Wednesday 31 October 2007

कि ये साजिश अब समझने लगे हैं लोग...



अप्टन सिन्क्लेयर ने कहीं लिखा है- "आदमी को आत्मा के अमरत्व में विश्वास करने के लिए लगा दो और उसका सब कुछ लूट लो। वह हंसते हुए इसमें तुम्हारी मदद भी करेगा।" गुजरात-२००२ का कुछ भी छिपा हुआ नहीं था। फर्क सिर्फ यह है कि तहलका ने वह सब कुछ दिखा दिया है। अब वह सब कुछ भूल जाने को कहा जा रहा है। आगे बढ़ने की बात हो रही है।

आगे बढ़ने के लिए तथ्‍यों और तर्कों की ज़रूरत पड़ती है, जिस पर मेहनत करनी पड़ती है- सभी स्‍तरों पर, और भावनाओं में बहाने या भावुकता में बहने के लिए मेहनत नहीं करनी पड़ती, इसलिए आसान है। यह पूरी की पूरी सांस्‍कृतिक समस्‍या है। हमारे यहां ज़्यादातर लोग मान कर चलते हैं, जान कर चलने की ज़रूरत उन्‍हें कभी महसूस नहीं होती। सभी नैतिक शास्त्रों में तयशुदा 'श्रेष्‍ठता' के मानदंडों के सामने सीधे-सीधे सिर झुकाने की प्रवृत्ति ने आदमी की आंखों को इस कदर बंद कर दिया है, कि जो श्रेष्‍ठ प्रस्‍तुत है, वही सत्‍य है- पर कोई सवाल उठाने की प्रवृत्ति सिरे से ग़ायब है। हिंदू सांप्रदायिकता के उफान और उसकी प्रतिस्‍थापना के संघर्षों को इसी संदर्भ में देखा जा सकता है।

नीचे तस्वीर- खैरलांजी हत्याकांड

आज एक ओर क्‍लोन क्रांति के रास्‍ते आदमी का दिमाग़ समूची प्राकृतिक व्‍यवस्‍था के सामने चुनौती के रूप में खड़ा होने को तैयार है, वहीं हमारे यहां अचानक ही कभी पत्‍थर की मूर्तियां समूचे देश में दूध पीने लगती हैं, तो कभी लाखों की भीड़ एक पुरानी इमारत के नाम पर पागल हो जाती है। धार्मिक उन्‍माद से पीड़ि‍त यह भीड़ उन लोगों को मार कर या ज़ि‍न्‍दा जला कर या औरतों का बलात्‍कार कर अट्टहास करती है, गौरव यात्राएं निकालती हैं, जिनका इस तरह के पागलपन से कोई लेना-देना नहीं होता। मारे गये लोगों का कसूर सिर्फ इतना होता कि उन पर किसी ख़ास धर्म के होने का ठप्‍पा लगा होता है। समाज और धर्म के चंद ठेकेदारों की हांक पर इकट्ठा हुई लाखों की भीड़ को यह नहीं मालूम होता कि उनका पूरा अस्तित्‍व उन ठेकेदारों का गुलाम है जो केवल उस भीड़ का खून पीकर खुश होते हैं। लोगों को दंगों की आग में जलते हुए देखना ही जिनका 'यज्ञ' है, और इसी से उनकी 'मोक्ष' प्राप्ति का रास्‍ता तय होता है।

ये धार्मिक लुटेरे इस बात से अच्‍छी तरह वाकिफ होते हैं कि जिन पारलौकिक भ्रमों की बुनियाद पर इस समाज को खड़ा किया गया है, उनका कायम रहना उनकी दु‍कानदारी के हित में है। यहां आम लोगों को यह सोचने की छूट एकदम नहीं है कि अगर भगवान है तो उसकी रक्षा और सेवा हम करेंगे या वह हमारी सेवा ओर रक्षा करेगा। लेकिन हजारों धार्मिक दावानलों में नवजात शिशुओं तक को जिंदा राख होते रेख कर भी हमारी आंखें आज भी बंद हैं। ईंट-पत्‍थरों की बेजान और निरर्थक इमारतों में अपने 'भगवान' की प्रतिस्‍थापना के लिए गर्भवती औरतों का पेट चीर कर बच्‍चे के साथ उसे आग में झोंक कर खुशी से नाचने को कुछ लोग संस्‍कृति की रक्षा की लड़ाई कह रहे हैं। अगर यही संस्कृति है तो मुझे शर्म है इस संस्कृति पर और इसके मूल निहितार्थों को समझना मेरे लिए बहुत ज्‍यादा मुश्किल नहीं है।

