Saturday, 24 April 2010

बदलते बिहार का वितंडा...

सत्ता सामाजिक बदलाव का एक औजार जरूर है, लेकिन क्या यह व्यक्तियों को सत्ता में बदल देने का भी औजार है? इसे हमारे देश के तमाम राजनेताओं ने साबित किया है कि सत्ता तंत्र की लगाम हाथ लगते ही उनकी दिशा अपने स्वार्थों और नफे-नुकसान के हिसाब से तय होने लगती है। सत्ता की लगाम हाथ में आने के बाद नीतीश सरकार के पिछले लगभग चार साल में सामाजिक विकास या शैक्षिक सुधार के सवाल पर बने तमाम आयोगों का जिस तरह इस्तेमाल हुआ या उनका जो हश्र हुआ, उसे देखते हुए भूमि सुधार आयोग की सिफारिशों के खारिज किए जाने पर किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। सत्ता में आते ही अमीरदास आयोग को भंग करने के बाद यह दूसरी बार है, जिसकी मार्फत नीतीश कुमार ने खुले तौर पर यह बताने की कोशिश की है कि उनकी सामाजिक-विकास दृष्टि और राजनीति असल में क्या है।

दरअसल, बिहार में मीडिया का जो सामाजिक और वर्गीय चरित्र रहा है, उसमें पिछले तीन-चार साल में सत्ता के मीडिया प्रबंधन का दौर उसके लिए शायद बिन मांगी मुराद जैसा रहा है। नीतीश कुमार ने ‘बदल गया बिहार’ के सुर वाले नारे को ‘सूचना’ के रूप में पेश किया और महज सूचक बन कर समूचे मीडिया जगत ने इसे देश-समाज के सामने परोस दिया। कुछ ही समय पहले राज्य में हुए विधानसभा के उपचुनाव भी इसी ‘बदल गया बिहार’ की शोर के बीच लड़े गए थे। लोकसभा चुनावों के नतीजों से अति उत्साह में आए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इन उपचुनावों को जिस तरह अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों का सेमीफाइनल घोषित कर दिया था, उसने स्वाभाविक रूप से इस बात के विश्लेषण का मौका दिया कि महज तीन महीने में मतदाता का मन-मिजाज क्यों बदला।


विकास वोट के लिए कोई मुद्दा नहीं है- यह वह शिगूफा है, जो शायद कभी लालू प्रसाद की जुबान से फिसला था। तो बिहार में मौजूदा विकास-राग के दौर में क्या लालू प्रसाद के उस जुमले को अपने असर से साथ लौटने में महज तीन महीने लगे? क्या कारण रहा कि ‘शाइनिंग इंडिया’ और ‘फील गुड’ की तर्ज पर ‘बदल गया बिहार’ का प्रचार विधानसभा के उपचुनावों में कारगर नहीं रहा? कुछ विश्लेषकों की निगाह में भूमि सुधार आयोग की रिपोर्ट और उसे लागू करने के अफवाह ने मतदाताओं को नीतीश सरकार से डरा दिया कि वह जमीन पर अब जोतदारों को हक देने जा रही है! इस निष्कर्ष को सामने रखने वाले लोग दरअसल भूमि सुधार पर बंदोपाध्याय समिति की रिपोर्ट पर अमल करने की सलाह देने के बजाय नीतीश सरकार को यह बताना चाहते थे कि अगर राज्य के भूपतियों यानी जमींदारों को छेड़ा गया तो उसके नतीजे ऐसे ही होंगे।

हालांकि भाजपा के सहारे सत्ता को ढोती नीतीश कुमार की सरकार से इससे इतर किसी सामाजिक विकास-नीति की उम्मीद भी बेमानी है। लेकिन जब प्रतीक-स्वरूप भी आपके सामने कुछ होता है तो उम्मीद पाल लेना मुगालता भले हो, स्वाभाविक है। संयोग से मिली सत्ता को कायम रखने के लिए लालू प्रसाद ने जिस सामाजिक फार्मूले का ईजाद किया था, नीतीश कुमार के सामने बिना भाजपा के सहारे के कोई नया फार्मूला तैयार करने का विकल्प नहीं था।

लेकिन सामाजिक समीकरणों से सत्ता को साधने की कोशिश न केवल कोई स्थायी नतीजे नहीं दे सकती, बल्कि एक ऐसी राजनीतिक दिशा का निर्माण करती है जिसमें राज ज्यादा होता है और नीति कम। आजादी के बावजूद एक ढांचे के तौर पर सामाजिक सामंतवाद ने हमारे देश में लगातार अपना दबाव बनाए रखा है। बिहार में लालू-युग को हम उस ढांचे को तोड़ने, या फिर कुछ सामाजिक वर्गों की उसमें घुसपैठ करने के रूप में देख सकते हैं। इसी दौर में देश में नवउदारवादी पूंजीवाद के उभार की पृष्ठभूमि में बिहार में पूंजीवादी सामंतवाद की भी स्थितियां पैदा हुईं। नीतीश कुमार के लिए यह एक मौका था। लेकिन उन्होंने सामाजिक सामंतवाद के घोड़े का सवार बनना ज्यादा पसंद किया।

अमीरदास आयोग या बदोपाध्याय समिति की सिफारिशों का हश्र तो महज कुछ नमूने हैं। भौतिक विकास के पर्याय के रूप में सड़क, अपराध-भ्रष्टाचार से मुक्ति, सामाजिक विकास के लिए अति पिछड़ों और महादलितों के लिए विशेष घोषणाएं और परिवारवाद से कथित ‘लड़ाई’- ये ऐसे मुद्दे रहे हैं, जो पिछले तीन-चार साल से कुछ लोगों को रिझाते रहे है। मगर थोड़ा करीब जाते ही यह साफ हो जाता है कि इन कुछ प्रचार-सूत्रों को किस तरह हकीकतों को ढांकने या उन्हें दफन कर देने का औजार बनाया गया है! इसी दौर में एक और महत्त्वपूर्ण ‘मिशन’ जारी है, जिसमें सामाजिक यथास्थितिवाद पर हमला करने वाले किसी भी सोच को बड़े करीने से किनारे लगाया जा रहा है।

करीब दो महीने पहले पटना में ‘बिहार की ब्रांडिंग में मीडिया की भूमिका’ विषय पर गोष्ठी हुई थी। यह प्रसंग दिलचस्प इसलिए है कि क्या मीडिया का काम किसी राज्य की ‘ब्रांडिंग’ करना है, या फिर उसकी प्राथमिकताओं में ‘जनता’ की जगह ‘राज्य’ ऊपर आ गया है। यों बिहार में नीतीश सरकार के सत्ता संभालने और ‘तीन महीने में सब कुछ ठीक कर देने’ की मुनादी के कुछ ही समय बाद से मीडिया को सब कुछ ‘गुडी-गुडी’ दिखाई देने लगा था। तो क्या यह सचमुच सब कुछ ठीक हो जाने का संकेत था, या खुली आंखों पर एक ऐसा चश्मा चढ़ जाना था जिसके पार वही दिखाई देता है जो हम देखना चाहते हैं?

