‘अब ब्लाउज खोल कर फेंक दो, छाती पर हाथ फेरो, फटाफट साड़ी उतारो और टांगें फैला कर सो जाओ। धत्तेरे की, मेरे सामने शर्म कैसी!’
“पोर्नोग्राफी पर रोक कैसे लगे? समाज का सही चित्र न दिखाने की मंशा से ही तो वह सब दिखाया जाता है। अगर लोगों के मन-मस्तिष्क के भीतर किसी कोने में विकृति भरी हुई है तो आज नहीं तो कल भद्र कहे जाने वाले चेहरों पर से मुखौटा हटेगा ही। मेरा मानना है कि विकृति चिरस्थायी चीज नहीं है। स्वस्थ, सुंदर, समान अधिकार वाला समाज बनाने के लिए चल रही कोशिशों में स्त्री और पुरुष दोनों को मिल कर यह विकृति समाप्त करने की चेष्टा करनी ही होगी। इसे बुरी बात मान कर हाथ पर हाथ धरे बैठे रहने से कुछ नहीं होगा। यह गंदगी पूरी दुनिया को अपने आगोश में लेती चली जाएगी। कानून बना कर और मानवाधिकारों के मामले में लोगों को शिक्षित करके ही इस विषमता और विकृति को रोकने में मदद मिल सकती है।”
ये दोनों अंश तसलीमा नसरीन के एक लेख के अंश हैं। सुविधा के लिए इस लिंक पर जाया जा सकता है – http://mohallalive.com
- शब्दों के जरिए रचा गया चित्र,
- और विश्लेषण के बाद समाधान के लिए बताया गया रास्ता…।
एक लेख के चंद अंशों से किसी को आंकना ठीक नहीं। लेकिन यह उनके एक ताजा लेख के अंश हैं और उम्मीद यही होती है कि कोई व्यक्ति अपने काम के क्षेत्र और विषय के प्रति समय के साथ और ज्यादा परिपक्व होता है।
अब हुसैन की रेंज और तसलीमा के विस्तार की तुलना कीजिए। दो व्यक्ति को एक कसौटी पर कसने के लिए दो मापदंड नहीं हो सकते। तसलीमा और हुसैन, दोनों अपने-अपने देश के बहुसंख्यक कठमुल्लावाद के शिकार हैं। दोनों को ही अपने-अपने देशों से इसलिए भागना पड़ा है क्योंकि उन्होंने एक जड़ व्यवस्था के सामने साहस के साथ अपना प्रतिरोध दर्ज किया। लेकिन तसलीमा अपने इसी प्रतिरोध के कारण मुसलमान से ऊपर उठ कर इंसानियत की पक्षधर हो जाती हैं और हुसैन की पहचान एक मुसलमान के दायरे में सिमट जाती है। क्यों…?
अपने देश लौटने की अपेक्षा हम जितनी “उदारता” के साथ हुसैन से करते हैं, क्या ऐसी ही सदिच्छा हम तसलीमा से कर सकते हैं। उनके बांग्लादेश लौटने का रास्ता क्या इतना आसान रह गया है? बांग्लादेश की सरकार ने तसलीमा को बाहर किया, इसलिए कि वहां के कठमुल्लों की यह इच्छा थी। हुसैन को इस देश से इसलिए बाहर जाना पड़ा, क्योंकि यही यहां के कठमुल्लों की इच्छा है।
दोनों के अपने वतन लौटने पर कौन-सी स्थितियों का सामना करना पड़ सकता है? तसलीमा बांग्लादेश सरकार और वहां के कठमुल्लों – दोनों के निशाने पर हैं। और हुसैन! देश लौटने के साथ ही यहां के कठमुल्लों की तलवारें और सरकार की हथकड़ियां – दोनों ही हुसैन के स्वागत के लिए तैयार खड़ी हैं। क्या अंतर है?