दरअसल, परजीविता या निकम्मापन जिस समाज का या समाज के जिस वर्ग का भी आदर्श होगा, वह अपनी सुविधा की आकांक्षा की आग में समूचे समाज को झुलसाता रहेगा, राख बनाता रहेगा। हिंदुत्व की रक्षा की लड़ाई के मूल में छिपी यह चिंता साफ-साफ देखा और समझी जा सकती है। आज़ादी के बाद और ख़ास तौर पर पिछले डेढ़ दो दशकों में समाज के दलित और पिछड़े तबकों में जिस तेज़ी से वैचारिक आलोड़न हो रहा था, उसका अंतिम नतीजा समाज के उस ताने-बाने का छिन्‍न-भिन्‍न होना था, जहां कुछ परजीवियों की दुकानदारी कायम थी। और ज़ाहिर है कि मुसलमान, ईसाई और लोकतंत्र इस श्रेष्‍ठ वर्ग की परजीविता और निठल्‍लेपन के साथ-साथ सामाजिक 'श्रेष्‍ठता' के सिद्धांत के मुख्‍य बाधक तत्‍व हैं। और दलितों और पिछड़ों के विकास में एक संतुलन तत्‍व के रूप में काम कर रहे हैं। इसलिए प्राथमिक टारगेट मुसलमान और ईसाई हैं। हिंदुत्‍व के कथित संरक्षकों के हिसाब से इन दोनों के ख़त्‍म होने के बाद लोकतंत्र अपने आप ख़त्‍म हो जाएगा। और तब इस हिंदू समाज का प्राचीन 'गौरव' फिर से कायम हो सकेगा, जहां ढोल, गंवार, शूद्र, पशु और नारी सिर्फ ताड़न के अधिकारी होंगे और ब्रह्मा के कमर के ऊपर के हिस्से से पैदा हुए लोग भूदेवों के रूप में 'संस्‍कृति रक्षा' का अभियान उसी तरह चला सकेंगे, जिस तरह हरियाणा के झज्‍जर में गोहत्‍या के नाम पर पांच दलितों की ईंट-पत्‍थरों से मार-मार कर हत्‍या कर दी गई।

इसी संस्‍कृति निर्माण की प्रक्रिया के लिए पारलौकिक भ्रमों की बुनियाद को और मज़बूत करने की ज़रूरत समझी गयी, जहां आदमी का खुद पर से भरोसा उठ जाता है, और उसका दिमाग़ अंधी सुरंग में भटकते हुए जीवन के 'सत्‍य' की तलाश में मारा-मारा फिरता है- जीवन के ख़त्‍म हो जाने तक।

हिंदुत्‍व की 'रक्षा' की लड़ाई की साज़ि‍श का ही यह भी एक हिस्‍सा भर है कि जब आदमी का दिमाग़ आकार लेने लगता है, उसी समय से उसे इस तरह शिक्षित किया जाए ताकि वह बड़ा होकर या तो ज्‍योतिष 'विज्ञान' का डिग्रीधारी बने या फिर तिलक-चोटीधारी ज्‍योति‍षाचार्यों की सलाह से ही अपने शौचालय जाने तक का समय तय करे।

ऐसा नहीं है कि हिंदुत्‍व ने जिस तरह गुजरात को ग्रास लिया है, उससे दूसरे बचे हुए हैं। गुजरात में सिर्फ सुविधा यह है कि वहां न्यूटन के गति के नियम की नई व्याख्या करने वाला राजा मौजूद है। दरअसल, मोदी जैसा चेहरा किसी को एक बार धोखा दे सकता है, वाजपेयी जैसों का चेहरा लोगों को बार-बार छलता है। गुजरात में मुसलमानों के कत्लेआम के समय गुजरात पुलिस ने भी जान बचाने की भीख मांगती औरतों और बच्चों को बचने के लिए जो रास्ता बताया, उसमें वे उन्मादी पागलों की ज्यादा बड़ी भीड़ में जा फंसे और जिंदा जला दिए गए। जहां तक दूसरी जगहों की बात है, तो राम के उद्धार के लिए शुरू की गई रथयात्रा से समय से ही संघ-परिवार और उसके गर्भनाल से जुड़ी भाजपा-विहिप-बजरंग दल या शिवसेना ने जिस क्रूर प्रहसन युग की शुरुआत की थी, गुजरात में उसकी झलक भर दिखाई गई।
लेकिन समय कभी रुकता नहीं है। जो लोग इतिहास से सबक नहीं लेते, इतिहास उन्हें कभी माफ नहीं करता। हिटलर या मुसोलिनी को अपना आदर्श मानने वाले केवल उनके सत्ताकाल को याद रखते हैं। बेहतर हो इन दोनों इतिहास के तथाकथित नायकों के अंतिम दिनों को याद रखा जाए, जब नस्लवाद, नाजीवाद और जर्मन श्रेष्ठ हैं के प्रणेता हिटलर को तहखाने में छिप कर अपनी पत्नी के साथ खुदकुशी करनी पड़ी। और कि फासीवाद के प्रवर्तक मुसोलिनी के मरने के बाद भी इटली के लोगों ने उसकी लाश को शहर के चौराहे पर रख कर उसे जूते-चप्पलों से पीटा और उस पर थूका।
कहते हैं कि किसी एक चीज़ को बार-बार रटने से वह सच बन जाता है या फिर प्रहसन। इनके राम और राष्ट्र के राग के लगातार आलाप ने इन दोनों शब्दों को सिर्फ प्रहसन की एक त्रासदी बना दिया है। इन्हें इस बात की कोई फिक्र नहीं है इनके राष्ट्रवाद को पूरी दुनिया में जंगली, असभ्य और बर्बर लोगों का अभियान कहा जाने लगे। इन्हें इस बात की भी कोई फिक्र नहीं कि उन्होंने अपने राम को कितने लोगों के लिए भय और घृणा का पात्र बना दिया है।

