Monday, 21 February 2011

गरीब औरत की इज्जत, डेढ़ लाख रुपए: वाया सुप्रीम कोर्ट


उत्तर प्रदेश में बांदा की शीलू ने एक अखबार के संवाददाता को बताया कि विधायक (पुरुषोत्तम द्विवेदी) ने उसके साथ बलात्कार करने की हिम्मत इसलिए की क्योंकि वह एक गरीब बाप की बेटी है।

शीलू का बलात्कार करने वाला विधायक पुरुषोत्तम द्विवेदी अब इस बात के लिए जश्न मना सकता है कि जो लोग उसे शीलू के बलात्कार के मामले में सजा दिलाने पर तुले हैं, इस देश की सु्प्रीम कोर्ट ने उन्हें आईना दिखा दिया है कि न्याय के आखिरी मंदिर का इस बारे में क्या मानना है। अब उस फैसले को सामने रख कर पुरुषोत्तम द्विवेदी चाहे तो शीलू को उसकी ‘औकात’ के हिसाब से एक-डेढ़ लाख रुपए अदा कर दे और खम ठोंक कर बाकायदा सुप्रीम कोर्ट से ‘राहत सर्टिफिकेट’ हासिल कर अपने ‘दुश्मनों’ को मुंह चिढ़ाए कि बलात्कार-बलात्कार में फर्क होता है! चूंकि उसके पास डेढ़ लाख रुपए की अगली किस्तों की कमी नहीं होगी, इसलिए वह अगली किसी शीलू के शिकार पर निकल सकता है।

दरअसल, इस देश में रोजाना होने वाले सैंकड़ों बलात्कारों के मामले में फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक नजीर पेश की है, लेकिन इसका ‘फायदा’ बलात्कार की शिकार सिर्फ उन महिलाओं को मिल पाएगा, जो गरीब हैं! अगर पीड़ित महिला गरीब नहीं है तो उसे यह ‘फायदा’ नहीं मिल पाएगा!
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मामला कुछ यों है कि सांपला, रोहतक के इस्माइल गांव में संजय और रामफल ने संतरो (बदला हुआ नाम) के साथ आठ साल पहले सामूहिक बलात्कार किया था। सेशन कोर्ट ने इन दोनों अपराधियों को आईपीसी की धारा 376 (बी) के तहत बारह-बारह साल की कैद की सजा दी। बाद में हाईकोर्ट ने भी इस सजा को बरकरार रखा। दोनों अपराधियों ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की और सुप्रीम कोर्ट की एक खंडपीठ ने न्याय के एक नए सिद्धांत का प्रतिपादन किया। फैसला सुनाते हुए कोर्ट ने कहा कि किसी महिला की इज्जत कुछ लाख रुपए नहीं हो सकती, लेकिन महिला गरीब है, इसलिए दोनों अपराधी अगर महिला को डेढ़-डेढ़ लाख रुपए मुआवजा दे दें तो उन्हें जमानत पर रिहा कर दिया जाए। इस तरह का अब तक का यह पहला मामला है जिसमें सामूहिक बलात्कार जैसे संगीन अपराध के मामले में मुआवजे की शर्त पर दोषियों को जमानत दे दी गई। (हिंदुस्तान, 13 जनवरी, 2011)

बलात्कारियों को लेकर न्यायमूर्तियों की इसी पीठ का एक और नया फैसला भी इसी तर्ज पर आया। 22 फरवरी को इन्हीं दोनों न्यायमूर्तियों ने पंजाब के लुधियाना जिले में मार्च 1997 में एक महिला के साथ सामूहिक बलात्कार करने वाले तीन अपराधियों को पचास-पचास हजार रुपए अदा करने की शर्त पर महज साढ़े तीन साल कैद की सजा काटने के बाद रिहा करने का आदेश दे दिया। मुजरिमों को सेशन कोर्ट दस-दस साल कैद की सजा सुनाई थी, हाईकोर्ट ने मुजरिमों की अपील खारिज कर दी थी, लेकिन इन दोनों न्यायमूर्तियों ने एक बार फिर अपनी करीब हफ्ते भर पहले शुरू की गई परंपरा का निर्वहन करते हुए एक और इसी तरह का फैसला सुनाया। तर्क वही है, पीड़िता और उसके साथ बलात्कार की सजा पाए अपराधी के बीच समझौता हो गया! गौर करिएगा, इसमें बलात्कार की शिकार औरत की इज्जत की कीमत घट कर पचास हजार रुपए हो गई है। अब देखना है कि न्याय के इस सबसे बड़े मंदिर में बलात्कार की शिकार अगली किसी औरत की इज्जत की कितनी कीमत लगाई जाती है...!
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ध्यान रहे कि बलात्कार के अपराध में धारा 376 (जी ) के तहत न्यूनतम सजा दस वर्ष और अधिकतम उम्रकैद है। यह अपराध गैरजमानती तथा गैरमाफी योग्य है।