(यों, यहां भी एक अजीब समानता है कि तसलीमा अब शायद बांग्लादेश नहीं जाना चाहतीं और हुसैन अब भारत नहीं आना चाहते। एक अंतर यह है कि तसलीमा आज बांग्लादेश के बजाय भारत-प्रेम को जाहिर करने से कभी नहीं चूकतीं और कथित रूप से कतर की नागरिकता ग्रहण कर लेने के बावजूद हुसैन यही कहते हैं कि मैं आज भी भारत से प्रेम करता हूं, लेकिन भारत के लोगों ने मुझे खारिज़ कर दिया…)
फिर यह भी क्या सच नहीं है कि जिन कारणों से हुसैन की “सरस्वती” या “भारतमाता” जैसी कृतियां एक हिंदू मन को तकलीफ पहुंचाती हैं, लगभग उन्हीं कारणों से तसलीमा की रचनाएं एक मुसलिम मन को तकलीफ पहुंचाती हैं? एक कलाकार या रचनाकार को जैसे ही हम (या वह खुद भी) एक दायरे या एक मुसलमान-हिंदू के रूप में देखते हैं, यह समस्या आ खड़ी होती है।
तसलीमा ने जिस साहस के साथ इस्लामी कठमुल्लावाद का प्रतिरोध किया, उसे स्वीकार करने में कोई परेशानी नहीं। लेकिन उसी कसौटी पर हमें “सरस्वती”, “भारतमाता” या दूसरी कृतियों को देखना पड़ेगा कि वे एक व्यवस्था को आईना दिखाती हैं। न कि किसी मुसलमान मन को तुष्ट करती हैं या हिंदू मन को आहत करती हैं। अगर ऐसा नहीं है तो हैदराबाद के पंडित बद्री विशाल पित्ती की प्रेरणा से “रामायण” और “महाभारत” बनाने वाले हुसैन को हम किस रूप में देखेंगे? वहां तो हम हुसैन की व्याख्या एक कलाकार और इंसान के रूप में करने लगते हैं!
और यह भी एक अजीब तर्क है कि हुसैन ने अल्लाह या पैगंबर के चित्रों की रचना क्यों नहीं की? जिस तरह हम यह तय नहीं कर सकते कि तसलीमा क्या लिखें, उसी तरह हम हुसैन से यह उम्मीद क्यों करें वे अपनी कूचियां हमारी कामनाओं को तुष्ट करने के लिए चलाएं। और वह भी तब, जबकि हुसैन के उलट तसलीमा ने अपनी नास्तिकता को घोषित तौर पर स्वीकार करते हुए अपने काम सामने रखे। इसके बरक्स दुनिया में जितने लोग आस्तिक हैं, क्या उन सभी का संहार कर देना चाहिए? (पढ़ने वालों को यह ध्यान रखने के लिए कहना चाहूंगा कि मैं खुद घोषित तौर पर नास्तिक हूं और कई लोगों की भयप्रद आशंकाओं के बावजूद इस रास्ते से अपनी वापसी संभव नहीं मानता।)
अगर दलित वर्गों को अपनी सामाजिक स्थितियों के वास्तविक शास्त्र का पता लग जाए, तो वे मंदिर प्रवेश के लिए संघर्ष करने के बजाय धर्म और ईश्वर द्रोह की घोषणा करके गर्व करेंगे। हां, उन तथाकथित प्रगतिशील और क्रांतिकारी लेखकों के बारे में बात करने की जरूरत भी नहीं महसूस करता जिनके लिए “भगवान की मर्जी ही सब कुछ है।” (भगवान की मर्जी केवल सामाजिक सत्ता को बनाये रखने में सार्थक होती है।)
जहां तक हुसैन की कलाकृतियों के बाजार-शास्त्र का सवाल है, तो इस कसौटी पर भी दोनों में बहुत ज्यादा फासला नहीं है। दोनों ही अपनी-अपनी रचनाओं के लिए बाजार का निर्माण करते वक्त मूल रूप से एक ही फार्मूले का इस्तेमाल करते हैं। हां, तसलीमा के मुकाबले वहां हुसैन ज्यादा क्लासिक हो जाते हैं। (यहां हम हुसैन और तसलीमा के “उपभोक्ताओं” के बीच वर्ग विभाजन कर सकते हैं)। और अपने तमाम साहस और व्यवस्था के प्रतिरोध के बावजूद चूंकि तसलीमा भारत के बहुसंख्यक कठमुल्लावाद के लिए एक हथियार के तौर पर भी काम करती हैं, इसलिए उनकी “औसत” और एक स्तर पर असरहीन रचना भी महत्त्वपूर्ण के रूप में पोषित होती है। वरना क्या कारण है कि एक स्त्री का