सवाल है कि अगर किसी मुसलमान के सड़क पर नमाज पढ़ने या मदरसे में बच्‍चों को पढ़ने या ज्‍यादा बच्‍चे पैदा करने या गाय का मांस खाने या पाकिस्‍तानी टीम के जीतने पर पटाखे छोड़ने से देश टूटता है, तो हिंदूवादियों का कौन-सा ऐसा काम है, जिससे देश जुड़ता है।
एक और बात, कि किसी को राष्‍ट्रद्रोही या गद्दार घोषित करने के बाद उससे राष्‍ट्रभक्ति की उम्‍मीद करने का हमें क्‍या हक़ है? दरअसल विचार या विश्‍लेषण धर्म के ठेकेदारों के लिए सबसे बड़े ख़तरे हैं। क्‍योंकि यही अपनी रोज़ी-रोज़गार जैसे ज़ि‍न्‍दगी के असली सवाल उठा कर उस ठेकेदारी की संभावनाओं को ख़त्‍म करता है। इसलिए पहला हमला इसी पर किया जाता है। और कुछ ऐसी ही वजहों से हिंदू कहे जाने वाले नब्‍बे फीसदी से ज्‍यादा लोगों का किसी न किसी बहाने रोज़ जलील होना उनके भीतर किसी तरह का शर्म नहीं पैदा करता।

Thursday 25 October 2007

राम इतिहास हैं, तो शंबूक का वध...?

आस्थावादियों की दलील है कि धर्म निजी आस्था का सवाल है और इसमें दखल देने का हक किसी को नहीं है। मेरा मानना है कि कोई भी धर्म या मौजूदा सामाजिक व्यवस्था इंसानी समाज पर पूरी तरह एक थोपी गई चीज है। यहां तक कि आस्था भी। बहुत आसानी से हम अपनी आस्था को तार्किक आधार देने के लिए मिथकों को इतिहास घोषित करने लगते हैं। बिना इस बात पर गौर किए कि इसके बाद जो कड़वे सवाल उठेंगे, उसका जवाब हमारे पास क्या होगा। पिछले दिनों जनसत्ता में शंभुनाथ ने कुछ ऐसे ही सवाल उठाए। रामसेतु के मसले पर राम की ऐतिहासिकता का वितंडा पीटते हुए क्या हम उससे जुड़े कुछ सवालों पर गौर करना चाहेंगे?


धर्म की हिंसा

दुनिया के प्रायः सभी बड़े धर्मों के इतिहास से पता चलता है कि ये युद्ध, हिंसा और अत्याचारों के बीच से पैदा हुए। और लंबे समय तक खून-खराबे के बीच से ही इनका विकास हुआ। चिंताजनक यह है कि सभ्यता का दावा करने वाले समाजों में आज भी हिंसा का एक प्रधान औजार है धर्म। अभी सेतुसमुद्रम परियोजना के संदर्भ में राम का मुद्दा फिर गरम है। यह प्रस्तावित है कि पौराणिक कथा या पुराकथा को इतिहास के रूप में देखा जाए। इसके संदेह नहीं कि हर जाति के कुछ मिथकीय लोक विश्वास होते हैं, जिनका तार्किक आधार नहीं होता और इस पर आश्चर्य नहीं करना चाहिए, अगर वे किसी सार्वभौम जीवन सत्य की ओर संकेत करते दिखाई दें। राम, कृष्ण और शिव हिंदुओं के प्राचीन लोकविश्वास हैं, जिनकी रचना हजारों साल में हुई है। इन लोकविश्वासों के भीतर से करोड़ों लोग अपने जीवन के दुख-सुख, हंसी-खुशी, पर्व-उत्सव और रीति-नीति व्यक्त करते आए हैं। वे अपने भौतिक कष्टों के क्षणों में कहीं आश्रय न पाकर इन्हीं लोकविश्वासों की छाया में जाते हैं। यह समझ में आ सकता है कि तार्किक आधार न होने के बावजूद ये कितनी निष्कलंक जगहें हैं। फिर भी आज से नहीं, हजारों साल से इन लोकविश्वासों को पहले धर्म ने अपनी रणभूमि में बदल दिया। अब ये राजनीति और बाजार के खेल के मैदान हैं। यह कितनी आसानी से समझाने की कोशिश होती है कि सेतुसमुद्रम योजना के तहत जल के अंदर समाए जिस सेतु को तोड़ा जा रहा है, वह भगवान राम ने बनाया था। एक प्राकृतिक घटना को पुरातात्त्विक साक्ष्य बताया जा रहा है, जबकि हिंदुत्ववादियों के शासन में ही इसकी योजना नए सिरे से बनी थी।