सुप्रीम कोर्ट की जिस खंडपीठ ने यह फैसला सुनाया है, उसके दो माननीय ‘न्यायमूर्ति’ हैं माननीय न्यायमूर्ति मार्कंडेय काट्जू और माननीय न्यायमूर्ति ज्ञानसुधा मिश्रा। यहां साफ करने की जरूरत है कि इनमें से ज्ञानसुधा मिश्रा एक महिला का नाम है।

सुप्रीम कोर्ट के इस खंडपीठ में शामिल एक, मार्कंडेय काट्जू वही ‘न्यायमूर्ति’ हैं, जिन्होंने कुछ समय पहले लिव-इन रिलेशनिशप पर एक फैसला देते हुए कहा था कि ‘रखैलों’ को मुआवजा पाने का कोई हक नहीं है, और कि इसके लिए लंबे समय तक पति-पत्नी की तरह रहते दिखना होगा। हालांकि इन्हीं मार्कंडेय काट्जू ने अपने एक अन्य फैसले में नौ साल तक एक स्त्री के साथ रहने और उससे दो बच्चों का पिता बनने के बावजूद पत्नी के रूप में स्वीकार न करने वाले एक पुरुष के लिए महज ‘कपटी’ शब्द का इस्तेमाल करने तक से इनकार कर दिया और कहा कि ऐसे शख्स को ज्यादा से ज्यादा असभ्य कहा जा सकता है और कानून के तहत उसे सजा देना नाइंसाफी होगी। (उस खंडपीठ में भी ज्ञानसुधा मिश्रा उनके साथ थीं, लेकिन उन्होंने मार्कंडेय काट्जू से साफ तौर पर असहमति जताई थी और कहा था कि ऐसे पुरुष को कपटी कहना उचित होगा और उसे जेल की सलाखों के पीछे जाना ही होगा।) बहरहाल, जब रखैल शब्द पर आपत्ति उठाई गई तो न्यायमूर्ति श्री मार्कंडेय काट्जू का कहना था कि इस शब्द का इस्तेमाल तो सदियों से किया जाता रहा है। क्या ताजा फैसले से न्यायमूर्ति श्री मार्कंडेय काट्जू का इससे कोई अलग चेहरा सामने आता है?

अंग्रेजी में एक शब्द है माइसोजीनिस्ट... इसका मतलब यह होता है कि कोई अपनी बुनावट में ही स्त्रियों से नफरत करने वाला है।

लेकिन हमारे लिए केवल दुख नहीं, त्रासदी का मामला यह है कि इसी खंडपीठ में ज्ञानसुधा मिश्रा के रूप में एक महिला भी बैठी हुई थीं और उन्हें भी इसमें आपत्ति करने लायक कोई बात नहीं दिखी कि सेशन कोर्ट और हाईकोर्ट में बारह-बारह साल की सजा पाए बलात्कारियों को इस शर्त पर राहत देने का आदेश दे दिया जाए कि वह पीड़ित महिला को डेढ़ लाख रुपए अदा कर दें। यह इसलिए कि महिला गरीब है। न्यायमूर्तियों ने यह कहने की मेहरबानी की कि ‘किसी महिला की इज्जत कुछ लाख रुपए नहीं हो सकती...।’

