरी ‘खासियतों’ की भी थोड़ी चर्चा करते हैं। पिछले डेढ़-दो सालों में विभूति राय ने विश्वविद्यालय में अपने नाम इतनी ‘उपलब्धियां’ लिखवा ली हैं कि एक बार को संदेह हो जाता है कि ‘शहर में कर्फ्यू’ से एक ‘धर्मनिरपेक्ष’ और ‘ईमानदार’ के रूप में प्रचारित यह शख्सियत अपने मूल रूप में क्या है। ‘शहर में कर्फ्यू’ से शुरू वह सफर किन रास्तों से होकर यहां तक पहुंचा है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रचारित आतंकवाद की अमेरिकी परिभाषा उसके लिए भी अनुकूल है और वह आतंकवाद का जिक्र करते समय ‘इस्लामी आतंकवाद’ जैसे शब्दों का प्रयोग जोर देकर करता है? ‘इस्लामी आतंकवाद’ या माओवाद से उसके सरोकार किस रूप में जुड़े हैं कि इनके बरक्स वह राज्य की हिंसा को जायज ठहराता है? महात्मा गांधी के नाम पर स्थापित विश्वविद्यालय के रूप में क्या इस व्यक्ति को इस बात का भी ठेका दिया गया है कि इस विश्वविद्यालय के विद्यार्थी या कोई शिक्षक किसी दूसरे नेता, खासकर आंबेडकर की पुण्यतिथि पर निकलने वाली रैली में हिस्सा न लें। और लेगा तो उसके खिलाफ कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया जाएगा?

आंबेडकर की पुण्यतिथि पर निकली रैली में शामिल होने के एवज में प्रोफेसर कारुण्यकारा को कारण बताओ नोटिस [नोटिस के एवज में कारुण्‍यकारा का जवाब] जारी किया गया, दाखिले के वक्त दलित समुदाय से जुड़े छात्रों के साथ भयानक भेदभाव किया गया और विरोध प्रदर्शनों की लगभग खिल्ली उड़ायी गयी, नियुक्तियों में भयानक जातिवाद और भ्रष्टाचार के आरोप हैं और हाल ही में परिसर में बनाये गये छात्रावास में जब बिजली-पानी की दिक्कत को लेकर विद्यार्थियों ने अपनी कुछ मांगों के साथ हल्का प्रदर्शन किया तो इस ‘प्रगतिशील’ और ‘साहित्यकार’ कुलपति ने अपने मूल रूप में लौटते हुए विद्यार्थियों को न केवल मां-बहन की गालियां दीं, बल्कि लाठी चार्ज भी करवा दिया। और अपने इसी वैचारिक-सांस्कारिक बनावट से उपजे व्यवहारों के चलते सवाल उठने और इससे उपजे छवि के संकट से बचने की जद्दोजहद में हिंदी के कुछ जाने-माने बुद्धिजीवियों को जगह देकर उपकृत किया।

सवाल है कि एक समूची सामंती मानसिकता और व्यवहार से लैस व्यक्ति को किसी विश्वविद्यालय का नेतृत्व संभालने लायक क्यों समझा जाना चाहिए? अगर कुछ लोग केवल साहित्य की दुनिया में घुसपैठ होने के कारण विभूति राय की बातों को नजरअंदाज करने या बख्श देने के लिए कह रहे हैं तो इंतजार कीजिए कि निठारी का ‘हीरो’ मोहिंदर सिंह पंधेर या मिर्चपुर में बाल्मीकियों की बस्ती में आग लगाने और बारहवीं में पढ़ने वाली सुमन को जिंदा जला देने वाले अपने अनुभवों पर आधारित कोई उपन्यास अपने नाम से लेकर साहित्य समाज से उसे स्वीकार करने की मांग करे। नरेंद्र मोदी के संरक्षक अटल बिहारी वाजपेयी एक कवि के रूप में माला पहनाने के लिए तो इस साहित्य-समाज के सामने खड़े हैं ही। बेफिक्र रहिए, राजेंद्र यादव के लोकतंत्र में इन सबका भी स्वागत है।

अगर विभूति नारायण राय या रवींद्र कालिया जैसे लोगों को उनके दायित्वों से मुक्त करने की मांग करना राजेंद्र जी हिसाब से ‘बौद्धिक लोकतंत्र’ के बरक्स ‘धार्मिक फासिज्म’ है और तालिबानी होना है तो राजेंद्र जी ही बताएं कि इस तरह की मांगों के समर्थन में खड़े होने वालों के सीधे तालिबानी होने का फतवा जारी करना क्या है?