दुख सामने रखते हुए वे जितना बहादुर होती हैं, उन दुखों से लड़ने का रास्ता बताते हुए वे उतनी ही कमजोर और कहीं-कहीं उसी पुरुष-सत्ता का औजार हो जाती हैं, जिसके बरअक्स एक विकल्प के रूप में खड़ा होना पहली जरूरत है। यह तो नहीं हो सकता कि अपनी चुनौतियों से मुकाबले के लिए एक सामाजिक-लैंगिक सत्ता के रूप में पुरुषवाद जिन धतकर्मों को अपना हथियार बनाता है, वही फार्मूला स्त्री समाज के दुखों से निपटने के लिए अपनाया जाए। यह एक पुरुषवाद के बरअक्स उसी पैमाने पर खड़ा होने वाला दूसरा पुरुषवाद होगा और अपनी प्रकृति में आखिरी तौर पर उसी तरह नतीजे देने वाला साबित होगा।
मुश्किल यह है कि तसलीमा हमें अपनी बाकी कृतियों के मुकाबले सिर्फ “लज्जा” के लिए बहादुर लगती हैं। और “लज्जा” को सामने रख कर हुसैन से उनकी तुलना करेंगे तो एक तरह से कठमुल्लावाद के खिलाफ उनके साहस को बहुत छोटा करने की यह एक भद्दी कोशिश होगी। “लज्जा” बहुत सारे उन लोगों के लिए एक हथियार है, जो खुद स्त्रियों और समाज के वंचित तबकों के लिए आज तक अपराधी वर्ग के रूप में काम कर रहे हैं। बलात्कार, दहेज-हत्या से लेकर सती तक की परंपराएं या हर स्तर पर अपनी अस्मिता की हत्या के दौर से गुजरती स्त्री का दुख जिनके लिए “महान” परंपराएं हैं और कुछ “निर्वस्त्र” चित्र उनके लिए दुख के अंतिम विषय हैं। हर रोज दुनिया की सबसे वीभत्सतम जलालतें झेलते समाज के वंचित तबके जिनके लिए धर्म के गौरव हैं और “भारतमाता” का चित्र उनके लिए शर्म पैदा करता है।
हुसैन के देश छोड़ देने से पैदा हुई परेशानी से पहले हम शायद कभी परेशान नहीं होते जब सरकार के चालीस से साठ लाख रुपये डकार कर तैयार होने वाले हमारे डॉक्टर तुरंत आका अमेरिका का रुख कर लेते हैं। इस संदर्भ में दिलीप मंडल की इस टिप्पणी को सामने रखना जरूरी है –
भारत सरकार के पैसे से एम्स में पढ़कर डॉक्टर बने लगभग आधे प्रतिभाशाली, मेरिट से लबालब भरे छात्र विदेश चले गये। एम्स के पूर्व छात्रों की डायरेक्टरी आप भी देख सकते हैं कि वे किस देश की सेवा का मेवा खा रहे हैं। किसी को एतराज हुआ क्या? उनकी देशभक्ति क्यों असंदिग्ध है। वे तो आदरणीय पर्सन ऑफ इंडियन ओरिजिन है। अब तो उन्हें वोट देने के अधिकार की भी बात हो रही है। जबकि उन्होंने देश का पैसा और देश के संसाधन का दोहन किया और जो हुनर सीखा, उसका फायदा देश को रत्ती भर भी नहीं मिला। हुसैन ने कम से कम भारत का पैसा तो नहीं लूटा।
हुसैन निशाने पर इसलिए तो नहीं हैं कि उनका नाम हुसैन है और जिस देश ने उन्हें नागरिकता दी है, उसका नाम कतर है। अपने निजी स्वार्थ और फायदे के लिए विदेश भागो और यहां सीखा हुआ वहां लुटा दो, तो सम्माननीय पर्सन ऑफ इंडियन ओरिजिन और जान पर खतरे की वजह से या मुकदमे झेलने में नाकामी की वजह से विदेश भागो तो देश का द्रोही। आपको ऐसा नहीं लगता कि देशभक्ति और नैतिकता की परिभाषाएं सुविधा के हिसाब से बदली दी जाती हैं।
तो हुसैन या तसलीमा को उनकी मुस्लिम पहचान के रूप में नहीं, एक व्यवस्था-द्रोही प्रतीकों के रूप में देखा जाना चाहिए। दोनों ही बर्बर व्यवस्थाओं के प्रतिरोध के प्रतीक हैं। हुसैन से तसलीमा की तुलना इसीलिए होगी, तसलीमा चाहें या नहीं चाहें। वे अच्छी तरह से जानती हैं कि अगर उन्होंने स्वेच्छा से बांग्लादेश नहीं छोड़ा है, तो हुसैन ने भी कोई शौक से भारत से बाहर जाने का फैसला नहीं किया था। तसलीमा कठमुल्लापन के खिलाफ एक बहादुर प्रतिरोध और स्त्री अधिकारों की आवाज हैं, और इस रूप में उनका महत्त्व बना हुआ है।