देश की सबसे ऊंची अदालत में न्याय की कुर्सी पर बैठने के बावजूद ज्ञानसुधा मिश्रा को भी यह क्यों लगता है कि एक स्त्री की ‘इज्जत’ का पर्याय उसका शरीर है और अगर बंदूक की नोक पर उसके साथ बलात्कार किया जाता है तो इससे उसकी ‘इज्जत’ चली जाती है? क्या एक स्त्री का अस्तित्व इसी ‘इज्जत’ के भरोसे टिका होता है, जिसके लूट लिए जाने के बाद उसके पास कुछ नहीं बचता? फिर इस सामाजिक स्थापनाओं को हम क्यों गलत कहें जिसमें इस ‘इज्जत’ के लुट जाने के बाद मान लिया जाता है कि अब वह कौन-सा मुंह लेकर जिएगी? क्या हम अक्सर आने वाली इन खबरों से इतने अनजान हैं कि किसी स्त्री ने बलात्कार के बाद खुद आत्महत्या कर ली? क्या स्त्री की अस्मिता के सारे सवाल इसी ‘इज्जत’ के साथ खत्म हो जाते हैं? और क्या बलात्कार खासतौर पर हमारी सामाजिक परिस्थितियों में एक स्त्री के अस्तित्व पर एक ऐसा हमला नहीं है, जिस अपराध के लिए कितनी भी सख्त सजा कम ही होगी?

सवाल है कि ये ‘इज्जत’ है क्या और इस तथाकथित इज्जत की यह परिभाषा किसने गढ़ी है...? किसने एक औरत को घर या जमीन की तरह एक जायदाद में तब्दील कर दिया और किसने उसकी अस्मिता के सारे सवालों को खारिज करके उसकी इज्जत को उसके देह का दूसरा नाम बना दिया?

दरअसल, स्त्री को गुलाम बनाए रख कर ही समाज के सामंती चरित्र को बचाए रखा जा सकता है। इसका विस्तार करें तो स्त्रियों के साथ सामाजिक वर्णक्रम में निचले पायदान पर गिनी जाने वाली जातियों को भी इस चक्र में शामिल किया जा सकता है। यानी स्त्रियों और समाज के अधिकांश हिस्से को अपनी उंगलियों पर नचाने वाले ब्राह्मणवादी सूत्रों ने ऐसा सामाजिक मनोविज्ञान रच दिया है कि उसमें गुलामी और त्रासदी झेलते हुए शोषित और पीड़ित वर्गों को पता भी नहीं चल पाता कि इस व्यवस्था ने कब और कैसे उनके स्वत्व का हरण कर लिया।

लेकिन देश के सुप्रीम कोर्ट के फैसलों में अगर इन्हीं स्थापनाओं की छाया दिखती है तो अंदाजा लगाइए कि यह व्यवस्था किसकी है और अलग-अलग मोर्चे पर अलग-अलग रूप में किसके लिए चल रही है!

सवाल है कि क्या सुप्रीम कोर्ट के इन दोनों जजों ने सचमुच कोई ऐसा फैसला सुनाया है कि इससे किसी को दुखी होना चाहिए? हमारे समाज में कौन किसी बात पर दुखी होता है और किसके दुखी होने का कोई मतलब है? इस फैसले से किसको दुख होगा? सुप्रीम कोर्ट ने तो उन्हीं धारणाओं, मानसिकताओं और रिवायतों को कानूनी स्थापना दी है, जो हमारे समाज और सरकार के चरित्र में घुला-रचा-बसा है! मगर इसके बाद एक सवाल और खड़ा होता है कि देश के सुप्रीम कोर्ट में न्याय की कुर्सी पर क्या सामाजिक रिवायतों के झंडाबरदार बैठे हुए हैं?

कोई कह सकता है कि महिला खुद भी इसके लिए राजी थी। लेकिन जो लोग महिला के भी राजी होने का तर्क स्वीकार कर रहे हैं, क्या वे अंदाजा भी लगा सकते हैं कि वह महिला व्यवस्था की इन बेरहम परतों के बारे में कितना सोच-समझ सकती है? जब सबसे ऊंची अदालत में न्याय की कुर्सी पर बैठे लोग उसकी ‘इज्जत’ और बलात्कार जैसे अपराध के लिए सजा की यह परिभाषा गढ़ रहे हैं, तो क्या हम उस महिला से अपने साथ हुए बलात्कार, इसके प्रति सामाजिक अवधारणाओं, स्थापनाओं, परंपराओं और मानसिकता की साजिशें समझ-बूझ कर कुछ तय करने की उम्मीद करेंगे?