‘अपराधियों के आतंक से मुक्त बिहार’ के प्रचार में मशगूल मीडिया के लिए खुद बिहार सरकार की ओर से विधानसभा में पेश आंकड़े अगर कोई मायने नहीं रखते तो इसके कारण समझना बहुत मुश्किल नहीं है। विपक्ष की ओर से घेरे जाने के बाद बाकायदा विधानसभा में अपराध के आंकड़े सामने रखते हुए सरकार ने कहा कि अकेले 2008 में केवल महिलाओं के खिलाफ होने वाले अत्याचार के 4,415 मामले दर्ज किए गए, जिनमें 1,028 मामले बलात्कार और दुष्कर्म के और 902 मामले महिलाओं और लड़कियों के अपहरण के थे। इसके अलावा पिछले छह महीने में 1,571 हत्याएं, 37 फिरौती वसूलने, 346 डकैती, राहजनी की 80, लूट की 395 और बैंक लूट की एक घटना थाने में दर्ज की गयी।

ये सरकारी आंकड़े हैं। सबको मालूम है कि अत्याचार के कौन-कौन से रूप हमारे बीच मौजूद हैं और जितने होते हैं, उनमें कितने मामले पुलिस थानों में दर्ज कराये जाते हैं। बहरहाल, एक विधायक का कहना था कि सरकार कहती है कि बैंक लूट की केवल एक घटना हुई, जबकि सच्चाई यह है कि इस दौरान बैंक लूट की चौरासी वारदातें हुई। इसके सबूत हैं। यों हाल में खगड़िया जनसंहार का उदाहरण इस तरह के प्रचार की सच्चाई का अंदाजा लगाने के लिए काफी है कि ‘बिहार में आज अपराधी घबराता है कोई हरकत करने से।’ जहां तक ‘बड़े अपराधियों’ को काबू में करने का सवाल है, मामला सिर्फ ‘अपने’ और ‘दूसरों’ के पक्ष का है।

इसके उलट यह जरूर हुआ है कि पिछले तीन-चार सालों में बिहार में अपनी मांगों को लेकर आंदोलन करने वाले किसी भी वर्ग या समूह की शामत आ गयी है। विरोध प्रदर्शनों को लाठियों, पानी के फव्वारों या गोली के सहारे कुचल देना नीतीश सरकार की खासियत बन चुकी है। उसकी पुलिस शिक्षकों से लेकर ‘आशा’ की महिला कार्यकर्ताओं तक पर पूरी क्षमता से लाठियां बरसाती है। लेकिन यह सुशासनी लाठी ‘विकास’ की नयी ऊंचाइयों की ओर अग्रसर भ्रष्टाचार के खिलाफ नहीं चलती। तमाम दावों के उलट व्यवहार में भ्रष्टाचार की कितनी नयी परतें तैयार हुई हैं, इस सच का अंदाजा पंचायत से लेकर प्रखंड और जिलास्तरीय सरकारी कार्यालयों और पुलिस थानों की गतिविधियों को देख कर ही लगाया जा सकता है। स्कूलों से लेकर आंगनवाड़ी केंद्रों तक का जिलाधिकारी या वरिष्ठ अधिकारियों के औचक निरीक्षण का मतलब कितना ड्यूटी सुनिश्चित करना है और कितना कमाई करना, इसे नजदीक से देखे बिना समझना मुश्किल है।

जब इस साल के सालाना बजट में राज्य में सड़क निर्माण के मद में तीस फीसद रकम निर्धारित की गयी, तो बहुतों के लिए यह विकास के प्रति नीतीश सरकार के समर्पण से कम नहीं था। विकास के लिए बुनियादी ढांचे के रूप में अच्छी सड़कों का होना अनिवार्य है। लेकिन ‘विकास दिखाई दे’- इसके लिए भी सड़कों का होना जरूरी होता है। और यह भी कोई छिपी बात नहीं है कि सड़क निर्माण उन कामों में शायद अव्वल है, जिसमें सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार होता है। तो कुल बजट का तीस फीसद सड़कों को समर्पित किए जाने का मतलब समझना कोई मुश्किल काम नहीं है।

यों भी, अगर सरकार सड़कें बनवाने पर खासा जोर दे रही है तो यह राज्य के नागरिकों पर मेहरबानी किस तरह है? दूसरे, राज्य उच्च पथों जैसे राज्य के अधीन कुछ को छोड़ कर बाकी सड़कों के मामले में राज्य सरकार की भूमिका महज कार्य कराने तक सीमित है। जबकि राष्ट्रीय उच्च पथों और ग्रामीण इलाकों की सड़कों के निर्माण और विकास के लिए केंद्र सरकार सीधे तौर पर वित्तीय सहायता देती है। इसके अलावा घोषित और प्रचारित दावों के विपरीत राज्य में काफी कम सड़कें बनी हैं, और जो बनी भी हैं उनके बारे में खुद सरकार को यह स्वीकार करना पड़ा कि राज्य में बनाई गयी सड़कों की गुणवत्ता काफी घटिया स्तर की है। ज्यादातर सड़कों पर कोलतार की पतली परत चढ़ा कर देखने में सुहाने लायक बना दिया गया, जिसकी उम्र दो से चार महीने से ज्यादा की नहीं होती। इसी बार की बरसात गुजरने के बाद बहुत सारी सड़कों की दशा देखी जा सकती है।

परिवारवाद के ‘सिंड्रोम’ से नीतीश के बचे होने के वितंडे के बीच इस प्रहसन की खबर पर गौर करना रोचक होगा कि केंद्र सरकार की राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के तहत बिहार में लोगों को जो जॉब कार्ड बांटे जा रहे हैं, उन पर नीतीश कुमार की फोटो छापी गयी है। यों जिस ‘मित्र’ भाजपा की लाठी के सहारे नीतीश सत्ता में हैं, उसी के उनके ‘मित्र’ नेता नरेंद्र मोदी भी परिवारवाद से बचे हुए हैं। भाजपा और आरएसएस भी परिवारवाद के विरोधी सिद्धांतों पर चलता है।

परिवारवाद का समर्थन करना एक लोकतंत्र के रास्ते में बाधा खड़ी करना है। लेकिन यहीं यह देखना भी जरूरी है कि किसी व्यक्ति की राजनीति देश और समाज को किस दिशा में ले जा रही है। लोहिया और जेपी के सपनों की जमीन पर खड़े होकर भाजपा के सहारे गद्दी पर बैठे ये वही नीतीश कुमार हैं जिन्हें दिल्ली में मंत्री या बिहार में मुख्यमंत्री बनने के लिए बाबरी मस्जिद ढहाने का ‘शौर्य’ ढोती भाजपा का हाथ थामने में कोई दिक्कत नहीं महसूस हुई। तब भी, जब ‘गुजरात-2002’ के दंगों का अध्याय उसके साथ जुड़ गया। यह अनायास नहीं है कि परिवारवाद से बचे हुए एक और ‘विकास पुरुष’ नरेंद्र मोदी इस देश के ‘दूसरे विकास पुरुष’ नीतीश कुमार की पीठ थपथपाते हैं।

इतिहास के कुछ पन्नों को शायद इसलिए नहीं भूला जा सकता क्योंकि न्याय सुनिश्चित होने तक उसे भूलना भी नहीं चाहिए। राजनीति की अपनी मजबूरियां हो सकती हैं। लेकिन सवाल है कि इसकी कीमत क्या हो। प्रचार की सड़क पर सरपट दौड़ते नीतीश कुमार ने सुशासन बाबू का तमगा तो लटका लिया है, लेकिन आरएसएस और भाजपा के सहारे राजनीति की जमीन तलाशती उनकी सरकार ने समाज को बदल सकने वाले सोच को हर स्तर पर कुंठित किया है। यह ध्यान रखना चाहिए कि समाज को बदलने के लिए सड़कों के मुकाबले सोच की जरूरत ज्यादा होती है।
(जनसत्ता, 29 अक्‍टूबर 2009 से साभार)

सलवा जुडूम जिंदाबाद! बाल्को (कांड) जिंदाबाद!

