Wednesday 15 October 2008

हिंदुत्व के निशाने पर देश

असली खेल तो कुछ और है...


भारत के नक्सली समूहों की छवि अब भी ऐसी है कि अगर वे किसी घटना की जिम्मेदारी लेते हैं तो उस पर भरोसा किया जा सकता है। लेकिन विश्व हिंदू परिषद के नेता अशोक सिंघल भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) की इस घोषणा को स्वीकार करने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं हैं कि ओडीशा के कंधमाल में स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की हत्या उसने की। भाकपा (माओवादी) की स्वीकारोक्ति के बावजूद विहिप आखिर उसे बरी करने को क्यों तैयार है? क्या वह दिल्ली या अमदाबाद जैसे शहरों में सिलिसलेवार बम धमाकों की कथित जिम्मेवारी लेने वाले इंडियन मुजाहिदीन नाम के अब तक अमूर्त संगठन के बारे में भी ऐसा ही रवैया अपनाने को तैयार हैं? आखिर क्या कारण है कि भाकपा (माओवादी) के प्रति विहिप अचानक ही इतनी उदार हो गयी है और इंडियन मुजाहिदीन केवल विहिप या संघ परिवार ही नहीं, देश के समूचे सत्ता तंत्र के लिए आतंक का एक सहज स्वीकार्य पर्याय बन चुका है?

मान लिया जाए कि बजरंग दल या विहिप भाकपा (माओवादी) की घोषित तौर पर लक्ष्मणानंद सरस्वती की हत्या की ली गई जिम्मेवारी स्वीकार कर लेती है। इसके बाद वह किसको निशाना बनाएगी या किससे 'बदला' लेगी? दरअसल, वह नक्सलियों की अपनी ओर से घोषित जिम्मेवारी के बावजूद उनसे टकराने का जोखिम नहीं मोल ले सकती। अव्वल तो इसलिए कि जिस सामाजिक समूह के 'धर्मांतरित' होने का भय विहिप को सताता रहता है, नक्सलियों की पैठ भी सबसे ज्यादा उन्हीं के बीच है। दूसरे, नक्सलियों की बात मानते ही अपने हाथ आया 'मुद्दा' निकल जाने का डर है, जिसको आधार बना कर ईसाइयों पर हमले को जायज ठहराने की कोशिश की जा रही है। सवाल है कि लक्ष्मणानंद सरस्वती की हत्या की 'प्रतिक्रिया' में बजरंग दल ने जो 'खेल' शुरू किया है, वह कितने ईसाइयों का खून पीने, उन्हें जिंदा जलाने या गिरजाघरों को फूंकने के बाद खत्म होगा?

संघ परिवार दरअसल अपने एजेंडे को लेकर जिस धीरज के साथ दूरगामी नीतियां तैयार करता है, वह किसी शोधकर्ता के लिए अध्ययन का विषय होना चाहिए। 1990 के दशक के शुरू में 'जय श्रीराम' के नारे के साथ शुरू हुई लड़ाई बाबरी मसजिद के विध्वंस के साथ ही फुस्स हो गयी थी। हालांकि उसके असर से तैयार हुए मानस के कारण भी भाजपा को आखिरकार देश की गद्दी पर बैठने का मौका मिला। लेकिन यही मौका शायद संघ परिवार के लिए सुयोग और इस देश के लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष स्वरूप में विश्वास रखने वालों के लिए दुर्योग साबित हुआ।

छह दिसंबर 1992 को हिंदुत्व के ये उद्धारक देश को यह बता चुके थे कि ये किसकी मर्जी का लोकतंत्र चाहते हैं। उसके लगभग दस साल बाद, यानी मार्च 2002 में एक बार फिर उन्होंने गुजरात जनसंहार की मार्फत दिखाया कि अपने 'दुश्मनों' को काबू में रखने का उनका तरीका क्या है। तब तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी समेत हिंदुत्व के समूचे कुनबे के बार-बार रटने के बावजूद 'इस्लामी आतंकवाद' की हवा ने इतना जोर नहीं पकड़ा था। वरना अंदाजा लगाया जा सकता है कि उस सुनियोजित-प्रायोजित दंगे पर देश-समाज और दुनिया की क्या प्रतिक्रिया होती। बहरहाल, इराक पर अमेरिकी कब्जे का मतलब अगर केवल तेल पर कब्जा मान भी लिया जाए, तो 9/11 के हमले के बाद अमेरिका ने जिस 'इस्लामी आतंकवाद' शब्द का ईजाद किया, उसने 'जय श्रीराम' के मरते हुए नारे के सहारे हिंदुत्व को घसीट रही भाजपा और संघ परिवार के लिए जैसे संजीवनी का काम किया। पूरा जोर लगा लेने के बावजूद 'राम' का नाम आरएसएस-भाजपा को वह दे सकने में नाकाम साबित हुआ, जो 'इस्लामी आतंकवाद' ने उसे महज पांच-छह सालों में ही दे दिया। आज कश्मीर से कन्याकुमारी तक किसी भी बम धमाके को आसानी से आतंकवादी हमला करार दिया जा सकता है। इस मामले में संघी एजेंडे की इससे भी बड़ी कामयाबी यह है कि किसी भी विस्फोट के साथ ही एक आम हिंदू मानस पूरी सहजता के साथ इसमें किसी मुसलमान का हाथ होना मान लेता है। और हर विस्फोट के बाद देश का सत्ता तंत्र कुछ मुसलिम नाम वाले लोगों को गिरफ्तार कर या 'मुठभेड़' में मार कर उसकी इस धारणा को स्थापित कर देता है - वह चाहे भाजपा का गुजरात हो, या कांग्रेस की दिल्ली।