महिला चूंकि गरीब है, इसलिए डेढ़ लाख रुपए अदा कर रिहा करने का आदेश देते हुए भी दोनों न्यायमूर्ति यह तो मान ही रहे हैं कि कठघरे में खड़े दोनों व्यक्ति बलात्कार के अपराधी हैं। सेशन कोर्ट और हाईकोर्ट ने इन दोनों को बारह साल की कैद की सजा सुनाई थी। अगर सुप्रीम कोर्ट को लगता है कि ये दोनों व्यक्ति अपराधी नहीं हैं, तो वह उन्हें बाइज्जत बरी कर सकता है। अपराधी होने की स्थिति में भी उसकी कृपा बरसे तो वह उनकी सजा कम सकता है। लेकिन राहत पाने के लिए डेढ़ लाख रुपए देने की शर्त लगाते हुए न्यायमूर्तियों ने किस तर्क का सहारा लिया? क्या इस देश के संविधान में ही कहीं यह बात छिपी हुई है कि किसी गरीब महिला के साथ बलात्कार की स्थिति में अपराधियों को यह छूट है कि वह उसे लाख-डेढ़ लाख रुपए देकर राहत हासिल कर ले? अगर नहीं, तो न्यायमूर्तियों ने कानून की किसी भी धारा की व्याख्या इस रूप में किस आधार पर की? दोनों के अपराधी होने को स्वीकार करने के बावजूद उन्हें राहत हासिल करने की शर्त डेढ़ लाख रुपए कैसे तय कर दी?

हम मान ले सकते हैं कि इन न्यायमूर्तियों को महिला के गरीब होने पर दया आ रही थी। (जज की कुर्सी पर क्या दया करने के लिए बैठा जाता है?) लेकिन उसके साथ बलात्कार होने के लिए वह किस-किस को जिम्मेदार मानते हैं? अपने नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की आखिरी जिम्मेदारी राज्य पर है। इस लिहाज से उस महिला के साथ जो भी हुआ, वह राज्य की विफलता है। राज्य उसकी सुरक्षा नहीं कर सका, इसलिए अगर मुआवजा देना है तो राज्य को देना है। सुप्रीम कोर्ट की यह खंडपीठ अगर महिला को आर्थिक मदद मुहैया कराना ही चाहती थी तो वह राज्य को इतनी या इससे ज्यादा रकम मुआवजे के रूप में देने का आदेश दे सकती थी। लेकिन अगर बलात्कारियों को डेढ़ लाख रुपए दे कर राहत पाने की छूट दी जाती है, तो बलात्कार के अपराध में सजा पाए कितने ऐसे लोग होंगे जो इस विकल्प का चुनाव नहीं करना चाहेंगे?

और इसके साथ यह भी जोड़ लीजिए कि इस देश में जितनी भी महिलाओं के साथ बलात्कार होता है, उसमें ज्यादातर महिलाएं गरीब ही होती हैं। बांदा की शीलू ने जो कहा है, वह इस देश की एक बड़ी और तल्ख हकीकत है कि विधायक ने उसके साथ बलात्कार करने की हिम्मत इसलिए की, क्योंकि वह एक गरीब बाप की बेटी है।

अदालतें क्या इसी हल की राह पर चलते हुए किसी पीड़ित महिला के अमीर होने की स्थिति में डेढ़ लाख रुपए के मुआवजे को आनुपातिक तौर पर ज्यादा और बहुत ज्यादा बढ़ा कर महिला को चुप रहने की सलाह देंगी? (समाज में वर्गीय नफरत के भाव कैसे पैदा होते होंगे...?)

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला दरअसल मध्ययुगीन सामंती खाप मिजाजी पंचायतों के फैसलों या स्थानीय दबंगों की उन मनमानियों से कैसे अलग है, जिसमें बलात्कार की शिकार स्त्री को एक-दो-तीन या पांच हजार रुपए लेकर मुंह बंद रखने पर मजबूर कर दिया जाता है।

निचली अदालतों में फैली घूसखोरी, भ्रष्टाचार, अनियमतताओं और पद-प्रभाव के इस्तेमाल पर सोचने-समझने वाले लोगों से लेकर देश की सुप्रीम कोर्ट तक ने उंगली उठाई है। यानी आप सुप्रीम कोर्ट को पाक-साफ, पवित्र, अप्रश्नेय- सब कुछ मान सकते हैं। निचली अदालतों की उसी छवि के शिकार लोग जब किसी तरह सुप्रीम कोर्ट में पहुंचते हैं, तो न्याय की उम्मीद का वह एक आखिरी दरवाजा होता है। वहां से मिला ‘न्याय’ न केवल आखिरी तौर पर स्वीकार्य होता है, बल्कि एक नजीर भी कि आगे अगर देश की किसी अदालत में वैसा मामला आएगा तो सुप्रीम कोर्ट का फैसला राह दिखाएगा।