यह लोकविश्वासों की डकैती है

यह एक लोकविश्वास है कि हनुमान और नल-नील के नेतृत्व में बंदरों ने सेतु बनाया। इसमें एक गिलहरी का भी योगदान था। यह भी एक लोकविश्वास है कि हनुमान ने पूंछ में लगी आग से सोने की लंका जला दी, पर खुद उनकी पूंछ तक नहीं जली। भारत के लोग जो भी सोचें, श्रीलंका के लोग कभी मानने के लिए तैयार नहीं होंगे कि मिथकीय रावण की लंका यही है। वहां के लोकविश्वास दूसरे हैं, वह दूसरा देश है। इसी तरह, इतिहास ने कभी नूह की नौका के पुरातात्त्विक साक्ष्य ढूंढ़ने का दावा किया था। प्राचीन धार्मिक ग्रंथों में पहले विज्ञान खोजा जाता था। पर अब इतिहास ढूंढ़ा जाता है। धार्मिक मिथकों, पुराकथाओं या पुराणों का इतिहासीकरण दरअसल, एक राजनीतिक परिघटना है। इसका लक्ष्य लोकविश्वासों की राजनीतिक घेरेबंदी है। धर्मध्वजधारियों ने लोकविश्वासों का अपने वर्ण और वर्ग हित में इस्तेमाल किया। बाजारपतियों ने इनको एक आंतरिक भावना से उत्पाद बना दिया, आस्था का बाजारीकरण किया। राजनीतिज्ञों ने इन्हें सत्ता के लिए रणभूमि में बदल दिया। अब अयोध्या की जगह रामसेतु का मुद्दा है- फोकस अब उत्तर से हट कर दक्षिण के प्रसंग की ओर मुड़ गया है। अब भेद, घृणा और रक्त की लहलहाती खेती पीछे छोड़ती हुई एक नई रथयात्रा शुरू होगी। दरअसल, इसी तरह धर्म, बाजार और सुविधावादी राजनीति साधारण लोक को ठगते आए हैं। यह लोकविश्वासों की डकैती है। लोक अपने विश्वासों की व्याख्या खुद नहीं करेगा तो जाहिर है धर्मध्वजधारी, बाजारपति और सुविधावादी राजनीति अपनी-अपनी व्याख्याएं देंगे। ये लोक से उसके विश्वास छीन लेंगे और उसे सांस्कृतिक खोखलेपन में धकेल देंगे।

फिर निकलेंगे असंख्य विषैले सर्प
किसी भी धार्मिक महाकाव्य में "अच्छाई" और "बुराई" के बीच जो लड़ाई है, वही सच है। बाकी चीजें काव्यात्मक कल्पनाएं हैं या धर्मध्वजधारियों की कूटनीतिक सेंधें। क्या कोई मानेगा कि वाल्मीकि रामायण में बुद्ध को चोर कहा गया है? कहां रामायण, कहां बुद्ध। जाबालि को नास्तिक कह कर लोकायत परंपरा की आलोचना की गई है। संभवतः बौद्ध धर्म के ही असर से रामायण में एक जगह राम से सीता राम से हिंसा के विरोध में कहती हैं, आप बिना वैर के ही दंडकारण्य के राक्षसों का वध करना चाहते हैं। यह विचार त्याग दें, क्योंकि बिना अपराध के किसी को मारने को लोग अच्छा नहीं कहेंगे। राम ने जवाब दिया, राक्षसों के अत्याचार से तपस्यारत मुनि बहुत दुखी हैं। मैं तुम्हारा और लक्ष्मण का परित्याग कर सकता हूं, पर ब्राह्मणों को " नरभक्षियों" से रक्षा के लिए दिया गया वचन तोड़ नहीं सकता (अरण्यकांड, नौंवां और दसवां सर्ग) । रामायण में राम ने तलवार से शंबूक का सिर काटा है, जबकि राम के लोक बिंब में धनुष-बाण है, तलवार नहीं। जाहिर है कि बुद्ध को चोर कहने से लेकर शंबूक के वध तक के प्रसंग को भी अगर इतिहास मान लिया जाए तो राम को भगवान कहना कठिन होगा। इतना ही नहीं, इतिहास की पिटारी के सैकड़ों नए विषैले सर्प निकलेंगे। हम किसे ऐतिहासिक तथ्य मानें- वाल्मीकि रामायण में शंबूक वध दिखाया गया उसे, या तुलसी के रामचरितमानस में नहीं दिखाया गया उसे? अगर रामायण को इतिहास मान कर पढ़ा जाएगा, इसमें मिथक ही मिथक मिलेगा, मिथक मान कर पढ़ा जाएगा तो इतिहास ही इतिहास मिलेगा। अतीत का सामाजिक इतिहास।