दूसरों को तालिबान-तालिबान घोषित करते हुए कब कोई किसी तालिबानी कबीले का फतवा जारी करने वाला महंथ बन जाता है, यह शायद उसे भी पता नहीं चलता। साहित्य और बौद्धिकों की दुनिया ने राजेंद्र जी को एक तरह की सत्ता सौंपी है, या वे कह सकते हैं कि उन्होंने अपनी काबिलियत से उस पर कब्जा किया है। लेकिन क्या यह अंतिम हकीकत है कि सत्ता सबको भ्रष्ट बनाती है? दरअसल, जिन लोगों ने ‘लोकतंत्र के तकाजे’ के नाम पर हर तरह की तानाशाही का बचाव और किसी भी विरोध को ‘तालिबानी’ कहने को अपनी जुबान की शोभा बना ली है, वे या तो इन शब्दों को लेकर एक मायाजाल रच रहे हैं, या फिर इनके सामान्य अर्थ तक भी उनका पहुंचना अभी बाकी है।
(६ अक्टूबर, २०१० को मोहल्लालाइव पर)

शांति अपील करने से नहीं आती, न्याय करने से आती है......।

मुसलमानों में थोड़ी नाराजगी

दिल्ली के जामा मस्जिद इलाके में मुसलमानों ने बाबरी मस्जिद-रामजन्मभूमि विवाद पर इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को नाराजगी के साथ स्वीकार किया है। चप्पे-चप्पे पर अर्धसैनिक बलों के मौजूदगी के बीच लोगों ने हाईकोर्ट के फैसले को टेलीविजन पर देखा। पूरे इलाके में आम दिनों की तुलना में आमदोरफ्त बहुत कम है।

जामा मस्जिद के पास मटिया महल की गली में एक दुकान में टेलीविजन पर यह फैसला देख रहे नवेद ने कहा, “कोर्ट का फैसला वैसा ही आया है जैसी कि उम्मीद थी और सबको मालूम था कि ऐसा फैसला आएगा।” उनका कहना था कि वे इस फैसले को मंजूर करते हैं।

जबकि एक अन्य युवक फखरुद्दीन का कहना था, “ये फैसला गलत है, क्योंकि जिस स्थान पर मुसलमानों का कब्जा था वह किसी और को किस तरह से दिया जा सकता है। इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाना चाहिए।”

वहीं पास से गुजर रहे एक व्यक्ति ने गुस्से के साथ कहा, “अदालत उनकी, पार्लियामेंट उनकी, फौज उनकी, तो जाहिर है कि फैसला उनके पक्ष में ही आना था।” उनका कहना था कि किसी भी ऊंची अदालत में जाने का कोई अर्थ नहीं रहता क्योंकि मुसलमानों को वहां भी न्याय नहीं मिलेगा।

जबकि एक अन्य व्यक्ति इमरान का कहना था, “फैसला चाहे किसी के हक में आया हो, हम चाहते हैं कि हर ओर शांति बनी रहे और किसी तरह का कोई हंगामा न बरपा हो।”

इसी बीच वहां बहस चल पड़ी कि वहां तो बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद से ही मूर्ति रख दी गयी थी और उसे मंदिर बना दिया गया था। इस पर कुछ लोगों का कहना था कि क्या हमारे घर में कल कोई मूर्ति रख दी जाए तो उसे मंदिर मान लिया जाना चाहिए?

अदालत ने मामले की तह में जाने के लिए पहली बार पुरातत्व सर्वेक्षण से खुदाई करवाकर एक विशेषज्ञ रिपोर्ट भी प्राप्त कर ली, जिसमें कहा गया है कि जमीन के अंदर 11 वीं शताब्दी में उत्तर भारत में पाये जाने वाले मंदिरों जैसे विशिष्ट अवशेष मिले हैं।

♦ बाल ठाकरे : उम्मीद है कि इस फैसले के बाद दशकों पुराने विवाद का अंत होगा।
♦ आडवाणी : आज के निर्णय से राष्ट्रीय एकता का नया अध्याय शुरू होगा।
♦ आडवाणी : यह राम जन्मभूमि के निर्माण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
♦ आडवाणी : कोर कमिटी की बैठक में अयोध्या फैसले पर चर्चा हुई।