उन्हें बहुत पीड़ा हो रही है कि एक अदने-से पुलिस अफसर को छुड़ाने के लिए बड़ी मुश्किल से हाथ आये तेईस ‘आतंकवादियों’ को क्यों छोड़ दिया गया? हां, कुछ फैशनपरस्त लोगों की निगाह में अभावों में जीते-मरते और सड़कें खोद कर यह मान लेने के लिए शिक्षित या बाध्य किये गये लोग ‘आतंकवादी’ हैं कि अब पुलिस इस तोड़ या खोद दी गयी सड़क को नहीं पार कर सकती। खैर, पुलिस तो हर हाल में सड़क पार करती है और वही करती है, जो उसे करना है। एक और खैर इसलिए कि हमारी सरकार से पहले सरकार चलाने वाले बहुत सारे लोगों ने मान लिया था कि माओवादी इस देश के सबसे बड़े दुश्मन हैं। हालांकि जब सरकार चलाने वालों ने मान लिया था तो सरकार का यह मानना तो लाजिमी है।

वे इस बात से बहुत परेशान और दरअसल बेचैन हो गये हैं कि अगवा किये गये एक दो कौड़ी के अफसर के लिए ‘आतंकवादी’ बन गये दो कौड़ी के करीब-करीब दो दर्जन लोगों को क्यों छोड़ दिया गया (क्या वे भयोन्माद में चले गये हैं, या यह नफरत और हिकारत का उन्माद है?)। हालांकि उनका यह विलाप सही भी है कि यों भी इन लोगों का जीना क्या जीना! मर जाएं तो ज्यादा बेहतर! जीना तो सिर्फ उनका ज़रूरी होता है, जिनकी जान की कोई ऊंची कीमत होती है। यह कीमत पैदाइशी हो सकती है, विरासती हो सकती है और नफासती भी हो सकती है।

अगवा करके कंधार ले जाये गये लोग इसी कैटेगरी के थे। तत्कालीन प्रधानमंत्री के घरों की खिड़कियां तोड़ देने की घटना याद है किसी को? तब मसूद अजहर या उसके साथियों से देश के सामने खड़ा ‘ख़तरा मिट चुका था’ और अगवा कर कंधार ले जाये गये लोगों का बचना ‘देशहित में ज़रूरी था।’ उनके लिए मसूद अजहर को अगर छोड़ा गया, तो इस मानव समाज पर कितना बड़ा एहसान किया गया! वहां मसूद अजहर और उसके साथी तो कीमती थे ही, उन लोगों की जान ज़्यादा कीमती थी, जिन्हें बचा लिया गया।


उस वक्त सरकार ने इस दुनिया पर कितनी मेहरबानी की थी, यह दो कौड़ी के किसी शख्स को छुड़ाने के लिए दो कौड़ी के तेईस लोगों को छोड़ देने वाले लोग क्या समझेंगे। क्या फर्क पड़ता? अतींद्रनाथ दत्त हवा में उड़ान भरने वाला कोई आईएएस रैंक का या शीर्ष पुलिस अधिकारी तो था नहीं कि राज्य की ताक़त में कोई कमी आ जाती! (झारखंड में इंदीवर नाम के पुलिस वाले की गर्दन रेत दी गयी तो किसको क्या फर्क पड़ा। वह तो ‘शहादत’ थी। शहीद वे नहीं होते जिनकी जान की कीमत ऊंची होती है)। और न इन तेईस लोगों को फांसी पर लटका देने से दुनिया में कोई भूचाल आ जाता। (यों भी, सुना है कि फांसी में लगभग सौ प्रतिशत आरक्षण है।)

इससे क्या होता है कि इनमें ज्यादातर को महज सड़क खोदने, तोड़ने या रास्ता बाधित करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था, इन पर मामूली धाराएं लगी थीं, और कि इन्हें जमानत पर छोड़ा गया। इस पर भी गौर करने की क्या ज़रूरत है कि ‘युद्ध’ के दौरान अपने जिन छापामार या गुरिल्ला लड़ाकुओं के ढाल के तौर पर वे इस्तेमाल होते रहते हैं, उनके पास अचानक ‘गायब’ हो जाने की ट्रेनिंग होती है, और ये तो पहले ही दुनिया की तमाम तकलीफें झेलने के लिए पैदा हुए होते हैं। सामाजिक सत्ता की बर्बरताओं और अत्याचारों से लेकर राजनीतिक सत्ता तक के जुल्मों को झेलने को अभिशप्त…! और उसके बाद इस्तेमाल होने की नियति…! अपने ‘उद्धारकों’ की ढाल बने अगर पुलिस की गोलियों से बच गये, तो अदालतों में सजाए-मौत का इंतज़ाम किया जाए इनके लिए…! तब जाकर छाती ठंडी होगी हमारी…!

पश्‍िचम बंगाल सरकार ने तो पहले ही ‘अपराध’ किया था कि इन ‘आतंकवादियों’ पर पोटा (माफ कीजिएगा, यूपीए अभी ज़ुबान पर चढ़ा नहीं और और यूएपीए बोलते हुए ज़ुबान फिसल जाती है) नहीं लगाया था। टाडा से लेकर पोटा और यूपीए (फिर यूएपीए को यूपीए कह गया) – सब का गोदना (गोदना समझने में दिक्कत होगी, टैटू याद रहेगा) कपार पर गुदवा देना चाहिए था। आखिर छत्तीसगढ़ की सलवा जुडूमी सरकार ‘आतंकवादियों’ के सफाये का गौरव हासिल करने की ओर बढ़ ही रही है। शायद इस उपलब्धि के लिए इस सलवा जुडूमी सरकार को हमारे देश की यूएपीए सरकार (फिर कन्फ्यूजन!) राष्ट्रीय सुरक्षा के सर्वोच्च पुरस्कार से भी नवाजे।

बहरहाल, माओवादियों को आतंकवादी मानने से इनकार करने वाले और उनके साथ राजनीतिक तरीके से निपटने की वकालत करने वाले लोग तो अपराधी होंगे ही! ये इसलिए ज़्यादा बड़े अपराधी होंगे क्योंकि दो कौड़ी के ‘आतंकवादियों’ को इन लोगों ने उनके बराबर करके तोल दिया, जिनके बिना यह देश और संसार ज़‍िंदा नहीं रह सकता था।

माओवादियों को आतंकवादी मानने से इनकार करने वाले और उनके साथ आदर्शों की लड़ाई लड़ने या उनसे राजनीतिक स्तर पर निपटने वालों को अपराधी साबित किया जाना इसलिए ज़रूरी है क्योंकि जंगल और जंगल की संपत्ति पर कब्जा करने के लिए छत्तीसगढ़ की सलवा जुडूमी सरकार की स्वीकार्यता के लिए अनुकूल हालात पैदा किये जा सकें। बुद्धदेव भट्टाचार्य की तुलना बार-बार नरेंद्र मोदी से किया जाना इसलिए ज़रूरी है क्योंकि नरेंद्र मोदी की स्वीकार्यता के लिए आदर्श हालात पैदा किये जा सकें।

किसी के लिए यह देखना ज़रूरी नहीं होना चाहिए कि पश्चिम बंगाल और छत्तीसगढ़ या आंध्र प्रदेश में इस लड़ाई की प्रकृति में क्या फर्क है। एक तरफ एक मामूली अफसर के लिए बहुत मामूली लोगों को छोड़ने की ‘मूर्खताएं’ और दूसरी ओर, मामूली लोगों के खिलाफ मामूली लोगों की फौज खड़ी कर दी जाती है। आंध्र प्रदेश में बाकी सभी तरह की हवाओं पर ‘लोकतंत्र’ की हवा आच्छादित हो चुकी है।

शांत रहिए। देखते नहीं कि नागरिक अपनी ‘सुरक्षा’ खुद कर रहे हैं! पद- विशेष सुरक्षा अधिकारी…। तनख्वाह – बारह सौ रुपये प्रति माह…। कंधे पर शायद एक बंदूक…। दो कौड़ी के सारे लोगों को एक दूसरे के खिलाफ युद्ध में लगा दो। जो मरेंगे, सो मरेंगे। जो बचेंगे, वे? बहुत सारी कंपनियां आएंगी, बारह सौ रुपये महीना पगार देने वाली..।

सलवा जुडूम जिंदाबाद…!!! वेदांता टू बाल्को (कांड) जिंदाबाद…!!!