"उद्धारार्थ हत्या"

दरअसल, रामकथा को लेकर प्राचीन काल से ही पॉलीमिक्स होता आया है। राम को लेकर राजनीति नई घटना नहीं है। राम को सामाजिक भेदभाव वाली सामाजिक-राजनीतिक अवधारणा की कठपुतली बनाने के प्रयास आगे भी चलेंगे। रामचरितमानस से लगभग दो सौ वर्ष पहले रचे गए अध्यात्म रामायण में राम कहते हैं कि स्त्री-पुरुष का भेद या वर्ण भेद या आश्रय मेरे भजन में बाधक नहीं बन सकते। भक्ति हो ते कोई भी मेरा भजन कर सकता है। यहां तक भक्ति आंदोलन का असर स्पष्ट दिखाई देता है क्योंकि इस ग्रंथ में शंबूक वध अनुपस्थित नहीं है। रामायण से भिन्नता यह है कि रामायण में शंबूक राम के हाथों वध के बाद भी स्वर्ग नहीं जा पाता, बल्कि उसके स्वर्ग न जा पाने से प्रसन्न देवता राम पर फूलों की वर्षा करते हैं। अध्यात्म रामायण में शंबूक स्वर्ग चला जाता है। अध्यात्म रामायण का रचनाकार जो भी रहा हो, उसने वाल्मीकि रामायण जरूर पढ़ी होगी। अगर वह सब इतिहास था तो उसने तथ्य क्यों बदले?रामायण में शंबूक के प्रति की गई क्रूरता शूद्र विरोधी तदयुगीन ब्राह्मणों की क्रूरता है, जबकि अध्यात्म रामायण लिखने वाले ब्राह्मण ने सोचा होगा कि वध ठीक है, पर चलो इसको कम से कम स्वर्ग भेज दो- "उद्धारार्थ हत्या।"


आधुनिक रथयात्री

रामकथा में हजारों साल से इतने प्रसंग आते-जाते रहे हैं कि आम हिंदू जनता के मन में जो मुख्य कथा है, वह दरअसल इसके केवल कुछ जीवन-उदबोधक प्रसंगों में उसका विश्वास है- उसमें कुछ भी तथ्य नहीं है। भारत के लोगों ने राम कथा को इतिहास के रूप में न कभी देखा और न देखी की जरूरत महसूस की। अगल-अगल कवियों ने राम कथा को अलग-अलग सृजनात्मक दृष्टि से देखा- वाल्मीकि से निराला तक। अगर राम कथा को इतिहास माना जाता, उसकी कथा में कहीं उलटफेर नहीं होता। भवभूति के उत्तररामचरित में सीता से राम के प्रेम और स्त्री के सामाजिक अधिकार की स्वीकृति के अनेक दृश्य हैं। तुलसी ने कई फेरबदल किए। ये सब समय-समय पर अपनी परंपराओं को जांचने और जरूरत पड़ने पर उन्हें बदल देने के जातीय साहस के चिन्ह हैं। एक ये आधुनिक रथयात्री हैं, जो बदलना बिल्कुल नहीं चाहते।

Monday 22 October 2007

राम भरोसे हिंदू होटल

डॉ आंबेडकर के बाद कांचा इलैया इस धारा के सबसे बड़े चिंतक रहे हैं। इन्होंने हिंदू सामाजिक व्यवस्था पर कुछ कड़वे सवाल उठाए हैं जो आमतौर पर सवर्ण चेतना को गहरे रूप से असहज करता रहा है। उनके तर्क आमतौर पर नहीं काटे जा सकने लायक माने जाते रहे हैं। राम सेतु को एक बार फिर अपनी डूबती राजनीति का सहारा बनाने की जुगत में भिड़ी भाजपा और द्रमुक के आमने-सामने आने के बहाने उन्होंने तहलका में अपनी राय जाहिर की। मूल लेख अंग्रेजी में है। अनुवाद पंकज चौधरी ने किया हैः



पेरियार हमेशा यह कहते थे कि ईश्वर नाम की कोई सत्ता नहीं है। अब करुणानिधि लगातार यह कह रहे हैं कि राम का कोई अस्तित्व नहीं था। और जयललिता राम की सत्ता में पूरी विश्वास करती हुई जय श्रीराम का नारा लगाती हैं। करुणानिधि का राम की सत्ता में विश्वास नहीं करना उन्हें ई वी रामास्वामी नायकर पेरियार की तमिल और द्रविड़ राजनीति की निरीश्वरवादी और वैज्ञानिक परंपरा के एक रखवाले के रूप में सामने लाता है। दूसरी ओर, जयललिता का राम की सत्ता में विश्वास करना और यह कहना कि उन्हें पेरियार की निरीश्वरवादी अवधारणा में जरा भी विश्वास नहीं है, उनके उस रूप की पोल खोलता है कि वह न सिर्फ जन्मना ब्राह्मण हैं, बल्कि तमाम हिंदू देवी-देवताओं, खासतौर पर राम की आराधक हैं। सेतुसमुद्रम परियोजना पर जब बहस चल रही थी, तब जनता पार्टी के अध्यक्ष सुब्रह्मण्यम स्वामी ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दाखिल कर उससे केंद्र को यह निर्देश देने की गुजारिश की कि वह रामसेतु (एडम्स सेतु) को ध्वस्त नहीं करे। क्योंकि उनका व्श्वास है कि रामसेतु का निर्माण वाल्मीकि रचित रामायण के नायक राम के द्वारा हुआ है। ध्यान रहे कि स्वामी खुद एक तमिल ब्राह्मण हैं, और ब्राह्मण विरोधी द्रविड़ राजनीति से नफरत करते हैं।