इस देश के माहौल में ऐसी हवा घुल चुकी है कि आतंकवाद के मसले पर इस आम धारणा से इतर देश के सत्ता तंत्र के 'कारनामों' को शक की निगाह से देखने वाले ही शक की जद में आ सकते हैं। यह अलग बात है कि आतंकवाद का पर्याय मान लिए जाने के बावजूद सिमी या उससे जुड़े होने के आरोपों में जितने भी मुसलमानों को पकड़ा गया है, उन्हें आतंकवादी साबित किया जाना अभी बाकी है। इन कथित आतंकवादियों की प्राथमिक 'स्वीकारोक्तियों' की बुनियाद पर पुलिस जो कहानी मीडिया को सामने पेश करती है, पता नहीं क्यों इस देश की अदालतें (कभी-कभी 'जन भावनाओं को तुष्ट करने' वाले फैसले सुनाने के बावजूद) उसे मानने से इंकार कर देती हैं। अपने देश की न्यायपालिका पर हमें अब भी भरोसा करना चाहिए।
यह समझने के लिए भी ज्यादा जोर लगाने की ज़रूरत नहीं है कि नांदेड़ या कानपुर में बम बनाने के दौरान बजरंग दल के लोगों के मारे जाने और कई विस्फोटों में उनका नाम आने के बावजूद उनके लिए 'आतंकवादी' शब्द का इस्तेमाल क्यों नहीं होता है। जबकि कानपुर में बम विस्फोट में दो बजरंग दलियों की मौत के बाद पहुंची पुलिस ने दावा किया कि 'इतना बारूद आधे कानपुर को तबाह करने के लिए काफी था।' नांदेड़ में ऐसी ही घटना के बाद पुलिस ने बजरंग दल के उस 'ठिकाने' से मुसलमानों के पहनने वाले कपड़े, टोपी, बुर्के, नकली दाढ़ी वगैरह भी बरामद किये थे। इतने खुले सबूतों ('स्वीकारोक्तियों' पर आधारित कहानियां नहीं) के बावजूद कोई भी बम विस्फोट या आतंकी घटना के बाद सिमी या इंडियन मुजाहिदीन की तरह बजरंग दल का नाम एक आम मानस के भीतर उतनी ही सहजता से क्यों नहीं उतर पाता है? इंडियन मुजाहिदीन सिमी का नया नाम हो सकता है। लेकिन जिस बजरंग दल के लिए मुसलमानों की वेशभूषा इस्तेमाल करके भ्रम फैलाना आसान काम है, उसके लिए किसी दूसरे संगठन का नाम ओढ़ना क्यों मुश्किल होगा?

ऐसे सवाल न तो हमारे देश की पुलिस पर कोई खास असर डालते हैं, न हमारे मीडिया को इस पर सोचना जरूरी लगता है। दरअसल, पुलिस वही करती है, जो सत्ता उससे कराती है। और मीडिया का काम महज इतना रह गया है कि वह पुलिस के पक्ष को ज्यों का त्यों रख दे। खासतौर पर आपराधिक मामलों में तो मीडिया पुलिस के प्रवक्ता से ज्यादा की भूमिका में नहीं है। ऐसा कुछ तो उस खोखली बुनियाद के कारण होता है, जिस पर खड़ा होकर 'पत्रकारिता' करने का दावा किया जाता है और ज्यादा किसी खास घटना का कवरेज करने वाले पत्रकार या उसके समूचे संस्थान के आग्रहों के कारण। वरना क्या वजह है कि ओडीशा या कर्नाटक में गिरजाघरों पर हमले करने वाले बजरंग दल के गिरोह को सिर्फ एक 'भीड़' की संज्ञा दी जाती है, लेकिन अगर कोई 'आतंकवादी' पकड़ा जाता है तो सबसे पहले उसका नाम जोर देकर बताया जाता है। इसिलए कम कि 'आतंकवादी' एक व्यक्ति है, इसलिए ज्यादा कि वह मुसलमान है।