♦ प्रशांत भूषण : सुप्रीम कोर्ट में ये फैसला शायद ही ठहर पाएगा।
♦ प्रशांत भूषण : ये अदालती फैसला नहीं है राजनीतिक फैसला है।
♦ माकपा : इस मसले को सुलझाने के लिए लोकतंत्र में सुप्रीम कोर्ट का प्रावधान है और इसका सहारा लिया जाना चाहिए।

बीबीसी हिंदी पर प्रवीण तोगड़िया का यह बयान आया – इस फैसले से देश के सौ करोड़ हिंदुओं की श्रद्धा का सम्मान हुआ है। हम इसका स्वागत करते हैं। इसी साइट पर नरेंद्र मोदी ने कहा कि जहां तक अयोध्या रामजन्मभूमि विवाद का जजमेंट आया है, इस बात की खुशी है कि इस जजमेंट से भव्य राम मंदिर बनाने का रास्ता प्रशस्त हुआ है। इसी साइट पर विश्व हिंदू परिषद के एक अन्य नेता गिरिराज किशोर ने कहा है कि अब मुसलमानों को गुड-विल का परिचय देते हुए मथुरा और काशी को भी हिंदुओं को सौंप देना चाहिए।

और इसके बाद जामा मस्जिद इलाके के एक गुस्साए हुए व्यक्ति का बयान है, “अदालत उनकी, पार्लियामेंट उनकी, फौज उनकी, तो जाहिर है कि फैसला उनके पक्ष में ही आना था।”

बीबीसी पर शाया इन टुकड़ों से अंदाजा लगाया जा सकता है कि अयोध्या मसले पर आया फैसला किनके हितों को साधता है और किनके लिए एक बार फिर संदेश सामने रखता है कि तुम्हारी जगह क्या है।

अदालत के फैसले ने इस बात की नजीर रखी है कि कल को हमारे घर में चुपके से आकर अगर कोई मूर्ति रख दे तो उसके बाद पैदा हुई लड़ाई का नतीजा यही होगा कि अदालत उस घर को मंदिर घोषित कर देगी।

लेकिन इस चोरी को सही ठहराने के अलावा अदालत ने क्या यह कहना चाहा है कि मथुरा और काशी की संघी मांग भी इसी अंजाम तक पहुंचेगी। और क्या अब इस देश की सभी प्राचीन इमारतों की जांच करायी जाएगी कि यहां पहले क्या था और अब क्या होना चाहिए। आप क्या सोचते हैं कि बाबरी मसजिद में मनमाफिक हिस्सा मिलने के बाद संघी जमात यों ही चुप बैठ जाएगी।

सबसे विचित्र तो यह है कि अदालत का यह फैसला तकनीकी पहलुओं पर आस्था की जीत के रूप में जाना जाएगा। यह कहना कि विवादित स्थल ही रामजन्मभूमि है, एक ऐसा मजाक है, जिसे सुनना दहशत से भर देता है। लेकिन इसी में छिपी एक बात पर गौर करना चाहिए कि किसी व्यक्ति की इस जिद को किसी व्यक्ति ने ही सही ठहराया, जिसे किसी बात को सही या गलत ठहराने का अधिकार मिला हुआ है। सवाल है कि क्या अब अदालत के फैसले आस्थाओं की बुनियाद पर हुआ करेंगे… और क्या उन आस्थाओं पर फैसला देते समय भी यह देखा जाएगा कि किसकी आस्था ज्यादा ताकतवर है या किस आस्था से फैसला देने वाले के तार जुड़ते हैं…?

जिन्हें यह फैसला सुहा रहा है, उन्‍हें इस तरह के फैसलों के बाद बनने वाली बेआवाज हवाओं का अंदाजा नहीं है। सामने दिखने वाले विरोध या विद्रोह से आप निपट सकते हैं, उसको संतुष्ट कर सकते हैं या उसका दमन कर दे सकते हैं। लेकिन चुपचाप पलने वाली आग भीतर-भीतर चुपचाप ही सब कुछ को राख कर देती है। इस बात से गाफिल इस फैसले पर खुश होने के बजाय सोचने की जरूरत है कि बेईमानी की बुनियाद पर इंसाफ की इमारत खड़ी नहीं की जा सकती।
(१ अक्टूबर. २०१० को मोहल्लालाइव पर)

कौन हैं पढ़े-लिखे पाखंडियों को बचाने के अपराधी?