उन्होंने यह सुप्रीम कोर्ट से यह गुजारिश तब की जब भारतीय पुरातात्त्विक सर्वेक्षण का यह हलफनामा सामने आ चुका था कि इतिहास में न तो किसी पुल का साक्ष्य मिलता है और न ही राम का। भारतीय पुरातात्त्विक सर्वेक्षण के इस हलफनामे को मीडिया ने जरूरत से ज्यादा तूल दिया, जिससे भाजपा और उसकी सहयोगी पार्टियों को सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह पर हिंदू विरोधी होने का आरोप लगाने में मदद मिली। एक ओर उन्होंने सोनिया गांधी पर ईसाई होने का आरोप लगाया, वहीं मनमोहन सिंह पर सिक्ख होने का। उन दोनों को सिर्फ इसलिए निशाना नहीं बनाया गया कि वे अपने प्रशासनिक कर्तव्य का निर्वहन नहीं कर पाए, बल्कि उन्हें इसलिए भी कि वे अल्पसंख्यक समुदाय से आते हैं। इसमें सोनिया गांधी पर सबसे ज्यादा उंगलियां इसलिए उठीं कि वे ईसाई होने के साथ-साथ विदेशी मूल की भी हैं।

उन पर निशाना साध कर हिंदूवादी ताकतें भारत के पूरे ईसाई समुदाय को एक ओर जहां राष्ट्रविरोधी ठहरा रही हैं, वहीं गुजरात और मध्यप्रदेश जैसे राज्यों में ईसाइयों पर हमले को बढ़ावा दिया जा रहा है। उनकी रणनीति यह है कि इन राज्यों में होने वाले चुनाव को खूनी खेल में बदल दें, जैसा कि संघ परिवार पहले भी कर चुका है। उनके दुर्भाग्य से करुणानिधि ने उनकी उस रणनीति की कब्र खोद दी और हिंदू बहुसंख्यक बनाम ईसाई अल्पसंख्यक की बहस को द्रविड़ बहुसंख्यक बनाम आर्य अल्पसंख्यक में बदल दिया। एक ऐसे समय में करुणानिधि ने देश में एक और गुजरात होने से बचा लिया जो शायद ईसाइयों के खिलाफ होता।

करुणानिधि न सिर्फ राम की सर्वव्यापकता को नकारते हैं, बल्कि उनके प्रति आक्रामक रुख अपनाते हुए उन्हें एक किताब में एक चरित्र से ज्यादा कुछ नहीं मानते हैं। राम के बारे में वे कहते हैं कि क्या राम का वर्णन वाल्मीकि ने एक शराबी के रूप में नहीं किया है? क्या राम के पास इंजीनियरिंग की डिग्री थी? अगर नहीं, तो फिर कैसे उन्होंने एक ऐसे पुल का निर्माण करवाया, जिससे होकर श्रीलंका पहुंचा जा सकता था? करुणानिधि के तर्कपूर्ण सवालों ने राम से संबंधित बहस पर जबर्दस्त असर छोड़ा है। हिंदुत्ववादी ताकतें कभी भी तमिल-द्रविड़ राष्ट्रीयता को बर्दाश्त नहीं कर सकतीं। अगर जयललिता ऐसा करतीं, तो उसका समर्थन खो देतीं। सुब्रह्मण्यम स्वामी की तो कोई बात ही नहीं, क्योंकि राज्य में उनकी कोई खास हैसियत नहीं है। इस मुद्दे पर सोनिया गांधी की रणनीति ने उतना काम नहीं किया, जितना उनकी चुप्पी और उदासीनता ने।