जहां चार दर्जन मामूली लोगों की मौत की जवाबदेही किसी पर न आये, इसके इंतज़ाम किये जाते हैं, वहां एक मामूली शख्स की वापसी के लिए दो दर्जन मामूली लोगों को छोड़ देंगे आप! पॉलिटिकली और आइडियोलॉजिकली परास्त करने की बात करेंगे आप! उनकी चेतावनी पर गौर कीजिए। वे बहुत गुस्से में हैं और चाहते हैं कि पश्चिम बंगाल सरकार को इस ‘अपराध’ की सज़ा मिलनी चाहिए। अगर लड़ सकते हैं तो लड़िए, नहीं तो डरिए… क्या कहा…? फिर राजनीतिक और आइडियॉलॉजिकली…? चुप रहिए… आपकी ज़ुबान से मामूली लोगों की आवाज़ फूटने का भरम होता है…

श्श्श्श्श्… श्श्श्श्श्… श्श्श्श्श्… शांति… बनाए रखिए…!

…सुना है शीर्षासन से शरीर का कायाकल्प हो जाता है! इसलिए बुद्धि के जीवी ममता की छांव में योगा कर रहे हैं…!

(28 अक्टूबर 2009 मोहल्लालाइव पर)

बंगाल में मौकापरस्ती का खेल बनी हुई है बुद्धिजीविता

पक्षधरता क्या इतनी निकृष्ट हो सकती है…?

कोलकाता में शोमा दास को रेप करा देने की धमकी पर बहस के दौरान कुछ लोगों का मानना था कि यह घटना एक गढ़ी हुई कहानी हो सकती है। कोई भी किसी महिला को इस तरह की धमकी नहीं दे सकता। युवा पत्रकार शोमा दास एक बजे रात को वहां अकेले क्या कर रही थी। शोमा दास पत्रकारिता की नयी पीढ़ी का प्रतिनिधित्व कर रही हैं (यह वाक्य एक खास लहजे में कही गयी)। शोमा दास चूंकि सीपीएम संचालित चैनल चौबीस घंटा में काम करती है इसलिए उससे सहानुभूति रखना गैरजरूरी है, वगैरह-वगैरह। ध्यान रखिए कि इस तरह की सारी बातें एक साथ की गईं। यह भी कहा गया कि इस घटना को सामने रखने के पीछे पुण्य प्रसून वाजपेयी का निजी आग्रह है। एकाध सीधे कोलकाता से लिखने वाले की बात को अंतिम सत्य की तरह पेश किया गया।

हालांकि पुण्य प्रसून वाजपेयी के साथ या उनसे पहले ही ‘द हूट’ पर अजिता मेनन ने साफ लिखा कि बंगाल फिलहाल किस तरह के त्रासद ध्रुवीकरण से गुजर रहा है कि अगर एक पत्रकार को किसी खेमे की पहचान मिली हुई है, तो उसे किसी खास मौके की रिपोर्टिंग करने से रोका जा सकता है, अपमानित किया जा सकता है, सबसे गलीज़ धमकी दी जा सकती है, हत्या की कोशिश या साजिश के मुकदमे में फंसा दिया जा सकता है। अजिता मेनन ने शोमा दास के साथ हुए बर्ताव के बहाने घटना का ब्योरा ज्यादा विस्तार और वस्तुपरक तरीके से दिया है, जिसे पढ़ने के बाद किसी को भी विचलित होना चाहिए।

हो सकता है कि इसमें पहले की कुछ इस तरह की घटनाएं उभर कर सामने आएंगी, लेकिन बंगाल में खासतौर पर लोकसभा चुनावों के बाद जिस राजनीति ने जोर पकड़ा है, उसका असर साफ तौर पर सामान्य जन जीवन के साथ-साथ पत्रकारिता पर भी देखा जा सकता है। अपना और अपने ‘दुश्मन’ का पक्ष निर्धारित करने के बाद किसी नागरिक के साथ-साथ किसी पत्रकार के साथ भी अपना व्यवहार तय करना दरअसल बंगाल का नया फैशन बन रहा है।

शोमा दास को बलात्कार करा देने की धमकी के तथ्यगत रूप से भी सामने आ जाने के बावजूद अगर कुछ लोगों को इस पर विश्वास करने में परेशानी हो रही है, तो इसके कारण समझे जा सकते हैं। (किसी घटना का एक ही तरह का ब्योरा सभी स्रोतों से मिल रहा हो तो संदेह करने वालों को खुद पर संदेह करना चाहिए)। आज भी संघी जमात के पास गुजरात दंगों को सही ठहराने के तर्क मौजूद हैं और आपातकाल को सही ठहराने वाले लोग भी बहुत मिल जाएंगे। मामला यह लगता है कि सिर्फ वाम दलों का विरोध करने के नाम पर जिन लोगों ने ममता बनर्जी का पक्ष चुना है, उसे सही ठहराना भी उनका धर्म बन गया है। बुद्धिजीविता मौकापरस्ती का खेल बनी हुई है, जिसमें यह देखना जरूरी नहीं समझा जा रहा है कि उनका पक्ष भी उसी प्रवृत्ति का शिकार है, जिस प्रवृत्ति के विरोध में वे खड़े हुए थे। लेकिन अपने पक्ष की वही बीमारी उन्हें सही ठहराने लायक लगती है। क्या यह अभियान बुद्धदेव भट्टाचार्य को नरेंद्र मोदी के बराबर खड़ा करके नरेंद्र मोदी की स्वीकार्यता का रास्ता साफ करने की कोशिश भी है?

शनिवार, 17 अक्टूबर 2009 के ‘द हिंदू’ अखबार (ये खबरें दूसरी जगहों पर भी थी) में बंगाल से आकार-प्रकार में दो बड़ी खबरें छपी थीं कि कुछ तृणमूल सांसद मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य की गिरफ्तारी की मांग करते हुए उनके दफ्तर के बाहर धरने पर बैठ गए। दूसरी खबर में ममता बनर्जी मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य की गिरफ्तारी की मांग करते हुए बता रही थीं कि उन्हें शर्म आती है कि उन्होंने बंगाल में जन्म लिया। बहरहाल, आखिरी पन्नों की ओर बढ़ने पर एक छोटी खबर दिखाई पड़ी कि सीपीएम ने केंद्रीय चुनाव आयुक्त को एक पत्र लिखा है। उसमें तृणमूल सांसदों के खिलाफ कार्रवाई की मांग करते हुए यह शिकायत की गई है कि पश्चिम बंगाल के हुगली जिले में केंद्र सरकार में राज्यमंत्री मुकुल राय सहित तृणमूल कांग्रेस के सांसद शुभेंदु अधिकारी ने एक जनसभा में खुलेआम यह आह्वान किया कि सीपीआईएम के कुछ खास नेताओं का सिर काट कर सार्वजनिक जगहों पर प्रदर्शन के लिए रखा जाए। यही नहीं, दोनों तृणमूल सांसदों ने सार्वजनिक रूप से यह घोषणा की कि सीपीआईएम के नेताओं और उनके लोगों के परिवारों की महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार किया जाए और उनके घरों को जला दिया जाए।

शोमा दास को बलात्कार करा देने की धमकी की घटना कुछ लोगों को सिर्फ इसलिए संदेहास्पद लगती है क्योंकि वह जिस चैनल में नौकरी करती है, उस पर सीपीआईएम का होने का आरोप है। तृणमूल सांसदों के किसी सार्वजनिक सभा में किए गए ‘आह्वान’ को भी महज झूठा आरोप करार दिया जाएगा क्योंकि यह शिकायत सीपीएम ने की है। लेकिन लोकसभा चुनावों के बाद बंगाल में लगातार जो रहा है, उसकी खबरें इस तरह के संदेहों और आरोपों को मुंह चिढ़ा रही हैं।

और इस परिदृश्य में शोमा दास के साथ घटी घटना और हुगली का “आह्वान” कोई आश्चर्य नहीं पैदा करता। बल्कि एक ऐसी नई बनती हुई संस्कृति का संकेत देता है, जिसके सिर्फ एक कदम आगे की तस्वीर वीभत्सतम साबित होने वाली है।
(23 अक्टूबर, 2009 को मोहल्लालाइव पर)

दो पाटों की चक्की है, हमको इसमें पिसना है...!