अर्चना झा की डायरी के पन्ने पर एक लाइन यह दर्ज थी कि “बहन…” जैसी गाली आम है एक पढ़े-लिखे बुद्धिजीवी व्यक्ति के लिए, जो अपने संस्कारों से निकलने के “प्रोसेस” में है।

सवाल है कि संस्कारों से निकलने का यह प्रोसेस कब तक चलता रहता है? जब एक आदमी सार्वजनिक मंचों पर जाकर स्त्रियों या दलितों के बारे में ‘प्रगतिशील’ खयालों की मुनादी कर रहा होता है, उस वक्त वह क्या होता है? तमाम पढ़ाई-लिखाई और बुद्धिजीवियों की पांत बैठ कर अपनी छाती फुलाता आदमी उस वक्त क्या होता है जब किसी को ‘बहन…’ जैसी गाली देता है? सूरज (प्रकाश) बड़त्‍या (अब फिर सूरज बड़त्या) से शादी करने के पहले अर्चना झा उसके लिए क्या थी? क्या तब भी वह इसी तरह अर्चना झा या किसी और को कोई बात बिना कोई गाली दिए नहीं कह पाता था? अगर हां, तब अर्चना झा सूरज (प्रकाश) बड़त्‍या के चाहे कितने ही गुणों पर रीझ गई होगी, केवल इस कारण ही उसे खारिज़ क्यों नहीं कर सकी? और अगर नहीं, तो बुद्धिजीवी होने का तमगा लटका चुका सूरज (प्रकाश) बड़त्‍या क्या अपने पौरुष के जड़-मूल के साथ पूरी तरह सुरक्षित साजिशन ‘प्रगतिशील’ था?

साजिशन इसलिए कह रहा हूं कि ऐसा क्या हुआ कि शादी के बाद सूरज (प्रकाश) बड़त्‍या नाम का वह ‘प्रगतिशील बुद्धिजीवी’ अपने सारे खोल उतार कर व्यवहार में पति, पुरुष और आखिरकार सामंती ढांचे के एक सक्षम प्रतिनिधि के तौर पर अर्चना के सामने खड़ा हो गया? ‘प्रगतिशीलता’ का पाखंड ओढ़े हुए सूरज (प्रकाश) बड़त्‍या क्या मनोविज्ञान के उसी दर्जे पर ठस्स, जड़, ठहरा हुआ था जहां प्रेम के नाम पर एक स्त्री को अपने बाईं ओर खड़ा पाकर ही एक पुरुष अपनी मर्दानगी को कामयाब मानता है? तब फिर कैसी पढ़ाई-लिखाई, कैसी क्रांतिकारिता, सभ्य और विकसित या कम से कम विकासशील बुद्धि वाला होने का कैसा दावा !

इन सबके बावजूद सूरज (प्रकाश) बड़त्‍या नाम का वह आदमी एक छद्म रचने में तो कलाकार था ही। वरना अर्चना इतना बड़ा धोखा तो नहीं ही खा सकती थी कि उसका असली चेहरा खुलने की कीमत अपनी जान देकर चुकाती। अपनी डायरी में उसने जो बातें दर्ज कीं, उससे इतना तो समझा जा ही सकता है कि वह इस सामाजिक व्यवस्था को तो समझ रही थी, उसने उस व्यवस्था को खारिज़ भी किया, लेकिन सामाजिक मनोविज्ञान को वह अभी समझने की कोशिश में थी।

एक बुद्धिजीवी कहे जाने वाले व्यक्ति की जुबान से जब किसी के लिए “बहन…” जैसी गाली आम तौर पर बरसती है तब क्या एक पल के भी लिए उसे लगता है कि उस व्यक्ति की अस्मिता के खिलाफ वह किस तरह का अपराध कर रहा है और इस रास्ते का आम होना किस जलील सामाजिक व्यवस्था की बुनियाद है?