और…
बिहार से होली की छुट्टी में चार दिनों के लिए दिल्ली आये एक दोस्त ने एक घटना का ब्योरा दिया, जो इस प्रकार है – बिहार के सिवान जिले में एक जगह एक दबंग सवर्ण जाति के बारात में नाच-गाने का कार्यक्रम चल रहा था। वहां पड़ी खाली कुर्सियों पर सबसे पीछे की कुर्सी पर एक छोटा बच्चा बैठ कर नाच-गाना देखने लगा। घर वाले एक व्यक्ति ने बच्चे से नाम पूछा। उसके नाम से पता चला कि वह एक दलित जाति का बच्चा था। पूछने वाले व्यक्ति ने सीधे रिवॉल्वर निकाला और उसके सीने में दाग दिया। कुर्सी पर बैठने के एवज उस दलित जाति के बच्चे अपनी जान गंवानी पड़ी।
इस तरह की स्थितियों पर शर्मिंदा होने के बजाय अगर हम हुसैन के कुछ चित्रों से दुखी और प्रताड़ित महसूस करते हैं, तो शायद हम इसी लायक हैं।
(3 मार्च, 2010 को मोहल्लालाइव पर)
Wednesday, 2 June 2010
हिंसा का दुश्चक्र और सत्ता का “नवउदारवादी” खेल

जनतांत्रिक सिद्धांतों की बुनियाद पर खड़ी कोई सत्ता अगर अपने तंत्र में जन की वाजिब भागीदारी तय नहीं कर पाती तो उससे उपजी विडंबनाओं का चुनौती के रूप में तब्दील हो जाना स्वाभाविक है। विचित्र यह है कि संघर्ष के ‘लोकप्रिय’ तरीकों का हश्र जानने के बावजूद सत्ता और उसके सामने चुनौती पेश करने वाले पक्ष, दोनों ही समस्या को समाधान की दिशा देने के बजाय फिल्मी अंदाज में जनता का दिल जीतने की कोशिश करते दिखाई देते हैं। कुछ समय पहले तक ‘आतंकवाद’ से लड़ती भारतीय राजसत्ता के सामने अब एकमात्र चुनौती ‘माओवाद’ बन चुका है और हिंसा का मसला अब सुविधा के अनुकूल समर्थन और विरोध का सवाल बन रहा है।
मौजूदा संदर्भों में प्रत्यक्ष या परोक्ष कम से कम तीन बिंदु ऐसे हैं जो भारत में इस नवउदारवादी पूंजीवाद के दौर में सत्ता के खेल और चरित्र को समझने में मदद करते हैं। पहला, भारतीय राजसत्ता लगभग ‘सभ्य’ दिखने की कोशिश करती हुई यह कह रही है कि माओवादी हिंसा का रास्ता छोड़ें, तभी उनसे बातचीत होगी। दूसरा, मणिपुर में आर्म्स एक्ट को खत्म करने की मांग के साथ इरोम शर्मिला की भूख हड़ताल दसवें साल में प्रवेश कर चुकी है। और तीसरा, न्याय की मांग का समर्थन करने वाले, माओवादियों को एक पक्ष मानने और उनके साथ राजनीतिक और विचारधारात्मक स्तर पर निपटने की बात करने वाले तमाम लोग या पक्ष सरकार की निगाह में संदिग्ध हैं।
गौर से इन तीन स्थितियों का ही विश्लेषण करने पर कई परतें खुल कर सामने आ जाती हैं कि भारतीय राजसत्ता और उसके संचालक वर्ग का मकसद क्या है और उसे पूरा करने के लिए वे किस हद तक जा सकते हैं। बातचीत के लिए एक शर्त के तौर पर माओवादियों से हिंसा का रास्ता छोड़ने की मांग करने वाली हमारी ‘सभ्य’ सरकार को इरोम शर्मिला की मांग माने जाने लायक नहीं लगतीं तो इसके क्या निहितार्थ हो सकते हैं? यहां मनोरमा बलात्कार कांड और उसके बाद किसी भी सभ्यता को शर्मिंदा कर देने वाले उस सबसे त्रासद आर्तनाद को याद किया जा सकता है, जिसमें महिलाओं ने निर्वस्त्र होकर सत्ता-व्यवस्था को ललकारा था। लेकिन जब उसका कोई असर सत्ता पर नहीं हुआ, तो इरोम की भूख हड़ताल क्या असर डालेगा!