कई लोगों को लगता है कि लालगढ़ में छत्रधर महतो को गिरफ्तार करने के लिए पश्चिम बंगाल की पुलिस ने जो तरीका आजमाया, वह समूची पत्रकार बिरादरी के साथ छल है और भविष्य में पत्रकारों का जीना तक मुहाल हो जाएगा। लेकिन इस संदर्भ में “मोहल्ला लाइव” का मानना है कि पश्चिम बंगाल की पुलिस ने अगर छत्रधर महतो को गिरफ्तार करने के लिए पत्रकार बनने का नाटक किया, तो यह कोई बड़े आश्चर्य की बात नहीं है। यह रुख कुछ लोगों को “मोहल्ला लाइव” के पुलिस के एक पक्षकार के रूप में खड़े होने जैसा दिखता है। मोटे तौर पर देखा जाए तो इस मामले में एकमात्र सवाल जो उठ सकता है, वह यह है कि राज्य ने छत्रधर महतो को गिरफ्तार करने के लिए “अनैतिक” रास्तों का सहारा लिया।

जो “राज्य” (यहां राज्य को स्टेट यानी सत्ता के संदर्भ में देखें) लालगढ़ सहित देश के उन तमाम इलाकों में, जहां के “निचले दर्जे” के कहे जाने वाले अपने नागरिकों के जीने के लिए न्यूनतम बुनियादी जरूरतें मुहैया कराना अपना “नैतिक” कर्तव्य नहीं समझता है, उससे हम यह उम्मीद करते हैं कि वह किसी छत्रधर महतो को गिरफ्तार करने के लिए कोई “नैतिक” तरीका अख्तियार करे।

चलिए, छत्रधर महतो की गिरफ्तारी के तरीके में “नैतिकता” का सवाल हल हो गया।

एक सवाल बड़ा उलझा हुआ है कि राज्य के भीतर राज्य (स्टेट विदिन स्टेट) की स्वतंत्रता के लिए आदर्श स्थितियां कौन-सी होनी चाहिए। एक तरफ केंद्र सरकार नक्सली संगठनों और उससे जुड़े लोगों को आतंकवादी संगठन घोषित कर उन पर पाबंदी की बात करती है और दूसरी ओर पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी से लेकर सभी वामपंथी संगठन राजनीतिक स्तर पर लड़ाई लड़ने की बात करते हैं। छत्रधर महतो को छोड़ कर जितने भी लोगों को लालगढ़ ऑपरेशन के दौरान गिरफ्तार किया गया है, उन पर आतंकवादी निरोधक कानून नहीं लागू किया गया। किसी छोटी घटना को भी सामने लाने वाले और समूचे “लिबरेटेड जोन” में सर्वव्यापी पहुंच रखने वाले मीडिया को इस बार कोई “उस तरह की घटना” हाथ नहीं लगी, जिससे नंदीग्राम की दुहाई देने का मौका मिलता।

पत्रकारिता के आम नियम-कायदों-नैतिकताओं के बरक्स खोजी पत्रकारिता के एक हिस्से के रूप में स्टिंग ऑपरेशनों से लेकर पत्रकारीय नैतिकताओं की खरीद-बिक्री से आप सुधी पाठक और विश्लेषणकर्ता तो पहले से परिचत हैं ही। उस पर क्या बात करना!

और इन बातों पर भी क्या चिंतित होना कि जब पुलिस वाले साधारण नागरिकों की वेश-भूषा में कोई “ऑपरेशन” करती है और उससे उपजे शक का शिकार साधारण नागरिक होते हैं। “कैट्ल क्लास” के मुकाबले कीड़े-मकोड़े की क्लास वाले उन नागरिकों की औकात हम पत्रकारों के सामने क्या है? हमारी चिंता पत्रकारों के सामने खड़े हो रहे खतरों को लेकर होनी चाहिए, जीने के लिए जद्दोजहद कर रहे “नागरिक” के लिए नहीं…!

अब इस सवाल पर बात करें कि भयानक अभावों के बीच जीता “नागरिक” किसी छत्रधर महतो की छत्रछाया में जाने के अलावा क्या करे। क्या वह अनंत काल तक उन स्थितियों का इंतजार करे कि राज्य उनकी न्यूनतम बुनियादी जरूरतें पूरी करने उसके दरवाजे चल कर आएगा? दूसरे, कि अगर कोई छत्रधर महतो इस “नागरिक” के अभावों का शोषण करते हुए उन्हें ऐसे हालात में झोंक देता है जिसमें उसके लिए दो पाटों में पिसने के अलावा कोई चारा न बचे, तो वह क्या करे?

छत्रधर महतो और उसके कुछ खास साथियों या उसके पोषक संगठनों के पास एक ऐसा सुगठित तंत्र है कि वह “अपने लिए” बिना कोई नुकसान उठाये राज्य से “टक्कर” लेगा, और नायक भी बना रहेगा। दूसरी ओर, राज्य है, जो “वैध” तरीके से खुल्लमखुल्ला या फिर “रणनीतिक” तौर पर हर जरूरी कदम उठाते हुए छत्रधर महतो का सामना करेगा। बीच में है “नागरिक”, जिसके पास न तो गुरिल्ला छाप युद्ध की ट्रेनिंग है कि वह राज्य पर हमले के तुरंत बाद जंगलों में गुम हो जाए, और न राज्य का सामना करने की ताकत।

मगर छत्रधर महतो या उसके संरक्षकों के निशाने पर भी वही है और राज्य की बंदूकों के निशाने भी उसी पर टिके होते हैं। किसी मुख्यमंत्री पर जानलेवा हमले की प्रतिक्रिया एक “राज्य” की ओर से क्या होनी चाहिए थी? खासतौर पर एक ऐसे देश में, जहां की पुलिस के लिए न्यूनतम मानव अधिकारों के बारे में सोचना भी अपने “अधिकारों” में कटौती लगती है? पुलिस ने “हमलावरों” के पकड़ने के क्रम में जिस जमीन को तैयार किया, छत्रधर महतो जैसों को उसी जमीन की तलाश होती है।

यह सवाल छोड़ दिया जाए कि छत्रधर महतो का इतिहास क्या रहा है, तृणमूल और ममता बनर्जी के लिए छत्रधर महतो क्या रहे हैं और अब भाकपा (माओवादी) से उनके क्या रिश्ते रहे हैं, क्योंकि इससे फिर “क्रांतिकारी” बातें करने में बाधा खड़ी होगी। खासतौर पर हमारे उन “शुभचिंतकों” के लिए जो दिल्ली या मुंबई जैसे महानगरों में नवउदारवादी पूंजीवाद की सभी वेरायटी की मलाई चाभते हैं, और जंगल में दोतरफा निशाने पर खड़े लोगों के हकों के लिए हाय-हाय करते हैं। उनके लिए सत्तर-पचहत्तर लोगों का मार डाला जाना इसलिए महत्त्वपूर्ण नहीं है, क्योंकि जिनकी हत्या की गयी उन्हें माकपा के समर्थक होने के नाम पर मारा गया है।

स्कूल में पढ़ा कर अपनी जिंदगी गुजराने वाले पचास साल के रतन महतो ने “कुछ लोगों” के कहने पर माकपा से नाता तोड़ने का वादा तो कर दिया था, लेकिन इसकी घोषणा करने वाले पोस्टर उस इलाके की दीवारों पर नहीं चिपकाए थे। इस “अपराध” के एवज पहले उसे घुटने पर खड़ा किया गया और फिर गला रेत कर मार डाला गया।