भारतीय पुरातात्त्विक सर्वेक्षण के हलफनामे ने भाजपा और उसके दिवालिये नेतृत्व की पोल खोल दी है। बड़े आर्थिक मुद्दे या समस्याओं पर भाजपा को मुख्य विपक्षी पार्टी की तह कभी भी आलोचनात्मक रवैया अपनाते हुए नहीं देखा गया। हां, वामपंथी पार्टियां जरूर इस मोर्चे पर अपनी भूमिका पूरी गंभीरता से निभाती रही हैं। रामसेतु अभियान बाबरी मस्जिद के खिलाफ चलाए गए अभियान की तरह नहीं है, जिसमें मुसलमानों को लक्ष्य बनाया गया था। यह संघर्ष मुख्य रूप से द्रविड़ तमिलों के साथ हैं, जिसके गंभीर नतीजे हो सकते हैं। यह जेहोवा या अल्लाह की तरह भी नहीं है। हिंदू धर्म में राम एक भगवान के रूप में बड़े पैमाने पर स्वीकार्य नहीं है। संघ परिवार और मुख्य संगठन सभी भारतीयों को यह समझाने में विफल रहे हैं कि राम एक मर्यादा पुरुषोत्तम हैं। हो सकता है कि मुसलमान और ईसाई राम के खिलाफ बात नहीं करें, लेकिन तमिल द्रविड़ ऐसा क्यों करें?

संघ परिवार अगर सच्चाई जानना चाहता है तो उसे यह स्वीकार कर लेना चाहिए कि दक्षिण भारत में राम उस तरह से लोकप्रिय नहीं हैं, जिस तरह शिरडी के साईं बाबा। आंध्र प्रदेश के भद्राचलम में, जहां राम का सबसे बड़ा मंदिर है, जरा-सी भी व्यस्त जगह नहीं है। बहुत कम लोग वहां जाते हैं। अगर भाजपा सोचती है कि राम का नारा उछाल कर एक बार फिर वह हिंदू वोटों की गोलबंदी कर रही है तो यह उसकी भूल है। दूसरी ओर, करुणानिधि जिस तरह से राम के प्रति आक्रामक रुख अपनाए हुए हैं और सेतुसमुद्रम का राजनीतिकरण करने में कामयाब रहे हैं, वह निश्चित रूप से तमिल वोटों के ध्रुवीकरण में मदद करेगा।

Monday 8 October 2007

यह विश्वसनीयता और दोहरेपन का दोहरा सवाल है



एक पुरानी कहावत है कि दूसरों के घरों की ओर उंगलियां उठाने से पहले अपने घर का दरवाजा साफ कर लेना चाहिए। हिंदुस्तान से जुड़ी पत्रकार मृणाल वल्लरी की तरह बहुतों को यह शिकायत होगी कि एक बड़े बदलाव का वाहक बन सकने वाले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया अपने भीतर इतनी संवेदना क्यों नहीं पैदा कर पाता कि किसी भी छोटी-बड़ी खबर को ब्रेकिंग बना कर पेश करने की तरह कभी अपने आईने में देखने की ईमानदार कोशिश करे।