इरोम शर्मिला ने अपनी मांगों के पक्ष में आंदोलन का जो रास्ता अख्तियार किया है, क्या उससे भी चरम अहिंसक रास्ता कोई और हो सकता है? लेकिन हिंसा को सारी समस्याओं का हल और एकमात्र वैकल्पिक रास्ता मानने वाले माओवादियों के साथ-साथ अगर इरोम शर्मिला का रास्ता भी अपने दसवें साल के सफर के बावजूद सरकार के कानों पर कोई असर नहीं डाल पाता, तो अब इस पर न केवल सोचने, बल्कि पूछने की जरूरत है कि आखिर आपकी मंशा क्या है।
ऐसा लगता है कि न्याय की परिभाषा तय करने का अधिकार शायद इन तीनों प्रत्यक्ष पक्षों- यानी सरकार, इरोम शर्मिला और माओवादियों के हाथ से निकल चुका है। घोषित तौर पर लोकतंत्र को अपने शासन का आधार मानने वाली सरकार के एजेंडे में ‘लोक’ की जगह अब क्या है, या उसके लिए ‘लोक’ अब कौन हो गया है, यह धीरे-धीरे साफ होने लगा है। दरअसल, शासन की निगाह में कॉरपोरेटों ने अब ‘लोक’ का रूप ग्रहण कर लिया है और विकास के तर्क पर उनका हित ‘न्याय’ की एकमात्र कसौटी है। ‘विकास आया-विकास आया’ का शोर किस तरह वीभत्सतम हकीकतों को दफन करने का हथियार बन चुका है, इसका सबसे बड़ा उदाहरण उस समय देखने में आया जब पूरी बेहयाई के साथ ‘इंडिया-इंक’ यानी भारतीय उद्योगपतियों का एक समूह नरेंद्र मोदी को देश का भावी प्रधानमंत्री घोषित कर रहा था! हमारे इंडिया-इंक के लिए गुजरात दंगों में मारे गए लोगों की यही कीमत है।
इसलिए नवउदारवादी पूंजीवाद के वाहकों से यह उम्मीद लगाना ही शायद बेमानी है कि वे न्याय की किसी उस अवधारणा के जमीन पर उतरने में मददगार होंगे जिससे सत्ता में उनका हिस्सा थोड़ा कम होता हो या उस वर्ग की भागीदारी सुनिश्चित होती हो जिस पर शासन ही उनकी सत्ता का आधार है। लेकिन विडंबना यह है कि जनतांत्रिक सिद्धांतों के साथ संसदीय राजनीति करने का दावा करने वाले दल भी सत्ता पाने की हड़बड़ी में अक्सर अराजक तत्त्वों का सहारा लेने की हद तक जाते दिखते हैं। पश्चिम बंगाल का उदाहरण इस संदर्भ को समझने के लिए काफी है कि किस तरह माओवादी उग्रवादियों के साथ अनैतिक गठबंधन करके एक खास राजनीतिक दल ने अपनी मौकापरस्ती और सत्ता के लिए तो किसी भी हद तक जाने का सबूत दिया ही, माओवादी उग्रवादियों को भी एक आसानी से इस्तेमाल हो जाने वाले औजार के रूप में पहचान दे दी।
मगर क्या यह हड़बड़ी केवल मुख्यधारा के कुछ राजनीतिक दलों की सीमा है? वे कौन-सी वजहें रही होंगी जिसने भाकपा (माओवादी) के सामने भरोसे का संकट खड़ा किया होगा? हाल ही में पुलिस के हाथों पकड़े गए माओवादी विचारक कोबाद गांधी ने कहा कि लगातार अत्यधिक हिंसा ने हमारे सबसे मजबूत गढ़ आंध्र प्रदेश में हमारी जमीन कमजोर कर दी। कोबाद गांधी की इस स्वीकारोक्ति में संघर्ष के लिए सिर्फ हिंसा का रास्ता और उसकी परिणति को लेकर क्या कोई संदेश निहित है? सवाल है कि सेना तक को ललकारने वाले माओवादी कम से कम अपने प्रभाव वाले इलाकों में अपनी ताकत का इस्तेमाल उन सरकारी बाबुओं और अफसरों को मजबूर कर विकास सुनिश्चित कराने में क्यों नहीं करते, जो बिना घूस लिए मृत्यु प्रमाण पत्र तक नहीं बनाते हैं?