अर्चना ने बुद्धिजीवियों पर रहम करते हुए ये शब्द लिखे होंगे या फिर उसने संस्कारों के मनोविज्ञान के सवालों को टालने या उससे बचने की कोशिश की होगी कि “बहन…” जैसी गाली आम है एक पढ़े-लिखे बुद्धिजीवी व्यक्ति के लिए, जो अपने संस्कारों से निकलने के “प्रोसेस” में है। वरना ‘पढ़े-लिखे बुद्धिजीवी’ शब्द समूह में अपनी गिनती कराने को उतावले किसी व्यक्ति को पहले अपने ‘संस्कारों’ से निकलने के ‘प्रोसेस’ को पूरा कर लेना चाहिए, फिर अपने ‘पढ़े-लिखे’ होने का दावा करना चाहिए। कोई भी रचना पहले एक प्रक्रिया से गुजर कर अपना आकार ग्रहण करेगी, या फिर रचना या सिद्धांत अचानक आसमान से टपकते हैं और फिर उसके तहत प्रक्रिया की शुरुआत होगी? कम से कम रचनाकार के स्तर पर…?

इस ‘प्रोसेस’ को पूरा कर निकले बिना क्या कोई भी रचना ईमानदार हो सकती है? ऐसा क्यों है कि एक बेहद ताकतवर स्त्रीवादी या दलित कविता, कहानी या विचार दर्ज कर देने वाला व्यक्ति अपने व्यवहार में घनघोर जातिवादी और स्त्री-विरोधी बना रहता है?

लेकिन इस सामाजिक त्रासदी का क्या करेंगे आप कि अगर किसी सूरज (प्रकाश) बड़त्‍या ने किसी समूह में बैठ कर या मंच पर हाथ लहरा कर दो-चार ‘प्रगतिशील’ जुमले उछाल दिए, कुछ कविताएं या कहानियों की उपलब्धियां अपने नाम करा लीं तो मान लिया गया कि इस व्यक्ति के सभी कुकर्म इसलिए नज़रअंदाज़ किए जाने चाहिए क्योंकि यह कवि है, कहानीकार है, रचनाकार है, तो सभी सजाओं के पार है।

अपने नाम से छपी किसी किताब का विमोचन करते हुए कुछ बड़े साहित्यकारों के साथ मुस्कुराते सूरज (प्रकाश) बड़त्‍या को देख कर वहां मौजूद लोगों में से क्या किसी को अर्चना की याद आयी होगी?

यह यहां-वहां मौजूद तमाम लोगों की त्रासदी है कि अगर अर्चना की याद आई भी होगी तो उस पर सूरज (प्रकाश) बड़त्‍या की वह किताब भारी पड़ी होगी। यही है हमारा ‘पढ़ा-लिखा’ और ‘बुद्धिजीवी’ समाज, जो किसी व्यक्ति के तमाम धतकर्मों को सिर्फ इसलिए नज़रअंदाज़ कर देता है क्योंकि वह कविता, कहानी या उपन्यास लिखता है, ‘प्रगतिशील’ बातें करता है। एक ऐसा ढांचा बना दिया गया है कि अगर ‘प्रगतिशील’ विचारों से लैस कोई एक किताब अपने नाम हो जाए तो हम अपने निजी जीवन में चाहे कितना भी निर्लज्ज और आपराधिक नाच कर सकते हैं, हमें बचाने के लिए हमारा ‘पढ़ा-लिखा बुद्धिजीवी समाज’ तैयार बैठा है।

इस ‘पढ़े-लिखे बुद्धिजीवी समाज’ में बैठे सूरज (प्रकाश) बड़त्‍या जैसे तमाम लोग ऐसे ही बचाए जाते हैं, पाले-पोसे जाते हैं। लेखन और जीवन-व्यवहार में भयानक स्तर पर पाखंड जीने वाले ऐसे लोगों के लिए यही ‘पढ़े-लिखे बुद्धिजीवी’ में गिनती होना हर बार संजीवनी साबित होता है। जरा कल्पना कीजिएगा कि जब किसी स्लम या गंदी कही जाने वाली बस्ती में कोई व्यक्ति अपनी पत्नी-बेटी को मां-बहन की वीभत्सतम गालियां देता हुआ पीटता रहता है या बीवी-बच्चों के सामने खुदकुशी कर लेने की स्थितियां पैदा करता है तो आपको कैसा लगता है? उस व्यक्ति के प्रति कैसे विचार आते हैं और क्या उसका व्यवहार आपको अपराध लगता है? अगर हां, तो उसे किस तरह की सजा दिए जाने का आपका मन करता है? क्या कभी आपको यह भी लगता है कि आप उसके साथ खड़े होकर सम्मानित महसूस करेंगे?