यह एक उदाहरण है, क्रांति को अमली जामा पहनाने के तरीके का।

एक तरफ भूख, अपमान, उपेक्षाओं से त्रस्त और न्यूनतम मानव अधिकारों से वंचित और मजबूर नक्सली समूहों की शरण में गए लोगों के खात्मे के लिए सलवा-जुडूम के साथ बर्बरता की तमाम हदों को पार करता “राज्य” खड़ा है। दूसरी तरफ, पंद्रह सौ रुपए महीने की आमदनी वाली किसी आंगनवाड़ी कार्यकर्ता से पांच सौ, स्कूल टीचर से पांच हजार या स्थानीय हाट में रस्सी बेच कर गुजारा करने वालों से बंधी हुई रकम वसूलने वाले वे लोग हैं, जो “जन अदालतें” लगाते हैं और सिर्फ इसलिए गला रेत कर मार डालते हैं, क्योंकि उनके कहे के हिसाब से किसी ने किसी पार्टी को छोड़ने की सार्वजनिक घोषणा नहीं की होती है।

वहम में रहने और नक्सलवाड़ी से तुलना करके नक्सलवाद का अपमान करने से बचने की जरूरत है। ऐसे लोग अब पहले की तरह इकहरी लड़ाई नहीं लड़ रहे हैं। इन्होंने अपने आगे कई-कई सुरक्षा पंक्तियां खड़ी कर ली है। (समझौता बहुत आसान होता है)। पुलिस संत्रास का विरोध करने के नाम पर निरीह नागरिकों को राज्य के अत्याचारों में झोंक देने वाले छत्रधर महतो तो उनमें से महज एक पंक्ति है। उससे आगे महाश्वेता देवी एंड कंपनी और उससे भी आगे तृणमूल कांग्रेस के रूप में अगली पंक्तियां खड़ी हैं, जो या तो उनका इस्तेमाल करती हैं या दोतरफा पाट में पिस रहे लोगों की पीठ पर अपना सिक्का रगड़ कर चमकाती हैं।

कुछ समय पहले ही उसी इलाके के भाकपा (माओवादी) के नेता कोटेश्वर राव उर्फ किशनजी ने यह घोषणा कर मामला काफी साफ कर दिया था कि तृणमूल कांग्रेस ने नंदीग्राम की लड़ाई में नक्सलियों को हथियारों की सप्लाई की थी।

एक और तुर्रा यह कि भाकपा (माओवादी) को अपनी रीढ़ बना कर खड़े पुलिस अत्याचार विरोधी संत्रास समिति के नेता छत्रधर महतो ने भी ‘जनता की आखिरी लड़ाई’ को भारतीय राज्य के सुरक्षा बलों से हारते देखा तो अपने मातृ संगठन तृणमूल कांग्रेस की ओर से ही उम्मीद लगाई।

लेकिन अफसोस…!

ममता बनर्जी को भाकपा (माओवादी) या छत्रधर महतो से जितना लेना था, ले चुकी थीं। और अब उन लोगों को कुछ वापस लौटाने या उनसे कुछ लेने का नतीजा अपने शरीर पर एक बहुत ‘सादी साड़ी और पैरों में मात्र हवाई चप्पल’ पहन कर राजनीति करने वाली ममता दीदी के लिए बहुत भारी पड़ सकती थी। इसलिए उन्होंने न केवल माओवादी उग्रवादियों के साथ अपने किसी गठजोड़ से साफ इनकार किया, बल्कि तृणमूल कांग्रेस के गर्भनाल से जुड़े पुलिस अत्याचार विरोधी संत्रास समिति और छत्रधर महतो को भी पूरी तरह खारिज किया। ध्यान रहे कि यही छत्रधर महतो इसी लोकसभा चुनावों के पहले 4 फरवरी 09 को लालगढ़ में एक सभा में ममता बनर्जी साथ मंच पर था।

भारत के नक्सली समूह आज भी इतने अविश्वसनीय नहीं हुए हैं कि उनकी बातों पर यकीन नहीं किया जाए। नंदीग्राम में जब ‘भूमि बचाओ आंदोलन’ चल रहा था, बंगाल की सत्ताधारी वाममोर्चे ने आरोप लगाया था कि वह आंदोलन दरअसल तृणमूल कांग्रेस के साथ माओवादी उग्रवादियों और बाहरी ताकतों के गठजोड़ का नतीजा था। लोकसभा चुनावों में वाममोर्चे की हार के बाद तृणमूल कांग्रेस और भाकपा (माओवादी) के कार्यकर्ताओं की रगों में जो जोश बहने लगा, उसने वाममोर्चे के उस आरोप को बिन मांगे पुष्टि दे दी।

‘नंदीग्राम कब्जे’ के दौरान वहां के आमलोगों पर माकपाई अत्याचार के खिलाफ खड़े बहुत सारे बुद्धिमान लोग वही सब कुछ खेजुरी और लालगढ़ में होने पर चुप रहे।

और अब जबकि अपनी काहिली और अदूरदर्शिता की वजह से पश्चिम बंगाल की वाममोर्चे की सरकार नंदीग्राम में सरकारी सहयोग से मारकाट का कलंक अपने माथे पर ढो रही है, उस तथाकथित ‘आंदोलन’ के साथ-साथ ‘सिंगूर आंदोलन’ की परतें भी उतर गई हैं। पश्चिम बंगाल की सरकार आज भी 14 मार्च की पुलिस फायरिंग की अपराधी है। लेकिन उस हालात को पैदा करने के लिए तृणमूल ने क्या-क्या और किस तरह के ‘खेल’ किए होंगे, अब उसका अंदाजा लगाना क्या इतना मुश्किल है? केमिकल हब के लिए जमीन अधिग्रहण के सच पर जब बात होने लगेगी तो मामला उस सिरे तक चला जाएगा कि क्या वहां का विरोध आंदोलन सचमुच जमीन अधिग्रहण के मसले पर था। लेकिन यहां अपना मकसद यह नहीं है कि पश्चिम बंगाल की सरकार को 14 मार्च के नंदीग्राम कांड से बरी किया जाए। हां, उस कांड की जमीन अब अगर अनायास सामने दिखने लगी है, तो इसमें ममता को नहीं चाहने वालों का कसूर नहीं है।

इन तथाकथित आंदोलनों की जमीन पर दौड़ लगाती हुई ममता बनर्जी देश की मंत्री बन चुकी हैं, और इसके साथ ही उनके लिए ‘वे लोग’ अब अप्रासंगिक हो चुके हैं जिन्होंने उनके यहां तक के सफर के लिए राहों के कंटीले झाड़-झंखाड़ साफ किए।

उन्हें त्याग की एक महान मूरत के रूप में स्थापित करने के लिए ‘हजार चौरासीवें की मां’ महाश्वेता देवी ने लगभग ढाई महीने के भीतर दो बार एक प्रसिद्ध अखबार में यह लिख कर बताया कि कैसे ममता इसलिए महान हैं क्योंकि वे सादी साड़ी पहनती हैं और उनके पैरों में महज हवाई चप्पल होता है।

अब पता नहीं कि उनके पाठक भोले हैं या उन्हें वे उन्हें जानबूझ कर भोला बनाना चाहती हैं। यह मानना जरा मुश्किल है कि महाश्वेता देवी किशनजी के उस बयान से अनजान होंगी जिसमें उन्होंने कहा है कि तृणमूल ने नंदीग्राम में भाकपा (माओवादी) के कार्यकर्ताओं को हथियारों की सप्लाई की।

सादी साड़ी, पैरों में हवाई चप्पल और हथियारों की सप्लाई…!!!