कुछ दूसरे शहरों की तरह दिल्ली के बम धमाकों में अठारह लोग मारे गये। निश्चित तौर पर इसे आतंकवादी घटना मानने से किसी को परहेज नहीं होना चाहिए। लेकिन हमारे देश के सत्ता तंत्र, पुलिस और मीडिया पर वह कौन-सी मजबूरी हावी है कि ओडीशा में खुलेआम ईसाइयों पर हुए हमलों में पचास से ज्यादा लोगों के मारे जाने के बावजूद उसे किसी तरह आतंकवाद मानने में परेशानी होती है। गुजरात में 2002 के दंगे और उसके बाद नरेंद्र मोदी ने क्या किया, यह किसी से नहीं छिपा है। कर्नाटक में भी इस देश के संवैधानिक नियम-कायदों के तहत चुन कर आए लोग ईसाइयों पर हमले को जायज करार देते हैं। क्या इससे भी खुला आतंकवाद कुछ और हो सकता है?

दरअसल, ईसाई समुदाय पहले से ही संघी एजेंडे का दूसरा निशाना रहा है। मुसलमानों को लेकर संघ जो चाहता था, वह कर चुका है। अब मुसलमानों को 'साइज' में रखने के लिए उसे अलग से कुछ करने की जरूरत फिलहाल नहीं है। बाबरी मसजिद के विध्वंस और सैकड़ों दंगों से लेकर गुजरात के कत्लेआम तक से मुसलमानों को बताया जा चुका है कि इस देश में उन्हें किसके रहमोकरम पर रहना है। अब आतंकवाद का मुद्दा खुद-ब-खुद वह काम करता रहेगा, जो राम का नाम भी नहीं कर सका।

लेकिन ईसाई समुदाय को आतंक से जोड़ा जाना संभव नहीं दिखता। इसलिए फिलहाल तो उन पर हमले करके और गिरजाघरों में तोड़फोड़ कर उन्हें 'समझाया' जा रहा है। असली मकसद यही है कि ईसाइयों को भी मुसलमानों की तरह इस हाल में पहुंचा दिया जाए कि वे सत्ता और समाज के हिंदू मानस की निगाह में 'संदिग्ध' हो जाएं। अगर अमेरिका आंखें नहीं तरेरे तो मुसलमानों के मुकाबले ईसाई बहुत जल्दी उस हाल में पहुंचा दिए जाएंगे। आरोप भले बलात धर्मांतरण का होगा, उसे साबित करना न हिंदुत्व के ठेकेदारों के लिए जरूरी होगा, न सत्ता तंत्र के लिए। मानव अधिकारों के रक्षक होने का दंभ भरने और लोकतंत्र के प्रहसन के बीच धर्मांतरण विरोधी कानून बनाने और उसे सख्ती से लागू करने के उत्साह में कमी नहीं होगी। बिना इस बात पर विचार किए कि अगर कोई व्यक्ति अपना 'धर्म' बदलना चाहता है तो उसे क्यों रोका जाना चाहिए। लाख चाहने पर भी इस 'आधुनिक' समय में बंदूक की नोक पर धर्मांतरण कराने का आरोप किसी के गले नहीं उतरेगा।

इसलिए 'प्रलोभन' का तर्क गढ़ा जाएगा। वे कौन-से कारण हैं कि कोई व्यक्ति 'प्रलोभन' में आकर अपना धर्म बदल लेता है? हिंदुत्व छोड़ कर धर्म परिवर्तन करने वाले व्यक्ति या समूह का सामाजिक दर्जा हिंदुत्व के भीतर क्या होता है? धर्म परिवर्तन के नाम से किस सामाजिक वर्ग को भय और खतरा महसूस होता है? सामाजिक सत्ता और वर्ण-व्यवस्था को बनाये या बचाये रखने के इस खेल को समझना क्या इतना मुश्किल है?

जाहिर है, इस खेल को आसानी से खेलने के लिए देश के लोकतंत्र को मुसलमानों और ईसाइयों के 'बोझ' से मुक्त करना जरूरी है। इसे भुलाया नहीं जाना चाहिए कि झज्जर में गोहत्या का 'अपराधी' करार देकर ईंट-पत्थरों से मार-मार कर पांच दलितों की हत्या की गयी थी। गाहे-बगाहे दिखने वाला हिंदुत्व का असली खेल वही है। और संघी एजेंडे का असली मकसद उसी खेल का मैदान तैयार करना है। इसमें विहिप और बजरंग दल जैसे उसके 'सेनानी' अपना काम तो कर ही रहे हैं, उसके राजनीतिक मुखौटे भाजपा के साथ-साथ धर्मनिरपेक्षता की चादर ओढ़े कांग्रेस भी बड़े महीन तरीके से इसमें अपना योगदान कर रही है। उम्मीद इस बात से बंधती है कि इस देश के सामाजिक और राजनीतिक ढांचे का जो स्वरूप है, उसमें किसी के लिए भी इस तरह का खेल खेलना उतना आसान नहीं होगा, जितना समझ लिया गया है।