बहुत दिन नहीं बीते हैं जब नोएडा से चलने वाले एक प्रसिद्ध और राष्ट्रीय कहे जाने वाले टीवी चैनल की एक एंकर ने खुदकुशी कर ली। उसकी नौकरी छूट गई थी और वह लगातार तनाव से गुजर रही थी। इसके कुछ ही दिन बाद देश की राजधानी से ही चलने वाले एक और चैनल की एक और एंकर ने खुदकुशी कर ली। मरने से पहले उसने अपने नोट में खुद को लगातार प्रताड़ित किए जाने की बात लिखी थी। और यह भी कि कैसे उसका बॉस उसके काम को नजरअंदाज कर अपनी बेटी को तरजीह दे रहा था।
वक्त-बेवक्त पति-पत्नी के झगड़ों को भी लाइव दिखाने और किसी भी छोटी-बड़ी घटना पर एसएमएस मंगाने में आगे रहने वाले सभी चैनलों ने इन दोनों एंकरों की खुदकुशी पर किसी की बाइट लेना तो दूर, इसकी खबर तक चलाना जरूरी नहीं समझा।
लेकिन इसी दौरान एक टीवी चैनल ने मॉडल बनी भिखारन शीर्षक से एक ब्रेकिंग स्टोरी दिखाई। यह एक ऐसे मॉडल की कहानी थी, जो मिस यूनिवर्स सुष्मिता सेन के साथ काम कर चुकी है। चैनल के कैमरामैनों को देखते ही उस अर्द्धविक्षिप्त मॉडल ने जिस तरह से मॉडलिंग की विभिन्न मुद्राएं बनानी शुरू कर दी, उससे उसकी प्रतिभा का अंदाजा लगाया जा सकता था। फलक से फुटपाथ पर पहुंची वह मॉडल इस हालत में भी फर्राटेदार अंग्रेजी में फैशन और ग्लैमर के बारे में बता रही थी। उसके आत्मविश्वास को देख कर कोई भी आश्चर्य कर सकता था, तो दिल्ली के प्रतिष्ठित लेडी श्रीराम कॉलेज से ग्रेजुएट उस लड़की की हालत देख कर कोई भी तरस खा सकता था। इस ब्रेकिंग स्टोरी की मार्फत चैनल ने इस मॉडल की तकलीफ बयान करने में कोई कमी नहीं छोड़ी।
तस्वीर बिल्कुल साफ है। किसी मरी हुई खबर को भी ब्रेकिंग बना कर टीआरपी बटोरने वाले चैनलों के लिए दोनों एंकरों की खुदकुशी की खबर शायद ज्यादा मसालेदार साबित होती। लेकिन फिर उस तिलिस्म की परतें भी उघड़ जातीं, जिसकी चकाचौंध में सब कुछ सुहाना और महान दिखता है।
दरअसल, खुद को सबसे तेज या अव्वल साबित करने की कोशिश में पत्रकारिता का ढोंग रचते ज्यादातर चैनलों के लिए लगातार धमाकेदार ब्रेकिंग न्यूज की शरण लेना मजबूरी बनती जा रही है। भले ही इस प्रवृत्ति से उनकी प्रतिबद्धता और ईमानदारी पर गहरे सवाल उठने लगें। उमा खुराना पर किए गए तथाकथित स्टिंग ऑपरेशन के पर्दाफाश के बाद जो तस्वीर उभरी है, उससे पार पाना चैनलों के क्या इतना सहज होगा?
दूसरा सच यह भी है कि कम से कम इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में ग्लैमर और प्रतिभा के इस घालमेल के इस दौर ने एक टीवी एंकर और रैंप की मॉडल में कोई खास फर्क नहीं रहने दिया है। पच्चीस साल की होते-होते किसी मॉडल के कैरियर पर खतरा मंडराने लगता है। उसके शरीर पर बढ़ती चर्बी, चेहरे पर आती मेच्योरिटी, और उसके बाद आने वाली पतली-छरहरी लड़ी उसके कैरियर के लिए खतरे की घंटी होती है। यही हालत टीवी एंकर की भी है। भले आप उमा भारती को उत्तर प्रदेश की सांसद बता दें या फिर टोनी ब्लेयर को अमेरिका का राष्ट्रपति- आपका चेहरा सुदर्शन है तो सब कुछ आराम से खप जाएगा। कौन जानता है कि कास्टिंग काउच का सिरा बॉलीवुड से चल कर कहां-कहां पहुंचता है। आज का हिडेन कैमरा दीवारों के पार की तस्वीरें आसानी से उतार लेता है, लेकिन चैनलों की चहारदीवारी के भीतर जाने किस धुंध का शिकार हो जाता है। शायद ऐसी ही कुछ वजहों से कहा जाने लगा है कि समाज, राजनीति या दुनिया के अंधेरे कोनों का पर्दाफाश करने चैनलों के अंदर की दुनिया भी उतनी ही लिजलिजी है।
जैसे-जैसे चैनलों ने गांव-गांव तक अपने पांव पसारे हैं- सुष्मिता सेन या मलईका अरोड़ा या टीवी पर दिखने वाले खूबसूरत चेहरे लड़कियों के आदर्श बने। खासतौर पर शहरी समाज में मेकओवर जैसे शब्दों को पहचान मिली और ग्लैमर की अंधी दौड़ ने कम से कम इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को टीआरपी का खेल बना दिया। अगर कोई लड़की टीवी में एंकरिंग करती है तो देश-दुनिया की खबरों से ज्यादा फिक्र उसे एक मॉडल की तरह अपने शारीरिक समीकरण की होती है। अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा वह खुद को मेनटेन रखने पर खर्च करती है, ताकि ज्यादा से ज्यादा दिनों तक उसकी मांग बनी रहे।
एक आधुनिक होती लड़की ने चाहा था कि उसे सामाजिक बेड़ियों और वर्जनाओं से मुक्ति मिलेगी, लेकिन उसे मुक्ति मिली उसके कपड़ों से।
हमारे यहां पुरुषों पर फिटनेस का दबाव आज भी ज्यादा नहीं है। जबकि महिलाओं पर काम और ग्लैमर की दोहरी मार पड़ रही है। मनोवैज्ञानिक भी मानते हैं कि आज के दौर में यहां नौकरीशुदा औरतों पर दबाव बहुत ज्यादा है और शरीर को सुंदर या आकर्षक बनाए रखने की चाह उसे भीतर से घुन की तरह खाए जा रही है। दो साल पहले दिल्ली के एक बंद कमरे से राखी नाम की एक मॉडल की लाश मिली थी। बाद में पता चला कि उसकी मौत भूख से हुई थी। और कि ग्लैमर और रोटी के विकल्प में से उसने ग्लैमर को चुना था।
तो क्या उसी तरह के दबावों के पैदा हुआ अवसाद अब महिला टीवी एंकरों के बीच भी पसरने लगा है? सवाल यह भी है कि चैनलों के लिए उन दो एंकरों की खुदकुशी की खबर क्या इसलिए गैरजरूरी रही कि इससे उनकी टीआरपी में कोई इजाफा नहीं होता? बात शायद इसके उलट साबित होती, अगर उन एंकरों की खुदकुशियों की भी ब्रेकिंग न्यूज बनाया जाता। लेकिन अगर यह होता तो शायद शीशे के इन घरों के भीतर टंगे पर्दों का फाश भी हो जाता।