क्या इस फैसले के बाद भी न्याय का यह मंदिर यह सकने की हालत में है कि वह सबसे संगीन अपराधों में गिने जाने वाले अपराध- बलात्कार के मामले में संवेदनशील रवैया अपनाती है? क्या उसने यह नया सिद्धांत नहीं प्रतिपादित किया है कि अगर किसी गरीब महिला के साथ बलात्कार हुआ है तो उसे न्याय के रूप में लाख-डेढ़ लाख रुपए दे दो और बात खत्म करो? क्या किसी संभ्रांत या धनी वर्ग की महिला के साथ बलात्कार या किसी हाई-प्रोफाइल मामले में इन्हीं तथाकथित न्यायमूर्तियों को यही शब्द दोहराने की हिम्मत पड़ती?

Wednesday, 16 February 2011

बाजार दरअसल व्यवस्था का ही पोषण करता है...

सत्ता की जुबान

मृणाल वल्लरी



कुछ समय पहले अपने एक गीत की वजह से सिनेमा हॉलों में आने से पहले मशहूर हो चुकी एक फिल्म ‘तीसमार खां’ बड़ी धूम से आई, लेकिन बॉक्स ऑफिस पर मुंह के बल गिरी। उस बाजारू धूम का धुआं पैदा करने में जिन दो खास पहलुओं की भूमिका रही, वे यह थीं कि फिल्म के रिलीज होने के पहले ही ‘शीला की जवानी...’ ने कथित तौर पर युवा दिलोदिमाग को अपने मायाजाल में कैद कर लिया था और दूसरे कि टीवी पर चलाए गए प्रचार में यह संवाद बड़े जोर-शोर से परोसा गया कि किसी तवायफ की लुटती इज्जत को बचाना और तीसमार खां को पकड़ने की कोशिश करना- दोनों बेकार है। हैरानी तभी हुई थी कि एक महिला निर्देशक की फिल्म में इतना संवेदनहीन संवाद कैसे हो सकता है। जब टीवी के प्रोमो से वह संवाद हटा लिया गया था तो थोड़ी राहत महसूस हुई थी। लेकिन फिल्म में वह संवाद ज्यों का त्यों था, सिर्फ तवायफ शब्द पर एक ‘बीप’ की पट्टी चढ़ा-पढ़ा दी गई। सवाल है कि क्या सेंसर बोर्ड इतना भोला है कि उसने मान लिया कि ‘बीप’ चढ़ा देने भर से दर्शकों को वहां प्रयोग किए गए शब्द का पता नहीं चलेगा! ‘तीसमार खां’ किसकी इज्जत से इतनी घृणा से देख रहा है, एक आम दर्शक शायद इसलिए भी बड़ी आसानी से अंदाजा लगा लेता है, क्योंकि इसके इस्तेमाल का मकसद ही सामाजिक आग्रहों-दुराग्रहों और कुंठाओं का शोषण था।

इसके पहले प्रकाश झा की फिल्म ‘राजनीति’ के इस संवाद पर भी सेंसर बोर्ड ने कैंची चलाई थी कि ‘विधवा सब लूट कर ले जाएगी।’ यह फिल्म की नायिका कैटरीना कैफ के लिए कहा गया था। ध्यान रखने की बात यह है कि कैटरीना की उस भूमिका को परोक्ष रूप से सोनिया गांधी से जोड़ा गया था। सेंसर बोर्ड को लगा कि इससे शायद सोनिया गांधी के सम्मान को चोट पहुंचेगा, और वह संवाद बदल दिया गया। लेकिन ‘तीसमार खां’ जिसकी इज्जत बचाने को ‘बेकार’ घोषित करता है, उसके इससे आहत होने या न होने से सचमुच कहां किसी को कोई फर्क पड़ता है? अभिमन्यु की तरह मां के पेट से ही ठगी, धोखे और जालसाजी के गुण सीख कर आया आज के समाज का ‘सुपर हीरो’ अपनी जिंदगी के कई सिद्धांतों में से इस एक को कंटीली मुस्कान के साथ परदे पर जब भी कहता है कि तवायफों की कोई इज्जत नहीं होती तो सिनेमा हॉल में बैठा दर्शक तालियों की गड़गड़ाहट से उसकी मर्दानगी की हौसला-अफजाई करता है।