इसके अलावा महाश्वेता देवी पश्चिम बंगाल से संबंधित हर लेख में तापसी मलिक का जिक्र करना नहीं भूलतीं। तापसी मलिक के साथ जो हुआ, उससे कोई भी शख्स विचलित हुए बिना नहीं रह सकता- अगर वह कहीं से भी जिंदा और ईमानदार है तो। लेकिन सुनीता मंडल का त्रासदी महाश्वेता देवी के लिए नजरअंदाज करने लायक होती है तो इसके क्या अर्थ हो सकते हैं। सुनीता मंडल के साथ भी तो वही हुआ था, जो तापसी मलिक के साथ हुआ था। तापसी पर अत्याचार ढाने वालों से घृणा की जानी चाहिए। लेकिन सुनीता मंडल के साथ भी वही सब करने वालों का झंडा थामना और उनकी वकालत करना किस ‘निष्ठा’ का नतीजा है?

यों, भारत के लिए यह अजूबी बात नहीं है कि संसदीय राजनीति करने वाले अक्सर अराजक तत्त्वों का सहारा लेते रहे हैं। बंगाल इसका अपवाद नहीं है। बत्तीस साल के शासन की विफलता को सामने लाने के लिए ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस के पास मुख्यधारा का कोई राजनीतिक कार्यक्रम नहीं था। यह सवाल तो फिलहाल बहुत मायने नहीं रखता कि क्या वे अपनी क्षमता जानती हैं? लेकिन इतना तय है कि पिछले डेढ़-दो दशकों की राज नीति ने उन्हें अवसर और साधनों यानी समूहों का इस्तेमाल करना सिखा दिया है। नंदीग्राम और सिंगूर से लेकर लोकसभा चुनावों और लालगढ़ में यह साफ-साफ दिखा।

लेकिन कई बार आपका अवसरवाद इतना अधकचरा होता है कि आप उसका फायदा लंबे समय तक नहीं उठा पाते। माओवादी उग्रवादियों के साथ अनैतिक गठबधन करके ममता ने खुद अपने लिए तो विश्वसनीयता का संकट खड़ा किया ही, माओवादी उग्रवादियों को भी एक आसानी से इस्तेमाल हो जाने वाले औजार के रूप में पहचान दे दी।

उनका झंडा उठाए बहुत सारे बुद्धिजीवियों के साथ महाश्वेता देवी देश को यह जानकारी देती हैं कि पिछले तीन दशकों में राज्य में पचास हजार से औद्योगिक इकाइयां बंद हो गईं। क्या एक यही मुद्दा काफी नहीं था किसी भी सरकार को विफल साबित करने का? इसके अलावा बहुत सारी तल्ख सामाजिक सच्चाइयां सतह पर आने को बेताब थीं। लेकिन ममता बनर्जी की हड़बड़ी और उनके लिए वंदना करने वालों ने समय रहते अपनी सच्चाई जाहिर कर दी कि उनका मकसद केवल सत्ता की मलाई का स्वाद लेना है।

मजे की बात यह है कि लालगढ़ और खासतौर पर पश्चिम बंगाल अभी तमाम तरह की नैतिकताओं को कसौटी पर कसने के दौर से गुजर रहा है। देश भर में कितने सेज कहां खड़े किए गए, देश के “क्रांतिकारी समूहों” को इससे कोई मतलब नहीं है। पश्चिम बंगाल में यह “पाप” नहीं होना चाहिए। नेनो अगर सिंगूर में बन कर बंबई या दिल्ली की सड़कों पर दौड़ती, कांटे की तरह चुभती। अब गुजरात से बनी नेनो दौड़ेगी सड़कों पर और ठंडक पहुंचेगी नयनों को…। राज्य में पिछले तीस साल के वाम शासन में हजारों उद्योग बंद हो गए तो तीस साल का यह अभ्यास जारी रहना चाहिए। अगर राज्य कोई नया प्रयोग करने की कोशिश करे, तो उसे “जन-अदालत” में खड़ा करना चाहिए!

पश्चिम बंगाल में नंदीग्राम और सिंगूर से शुरू हुआ यही “जन अदालत” लालगढ़ में भी लगाने की कोशिश चल रही है। लोकसभा चुनाव के नतीजों का कि तृणमूल सहित तमाम विपक्ष वाम के नाश के एक अमूर्त सुख-सागर में गोते रहा है, और वाम के सामने एकमात्र चुनौती अपनी साख बचाने की बनी हुई है। नंदीग्राम कांड और लालगढ़ ऑपरेशन में फर्क साफ दिख जाएगा, अगर देखना चाहें।
(2 अक्टूबर 2009 को मोहल्लालाइव पर)

आशुतोष को नेहरु की ज़रूरत नहीं, हमें आशुतोष की ज़रूरत नहीं...!

“आप कुछ भी छापते रहिए, हमें कोई फर्क नहीं पड़ता।” – कपिल सिब्बल।

“बाजार की नकारने की प्रवृत्ति गलत है। समस्या यह है कि आज भी लोग 1947 या फिर 1977 की मानसिकता में जी रहे हैं। 1977 में क्या पत्रकार नेताओं की गोद में बैठ कर रिपोर्टिंग नहीं कर रहे थे? …आज गिरीलाल जैन जैसे पत्रकारों की जरूरत नहीं है। …जवाहरलाल नेहरू तब थे, आज उनकी जरूरत नहीं है।” – आशुतोष।

“आज हमारी हालत यह हो गई है कि कोई कपिल सिब्बल आता है और हमारे मुंह पर तमाचा मारते हुए ये कह कर निकल जाता है कि आप कुछ भी छापते रहिए, हमें कोई फर्क नहीं पड़ता। हम शर्मिंदा होने के सिवाय कुछ नहीं कर सकते…। हम इस लायक भी नहीं हैं कि उन्हें जवाब दे पाते।” – कुर्बान अली।

कायदे से कहें तो बात यहीं खत्म हो जाना चाहिए। एक तथाकथित नेता समूची पत्रकारिता जगत को उसकी औकात बता रहा है, दूसरा तथाकथित पत्रकार पत्रकारिता के इस औकात में आ जाने के कारण बता रहा है। और तीसरी टिप्पणी करने वाले कुर्बान अली ऊपर के दोनों पक्षों की संबद्धता से उपजी नियति पर दुखी हैं।

सवाल है कि अगर आशुतोष के ‘विचारों’ को निष्कर्ष मान लिया जाए तो कपिल सिब्बल ने क्या गलत कहा। बहुत दिन नहीं बीते हैं जब आशुतोष के इसी तरह के विचार एक अखबार में छपी रिपोर्ट में पढ़ा था कि यह कहने का फैशन-सा चल पड़ा है कि खबरिया चैनल सिर्फ टीआरपी और मुनाफे के खेल में मशगूल हैं, और कि ये बताइये कि कौन-सा ऐसा उद्योग है जो मुनाफे का खेल नहीं खेल रहा है।

चलिए। चूंकि दूसरे उद्योग मुनाफे का खेल खेल रहे हैं तो आपको मुनाफे का यह खेल खेलने का हक है। यह ‘खेल’ आप खबरों के साथ बिना ‘खिलवाड़’ किए नहीं ‘खेल’ सकते। तो जब आप खबरों के साथ ‘खिलवाड़’ करेंगे और उसके बाद आपकी खबर, कोई खबर नहीं रह कर एक ‘खेल’ भर होगी, तो कोई कपिल सिब्बल क्यों नहीं कहेगा कि आप कुछ भी छापते रहिए, हमें कोई फर्क नहीं पड़ता?