लेकिन ‘पढ़े-लिखे बुद्धिजीवियों’ की दुनिया में यह ‘विशेष छूट’ तभी लागू हो जाती है जब से उनकी गिनती ‘पढ़े-लिखे बुद्धिजीवी’ के रूप में होने लगती है। सवाल है कि दो व्यक्ति के समान कुकर्मों की स्थिति में एक व्यक्ति को सिर्फ इसलिए छोड़ दिए जाने लायक क्यों मान लिया जाए कि वह एक तथाकथित लेखक-बुद्धिजीवी है? बल्कि उसे तो उस व्यक्ति से ज्यादा बड़ा अपराधी और ज्यादा सजा के लायक माना जाना चाहिए जो कई वजहों से अपने व्यवहारों का कारण समझने में सक्षम नहीं है और निकृष्ट व्यवहारों को जीना उसकी त्रासदी है।

मुश्किल यह है कि अर्चना जैसी लड़कियां अपनी अस्मिता और स्त्री के अस्तित्व के प्रति सजग रहते हुए भी सूरज (प्रकाश) बड़त्‍या जैसे अपराधियों से हार जाती हैं। सामना करने के बजाय अपने जीवन को खत्म कर लेने का फैसला भी क्या एक प्रोसेस के अधूरे रह जाने की कहानी नहीं है? प्रेम ने इतनी ताकत दे दी कि आपने जाति जैसी घिनौनी व्यवस्था पर कायम इस समाज को खारिज़ करके अपने जीवन की दिशा चुनी, लेकिन उसी हिम्मत से सूरज (प्रकाश) बड़त्‍या जैसे पाखंडियों का पाखंड सामने आने पर उसे क्यों नहीं लतिया सकती हैं? एक भावुक व्यक्ति ही विद्रोह कर सकता है, लेकिन अपनी अस्मिता को लेकर भावुक होना अपने प्रेम के प्रति भावुक होने से कैसे कम जरूरी है?

सूरज (प्रकाश) बड़त्‍या जैसे लोग इस बात के अपराधी हैं कि अपने अस्तित्व से प्यार करने वाली जिन स्त्रियों के लिए इस सामाजिक व्यवस्था के मुकाबले अपनी अस्मिता और अपना चुनाव ज्यादा अहम है, सूरज (प्रकाश) बड़त्‍या ने उनमें से बहुतों के सामने एक बार ठिठक जाने का मौका मुहैया कराया है। सूरज (प्रकाश) बड़त्‍या जैसे बुद्धिजीवी कहे जाने वालों को सामाजिक रूप से पीड़ित होने का लाभ नहीं दिया जाना चाहिए, क्योंकि कोई अगर बुद्धि और मनोबल के स्तर पर सबल है और लड़ सकता है तो उसे बराबर करके देखा जाना चाहिए।

…और हमारा ‘पढ़ा-लिखा बुद्धिजीवी समाज’ सूरज (प्रकाश) बड़त्‍या जैसे तमाम वैसे लोगों को स्वीकार करने और सम्मानित करने का अपराधी है जो ‘बुद्धिजीवी’ होने का तमगा अपने गले में लटकाये लिखते और भाषण झाड़ते वक्त तो अपनी ‘महानता’ की दुकानदारी कर रहे होते हैं, लेकिन व्यवहार में जीते हुए एक अविकसित दिमाग वाला बर्बर सामंत हो जाते हैं।
(६ सितंबर, २०१० को मोहल्लालाइव पर)

पंधेर और पुलिस में क्या फर्क है…

कुछ समय पहले मेरे भांजे विनेश ने फोन पर पूछा कि कोई आदमी खो जाए तो अखबार में कैसे छपवाते हैं। मैंने कहा कि कोई रिपोर्टर जान-पहचान का है तो ठीक वरना विज्ञापन के रूप में छपवा दो। उसके गांव का एक व्यक्ति सूरत कमाने गया था। वहां से बिहार के मुजफ्फरपुर के लिए कल रेल पकड़ेगा, यहां तक की खबर उसने फोन पर बतायी थी। लेकिन जब पंद्रह दिन बाद तक घर नहीं पहुंचा तो घर वाले उसके गुम होने की खबर अखबार में देना चाहते थे। फिर वे सूरत की ओर उसे खोजने चल पड़े। पता लगाते-लगाते जब गुजरात के किसी स्टेशन पर पहुंचे तो पता चला कि वह तो पंद्रह दिन पहले ही एक ट्रेन से कट गया था और कोई खोज-खबर लेने वाला नहीं था, इसलिए पुलिस ने उसका ‘दाह-संस्कार’ कर दिया।