दरअसल, फराह खान जैसे निर्देशक जितना बाजार की नब्ज पहचानते हैं, उससे ज्यादा उन्हें यह पता है कि बाजार में समाज की किन कुंठाओं को सबसे ज्यादा बेचा जा सकता है। अपने हर अंक का आधा वक्त ‘बीप’ में काट लेने वाले कथित रियलिटी शो ‘बिग बॉस’ जैसे धारावाहिकों में हर ‘बीप’ के साथ उसके दर्शकों की किस तरह की प्यास बुझती है? यह बेवजह नहीं है कि आज हिंदी फिल्मों में ऐसे संवाद आम हैं, जिससे कहीं न कहीं लोगों की यौन लिप्साओं को तुष्टि मिलती है। इससे किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता कि सिनेमा हॉल की किसी सीट पर बैठी एक स्त्री के लिए वे संवाद किस हद तक असहज करने वाले हो सकते हैं। ऐसी स्त्रियों को पाठ पढ़ाया जाता है कि एक ओर स्त्रियां भी तमाम वर्जनाओं को त्याग कर धड़ल्ले से गालियों का इस्तेमाल करके अपनी ‘शक्ति’ का प्रदर्शन करने लगी हैं और यहां फिर से वर्जनाओं के जाल में उलझाने की कोशिश की जा रही है। ‘नो वन किल्ड जेसिका’ में पत्रकार बनी रानी मुखर्जी करगिल रिपोर्टिंग से लौटते वक्त हवाईजहाज में एक सहयात्री को जब गालीयुक्त मर्दाना भाषा में चुनौती देती है या कुछ दूसरी महिला पात्र जब बार-बार एक गाली का प्रयोग करती हैं तो सिनेमा हॉल में ठहाका लगता है या लोग फुसफुसाने लगते हैं और दूसरी ओर बाजार इसे स्त्री सशक्तीकरण के रूप में पेश करता है। धड़ल्ले से गालियों का इस्तेमाल कर रही कोई महिला क्या सोच भी पाती है कि दुनिया की अमूमन सभी गालियां कैसे स्त्री-देह को लक्षित हैं और इससे स्त्री की अस्मिता कहां-कहां और कैसे खंडित होती है? अपने लिए चुनौती बन सकने वाली किसी ताकत को सत्ताएं इसी तरह नष्ट कर डालती हैं।

हाल ही में रामगोपाल वर्मा की वाहियात कही जा सकने वाली फिल्म ‘रक्तचरित्र-1’ में एक पात्र एक संवाद में जब ‘नीची जाति’ बोलता है तो इसमें ‘नीची’ शब्द पर बीप की पट्टी चढ़ा दी गई और ‘जाति’ रहने दिया गया। लेकिन इसी फिल्म का खलनायक एक जगह मां की प्रसिद्ध गाली चिल्ला-चिल्ला कर दोहराता है और इससे सेंसर बोर्ड को कोई परेशानी नहीं होती। शायद इसलिए कि मां की गाली अब आपत्ति करने लायक नहीं रही। इसी गाली की आड़ ने देश के प्रिय क्रिकेटर हरभजन सिंह को बचा लिया था। जब आस्ट्रेलियाई खिलाड़ी एंड्रयू साइमंड्स ने आरोप लगाया कि हरभजन ने उन्हें ‘मंकी’ कहा तो इसे नस्लभेदी गाली मानते हुए कड़ी कार्रवाई की तैयारी हुई। लेकिन हरभजन ने बड़ी मासूमियत से सफाई दे दी कि उन्होंने ‘मंकी’ नहीं ‘मां की’ कहा था। उनकी सफाई को स्वीकार करते हुए उन्हें बख्श दिया गया। भारत में उनकी मां ने खुशियां मनार्इं कि उनका बेटा नस्लभेदी गाली देने के आरोपों से मुक्त हो गया। शायद उनकी मां को इस गाली से आपत्ति नहीं हुई होगी, क्योंकि यह तो यहां के लोगों की जुबान पर आम है।

सिनेमा और टीवी वाले कहते हैं कि हम वही दिखाते और सुनाते हैं जो जनता चाहती है। क्या हम सचमुच वही देखना और सुनना चाहते हैं? हम सभ्यता के किस दौर में जी रहे हैं जहां खांसने और छींकने पर तोसॉरीबोलते हैं, लेकिन वीभत्सतम गालियां सुनने-सुनाने के बाद भी हमें कोई पछतावा नहीं होता?

(14 फरवरी को जनसत्ता में दुनिया मेरे आगे स्तंभ में प्रकाशित)