तिस पर तुर्रा यह कि खबरों के साथ ‘खिलवाड़’ करते हुए आपको ‘तमगा’ इस तरह के खेल में एक माहिर ‘खिलाड़ी’ का नहीं, पत्रकार का चाहिए। क्यों भाई? क्या इसलिए कि इस तरह के ‘खेल’ में एक माहिर ‘खिलाड़ी’ का तमगा आपको एक दुकानदार की औकात के बराबर खड़ा कर देता है और एक पत्रकार बने रह कर आप ‘क्रांतिकारी’ भी बने रह सकते हैं? बाजार की तुरही बजाते हुए आप बदलते समय के साथ पत्रकारिता को भी बदलने का उपदेश देते हैं। बिल्कुल ठीक। लेकिन आपकी बदली पत्रकारिता अगर ‘मर्दखोर परियां,’ ‘पारग्रही प्राणी,’ या फिर ‘स्वर्ग की सीढ़ियां’ खोज के लाती हैं तो बताइए कि आपका प्यारा बाजार क्या-क्या बदल रहा है?

अच्छा, तो अब समझ में आया कि आपको आज जवाहरलाल नेहरू की जरूरत क्यों नहीं है। क्योंकि नेहरू के ‘हिसाब-किताब’ का ‘विज्ञान’ का सिरा थाम के कोई भी इंसान आपकी बुद्धि पर सवाल उठा सकता है कि बताओ कि तुम्हारी मर्दखोर परियों, एलिंयस, स्वर्ग की सीढ़ियों की सच्चाई क्या है, इसलिए आपको नेहरू से डर लगता है। आप चाहते हैं कि लोगों के दिमाग में सवाल पैदा नहीं हों, इसलिए हर वह मसाला परोसेंगे जो लोगों के दिमाग को सवालों से दूर करता है। यानी बाजारू ‘प्रगतिशीलता’ के साथ यथास्थितिवाद बहाल रहे! जय हो…!

आपकी बात मानते हैं कि मीडिया या चैनल चलाना बहुत खर्चीला काम है। क्या इससे आगे हमें यह सुनने को मिलेगा कि चूंकि यह बहुत खर्चीला काम है, इसलिए हमें खबरों के साथ खिलवाड़ करना पड़ता है, ताकि टीआरपी ऊंची जाए और आमदनी हो। नहीं तो समाज को हम इस तरह की खबरें दे सकने की स्थिति में नहीं होंगे।

भाई साहब! मुश्किल तो अब यह आ चुकी है कि अब काम केवल खबरों के साथ खिलवाड़ करने से नहीं चल रहा है। अब तो आपको अपने स्टूडियो को रैंप की शक्ल देनी पड़ेगी और अब उस रैंप पर कैटवॉक करती / करते एंकरों का चेहरा शून्यभाव का दर्पण नहीं होगा। अब हमें खबरों का आस्वादन भी उसी रूप में होगा। कोई बात नहीं, पत्रकारों की ‘प्रबंधकीय’ क्षमता तो उनकी योग्यता का मानक हो ही चुकी है, अब मॉडलिंग को भी पत्रकारिता के पाठ्यक्रम में विधिवत शामिल हो जाना चाहिए। मैनेजमेंट इन जर्नलिज्म तो चल ही पड़ा है, मॉडलिंग इन जर्नलिज्म- आदि-आदि। इससे बाजार थोड़ा और ‘जिंदा’ हो जाएगा।

दरअसल, जो लोग आज बाजार के अस्तित्व के स्वीकार के तर्क पर पत्रकारिता को भी बाजार का हथियार बना चुके हैं, कायदे से उन्हें ठग घोषित कर देना चाहिए। क्योंकि ठगों को यह छूट होती है कि वह कोई भी वेश धारण कर, कोई भी चाल चल कर अपना हितसाधन करे। अगर कोई घोषित ठग ऐसा करता है, तो उस पर मातम मनाने की जरूरत नहीं है। यह बेवजह नहीं है कि लाखों-करोड़ों रूपए घूस देकर निर्माण कार्यों का ठेका हासिल करने वाली स्वतंत्र निजी कंपनियों की आज की सबसे पहली पसंद कोई चैनल खोलना हो चुकी है। एक नेता के बारे में सुना है, जिसने चुनावों में हारने के बाद पहले दो फुलफ्लेज अखबार खरीद लिए, फिर एक कैसीनो खरीदा। क्या इस उदाहरण का कोई अर्थ हो सकता है? मीडिया की ताकत का अंदाजा लगा कर पत्रकारिता को अपना हथियार बनाने वाले ऐसे गिरोह बहुत अच्छी तरह से जानते हैं कि पत्रकारिता कैसे उनके चेहरे को धवल रख सकती है और इसका इस्तेमाल कैसे अपने मूल व्यवसाय को ‘सुरक्षा’ प्रदान करने में किया जा सकता है। उनके लिए जैसा काम किसी बिल्डिंग को बनाने में सीमेंट-गिट्टी आदि में मिलावट या घपला करना, शराब में जहर मिलाना, वैसे ही खबरों में मिलावट या घपला करना।

लेकिन यहां तक पहुंच चुके लोगों को यह हक कहां रह जाता है कि वे किसी भी तरह की गड़बड़ी की खबर लें। हां, अगर ‘तू मेरी खबर ले, मैं तेरी खबर लूं’ का फार्मूला लागू हो तो अलग बात है। लेकिन यहां तर्क यह है कि चूंकि किसी हाई प्रोफाइल बलात्कार की खबर ज्यादा बिक सकती है, इसलिए बलात्कार परोसा जाएगा। कीड़े-मकोड़े की जिंदगी जीने वाले मजदूरों-किसानों का सवाल बिकने के बजाय टीवी-अखबार का भट्ठा बैठा देगा, कमाई के रास्ते बंद कर देगा, इसलिए उसे दिखाने-छापने की जरूरत नहीं।

इसलिए नीलाभ मिश्र अगर कह रहे हैं कि अगर आप तेल बेच रहे हैं तो तेल ही बेचिए। उसमें आप चर्बी की मिलावट करेंगे तो अपराध होगा और उसकी सजा होगी, तो वे उन सभी लोगों की उम्मीद को आवाज दे रहे हैं जो खबरों के उपभोक्ता हैं। एक चपरासी से लेकर किसी अफसर या किसी नेता का घूस लेना, दंगा कराना या हत्या-बलात्कार जैसे कोई भी दूसरे अपराध हमारे भीतर गुस्सा भर देते हैं तो पत्रकार का चोला ओढ़े लोगों की बेईमानी हमारे लिए गुस्से का कारण क्यों नहीं हों?

पत्रकारिता में बाजार के सच को स्थापित करने वाले लोग यह भूल जाते हैं कि इस तरह वे इस बात को स्थापना दे रहे हैं कि बाजार ने हमें खरीद लिया है। और इस तरह की किसी भी स्थापना के साथ महाभारत की द्रौपदी का वह सवाल बार-बार उठ खड़ा होता है कि बिके हुए लोगों को यह हक कतई नहीं है वे किसी दूसरे का सौदा तय करें। यों, यह हक किसी को नहीं है।

आशुतोष जी जैसे लोगों को बेशक जवाहरलाल नेहरू की जरूरत नहीं है। कारण समझा जा सकता है। लेकिन बहुत सारे लोग (आशुतोष जी के लिए यह अफसोस की बात है) ऐसे हैं कि सबसे ताजा पीढ़ी के बहुत सारे लोगों को आज ही आशुतोष की जरूरत नहीं महसूस होती है।

मौजूदा पत्रकारिता पर शोक मनाने के इसी दौर में वैसी पौध भी पल-बढ़ और पसर रही है जिसे चांदी की थाली में खाने का शौक नहीं है। उसे इस दुनिया का सबसे महंगा राजमहल जैसा घर, चार मोटरगाड़ियां, कम से कम एक हवाई जहाज और पांच लाख रुपए महीने की आमदनी की जरूरत नहीं है, जिसके लिए स्विट्जरलैंड के बैंकों की शरण लेनी पड़ती है। इस पौध को पता है कि इतना सब कुछ हासिल करने के लिए सबसे पहले अपनी रीढ़ को बाजार के शहंशाहों के पास गिरवी रखना पड़ता है।
(18 जुलाई, 2009 को मोहल्लालाइव पर)