यहां एक ओर वह पक्ष है जो शायद जानबूझ कर इस हकीकत से मुंह चुरा रहा है कि राजसत्ता के पास ‘लोकतंत्र’ की दुहाई है, कानून-व्यवस्था का तर्क है और कोबरा से लेकर सेना तक एक ऐसी सुरक्षा पंक्ति है, जिसका सिरा शायद दुनिया की ‘सबसे बड़ी ताकत’ से जुड़ता है। और दूसरी ओर विकास का ठेका उठाने वाली वे सरकारें हैं, जिन्हें कारणों पर गौर करने या अवधारणाओं में फर्क करने की जरूरत महसूस नहीं होती। उसकी निगाह में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर, मुंबई या पेशावर के चिथड़े उड़ा देने वाले लोगों के बरक्स सत्ता के अत्याचारों के नतीजे में माओवादियों की शरण में गए दलित-आदिवासी बराबर के आतंकवादी हैं!
कमजोर तो यों भी महज मोहरे होते हैं। उन्हें यह समझाना आसान होता है कि इंदिरा आवास और सौ दिन का रोजगार काफी है भारत देश का नागरिक होने पर गर्व करने के लिए। उन्हें राजसत्ता की ‘विकास नीति’ के खिलाफ लोकतांत्रिक संघर्ष के लिए लामबंद करने के बजाए जंगल से लकड़ी काट कर बाजार में बेच कर गुजारा करने, स्कूल का मुंह नहीं देखने, घास-फूस के घर में रहने, बीमार पड़ने पर ओझाओं की शरण लेने और ‘डायनों’ को खोज कर मैला पिलाने, उन पर जुल्म ढाने या मार डालने जैसी परंपराओं को संस्कृति रक्षा के नाम पर बचाए रखने के लिए ‘आंदोलित’ करना भी आसान है। उन्हें यह समझाना भी आसान है कि तीर-धनुष काफी हैं एके-47 से लेकर तोपों-टैंकों तक से मुकाबले के लिए!
भाकपा (माओवादी) या उसके सहयोगी संगठनों का सबसे आखिरी चक्र एक ऐसे सुगठित तंत्र के भीतर रहता है कि वह ‘अपने लिए’ बिना कोई नुकसान उठाए राज्य से ‘टक्कर’ लेगा और नायक भी बना रहेगा। दूसरी ओर, राज्य है, जो ‘वैध’ तरीके से खुल्लमखुल्ला या फिर ‘रणनीतिक’ तौर पर हर जरूरी कदम उठाते हुए गुरिल्ला लड़ाकुओं का सामना करेगा। बीच में है ‘नागरिक’, जिसके पास न तो छापामार युद्ध की ट्रेनिंग है कि वह राज्य पर हमले के तुरंत बाद जंगलों में गुम हो जाए, और न राज्य का सामना करने की ताकत। मगर माओवादियों से लेकर उसकी सुरक्षा पंक्ति के रूप में काम करने वाले तमाम पक्षों के लिए भी वह एक सुविधाजनक मोहरा है और राज्य की बंदूकों के निशाने भी उसी पर टिके हैं।
इस ‘नागरिक’ की त्रासदी को सतह पर दिखते सवालों से समझना इसलिए मुश्किल है, क्योंकि यह सही है कि भूख, अपमान, अन्याय, उपेक्षाओं से त्रस्त और न्यूनतम मानव अधिकारों से वंचित किसी व्यक्ति के पास आखिर रास्ता क्या बचता है। लेकिन ‘मुक्ति’ के नाम पर चलाए जाने वाले अभियान के नाम पर जन अदालतों में किसी न किसी रूप में अपने ही वर्ग के ‘दुश्मनों’ का सफाया करना एक निर्मम सत्ता-व्यवस्था के बरक्स कौन-सा और कैसा विकल्प पेश करता है? राज्य तो एक तरह से ऐसी ‘उकसाने’ वाली घटनाओं के इंतजार में ही खड़ा होता है, ताकि कानून-व्यवस्था से लेकर सलवा-जुडूम तक के तर्क पेश कर दमन को सही ठहरा सके।