मंगलवार, 30 मार्च 2010 के ‘द हिंदू’ अखबार में एक खबर जयपुर से छपी है। श्रीगंगानगर में रहने वाले राजकुमार सोनी के उन्नीस साल के बेटे राहुल की पिछले साल मई में किसी ने हत्या कर दी। पुलिस ने किसी जगह से उसकी लाश ढ़ूंढ़ निकाली। लाश बरामदगी के तुरंत बाद पोस्टमार्टम भी करा दी। लेकिन उसके बाद उसके परिजनों को सूचना देना या खोजना पुलिस ने जरूरी नहीं समझा और पोस्टमार्टम के दस मिनट के भीतर शहर के तांतिया मेडिकल कॉलेज को मोटा पैसा लेकर बेच दिया। जबकि नियमों के मुताबिक ऑटोप्सी के बाद अड़तालीस घंटे तक किसी भी लाश को अस्पताल से बाहर नहीं ले जाया जा सकता।

अपने बेटे की लाश नहीं मिल पाने के बाद राजकुमार सोनी ने सूचना के अधिकार कानून के तहत जो जानकारी मांगी थी, उसमें केवल उनके बेटे के बारे में यह त्रासद तथ्य सामने नहीं आया, बल्कि यह भी कि जिंदा लोगों की खाल उधेड़ कर घूस लेने वाली पुलिस किस तरह लावारिस लाशों को भी अपनी कमाई का जरिया बनाती है। राजकुमार सोनी को कोतवाली पुलिस ने पहले बताया कि उनके बेटे राहुल का ‘दाह संस्कार’ कर दिया गया है। लेकिन दाह संस्कार की जगह पूछने पर बताया गया कि लाश को मेडिकल कॉलेज में ‘संरक्षण’ के लिए भेज दिया गया है।

राजकुमार सोनी ने सूचना के अधिकार कानून के तहत पूरे जिले के पुलिस थानों से लावारिस लाशों का ब्योरा मांगा था। लेकिन महज तीन थानों से ही पिछले पांच साल में तेईस ऐसी लाशों को पुलिस ने बहुत ऊंची कीमत पर गैरकानूनी तरीके से निजी मेडिकल कॉलेजों को बेच दिया।

लगभग दो महीने पहले बिहार में भी इसी तरह की एक खबर किसी तरह सामने आ सकी थी जिसमें एक थाने के अहाते में कोलतार के बड़े खाली डिब्बे में चार लाशें छिपा कर रखी गयी थीं। छानबीन में पता लगा कि ये चार लाशें उन लोगों के हैं, जिन्हें पुलिस ने फर्जी मुठभेड़ में मार डाला था और इन लाशों को निजी मेडिकल कॉलेजों को बेचा जाना था, ताकि वहां छात्रों की ‘पढ़ाई’ और ‘परीक्षण के प्रशिक्षण’ में कोई बाधा नहीं आये। ‘लावारिस’ लाशों को बेचे जाने की घटनाएं काफी पहले से जारी हैं।

अब अंदाजा लगा सकते हैं कि गांव-देहातों से रोजगार की तलाश में परदेस गये लोगों में से ‘गुम’ हो गये लोगों का क्या होता होगा? निठारी में ‘गुम’ बच्चों का क्या हुआ? और दिल्ली जैसे शहरों में ‘गुम’ होने वालों में ज्यादातर का पता भी नहीं चल पाने के पीछे क्या राज है…?

बच्चों की हत्या कर उनके अंगों की तस्करी करने वाले मोहिंदर सिंह पंधेर में और उन पुलिस वालों में क्या फर्क है, जो अपना पेट ऊंचा करने के लिए ‘लावारिस’ लाशों को भी नहीं बख्शते…?
( अप्रैल, २०१० को मोहल्लालाइव पर)