माओवादी और राज्य, दोनों ही क्या इस बात का हिसाब कभी लगाएंगे कि इस ‘संघर्ष’ में जिन लोगों की बलि चढ़ाई गई, वे कौन थे? समाज के सबसे कमजोर तबके के रूप में आदिवासी या दलित क्या सिर्फ इस्तेमाल होने या बलि का बकरा बनने के लिए पैदा होते हैं? कभी-कभार कुछ निचले दर्जे के पुलिस वालों की हत्या कर या किसी को अपनी पार्टी छोड़ने की सार्वजनिक घोषणा नहीं करने पर गला रेत कर मार डालने को ‘क्रांति’ घोषित करने वाले माओवादी क्या इस बात से अनजान होते हैं कि उनकी इस तरह की हर ‘बहादुरी’ के बाद राज्य और कितना बर्बर हो जाता है? और कि राज्य के अत्याचारों का शिकार उनके छापामार दस्ते के प्रशिक्षित गुरिल्ला नहीं होते, बल्कि वे निरीह आदिवासी या दलित होते हैं जिन्होंने खुद को बचाने का कोई ‘कारगर तरीका’ अब तक नहीं सीखा है। यानी व्यवस्था या सपना चाहे कोई भी हो, उसकी कीमत समाज के सबसे कमजोर तबकों को ही चुकाना है।
एक तरफ अन्याय और दमन की राजनीति और दूसरी तरफ इसके विरोध में मकसद को बेमानी बना देने वाली हिंसा की जटिल स्थितियों के बावजूद जनतंत्र के तकाजों का सवाल उठाने वालों को भी अगर भारतीय राजसत्ता संदेह के कठघरे में खड़ा करना चाहती है तो इसका मतलब समझने में बहुत मुश्किल नहीं होनी चाहिए। दरअसल, राजनीतिक और विचारधारात्मक लड़ाई की वकालत करने वाले पक्ष माओवादियों को किसी न किसी स्तर पर एक पक्ष के रूप में स्वीकार कर रहे हैं और इस तरह की स्वीकृति आखिरकार नवउदारवादी पूंजीवाद के पैरोकारों, कॉरपोरेटों और उनकी उंगलियों पर नाच रहे लोगों को एक असहज स्थिति में ला खड़ा करेगा।
और भारतीय राजसत्ता फिलहाल जिनके हाथों का खिलौना बनी हुई है, वे देश भर में एक ‘सुविधाजनक’ और ‘सुरक्षित’ हालात चाहते हैं। एक ऐसा सत्ता-तंत्र, जो मौजूदा सामाजिक सत्ता-व्यवस्था का आधुनिक और उदार दिखने वाला चोला हो। आज कॉरपोरेटों की सरकार ‘विकास’ की जिस अवधारणा पर काम कर रही है उसके लिए मुफ्त की आबो-हवा, सस्ती जमीन और सस्ते संसाधन चाहिए। और वे सस्ते मजदूर चाहिए, जिनके लिए श्रम की न्यूनतम मानवीय परिस्थितियां मुहैया कराना जरूरी नहीं होता, किसी भी तरह के श्रम कानूनों के पालन की जरूरत नहीं होती और न वाजिब मजदूरी जैसे कोई सवाल मायने रखते हैं। इसलिए माओवाद के बहाने हिंसा के तर्क को हावी करने और उन तमाम लोगों और पक्षों को संदेह के घेरे में लपेटने की कोशिश हो रही है जो कॉरपोरटों या बहुराष्ट्रीय कंपनियों के पूंजीवादी विकास के बरक्स हक या अधिकार जैसी कोई बाधा सामने रख दे। (यह आलेख जनसत्ता की प्रॉपर्टी है)
(8 दिसंबर 2009 को जनसत्ता में)
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